Kalua @ Koshal Kishore v. Rajasthan State; Pintu @ Kamal Kishore & Ors. v. Rajasthan State

Supreme Court of India · 31 Jan 2019
R. Banumathi; R. Subhash Reddy
Criminal Appeal No 138/2010; Criminal Appeal No 139/2010
criminal appeal_dismissed

AI Summary

The Supreme Court upheld life imprisonment convictions under Section 302 read with Section 34 IPC based on credible eyewitness testimony and corroborative evidence, dismissing appeals challenging the same.

Full Text
Translation output
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
आपराधिक अपीलीय आधिकारिकता
आपराधिक अपीलीय संख्या 138/2010
कलुआ@कोशल किशोर - अपीलकर्ता
बनाम
राजस्थान राज्य - प्रतिवादी

े साथ
आपराधिक अपीलीय संख्या 139/2010
पिंटू उर्फ कमल किशोर और अन्य - अपीलकर्ता
बनाम
राजस्थान राज्य - प्रतिवादी
निर्णय
भानुमति, न्यायाधीश :
JUDGMENT

(1) ये अपीलें 18 अगस्त, 2008 को राजस्थान उच्च न्यायालय, पीठ जयपुर द्वारा डी.बी.सीआरएल 10/2005 और डी.बी.सीआरएल अपील संख्या 99/2005 में पारित निर्णय और आदेश से उत्पन्न होती हैं। जिसक े द्वारा उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ताओं को धारा 302 सहपठित धारा 34 भारतीय दंड संहिता क े तहत दोषसिद्धि की पुष्टि की और उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी। (2) संक्षेप में मामला इस प्रकार है। 17 सितंबर, 1999 को एक प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत पर, जिसमें कहा गया था कि शाम लगभग 5.00 बजे मृतक लखन मुख्य बाजार बयाना में नगर परिषद/निगम क े सफाई कर्मचारियों क े निरीक्षण कार्य में व्यस्त था। उस समय लखन सुस्या उर्फ लोक े श (ए- 4), पिंटू उर्फ कमल किशोर (ए-1), लड्डू उर्फ मूल चंद (दोषमुक्त), दिनेश (ए-2), कलुआ (ए-5), सतीश (ए-3) (दोषमुक्त) और बंदूक और हथियारों से लैस अन्य व्यक्तियों से घिरा हुआ था। पिंटू उर्फ कमल किशोर (ए-1) और कलुआ उर्फ कोशल किशोर (ए-5) ने बाजार में दहशत फ ै लाने क े लिए हवा में गोलियां चलाई ं। सुस्या उर्फ लोक े श (ए-4) ने अपने कट्टा (देशी बंदूक) से लखन पर गोली चलाई, जो लखन क े पेट क े बाई ंओर लगी और उसक े बाद सभी आरोपी मौक े से फरार हो गए। प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) और मौक े पर मौजूद अन्य लोगों ने घायल लखन को अस्पताल में भर्ती कराया और अस्पताल में इलाज क े दौरान लखन ने दम तोड़ दिया। प्राथमिक तौर पर अपीलकर्ताओं क े खिलाफ आईपीसी की धारा 307 क े तहत मामला दर्ज किया गया था। लेकिन लखन की मौत क े बाद एफआईआर को धारा 302 आईपीसी में बदल दिया गया। (3) प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) और राक े श (पीडब्लू-12) क े साक्ष्य पर विचार करने पर और यह कि घटना स्थल से खाली कारतूस की बरामदगी हुई थी और पिंटू @ कमल किशोर (ए-1) से देशी बंदूक (कट्टा) की बरामदगी हुई थी, विचारण न्यायालय ने पिंटू @कमल किशोर (ए-1), कलुआ @कोशल किशोर (ए-

5) और सुस्या @ लोक े श (ए-4) को आईपीसी की धारा 302 सहपठित धारा 34 क े तहत दोषी ठहराया और उनमें से प्रत्येक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। निचली अदालत ने दिनेश (ए-2) और सतीश (ए-3) तथा लड्डू उर्फ मूल चंद को दोषमुक्त कर दिया। अपील में, उच्च न्यायालय ने पैरा (2) में पूर्वोक्त रूप में अपीलार्थियों की दोषसिद्धि की पुष्टि की। (4) हमने अपीलकर्ता - कलुआ उर्फ कोशल किशोर (ए-5) की ओर से पेश होने वाली विद्वान वकील सुश्री चारु माथुर और अपीलकर्ताओं- पिंटू उर्फ कमल किशझोरे (ए-1) और सुस्या उर्फ लोक े श (ए-4) की ओर से पेश होने वाले विद्वान अधिवक्ता श्री अशोक क े. श्रीवास्तव को बहुत विस्तार से सुना है। हमने प्रतिवादी राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री जयंत भट्ट को भी सुना है और आक्षेपित निर्णय और अभिलेख पर अन्य सामग्री का भी अवलोकन किया है। (5) अपीलकर्ता पिंटू उर्फ कमल किशोर (ए-1) और सुशया उर्फ लोक े श (ए-4) की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री अशोक क े. श्रीवास्तव ने अन्य बातों क े साथ-साथ बालका सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य, (1975) 4 एससीसी 511 में इस न्यायालय क े फ ै सले पर भरोसा किया। यह तर्क दिये गए कि क ु छ अभियुक्तों, नामत: दिनेश (ए-2) और सतीश (ए-3) को झूठा फ ं साया जाना, अपीलकर्ताओं की मिलीभगत पर गंभीर संदेह पैदा करता है और विचारण न्यायालय या अपीलीय न्यायालय द्वारा इन पहलुओं पर ठीक से विचार नहीं किया गया था। (6) विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय ने इस तथ्य क े समवर्ती निष्कर्षों को दर्ज किया कि चश्मदीद गवाह प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) और राक े श (पीडब्लू-12) घटना क े प्राक ृ तिक गवाह हैं। सबूतों क े मूल्यांकन पर, दोनों न्यायालयों ने समवर्ती निष्कर्षों को दर्ज किया, जिसमें कहा गया कि प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) और राक े श (पीडब्लू-12), जो कि मुख्य बाजार, बयाना, पंचायती राज मंदिर में क ु छ सामान खरीद रहे थे, और उन्होंने घटना देखी कि पीड़ित-लखन अपीलकर्ताओं और अन्य अभियुक्तों से घिरा हुआ था। जब दोनों न्यायालयों ने उनक े सबूतों को विश्वसनीय रूप से स्वीकार कर लिया है, तो हमें इन गवाहों क े सबूतों को बदनाम करने का कोई आधार नहीं मिलता है। (7) विभिन्न निर्णयों को निर्दिष्ट करने क े पश्चात्, विचारण न्यायालय ने अपने निर्णय क े पैरा (37) द्वारा यह मत व्यक्त किया कि प्राप्त मामले क े तथ्य और परिस्थितियों क े विश्लेषण पर, यह इंगित किया कि जिस प्रकार अनाज को आसानी से भूसी से अलग किया जा सकता है, झूठ और सत्य को आसानी से अलग किया जा सकता है। अभियोजन पक्ष द्वारा दिए गए सबूतों पर विचार करते हुए, विचारण न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि अभियुक्त नं. 2 और 3 अर्थात्, दिनेश (ए-2) और सतीश (ए-3) क े दोषमुक्ति पर, अपराध करने में अन्य अभियुक्तों की संलिप्तता पर संदेह नहीं किया जा सकता है। निचली अदालत और उच्च न्यायालय ने साथ-साथ यह माना कि चश्मदीद गवाह प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) और राक े साक्ष्य आरोपी पिंटू उर्फ कमल किशोर (ए-1), सुस्या उर्फ लोक े श (ए-4) और कलुआ उर्फ कोशल किशोर (ए-5) क े अपराध को साबित करने क े लिए तर्क संगत और अकाट्य हैं। प्रत्यक्षदर्शियों क े सुसंगत कथन को ध्यान में रखते हुए, हम भिन्न दृष्टिकोण अपनाने क े लिए कोई अच्छा आधार नहीं पाते हैं। (8) जहां तक प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) की विश्वसनीयता पर हमला करने वाले तर्क का संबंध है कि उसे एक अन्य हत्या में दोषी ठहराया गया है और वह आजीवन कारावास का सामना कर रहा है, अपने निर्णय क े पैरा (38) में विचारण निचली अदालत ने अपने निष्कर्षों को यह कहते हुए अभिलिखित किया कि वर्तमान घटना किसी राजेश की हत्या क े मामले में प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) को आजीवन कारावास देने और थालेश की हत्या करने क े प्रयास से पहले की अवधि से संबंधित है। विचारण न्यायालय ने सही अभिनिर्धारित किया है कि क े वल प्रेम शंकर (पीडब्लू- 9) को अन्य मामले में दोषी ठहराए जाने क े कारण, यह उसकी विश्वसनीयता को प्रभावित नहीं करता है, जबकि वह इस घटना का गवाह है । (9) जहां तक सुस्या उर्फ लोक े श (ए-4), जिसने कि पीड़ित-लखन क े पेट पर गोली चलाई है, से कट्टा (देश निर्मित बंदूक) की गैरबरामदगी क े बारे में विवाद का संबंध है, दोनों न्यायालयों ने समवर्ती निष्कर्षों को अभिलिखित किया है कि इस तरह की गैरबरामदगी या हथियार का अप्रस्तुतिकरण अभियोजन क े मामले को भौतिक रूप से प्रभावित नहीं करेगा। (10) अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत चश्मदीद गवाहों और अन्य सामग्रियों क े साक्ष्य क े मूल्यांकन पर, विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय ने समवर्ती निष्कर्षों को अभिलिखित किया कि प्रेम शंकर (पीडब्लू-9) और राक े साक्ष्य अविवाद्य हैं और हमें विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय क े समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला है। (11) तदनुसार अपीलें खारिज की जाती हैं। (12) चूंकि अपीलार्थियों को दस वर्ष से अधिक क े कारावास का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए अपीलार्थी माफी क े लिए अपने मामले पर विचार करने क े लिए सक्षम प्राधिकारी से संपर्क करने क े लिए स्वतंत्र हैं। जब भी इस संबंध में इस तरह का प्रतिनिधित्व किया जाता है तो संबंधित प्राधिकारी को कानून क े अनुसार निर्णय लेना होता है। न्यायाधीश (आर. बानुमथि) न्यायाधीश (आर सुभाष रेड्डी) नई दिल्ली, 31 जनवरी, 2019 यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास' क े जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है। अस्वीकरण: यह निर्णय पक्षकार को उसकी भाषा में समझाने क े सीमित उपयोग क े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से भी अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।