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भारत का सर्वोच्च न्यायालय
सिविल अपीलीय क्षेत्राधिकार
सिविल अपील संख्या 4554/2018
(एसएलपी (सी) संख्या 38618/2016 से उत्पन्न)
चंपा लाल अपीलकर्ता
बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य प्रतिवादी
क
े साथ
सिविल अपील संख्या 4556/2018
(एसएलपी (सी) संख्या 11091/2017 से उत्पन्न)
निर्णय
न्यायाधीश, चेलामेश्वर
अनुमति प्रदान की गई।
ये दोनों अपीलें भारत क
े संविधान क
े अनुच्छेद 243Q की व्याख्या क
े संबंध
में कानून क
े एक महत्वपूर्ण सवाल को उठाने क
े लिए आपस में जुड़ी हुई हैं।
े प्रयोजन क
े लिए न्यूनतम आवश्यक तथ्यों को छोड़कर पूरे
तथ्यात्मक विवरण और मामले का इतिहास देना हमारे लिए आवश्यक नहीं है। यह
मुकदमा राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान नगरपालिका अध्यादेश 2008 की धारा
3 (1) (ए) क
े तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए नापासर गांव की ग्राम
पंचायत को नगर पालिका (नगरपालिका) वर्ग 4 की श्रेणी में उन्नयन करने क
े लिए
दिनांक 6.10.2008 जारी की गयी अधिसूचना क
े इर्द-गिर्द घूमता है। उक्त
अधिसूचना की वैधता को राजस्थान उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका में चुनौती दी
गई थी। इसे एक विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा खारिज कर दिया गया था। बर्खास्तगी
से असंतुष्ट होकर यह मामला एक रिट अपील में उठाया गया। रिट अपील क
े लंबित
रहने क
े दौरान, दिनांक 6.10.2008 की आक्षेपित अधिसूचना को राजस्थान राज्य
द्वारा 18.9.2009 की एक अन्य अधिसूचना द्वारा वापस ले लिया गया था। अतः रिट
अपील निरर्थक हो गई।
दिनांक 18.9.2009 की अधिसूचना को चुनौती देते हुए, एक और रिट
याचिका दायर की गई। उक्त रिट याचिका को एक खण्ड पीठ द्वारा दिनांक
13.5.2015 क
े अपने फ
ै सले द्वारा उक्त अधिसूचना को रद्द करते हुए और राज्य को
परिणामी कदम उठाने का निर्देश देते हुए अनुमति दी गई थी। इससे व्यथित होकर
एसएलपी (सी) संख्या 11091/2017 दाखिल की गई। उच्च न्यायालय क
े निर्देश क
े
बाद, 2 जून, 2016 को एक बार फिर नापसर गांव क
े लिए नगरपालिका स्थापित
करने क
े लिए एक नई अधिसूचना जारी की गई। उक्त अधिसूचना को चुनौती देते हुए
राजस्थान उच्च न्यायालय क
े समक्ष एक और रिट याचिका दायर की गई। राज्य
सरकार नगर पालिका अध्यादेश 2008 की धारा 3(1)(ए) क
े अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों
का प्रयोग करते हुए राज्य सरकार ग्राम पंचायत नापासर को नगर पालिका चतुर्थ
श्रेणी घोषित करती है। ग्राम पंचायत नापासर की वर्तमान सीमा/क्षेत्र नगर पालिका
अंततः अध्यादेश को राजस्थान नगर पालिका अधिनियम, 2009 द्वारा प्रतिस्थापित
किया गया। इसे दिनांक 3.8.2016 क
े एक फ
ै सले द्वारा खारिज कर दिया गया था।
अपील पर, इसकी पुष्टि खण्ड पीठ द्वारा अपने दिनांक 12.9.2016 क
े निर्णय द्वारा
की गई थी। इससे व्यथित होकर, एसएलपी (सी) संख्या 38618/2016 दाखिल
की गई है।
इन दो अपीलों में उच्च न्यायालय क
े दो निर्णयों की शुद्धता पर विभिन्न आधारों
पर सवाल उठाया गया है। हमारी राय में, हमारे समक्ष की गई विभिन्न प्रस्तुतियों की
जांच करना आवश्यक नहीं है। प्रतिवादी राज्य की आक्षेपित कार्रवाइयां, जिसकी
परिणति उच्च न्यायालय क
े दो विवादित निर्णयों में हुई, एक मूलभूत दुर्बलता से ग्रस्त
है जो मामले की जड़ तक जाती है।
न्यायालय द्वारा निर्दिष्ट परिणामी कार्य यह है कि एक नई अधिसूचना जारी
करने का निदेश दिया गया था। नगर पालिकाओं और उनक
े संगठनों की स्थापना
भारत क
े भाग IX A (अनुच्छेद 243P से 243ZG तक) द्वारा शासित
होती है, जिसे संविधान क
े 74 वें (संशोधन) अधिनियम, 1992 द्वारा 1.6.1993 से
संविधान में सम्मिलित किया गया है। अनुच्छेद 243 पी (ई) में ‘नगरपालिका’ की
परिभाषा अनुच्छेद 243 Q क
े तहत गठित स्वायत्त शासन की संस्था क
े रूप में की
गई है। भारत क
े अनुच्छेद 243 Q में निम्नलिखित घोषणा की गई हैः
243 Q. नगरपालिकाओं का गठनः (1) प्रत्येक राज्य में
इसका गठन किया जाएगा।
े लिए एक नगर पंचायत
(चाहे किसी भी नाम से जाना जाता हो), अर्थात एक ग्रामीण
क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में संक्रमण का क्षेत्र;
(ख) छोटे शहरी क्षेत्र क
े लिए नगरपालिका परिषद और
(ग) किसी बड़े शहरी क्षेत्र क
े लिए नगर निगम, इस भाग क
े उपबंधों क
े अनुसारः
परंतु इस खंड क
े अधीन किसी नगरपालिका का गठन ऐसे
शहरी क्षेत्र या उसक
े भाग में नहीं किया जा सकता है जिसे
राज्यपाल, क्षेत्र क
े आकार और उस क्षेत्र में किसी औद्योगिक
प्रतिष्ठान द्वारा दी जा रही या दिए जाने क
े लिए प्रस्तावित
नगरपालिका सेवाओं और ऐसे अन्य कारकों को, जो वह
लोक अधिसूचना द्वारा ठीक समझे, ध्यान में रखते हुए
औद्योगिक बस्ती क
े रूप में विनिर्दिष्ट करे।
JUDGMENT
(2) इस अनुच्छेद में," "संक्रमणकालीन क्षेत्र," "एक छोटे शहरी क्षेत्र" "या एक बड़े शहरी क्षेत्र" "से ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है जिसे राज्यपाल, क्षेत्र की जनसंख्या, उसमें जनसंख्या क े घनत्व, स्थानीय प्रशासन क े लिए सृजित राजस्व, गैर-क ृ षि क्रियाकलापों में नियोजन का प्रतिशत, आर्थिक महत्व या ऐसे अन्य कारकों को ध्यान में रखते हुए, जो वह इस भाग क े प्रयोजनों क े लिए लोक अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे।"अनुच्छेद 243Q में तीन अलग-अलग श्रेणियों क े निकायों क े गठन की परिकल्पना की गई है, जिन्हें (i) संक्रमणकालीन क्षेत्र क े लिए नगर पंचायत, (ii) छोटे शहरी क्षेत्रों क े लिए नगर परिषद और (iii) बड़े शहरी क्षेत्र क े लिए नगर निगम क े रूप में जाना जाता है। अनुच्छेद 243Q (2) क े तहत यह घोषित किया गया है कि 'एक संक्रमणकालीन क्षेत्र', 'एक छोटा शहरी क्षेत्र' और 'एक बड़ा शहरी क्षेत्र' (जिसे इसमें इसक े बाद सामूहिक रूप से 'ऐरीयाज' क े रूप में संदर्भित किया गया है) का अर्थ होगा ऐसे क्षेत्र जो राज्यपाल द्वारा भारत क े भाग IX ए क े उद्देश्य क े लिए एक सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं। अनुच्छेद 243Q (2) आगे राज्यपाल को बाध्य करता है कि वे क्षेत्रों को निर्दिष्ट करने से पहले उसमें उल्लिखित विभिन्न कारकों क े संबंध में ध्यान दें, अर्थात् क्षेत्र की जनसंख्या, जनसंख्या का घनत्व, स्थानीय प्रशासन क े लिए क्षेत्र में उत्पन्न राजस्व, गैर में रोजगार का प्रतिशत -क ृ षि गतिविधियां, आर्थिक महत्व या ऐसे अन्य कारक जो वह उचित समझे। इसलिए, यह अनुच्छेद 243Q (2) की योजना से प्रतीत होता है कि राज्यपाल अपने पूर्ण विवेक में 'क्षेत्रों' को अधिसूचित करने क े लिए स्वतंत्र नहीं हैं, लेकिन यह निर्धारित करने क े लिए आवश्यक मापदंड तय करने की आवश्यकता है कि कोई विशेष क्षेत्र एक संक्रमणकालीन क्षेत्र है या एक छोटा शहरी क्षेत्र है या ऊपर उल्लिखित कारकों क े संबंध में एक बड़ा शहरी क्षेत्र है। यह स्पष्ट है कि ऐसे मानदंड पूरे राज्य क े लिए एक समान होने चाहिए। मापदंडों क े निर्धारण क े बाद ही अनुच्छेद 243 Q (1) क े तहत विचार किए गए विभिन्न नगर निकायों का गठन किया जा सकता है। एक विशिष्ट प्रश्न क े जवाब में कि क्या अनुच्छेद 243 (Q) (2) क े तहत कोई अधिसूचना राजस्थान राज्य द्वारा जारी की गई थी, श्री गुरु क ृ ष्णक ु मार, राजस्थान राज्य क े लिए पेश होने वाले वरिष्ठ विद्वान अधिवक्ता, उन्होंने दिनांकित 4 जुलाई, 1995 और 30 अप्रैल, 2012 की दो अधिसूचनाएं पेश कीं। दोनों अधिसूचनाओं को सीधे तौर पर पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है कि ये अधिसूचनाएं राज्य सरकार को प्रदत्त वैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए दो अलग-अलग अधिनियमों द्वारा जारी की गई थीं जिन्हें "राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 1959 (निरस्त) और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009" क े रूप में जाना जाता है।उपरोक्त दो अधिनियमों क े विभिन्न प्रावधानों द्वारा इन अधिसूचनाओं को जारी करने क े लिए शक्ति क े स्रोत क े बारे में घोषणा क े अलावा, अधिसूचनाओं की अवधि और योजना से यह प्रतीत होता है कि ये अधिसूचनाएं क े वल जनसंख्या क े आधार पर नगरपालिकाओं का वर्गीकरण करती हैं। उपर्युक्त दो अधिसूचनाओं क े तहत किए गए वर्गीकरण क े उद्देश्य क े लिए अनुच्छेद 243Q (2) क े तहत जिन विभिन्न अन्य मापदंडों को ध्यान में रखना आवश्यक है, उन पर विचार नहीं किया गया। इसलिए, हमारी राय में, इन दो अधिसूचनाओं को अनुच्छेद 243 (Q) (2) क े तहत अपेक्षित अधिसूचना नहीं माना जा सकता है। अनुच्छेद 243Q (2) की आवश्यकताओं को पूरा करने वाली किसी भी अधिसूचना क े अभाव में, राजस्थान राज्य द्वारा नापासर ग्राम पंचायत को नगरपालिका बनाने क े लिए अपग्रेड करने की पूरी कवायद [जो अनुच्छेद 243Q (1) (ए) में उल्लिखित नगर पंचायत क े बराबर है] असंवैधानिक है क्योंकि यह भारत क े संविधान क े अनुच्छेद 243 Q क े तहत संविधान की आवश्यकताओं क े साथ असंगत है। इसलिए, दिनांक 6.10.2008 की प्रारंभिक अधिसूचना अपने आप में टिकाऊ नहीं है। दुर्भाग्य से, इस पहलू पर उच्च न्यायालय द्वारा ध्यान नहीं दिया गया है क्योंकि इसे स्पष्ट रूप से उच्च न्यायालय क े संज्ञान में नहीं लाया गया था। यह तथ्य कि न्यायालय क े समक्ष कोई वादकारी प्रासंगिक सिद्धांतों और कानून क े प्रावधानों को इंगित नहीं करता है, न्यायालय को वाद में शामिल मुद्दों की जांच करने से नहीं रोकता है, विशेष रूप से, जब प्रक्रिया जो न्यायालय क े समक्ष मुकदमेबाजी की विषय वस्तु है, संविधान क े आदेश क े साथ असंगत है। यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि अदालतें संविधान और कानूनों को ध्यान में रखने क े लिए बाध्य हैं। इसलिए हमारे पास यह मानने क े अलावा कोई विकल्प नहीं है कि दिनांक 6.10.2008 की प्रारंभिक अधिसूचना असंवैधानिक है। इसलिए, उस अधिसूचना क े बाद की विभिन्न कार्रवाइयों की वैधता, जो अधिसूचना और उच्च न्यायालय क े अन्य निर्णयों का पालन करती हैं, जिन्होंने उन कार्यों की वैधता की जांच की, हमारे विचार में, जांच की आवश्यकता नहीं है। एस. सी. पराशर और एक अन्य बनाम वसंतसेन द्वारकादास और अन्य, एआईआर 1963 एससी 1356 विभाग ने इस मामले में उच्च न्यायालय क े समक्ष 1953 क े संशोधन अधिनियम पर भरोसा किया था।हालांकि उच्च न्यायालय ने धारा 34 की उप-धारा 3 क े दूसरे परंतुक क े कोण से मामले पर विचार किया और इसे असंवैधानिक क े रूप में भी रद्द कर दिया, लेकिन इसने धारा 31 को ध्यान में नहीं रखा। मूल अधिनियम की खंड 34 की उपखंड (1), (2) और (3) (जिसक े अंतर्गत हमारे समक्ष यह तर्क दिया गया था कि यदि उच्च न्यायालय द्वारा इसका उल्लेख नहीं किया गया है तो हम खंड 31 को ध्यान में नहीं रख सकते। किंतु न्यायालय को संविधियों का न्यायिक संज्ञान लेना अपेक्षित है और यदि अधिनियम, 1953 की धारा 31 में यह कहा गया है कि निश्चित रूप से 1953 क े अधिनियम द्वारा किए गए संशोधन लागू होंगे और 1 अप्रैल, 1948 से पहले समाप्त होने वाले किसी भी वर्ष क े लिए किसी भी निर्धारण या पुनर्निर्धारण को हमेशा लागू माना जाएगा, तो यह न्यायालय और अधिकरणों का कर्तव्य है कि वे धारा 34 को इस तरह से पढ़ें, न कि किसी अन्य तरीक े से। हमारी राय में धारा 31 क े बिना धारा 34 को पढ़ना उच्च न्यायालय क े लिए स्वतंत्र नहीं था जिसमें एक विधायी निर्माण शामिल था और धारा 34 को पूर्वव्यापी बनाया गया था।इस चूक ने उच्च न्यायालय क े तर्क को दूषित कर दिया है। 121 तैयार किए गए प्रश्न आयकर अधिनियम की खंड 34 (3) क े प्रावधानों से संबंधित हैं। उन्होंने रिटर्न की तारीखों (7-3-1951 और 14-1-1952) और आकलन की तारीख (17-11-1953) क े दो सेट का भी उल्लेख किया। अब हम जानते हैं कि अप्रैल 1952 क े पहले दिन से पहले, धारा 34 की उप-धारा 3 क े तहत मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन क े लिए चार साल की सीमा थी, लेकिन उसक े बाद संशोधन अधिनियम की धारा 18 द्वारा जोड़े गए प्रावधान द्वारा उस सीमा को हटा दिया गया था। 1953 क े और उसी अधिनियम की धारा 31 द्वारा 1953 क े संशोधन अधिनियम (1-4-1-952) क े प्रारंभ होने से पहले या बाद में किए गए आकलन को वैध घोषित किया गया था यदि कार्यवाही 8 सितंबर, 1948 क े बाद शुरू हुई थी। बनाए गए प्रश्न का उत्तर धारा 31 क े संदर्भ क े बिना नहीं दिया जा सकता है और भले ही पक्षकारों ने इसे उच्च न्यायालय क े ध्यान में नहीं लाया हो, यह उच्च न्यायालय का कर्तव्य था कि वह धारा 31 क े वैध प्रावधानों पर गौर करे।यदि उच्च न्यायालय ने ऐसा नहीं किया तो हम इस न्यायालय क े ऐसे किसी नियम या विनिश्चय क े बारे में नहीं जानते जो हमें ऐसे विधिमान्यकरण उपबंध पर विचार करने से रोकता है जो उच्च न्यायालय क े विनिश्चय क े समय विद्यमान था और उसकी उपेक्षा की गई थी और जिसने स्वयं उच्च न्यायालय की राय क े लिए प्रतिपादित प्रश्न का उत्तर प्रस्तुत किया था। इस न्यायालय क े किसी भी निर्णय में यह नहीं कहा गया है कि धारा 66 क े तहत संदर्भित प्रश्न क े सही उत्तर का निर्धारण करने में, यह न्यायालय क े वल उन वर्गों तक ही सीमित है जिन्हें न्यायाधिकरण या उच्च न्यायालय ने संदर्भित किया है।वास्तव में, ऐसे कई मामले हैं जो इसक े विपरीत कहते हैंःक ु सुमबेन महादेविया बनाम सीआईटी [(1960) 3 एससीआर 417],जोरास्टर एंड क ं बनाम सीआईटी [(1961) 1 एससीआर 210]और हाल ही में सिंधिया स्टीम नेविगेशन क ं पनी बनाम सीआईटी [(1961) 42 आईटीआर 589] का मामला है।अतः हमें इन अपीलों को अवधारित करने क े लिए धारा 31 पर विचार करना चाहिए। उच्च न्यायालय क े उन निर्णयों की, जिन्होंने उन कार्यों की वैधता की जांच की, हमारे विचार से, जांच किए जाने की आवश्यकता नहीं है। राज्य की ऐसी सभी बाद की कार्रवाई जिसक े कारण मुकदमेबाजी हुई, एक मौलिक संवैधानिक दोष से ग्रस्त है। संविधान क े भाग IXA और विशेष रूप से अनुच्छेद 243Q (2) क े वास्तविक दायरे और योजना की जांच किए बिना दिए गए उच्च न्यायालय क े आक्षेपित निर्णय पर इंक ु रियम की श्रेणी में आते है । विशेष अनुमति याचिका (सी) संख्या 11091/2017 में गैर-राज्य प्रतिवादी की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री ए. सुब्बा राव ने प्रस्तुत किया कि उच्च न्यायालय द्वारा अभिलिखित निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए कि अंतराल में, प्रश्नगत भौगोलिक क्षेत्र में बहुत विकास हुआ (जैसे कि उद्योगों, शैक्षणिक संस्थानों और अस्पतालों की स्थापना आदि) और इसलिए, यह न्यायालय प्रश्नगत क्षेत्र को नगरपालिका क े रूप में अपग्रेड करने की अधिसूचना में हस्तक्षेप नहीं कर सकता क्योंकि इस तरह क े हस्तक्षेप से नगरपालिका को एक बार फिर से ग्राम पंचायत में बदल दिया जाएगा। इस सवाल पर कि इस तरह क े परिणाम से गैर-राज्य प्रतिवादी को क्या प्रतिक ू ल प्रभाव पड़ेगा, श्री राव ने कहा कि इस बात की संभावना है कि उद्योगों को इस क्षेत्र से दूर स्थानांतरित कर दिया जाए।यह सिर्फ एक आशंका है।हमें ऐसी आशंकाओं क े लिए अनुरोध करने में कोई आधार नहीं मिलता है और न ही हमें ऐसा कोई कारण दिखाई देता है जो ऐसी संभावना का कारण बन सकता है। अतः निवेदन अस्वीकार किया जाता है। तदनुसार अपीलों का निपटान किया जाता है। न्यायाधीश, चेलमेश्वर न्यायाधीश, संजय किशन कौल नई दिल्ली, 26 अप्रैल, 2018 यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास' क े जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है। अस्वीकरण: यह निर्णय पक्षकार को उसकी भाषा में समझाने क े सीमित उपयोग क े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से भी अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।