M. R. Krishna Murthy v. New India Assurance Company Ltd. & Ors.

Supreme Court of India · 05 Mar 2019
A. K. Sikri; S. Abdul Nazeer
Civil Appeal Nos. 2476-2477 of 2019 @ SLP (Civil) Nos. 31521-31522 of 2017
civil appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court enhanced compensation for an 18-year-old accident victim by properly considering his permanent disability and future earning capacity, while recommending systemic reforms for speedy motor accident claim settlements.

Full Text
Translation output
प्रतिवेद्य
भारिीय सवोच्च न्यायालय
ससववल अपीलीय अधिकाररिा
ससववल अपील सं. 2476-2477/2019
(एस. एल. पी. (ससववल) सं. 31521-31522/17 से उत्पन्न)
एम. आर. कृ ष्णा मूर्ति .....अपीलार्थी(गण)
बनाम
न्यू इंडिया एशोरंस क
ं पनी लललमटेि व अन्य ......प्रत्यर्थी(गण)
तनर्णय
ए. क
े . सीकरी, न्यायािीश
अनुमर्त प्रदान की गई |
JUDGMENT

2) अपीलकताि जो कक, यहााँ एक व्यावसार्यक अधिवक्ता है, को 18 साल कक अल्प आयु में एक बड़ी दुर्िटना का सामना करना पड़ा, जोकक 26 मई 1988 को हुई, जब वह ददल्ली क े मॉिनि स्क ू ल में ववद्यार्थी र्था | वह अपना 18वां जन्मददन मनाने क े ललए, जो कक 27 मई, 1988 को पड़ता र्था, अपनी मााँ क े सार्थ ददल्ली से मसूरी की यात्रा कर रहा र्था | उक्त दुर्िटना ददल्ली-देहरादून राजमागि पर हुई, जजसमें उसकी पूरी बायीं टांग क ु चली गई | उसे अस्तपताल ले जाया गया, जहााँ वह दो महीने तक भती रहा यद्यवप अपीलकताि को दो महीने क े पश्चात् छ ु ट्टी दे दी गई र्थी तर्थावप 6 वर्षो तक उसका उपचार जारी रहा, जजस अवधि क े दौरान उसे आगे भी ऑपरेशन से गुजरना पड़ा | क ु ल लमलकर तीन बार सजिरी हुई | पहली प्लेट और स्र ू लगाने क े ललए, दूसरी प्लेट और स्र ू हटाने क े ललए, जजसमें िॉक्टर को पता चला कक वह फ़ीमर हड्िी क े प्लेट्स और स्र ू को नहीं हटा सकता है | नतीजा यह है कक आज भी फ़ीमर हड्िी में उक्त स्र ू और प्लेट्स लगे हैं | जजससे उससे कभी भी फ्र ै क्चर होने का खतरा है | तीसरा ऑपरेशन दादहने पैर में एक गांठ को हटाने क े ललए ककया गया र्था, जो दुर्िटना क े बाद क ु छ वर्षो में ववकलसत हुई र्थी | 3) अपीलकताि क े अनुसार, उपरोक्त भीर्षण दुर्िटना का क ु ल पररणाम यह है कक वह आज स्र्थाई ववकलांगता (आने-जाने में ददि और कदठनाई) से पीडड़त है | यह ववकलांगता जिला सरकारी अस्पताल, मुजफ्फ़रनगर द्वारा प्रमाणणत प्रमाण पत्र ददनांककत 10.12.2005 क े अनुसार 40% की दर से (प्रदशि PW-4/103) प्रमाणणत है |

4) अपीलकताि ने दुर्िटना क े दावे हेतु मोटर दुर्िटना दावा अधिकरण मुजफ्फ़रनगर, उ.प्र. में एक आवेदन पत्र दाणखल ककया चूाँकक दुर्िटना उक्त (एम.ए.सी.टी.) क े अधिकार क्षेत्र में हुई र्थी | हांलाकक, उक्त दावा याधचका क े हस्तांतरण क े ललए अपीलार्थी क े आवेदन पर, इस अदालत ने 12 जनवरी, 1998 को आदेश पाररत कर मामले को पदटयाला हाउस न्यायालय, नई ददल्ली में हस्तांतररत कर ददया र्था | एम.ए.सी.टी. ने परीक्षण क े समापन क े उपरांत अपने द्वारा पाररत अवािि ददनांककत 23.05.2007 में अम्बेसिर कार क े ड्राईवर को पूरी तरह जजम्मेदार ठहराया जजसकी लापरवाही से अम्बेसिर कार ने उस वाहन को टक्कर मार दी जजसमें अपीलकताि यात्रा कर रहा र्था | चूाँकक उपरोक्त दुर्िटना चालक की लापरवाही क े कारण हुई र्थी (प्रत्यर्थी न. 4 एम.ए.सी.टी. प्रकरण में) और प्रत्यर्थी न. 1, न्यू इंडिया एशोरंस क ं पनी लललमटेि से बीमाकृ त है इसललए बीमा क ं पनी, वाहन चालक और वाहन क े स्वामी को भी इस प्रकरण में प्रत्यर्थी क े रूप में श्ृंखलाबद्ि ककया गया | उसक े उपरांत एम.ए.सी.टी. ने दावे की मात्रा क े वववाद पर ववचार करते हुए रुपये 8,48,000/- का प्रर्तकर अधिर्नणणित ककया, जो र्नम्न रूप से ववभाजजत है: ददि और पीड़ा रुपये 50,000/- दवाईयााँ रुपये 2,10,000/- ववशेर्ष आहार रुपये 15,000/- वाहन खचि रुपये 15,000/- 18 क े गुणक को अपनाने वाली आय क े नुकसान पर मुआविा रुपये 4,08,000/- स्र्थाई ववकलांगता रुपये 75,000/- अटेंिेंट रुपये 25,000/- आनंद की हार्न रुपये 50,000/- क ु ल योग रुपये 8,48,000/- 5) एम.ए.सी.टी. ने दस साल क े अन्तराल क े ललए 7% की दर से ब्याज भी ददया, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कक, दावा याधचका दो बार अनुपजस्र्थर्त में खाररज कर दी गई है |

6) अपीलकताि ने तदुपरान्त एक अपील उच्च न्यायालय में दाणखल की हालााँकक जब इसकी सुनवाई हुई कोई भी अपीलकताि की तरफ से उपजस्र्थत नहीं हुआ | इस तथ्य को देखते हुए की लगातार कई तारीख पर अपीलकताि का प्रर्तर्नधित्व नहीं ककया गया, परन्तु अनुपजस्र्थर्त में अपील को खाररज करने कक बजाय, उच्च न्यायालय ने बीमा क ं पनी क े अधिवक्ता को सुनने और अलभलेख का अवलोकन करने क े पश्चात् अपील का फ ै सला गुण क े आिार पर कर ददया |

7) अपील में अपीलकताि का मुख्य तक ि यह है कक एम.ए.सी.टी. ववकलांगता प्रमाण पत्र को ध्यान में रखने में ववफल रहा र्था | जजसमें यह दशािया गया र्था कक, अपीलकताि को स्र्थाई ववकलांगता का 40% तक नुकसान हुआ र्था | इस तक ि को उच्च न्यायालय ने इस आिार पर खाररि कर ददया कक एम.ए.सी.टी. ने वास्तव में अपीलकताि द्वारा भववष्य में होने वाले नुकसान कक गणना इस आिार पर की र्थी, जजसमें अपीलकताि ने अपनी आय क्षमता को प्रभाववत करने वाली 40% की सीमा तक की कायाित्मक ववकलांगता का सामना ककया र्था | उच्च न्यायालय ने अपीलकताि द्वारा दाणखल वर्षि 2003-04, 2004-05, 2005-06 क े आयकर ररटनि का भी अवलोकन ककया | उच्च न्यायालय क े अनुसार, यह आयकर ररटनि आप्रासंधगक र्थे और उन्हें नहीं माना जा सकता र्था क्य कक वर्षि 1988 में दुर्िटना हुई र्थी और उसक े तत्पश्चात ही क्षर्तपूर्ति दुर्िटना की तारीख से तय की जानी र्थी, जब दावेदार मात्र 18 वर्षि का लड़का र्था | इसक े अलावा, उच्च न्यायालय ने क ु छ अन्य आिार पर भी अपनी दटप्पणी दी जजसमें यह उल्लेख ककया गया कक अपीलकताि को 70 वर्षि की आयु प्राप्त करने तक ड्राइवर की सेवाओं की आवश्यकता होगी जो कक एक अपेक्षक्षत जीवन काल है हालााँकक इस दावे क े समर्थिन में कोई साक्ष्य नहीं ददया गया र्था | अपीलकताि द्वारा दी गई ववकलांगता और शारीररक अक्षमता की प्रकृ र्त को देखते हुए उच्च न्यायालय ने 50,000/- रुपये की एकमुश्त अर्तररक्त रालश भी अपीलकताि को दी | 8) इसक े बाद अपीलकताि ने उच्च न्यायालय द्वारा ददए गए फ ै सले ददनांककत 17 मई, 2016 क े पुनरीक्षण हेतु लसववल प्रकरया क े आदेश LXVII, र्नयम 1 क े अंतगित एक पुनरीक्षण याधचका को प्रार्थलमकता दी जजसमे एम.ए.सी.टी. द्वारा ददए गए त्रुदटपूणि र्नणिय को दशािया गया र्था चूाँकक इसने गुणक 17 का गुणन ककया र्था जबकक 18 क े गुणक को आय क े नुकसान और मुआवजे में गणना करते समय अपनाया जाना र्था | इस तथ्य को देखते हुए कक, अपीलकताि या अपीलार्थी क े वल 18 वर्षि की आयु का र्था जब उसे चोटें आई र्थीं | यह अलभवाक उच्च न्यायालय द्वारा मान ललया गया और गुणक 17 की बजाय 18 को मान ललया गया, जजसक े फलस्वरूप 24,000/- रुपये की रालश ब्याज सदहत बढ़ा दी गई | 17 मई, 2016 का मुख्य र्नणिय और आदेश ददनांककत 19 मई 2017 जो कक पुनरीक्षण याधचका में पाररत ककया गया है वतिमान अपील का ववर्षय बबंदु है | 9) श्ी अरुण मोहन, अपीलकताि क े ललए उपजस्र्थत वररष्ठ वकील ने दो तरह की प्रस्तुर्तयां की है जोकक अनुवती तरीक े से पररभावर्षत की गई है: (i) पहले उदाहारण में यह प्रस्तुत ककया गया है कक एम.ए.सी.टी. और सार्थ ही उच्च न्यायालय ने भी भववष्य की कमाई क े नुकसान का आकलन करते हुए, 5000/- रुपये की दर से आय को र्निािररत करक े भववष्य की कमाई की गणना करने में त्रुदट की है | ववद्वान वररष्ठ वकील ने र्नवेददत ककया कक, र्नसंदेह उस वक्त अपीलकताि क े वल एक छात्र र्था और उस स्तर पर उसे कोई वास्तववक कमाई नहीं र्थी, परन्तु भववष्य की संभावनाओं पर ववचार ककया जा सकता है, जैसा कक इस न्यायालय द्वारा पाररत र्नणिय की श्ृंखला में र्निािररत कानून है | ववद्वान वररष्ठ वकील का र्नवेदन यह र्था कक भववष्य की कमाई क े नुकसान का आकलन करते समय, अदालत को पीडड़त की पाररवाररक पृष्ठभूलम, संस्र्था जजसमें वह लशक्षा प्राप्त कर रहा र्था, अपनी पसंद क े व्यवसाय को चुनने की क्षमता, मौजूदा पररजस्र्थर्तओं को देखते हुए उसक े व्यवसाय की संभावनायें आदद को भी देखना चादहए र्था | इस सन्दभि में, श्ी अरुण मोहन ने बताया कक अपीलकताि वकील क े पररवार से हैं जजसक े माता-वपता सवोच्च न्यायालय क े वररष्ठ वकील है और वहााँ प्रेजक्टस कर रहे हैं | इस पाररवाररक पृष्ठभूलम क े कारण अपीलकताि भी क़ानूनी व्यवसाय में शालमल होना चाहता र्था | हालााँकक दुर्िटना क े समय वह स्क ू ल में पढ़ रहा र्था परन्तु उसक े उपरांत उसने कानून की पढ़ाई का इरादा ककया हुआ र्था | उसने वस्तुतः कानून की पढ़ाई की और क़ानूनी पेशे में शालमल भी हो गया जैसा कक ररकॉिि पर भी उपलब्ि है | जजस वक्त तक अपीलकताि वकील बना, उसका क े स एम.ए.सी.टी. में लंबबत र्था | संपन्न पाररवाररक पृष्ठभूलम क े सम्बन्ि में आगे र्नवेददत है कक, दुर्िटना क े समय अपीलकताि प्रर्तजष्ठत मॉिनि स्क ू ल, बाराखंभा रोि, नई ददल्ली में पढ़ रहा र्था | यह तमाम परजस्र्थर्तयााँ स्पष्ट रूप से दशािती हैं कक अपीलकताि का एक उज्जवल भववष्य र्था और इसललए उसकी भववष्य की आय का आकलन उपरोक्त संभावनाओं को आंक े बबना नहीं ककया जा सकता और उसकी भववष्य की कमाई का र्निािरण मात्र 5000/- रुपये की दर से करना बहुत ही कम है | उन्ह ने यह भी र्नवेददत ककया कक यद्यवप उच्च न्यायालय क े समक्ष दायर पुनरीक्षण याधचका में उक्त आशय का ववलशष्ट आिार ललया गया र्था, परंतु उच्च न्यायालय ने उस पर कदावप ववचार नहीं ककया | (ii) श्ी अरुण मोहन कक दूसरी प्रस्तुर्त एक भावुक दलील है जजसका उद्देश्य र्नम्नललखत स्तर पर प्रणाली में सुिार करना र्था: a) सड़क सुरक्षा पर बबना ककसी देरी क े पीडड़त को पयािप्त मुआवजा प्रदान करना | दाव क े शीघ्र र्नपटारे को सुर्नजश्चत करने क े ललए, वैकजल्पक सािन का सहारा लेना जो नवीन उपाय को लागू कर सकता है | b) एम.ए.सी.टी. द्वारा मामल का तेजी से र्नपटारा सुर्नजश्चत करने क े ललए नवीन उपाय को अपनाने हेतु पयािप्त कदम की शुरुआत | c) पीडड़त या पीडड़त क े पररवारजन क े सुरक्षक्षत हार्थ में मुआविे की प्राजप्त सुर्नजश्चत करना, वह भी एक र्नरंतर अवधि में | 10) श्ी अरुण मोहन क े इन पहलुओं और सुझाव पर ववस्तृत र्नवेदन र्नम्नानुसार हैं: “सड़क सुरक्षा और मुआविा ऐसा देखा गया है कक प्रर्त वर्षि (1,40,000 लोग सड़क दुर्िटनाओं में मरते हैं जबकक 5,00,000 र्ायल होते है), जजसमें से 10% से भी कम दावे क े ललए एम.ए.सी.टी. तक पहुाँचते हैं, जबकक 90% तक की न्याय तक पहुाँच नहीं है और 10% या उसक े लगभग जोकक एम.ए.सी.टी. तक पहुाँचते हैं, उनक े संदभि में प्रश्न उठते हैं:

1. इन दाव की सुनवाई क े ललए राज्य न्यायपाललका और बीमा क्षेत्र की लागत क्या है ?

2. समय देरी क्या है ?

3. दाव क े भुगतान तक र्ायल और उस पर र्नभिर व्यजक्त ककस आय स्रोत पर गुजारा करते हैं?

4. दावे क े अंर्तम भुगतान में वास्तव में प्राप्तकतािओं तक ककतना पैसा पहुाँचता हैं और ककतना खो जाता है ?

5. दावे क े भुगतान क े लगभग 5 वर्षि बाद अधिकतर प्राप्तकतािओं क े पास क्या रह जाता हैं ? यह एक जमीनी स्तर क े सवेक्षण पर क ु छ परेशान करने वाले प्रश्न र्थे | अलग ढंग से कहे, तो सबसे पहले, जैसा कक अधिकांश लोग गरीब हैं, शायद ही न्याय तक कोई पहुाँच पाता हो, देश क े संसािन को बबािद कर ददया जाता है, न्याय में देरी और कदठनाईयां होती है और भुगतान में कटौती होती है और जो पैसा लमलता है वो भी असुरक्षक्षत रहता है | इन समस्याओं को हल करने क े ललये दो प्रस्ताव हैं:

1. प्रत्येक जजले में एक मोटर दुर्िटना मध्यस्र्थता प्राधिकरण की स्र्थापना (एम.ए.एम.ए.) |

2. दुर्िटना जााँचकताि क े ललए यह अर्नवायि बनाना a. अपने ररपोटि की प्रर्त (एम.ए.एम.ए.) को भेजे; b. राष्रीय सड़क सुरक्षा पररर्षद् सेल को ईमेल भेज कर दुर्िटना स्र्थान की पहचान करे और बताये क ै से भववष्य में होने वाली ऐसी दुर्िटनाओं को रोका जा सकता है | एम.ए.एम.ए. र्नम्न प्रकरया को अपनायेगा:

1. एम.ए.एम.ए. उसक े बाद दावेदार और अन्य लोग को नोदटस जारी करेगा |

2. मुकद्दमे क े लंबबत रहने की अवधि तक, क ु छ हिार रुपये का मुआविा (पुनरावृवि क े सार्थ) पीडड़त क े आिार ललंक बैंक खाते में सीिे र े डिट क े रूप में जमा होगा |

3. एम.ए.एम.ए. में कागि-पत्र क े कायि का समापन;

4. एम.ए.एम.ए. में मध्यस्र्थता कायिवाही;

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5. प्राप्तकिाि क े हार्थ में पूणि सुरक्षा तय रालश रुपये (अर्थवा एफ.िी.आर.) क े रूप में नहीं दी जाती बजल्क वावर्षिक प्रमाणपत्र क े रूप में दी जाती है जजस से उसी मूल्य में अधिक आय होता है अर्थाित् दावेदार द्वारा पूणि प्राजप्त क े सार्थ बीमा क्षेत्र को कम भुगतान करना पड़ता है|

11. उन्ह ने आगे र्नवेदन ककया कक न्यायालय इन प्रकरयाओं और योजनाओं को बनाने क े ललए सरकार को र्नदेश करने पर ववचार कर सकता है | पेंशन र्नधि र्नयंत्रक तर्था ववकास प्राधिकरण एवं वाणणजज्यक बैंक / बीमा क ं पर्नय से परामशि करक े एल.आई.सी. /आर.बी.आई. वावर्षिक प्रमाणपत्र उपलब्ि कराने का कायि कर सकती है|

12. सराहने और पररपालन हेतु, उन्ह ने र्नम्नुसार दो प्रवाह-चाटि ददए:- प्रवाह चाटि -1 (मूल अंग्रेजी रूप में पुनः प्रस्तुत) प्रवाह चाटि-2 (मूल अंग्रेजी रूप में पुनः प्रस्तुत)

13. प्रवाह चाटि -1 में (ववद्यमान ववधि क े अंतगित), इस न्यायालय से समस्त एम.ए.सी.टी.स को एक र्नदेश अपेक्षक्षत है कक, मोटर दुर्िटना मामल को अर्नवायि रूप से जजला मध्यस्र्थता प्राधिकरण में र्नदेलशत ककया जाऐ जो यह कायि करेंगे जब तक कक सरकार अधिर्नयम में संशोिन नहीं करती | प्रवाह चाटि-2 यह ददखाता है कक, संशोधित अधिर्नयम एवं र्नयम देश क े प्रत्येक जजला में मोटर दुर्िटना मध्यस्र्थता प्राधिकरण (एम.ए.एम.ए.) स्र्थावपत करने का प्राविान रखा है | उन्ह ने यह भी सुझाव ददया कक, र्नयम में यह भी प्राविान हो कक प्रत्येक दुर्िटना अन्वेर्षक (1) एम.ए.एम.ए. तर्था (2) राष्रीय सड़क सुरक्षा काउंलसल प्रकोष्ठ को सूचना भेजे |

14. सकारात्मक भाव से बोलते हुए, श्ी मोहन ने यह भी र्नवेदन ककया कक, मामा क े प्राविान से आशा है कक: (1) महत्वपूणि रूप से न्याय तक पहुाँच बढ़ेगी; (2) न्यायालय की लागत र्टेगी; (3) बीमा क्षेत्र लागत (भुगतान में रूप में) र्टेगी; (4) भुगतान क े वावर्षिक प्रमाणपत्र लगभग “बन्दर बााँट” को समाप्त कर देंगे; तर्था (5) प्राप्तकतािओं को वास्तववक लाभ (वावर्षिक प्रमाणपत्र क े सार्थ) कहीं अधिक होगा जो वतिमान में उन्हें लमलता हैं |

15. बीमा क ं पनी क े र्नलमि पेश होने वाले फ़ाजिल अधिवक्ता श्ी सललल पॉल ने भववष्य की संभावनाओं क े आिार पर मुआविे की रक़म पर बहस की | उनका र्नवेदन र्था कक न्यायालय द्वारा जो मापदंि भववष्य की संभावनाओं क े आिार पर आय र्निािररत करने हेतु अपनाया गया र्था, जजसक े आिार पर अपीलार्थी को मुआविा ददया गया वह इस न्यायालय तर्था उच्च न्यायालय द्वारा पाररत ककये गए ववलभन्न र्नणिय क े अनुरूप है | अतः जहााँ तक मुआविा प्रदान करने का सम्बन्ि है, उसमें कोई भी हस्तक्षेप उधचत नहीं| उन्ह ने समर्थिन में अमुक र्नणिय को संदलभित ककया |

16. श्ी अरुण मोहन क े द्ववतीय र्नवेदन क े सन्दभि में श्ी सललल पॉल ने एक सकारात्मक उिर ददया कक श्ी अरुण मोहन द्वारा ददए गए सुझाव पूरी प्रणाली क े सुिार हेतु बड़े जनदहत में हैं, इसी कारणवश वो, यदद इस र्नलमि न्यायालय युजक्तयुक्त र्नदेश जारी करे तो उन्हें इससे कोई आपवि नहीं | उसी समय उन्ह ने यह भी बताया कक जहााँ तक मुकद्दम क े शीघ्र र्नपटान एवं पीडड़त, ववशेर्षकर, नवयुवक पीडड़त क े मुआविा भुगतान का सम्बन्ि है तो ददल्ली उच्च न्यायालय ने र्नदेश ददए र्थे जजसक े आिार पर दावा अधिकरण सहमत प्रकरया ददल्ली उच्च न्यायालय द्वारा अनुमोददत ककया गया र्था | उसी का एक संशोधित रूपांतरण अभी-अभी 7 ददसम्बर, 2018 को अनुमोददत ककया गया जो शीघ्र र्नपटान क े सार्थ-सार्थ एक समय कालावधि क े दौरान नवयुवक पीडड़त को कालावधि आिार पर भुगतान ककये जाने पर ध्यान देता हैं| श्ी सललल पॉल ने अलभलेख पर सुसंगत र्नणिय क े सार्थ-सार्थ 7 ददसम्बर, 2018 क े आदेश द्वारा ददल्ली उच्च न्यायालय से अनुमोददत संशोधित द्वारा अधिकरण सहमर्त प्रकरया को पेश ककया |

17. अब हम उपरोक्त दोन मफरूि क े गुण पर चचाि करने हेतु आगे बढ़ते हैं | (I) मुआवज़े का तनिाणरर्: र्नस्संदेह अपीलार्थी ववद्यालय में पढ़ने वाला एक ववद्यार्थी र्था | वो कोई कायि नहीं कर रहा र्था और ककसी व्यवसाय से नहीं जुड़ा र्था और इस प्रकार वो क ु छ कमा नहीं रहा र्था | भववष्य की कमाई की हार्न उपरोक्त आिार पर र्निािररत की जाएगी | श्ी अरुण मोहन द्वारा की गई बहस को देखने एवं उपरोक्त का ध्यान करने से पूवि, दोन पक्षकार द्वारा हमारे समक्ष रह गए अमुक र्नणिय को देखना उधचत होगा ताकक ऐसी पररजस्र्थर्तय में भववष्य की कमाई की हार्न र्निािरण का लसद्िांत पता ककया जा सक े | पहला मुक़द्दमा जजसे हम संदलभित करना चाहेंगे वो अरववन्द क ु मार समश्रा बनाम नई इंडिया एश्योरेंस क ं पनी सलसमटेि, (2010) 10 एस.सी.सी. 254 क े मुक़द्दमे में ददया गया र्नणिय है | उस मुकद्दमे में भी दुर्िटना का पीडड़त जो अपीलार्थी र्था वह एक ववद्यार्थी ही र्था | वह इंजीर्नयरी क े अंर्तम वर्षि में र्था जो वो एक प्रलसद्ि महाववद्यालय से कर रहा र्था | उसका शैक्षक्षक ररकॉिि बहुत ही शानदार र्था और वह सत्रक परीक्षाओं में ववशेर्ष योग्यता सदहत उिीणि हुआ र्था | जो दुर्िटना र्टी उसमें अपीलार्थी को ववलभन्न जख्म आये जजसक े चलते उसे 70% स्र्थायी अशक्तता प्राप्त हुई | इस अशक्तता ने उसे अक्षम बना ददया, जजसका पररणाम यह हुआ कक उसका मक े र्नकल इंजीनीयर बनने का सपना चकनाचूर हो गया जजस कररयर क े ललए उसने इतनी पढ़ाई की र्थी | उपरोक्त तथ्य क े आिार पर जनरोिगार में एक सहायक अलभयंता को लमलने वाली तनख्वाह एवं ददए जाने वालो भि को देखते हुए उसकी भववष्य की कमाई रूपये 60,000/- वावर्षिक र्निािररत की गई र्थी | इस भववष्य की कमाई को 30% र्टाया गया र्था जजसक े आिार पर गुण्य रुपये 42,000/- वावर्षिक हुआ र्था | उसकी आयु को देखते हुए जो दुर्िटना क े समय 25 वर्षि की र्थी, 18 से गुणा ककया गया जजसक े आिार पर भववष्य की कमाई की हार्न क े मुआविे क े रूप में रुपये 7,56,000/- र्निािररत ककया गया र्था | दूसरा मुक़द्दमा जजसका सन्दभि ददया गया वो ओररएण्टल इंश्योरेंस क ं पनी सलसमटेि बनाम देव पटौदी अन्य, (2009) 13 एस.सी.सी. 123 हैं इसमें पीडड़त एक बहुत ही प्रर्तभाशाली ववद्यार्थी र्था जो इंग्लैंि में अिि समय कायि क े आिार पर प्रर्तमास रुपये 80,000/- भी कमा रहा र्था | उसने अमेररका आिाररत एक क ं पनी द्वारा वावर्षिक रुपये 18,00,000/- की तनख्वाह वाली एक जॉब क े पेशकश को स्वीकार नहीं ककया र्था | तर्थावप दुर्िटना क े समय वह कायि नहीं कर रहा र्था | 12 जून, 2003 को दुर्िटना र्टी जब वह 22 वर्षि का र्था | उसे लसर में जख्म लगे जो र्ातक लसद्ि हुए और वह 6 ददन क े अन्दर अर्थाित् 18.06.2003 को मर गया | “आश्य की हार्न” (दावेदार का वो अक े ला लड़का र्था) क े शीर्षिक क े अंतगित मुआविे का दहसाब लगाते हुए अधिकरण तर्था उच्च न्यायालय ने भी यह माना कक मृतक क े वल रुपये 18,000/- प्रर्तमास कमाया होता | इस न्यायालय ने अपील में तर्थावप उपरोक्त आय क े आंकलन को कम ववचार ककया और न्यायालय ने कमाई को रुपये 25,000/- प्रर्तमास र्निािररत करने का र्नणिय ललया जो वो इंग्लैंि में कमा रहा र्था उस रालश का क े वल एक र्तहाई र्था | इस र्नलमत सुसंगत बहस र्नम्नानुसार:- “8. आश्य की हार्न क े गणना क े सम्बन्ि में यह प्रश्न र्र्सावपटा है कक मामला मामला में अंतर होगा | इस तथ्य पर कक मृतक एक प्रर्तभावान ववद्यार्थी र्था, कोई वववाद नहीं है | उसने इंग्लैंि में व्यवसाय प्रशासन में स्नातक ककया र्था | ववद्यार्थी क े रूप में, अंश समय कायि क े आिार पर उसे प्रर्तमास रुपये 80,000/- (1008.31 UK £) की तनख्वाह लमल रही र्थी | उसने अपने आयकर का भुगतान इंग्लैंि में भी ककया र्था | अपने स्नातक क े पश्चात् वो भारत वावपस आ गया र्था | ई. यू. क ं रोलर क े रूप में उसे लशकागो, अमेररका आिाररत जी. ओ. ए. एल. एल. सी. क ं पनी द्वारा रुपये 18 लाख (अर्थाित् $ 41,600) की सालाना तनख्वाह पर जॉब की पेशकश हुई र्थी | तर्थावप जब दुर्िटना र्टी तो वह कायि नहीं कर रहा र्था | क्य कक उक्त पेशकश को स्वीकार नहीं ककया र्था | वो अभी भी ववद्यार्थी र्था | उस आिार पर र्नभिरता की हार्न क े ललए मुआविे की रालश की गणना करना अधिकरण क े ललए र्ातक होता |

9. उपरोक्त पृष्ठभूलम को ध्यान में रखते हुए अधिकरण एवं उच्च न्यायालय का यह मानना कक वो क े वल 18 हिार रुपये ही प्रर्तमास कमा पाता, हमारे ववचार में ठीक नहीं | यह सत्य है कक पजश्चमी देश में जीवन का खचाि ज्यादा होता हैं | पजश्चमी देश क े जीवन का मापदंि का अनुपालन नहीं ककया जा सकता; इस न्यायालय क े समक्ष रखे गए ककसी सामग्री क े अभाव में इसका भारत में पालन नहीं ककया जा सकता | दुर्िटना का पीडड़त जब अमेररकी िॉलर में अपना वेतन पा रहा र्था, उस मामले में भी इस न्यायालय ने ववचार ककया कक र्नचले गुणा को लागू ककया जाये |

10. युनाइटेि इंडिया इंश्योरेंस क ं पनी लललमटेि बनाम पेदरलसया जीन महाजन [(2002) 6 एस.सी.सी. 281] इस न्यायालय ने माना कक (एस.सी.सी. पी.पी. 294-95, पैरा 19-20) “19. वतिमान मामले में हम देखते हैं कक मृतक क े माता वपता 69/73 वर्षि क े र्थे | दो बेदटयां 17 और 19 वर्षि की र्थीं | इस मुक़द्दमे में महत्वपूणि प्रश्न यह है कक दी गई पररजस्र्थर्तय में गुण्य कक रालश का भी महत्त्व है | र्नभिरता की क ु ल रालश जो फ़ाजिल एकल न्यायािीश द्वारा पायी गई और खण्ि पीठ द्वारा ठीक रूप से जजसकी पुजष्ट की गई वो 2,26,297 िॉलर है | ब्याि सदहत रालश और 47/- रुपये क े बदल दर को 10 से गुणा करने पर यह 10.38 करोड़ रुपए बनता है | भारतीय अर्थिव्यवस्र्था, ववि एवं वविीय जस्र्थर्त को देखते हुए यह रालश र्नजश्चत रूप से बहुत बड़ी है | यद्दवप अमेररकी पररजस्र्थर्तय की पृष्ठभूलम में ऐसा नहीं है | अतः जब दो स्र्थान अर्थाित् वो स्र्थान जहााँ का पीडड़त है और वो स्र्थान जहााँ मुआविा ददया जाना है उसक े प्रभाव एवं वविीय पररजस्र्थर्तय में जब बहुत अंतर हो तो कहीं न कहीं एक स्वणि संतुलन बना जाना चादहए ताकक एक युजक्तयुक्त एवं उधचत प्रर्तफल को प्राप्त ककया जा सक े | भारतीय मापदंि को देखते हुए उन्हें बहुत ज्यादा मुआविा नहीं ददया जा रहा एवं इसी प्रकार उस देश की पृष्ठ भूलम में जहााँ अधिकतर आधश्त लाभार्थीगण रहते हैं, बहुत कम मुआविा भी नहीं हैं | आधश्त में से दो अर्थाित् 69/73 वर्षीय माता-वपता भारत में रहते हैं परन्तु उनमें से चार अमेररका में रहते हैं | श्ी सोली जे. सोराबजी का र्नवेदन है कक गुण्य की रालश अवश्य रूप से सुसंगत होगी और उस दशा में जब यह एक बहुत बड़ी रालश हो, तो युजक्तयुक्त रूप से क ु छ कम से गुणा ककया जा सकता है | इस र्नवेदन में हम बल पाते हैं.............

20. न्यायालय वास्तववक पररजस्र्थर्तय की पूणिरूप से उपेक्षा नहीं कर सकता | गुण ववदहत करते समय द्ववतीय अनुसूची में अपने मजस्तष्क में 40,000/- रुपये प्रर्तवर्षि की अधिकतम आय रखी र्थी परन्तु अधिकतर आय क े मामल में इस ववदहत गुणनक को लागू करना एक सुरक्षक्षत ददशा र्नदेश ववचार ककया जाता है परन्तु आय में बहुत अंतर हो वैसे मामल में जैसा कक प्रस्तुत मामले में है कक आय 2,26,297 िॉलर हैं ऐसी पररजस्र्थर्त में भी यह नहीं कहा जा सकता कक गुणनक का क ु छ अवहेलना बबलक ु ल ही अनुज्ञेय होगा | द्ववतीय अनुसूची में ददए गए गुणनक से इस मामले में क ु छ हटाया जा सकता हैं | पूवि में इंधगत कारक से हट कर गुण्य की रालश भी एक काक है जजसको ध्यान में रखा जायेगा, जो इस मामले में 2,26,297 िॉलर हैं जजसका अर्थि यह है कक यदद इसे 30/- रुपये की दर से बदलें तो लगभग 68 लाख रुपय की रालश प्रर्तवर्षि होगी | भारतीय मापदंि से यह र्नजश्चत रूप से एक बड़ी रालश है | अतः उधचत मुआविे क े प्रयोजन हेतु गुण्य की बड़ी रालश पर लागू ककये जाने हेतु क ु छ कम से गुणा ककया जा सकता है |” तर्थावप उक्त र्नणिय क ु छ सीमा तक इस न्यायालय द्वारा पंजाब नेशनल बैंक बनाम इंडियन बैंक [(2003) 6 एस.सी.सी. 79]

11. उपरोक्त पररजस्र्थर्त में हमारे ववचार में मुआविे की उधचत रालश प्रर्तमास 25 हिार रुपये धगनी जानी चादहए र्थी जो वो इंग्लैंि में पा रहा र्था उस रालश का लगभग एक र्तहाई होता |” 18) हम ददल्ली उच्च न्यायालय क े एम.ए.सी. एप्लीक े शन सं. 135/2008 शीर्षिक “न्यू इंडिया एश्योरेंस क ं सल. बनाम गंगा देवी व अन्य” में ददनांक 23.11.2009 को ददए र्नणिय पर भी ध्यान देंगे | उस मामले में भी दुर्िटना में पीडड़त की मौत हुई र्थी, जजसका नाम िॉ. बृजमोहन र्था । हादसे क े वक्त उसकी उम्र 24 साल र्थी और उसने एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूरी की र्थी । वह एक साल की इंटनिलशप कर रहा र्था और उसे 5 हजार रुपये प्रर्तमाह स्टाइपेंि (वेतन) लमल रहा र्था । मृतक ने मेडिकल ऑकफसर पद क े ललए यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली र्थी और इंटनिलशप पूरी करने क े बाद मेडिकल ऑकफसर क े पद पर उसकी र्नयुजक्त होनी र्थी । उस अस्पताल क े, जहां मृतक इंटनिलशप कर रहा र्था, वररष्ठ सहायक, पीिब्ल्यू-2 क े साक्ष्य को प्रस्तुत ककया गया, जजसने यह बयान ददया कक अपनी इंटनिलशप पूरी करने क े बाद, मृतक की उसी अस्पताल में 18 हजार रुपये से 20 हजार रुपए प्रर्त माह क े वेतन पर जूर्नयर रेजजिेंट िॉक्टर क े रूप में र्नयुजक्त की संभावना र्थी ।

19) दरब्यूनल ने यह ववचार रखा कक उपरोक्त साक्ष्य आय को साबबत करने क े ललए अपयािप्त र्थे । तदनुसार, इसने एक स्नातक कामगार की न्यूनतम मजदूरी को 3,543/- रुपए प्रर्तमाह क े रूप में ललया और 50% मुद्रास्फीर्त और मूल्य सूचकांक में वृद्धि क े ललए जोड़ा | इसमें से, र्नजी खचों क े ललए एक र्तहाई की कटौती की गई र्थी तर्था र्नभिरता क े नुकसान की गणना करने क े ललए 9,35,352/- रूपये पर 11 का गुणक लगाया गया । उच्च न्यायालय ने दरब्यूनल क े आदेश को इस आिार पर खाररज ककया कक पीिब्ल्यू-2 का साक्ष्य ववश्वसनीय र्था । इस आिार पर, इसी न्यायालय द्वारा सरला वमाण बनाम ददल्ली पररवहन तनगम (209) 6 SCALE 129 में ददए र्नणिय का पालन करते हुए, आय 18,000/- रुपये प्रर्तमाह ली गयी जजसमें भववष्य की संभावनाओं क े ललए 50% की वृद्धि की गई । र्नजी खचों क े ललए कटौती की गई जजस पर 13 का गुणक लगाया गया र्था । 20) उपयुिक्त मामले उन सभी पीडड़त क े हैं जो दुर्िटना क े समय छात्र र्थे और वास्तववक रोजगार में नहीं र्थे । इसक े अलावा, श्ी अरुण मोहन ने एन. मंजेगौड़ा बनाम प्रबंिक, युनाइटेि इंडिया इंश्योरेंस क ं पनी सलसमटेि (2014) 3 SCC 584 में र्नणिय का उल्लेख ककया र्था, जहां एक दुर्िटना का लशकार एक युवा अधिवक्ता र्था, जजसकी आयु लगभग 36 वर्षि र्थी । दुर्िटना में, वह 50% पूणि शारीररक ववकलांगता से ग्रस्त हो गया । यह र्नणिय दुर्िटना में ववकलांगताग्रस्त एक वकील की कमाई की क्षमता क े नुकसान का र्निािरण करने में अदालत द्वारा र्निािररत लसद्िांत ददखाने क े उद्देश्य क े ललए उद्िृत ककया गया है । अधिकरण ने ववकलांगता क े कारण भववष्य में होने वाली आय में 6,17,500/- रुपये प्रर्त वर्षि की हार्न का आकलन ककया र्था । उच्च न्यायालय ने इसे र्टाकर 1,50,000/- रुपये कर ददया । इस अदालत ने माना कक इस दुर्िटना क े कारण अपीलकताि को अपने सभी अंग पर आंलशक संवेदन क्षर्त पहुंची र्थी और चार अंग में उधचत समन्वय का अभाव र्था । उसे ददनचयाि क े काम क े ललए भी सहायता की आवश्यकता र्थी । अदालत की राय में, इस तरह की ववकलांगता से एक अधिवक्ता क े रूप में कायि करने की उनकी क्षमता में और कानूनी पेशे क े क्षेत्र में अन्य लोग क े सार्थ प्रर्तस्पिाि में बािा आई । इस हालत में उसे भारी व्यावसार्यक नुकसान होना स्वाभाववक र्था । इस न्यायालय ने उपयुिक्त पररजस्र्थर्तय में यह ववचार ककया कक भववष्य में 6,17,500/- रुपये की आय की हार्न क े ललए ककसी कटौती की आवश्यकता नहीं र्थी । इसक े ववपरीत, आय की हार्न को 70% माना जाना चादहए और उपयुक्त गुणक 13 क े स्र्थान पर 16 होना चादहए । इस आिार पर ववकलांगता क े कारण होने वाली आय की हार्न 6,17,500/- रुपये में कम से कम 4,00,000/- रुपये बढ़ाने की जरूरत र्थी और ववकलांगता क े कारण होने वाली आय क े मद क े अंतगित क्षर्तपूर्ति को तदनुसार आकललत ककया गया । 21) दुर्िटना क े पररणामस्वरूप हुई ववकलांगता क े कारण होने वाली भावी आय क े नुकसान क े आकलन से संबंधित कर्तपय र्नणिय पर ध्यान देना भी उधचत होगा क्य कक ये मामले इस तरह क े नुकसान का आकलन करने क े ललए र्निािररत सामान्य लसद्िांत पर प्रकाश िालेंगे, भले ही ये मामले उन पीडड़त से संबंधित हैं जो आय प्राप्त कर रहे र्थे | 22) राज क ु मार बनाम अजय क ु मार एवं अन्य (2011) 1 SCC 343 क े मामले में, जहां पीडड़त र्नचले बाएं अंग में 45% ववकलांगता से पीडड़त हुआ तर्था उसे 25% स्र्थायी कायाित्मक ववकलांगता हुई, न्यायालय ने यह माना कक यह एक कायाित्मक ववकलांगता है जो कक भववष्य की कमाई क े नुकसान क े आकलन में कसौटी होगी, न कक शारीररक ववकलांगता क े आकलन हेतु । स्र्थायी े कारण होने वाली कमाई क े भववष्य में होने वाले नुकसान क े आकलन क े बारे में ववस्तृत और स्पष्ट रूप से चचाि की गई है, जजसमें इस ववर्षय क े हर सूक्ष्म पहलु पर चचाि करते हुए सभी संभाववत पहलुओं को शालमल ककया गया है | स्र्थायी ववकलांगता का अर्थि समझाने और उसकी अस्र्थायी ववकलांगता से तुलना करने क े बाद और यह भी कक जजस तरह से ववकलांगता प्रमाणपत्र में िॉक्टर द्वारा व्यक्त ककए गए ववलभन्न अंग की स्र्थायी ववकलांगता की व्याख्या की जानी है, अदालत ने स्पष्ट ककया कक भववष्य में होने वाली आय की हार्न क े मद में मुआवजे का आकलन उसकी अजिन क्षमता पर ऐसी स्र्थायी ववकलांगता क े प्रभाव और पररणाम पर र्नभिर होगा | जजस तरीक े से मूल्यांकन ककया जाना है, वह उक्त र्नणिय में र्नम्नललणखत प्रकार से र्नदहत है- “12. इसललए, अधिकरण को पहले यह र्नणिय लेना होगा कक क्या कोई स्र्थायी ववकलांगता है और यदद हां, तो ऐसी स्र्थायी ववकलांगता ककतनी है । इसका अर्थि है कक अधिकरण को साक्ष्य क े संदभि में ववचार करना चादहए और र्नणिय लेना चादहए: (i) क्या ववकलांगता स्र्थायी है या अस्र्थायी; (ii) यदद ववकलांगता स्र्थायी है, तो क्या यह स्र्थायी रूप से पूणि ववकलांगता है या स्र्थायी आंलशक ववकलांगता; (iii) यदद ककसी ववलशष्ट अंग क े संदभि में अशक्तता की प्रर्तशतता व्यक्त की जाती है, तो संपूणि शरीर क े कायि करने में उस अंग की ऐसी ववकलांगता का प्रभाव का अर्थि उस व्यजक्त को होने वाली स्र्थायी अपंगता से होगा । यदद अधिकरण यह र्नष्कर्षि र्नकालता है कक कोई स्र्थायी ववकलांगता नहीं है तो आगे बढ़ने और भावी अजिन क्षमता क े नुकसान का र्निािरण करने का कोई प्रश्न नहीं है । लेककन यदद अधिकरण यह र्नष्कर्षि र्नकालता है कक स्र्थायी ववकलांगता है तो वह ककस सीमा तक है, इसका आकलन करेगा । अधिकरण द्वारा धचककत्सीय साक्ष्य क े आिार पर दावेदार की स्र्थायी ववकलांगता क े स्तर का पता लगाने क े बाद यह र्निािररत करना होगा कक क्या ऐसी स्र्थायी ववकलांगता से उसकी अजिन क्षमता प्रभाववत हुई है या प्रभाववत होगी ।

13. वास्तववक अजिन क्षमता पर स्र्थायी ववकलांगता क े प्रभाव को र्नजश्चत करने क े ललए तीन स्तर हैं । अधिकरण को पहले यह पता लगाना होगा कक स्र्थायी ववकलांगता क े बावजूद दावेदार ककन कायों को कर सकता है और स्र्थायी ववकलांगता क े पररणामस्वरूप वह क्या नहीं कर सकता है (यह जीवन की सुवविाओं की हार्न की मद क े अंतगित मुआवजा देते समय भी सुसंगत है) । दूसरा स्तर दुर्िटना से पहले उसक े व्यवसाय, पेशे और काम की प्रकृ र्त का पता लगाना है, सार्थ ही उसकी उम्र का भी । तीसरा स्तर यह पता लगाना है कक क्या (i) दावेदार ककसी भी प्रकार की आजीववका कमाने से पूणित अक्षम है, या (ii) क्या स्र्थायी ववकलांगता क े बावजूद दावेदार अभी भी उन कायिकलाप और कायों को प्रभावी ढंग से कर सकता है, जो वह पहले से कर रहा र्था, या (iii) क्या उसे अपने पहले क े कायिकलाप व कायों को पूरा करने में रुकावट या ददक्कत हो रही है, लेककन कोई अन्य कायिकलाप और क ु छ कम कायों को कर सकता है जजससे कक वह कमाना जारी रख सक े या अपनी आजीववका अजजित करने क े ललए कायि करता रहे | xx xx xx

19. अब हम ऊपर ववचार ककए गए लसद्िांत को संक्षेप में प्रस्तुत कर सकते हैं: (i) सभी चोट (या चोट से उत्पन्न होने वाली स्र्थाई ववकलांगता) का पररणाम अजिन क्षमता की हार्न नहीं है । (ii) ककसी व्यजक्त क े संपूणि शरीर क े संदभि में स्र्थायी ववकलांगता क े प्रर्तशत को अजिन क्षमता क े नुकसान का प्रर्तशत नहीं माना जा सकता है । अन्य ढंग से कहें तो अजिन क्षमता क े नुकसान का प्रर्तशत स्र्थायी ववकलांगता क े प्रर्तशत क े समान नहीं है (क ु छ मामल को छोड़कर, जहां साक्ष्य क े आिार पर अधिकरण इस र्नष्कर्षि पर पहुंचा कक अजिन क्षमता क े नुकसान का प्रर्तशत और स्र्थायी ववकलांगता का प्रर्तशत एक समान है) । (iii) जजस धचककत्सक ने ककसी र्ायल दावेदार का इलाज ककया है अर्थवा जजसने बाद में उसकी जांच कर उसकी स्र्थायी ववकलांगता क े स्तर का आकलन ककया है, वह स्र्थायी ववकलांगता क े स्तर क े संबंि में ही साक्ष्य दे सकता है । अजिन क्षमता का नुकसान ऐसा है जजसका आकलन संपूणि रूप से साक्ष्य क े संदभि में अधिकरण द्वारा ककया जाना होगा । (iv) समान स्र्थायी ववकलांगता क े पररणामस्वरूप अजिन क्षमता की हार्न की प्रर्तशतता ववलभन्न व्यजक्तय में अलग-अलग हो सकती है जो व्यवसाय, पेशे या नौकरी, आयु, लशक्षा और अन्य कारक की प्रकृ र्त पर र्नभिर करती है ।” 23) पूवोक्त र्नणिय को संयुक्त रूप से पढ़ने पर, अन्य बात क े सार्थ-सार्थ, र्नम्नललणखत लसद्िांत को ललया जा सकता है जो वतिमान अपील पर र्नणिय लेने क े ललए प्रासंधगक ह गे: (i) उन मामल में जहां दुर्िटना का पीडड़त व्यजक्त कमाने वाला नहीं बजल्क एक छात्र हो, भववष्य में होने वाली कमाई क े मुआवजे का आकलन करते समय, जांच का क ें द्र ऐसे व्यजक्त की प्रगर्त की संभावना और भववष्य में संभाववत कमाई होगी । उदाहरण क े ललए, जहां दावेदार ककसी ववशेर्ष व्यावसार्यक पाठ्यरम की पढ़ाई कर रहा है, कसौटी यह होगी कक - यदद वह उक्त पाठ्यरम क े अनुरूप नौकरी में शालमल हो गया होता तो उसकी आय क्या होती । वही भववष्य में उसकी कमाई हो सकती है । (ii) ऐसे मामले हो सकते हैं जजनमें पीडड़त व्यजक्त उस समय ककसी ववशेर्ष नौकरी को करने क े ललए इस प्रकार का कोई पाठ्यरम नहीं पढ़ रहा है । हो सकता है कक वह ककसी स्क ू ल में पढ़ाई कर रहा हो । ऐसे मामले में, भववष्य में प्रगर्त ववववि कारक पर र्नभिर करेगी जैसे पाररवाररक पृष्ठभूलम, ककसी ववशेर्ष व्यवसाय हेतु लशकायतकताि की पसंद/रुधच, उसे ऐसा पेशा अपनाने हेतु उपलब्ि सुवविाएं तर्था उसक े आसपास की अनुक ू ल पररजस्र्थर्तयााँ को देखना जो दावेदार को उक्त पेशे को सफलतापूविक चुनने में सक्षम बनातीं | यदद चुना हुआ क्षेत्र रोजगार है तो भववष्य में होने वाली कमाई को ऐसे र्नयोजन क े ललए देय वेतन और भि क े आिार पर ललया जा सकता है । यदद भववष्य कोई ववशेर्ष व्यवसाय है तो भववष्य में होने वाली कमाई अन्य कारक पर र्नभिर करेगी जजसक े आिार पर ऐसे व्यवसाय में सफलता प्राप्त करने की संभावना का अंदाजा लगाया जा सकता है । (iii) क ु छ मामले जैसे कक देव पटौदी जजसमें एक छात्र, दावेदार अंशकाललक आिार पर आय अजजित कर सकता र्था अर्थवा उसको ककसी ववशेर्ष कायि की पेशकश की जा सकती र्थी | ऐसे मामल में, इन कारक को भी प्रासंधगक माना जाएगा । (iv) उपयुिक्त तरीक े से पीडड़त व्यजक्त की संभाववत आय का पता लगाने क े बाद, तर्था उसक े पररणामस्वरूप हुई चोट और अपंगता की प्रकृ र्त का र्निािरण करते समय इस बात को ध्यान में रखा जाएगा कक इससे ककतनी आय प्रभाववत हुई है । यहां, कायाित्मक ववकलांगता पर चोट क े प्रभाव को देखना है । पीडड़त की मृत्यु की दशा में, आय में पूणितः हार्न माना जाएगा । चोट क े मामले में, ववकलांगता की प्रकृ र्त महत्वपूणि हो जाती है । ऐसा प्रयोग एन. मंजेगौड़ा मामले में ककया गया र्था | 24) अपीलकताि क े ववद्वान वररष्ठ वकील द्वारा प्रस्तुत ककए गए सुसंगत कारक इस प्रकार से हैं - अपीलकताि वकील क े पररवार से है और उसक े माता-वपता दोन ही उच्चतम न्यायालय में वकालत कर रहे वररष्ठ वकील र्थे । अपनी पाररवाररक पृष्ठभूलम क े कारण अपीलकताि भी कानूनी पेशे से जुड़ना चाहता र्था, हालांकक दुर्िटना क े समय वह स्क ू ल में ही पढ़ रहा र्था । संपन्न पाररवाररक पृष्ठभूलम होने क े फलस्वरूप, दुर्िटना क े समय अपीलकताि प्रर्तजष्ठत मॉिनि स्क ू ल, बाराखंभा रोि, नई ददल्ली में पढ़ रहा र्था । इन सभी पररजस्र्थर्तय से स्पष्ट संक े त लमलता है कक अपीलकताि का भववष्य उज्ज्वल र्था और इसललए पूवोक्त कारक को ध्यान में रखे बबना उनकी भावी आय पर ववचार नहीं ककया जा सकता । अपीलकताि ने अपनी ववकलांगता क े संबंि में सबूत भी पेश ककए । यह ववकलांगता कमाई की संभावनाओं की अधिक हार्न का संक े त नहीं है चूंकक यह एन. मंजेगौड़ा मामले क े समान है । हालांकक, उसक े कायिकलाप बाधित हैं और उसे एक ड्राइवर की आवश्यकता है क्य कक वह खुद कार चलाने की जस्र्थर्त में नहीं है । इससे अजिन क्षमता में क ु छ हद तक तो बािा पैदा होगी, परन्तु बहुत अधिक नहीं | 25) एम.ए.सी.टी. क े र्नणिय से हम देखते हैं कक इस पहलु पर इसने अरुर् सोंिी बनाम ददल्ली पररवहन तनगम (2001) ACJ 1779 क े र्नणिय का अनुसरण ककया है और 4,08,000/-रुपये का मुआवजा ददया है । इसने इस आिार पर 40% स्र्थायी ववकलांगता क े कारण 75,000 रुपये भी जोड़ ददए हैं कक इससे आय में कमी आने क े अलावा समग्र रूप से अपीलकताि क े जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है । 4,08,000/- रुपए की गणना र्नम्नललणखत तरीक े से की गयी है: “42. याधचकाकताि क े ववद्वान वकील ने ववस्तारपूविक यह दलील दी है कक भववष्य में अजिन क्षमता में कमी क े कारण याधचकाकताि को पयािप्त मुआवजा ददया जाना अपेक्षक्षत है । यह कहा गया है कक दुर्िटना में हुई चोट क े कारण याधचकाकताि की आय में 60% की कमी आई है जो वह अन्यर्था अजजित कर सकता र्था । मेरा ववचार है कक याधचकाकताि क े ववद्वान वकील द्वारा उठाए गए इस तक ि को स्वीकार नहीं ककया जा सकता । दुर्िटना क े समय याधचकाकताि छात्र र्था । उसने अपने व्यवसाय की शुरुआत दुर्िटना क े करीब 5 साल बाद की र्थी । मैं यह नहीं कहता कक याधचकाकताि पर चोट का प्रर्तक ू ल प्रभाव नहीं पड़ा, लेककन याधचकाकताि द्वारा दावा ककए गए तरीक े से इसकी मात्रा का र्निािरण करना शायद ठीक नहीं होगा । इस संबंि में मैं मानता हूं कक अरुर् सोंिी बनाम ददल्ली पररवहन तनगम (2001) ACJ 1779 मामले से मागिदशिन ललया जा सकता है । इस मामले में र्ायल 21 वर्षि का छात्र र्था और उसे 100 प्रर्तशत ववकलांगता हुई र्थी | एल.पी.ए. में भववष्य में होने वाली कमाई का आकलन 5000/- रुपये प्रर्त माह ककया गया और 16 क े गुणक को अपनाने क े बाद 10,80,000/- रुपये का मुआवजा मंिूर हुआ | यदद इसी लसद्िांत को अपनाया जाता है और भववष्य में होने वाली कमाई 5000/- रुपये और ववकलांगता 40% है, तो आय की मालसक हार्न 2000/- रुपये प्रर्तमाह या 24 हजार रुपये प्रर्त वर्षि की दर से आती है | यह एक र्निािररत प्रस्ताव है कक स्र्थायी ववकलांगता क े मामले में ववचारण क े समय आयु क े अनुसार ही गुणक को अपनाया जाता है । इस लसद्िांत को अपनाते हुए यदद 17 क े गुणक को अपनाया जाता है तो भववष्य में होने वाली आय क े कारण मुआवजा 24,000/- X 17 = 4,08,000 रुपये बनता है ।” 26) जैसा कक उपयुिक्त से देखा जा सकता है, भववष्य में होने वाली आय की हार्न 2 हजार रुपये प्रर्तमाह अर्थवा 24 हजार रुपये प्रर्त वर्षि आंकी गई है । इस प्रकरया में, एम.ए.सी.टी. ने ऊपर उजल्लणखत प्रासंधगक तथ्य को ध्यान में रखते हुए भववष्य की संभावनाओं पर ववचार नहीं ककया है, जजन पर ववचार ककया जाना चादहए र्था । इसक े सार्थ ही यह कायाित्मक ववकलांगता है जजसे ध्यान में रखना होगा । हालांकक, सहज रूप से, अपीलकताि द्वारा ग्रस्त े कारण कायाित्मक क्षमता क्षीण हो गई है क्य कक अपीलकताि अपनी उम्र क े अन्य युवा अधिवक्ताओं की तरह इिर-उिर भाग-दौड़ नहीं कर सकता । समग्र पररजस्र्थर्तय को देखते हुए, हमारी यह राय है कक अपीलकताि क े मामले में, भववष्य में होने वाली आय की हार्न 5000/- रु प्रर्त माह अर्थाित 60,000/- रुपये प्रर्त वर्षि र्निािररत की जा सकती है जजस पर 18 क े गुणक को लागू ककया जाना है । इस तरीक े से गणना की जाए तो भववष्य में होने वाली कमाई की हार्न 10,80,000/- रुपये होती है । इस प्रकार अपीलकताि को जैसा कक र्नचले न्यायालय द्वारा कहा गया र्था, इस मद क े अंतगित ब्याज सदहत 6,54,000/- रुपये की एक अन्य रालश का भुगतान ककया जाएगा । हम श्ी अरूण मोहन क े कर्थन को अलभलेख पर ले सकते हैं कक अपीलकताि ने सड़क सुरक्षा की ददशा में कायि कर रहे ककसी सरकारी या साविजर्नक िमािर्थि संगठन को यह रालश देने की इच्छा जताई है । हम अपीलकताि क े इस ववचार की सराहना करते हैं । हम इसे अपीलकताि पर छोड़ते हैं कक वह अपनी पसंद क े ककसी भी संगठन को यह रालश दान कर सकता है । वैकजल्पक रूप से, यह अपीलकताि द्वारा एम.ए.एम.सी. पररयोजना क े ललए ददया जा सकता है । ववकल्प पूरी तरह से अपीलकताि का होगा । (II) इसक े सार्थ, हम श्ी अरुण मोहन द्वारा ददए गए दूसरे प्रस्ताव पर ध्यान देते हैं । प्रारम्भ में, हम यह बताना चाहेंगे कक यह पहलू उन सुिार से संबंधित है जो सड़क दुर्िटनाओं क े पीडड़त को मुआविे क े भुगतान क े संबंि में लाए जा सकते हैं । हम श्ी अरूण मोहन द्वारा ददए गए सुझाव की भी प्रशंसा करना चाहेंगे जो दूरदशी प्रकृ र्त क े हैं । उन्ह ने जजन दो पहलुओं पर प्रकाश िाला है, उन पर रमानुसार नीचे ववचार ककया गया है । (क) सड़क सुरक्षा और मुआवजा:

27) यहााँ इस बात पर जोर ददया गया है कक सड़क दुर्िटना पीडड़त क े ललए न्याय तक पहुंच सुर्नजश्चत हो और एक ऐसा तंत्र लाया जाए जो सड़क दुर्िटना पीडड़त को मुआवजा देने में देरी और अन्य बािाओं को रोकता हो । हर जजले में एम.ए.एम.ए. की स्र्थापना क े ललए श्ी अरुण मोहन का सुझाव स्वीकार योग्य है । यह एक कड़वा सच है कक सड़क दुर्िटनाओं को कम करने में प्राधिकाररय द्वारा जो भी कदम उठाए गए हैं, दुर्िटनाएं रोकने में नाकाम हैं । संभवतः सड़क दुर्िटनाओं की संख्या में कमी आई हो, लेककन दुर्िटनाएं पूणितः रुक नहीं सकती | ऐसी दुर्िटनाओं, ववशेर्ष रूप से र्ातक दुर्िटनाओं, क े कारण पीडड़त और/अर्थवा पीडड़त क े पररजन द्वारा मुआविे क े ललए दावे तो दाणखल ककये ही जायेंगे । र्ातक दुर्िटनाओं क े पररणामस्वरूप, लापरवाही और तेजी से गाड़ी चलाने वाले चालक, जजसकी वजह से दुर्िटना हुई, क े णखलाफ अलभयोजन भी बढ़ा है | जहां तक दाव क े संबंि में वववाद का संबंि है, इसका यर्थाशीघ्र समािान ककए जाने की आवश्यकता है क्य कक कई कारण से दावेदार को मुआविे की रालश की अत्यधिक आवश्यकता हो सकती है और इसमें ववलम्ब से कई तरह की असह्य परेशार्नयां हो सकती हैं । इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कक बड़ी संख्या में दुर्िटनाओं क े कारण ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इनक े तुरंत समािान क े उपाय अपनाने की आवश्यकता है । ऐसे में, वववाद क े र्नपटारे की अविारणा क े रूप में मध्यस्र्थता, वववाद क े ववरोिात्मक न्यार्यक प्रकरया का दहस्सा बनने से पहले ही, अत्यंत महत्वपूणि होगा | मध्यस्र्थता क े कई फायदे हैं । यह ववचार वविार्यका क े सार्थ ही सार्थ नीर्त र्नमािताओं द्वारा भी मान्य ठहराया गया है और इस बारे में कोई संशय नहीं है | मध्यस्र्थता की आवश्यकता सदा रहेगी | इसका ववकास भी होगा | मध्यस्र्थता से होने वाले फायद को एक तरीक े क े रूप में अपनाने से नए आिार खोजे जा सकते हैं | इसका ववस्तार होना है क्य कक यह समय की आवश्यकता है । अब इसे सांववधिक मान्यता लमल रही है और इसे क ु छ ववधिय में भी शालमल ककया गया है । क ं पनी अधिर्नयम, ददवाला एवं शोिन अक्षमता कोि (इन्सोल्वेंसी एवं बैंकरप्टसी कोि), वाणणजज्यक न्यायालय अधिर्नयम आदद इसक े उदाहरण हैं । इन अधिर्नयम में इस प्रकरया को अर्नवायि बनाते हुए वाद-पूवि मध्यस्र्थता क े ललए भी प्राविान ककए गए हैं । ककसी भी मामले में, लसववल प्रकरया संदहता में िारा 89 क े रूप में, अन्य बात क े सार्थ-सार्थ, अन्य प्राविान भी हैं जजनमें न्यायालय क े सार्थ जुड़े मध्यस्र्थता का प्राविान है । अब समय आ चुका है कक अब दुर्िटना क े दाव क े र्नपटान क े ललए इसी तरह की व्यवस्र्था होनी चादहए | इसललए एम.ए.एम.ए. की स्र्थापना का सुझाव प्रशंसनीय है । हम सरकार से लसफाररश करते हैं कक वह मोटर वाहन अधिर्नयम में आवश्यक संशोिन करक े एम.ए.एम.ए. स्र्थावपत करने की व्यवहायिता की जांच करे । वास्तव में, जजस तरह से इस देश में मध्यस्र्थता का प्रयोग बढ़ रहा है, भारतीय मध्यस्र्थता अधिर्नयम को भी अधिर्नयलमत करने की सख्त जरूरत है । 28) जब तक संसद द्वारा ऐसा संशोिन नहीं लाया जाता, तब तक राष्रीय ववधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) को इस कायि को एक पररयोजना क े रूप में लेना चादहए । मोटर दुर्िटना मध्यस्र्थता प्रकोष्ठ (एम.ए.एम.सी.) की कायिप्रणाली क े बारे में एक पूणि ररपोटि/माड्यूल तैयार ककया जाए । यह कारिवाई दो माह की अवधि में पूरी की जाए । तत्पश्चात्, इस पररयोजना को सभी राज्य ववधिक सेवा प्राधिकरण (एस.एल.एस.ए.) क े सार्थ साझा ककया जा सकता है ताकक राज्य ववधिक सेवा प्राधिकरण अपने संबंधित जजला ववधिक सेवा प्राधिकरण (िी.एल.एस.ए.) क े माध्यम से इसे कायािजन्वत कर सक ें ।

29) उच्चतम न्यायालय में मध्यस्र्थता और सुलह पररयोजना सलमर्त (एम.सी.पी.सी.) है जो कक न्यायालय से जुिी मध्यस्र्थता सदहत मध्यस्र्थता की बेहतर कायिप्रणाली क े ललए ववलभन्न नीर्तगत र्नणिय लेती है । एम.सी.पी.सी. की संरचना क े ववस्तार से, उच्च न्यायालय क े मध्यस्र्थता क ें द्र क े सार्थ ही जजला न्यायालय क े स्तर पर मध्यस्र्थता क ें द्र क े सार्थ उधचत समन्वय प्राप्त ककया गया है । इस प्रकार, नालसा भी एम.ए.एम.सी. की पररयोजना को एम.सी.पी.सी. को सौंपने पर भी ववचार कर सकता है । 30) श्ी अरुण मोहन, वररष्ठ अधिवक्ता द्वारा ललणखत पुस्तक: ‘सड़क दुर्िटना: बचाव, साविानी और क्षर्तपूर्ति’ में सड़क पीडड़त क े ललए न्याय लमलने से संबंधित ववलभन्न पहलुओं पर ववचार-ववमशि ककया गया है । एम.ए.एम.ए. की स्र्थापना पर ववशेर्ष अध्याय है जो पररयोजना की तैयारी और उसे अंर्तम रूप देने क े ललए नालसा को काफी मदद कर सकता है । नालसा को उस पुस्तक में ददए गए सुझाव और प्रस्ताव पर ववचार करना फायदेमंद रहेगा | इसमें, अन्य बात क े सार्थ-सार्थ, दुर्िटना अन्वेर्षक को अर्नवायि रूप से ररपोटि की प्रर्त एम.ए.एम.सी. को भेजने अर्थवा राष्रीय सड़क सुरक्षा पररर्षद को ईमेल करने का प्राविान ककया जा सकता है । इसकी एक प्रर्त एम.ए.एम.सी. को भेजने से मध्यस्र्थता में मदद लमलेगी, दूसरी ओर राष्रीय सड़क सुरक्षा पररर्षद को सूचना देने से पररर्षद को भववष्य में ऐसी दुर्िटनाओं को रोकने क े ललए उपाय करने में सहायता लमलेगी । (ख) एम.ए.सी.टी. द्वारा मामलों का शीघ्रातिशीघ्र तनपटान 31) एम.ए.एम.ए./एम.ए.एम.सी. की स्र्थापना मामले को एम.ए.सी.टी. में दायर ककए जाने से पहले दाव क े समािान करने क े प्रयोजनार्थि है । यह सविववददत है कक एम.ए.सी.टी. क े समक्ष लंबबत मामल क े सौहाद्रिपूणि र्नपटान क े ललए लोक अदालत क े रूप में वैकजल्पक वववाद र्नपटान का सहारा ललया जाता है, जो समय क े सार्थ-सार्थ जबरदस्त रूप से सफल रहा है | ये लोक अदालतें ववधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा भी आयोजजत की जाती हैं । लोक अदालत द्वारा मामल क े र्नपटान क े अपने फायदे और नुकसान होते हैं । जैसा भी हो, लोक अदालत क े अपने फायद क े कारण इसका प्रयोग जारी रखना चादहए ।

32. उपरोक्त वैकजल्पक वववाद र्नपटान ववधिय क े बावजूद, एम.ए.सी.टी. क े समक्ष न्याय प्रकरया का होना अपररहायि है । इस बात की गारंटी नहीं हो सकती कक मध्यस्र्थता या लोक अदालत क े माध्यम से 100 प्रर्तशत मामल का र्नपटारा ककया जा सकता है | अतः इन मामल को बबना ववलम्ब और सीलमत अवधि में र्नपटाने की सख्त आवश्यकता है । ददल्ली उच्च न्यायालय ने ऐसे मामल क े र्नपटारे में तेजी लाने हेतु प्रकरया दशािने वाले और यह सुर्नजश्चत करने वाले कक योजनाओं का र्नपटान दुर्िटना की तारीख से 90/120 ददन की अवधि क े भीतर ककया जाए, क ु छ र्नणिय ददए हैं । संक्षेप में, इन र्नदेश में यह शालमल है कक दुर्िटना होने पर, पुललस को जो सबसे पहले इस मामले में सामने आती है, जांच पूरी करनी चादहए और संबंधित मेरोपोललटन मजजस्रेट क े न्यायालय क े समक्ष एफ.आई.आर. दजि कराने क े सार्थ-सार्थ, प्रर्तयां एम.ए.सी.टी. क े सार्थ ही बीमा क ं पनी को भी भेजी जाएाँ । बीमा क ं पनी को यह पता लगाने क े ललए इसकी जांच करनी चादहए कक क्या वह दावा देय है और 30 ददन क े भीतर उसे एम.ए.सी.टी. को जवाब देना चादहए और एक बार ये दस्तावेज साक्ष्य आदद क े रूप में एम.ए.सी.टी. क े समक्ष आ जाते हैं तो यह उसे इस मामले को 30 ददन क े भीतर र्नणिय करने हेतु सक्षम बना देता है | एफ.ए.ओ. सं 843/2003 का र्नणिय ददनांक 16 ददसम्बर, 2009, वह मामला है जजसमें संपूणि प्रकरया को स्पष्ट ककया गया है । इस न्यायालय ने जयप्रकाश बनाम नेशनल इंश्योरेंस क ं पनी (एस.एल.पी. (ससववल) संख्या 11801-11804/2005) में अपनी सहमर्त भी अपने ददनांक 13 मई, 2016 क े आदेश में र्नम्नललणखत तरीक े से दी है- “जहां तक उक्त सुझाव का संबंि है, ववद्वान महासालललसटर ने हमारे समक्ष जनरल इंशोरेंस काउंलसल की ओर से फाइल ककये गए जवाब, ‘ववशेर्ष रूप से पैराग्राफ 4’, की ओर हमारा ध्यान आकवर्षित ककया, जजसमें कहा गया है कक इस समय पैराग्राफ 23 में सुझाई गई प्रकरया का अनुपालन ददल्ली में बीमा क ं पर्नय द्वारा “दावा अधिकरण सम्मत प्रकरया” नामक एक योजना क े माध्यम से ककया जा रहा है जजसे ददल्ली उच्च न्यायालय ने एफ.ए.ओ. सं 843/2003 शीर्षिक राजेश त्यागी और अन्य बनाम जयबीर लसंह एवं अन्य में पाररत ददनांक 16.12.2009 क े र्नणिय में तैयार ककया र्था । इसमें यह भी उल्लेख ककया गया है कक अधिकरण क े सार्थ-सार्थ ववधिक सेवा प्राधिकरण उक्त प्रकरया को कायािजन्वत करने क े ललए प्रभावी कदम उठा रहा है, जजसे राष्रीय राजिानी क्षेत्र ददल्ली में चलाया जा रहा है । पैरा 5 में आगे यह भी उल्लेख ककया गया है कक चूंकक यह प्रकरया ददल्ली में सफल रही है, इसललए इसे अणखल भारतीय आिार पर बढ़ाया जा सकता है । जनरल इंशोरेंस काउंलसल की ओर से दायर जवाब क े सार्थ अनुलग्नक आर-5 क े रूप में सहमत प्रकरया भी दायर की गई है ।” “हमने इस प्रकरया को भी देखा ललया है, जजसे जवाब क े सार्थ अनुलग्नक आर-5 क े रूप में फाइल ककया गया है, जो हमारे ववचार से एक ववस्तृत प्रकरया प्रतीत होती है और हम यह सुर्नजश्चत करने क े ललए ददल्ली उच्च न्यायालय क े महार्नबंिक को आगे र्नदेश जारी कर सकते हैं कक जहां तक ददल्ली का प्रश्न है इस प्रकरया का सख्ती से अनुपालन ककया जाए और उक्त प्रकरया को अन्य सभी उच्च न्यायालय को भी भेजे और अन्य सभी उच्च न्यायालय क े महार्नबंिक को यह सुर्नजश्चत करने क े र्नदेश ददए जाते हैं कक उक्त प्रकरया मोटर दुर्िटना दावा अधिकरण क े माध्यम से ववधिक सेवा प्राधिकरण तर्था संबंधित राज्य क े पुललस महार्नदेशक क े सार्थ समन्वय करक े कायािजन्वत की जाए | उच्चतम न्यायालय की रजजस्री (कायािलय) को र्नदेश ददया जाता है कक वह इस आदेश की एक प्रर्त, अनुलग्नक आर-5 (जनरल इंशोरेंस काउंलसल की ओर से दायर जवाब क े पेज 32 से 46 क े सार्थ) ददल्ली उच्च न्यायालय सदहत सभी उच्च न्यायालय को अग्रेवर्षत करे ताकक वतिमान आदेश का अनुपालन सुर्नजश्चत ककया जा सक े |”

33) जयप्रकाश मामले में ददनांक 6 नवम्बर, 2017 क े आदेश द्वारा, इस न्यायालय ने ददनांक 13 मई, 2016 क े अपने आदेश में संशोिन ककया और सभी राज्य को र्नदेश ददया कक वे 12 ददसम्बर, 2014 को ददल्ली उच्च न्यायालय द्वारा प्रर्तपाददत संशोधित दावा अधिकरण सम्मत प्रकरया को करयाजन्वत करें । संशोधित दावा अधिकरण सम्मत प्रकरया की प्रर्त आवश्यक अनुपालना क े ललए प्रत्येक उच्च न्यायालय क े महार्नबंिक को अग्रेवर्षत करने का र्नदेश ददया गया । उक्त आदेश क े संगत भाग को र्नम्नानुसार पुनः प्रस्तुत ककया जा रहा है: “ववद्वान न्याय लमत्र का यह भी कर्थन है कक 13 मई, 2016 क े हमारे आदेश में उजल्लणखत न्यायमूर्ति लमड्ढा द्वारा पाररत आदेश को वास्तव में ददनांक 12 ददसम्बर, 2014 को न्यायमूर्ति लमड्ढा द्वारा संशोधित ककया जा चुका र्था । अतः ददनांक 13 मई, 2016 क े आदेश को इस सीमा तक संशोधित माना जाए जो कक न्यायमूर्ति लमड्ढा ने 12 ददसम्बर, 2014 को अपने पहले क े आदेश को संशोधित कर ददया है । रजजस्री इस आदेश की प्रर्त क े सार्थ-सार्थ न्यायमूर्ति लमड्ढा द्वारा ददनांक 12 ददसंबर, 2014 को पाररत आदेश की प्रर्त प्रत्येक उच्च न्यायालय क े महार्नबंिक को आवश्यक जानकारी और अनुपालन क े ललए भेजेगी |”

34) अणखल भारतीय स्तर पर इसका पालन करने की आवश्यकता है । नालसा को इसकी सुवविा प्रदान करने क े ललए ववलभन्न उच्च न्यायालय क े सार्थ समन्वय और सहयोग क े सार्थ-सार्थ इस पर ध्यान देना चादहए और इसकी र्नगरानी करनी चादहए| (ग) पीडड़िों एवं/अथवा पीडड़त क े पररजनों क े सुरक्षक्षि हाथों में मुआवजे की प्राप्ति सुतनप्श्चि करना:

35. श्ी अरुण मोहन ने सुझाव ददया कक इस संबंि में सरकार प्रकरयाओं एवं योजनाओं को बना सकती है| ववशेर्षत: LIC/RBI पेंशन फण्ि ववर्नयामक एवं ववकास प्राधिकरण एवं व्यावसार्यक बैंक /बीमा क ं पर्नय क े सार्थ ववचार ववमशि करक े वावर्षिकी की उपलब्िता प्रदान कर सकती है| इसे आसान करने क े ललए, ववद्वान ् वररष्ठ अधिवक्ता ने दो फ्लोचाटि ददये हैं, पहला, वतिमान कानून क े अंतगित एवं दूसरा MAMA की स्र्थापना क े अंतगित| ऐसी प्रकरया एवं योजनाओं को बनाने का वववरण ऊपर संदलभित श्ी अरुण मोहन की बुक में ददया गया है| हम सरकार से आशा करते हैं कक ऐसी योजनाओं को बनाने एवं वावर्षिकी प्रमाण पत्र की उपलब्िता की व्यवहायिता को देखें | यह प्रयोग छ: महीने की अवधि क े भीतर ककया जाए एवं उसी क े अनुरूप फ ै सला ललया जाए|

36) इसक े अर्तररक्त, हम यह भी वणिन करना चाहते हैं कक ददल्ली उच्च न्यायालय ने (राजेश त्यागी बनाम जयवीर ससंह एवं अन्य (FAO सं. 842 of

2003) (न्यायािीश जे.आर. समड्ढा द्वारा) मोटर दुर्िटना दावे वावर्षिकी जमा योजना MACAD योजना बनाने का कायि भारतीय बैंक सलमर्त क े सहयोग से ककया र्था| बैंक को शालमल करने का उद्देश्य यह सुर्नजश्चत करना र्था कक योजना बैंक क े द्वारा कायािजन्वत की जाए| उपरोक्त मामले में ददनांक 7 ददसम्बर, 2018 को पाररत अपने आदेश में ववद्वान ् न्यायािीश ने अलभललणखत ककया कक 21 बैंक ने MACAD योजना क े कायािन्वयन करने का फ ै सला ककया र्था जजसे न्यायालय द्वारा 1 मई, 2018 द्वारा अनुमोददत ककया गया | इन 21 बैंक क े प्रभावी दस्तावेज को ररकॉिि पर ललया गया र्था | न्यायालय ने र्नदेलशत ककया कक इन प्रभावी दस्तावेि को उच्च न्यायालय क े महार्नबंिक को प्रदान ककया जाए जजससे ये सभी MACT’s को पररचाललत ककये जा सक ें | आगे, उपरोक्त योजना क े कायािन्वयन क े ललए र्नदेश ददए गए हैं | अत: हम 7 ददसम्बर, 2018 क े आदेश को सम्पूणित: दोबारा पेश करना चाहेंगे | “1. श्ी लललत भसीन, भारतीय बैंक सलमर्त क े ववद्वान ् अधिवक्ता ने 21 बैंक क े प्रभावी दस्तावेि की प्रर्तय को सौंपा है जजन्ह ने, न्यायालय द्वारा 01 मई, 2018 को अनुमोददत, मोटर दुर्िटना दावा वावर्षिकी जमा योजना (MACAD योजना) को कायािजन्वत ककया है | इन 21 बैंक क े प्रभावी दस्तावेज क े संकलन को अलभलेख पर ललया गया| भारतीय बैंक सलमर्त की ओर से ववद्वान ् अधिवक्ता कायिकारी दस्तावेज की प्रर्त महार्नबंिक को सभी दावा अधिकरण को पररचाललत करने क े ललए देंगे | 2. महार्नबंिक को र्नदेश ददया जाता है कक उपरोक्त दस्तावेि को सभी दावा अधिकरण में कायािजन्वत ककये जाने हेतु भेजे | दावा अधिकरण आदेश ददनांक 1 मई 2018 क े अनुसार, दावेदार को अवािि रालश तरीक े बद्ि ढंग से प्रदान करेगा और अवािि रालश मोटर दुर्िटना दावा वावर्षिकी जमा योजना द्वारा प्रदान की जायेगी | 3. सभी बैंक को 4 सप्ताह क े भीतर प्रिान अधिकारी र्नयुक्त करने हेतु र्नदेश ददया जाता है | भारतीय बैंक सलमर्त क े ववद्वान ् अधिवक्ता बैंक क े प्रिान अधिकाररय क े पते, फोन न. व ई मेल पते सदहत उनकी एक सूची तैयार करेंगे और उसे महार्नबंिक को जमा करायेंगे जो इस प्रिान अधिकाररय की सूची को सभी दावा अधिकरण को भेजेंगे| प्रत्येक बैंक क े प्रिान अधिकारी अपनी शाखाओं द्वारा दुर्िटना दावा वावर्षिकी जमा योजना क े कायािन्वयन को सुर्नजश्चत करेंगे | दावा अधिकरण प्रदार्नत आदेश की प्रर्त को बैंक क े प्रिान अधिकारी को ई-मेल द्वारा भेजेगा जो ई-मेल क े प्राप्त होने क े तीन सप्ताह क े भीतर बैंक द्वारा इसे प्रदान करने को सुर्नजश्चत करेगा | 4. भारतीय बैंक सलमर्त तर्था ददल्ली राज्य ववधिक सेवा प्राधिकरण इस दुर्िटना दावा वावर्षिकी जमा योजना का वप्रंट मीडिया क े सार्थ सार्थ डिजजटल मीडिया में पयािप्त रूप से प्रचार करेंगे | 5. आदेश ददनांक 12.01.2018, 09.03.2018, 01.05.2018, 20.07.2018 तर्था 07.09.2018 में ददए गए र्नदेश को शालमल करते हुए आदेश ददनांक 15.12.2017 क े अनुसार दावा अधिकरण सम्मत प्रकरया में संशोिन ककया जाता है| संशोधित दावा अधिकरण सहमर्त प्रकरया इस आदेश क े सार्थ संलग्न है |

6. महार्नबंिक संशोधित दावा अधिकरण सहमर्त प्रकरया को सभी दावा अधिकरण को प्रेवर्षत करेगा| दावा अधिकरण, ददल्ली पुललस तर्था बीमा क ं पर्नय को यह र्नदेश ददया जाता है कक वे ददनांक 01.01.2019 से संशोधित दावा अधिकरण सहमर्त प्रकरया को लागू करें | 7. ववद्वान ् न्याय लमत्र ने कर्थन ककया कक सलमर्त इस न्यायालय द्वारा उसे संदलभित ककये गए मुद्द पर ववचार कर रही है| सलमर्त की अंर्तम ररपोटि इस न्यायालय क े समक्ष अगली सुनवाई की ताररख को फाइल की जाए | 8. अनुपालना हेतु ददनांक 08.02.2019 को 2:30 p.m. सुनवाई की जाए| 9. न्यायालय दुर्िटना दावा वावर्षिकी जमा योजना क े कायािन्वयन हेतु भारतीय बैंक संर् की ओर से ववद्वान ् अधिवक्ता श्ी लललत भसीन क े सहयोग की सराहना करता है | 10. संशोधित दावा अधिकरण सहमर्त प्रकरया क े सार्थ इस आदेश की प्रर्त इस न्यायालय क े महार्नबंिक, राष्रीय ववधिक सेवा प्राधिकरण, ददल्ली राज्य ववधिक सेवा प्राधिकरण, ददल्ली पुललस क े सार्थ सार्थ जनरल इंशोरेंस काउंलसल (5वां तल, बबजल्िंग सं. 14, नेशनल इंशोरेंस बबजल्िंग, जमशेदजी टाटा रोि, चचि गेट, मुंबई- 400020) को भेजी जाए| जनरल इंशोरेंस काउंलसल इस आदेश को सभी बीमा क ं पर्नय को प्रेवर्षत करेगी| 11. इस आदेश की प्रर्त वादकार की ओर से ववद्वान ् अधिवक्ता सदहत भारतीय बैंक संर् तर्था ददल्ली पुललस की ओर से ववद्वान ् अधिवक्ता को कोटि मास्टर क े हस्ताक्षर से दस्ती दी जाए |

37. इस प्रकार, ‘दावा अधिकरण सहमर्त प्रकरया’ जो संशोधित प्रकरया द्वारा प्रर्तस्र्थावपत है, जो उपरललणखत है, क े कायािन्वयन हेतु र्नदेश पहले ही ददया गया है| यद्दवप, हमने पाया कक दावा प्राधिकरण द्वारा उधचत कायािन्वयन नहीं ककया गया है| हम, इस प्रकार, र्नदेलशत करते हैं कक दावा अधिकरण क े पीठासीन अधिकाररय, राज्य पुललस क े वररष्ठ पुललस अधिकाररय एवं इंशोरेंस क ं पनी को जागरूक करने क े ललए सभी राज्य न्यार्यक पररर्षद में उक्त प्रकरया क े कायािन्वयन हेतु समय समय पर कायिरम होने चादहए|

38. ददल्ली उच्च न्यायालय क े उपयुिक्त आदेश ददनांक 7, ददसम्बर, 2018 द्वारा अनुमोददत संशोधित दावा अधिकरण सहमर्त प्रकरया की प्रवृवि मोटर दुर्िटना दावा अधिकरण क े मामल का तीव्र गर्त से र्नपटान सुर्नजश्चत करना है| उसी तरह, जो वावर्षिकी जमा योजना में करयाजन्वत 21 बैंक क े प्रभावी दस्तावेि सुर्नजश्चत कर सकते है की मुआविा उन व्यजक्तय को ददया गया है जजनको लमलना चादहए| यह वावर्षिकी भुगतान क े ललए है| अत: पूरे देश में दावा अधिकरण द्वारा MACAD योजना क े कायािन्वयन की आवश्यकता है| हम उसी अनुसार र्नदेलशत करते हैं | हम 21 बैंक को र्नदेश देते हैं कक वह अणखल भारतीय आिार पर इसक े प्रभावी दस्तावेि का कायािन्वयन करे|

39. हम ववलभन्न र्नदेश/लसफाररशें र्नम्न प्रकार से प्रस्तुत करते हैं: (a) हम सरकार से आशा करते हैं कक सामान्य रूप से मध्यस्र्थता क े ववलभन्न पहलुओं को देखने क े ललए भारतीय मध्यस्र्थता अधिर्नयम को लागू करने की संभाव्यता पर ववचार करे | (b) मोटर वाहन अधिर्नयम में आवश्यक संशोिन करक े सरकार MAMA को स्र्थावपत करने की संभाव्यता की जांच करें | इस उद्देश्य क े ललए, यह अपीलार्थी क े द्वारा ददए गए दो फ्लो चाट्िस पर ववचार कर सकती है | (c) इसी बीच में, NALSA को मोटर दुर्िटना मध्यस्र्थता सेल स्र्थावपत करने हेतु र्नदेलशत ककया जाता है जो NALSA क े संरक्षण में स्वतंत्र रूप से अपना कायि कर सकता है अर्थवा MCPC को सौंपा जा सकता है | ऐसा प्रोजेक्ट दो महीने की अवधि क े भीतर तैयार होना चादहए एवं तत्पश्चात इसे ववलभन्न स्तर पर अपना कायि तुरंत शुरू करना चादहए जैसा कक इस र्नणिय में सुझाया गया है | हम जय प्रकाश मामले में ददनांक 6 नवम्बर, 2017 क े आदेश में सजम्मललत र्नदेश को आिुर्नक संशोधित दावा अधिकरण सहमर्त प्रकरया क े कायािन्वयन हेतु दोहराते हैं | ऐसा कायािन्वयन को सुर्नजश्चत करने क े ललए, NALSA को ववलभन्न उच्च न्यायालय क े सार्थ समन्वय एवं सहयोग क े सार्थ इस पर ववचार करने क े ललए र्नदेलशत ककया जाता है | MACAD योजना अणखल भारतीय आिार पर सभी दावा अधिकरण में करयाजन्वत होगी | 21 बैंक, भारतीय बैंक संर् क े सदस्य जजन्ह ने MACAD योजना को करयाजन्वत करने का र्नणिय ललया है वे अणखल भारतीय आिार पर ऐसा ही करेंगे | (d) हम सरकार से आशा करते हैं कक सरकार आवश्यक योजनाओं को बनाने की संभाव्यता एवं वावर्षिक प्रमाण पत्र की उपलब्िता पर ववचार करे| यह अभ्यास छ: महीने क े भीतर ककया जाए एवं तत्पश्चात र्नणिय ललया जाए | (e) इसी प्रकार, हम र्नदेश देते हैं कक सभी न्यार्यक अकादलमय में दावा अधिकरण क े पीठासीन अधिकाररय, राज्य पुललस क े वररष्ठ पुललस अधिकाररय को जागरूक करने हेतु तर्था इंशोरेंस क ं पर्नय में उक्त प्रकरया क े करयान्वयन हेतु समय समय पर कायिरम ककये जाएाँ |

40. अपील का उपरोक्त तरीक े से र्नपटान ककया जाता है|...................न्यायािीश ए.क े.सीकरी...................न्यायािीश एस. अब्दुल निीर नई ददल्ली 05 माचि, 2019 [अस्वीकरण: देशी भार्षा में र्नणिय का अनुवाद मुकद्द्मेबाि क े सीलमत प्रयोग हेतु ककया गया है ताकक वो अपनी भार्षा में इसे समझ सक ें एवं यह ककसी अन्य प्रयोजन हेतु प्रयोग नहीं ककया जाएगा| समस्त कायािलयी एवं व्यावहाररक प्रयोजन हेतु र्नणिय का अंग्रेिी स्वरूप ही अलभप्रमाणणत माना जाएगा और कायािन्वयन तर्था लागू ककए जाने हेतु उसे ही वरीयता दी जाएगी |]