Naresh Chandra Bhardwaj v. Bank of India & Ors.

Supreme Court of India · 22 Apr 2019
Sanjay Vikash Kaul; Indira Banerjee
Civil Appeal No. 4037 of 2019 @ SLP (Crl) No. 16555 of 2018
labor sentence_modified Significant

AI Summary

The Supreme Court modified the dismissal of a bank officer to unauthorized retirement without pension, applying the principle of parity and balancing disciplinary severity with compassionate pensionary benefits.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
समक्ष भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपीलीय न्यायक्षेत्र
सिसविवल अपील संख्या 4037/2019
[ एस. एल. पी. (सी.) सं. 16555/ 2018 से उद्भू ]
नरेश चन्द्र भारद्वाज ............अपीलार्थी6
बनाम
बैंक आॅफ इंति>या व अन्य ...........प्रत्यर्थी6गण
विनणBय
न्यायमूर्ति संजय विकशन कौल mn~?kks"k.kk
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
JUDGMENT

1. अनुमति प्रदान की गयी।

2. अपीलार्थी6 प्रत्यर्थी6 सं. 1/बैंक आॅफ इंति>या (संतिक्षप्त में 'बैंक') क े सार्थी स्क े ल-2 अतिNकारी क े रूप में विनयोसिज र्थीा जब वह बैंक क े लाल बँगला शाखा कानपुर में विनयुक्त र्थीा ब उसने ीन ऋण अुनमोविद विकया र्थीा। अपीलार्थी6 ने दो ऋणों क े लिलए एक बार विफर से हर्षB नगर शाखा कानपुर में प्रातिNकरण को संस् ुति विकया र्थीा। मूलभू रूप से ये ऋण गैर-व्यावसातियक परिरसंपलि\ (NPA) ) क े रूप में वग6क ृ र्थीा और प्रदान विकये जा रहे ऋणों की प्रविbया को बैंक द्वारा बारीकी से देखा गया र्थीा, जब कई प्रविbया को बैंक द्वारा बारीकी से देखा गया र्थीा, जब कई प्रविbयात्मक अविनयविम ाओं को पाया गया ब इसकी वजह से बैंक को 70.32 लाख रूपये का नुकसान हुआ र्थीा।

3. अनुशासनात्मक कायBवाविहयों क े अनुसरण में अपीलार्थी6 को सेवा क े विनष्कासन क े बड़े जुमाBने क े सार्थी सामना करना पड़ा जो अपीलार्थीा6 क े ऊपर भविवष्य क े रोजगार क े लिलए विनरहB ा नहीं होगा। विदनांक 25.10.2017 क े आक्षेविप आदेश क े अनुसार अपीलार्थी6 का प्रयत्न इन प्रति क ू ल परिरणामों क े सार्थी पूणB या असफल रहा है।

4. विदनांक 04.07.2018 को क े वल इस स्थिस्र्थीति ने इस न्यायालय को सूचना जारी करने क े लिलए राजी विकया जो विक जुमाBने की मात्रा क े सम्बन्N में र्थीा। यह अपीलार्थी6 क े लिलए विवद्वान अतिNवक्ता द्वारा अविlम प्रस् ु ीकरण क े आNार पर र्थीा विक यहाँ पर अतिNकारिरयों क े दो अन्य मामले र्थीे, पहला श्री आर. क े. विमश्रा और दूसरा श्री वी. क े. श्रीवास् व जहाँ एक ही पक्ष क े कारण समान नुकसान भी हुआ Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds र्थीा और उन्हें अविनवायB सेवाविनवृलि\ का दण्> विदया जा चुका है। वस् ु ः अपीलार्थी6 ने सम ुल्य ा क े आNार पर कहा विक उसे भी दण्>स्वरूप क े वल अविनवायB सेवाविनवृलि\ ही विमलना चाविहए।

5. उपस्थिस्र्थीति दजB कर रहे प्रत्यर्थी6गणों पर, प्रत्यर्थी6 की रफ से विवद्वान अतिNवक्ता ने अनुदेश प्राप्त करने की मांग की विक क्या दण्> को अन्य दो दोर्षी कमBचारिरयों क े सार्थी अनुरूप ा पर अविनवायB सेवाविनवृलि\ से परिरव Bन विकया जा सक ा है। इसक े सम्बन्N में एक प्रति उ\र शपर्थीपत्र दायर विकया गया है जो अपीलार्थी6 की ओर से विकए गये अनुरोN का विवरोN कर ा है। हमें यह परीक्षण करना है विक यह विववाद की सीविम रूप -रेखा है सिजसका व Bमान मामले में परीक्षण करना है।

6. यह कहना तिrसा-विपटा है विक न्यायालय का अतिNकार क्षेत्र दण्> की मात्रा क े मुद्दे पर बहु सीविम है। यह अनुशासनात्मक प्रातिNकारी या अपीलीय प्रातिNकारी है, जो विकये गये कदाचार की गम्भीर ा को ध्यान में रखकर दण्> की प्रवृलि\ को विनNाBरिर कर ा है। इसका अर्थीB यह नहीं होगा विक यविद दण्> इ ना अनुपा हीन है विक यह न्यायालय क े मस्थिष् ष्क को झकझोर दे ा है, ो न्यायालय को इसमें हस् क्षेप करने का अतिNकार नहीं है। साNारण या इस प्रकार क े मामलों में भी अनुशासनात्मक/अपीलीय प्रातिNकारी द्वारा विवचार क े लिलए मामले को वापस कर देना उतिच हो सक ा है। हालांविक, हस् क्षेप का एक अन्य कारण यह हो सक ा है विक जहाँ दण्> में समान ा की दलील दी गयी है लेविकन ब पूवB - आवश्यक ा यह होगी विक समान ा को ऐसे आरोपों की प्रक ृ ति में होना चाविहए जो विक दोर्षी कमBचारी और कमBचारी क े आचरण क े विवरूद्ध विकये गये हैं। यह बाद का Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds पहलू है सिजसे राजेंद्र यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य (2013) 3 एससीसी 73 क े मामले में विनणBय पर भरोसा करक े अपीलार्थी6 की रफ से विवद्वान अतिNवक्ता द्वारा उन्न होने की माँग की जा ी है। इस पहलू पर प्रत्यर्थी6गणों की रफ से विवद्वान अतिNवक्ता ने लखनऊ क्षेत्रीय lामीण बैंक (अब उ\र प्रदेश lामीण बैंक, इलाहाबाद) एवं अन्य बनाम राजेन्द्र सिंसह (2013) 12 एससीसी 73 क े विनणBय पर ध्यानाकर्षिर्ष विकया जो विक उपरोक्त में पूवBव 6 विनणBय का उल्लेख विकया गया र्थीा।

7. प्रस् ाव में वास् व में कोई अं र नहीं है, सिजसे प्रस् ाविव विनणBय को छोड़कर कहा जाना चाविहए विक बाद क े विनणBयों में सिसद्धान् ों को संतिक्षप्त रूप में संक्षेविप विकया गया है, जो विनम्नानुसार पढ़ा गया है- “19. ऊपर उसिल्ललिख सिसद्धान् ों को संतिक्षप्त ः प्रस् ु विकया जा सक ा है-

19.1. जब एक कदाचार क े आरोपों को एक जाँच में साविब विकया जा ा है, ो एक विवशेर्ष मामले में लगाये जाने वाली सजा की मात्रा अविनवायB रूप से विवभागीय अतिNकारिरयों का क्षेत्र है।

19.2. मा. न्यायालय अनुशासविनक/विवभागीय प्रातिNकारिरयों क े कायB को नहीं मान सक े और दण्> की मात्रा एवं जुमाBने की प्रक ृ ति य होना, यह कायB विवशेर्ष रूप से सक्षम प्रातिNकारी क े अतिNकार क्षेत्र में हैं। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

19.3. सीविम न्यातियक समीक्षा अनुशासविनक प्रातिNकारी द्वारा लगाए गए दण्> क े सार्थी हस् क्षेप करने क े लिलए उपलब्N है, क े वल उन मामलों में जहाँ इस रह का जुमाBना अदाल क े विववेक क े लिलए चौंकाने वाला पाया जा ा है।

19.4. यहाँ क विक ऐसे मामले में भी जब सजा दोर्षी कमBचारी क े विवरूद्ध आश्चयBजनक रूप से अलग अलग अनुपा में आरोपों की प्रक ृ ति क े रूप में अपास् विकया जा ा है ो कायBवाही की उपयुक्त प्रणाली अनुशासनात्मक प्रातिNकारी अर्थीवा अपीलीय प्रातिNकारी को वापस भेजने क े विनद…श क े सार्थी उतिच आदेश पास करने क े लिलए है। मा. न्यायालय अपने आप में यह प्रदर्शिश नहीं कर सक े विक ऐसे मामले में क्या दण्> विदया जाना चाविहए।

19.5. उपर विदए गये प्रस् र (>ी) में वर्शिण सिसद्धान् का एकमात्र अपवाद उन मामलों में हुआ होगा जहाँ सह -अपराNी को अनुशासनात्मक प्रातिNकारी द्वारा कम सजा दी जा ी है, यहाँ क विक कदाचार का आरोप समान अर्थीवा अतिNक गंभीर आरोपों में सह - अपराNी र्थीे। यह समान ा क े सिसद्धान् पर होगा जब यह पाया जा ा है विक सम्बस्थिन्N कमBचारी और सह-अपराNी समान रूप से रखे गये हैं। हालांविक दोनों क े बीच एक पूणB सम ा होनी चाविहए, न क े वल आरोप की प्रक ृ ति क े सम्बन्N में, बस्थिल्क दोनों मामलों में आरोप पत्र दे देने क े आचरण में भी। यविद सह-अपराNी आरोपों को स्वीकार कर ा है ो Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अयोग्य माफी क े सार्थी पश्चा ाप का संक े उसक े लिलए कम दण्> देना न्यायोतिच होगा। (जोर विदया गया)

8. इस प्रकार, सिसद्धां इस मामले से बाहर विनकल ा है विक दण्> की मात्रा क े मुद्दे, जैसा विक उपरोक्त प्रस् र 19.[5] में दर्शिश है, उदाहरणस्वरूप एक सह- अपराNी को अनुशासनात्मक प्रातिNकारी द्वारा कम सजा प्रदान विकया जा ा है यहाँ क विक जब भी दुव्यBवहार क े आरोप समान हो े हैं अर्थीवा सह -अपराNी को अत्यतिNक गंभीर आरोप क े सार्थी र्थीोपा गया। यह समान ा क े सिसद्धां पर आNारिर है लेविकन विफर एक पूणB समान ा होना चाविहए।

9. अब हम उपरोक्त सिसद्धान् ों की रूप-रेखा में व Bमान मामले क े थ्यों का विवश्लेर्षण क े लिलए आगे बढ़ े हैं।

10. यविद हम अन्य दो अतिNकारिरयों क े मामले का अवलोकन करें ो बैंक का संभाविव नुकसान श्री आर. क े. विमश्रा क े मामले में 79.70 लाख रूपये व श्री वी. क े. श्रीवास् व क े मामले में 39.74 लाख रूपये आँका गया र्थीा। कम से कम यह राशिश श्री आर. क े. विमश्रा क े मामले में से एक बहु अतिNक असमान नहीं है। हालाँविक क्या कायB विकया गया बह अतिNक महत्वपूणB है। ऋणों क े प्रश्नों क े विवर्षय में श्री आर. क े. विमश्रा और श्री वी. क े. श्रीवास् व दोनों अनुमोदन प्रातिNकारी क े रूप में र्थीे और दोनों अतिNकारिरयों क े मामले में प्रत्येक क े चार ऋण शाविमल र्थीे। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds े मामले में, वह ीन ऋणों में अनुमोदन प्रातिNकारी र्थीा, जबविक दो ऋणों में अनुशंसिस प्रातिNकारी र्थीा।

13,405 characters total

11. इस स्थिस्र्थीति क े मूल्यांकन में, हम प्रर्थीम ः अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध आरोपों का उल्लेख करेंगे। यह उल्लेखनीय है विक दुभाBवना सिसद्ध नहीं हुई र्थीी। यह पाया गया विक श्री विवbम दीतिक्ष उफ B श्री विवनय सोंढी एक प्रमुख व्यविक्त हैं जो एक Nोखेबाज हैं और उन्होंने कई संगठनों को Nोखे से प्राप्त विवशिभन्न पहचान पत्रों क े माध्यम से अपनी पहचान साविब करक े Nोखा विदया है। ीसरा महत्वपूणB पहलू यह है विक अनुमोविद अतिNवक्ताओं और मूल्यांकनक ाBओं ने एक आख्या प्रस् ु की, जो बैंक अतिNकारिरयों द्वारा भरोसे क े ऊपर र्थीी। यह वास् व में ीनों मामलों में सामान्य सूत्र जान पड़ ा है।

12. अब मुख्य स क B ा अतिNकारी क े संस् ुति विदनांक 20.08.2009 की रफ मुड़ े हैं, यह प्र्स् र 6.[2] प्रति लिलविप क े अनुरूप र्थीा जैसा विक विनम्नानुसार पविठ है- “ 6.[2] >ी. ए. ने ीनों अतिNकारिरयों पर “अविनवायB सेवाविनवृलि\ ” क े प्रमुख दण्> को अतिNरोपण करने की संस् ुति की है। अशिभलेखों क े अनुशीलन पर, हम पा े हैं विक, श्री वी. क े. श्रीवास् व और श्री. आर. क े. विमश्रा P.F. क े और श्री एन. सी. भारद्वाज पेंशन क े वैकस्थिल्पक हैं। इससे पहले हमने ीनों अतिNकारिरयों को “ सेवा से विनष्कासन” क े सम्बन्N में प्रस् ाविव कर चुक े हैं, श्री भारद्वाज पर अतिNरोविप अविनवायB सेवाविनवृलि\ मामले में थ्य को देख े हुए, वह अविनवायB सेवाविनवृलि\ व्यविक्त क े लिलए Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds हकदार होंगे। श्री भारद्वाज द्वारा कारिर कदाचारों की गंभीर ा को देख े हुए, हमें लग ा है विक उनक े मामले में “सेवा का विनष्कासन” उतिच दण्> होना चाविहए। ऐसा इसलिलए है क्योंविक हर्षB नगर शाखा में 2 मामलों में संस् ुति प्रातिNकारी क े रूप में उसका हस् क्षेप क े अति रिरक्त, उन्होंने समान पक्ष का समायोजन यानी श्री विवbम दीतिक्ष को लाल बँगला शाखा से 3 अन्य ऋणों की संस् ुति की।”

13. उपरोक्त पठन से यह देखा जा ा है विक, जब पूवB में ीनों अतिNकारिरयों को सेवा से विनष्कासन का प्रस् ाव र्थीा, अन्य दो अतिNकारिरयों क े सम्बन्N में, क े मामले में ऐसा नहीं कर े हुए इसे अविनवायB सेवाविनवृलि\ में बदल विदया गया। उपपलि\ में े कदाचार और थ्य को गंभीर ा से कहा गया है विक वह दो मामलों में अनुशंसिस प्रातिNकारी व ीन अन्य मामलों में अनुमोदन अतिNकारी र्थीा। हालांविक वास् विवक कारण प्रस् र क े पूवB क े भाग से बाहर आ ा है, जो यह है विक, अपीलार्थी6 को पेंशन क े लिलए चुना गया जबविक अन्य दो अतिNकारिरयों को भविवष्य विनतिN को लिलए चुना गया। यह विक दोनों विवकल्पों क े सम्बन्N में विव\ीय जविटल ा क्या है और यह विक क्या अपीलार्थी6 को पेंशन क े लिलए चुने जाने क े कारण अतिNक विव\ीय लाभ प्राप्त होगा, हालांविक हमारे समक्ष विकसी भी क B का स्पष्टीकरण नहीं हुआ है।

14. हमारे लिलए यह स्वीकार करना मुस्थिश्कल है विक ीनों अतिNकारिरयों क े आचरण में कोई शिभन्न ा है जो दण्> में यह विवभेदन न्यायसंग होगा। नोविटस क े विनविम\ सबसे महत्वपूणB थ्य यह है विक प्रत्यर्थी6गणों द्वारा प्रस् ु प्रति उ\र शपर्थीपत्र क े अनुसार, वे स्वज्ञान में अपीलार्थी6 को सहानुभूति शील भ\ा प्रदान Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds करने क े लिलए सहम हुए हैं, जो पूणB पेंशन का 2/3 भाग उनको देय होगा उस पर सेवा से विनष्कासन का दण्> अतिNरोविप नहीं हुआ है। यह भी ध्यान रखना महत्वपूणB है विक आगे समान प्रस् र 8.[2] में यह क B विदया गया विक भले ही सजा को अविनवायB सेवाविनवृलि\ में परिरवर्ति विकया गया हो अपीलार्थी6 को पूणB पेंशन का 2/3 भाग प्राप्त होगा जो सहानुभूति शील भ\े क े लिलए प्राप्त पूणB पेंशन क े 2/3 भाग क े बराबर है। अपीलार्थी6 को सहानुभूति शील भ\े क े व्यवहार ः पेंशन विवविनयमन 1995 क े विवविनयमन 31 एवं 33 क े ह अतिNक म लाभ विदया गया है। ” 8.2..............आगे यह प्रस् ु विकया गया विक यविद यातिचकाक ाB पर दण्>स्वरूप “सेवा से विनष्कासन” अतिNरोविप है ो “अविनवायB सेवाविनवृलि\” क े रूप में संंशोतिN विकया जा ा है, जो पूणB पेंशन क े 2/3 वाँ भाग प्राप्त करेगा जो पूणB पेंशन क े 2/3 वाँ भाग क े बराबर है जो उन्हें व Bमान में “सहानुभूति शील भ\े” क े रूप में प्राप्त हो रहा है। ”

15. हम एक बार इस बा की सराहना करने में विवफल रह े हैं विक कोई विव\ीय शिभन्न ा नहीं है और कायB व्यवहार ः एक समान है, ो प्रत्यर्थी6गणों ने अपीलार्थी6 पर “सेवा से विनष्कासन जो भविवष्य क े रोजगार क े लिलए अयोग्य नहीं होगा” से “अविनवायB सेवाविनवृलि\” में प्रयुक्त दण्> को बदलने क े लिलए स्वयं से विहचविकचाहट क्यों हुई। एकमात्र पक्ष दण्> की प्रक ृ ति है जो अपीलार्थी6 प्रत्यर्थी6 -बैंक क े लिलए विबना विकसी विव\ीय विनविह ार्थीB अन्य दो अतिNकारिरयों से अतिNक प्रकट हो ा है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

16. पूवBकशिर्थी थ्यों एवं परिरस्थिस्र्थीति यों में इस प्रकार हम अपीलार्थी6 क े क B स्वीकार करने में प्रवृ\ हो े हैं ाविक उसका दण्> पूवBकशिर्थी श “ में से एक “अविनवायB सेवाविनवृलि\” में परिरवर्ति हो।

17. इस अपील को दनुसार अनुमति प्रदान की जा ी है पक्षों को अपना खचाB स्वयं वहन करना होगा।..................................... न्यायमूर्ति संजय विकशन कौल............................. न्यायमूर्ति इंविदरा बैनज[6] नई विदल्ली, 22 अप्रैल, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds