Indian Oil Corporation Ltd v. State of Uttar Pradesh

Supreme Court of India · 22 Apr 2019
Ashok Bhushan; K. M. Joseph
Civil Appeal Nos. 3257-3268 of 2019 (Special Leave Petition (Civil) Nos. 31748-31759 of 2019)
2019 INSC 548
tax appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court upheld the constitutional validity of the Uttar Pradesh Entry Tax Act, 2007, but ruled that interest on delayed payment of entry tax cannot be imposed without explicit statutory provision.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
भार का सव च्च न्यायालय
दीवानी पुनयाचना अति कारिर ा
दीवानी पुनयाचना संख्याः 3257-3268 सन् 2019
(विवशेष अनुमति यातिचका (दीवानी) संख्याः 31748-31759 सन् 2019
से उत्पन्न)
इण्डि67यन ऑयल कॉरपोरेशन लिलविमटे7 अपीलार्थी>
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य प्रत्यर्थी>गण
विनणय mn~?kks"k.kk
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
2019 INSC 548
माननीय न्यायमूर्ति , अशोक भूषण।
प्रत्यर्थी> द्वारा अपीलार्थी> से प्रवेश कर पर ब्याज की मांग कर े हुए जारी
सूचनाओं की मांग पर आपलित्त उठा े हुए अपीलार्थी> द्वारा दायर रिरट यातिचका
को इलाहाबाद उच्च न्यालय की ख6ड़पीठ द्वारा विदनांक 22.11.2018
खारिरज कर विदये जाने क
े विवरूद्ध ये यातिचकाएं दायर की गयी हैं। ये
पुनयाचनाएँ यूपी टैक्स ऑन इन्ट्रीऑफ गुड्स इटू लोकल एरिरया
2007 अति विनयम क
े अन् ग अपीलार्थी> पर प्रवेश कर का भुग ान करने क

दातियत्व से संबंति विवषय पर क
ें वि^ हैं (अति विनयम, 2007 से संदर्भिभ )।
अपीलार्थी> द्वारा मांगी गयी प्रवेश कर का भुग ान कर विदये जाने पर इस
विवषय को क
े वल प्रवेश कर पर ब्याज का भुग ान करने का दातियत्व से
संबंति समझा जाना है।
उ.प्र. राज्य एवं देश क
े अन्य राज्य में प्रवेश कर अति विनयम में मुकदमों का
लम्बा इति हास रहा है। प्रवेश कर अति विनयम को प्रवर्ति करने में राज्यों की
विव ातियका की वै ाविनक योग्य ाओं पर प्रश्नग कर े हुए उ. प्र. सविह अन्य
राज्यों द्वारा प्रवर्ति प्रवेश कर अति विनयम को उच्च न्यायालयों में चुनौ ी दी mn~?kks"k.kk
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
गयी, जो भार क
े संविव ान क
े भाग 13 क
े अनुच्छेद 301 एवं अन्य क

अन् ग प्रदत्त व्यापार, वाणिणज्य एवं समागम क
े दूविष अति कार रिरट
यातिचकाक ाओं क
े अनुरूप है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय एवं क
ु छ अन्य उच्च
न्यायालयों ने शुरुआ ी प्रवेश कर कानूनों को इस आ ार पर खारिरज कर
विदया विक ये कानून भार क
े संविव ान क
े भाग 13 क
े अं रग प्रद्त्त
अति कारों का उल्लंघन कर े हैं।
इन पुनयाचनाओं में उत्पन्न विवषयों विनणय करने क
े लिलए जहां क उ. प्र. में
वादों क
े इति हास का संबं है उस पर ध्यान देना आवश्यक है। विकसी
स्र्थीानीय क्षेत्र में विकसी माल पर प्रवेश कर का अति रोपण को यू.पी टैक्स
ऑन एंट्री ऑफ गुड्स अति विनयम, 2000 द्वारा लगाया गया, 7ब्ल्यू. ई. एफ
01.11.1999 जिजसे यू.पी. टैक्स ऑन एंट्री ऑन गुड्स अति विनयम 2000
द्वारा प्रति स्र्थीाविप कर विदया गया, जो 01.11.1999 को में आया। प्रवेश कर
को कच्चे ेल पर भी लगाया गया। कच्चे ेल पर कर क
े अति रोपण को चुनौ ी
दे े हुए सन् 2003 में मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद क
े समक्ष रिरट यातिचका
संख्या 251 अपीलार्थी> द्वारा प्रस् ु की गयी। मा. उच्च न्यायालय ने अपने mn~?kks"k.kk
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
विवस् ृ विनणय एवं आदेश विदनांविक 27.01.2004 को अति विनयम सं. 1, सन् 2000 को भार ीय संविव ान क
े अनुच्छेद 301 एवं 304 क
े उल्लंघन में
माना और अ ः इसको अति कारा ी (घा क महामारी) घोविष कर विदया।
27.01.2004 को पारिर विनणय, जिजसे बाद में जिसविवल अपील सं. 997-
998, सन् 2004 क
े रूप में पुनः अंकीक
ृ विकया गया, क
े विवरूद्ध उ. प्र.
राज्य नें विवशेष अनुमति यातिचका प्रस् ु की। न्यायालय विदनांक
09.03.2004 को विनम्नलिललिख अन् रिरम आदेश पारिर विकयाः-
"अमल हे ु आवेदन पत्र पर नोविटस जारी करें।
अनुमति प्रद्त्त।
27.01.2004 क
े बाद अलग-अलग खा े में ब्याज को
प्रत्यर्भिर्थीयों से अपीलार्थी> द्वारा प्राप्त विकया जा सकने वाले सभी
करों को अपीलार्थी> द्वारा शपर्थी करने क
े विवषया ीन आक्षेविप
विनणय की कायवाही पर रोक लगायी जा ी है। इससे प्राप्त राणिश mn~?kks"k.kk
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
एवं ब्याज इस न्यायालय क
े आगे क
े आदेशों क
े विवषया ीन
रोक दी जाएगी।
विवशेष अनुमति (जिसविवल) संख्याः 3033/3004
इस विवषय को हटायें।"
JUDGMENT

5. इस न्यायालय की संविव ान पीठ ने जिजन्दाल स्टेनलेस स्टील लिल. (2) एवं अन्य बनाम हरिरयाणा राज्य एवं अन्य (2006) 7 एस.एस.सी. 241 क े मामले में कर क्षति परक है या नहीं को य करने क े लिलए मानद6ड़ों का विन ारण विकयााा। संविव ान पीठ ने दुहराया विक अनुच्छेद 301 क े अं ग जैसा विक अति याबारी टी कम्पनी लिल. बनाम असाम राज्य, एआईआर 1961 एस.सी. 232 क े मामले में व्यापार एवं वाणिणज्य क े में प्रत्यक्ष एवं विनकटम प्रभाव का यह जिसद्धान् और ऑटोमोबाईल ट्रांसपोट(राजस्र्थीान) लिल. बनाम राजस्र्थीान राज्य, ए.आई.आर. 1962 एस.सी. 1408 क े मामले में व्यक्त कायप्रणाली परीक्षण इस बा को य करने क े लिलए विक कर क्षति कारक है अर्थीवा नहीं को लागू करने क े लिलए बने रहने देना र्थीा। संविव ान पीठ ने उसे दनुरूप बनाये रखा, विवणिभन्न क्षेत्रीय अति विनयमनों की संवै ाविनक मान्य ा mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लंविब अपीलों, विवशेष अनुमति यातिचकाओं एवं रिरट यातिचकाओं क े विवषया ीन इस विनणयों क े आलोक में विनस् ारण हे ु सुनी जाएगीं।

6. जब न्यायालय ने पक्षकारों को अनुज्ञा दी विक संबंति रिरट यातिचकाओं को युविक्तयुक्त थ्यों को अपने-अपने उच्च न्यायालयों में दो माह क े भी र प्रस् ु करें जिजनको आक्षेविप अति रोपण क्षति परक प्रक ृ ति की या की जाँच करनी र्थीी, संवै ाविनक पीठ क े विनणय क े आ ार पर इस मामले को सुनवाई क े लिलए 14.07.2006 ारीख लगी। मा. उच्च न्यायलय से आदेश प्राविप्त की ति णिर्थी से पाँच माह क े अन्दर मामले को विनपटाने की प्रार्थीना की गयी। इस न्यायलय क े उपरोक्त आदेश क े उपरान्, मा.इलाहाबाद उच्च न्यायलय विदनांक 08.01.2017 को उठायी गयी आपलित्तयां विक कच्चे ेल एवं अन्य सामानों पर लगाया गया प्रवेश कर द67ात्मक कर की आवश्यक श •, इस न्यायलय द्वारा यर्थीाविनण>, को पूरा नहीं कर ा पर सुनवाई क े लिलए राजी हुआ। इस न्यायालय ने विदनाँक 17.04.2007 को जिसविवल अपील संख्या 997-998 वष 2004 उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य बनाम इंति7यन ऑयल कॉरपोरेशन Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लिलमटे7 एवं अन्य क े मामले में विनम्नलिललिख श • क े सार्थी आदेश पारिर विकया गया- ".............उच्च न्यायलय का आदेश, जहाँपर इसको करदा ाओं क े पक्ष में पारिर विकया गया है यह वहां क लागू होगा जहाँ क यातिचकाक ाओं का संबं है.........."

7. उपरोक्त अन् रिरम आदेश क े आ ार पर इसका प्रभाव यह र्थीा विक उत्तर प्रदेश राज्य में कर का आरोपण अपोषणीय होना ही र्थीा। पूव अति विनयम सं. 1 वष 2007 को विनरजिस कर एवं इस अति विनयम को, जो विक 01.11.1999 से प्रभावी है, पुनः लागू करक े उत्तर प्रदेश राज्य ने विदनांक 24.09.2007 को उ. प्र. स्र्थीानीय क्षेत्र में माल प्रवेश कर अति विनयम (उ. प्र. अति विनयम 35 वष 2007) लागू विकया। उद्देश्यों एवं कारणों से संबंति कर्थीन जो उपरोक्त अध्यादेश क े विनगमन क े लिलए आवश्यक र्थीा वह विनम्नलिललिख हैः- उद्देश्यों एवं कारणों से संबंति कर्थीन Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उत्तर प्रदेश माल प्रवेश कर अति विनयम, 2000 (अति विनयम सं. 12 वष 2000) को लागू विकया गया जो स्र्थीानीय क्षेत्र में माल क े उपभोग, प्रयोग, एवं विवक्रय हे ु प्रवेश पर कर लगाने एवं उसको वसूलने क े प्राव ान कर ा है। मा. इलाहाबाद उच्च न्यायलय नें रिरट यातिचका सं.251/2003, श्री इंति7यन ऑयल कॉरपोरेशन लिलविमटे7 बनाम राज्य सरकार क े मामले में विदनांक 27 जनवरी, 2004 स्वयं द्वारा पारिर विनणय में इस अति विनयम को अति कारा ी (महामारी) घोविष कर विदया। राज्य सरकार ने उक्त विनणय क े विवरूद्ध विवशेष अनुमति यातिचका, संख्या 2757-2758/2004 दायर की। विदनांक 09.02.2004 क े मा. उच्च न्यायलय क े विनणय पर मा. उच्च म न्यायलय ने यह श लगा े हुए रोक लगा दी विक प्रवेश कर क े रूप में प्राप्त राणिश अलग-अलग ब्याज खा ों पर जमा की जाएगी। इसक े उपरान्, जिंजदाल स्टील लिलविमटे7 बनाम राज्य सरकार एवं अन्य क े मामले में मा. उच्च म न्यायालय मा. उच्च Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायलय से अपेक्षा की विक इस अति विनयम क े अन् ग प्रवेश कर क े द67ा मक प्रक ृ ति से इससे संबंति रिरपोट हमको दें। विदनांक 09 जनवरी,2007 को मा. उच्च न्यायलय ने यह विनण> विकया विक उक्त अति विनयम क े अन् ग प्रवेश कर द67ात्मक प्रक ृ ति का नहीं है। यही विनणय इंति7यन ऑयल कॉरपोरेशन लिलविमटे7 एवं समान मामलों में मा. उच्च न्यायलय ने पारिर विकया। विदनांक 08 जनवरी, 2007 क े मा. उच्च न्यायालय क े विनणय क े विवरूद्ध राज्य सरकार ने मा. उच्च म न्यायलय में विवशेष अनुमति यातिचका(एस.एल.पी.) दायर की गई। चूंविक उच्च म न्यायालय द्वारा पारिर विदनांविक 17 अप्रैल 2007 क े अं रिरम आदेश क े आ ार पर मेसस इण्डि67यन ऑल कॉरपोरेशन लिलविमटे7 द्वारा 3022-28 करोड़ रूपये क े नवापसी की मांग की जा रही र्थीी इसलिलए राज्य सरकार उच्च म न्यायलय क े संवै ाविनक पीठ क े विनणय क े पश्चा ् उक्त अति विनयम को नये जिसरे से भू लक्षी रूप से लागू करने का Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवचार कर रही र्थीी। इस सब क े बीच विबहार प्रवेश कर अति विनयम को पटना उच्च न्यायालय द्वारा वै घोविष कर विदया गया। अ ः उच्च न्यायालय द्वारा दर्भिश कविमयों को हटाकर, उच्च म न्यायालय क े संवै ाविनक पीठ द्वारा द67ात्मक कर से संबंति विकये गये अवलोकन क े प्रकाश में और पटना उच्च न्यायालय द्वारा वै घोविष विबहार प्रवेश कर अति विनयम क े प्राव ानों क े आ ार पर भू लक्षी प्रभाव से प्रभाविव विवति बनाने का विनणय लिलया गया। चूंविक राज्य की विव ातियका सत्र में नहीं र्थीी और उक्त विनणय को लागू करने की विन ां आवश्यक ा र्थीी, इसलिलए विदनांक 24 जिस ंबर 2007 को उ. प्र. क्षेत्रीय भागों में माल प्रवेश कर अध्यादेश, 2007 (अध्यादेश संख्या 35 वष 2007) राज्यपाल द्वारा जिस म्बर 24,2007 को प्राख्याविप विकया गया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस विव ेयक को उक्त अध्यायदेश को प्रति स्र्थीाविप करने क े लिलए लाया गया है।”

8. अध्यादेश संख्या 35 वष 2007 को उ.प्र. क्षेत्रीय भागों में प्रवेश कर अति विनयम द्वारा प्रति स्र्थीाविप कर विदया गया र्थीा। अपीलार्थी> ने उक्त अध्यादेश क े प्रव न क े उपरान् उच्च न्यायलय इलाहाबाद में अध्यादेश संख्या 35 वष 2007 को चुनौ ी दे े हुए रिरट यातिचका संख्या 1483 वष 2007 दायर की र्थीी। अति विनयम क े प्रव न क े उपरान् रिरट यातिचका में “अति विनयम” को “अध्यादेश” से प्रति स्र्थीाविप करने की मांग की गयी र्थीी। विदनांक 18.12.2008 को जय प्रकाश एसोजिसएट लिलविमटे7 बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य (2009) 7 एस.सी.सी. 339 क े मामले मे इस न्यायालय की दो जजों वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश सविह विवणिभन्न राज्यों में माल प्रवेश पर कर लगाने क े इस मामले का भार क े संविव ान क े अनुच्छेद 145 (3) की श • क े अनुरूप विन ारण हे ु नव जजों वाली बड़ी पीठ को संदर्भिभ कर विदया। विदनांक 23.12.2011 को उच्च न्यायलय की ख67पीठ ने रिरट यातिचका संख्या 1483 वष 2007 सार्थी ही सार्थी अनेक रिरट यातिचकाएं Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जिजसमें महत्वपूण रिरट यातिचका जो रिरट टैक्स संख्या 1484 वष 2007- आईटीसी लिलविमटे7 बनाम उ. प्र. राज्य हैं, को विनस् ारिर विकया। इलाहाबाद उच्च न्यायलय की ख6ड़पीठ ने यह विनण> विकया विक उत्तर प्रदेश स्र्थीानीय क्षेत्र में माल प्रवेश कर अति विनयम, 2007 क े प्रव न में विव ायी अणिभयोग्य ा की विकयाी नहीं र्थीी जिजसमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वार अनुसूतिच माल क े स्र्थीानीय क्षेत्र में प्रवेश पर उपभोग, प्रयोग एवं विबक्री हे ु प्रवेश कर लगाना र्थीा। इस विनणय का विनष्कष भाग प्रस् र संख्या 151,152 एवं 153 में है जो इस विनम्नलिललिख हैः- “151. उक्त प्रायोजनों हे ु, हम ारिर कर े हैं विक अनुसूतिच माल को स्र्थीानीय क्षेत्रों में उपभोग, प्रयोग और विबक्री क े लिलए प्रवेश पर प्रवेश कर को लगा े हुए स्र्थीानीय क्षेत्र में माल प्रवेश कर अति विनयम, 2007 को प्रवर्ति करने में उ. प्र. सरकार क े पास विवति यी योग्य ा का आभाव नहीं र्थीा। अति विनयम क े प्राव ान स्पष्ट ः प्राव ान कर े हैं विक प्रवेश कर की सम्पूण Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA राणिश उ. प्र. राज्य विवकास विनति में एकत्र एवं जमा होगी और इस विनति का प्रयोग क े वल इसक े प्रति पूर्ति क े उद्देश्यों क े लिलए व्यापार, वाणिणज्य और उद्योग को सरल बनाना हैं इसी बा को सुविनतिश्च क े लिलए अति विनयम में पयाप्त विदशा विनद‰श एवं गारंटी दी गयी है। राज्य सरकार ने यह स्र्थीाविप विकया है विक प्रवेश कर की सम्पूण राणिश उ.प्र. राज्य क े स्र्थीानीय क्षेत्रों में प्रति पूर्ति /हजाना क े माध्यम से इसक े देनदारों को गुणात्मक/मात्रात्मक लाभ प्रदान कर ा है। अति विनयम, 2007 क े अन् ग यह अति रोपण भेदभावपूण, अ ार्किकक एवं लोकविह क े विवरूद्ध नहीं है। अ ः अति विनयम क े अन् ग कर का अति रोपण भार क े अनुच्छेद 301 क े ह प्रदत्त व्यापार, वाणिणज्य एवं समागम की स्व ंत्र ा का उल्लंघन नहीं कर ा है। अति विनयम की ारा 17 जो उ.प्र. माल प्रवेश कर अति विनयम, 2000 क े ह अति रोविप, आँकलिल, संपाविद, संग्रही प्रवेश कर की राणिश को वै बना ा है, वह भी वै है Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और राज्य को प्राति क ृ कर ी है विक वे राज्य क े स्र्थीानीय क्षेत्र में व्यापार वाणिणज्य एवं समागम को सुगम बनाने क े लिलए सम्पूण न को इसक े उपयोग क े लिलए बनाए रखे।

152. हम स्पष्टीकरण क े माध्यम से यह देख सक े हैं विक इन रिरट यातिचकाओं में हमने अपना जांच उ.प्र. स्र्थीानीय क्षेत्र माल प्रवेश कर अति विनयम, 2007 क े संवै ाविनक वै ा और विकया इसकी प्रक ृ ति द6ड़ात्मक है, जो भार क े अनुच्छेद 301 क े ह व्यापार, वाणिणज्य एवं समागम की स्व ंत्र ा का उल्लंघन नहीं कर ा है, क सीविम कर लिलया है। हमने सूचनाओं की वै ा, आँकलन, अवहार, छ ू ट एवं व्यापारिरयों क े दातियत्व और अनुसूतिच माल क े व्यापारिरयों का प्रवेश कर का भुग ान जैसे अन्य विवषयों का परीक्षण नहीं विकया है। अन्य सभी प्रश्न अति विनयम क े अ ीन विवति सम्म सक्षम प्राति कारिरयों क े विवचार क े लिलए बने रहेंगे। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

153. परिरणामस्वरूप सभी रिरट यातिचकाएं खारिरज की जा ी हैं। अन् रिरम आदेश विदया जा ा है।”

9. अपीलार्थी> ने उच्च न्यायालय द्वारा पारिर विनणय विदनांविक 23.12.2011 क े विवरूद्ध,जो अपीलार्थी> की रिरट यातिचका में विनणय हुआ र्थीा, एस.एल.पी. (जिसविवल) संख्या 327 वष 2012 दायर की र्थीी। अपीलार्थी> द्वारा प्रत्येक मामले में अति विनयम क े ह 50 प्रति श कर दातियत्व/बकाया को भुग ान करने एवं चार सप्ताह क े भी र शेष नराणिश जमा करने क े संबं में उच्च े विदनांक 23.12.2011 को पारिर विनणय क े प्रव न पर रोक लगाकर उच्च न्यायालय ने विनणय विदनांविक 23.12.2011 क े विवरूद्ध प्रस् ु अनेक विवशेष अनुमति यातिचकाओं में अन् रिरम आदेश पारिर विकया। एस.एल.पी. (जिसविवल) संख्या 327 वष 2012 में विनम्नलिललिख आदेश पारिर विकया गयाः- “इस मामले में याची की ओर से विवद्व सॉलिलजिसटर जनरस श्री आर.एफ. नरीमन ने कर्थीन विकया र्थीा विक इन सभी वष• में आँकलनों क े माध्यम से विबना विकसी प्रमाणीकरण क े आँकलन Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अवति यों 2007-2008, 2008-2009, 2009-2010 2010-2011 क े लिलए स्र्थीानीय क्षेत्र में माल प्रवेश कर अति विनयम,2007 क े प्राव ानों क े अन् ग प्रवेश क े भुग ान की मांग कर े हुए अन्य सभी बा ों क े सार्थी प्रत्यर्थी> (गण) ने मांग सूचनाओं को जारी विकया है। इस परिरण्डिस्र्थीति का सामना करक े राज्य-प्रत्यर्थी> की ओर से विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री क े.क े. वेणुगोपाल ने कर्थीन विकया विकया विक वह यह दर्भिश कर े हुए विक विकया याचीगणों ने प्रश्नग आँकलन वष क े लिलए माजिसक या वार्किषक रिरटन दालिखल विकया है और विकया विवभाग ने आँकलन पूरा कर लिलया है या आ ार जिजन पर मांग सूचनाओं को जारी की गया है, उतिच शपर्थीपत्र दालिखल करेंगे। उक्त शपर्थीपत्र दालिखल करने क हम इस मामले को विदनांक 12.01.2012 क स्र्थीविग कर े हैं।” 10.अपीलार्थी> द्वारा इस एस.एल.पी.(जिसविवल) संख्या 327 वष 2012 में इस न्यायलय ने आगे आदेश विदनांविक 17.01.2012 एवं आदेश विदनांविक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 16.02.2012 पारिर विकया। इस अन् रिरम आदेश में अपीलार्थी> को 50 प्रति श प्रवेश कर अदा करने का विनद‰श विदया गया। विदनांक 06.12.2013 को अपीलार्थी> की रफ से अन् रिरम आदेश में सु ार हे ु प्रार्थीना की गयी र्थीी जिजसे स्वीकार कर लिलया गया जिजसका विनम्नलिललिख प्रभाव हैः- “जिसविवल अपील संख्या 3413 वष 2012 में अन् रिरम आदेश संख्या 7 में, अपीलार्थी> की ओर से विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री आर.ए. नरीमन ने हमारे द्वारा पारिर आदेश विदनांविक 17.01.2012 को संशोति करने की विनवेदन कर े हैं इस अपील क े अण्डिन् म विनस् ारण क े समय हमने यह देखा विक अपीलार्थी> अपील करने में असफल हो चुक े हैं इसलिलए वह उत्तर प्रदेश प्रवेश कर अति नयम, 2007 क े ह इस न्यायालय द्वारा यर्थीा विन ारिर ब्याज सविह कर क े बकाये क े भुग ान क े दायी होंगे। विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता की विनवेदन कसंग प्र ी हो ी है और यविद इसे अनुद्त्त विकया जा ा है ो इससे प्रत्यर्थी>गण का मामला विकसी भी रह से पूवाग्रह से प्रभाविव नहीं होगा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उक्त क े दृविष्टग, हम विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री नरीमन द्वारा की गयी प्रार्थीना को स्वीकार कर े है।

11. इस प्रकार न्यायालय ने ब्याज, जिजसे अपीलार्थी> द्वारा विदया जाना र्थीा और बाद में विन ारिर विकया जाना र्थीा, क े विन ारण को छोड़ विदया। विदनांक 11.11.2016 को जिंजदाल स्टेनलेस लिलविमटे7 एवं अन्य बनाम हरिरयाणा राज्य एवं अन्य (2017) 12 एस.सी.सी. 1 क े मामले में पारिर संदभ को नौ न्याय ीशों वाली संवै ाविनक पीठ ने विनण> विकया। इस न्यायलय ने प्रस् ु संदभ का जो उत्तर विदया वह विनम्नलिललिख हैः- “1159. संदभ का उत्तर इस न्यायलय ने विनम्नलिललिख श • क े सार्थी बहुम से विदया 1159.1. कर सरलीकरण भार क े भाग ेरह क े अन् ग नहीं हैं। अनुच्छेद 301 में प्रयुक्त शब्द “मुविक्त” का अर्थी “कर से मुविक्त” नहीं है। 1159.2. क े वल ऐसा कर जिजसकी प्रक ृ ति पक्षपा पूण है उसे अनुच्छेद 304(अ) द्वारा विनविषद्ध विकया गया है। इसका परिरणाम Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह हो ा है विक पक्षपा रविह कर क े अति रोपण से संविव ान क े अनुच्छेद 301 का अति क्रमण नहीं होगा। 1159.3. अनुच्छेद 304 क े उपख67 (अ) और (ब) अलग अलग पढ़ा जाना चाविहए। 1159.4. अति रोपण जिजससे अनुच्छेद 304 (अ) का उल्लंघन हो ा है उसे बचाया नहीं जा सक ा है भले ही अनुच्छेद 304 (ब) क े ह प्रविक्रया या इसक े अन् ग विदया गया अपवाद सं ुष्ट न हो ा हो। 1149.5. क्षति परक कर परिरकल्पना ऑटोमोबाइल ट्रांसपोट, ए.आई.आर. 1962 एस.सी. 1406 क े मामले में विवकजिस हुई और व मान मामले में अति रोविप कर वास् व में इस कसौटी में खरी उ र ी है इस बा का विन ारण इस मामले को लगा ार सुन रही पीठ पर छोड़ विदया गया है।

1161. यह प्रश्न विक विकया सम्पूण राज्य को स्र्थीानीय क्षेत्र क े ौर पर अति सूतिच विकया जा सक ा है एवं विकया अन्य देश से Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भार क े भूभाग में माल क े प्रवेश पर कर लगाया जा सक ा है, इसे उतिच न्यातियक कायवाविहयों द्वारा विन ारण पर छोड़ा जा ा है। बाद में जिंजदाल वाद (2006) एस.सी.सी. 7 241 में इसक संशोति विकया गया और कहा गया यहां कोई विवति क आ ार नहीं है और इसे खारिरज विकया जा ा है। 1159.6. अति याबारी एआईआर 1961 एस. सी. 232, ऑटोमोबाइल ट्रांसपोट एआईआर 1962 एस.सी. 1406 और जिंजदाल, (2006) 7 एस.सी.सी. 241 और सभी अन्य विनणयों में इस न्यायालय क े विनणयों को इस सीमा क अनुसरण करना है जहां क वह ऐसा अवलम्ब उलट विदया गया है। 1159.7. प्रयोग, विबक्री एवं उपभोग क े लिलए स्र्थीानीय क्षेत्र में प्रवेश पर लगया गया कर स्वीकाय है यद्यविप उसी रह माल का वहां उत्पादन न विकया जा रहा हो। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1159.8. अनुच्छेद 304(क) भेदभावपूण है अ ः

1160. राज्य क े पास पूरा अति कार् है विक वह यह सुविनतिश्च करे विक अन्य राज्य से आयाति माल पर कर का भार और राज्य क े अन्दर उत्पाविद माल समान कर क े दायरे में हों। यविद ऐसा कदम उठाया गया हो ा ो संविव ान क े अनुच्छेद 304(क) का भंग न हो ा। यह प्रश्न विक क्या व मान मामले में जो छ ू ट है वह इस परीक्षा को पास कर ी हैं विक नहीं, वह इस मामले को सुन रही विनयविम पीठ द्वारा विन ारिर की जाए।

1161. यह प्रश्न विक क्या सम्पूण राज्य स्र्थीानीय क्षेत्र क े रूप में अति सूतिच विकया जा सक ा है और क्या अन्य देशों से भार में आयाति माल पर प्रवेश कर में छ ू ट दी सक ी है इनको न्यायालय की कायवाविहयों में विन ारिर विकया जाना है।

12. विदनांक 11.11.2016 क े नौ न्याय ीशों वाली पीठ क े विनणय पारिर विकये जाने क े पश्चा ् मामला विनयविम पीठ ने लिलया और विदनांक 21.03.2017 क े आदेश एवं विनणय द्वारा इस न्यायालय ने अपीलक ाओं Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को अति विनयम 2007 क े अन् ग प्रवेश कर की छ ू ट क े प्रश्न पर एक नई रिरट यातिचका क े द्वारा उच्च न्यायालय क े समक्ष नौ न्याया ीशों क े बेंच क े आदेश में छोड़े गये मुद्दों पर दालिखल करने की छ ू ट प्रदान की। अपीलार्थी> ने उच्च े समक्ष रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 दायर की जहां पर आँकलन आदेशो को आनुषंविगक अनु ोष क े ौर पर चुनौ ी दी गयी। अन्य रिरट यातिचकाएं भी र्थीी। विदनांक 09.11.2017 को कई रिरट यातिचकाओं क े सार्थी अपीलार्थी> की रिरट यातिचका 25730 वष 2017 को सुना गया और 09.11.2017 को विनणय सुरतिक्ष कर लिलया गया। क ु छ अन्य रिरट यातिचकाएं र्थीी जिजन्हें बंच(समूह) रिरट यातिचका क े सार्थी सुना गया, एक रिरट कर संख्या. 474 वष 2017- श्री विबरला कॉरपोरेशन लिलविमटे7 बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, जहां पर ब्याज की मांग की वै ा को अलग से चुनौ ी दी गयी र्थीी। 09.11.2017 को विनणय आरतिक्ष कर उच्च न्यायलय ने ऐसी सभी रिरट यातिचकाओं को अलग कर विदया जिजसमें ब्याज की मांग की वै ा को अलग से चुनौ ी दी गयी र्थीी। 04.05.2018 को उच्च न्यायलय ने अति विनयम, 2007 को बरकरार रख े हुए रिरट यातिचकाओं को खारिरज कर रिरट यातिचका Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संख्या 25730 वष 2017 एवं इससे जुड़े अन्य मामलों में विनणय पारिर विकया। 04.05.2018 को उच्च न्यायालय द्वारा पारिर विनणय क े त्काल बाद अपीलर्थी> से ब्याज सविह प्रवेश कर जमा करने की अपेक्षा कर े हुए आँकलन वष 2008-2009 से 2011-2012 एवं 2000-2001 से 2007-2008 क े लिलए मांग सूचनाएं जारी की गयी र्थीी। अपीलार्थी> ने 1999-2000 से 2001-2012 वष• क े लिलए प्रवेश कर क े ौर पर क ु ल

361.55 करोड़ रूपये चुकाया। जहां क ब्याज की मांग का प्रश्न र्थीा अपीलार्थी> ने मांग सूचनाएं विदनांविक 04.05.2018 एवं 05.05.2018 को चुनौ ी दे े हुए एक रिरट यातिचका दायर की। उन रिरट यातिचकाओं में से एक में अपीलार्थी> द्वारा रिरट यातिचका संख्या 757 वष 2018 दायर की गयी जिजसमें विनम्नलिललिख विनवेदन विकया गया र्थीाः- “(i) अणिभलेखों की मांग कर े हुए और आक्षेविप सूचना विदनांविक 04.05.2018 (संलग्नक-1) जिजसे याची से प्रवेश कर की मांग कर े हुए प्रत्यर्थी> संख्या 3 द्वारा जारी विकया गया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीा, उसको रद्द कर े हुए उत्प्रेषण प्रक ृ ति का लेख, आदेश या विनद‰श जारी करने की प्रार्थीना की गयी र्थीी। (ii) प्रत्यर्भिर्थीयों एवं उनक े सेवक, अणिभक ा, एवं प्रति विनति को अति विनयम संख्या 30 वष 2007, आँकलन आदेश और विदनांविक 04.05.2018 क े आक्षेविप सूचना क े ह यातिचकाक ा से विकसी भी प्रकार प्रवेश कर पर ब्याज लेने से रोक े हुए प्रति षे प्रक ृ ति का लेख, आदेश या विनद‰श जारी करने की प्रार्थीना की गयी र्थीी। (iii) प्रत्यर्भिर्थीयों द्वारा देय ब्याज उस राणिश पर जिजसे प्रत्यर्थी> ने द्वारा 23.09.2007 क ब्याज सविह प्रवेश कर का भुग ान कर विदया उसको समाजिज करने का आदेश दे े हुए परमादेश प्रक ृ ति का लेख, आदेश या विनद‰श जारी करने की प्रार्थीना की गयी। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) कोई अन्य लेख, आदेश या विनद‰श जारी करने की प्रार्थीना की गयी जैसा माननीय उच्च न्ययालय थ्यों और मामले की परिरण्डिस्र्थीति यों से उतिच समझे। (v) यातिचका ा को यातिचका से संबंति खच• को प्रदान विकया जाए।

13. जब विदनांक 10.05.2018 को मा. उच्च न्यायालय ने यातिचका पर सुनवाई की ो अपीलार्थी> क े विवद्वान अति वक्ता ने यह कर्थीन विकया विक अपीलार्थी> ने अति विनयम 2007 क े अन् ग ब्याज जमा करने क े दातियत्व को न्यायविनण> करने क े लिलए इस न्यायालय क े समक्ष प्रार्थीना पत्र देना चाहा क्योंविक विक इस मामले को अपील क े समय विनण> विकया जाना र्थीा विकन् ु अभी क नहीं विकया गया। अपालार्थी> द्वारा एक प्रार्थीना पत्र, जिजसकी संख्या 1716 वष 2018 है, विनद‰श हे ु दालिखल विकया, जिजसे न्यायालय ने अपीलार्थी> क े अति वक्ता को सुनकर वापस लेने की स्वीक ृ ति प्रदान कर दी और कहा विक ब्याज पर छ ू ट प्रदान करने संबं ी इस मामले को मा. उच्च न्यायलय क े समक्ष उठाये। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

14. विदनांक 20.07.2018 क े उक्त आदेश क े उपरान् रिरट यातिचका पर सुनवाई हुई। ब्याज राणिश क े भुग ान की मांग कर े हुए प्रत्यर्थी> द्वारा अन्य मांग सूचना विदनांक 18.05.2018 को जारी की गयी। प्रत्यर्थी> ने उच्च न्यायलय क े समक्ष विदनांक 25.07.2018 को इस आ ार पर प्रार्थीविमक आपलित्त उठाई विक रिरट यातिचका एक द्व ीय रिरट यातिचका है जो उन्ही बा ों एवं आनुषंविगक वाद हे ुक पर समान मूल्यांकन आदेश क े विवरूद्ध है। प्रार्थीविमक आपलित्त में यह कहा गया र्थीा विक रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017, जिजसमें वही अनु ोष मांगे गये र्थीे, को मा. उच्च न्यायलय द्वारा विदनांक 04.05.2018 को पहले ही खारिरज कर विदया गया है, जहां मूल्यांकन संबं ी आदेश को भी चुनौ ी दी गयी र्थीी, इस प्रकार चूंविक यह द्व ीय रिरट यातिचका है इस ना े इस रिरट यातिचका को खारिरज विकयााा जाए कमाोंविक यह पोषणीय नहीं है। प्रार्थीविमक आपलित्तयों का जवाब अपीलार्थी> द्वारा विदया गया र्थीा। उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षकारों को सुनने क े उपरान् आक्षेविप आदेश विदनांविक 22.11.2018 द्वारा रिरट यातिचकाओं की पोषणीय ा संबं ी प्रार्थीविमक आपलित्त को बरकरार रखा और रिरट यातिचका को खारिरज कर विदया गया क्योंविक यह Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पोषणीय नहीं है। उच्च न्यायलय ने रिरट यातिचकाओं को खारिरज कर े समय कति पय अवलोकन विकया। विदनांविक 22.11.2018 क े विनणय से पीविड़ अपीलार्थी> ने अपील दायर की है।

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15. हमने अपीलार्थी> क े विवद्व अति वक्ता श्री ध्रुव अग्रवाल को सुना है। प्रत्यर्भिर्थीयों की रफ से वरिरष्ठ विवद्वान अति वक्ता श्री विदनेश विद्ववेदीीी प्रस् ु हुए हैं। हमने वरिरष्ठ विवद्वान अति वक्ता श्री गुरू क ृ शन को भी सुना है जो अपीलार्थी> की रफ से एस.एल.पी संख्या 2691 वष 2018 वी.एस. टी इं7स्ट्रीस लिलविमटे7 बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य की रफ से प्रस् ु हुए, जिजसे अलग से विनण> विकयााा जा रहा है।

16. अपीलार्थी> क े विवद्व अति वक्ता ने कर्थीन विकया विक अति विनयम, 2007 क े अन् ग प्रवेश कर पर ब्याज क े वसूलने संबं ी कोई मौलिलक प्राव ान नहीं हैं। चूंविक यहां ब्याज क े मौलिलक प्राव ान का आभाव है अ ः अपीलार्थी> से विकसी प्रकार ब्याज की मांग नहीं की जा सक ी है। यह कर्थीन विकया गया विक अति विनयम, 2007 में ब्याज क े भुग ान संबं ी उपबं हो े ो उसे विदया गया हो ा। अति विनयम, 2007 की ारा 12 की उप ारा 3 का Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA संदभ विदया गया जहां पर ब्याज सविह कर क े भुग ान का दातियत्व सृजिज विकया गया है। यह कर्थीन विकया गया विक अति विनयम की ारा 13 जो उत्तर प्रदेश मूल्य वर्ति कर अति विनयम, 2008 म्यूटे ति7 स बना ी है, क े वल अति विनयम क े मशीनी प्राव ानों क े लिलए प्रायोज्य है और मूल्य वर्ति कर अति विनयम, 2008 की ारा 33 जो कर की मांग और वसूली से संबंति है वह क े वल एक मशीनी प्राव ान है जो प्रत्यर्थी> को अपीलार्थी> ब्याज क े दावे का हक प्रदान नहीं कर ी है। ारा 12 क े अलावा अति विनयम क े अन् ग ब्याज क े भुग ान संबं ी अन्य मौलिलक प्राव ान नहीं हैं। अति विनयम की ारा 13 क े अन् ग मशीनी प्राव ानों क े विनवचन द्वारा कोई भार सृजिज नहीं विकया गया है। आगे कर्थीन विकया गया विक प्रवेश कर क े भुग ान को लेकर 7ीलर क े दातियत्व से संबंति विववाद उच्च न्यायलय में चल रहा र्थीा जिजसे उच्च न्यायालय ने अण्डिन् म रूप से विदनांक 04.05.2018 को विनण> कर विदया और पाया विक जब अपीलार्थी> द्वारा रिरट यातिचका दायर की गयी र्थीी जिजसमें उसने अति विनयम क े वायस को चुनौ ी दी र्थीी उसको उच्च न्यायलय ने अण्डिन् म रूप से खारिरज कर विदया र्थीा। यहां चूंविक प्रवेश कर क े भुग ान संबं ी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दातियत्व का ही विववाद है इसलिलए प्रत्यर्थी> प्रवेश कर पर विकसी भी ब्याज को वसूलने का हकदार नहीं है। यह कर्थीन विकया गया विक चूंविक अति विनयम उच्च न्यायलय द्वारा अति कारा ी घोविष कर विदया गया र्थीा इसलिलए 23.09.2017 क राज्य द्वारा प्रवेश कर को पुनः प्राप्त करने की शविक्त नहीं र्थीी। अति विनयम, 2007 क े बल पर करारोपण को वै बनाया गया र्थीा अ ः 24.09.2007 क े पहले अति विनयम क े पारिर होने की ति णिर्थी की अवति क विकसी भी प्रकार क े ब्याज क े भुग ान का कोई भी दातियत्व नहीं र्थीा। वष 1999 से अपीलार्थी> द्वारा मांगा गया ब्याज पूणरूपेण अवै एवं क्षेत्राति कार से परे है। न्यायालय द्वारा पारिर अन् रिरम आदेश, अपीलार्थी> द्वारा दालिखल एस.एल.पी संख्या 327 वष 2012 में पारिर विदनांविक 06.12.2016 का आदेश शाविमल है, जहां पर इस न्यायलय ने विदनांक 06.12.2013 को एक आदेश पारिर विकया र्थीा जिजसमें यह विनद‰श दे े हुआ कहा र्थीा विक अपीलार्थी> ब्याज सविह कर जो विक न्यायलय द्वारा अति विनयम क े प्राव ानों द्वारा य विकये जा सक ें गे, क े बकाए क े भुग ान का दायी होगा। यह कहा गया विक न ो विदनांक 11.11.2016 को नौ न्यायमूर्ति यों वाली संवै ाविनक पीठ ने अपने क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विनणय में और न ही विनयविम पीठ जो विदनांक 21.03.2017 को अपील का विनस् ारण कर रही र्थीी, ब्याज क े दातियत्व संबं ी प्रश्न पर विवचार विकया न ो उसका विनस् ारण विकया। विदनांक 21.03.2017 को उच्च न्यायलय ने अपने विनणय में अपीलार्थी> पर आरोविप ब्याज क े दातियत्व संबं ी प्रश्न पर विवचार नहीं विकया और क े वल ीन विबन्दुओं क स्वयं को सीविम रखा जो विनणय में लिलखे गये हैं। रिरट यातिचका जिजसमें अलग से ब्याज की मांग को चुनौ ी दी गयी र्थीी, उसे हटा विदया गया र्थीा, जिजसने उच्च न्यायलय क े रुख को स्पष्ट कर विदया विक उच्च न्यायलय का न ो ऐसा करने का आशय र्थीा और न ही विदनांक 04.05.2018 को विनण> समूह रिरट यातिचकाओं में ब्याज विवषयक मामले का सचमुच विनपटारा विकया र्थीा। विदनांक 04.05.2018 क े अपने विनणय में अति विनयम, 2007 क े ह ब्याज क े दातियत्व को विनण> न कर उच्च न्यायलय ने अपने आक्षेविप विनणय में यह ारिर कर े हुए विक विदनांक 04.05.2018 का विनणय अपीलार्थी> द्वारा दायर बाद की रिरट यातिचका जहां पर ब्याज को जमा करने की सूचनाएँ, प्रांगन्याय की रह काय करेगा, प्रत्यर्थी> क े आक्षेपों को प्रार्थीविमक ौर स्वीकार करने में गल ी की है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

17. श्री अग्रवाल ने आगे कर्थीन विकया विक चूंविक अति विनयम, 2000 को असंवै ाविनक घोविष कर विदया गया है अ ः जिजस विदन यानी 24.09.2007 को अति विनयम 2007, लागू विकया गया र्थीा उससे पहले विकसी भी प्रकार क े ब्याज क े भुग ान का दातियत्व नहीं बन ा। आगे कर्थीन विकया गया विक अति विनयम, 2007 को अपीलार्भिर्थीयों द्वारा ुरन् चुनौ ी दी गयी र्थीी जिजसे विदनांक 23.12.2011 को उच्च न्यायालय की ख6ड़पीठ ने बरकरार रखा र्थीा। उक्त ति णिर्थी क े पहले उच्च न्यायलय ने प्रवेश कर विव ानयन से संबंति कई विवषयों को पहले ही बड़ी पीठ को संदर्भिभ कर विदया है। नौ न्यायमूर्ति यों वाली बड़ी पीठ ने इस संदभ को 11.11.2016 को ही विनण> कर विदया र्थीा। बड़ी पीठ ने पचास वष• से अति क समय से चले आ रहे विवति को उलट विदया र्थीा। इस विवति क अविनतिश्च ा क े परिरणामस्वरूप ब्याज क े दातियत्व को अपीलार्थी> क े सर पर नहीं मढ़ा जा सक ा है। यह कर्थीन विकयााा गया विक आलिखरकार ख6ड़पीठ ने उदार भाव अपना े हुए विदनांक 04.05.2018 को इस अति विनयम को वै घोविष कर विदया। यह कर्थीन विकया गया विक उक्त अवति क े दौरान विकसी भी प्रकार क े ब्याज क े भुग ान से Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपीलार्थी> को छ ू ट होगी। यह कर्थीन विकया गया विक विदनांक 04.05.208 को रिरट यातिचका क े खारिरज हो जाने क े उपरान् अपीलार्थी> ने त्काल पूरे प्रवेश कर का भुग ान कर विदया र्थीा। यह कर्थीन विकया गया विक चूंविक अपीलार्थी> एक पण्डिब्लक कॉरपोरेशन है इसलिलए उसपर ब्याज की इ ने बड़े दातियत्व का बोझ नहीं ड़ाला जा सक ा है नहीं ो इससे उसकी कायप्रणाली बुरी रह से प्रभाविव होगी।

18. प्रत्यर्भिर्थीयों क े वरिरष्ठ विवद्व अति वक्ता श्री विदनेश विद्ववेदीीी ने आक्षेविप विनणय का समर्थीन कर े हुए कर्थीन प्रस् ु विकया विक रिरट यातिचका क े पोषणीय न होने क े कारण उच्च न्यायालय ने इस ठीक ही खारिरज कर विदया है। यह कर्थीन विकया विक अपीलार्थी> द्वारा दायर रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 में जो विनवेदन विकया गया र्थीा उसमें से एक विनवेदन प्रवेश कर सविह ब्याज को विन ारिर करने क े मूल्यांकन आदेश को समाप्त करने का र्थीा और भले ही उच्च न्यायलय की ख6ड़पीठ द्वारा विदनांक 04.05.2018 ब्याज की देय ा संबं ी प्रश्न को न विन ारिर विकया गया हो इसलिलए विववतिक्ष पूव न्याय का जिसद्धान् अपीलार्थी> को बाद की रिरट यातिचका द्वारा ब्याज की मांग Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को चुनौ ी देने से रोक े हुए लागू होगा। यह कर्थीन विकया गया विक उच्च न्यायलय ने सही ही प्रत्यर्भिर्थीयों की प्रार्थीविमक आपलित्तयों को स्वीकार विकया और ारिर विकया विक रिरट यातिचका पोषणीय नहीं है। श्री विद्ववेदीीी ने अपीलार्थी> क े मामले क े गुणागुण की पर कर्थीन प्रस् ु विकया। यह कर्थीन विकया गया विक उक्त अति विनयम में ब्याज लगाने क े मौलिलक प्राव ान हैं। उन्होंने कर्थीन विकया विक उक्त अति विनयम की ारा 13 क े आ ार पर उ.प्र. व्यापार कर अति विनयम 1948 मूल्य वर्ति कर 2008 को अपनाया गया है जिजसमें ब्याज क े प्राव ान विदये गये हैं। उ.प्र. व्यापार कर अति विनयम 1948 की ारा 8 और मूल्य वर्ति कर अति विनयम 2008 की ारा 33 उपबं कर ी है विक जब 7ीलर कर चुकाने में असफल हो जा ा है ो उससे ब्याज को वसूला जाए कर और वह इस अति विनयम क े ह ब्याज क े भुग ान का दायी होगा। इस प्रकार अपीलार्थी> का कर्थीन विक इस े ह ब्याज लगाने का क े मौलिलक प्राव ान नहीं हैं, वह विनरा ार है। आगे यह कर्थीन विकया गया विक विदनांक 23.12.2011 को उच्च े विनणय को चुनौ ी दे े हुए अपीलार्थी> द्वारा दायर विवशेष अनुमति Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यातिचका में इस न्यायालय द्वारा पारिर अन् रिरम आदेश का अपीलार्थी> ने लाभ उठाया चुका है और अब वे ब्याज देने की क्षम ा को चुनौ ी देने से रोक विदये जा े हैं। उक्त अति विनयम की ारा 17 ब्याज की छ ू ट को वै बना विदया गया है। उक्त अति विनमय को विदनांक 01.11.1999 से भू लक्षी प्रभाव से प्रभाविव है अ ः अपीलार्थी> प्रवेश कर एवं ब्याज क े भुग ान का दायी है। प्रवेश कर का दातियत्व उक्त अति विनयम से उत्पन्न हो ा है और उ.प्र. प्रवेश कर विनयमावली, 2007 को उसी क े अ ीन बनाया गया है। प्रवेश कर क े भुग ान न विकये जाने ब्याज की अव ारणा विवकजिस हो ी है। श्री विद्ववेदी ने क्षति पूर्ति क े जिसद्धान् का अवलम्ब लिलया है। अति विनयम, 2008 क े अन् ग जो दातियत्व है वह अति विनयम, 2007 क े अ ीन उत्पन्न माना जाएगा। विदनांक 04.05.2018 को रिरट यातिचका क े खारिरज हो जा े ही ब्याज संबं ी यह विवषय अण्डिन् म रूप से बंद हो जा ा है। न्यायालय क े विदनांक 10.01.2012 एवं 17.01.2012 क े अन् रिरम आदेश क े पारिर विकये जाने क े उपरान् प्रवेश कर को भाग ः जमा कर विदया गया और शेष कर को क े वल उच्च े विदनांक 04.05.2018 क े विनणय क े बाद जमा विकया गया। वै Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA छ ू ट क े बावजूद अपीलार्थी> द्वारा कर क े भुग ान को रोका गया र्थीा। अपीलार्थी> ने वाद दायर विकया और रोक े गये न का प्रयोग विकया। छ ू ट जिजसको वै ब ाया गया है वह बकाये की ति णिर्थी से वै है न विक उच्च न्यायालय द्वारा पारिर विनणय की ति णिर्थी से। अ ः अपीलार्थी> ब्याज क े भुग ान का विवति क े अ ीन दायी है न विक साण्डिम्यक आ ार पर। स्टे आदेश क े दौरान ब्याज को जमा करने का दातियत्व वै है क्योंविक ब्याज अन् रिरम आदेश क े पारिर विकये जाने से रुक नहीं जा ा है। ब्याज साण्डिम्यक आ ारों पर लगाया जाए। कर पर ब्याज की देय ा एक संचयन है और ब्याज क े दातियत्व को बढ़ा ा है। व मान मामले में विवलण्डिम्ब भुग ान पर ब्याज का दातियत्व विवति द्वारा विवविह है।

19. हमने पक्षकारों की ओर से विवद्व अति वक्ता क े कर्थीनों को सुना और अणिभलेखों का अवलोकन विकया।

20. पक्षकारों क े विवद्व अति वक्ता क े कर्थीनों एवं अणिभलेख में की गयी प्रार्थीनाओं से विवविद हो ा है विक अपील में विनम्नलिललिख प्रश्न हैं जिजन पर हमको विवचार करना हैःmn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (1) विकया अपीलार्थी> द्वारा दायर रिरट सं. 757 वष 2018 एवं अन्य रिरट यातिचकाएँ रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 में उच्च न्यायालय द्वारा विदनांक 04.05.2018 को पारिर विनणय क े उपरान् विदनांक 04.05.2018 एवं 05.05.2018 क े मांग सूचनाओँ को चुनौ ी दे े हुए जारी की गयी विदनांक 04.05.2018 को रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 क े खारिरज विकए जाने क े आलोक में प्रांगन्याय क े जिसद्धान् द्वारा बाति है? (2) विकया अति विनयम, 2007 में ब्याज लगाने क े कोई मौलिलक प्राव ान नहीं है? (3) विकया 1.11.2019 से 23.09.2007 की अवति यानी अति विनयम, 2007 क े प्रभाव क े समय, जिजसको उच्च न्यायालय द्वारा खारिरज कर विदया गया र्थीा, उस दौरान अपीलार्थी> पर लगाये प्रवेश कर पर ब्याज को देने का दायी र्थीा? Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (4) ब्याज क े भुग ान की देय ा विकया हो सक ी है जिजसक े सार्थी उस अवति क े उपरान् जो 24.09.2007 से प्रभावी है अपीलार्थी> को दुःखी विकया जा सक ा है? (5) यविद कोई अनु ोष जिजसका अपीलार्थी> हकदार है? प्रश्न संख्या.[1]

21. प्रत्यर्थी> द्वारा उठाये गये प्रागन्याय पर आ ारिर प्रार्थीविमक आपलित्त को रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 में विदनांक 04.05.2018 को उच्च न्यायालय द्वारा पारिर विनणय का अवलम्ब ले े हुए स्वीक ृ ति प्रदान कर दी गयी है। हमें सबसे पहले रिरट संख्या 25730 वष 2017 में की प्रार्थीनाओं पर विवचार करना होगा। ये प्रार्थीनाएं विनम्नलिललिख हैं- “(क) यह विक उत्तर प्रदेश स्र्थीानीय क्षेत्र में माल प्रवेश कर अति विनमय, 2007 को अमान्य, शून्य एवं असंवै ाविनक घोविष कर े हुए उतिच रिरट, आदेश या विनद‰श जारी विकया जाए, जहां क विक मर्थीुरा रिरफायनरी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े लिलए भार में आयाति कच्चे ेल क े लिलए करारोपण क े लिलए दावा हो। (ख) यह विक प्रत्यर्भिर्थीयों, उनक े सेवकों, अणिभक ाओं एवं उनक े प्रति विनति यों को अति विनयम क े अन् ग यातिचकाक ा से विकसी भी रह का प्रवेश कर वसूलने से रोक े हुए परमादेश प्रक ृ ति का उतिच रिरट, आदेश या विनद‰श विकया जाए। (ग) यह विक अणिभलेख की मांग कर े हुए और परिरणिशष्ट 3 से 11 क क े मूल्यांकन आदेशों को समाप्त कर े हुए प्रति षे लेख की प्रक ृ ति का उतिच रिरट या आदेश विकया जाए। (घ) यह विक आक्षेविप मूल्यांकन आदेशों क े अन् ग प्रत्यर्भिर्थीयों को आगे की कदम या कायवाही उठाने से रोक े हुए/विनषेति कर े हुए विनषे ात्मक या परमादेश प्रक ृ ति का रिरट आदेश या विनद‰श जारी विकया जाए। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ड़) यह विक आक्षेविप अति विनयम क े अन् ग प्रत्यर्थी> को यातिचकाक ा द्वारा भुग ान विकये गये प्रवेश कर को वापस करने संबं ी उतिच रिरट, आदेश या विनद‰श जारी विकया जाए। (च) यह विक मामले क े त्र्थीों एवं परिरण्डिस्र्थीति यों में, जैसा माननीय न्यायालय उतिच न्यायातिच समझे, उतिच आदेश या विनद‰श जारी विकया जाए। (छ) यातिचका ा को यातिचका क े खच• को प्रदान विकया जाए।

22. जैसा विक उपरोक्त वर्भिण है न्यायालय ने अपने आदेश विदनांविक 21.03.2017 द्वारा अपीलार्थी> का छ ू ट प्रदान की र्थीी। अपीलार्थी> को जो छ ू ट प्रदान की गयी र्थीी वह नौ न्यायमूर्ति यों वाली संवै ाविनक पीठ द्वारा सुना जाना र्थीा और उसपर ध्यान विदया गया। क ु छ विनम्नलिललिख पहलू हैं जो संवै ाविनक पीठ की समक्ष रखे गये विकन् ु उस पर विनणय नहीं हो पायाः Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (क) विकया प्रवेश कर क े लिलए पूरे राज्य को स्र्थीानीय क्षेत्र क े ौर पर लिलया जाए। (ख) विकया प्रवेश कर को उन सभी मालों पर लगाया जा सक ा है जिजन्हें अन्य देशों से आयाति विकया जा ा है और विकसी विवशेष राज्य लाया जा ा है। (ग) क ु छ राज्यों द्वारा अति विनयविम अति विनयमों में,..............

23. आलिखरकार, विदनांक 21.03.2017 को इस न्यायालय ने उक्त बिंबदुओं को संदर्भिभ कर े हुए विनम्नलिललिख छ ू ट प्रदान कीः उक्त क े संदभ में हमारे अनुसार अपीलार्थी> को उतिच कायवाविहया करने हे ु 31 मई 2017 क हमारे विवचार हे ु आवश्यक थ्यात्मक आ ारों अन्य संवै ाविनक बिंबदुओं क े सार्थी उक्त प्रश्नों को उठा े हुए नयी रिरट यातिचका दायर करने की छ ू ट होगी।

24. उक्त विदनांविक 21.03.2017 प्रदत्त छ ू ट क े क े अन् ग अपीलार्थी> द्वारा रिरट संख्या 25730 दालिखल की गयी र्थीी। रिरट यातिचका में की गयी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मुख्य प्रार्थीनाएं एवं आ ारों का संबं अति विनयम, 2007 क े ारों क े चुनौ ी देने से संबंति है। रिरट यातिचका में जिजस विनद‰श की मांग की गयी र्थीी वह मर्थीुरा रिरफायनरी क े भार आयाति कच्चे ेल पर प्रवेश कर क े परपोर्ट्सस में अति विनयम, 2007 को अप्रभावी, शून्य और असंवै ाविनक घोविष करने क े लिलए र्थीा। मूल्यांकन आदेश को समाप्त करने की प्रार्थीना जो रिरट यातिचका में परिरणिशष्ट 3 से 11 है, सविह आगे जो रिरट यातिचका में अनु ोष मांगा गया र्थीा वह मूल्यांकन आदेश 1999-2000 से 2011-2012 है। यह भी ध्यान देना प्रासांविगक है विक ब्याज को भी चुनौ ी दी गयी र्थीी। विनम्नलिललिख बा ें रिरट यातिचका क े प्रस् र 33 और 34 में कहीं गयी र्थीीः

33. यह विक उक्त क े दृविष्टग, यह कर्थीन विकया जा ा है विक सव च्च न्यायालय क े नौ जजों की पीठ द्वारा अति यावारी वाद और ऑटोमोबाइल का वाद उलट विदया गया है, अ ः अपीलार्थी> से 11.11.2016 की अवति से पहले क े लिलए ब्याज और अर्थीद6ड़ की मांग नहीं की जा सक ी र्थीी क्योंविक यातिचकाक ा ने विवति सम्म काय विकया है, और जिजसको Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उच्च म न्यायालय की संवौ ाविनक पीठ ने पहले ही घोविष कर चुका है, जो भूविम विवति क े ना े घोविष विकया गया है। अ ः उच्च म न्यायलय का मानना है विक जब बाद में विवति को उलट विदया गया हो और यातिचकाक ा विवति क प्राव ानों क े अनुरूप काय कर रहा र्थीा, और जैसा विक विववाद क े दौरान र्थीा, उसे बाद हुए विवति में परिरव न क े कारण कष्ट नहीं भोगने विदया जाएगा।

34. यह विक उक्त क े पूवाग्रह से ग्रजिस हुए विबना, यह कर्थीन विकया गया विक यहां क विक अन्यर्थीा ब्याज, यविद कोई हो, मूल्यांकन आदेश पारिर होने की ति णिर्थी से पहले अपीलार्थी> पर नहीं आरोविप विकया जा सका।

25. विदनांक 04.05.2018 क े उच्च न्यायालय क े विनणय क े अवलोकन क े यह परिरलतिक्ष हो ा है विक ख6ड़पीठ ने प्रस् र 40 में यह दृविष्टकोण लिलया विक ख6ड़पीठ को विदनांक 21.03.2017 विनयविम पीठ क े विनणय से यर्थीा दर्भिश आ ारों की चुनौति यों से विनपटना है। जिजसका विनम्नलिललिख प्रभाव हैः Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

40. इस प्रकार इन यातिचकाओं की पोषणीय ा को रद्द कर े हुए हम स्वंय को विदनांक 21 मई 2017 को पूण पीठ द्वारा पारिर विनणय क सीविम रखना चाहेंगें। हम आगे पा े हैं, एक बार पुनः पुनयाचना की कीम पर, अति विनयम, 2007 को जो चुनौ ी दी गयी र्थीी उसपर आटीसी लिलविमटे7 क े मामले में इस ख6ड़पीठ द्वारा अति विनयम क े क्षति पूरक प्रक ृ ति सविह सभी आ ारों पर विवचार विकया गया र्थीा। नौ जजों वाली पीठ क े म ानुसार जिजसमें अति विनमय क े कम्पनसेटरी जिसद्दान् को पूरी रह हटा विदया गया र्थीा, इसलिलए हमें उच्च म न्यायालय क े विनयविम पीठ द्वारा गविठ प्रश्नों में दर्भिश आ ारों क सीविम चुनौ ी पर विवचार करना चाविहए। संक्षेप में और थ्य ः हम पा े हैं विक हमें उस चुनौ ी से विनपटना होगा जो क े वल जिंजदाल स्टेनलेस स्टील-2 में नौ जजों वाली पीठ क े विनणय क े आलोक में विदनांक 23.03.2017 क े विनयविम पीठ क े विनणय में यर्थीा दर्भिश आ ारों पर हैं। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

26. अ ः ख6ड़पीठ ने उच्च म न्यायालय की विनयविम पीठ द्वारा गविठ प्रश्नों में दर्भिश आ ारों क सीविम प्रति फल क सीविम कर लिलया। इस प्रकार ख6ड़पीठ ने प्रति फल को ीन प्रश्नों क सीविम कर लिलया जैसा विक हमने विदनांक 21.03.2017 क े इस न्यायालय क े विनणय से लिलया है। ख6ड़पीठ ने ब्याज क े प्रश्न सविह विकसी अन्य प्रश्न को विवचारिर करने की स्पष्ट अनुज्ञा नहीं दी जो विदनांक 04.05.2018 क े विनणय से स्पष्ट है। स्पष्ट ः यह कर्थीन विकयााा गया है विक जब रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 सविह अन्य रिरट यातिचकाओं में विदनांक 09.11.2017 को विनणय को आरतिक्ष विकयााा गया र्थीा ो उन रिरट यातिचकाओं में जहां ब्याज क े आरोपण को अलग से चुनौ ी दी गयी र्थीी उसे हटा विदया गया र्थीा। विदनांक 09.11.2017 को रिरट संख्या 474 वष 2017 श्री विबरला कॉरपोरेशन लिलविमटे7 बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य क े मामले में पारिर विनणय को संलग्नक पी-24 क े रूप में अणिभलेख पर लाया गया है जहां पर ख6ड़पीठ ने आदेश विदया विकः इस यातिचका को बंच से हटाया जाए और इसे उतिच पीठ क े समक्ष उठाया जाए।

27. विवणिशष्ट आ ार संख्या एल को लिलया गया जो विनम्नलिललिख हैः Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ठ). न्यायालय ने यहां क विदनांक 09.11.2017 को जिसविवल रिरट संख्या 25730 वष 2017 एवं इससे संबंद्ध मामलों को आरतिक्ष कर े समय ऐसी सभी रिरट यातिचकाओं जिजसमें प्रवेश कर पर ब्याज की मांग को चुनौ ी दी गयी र्थीी, उन सभी को इन रिरट यातिचकाओं से हटा विदया र्थीा।

28. पक्षकारों क े अति वक्ताओं ने हमारे समक्ष यह स्वीकार विकया है विक रिरट यातिचका संख्या 474 वष 2017 जिजसको रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 क े समूह से हटाया गया र्थीा, वह उच्च न्यायालय क े विवचार हे ु अभी भी लण्डिम्ब है। व मान मामला ऐसा मामला जहां पर रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 का विनस् ारण कर े समय ख6ड़पीठ ने अपने आपको ीन प्रश्नों क सीविम कर लिलया जैसा विक विदनांक 21.03.2017 को इस े विनणय में उल्लेख विकया गया है, और न्यायालय ने इन ीन प्रश्नों क े अलावा अन्य प्रश्न को उठाने जाने की अनुज्ञा नहीं दी। यह विवषय जो विक विदनांक 04.05.2018 क े विनणय द्वारा विनण> करने की स्पष्ट ौर पर अनुज्ञा नहीं दी गयी है इसलिलए यह अपीलार्थी> द्वारा दायर बाद की रिरट यातिचका में पूव न्याय की रह काय नहीं करेगा जहां पर ब्याज की छ ू ट को चुनौ ी दी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जा चुकी है। अपीलार्थी> क े अति वक्ता ने जिसविवल प्रविक्रया संविह ा की ारा 11 क े स्पष्टीकरण 4 का अवलम्ब लिलया है जो इस प्रकार हैः- “ ारा 11. पूव न्यायः कोई भी न्यायालय ऐसे वाद या विववाद्यक का विवचारण नहीं करेगा जिजसमें प्रत्यक्ष ः और सार ः विववाद्य विवषय उसी हक क े अ ीन मुकदमा करने वाले उन्हीं पक्षकारों क े बीच क े या ऐसे पक्षकारों क े बीच क े, जिजसमें विवयुत्पन्न अति कार क े अ ीन वे या उसमें कोई दावा कर े हैं, विकसी पूवव > न्यायालय में भी ऐसे वाद में प्रत्यक्ष ः और सार ः विववाद्य रहा है, जो ऐसे पश्चात्व > वाद का या उस वाद का, जिजसमें ऐसा विववाद्यक वाद में उठाया गया है विवचारण करने क े लिलए सक्षम र्थीा और ऐसे न्यायालय द्वारा सुना जा चुका है और अण्डिन् म रूप से विवविनतिश्च विकया जा चुका है। xxx xxx xxx स्पष्टीकरण 4. विकसी ऐसे भी विवषय क े बारे में, जो ऐसे पूवव > वाद में प्रति रक्षा या आक्रमण का आ ार बनाया जा सक ा र्थीा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और बनाया जाना चाविहए र्थीा, यह समझा जाएगा विक वह ऐसे वाद में प्रत्यक्ष ः और सार ः विववाद्य रहा है।

29. स्पष्टीकरण 4 जो उपबंति कर ा है वह यह है विक जो विववाद्यक पूव वाद में उठाये गये र्थीे वे उस व्यविक्त क े विवरूद्ध विवचारिर एवं विनण> माने जाएंगे जो बाद वाले वाद में ऐसे विववाद्य को उठा ा है। व मान मामला ऐसा है जहां पर ब्याज पर जो छ ू ट प्रदान की गयी है उसपर आपलित्त उठा े हुए विनवेदन अपीलार्थी> द्वारा रिरट यातिचका क े प्रस् र 33-34 में विकया गया है जो ऊपर उजिल्ललिख है। ख6ड़पीठ ने ऐसे दलीलों पर सुनवाई करने से इन्कार कर विदया क्योंविक न्यायालय ने स्वयं को उपरोक्त उजिल्ललिख ीन प्रश्नों क स्वयं को सीविम कर लिलया है। उच्च न्यायालय की ख6ड़पीठ ने ऐसे दलीलों को नहीं माना क्योंविक न्यायालय द्वारा ीन प्रश्नों क विवचारण सीविम है। उक्त थ्यों परिरण्डिस्र्थीति यों में हमारा यह मानना है विक बाद की रिरट यातिचका जहां पर ब्याज की छ ू ट की दलील दी गयी र्थीी उसे पूव न्याय क े आ ार पर नहीं छोड़ा जा सक ा र्थीा। घटनाओं का क्रम और रिरट यातिचका को मुख्य समूह से हटाने का थ्य जहां अलग से ब्याज को चुनौ ी दी गयी र्थीी,स्पष्ट ः Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इंविग कर ा है विक ख6ड़पीठ जिजसमें विदनांक 09.11.2017 को विनणय को आरतिक्ष विकया र्थीा स्पष्ट रूप से बंच में ब्याज क े दातियत्व क े प्रश्न को जारी नहीं रखने का आशय है जो विदनांक 09.11.2017 को आरतिक्ष विकया गया र्थीा। जब उच्च न्यायालय उपरोक्त उजिल्ललिख ीन मुद्दों क े विवचारण को अणिभव्यक्त रूप से प्रति बंति विकया है, ो प्रलतिक्ष पूव न्याय की दलील को अपीलक ा क े विवरूद्ध प्रश्न उठाने से उसे रोकने क े लिलए नहीं लगाया जा सक ा है जो रिरट यातिचका संख्या 25730 वष 2017 में अणिभव्यक्त रूप से दलील देने क े लिलए अऩुज्ञेय नहीं र्थीा।

30. यहां एक अन्य कारण है जिजसक े चल े हम प्रवेश कर पर ब्याज को जमा करने क े अपीलार्थी> क े दातियत्व क े प्रश्न क े विवचारण को बंद नहीं कर े हैं। उपरोक्त वर्भिण मामले क े थ्यों से स्पष्ट हो ा है विक विदनांक 06.12.2013 को पारिर इस न्यायालय क े आदेश में, जब न्यायालय जिसविवल अपील संख्या 3413 वष 2012 में पारिर अन् रिरम आदेश को संशोति कर रहा र्थीा, न्यायालय ने अवलोकन विकया विक यविद "अपील में अपीलार्थी> असफल हो जा ा है ो वह अपील क े समय उ.प्र. प्रवेश कर Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA े अ ीन, जैसा न्यायालय विनतिश्च करे, ब्याज सविह कर क े बकाये क े भुग ान का दायी होगा। जब अपील संख्या 3413 वष 2012 इस न्यायालय द्वारा अण्डिन् म रूप से विदनांक 21.03.2017 विनण> कर विदया गया ब उच्च न्यायालय द्वारा विवचारिर विकये जाने क े लिलए यहां उजिल्ललिख मुद्दों को उठा े हुए अपीलार्थी> को छ ू ट प्रदान की गयी। विदनांक 21.03.2017 क े आदेश में, प्रवेश कर अति विनयम, 2007 क े े ह अपीलार्थी> द्वारा भुग ान विकये जाने वाले ब्याज क े संबं में कोई संकल्प नहीं र्थीी। हालांविक जब अपीलार्थी> को न्यायालय द्वारा आवश्यक थ्या मक अर्थीवा अन्य संवै ाविनक/सांविवति क आ ार उक्त वर्भिण ीन मुद्दों को उठाने की छ ू ट प्रदान की गयी, जो विवचार करने हे ु उत्पन्न हुए हैं, ब उच्च न्यायालय उक्त अति विनयम क े ह अपीलार्थी> द्वारा ब्याज क े भुग ान करने क े दातियत्व संबं ी प्रश्न पर विवचार करने को स्व ंत्र र्थीा।

31. आगे जो ब्याज की अादायगी की योजना है वह एक ऐसा प्रश्न है, वह े विनवचन एवं उसक े ह बनाये गये विनयमों पर विनभर कर ा है। इस मुद्दे को विनयमों और अति विनयम क े उतिच कायान्वयन हे ु विन ारिर करने की आवश्यक ा है। इस संदभ में हम इस न्यायालय द्वारा श्री भगव ी स्टील रोलिंलग विमल बनाम कविमश्नर से6ट्रल एक्साइज एवं अन्य 2016. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 3 एसएससी 6643 क े मामले में पारिर विनणय का उल्लेख करना चाहेंगें जहां पर सेंट्रल एक्साइज 1944 क े अन् ग विनयम 96-जे7 ओ, 96-जे7पी एवं क ें ^ीय एक्साइज विनयमावली 1944 क े विनयम 96-जे7ओ क े अन् ग ब्याज का अति रोपण एवं उक्त प्रश्न को उठाने की स्वीक ृ ति देने क े क्षेत्राति कार से संबंति है। इसको इस न्यायलय प्रस् र-29 में प्रति पाविद विकया हैः "29.हमारा यह भी मानना है विक चूंविक यह प्रश्न ब्याज क े आरोपण से जुड़ा विवस् ृ क्षेत्राति कार का है और इस न्यायलय क े संवै ाविनक पीठ क े विनणय से आच्छाविद है। यविद हम श्री अग्रवाल को ब्याज जमा करने की अनुज्ञा देगें ो न्याय का मजाक बनेगा।"

32. अ ः हम मान े हैं विक अति विनयम, 2007 की योजना क े अन् ग प्रवेश कर पर ब्याज की आदायगी की सीमा और विवस् ार से संबंति प्रश्न को इस न्यायालय द्वारा इन अपीलों में जाँच की जानी चाविहए। उक्त चचाओं क े दृविष्टग हमारा विवचार है विक मा. उच्च न्यायलय ने आक्षेविप विनणय में प्रत्यर्थी> की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रार्थीविमक आपलित्तयों पर ध्यान न देकर जो विनणय पारिर विकया है, वह त्रुविटपूण है। हमारे विवचार में अति विनयम, 2007 की योजना क े अन् ग प्रवेश कर पर ब्याज की दातियत्व की सीमा एवं विवस् ार से संबंति प्रश्न को इन अपीलों में जाँच करने एवं उसका उत्तर विदये जाने की आवश्यक ा है। दनरूप इस प्रश्न का उत्तर विदया जा ा है। प्रश्न सं. 2

33. अपीलार्थी> ने कहा विक अति विनयम क े अन् ग प्रवेश कर पर ब्याज उसक े द्वारा देय नहीं है और अति विनयम में बकाये पर ब्याज क े आरोपण से संबंति कोई मौलिलक प्राव ान नहीं है। यह कहा गया विक ारा 12(3) क े अन् ग प्रवेश कर पर ब्याज को वहाँ विवचारिर विकया जा सक ा है जहाँ पर कर क े सार्थी ब्याज एवं द67 पर ध्यान विदया जा ा है और जहाँ पर कोई विनमा ा ारा 12 क े अन् ग कर क े भुग ान में असफल रह ा है। उन्होंने यह कहा विक अति विनयम में ब्याज क े अति रोपण का कोई मौलिलक प्राव ान नहीं है। यह कहा गया विक ारा 13 उ.प्र. मूल्य वर्ति कर अति विनयम, 2008 क े मौलिलक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्राव ानों पर लागू हो ी है, विकन प्राव ान को सवश्रेष्ठ मशीनरी प्राव ानों पर लागू होना कहा जा सक ा है और विकनको उन प्राव ानों की प्रायोज्य ा ब्याज से संबंति मौलिलक प्राव ानों की पर लागू होना नहीं कहा जा सक ा है। न्यायलय क े समक्ष विकये गये कर्थीनों पर विवचार कर हमें सबसे पहले े प्राव ानों पर ध्यान देने की ज़रूर है जो व मान विववाद से कसंग हैं। अति विनयम की ारा 4 कर क े अति रोपण से संबंति है। ारा 4(1) प्राव ान कर ी है विक राज्य क े व्यापार, वाणिणज्य एवं उद्योग विक उन्नति क े लिलए सरकार,विवविह रूप में, सूचना जारी करक े, माल की क ु ल कीम का पांच प्रति श से अनति क उस स्र्थीानीय क्षेत्र क े बाहर से विवविह रूप से उस स्र्थीानीय क्षेत्र में अनुसूतिच माल क े उपभोग एवं विवक्रय हे ु प्रवेश पर कर अति रोविप कर सक ी है एवं उसको वसूल सक ी है।

34. ारा 9 रिरटन जमा करने एवं कर क े मूल्यांकन से संबंति है। ारा 10 कर क े अस्र्थीाई मूल्यांकन से संबंति है। ारा 12 विनमा ा से कर की प्राविप्त से संबंति है। ारा 12 (1), (2) इस प्रकार हैं- "12. विनमा ा से कर की प्राविप्त Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (1) इस अति विनयम में विकसी बा क े हो े हुए भी कोई व्यविक्त विकसी माल, जैसा विक राज्य सरकार द्वारा अनुसूची में विनर्किदष्ट विकया जाए, को विकसी विनमा ा से राज्य क े अन्दर विकसी स्र्थीानीय क्षेत्र में लाना चाह ा है, माल की ति7लीवरी ले े समय विनमा ा को स्र्थीानीय क्षेत्र में माल क े प्रवेश पर देय कर का भुग ान करेगा और विनमा ा ऐसे कर को प्राप्त करेगा। जब क क्र े ा द्वारा ऐसे कर का भुग ान नहीं कर विदया जा ा ब क विनमा ा ऐसे माल को सुपुद नहीं करेगा। (2) विनमा ा, जिजसने उप ारा (1) क े अन् ग कर को प्राप्त विकया है, उप ारा 1 क े अन् ग उसक े द्वारा आपू माल एवं प्राप्त कर को जमा करेगा और विवविह समय क े अन्दर ऐसी रीति से कर का भुग ान करेगा। (3) जहाँ पर कोई विनमा ा इन ारा क े अ ीन कर क े भुग ान में असफल रह ा है ो वह कर सविह ब्याज एवं द67 क े भुग ान Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का, यविद कोई भू-राज्स्व क े रूप में बकाये क े रूप में वसूली योग्य हो, दायी होगा। xxx............................xxx.................................xxx "35. अगला प्रव ान जिजसपर हमारा ध्यान गया वह 13 है जो उ. प्र. मूल्य वर्ति कर अति विनयम, 2008 कति पय प्रव ानों की प्रायोज्य ा गयी है जहां क ारा 13 की प्रासांविगक ा का प्रश्न है वह विनम्नांविक हैः- "13. उ. प्र. व्यापार कर अति विनयम, 1948 क े कति पय प्राव ानों की प्रायोज्य ा- उ. प्र. मूल्य वर्ति अति विनयम, 2008 क े विनम्नलिललिख प्राव ान इन अति विनयम क े अन् ग सभी 7ीलरों और कारवाविहयों पर यर्थीोतिच परिरव नों सविह लागू होंगेः- (i) ारा 9- फम की दातियत्व, व्यविक्तयों क े संघ एवं अविवभाजिज विहन्दू परिरवार से संबंति है। (ii) ारा 10- मृ क द्वारा बकाया कर उसक े प्रति विनति द्वारा देय होगा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) ारा 11- नाबालिलग एवं अक्षम व्यविक्त क े मामले में कर का दातियत्व। (iv) ारा 12- कोर्ट्सस ऑफ वाड्स क े मामले में कर का दातियत्व। (v) ारा 16- सबू का भार। (vi) ारा 19- राजस्व क े विह में सुरक्षा। (vii) ारा 21- खा ा एवं प्रपत्रों का 7ीलरों द्वारा बनाया जाना। (viii) ारा 29- मूल्यांकन से बचे हुए क ु ल कर का मूल्यांकन। (ix) ारा 30- क ु ल कारोबार एवं कर का आंकलन। (x) ारा 31- भूल सु ार। (xi) ारा 32- एक पक्षीय मूल्यांकन एवं द67 को अपास् करने की शविक्त। (xii) ारा 33- कर का भुग ान एवं वसूली। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA xxx..........................xxx...............................xxx

36. अब अपीलार्थी> क े विवद्वान अति वक्ता क े कर्थीनों से यह विवविद हो ा है विक क े अति विनयम, 2007 क े ह ब्याज क े भुग ान से संबंति प्राव ान मौलिलक हैं र्थीा ारा 12 में विदये गये हैं। ारा 12 विनमा ा द्वारा कर की प्राविप्त से संबंति है। ारा 12(1) कह ी है विक यविद कोई विनमा ा राज्य क े अन्दर कहीं से भी विकसी माल, जैसा विक राज्य सरकार अनुसूची में विनर्किदष्ट करे, विकसी स्र्थीानीय क्षेत्र में लाना चाह ा है ो क्र े ा को माल को ले े समय ऐसे स्र्थीानीय क्षेत्र में माल पर देय प्रवेश कर विनमा ा को देना होगा। ारा 12(2) उस व्यविक्त पर दातियत्व आरोविप कर ी है जो अनुसूची में विनर्किदष्ट विकसी माल को विकसी स्र्थीानीय क्षेत्र में लाना चाह ा है और भुग ान का समय वै ाविनक रूप से वही अणिभविनण> है जो सामान लेने का समय है। ारा 12(1) ऐसी परिरण्डिस्र्थीति को दशा ी है जहां यद्यविप विनमा ा ारा 12(1) क े अन् ग कर प्राप्त विकया है विकन् ु ारा 12(2) क े अनुरूप करे को चुकाने में असफल रहा है ो वह ब्याज सविह कर क े भुग ान का दायी होगा। अ ः ारा 12(3) क े वल एक विवणिशष्ट परिरण्डिस्र्थीति क सीविम है और ारा 12 ब्याज क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकसी सावभौविमक अनुप्रयोग क े लिलए नहीं है। अ ः ारा 12(3) क े अन् ग ब्याज क े भुग ान करने की जरूर एक विवशेष परिरण्डिस्र्थीति क े लिलए है और कर क े दातियत्व से विकसी अन्य उदाहरण क े संबं में इसका अनुप्रयोग नहीं है। प्रस् ु मामला ऐसा है जहां अपाला > विकसी विनमा ा से की माल नहीं ले रहा है, अ ः व मान मामले में ारा की कोई प्रायोज्य ा नहीं है।

37. अपीलार्थी> क े विवद्वान अति वक्ता ने जे.क े. जिसन्र्थीेविटक्स लिलविमटे7 बनाम कामर्भिशयल टैक्सेज ऑफीसस, (1994) 4 एस.एस.सी 276 क े इस संवै ाविनक पीठ क े विनणय में भरोसा ज ाया है। संविव ान पीठ क े पैरा 16 में विनम्नलिललिख विनणय पारिर विकया गया हैः "16. यह सवविवविद है विक जब विकसी विव ान में कर क े अति रोपण का प्राव ान विकया जा ा है और विव ान में कर वसूलने की ारा समाविह कर दातियत्व का विनमाण एवं उसको य विकया जा ा है और ब सरकारी ंत्र को दातियत्व को प्रभावी बनाने क े विदशा में काय करने विदया जा ा है। अ ः यह द67 ारा में पूव य दातियत्व क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मूल्यांकन की शविक्त दे ा है और सार्थी ही सार्थी कर वसूली एवं कर इकट्ठा करने की रीति भी ब ा ा है, जिजसमें बकायेदारों से संबंति द67 ारा भी समाविह है। विवलम्ब से भुग ान इत्याविद पर द67 लगाने क े लिलए भी प्राव ान विकया गया है। सामान्य ः द67 से संबंति ारा का कठोर रूप से अर्थी लगाया जा ा है विकन् ु कठोर रूप से अर्थी लगाने का विनयम, जो अन्य प्राव ानों की रह लगाये जा े हैं, मशीनरी प्राव ानों क सीविम नहीं है। मशीनरी प्राव ानों का अर्थी इस रह लगाना चाविहए जो उसक े उद्देश्यों को और प्रभावी बनाये न विक असफल बनाये। (देखें- लिव्हटने बनाम आईआरसी, सीआईटी बनाम महालीराम रामजीदास, इण्डि67या युनाइ7ेट विमल्स लिल. बनाम कविमश्नर एक्सेस प्रोविफर्ट्सस टैक्स, बाम्बे एवं गुरसाही सहगल बनाम सीआईटी, पंजाब)। लेविकन हमें यह सोंचना चाविहए विक प्राव ान जो Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्राति कारी को कर लगाने एवं एवं ब्याज वसूलने की शविक्त दे ा है अगर उसका अर्थी मशीरी प्राव ान क े रूप में अर्थी लगाया जाए ो वह इस कारण से मूल विवति जान पड़ ी है, यविद इसे विवति क े अ ीन संविवदा एवं ब्याज वसूलने क े अभाव में लगाया जाए ो इस राणिश को गल रीक े से अपने पास रखने क े लिलए क्षति क े रूप में नहीं वसूला जा सक ा है......."

38. उपरोक्त विनणय में जिजस बा पर ध्यान देना जाना सुसंग है वह यह है विक जो न्यायालय ने विनणय विदया है विक जिजसक े द्वारा प्राति कारी को कर लगाने एवं ब्याज लगाने की शविक्त प्रदान की गयी है, भले ही मशीनरी प्राव ानों क े विनमाण करने क े भाग क े ौर उसका अर्थी लगाया जाए, वो मूल विवति है। यहां विववाद नहीं है विक इस पर ब्याज या कर क े दातियत्व मूल विवति द्वारा प्रदान की जानी है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

39. ारा 13 यर्थीोतिच परिरव नों सविह उ. प्र. मूल्य वर्ति कर अति विनयम, 2008 की ारा 33 को लागू कर ी है। इस अति विनयम की ारा 33 इस प्रकार हैः "33. कर की वसूली एवं भुग ान- (1) टैक्स की कोई राणिश या फीस या द6ड़ या अन्य कोई राणिश, जिजसका 7ीलर या अन्य व्यविक्त इस अति विनयम क े अन् ग दायी है, वह 7ीलर एवं अन्य व्यविक्त द्वारा विवविह रूप में जमा की जाएगी। (2). ारा 42 क े अध्य ीन, कर जिजसको जमा विकया जाना है उसे विवविह समय में जमा करना होगा और ऐसा करने में असफल रहने पर एक चौर्थीाई सा ारण ब्याज प्रति मार की दर से बकाया हो जाएगा और इस बकाये का भुग ान करना होगा जो ऐसी राणिश का भुग ान करने की विन ारिर ति णिर्थी क े अण्डिन् म ति णिर्थी से प्रभावी होगा और ारा 24 की कोई ऐसी बा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ऐसे ब्याज क े दातियत्व को न ो रोकने वाली होगी और न ही स्र्थीविग करने वाली होगी। स्पष्टीकरण- इस उप ारा क े लिलए, कर अवति या मूल्यांकन वष हे ु भुग ान विकये जाने वाले कर, जैसा मामला हो, ारा 15 क े अनुरूप उसका आँकनल विकया जाएग। xxx............................xxx.................................xxx (4)यविद विकसी प्राति कारी या न्यायलय द्वारा आँकलिल, पुनःआँकलिल, या बढ़े हुए का मूल्यांकन या मांगी गयी सूचना में विनर्किदष्ट अवति क े बी जाने क े उपरान् नहीं भुग ान विकया जा ा ो ऐसी ति णिर्थी क े बी जाने से बकाये राणिश पर एक प्रति श प्रति माह की दर से सा ारण ब्याज की गणना की जाएगी जो बकाया हो जाएगी और उसका भुग ान करना होगा। xxx............................xxx.................................xxx mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

40. आगे इस न्यायालय की संविव ान पीठ ने वी.वी.एस. सुगस बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य 1999, 4 एस.सी.सी. 192 क े मामले क े उसी जिसद्धान् को दुहराया जो प्रस् र 6 में है जो विनम्नलिललिख है- “6. जे. क े. जिंसर्थीेविटक्स लिलविमटे7 बनाम सी.टी.ओ. में पारिर संविव ाविनक पीठ क े विनणय का विवश्लेषण कर इस न्यायालय ने काबन लिलविमटे7 बनाम असम राज्य मामले में यह ारिर विकया विक कर जमा करने में हुई देरी क े चल े ब्याज क े वल भी लगाया एवं वसूला जा सक ा है जब इस संबं में संविवति में मौलिलक प्राव ान विदये गये हों। यहां बकाये कर पर ब्याज लगाने एवं वसूलने का संविवति में मौलिलक प्राव ान नहीं है जो संशोति े प्रारम्भ क े विदन से बाद गन्ने की खरीद पर लागू हो ा है, यहां ब्याज अति रोविप नहीं विकया जा सक ा है जो उक्त विनयम 45 या अन्यर्थीा क े अनुप्रयोग पर आ ारिर ।” Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

41. वैट अति विनयम,2008 की ारा 33 क े प्राव ान की प्रक ृ ति क्या है, जिजसे अति विनयम, 2007 की ारा 13 क े आ ार पर प्रायोज्य बनाया गया है, उसका उत्तर विदया होगा? “यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह ” वैट अति विनयम, 2008 क े कति पय प्राव ानों पर लागू हो ा है जो ारा 13 में वर्भिण है। पद “यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह ” पद पर श्री अशोक सर्किवस सेंटर एवं अन्य बनाम उड़ीसा राज्य, (1983) 2 एस.सी.सी. 82 क े मामले में विवचार में आया। उक्त मामले में न्यायालय क े पास उड़ीसा अपर वाणिणज्य कर अति विनयम 1975 पर विवचार करने का अवसर प्राप्त र्थीा। यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह की ारा 2(2) उड़ीसा विबक्री कर अति विनयम,1947 क े प्राव ानों को लागू कर ी है। उपरोक्त संदभ में, इस न्यायलय ने प्रस् र 17 में पद यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह की व्याख्या की है जो विनम्नलिललिख है- “17. अति विनयम की ारा 3(2) जो प्र ान अति विनयम यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह क े प्राव ान अति रिरक्त कर अति रोपण को लागू कर े हैं वह अति विनयम क े करारोपण प्राव ान हैं और इसमें यह बा नहीं कही गयी है विक प्र ान Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA े कर मूल्यांकन और वसूली संबं ी प्राव ान े अन् ग कायवाविहयों पर लागू होंगे। इस पर विवचार करने क े पूव विक प्र ान अति विनयम क े कौन से प्राव न े भाग क े रूप में पढ़ा जाना चाविहए, हमें पद यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह का अर्थी समझना होगा। इंलिग्लश लॉ ति7क्सनरी अल जोविवर्ट्सस यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह को आवश्यक परिरव न क े रूप में परिरभाविष कर ी है। ब्लैक्स लॉ ति7क्सनरी यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह आवश्यक परिरव न क े रूप में परिरभाविष कर ी है। आम ौर पर इसक े अर्थी समान हो े हैं लेविकन जब आवश्यक हो ा है ो इसक े नाम पद एवं इसी से संबंति अन्य चीजें बदल दी जा ी है। हाउसमैन बनाम वाटरहाउस. बाउविवयर लॉ ति7क्सनरी ( ीसरा संशोति संस्करण 2) यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह का आशय आवश्यक परिरव न है। इस पद का म लब है प्रायोविगक ौर पर होने वाली घटनाओं में त्काल परिरव न। अ ः इसका Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अर्थी यह हुआ कोई पदार्थी और चीजें सामान्य ः वैसी ही रह ी हैं लेविकन जब आवश्क ा हो ी है ो उनक े नाम, कायालय में बदलाव विकया जाए। पूव अति विनयम यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह का बाद क े अति विनयम में विवस् ार अनुक ू लन क े विवचार को लागू कर ा है, लेविकन अब क क े वल क्योंविक यह उन उद्देश्यों क े लिलए जरूरी है विक उस वस् ु क े स्वभाव को विबना बदले परिरवर्ति न करना है। अति विनयम की ारा 3(2) यह दर्भिश हो ा है विक विव ानम6ड़ल का आशय यह नहीं र्थीा विक वह मूल अति विनयम में जो मौलिलक प्राव ान विदये गये हैं उससे हटकर विवति बनाये। उच्च न्यायलय ने जो प्रकल्पना की वह यह है विक यह अति विनयम एक स्व ंत्र अति विनयम है और उसक े सार्थी छेड़छाड़ करना सही नहीं है। मूल अति विनयम और इस अति विनमय क े ह कर में छ ू ट देने की जो प्रक ृ ति है वह समान है और विव ानम6ड़ल ने स्पष्ट ौर पर मूल अति विनमय में यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह क े प्राव ानों को बनाया है जो Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA े ह छ ू ट को लागू कर े हैं। अति रिरक्त विबक्री क ु ल विमलाकर सरचाज की प्रक ृ ति की र्थीी और जो बकाया र्थीी और जिजसका भुग ान अति विनयम क े अ ीन कर विन ारिर ी क े द्वारा भुग ान विकया जाना र्थीा। यद्यविप अति विनयम क े पास विवस् ृ नाम, संतिक्षप्त नाम और प्रत्येक कानून का अन्य सामान्य गुण होने पर भी इसे स्व ंत्र कानून विवचारिर नहीं विकया जा सक ा है। इसे प्रभावी बनाने क े लिलए मूल अति विनयम क े सार्थी पढ़ा जाना चाविहए। इस परिरण्डिस्र्थीति यों उच्च न्यायालय ने विनष्करण विनकाला विक यह बा गल र्थीी विक दो अति विनयम एक दूसरे पर विनभर नहीं कर े हैं। हमारा मानना है विक इन दोनों अति विनयम का एक सार्थी पढ़ा जाना और अर्थीान्वयन करना आवश्यक है मानों वे दोनों एक ही हैं। और, इस े प्राव ानों को लागू कर े हैं ो इस अति विनयम क े प्राव ानों में कौन बाद में आएगा, जब कभी अति विनयम में मूल अति विनयम क े संशो न की बा कहीं गयी हो। यहां पर Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लॉ7 जिसमोन क े विनष्कष का उल्लेख करना प्रासंविगक है जो उन्होंने फ ें 7ोच इनवेस्टमेंट ट्रस्ट कम्पनी बनाम इनलै6ड़ रेवेन्यू कविमशनस क े मामले में विदया र्थीा जो कति पय नीय संविवति यों क े अर्थीान्वयन से संबंति है। उन्होंने यह बा े प्रस् र 144 में कहीं हैंः "माई लॉ7, मुझे संदेह नहीं है विक अति विनयम क े अर्थीान्वयन क े समय जो विवणिशष्ट विवषयवस् ु से संबंति है विवशेष रूप से वहां जहां उन सभी को एक सार्थी पढ़ा जाना हो, हमें उसे प्रमुख ा देनी चाविहए जो स्पष्ट रूप में लिलखी हों और बाद क े अति विनयम में संशो न, यविद संभव हो, ो उस योजना से संग उसका अर्थीान्वयन विकया जाए।"

42. आगे इसी कर्थीन को राजस्र्थीान राज्य औद्योविगक विवकास एवं विनवेश एवं अन्य बनाम 7ाइमन्7 जेम 7ेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिल. एवं अन्य 2013 (5) Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एस.सी.सी. 470 क े मामले में दोहराया गय। जिजसमें विनम्नलिललिख ारिर विकया गया- "18. इस प्रकार वाक्यांश यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह का ात्पय है विक संविवति क े अन्य भाग या अन्य संविवति यों में विनविह कोई प्राव ान लागू करेगा क्योंविक इसका संबं विवस् ारपूवक कति पय बदलावों से है।"

43. इस प्रकार वैट अति विनयम, 2008 क े प्राव ानों का अमल विवस् ारपूवक कति पय परिरव नों क े सार्थी अति विनयम, 2007 की ारा 13 द्वारा उपबंति विकया गया है। वैट अति विनयम, 2008 की ारा 33, जिजसे ारा 13 क े अ ीन लागू करने हे ु उजिल्ललिख विकया गया है, को कर क े भुग ान और कर की वसूली क े संबं में लागू करना होगा। इस प्रकार कर राणिश पर ारा 33 क े ह ब्याज का भुग ान प्रवेश कर और ब्याज क े संबं में लागू विकया जाएगा। भले ही वैट अति विनयम, 2008 को मशीनरी प्राव ान मानना जो अति विनयम, 2007 की ारा 13 क े लागू हो ा है, विफर भी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मशीनरी प्राव ानों का इस रीति से विनवचन करना होगा ाविक दातियत्व को प्रभावी बनाया जा सक े और इसे मौलिलक विवति माना जाए।

44. इस संदभ में हम इस न्यायलय द्वारा विनण> इण्डि67या काबन लिलविमटे7 एवं अन्य बनाम असम राज्य, (1997) 6 एससीसी 479 क े मामले पर भी दृविष्टपा कर सक े हैं। उक्त मामले में अन् रराज्यीय पेट्रोलिलयम विबक्री क ें ^ीय विबक्री कर क े भुग ान में देरी कर दी गयी र्थीी और प्रत्यर्भिर्थीयों ने असम विबक्री कर अति विनयम की ारा 35 क क े ह विमली शविक्त का प्रयोग कर अपीलार्भिर्थीयों से ब्याज क े भुग ान की अपेक्षा की र्थीी। एक प्रश्न जिजसको विवचार में लिलया गया वह यह विक क्या क ें ^ीय विबक्री कर अति विनयम की ारा 9(2) में कोई ब्याज का भुग ान कण्डिल्प है विक नहीं। ारा 9(2) का उद्धरण विदया जा रहा है जिजसका विनम्नलिललिख प्रभाव है- "4. यहां क ें ^ीय अति विनयम की ारा 9(2) इस प्रकार हैः "9(2) इस अति विनयम क े अन्य प्राव ानों एवं विनयमों क े अ ीन रह े हुए, प्राति कारीगण जिजन्हें समुतिच सरकार द्वारा त्समय समान्य विबक्री कर विवति क े अ ीन कर क े मूल्यांकन, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पुनमूल्यांकन, संग्रह और भुग ान क े प्रव न की शविक्त प्राप्त है, भार सरकार क े रफ से इस अति विनयम क े अन् ग विवक्र े ा द्वारा देय अर्थीद6ड़ सविह कर क े मूल्यांकन, पुनमूल्यांकन, संग्रह और भुग ान का प्रव न करेगा मानो वह अर्थीद6ड़ कर व राज्य की सामान्य विबक्री कर विवति क े अन् ग देय अर्थीद67 हो, और इस उद्देश्य क े लिलए वह राज्य की सामान्य विबक्री कर विवति क े अ ीन विकन्हीं या सभी शविक्त का प्रयोग करेगा। और ऐसी विवति क े प्राव ान जिजसमें रिरटन से संबंति प्राव ान, अनंति म मूल्यांकन, कर का अविग्रम भुग ान, विकसी व्यापार में संलग्न अन् रणक ा का पंजीकरण, अन् रणक ा की ओर से चलाए जा रहे विकसी व्यविक्त पर कर दातियत्व का अति रोपण, उत्तराति कारी को, ऐसा व्यापार, विकसी फम क े या विहन्दू अविवभाजिज परिरवार का ऐसी फम का समापन ऐसे परिरवार क े विवभाजन क े समय कर क े दातियत्व का अन् रण,पर व्यविक्त से कर वसूली, पुनयाचना, विनद‰श, प्रति दाय, छ ू ट, mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अर्थीद6ड़ अति रोपण या ब्याज का भुग ान, अपरा ों का संयोजन र्थीा विवक्र े ा द्वारा उपलब् कराये गये प्रपत्रों को गोपनीय रखना, द्नुरूप लागू होगें।"

45. इस न्यायालय क े संवै ाविनक पीठ द्वारा पारिर विनणय जे. क े. जिंसर्थीेविटक्स (उपरोक्त) का अवलोकन विकया है और इस पीठ क े अनुपा को संदभ कर े हुए प्रस् र 7 में विनम्नलिललिख अवलोकन विकया गया हैः "उक्त से यह क लिलया जा सक ा हैः ब्याज क े वल भी लगाया और वसूला जा सक ा है जब संविवति में ऐसा करने क े मौलिलक प्राव ान विदये गये हों।"

46. इस न्यायलय ने इण्डि67या काबन लिल.(उपरोक्त) में ारिर विकया विक बाद क े भाग में ारा 9(2) से संबंति प्राव ान क े वल भी विबक्री कर प्राति कारिरयों द्वारा लगाया जा सक ा है जब क ें ^ीय अति विनयम क े वल उस सीमा क क ें ^ीय विबक्री कर पर करारोपण और ब्याज लगाने संबं ी मौलिलक प्राव ान बनाए। प्रस् र 13 में विनम्नलिललिख ारिर विकया गया हैः Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA "13. अब, ारा 9(2) में ब्याज का आरोपण या वसूली प्राव ान बाद क े भाग कहे जा सक े हैं। ारा 9(2) विबक्री कर प्राति कारिरयों को विवक्र े ा द्वारा देय क ें ^ीय विबक्री कर क े मूल्यांकन, पुनमूल्यांकन, वसूली एवं भुग ान क े प्रव न की शविक्त प्रदान कर ा है मानो यह राज्य क े अति विनयम क े ह देय हो, ारा 9(2) का यह प्रर्थीम भाग है। द्व ीय भाग में प्राति कारिरयों को, राज्य अति विनयम एवं इसक े ह, शविक्त क े प्रयोग का अति कार प्रदान विकया गया है जिजसमें ब्याज का आरोपण और भुग ान से संबंति प्राव ान शाविमल हैं र्थीा दनरूप लागू हो ा है। खेमका ए67 कम्पनी क े मामले में जो क ु छ भी कहा गया उसका ध्यान रख े हुए यह ारिर करना होगा विक मूल विवति जिजसे राज्य लागू करेगी वह क ें ^ीय अति विनयम है. ऐसे अनुप्रयोगों में, क े वल प्रविक्रयात्मक उद्देश्यों क े लिलए राज्य क े प्राव ान उपलब् हैं। ारा 9(2) क े बाद वाले भाग में ब्याज से संबंति प्राव ान राज्य विबक्री कर Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्राति कारिरयों द्वारा क े वल भी प्रयोग विकया जा सक ा है और क े वल उसी सीमा क जब क ें ^ीय अति विनयम क ें ^ीय विबक्री कर पर ब्याज लगाने एवं वसूलने हे ु मौलिलक प्राव ान कर ा है। यहां चूंविक क ें ^ीय अति विनयम में क ें ^ीय विबक्री कर पर ब्याज वसूलने का कोई मौलिलक प्राव ान नहीं है इसलिलए राज्य विबक्री कर प्राति कारी, क ें ^ीय विबक्री क े प्रव न और उसको वसूलने क े उद्देश्यों हे ु, ब्याज लगा सक ी है।"

47. ारा 9(2) दो भागों में विवचार विकया गया। इस न्यायालय ने प्रर्थीम भाग को मौलिलक प्राव ीन कहा जबविक द्व ीय भाग को कहा विक इसका उद्देश्य क े वल प्रविक्रयात्मक है। उक्त कारणों क े चल े इस न्यायालय ने ारिर विकया विक ब्याज का कोई भी दावा नहीं पाया गया। हमारे पहले इस मामले में ारा 33 ारा 13 यर्थीाआवश्यक परिरव न सविह क े आ ार पर प्रायोज्य बनाया गया है। ारा 13 में की विद्वभाजन नहीं है जैसा विक विबक्री कर अति विनयम की ारा 9(2) में इण्डि67या काबन लिलविमटे7 क े मामले में देखा गया र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

48. जैसा विक ऊपर उल्लेख विकया गया है, इस न्यायालय की संवै ाविनक पीठ ने जे. क े. जिंसर्थीेविटक्स लिल. क े मामले में ारिर विकया है विक ".........लेविकन यह समझना होगा विक प्राव ान जिजसक े द्वारा प्राति कारी को ब्याज अति रोपण एवं उसको वसूलने की शविक्त प्रदान की गयी है भले ही इसका अर्थी मशीनरी े विनमाण भाग की रह लगाया जाए, यह मौलिलक विवति..........." इस प्रकार हमें अपीलार्थी> क े विवद्व अति वक्ता क े क• को नकारने में की संकोच नहीं है विक अति विनयम 2007 में ब्याज को लगाने और वसूलने क े मौलिलक प्राव ान नहीं है। दनुरूप प्रश्न संख्या 2 का उत्तर विदया जा ा है।

49. हमारे द्वारा क्षेत्राति कार संबं ी प्रश्न संख्या 1 एवं 2 का उत्तर विदये जाने क े उपरान् अन्य प्रश्नों एवं विववाद्यों को उच्च् न्यायलय द्वारा विवचारिर करने हे ु भेजे जाने की आवश्यक ा है। ब्याज का दातियत्व एवं त्र्थीात्मक पहलुओं सविह ब्याज एवं अन्य पहलुओं क े विन ारण हे ु प्रश्नों को उच्च न्यायालय द्वारा जांचे जाने एवं विवचारिर विकये जाने की आवश्यक ा है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उदाहरण क े क े ौर पर, उक्त वर्भिण जिसविवल अपील संख्या 997-998 में विदनांविक 09.02.2004 क े इस न्यायालय क े अन् रिरम आदेश क े अनुसरण में अलग अलग ब्याज खा ों में प्रवेश कर क े भुग ान का प्रभाव क्या होगा, उस पर विवचार विकये जाने की जरूर है। यहां पर कु छ अन्य विवषय हो सक े हैं, थ्यों से संबं ी प्रश्न जिजसे उच्च न्यायालय द्वारा अपीलार्थी> क े ब्याज क े दातियत्व को विन ारिर विकये जाने की जरूर है। उच्च न्यायालय यहां स्व ंत्र है विक वह विकसी प्रश्न या विवषय की रचना कर सक ा है जिजस पर विवचार एवं उत्तर विदये जाने की अपेक्षा की जा सक े गी।

50. परिरणामस्वरूप अपील पर अनुमति प्रदान की जा ी है। विदनांक 22.11.2018 का उच्च न्यायालय का आक्षेविप आदेश अपास् विकया जा ा है। यातिचकाएं विवचारिर एवं गुणों पर विनण> विकये जाने हे ु उच्च न्यायालय क े समक्ष संशोति की जा ी हैं।............................... (मा. न्यायमूर्ति, अशोक भूषण) Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA................................. (मा. न्यायमूर्ति, क े. एम. जोसेफ) नई विदल्ली। 22 अप्रैल, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA