Vivekram Johar v. State of Uttar Pradesh and Others

Supreme Court of India · 26 Apr 2019
Ashok Bhushan; K. M. Joseph
Criminal Appeal No. 759 of 2019
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court allowed the appeal and discharged the accused from offences under Sections 504 and 506 IPC, holding that the allegations did not prima facie constitute an offence warranting trial.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
भार ीय सव च्च न्यायालय में
आपराति क अपीलीय अति कारिर ा
आपराति क अपील सं. 759 सन् 2019
(विवशेष अनुमति याति)का (आपराति क) सं. 4820/2017 से उद्भू )
विवक्रम जोहर ...अपीलार्थी6(गण)
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य ...प्रत्यर्थी6(गण)
विनण?य
न्यायमूर्ति , अशोक भूषण
JUDGMENT

1. अनुमति प्रदान की गयी।

2. यह अपील माननीय उच्च न्यायालय क े विनण?य विदनांविक 06.02.2017 को )ुनौ ी दे े हुए दाखिHल की गयी है जिजसक े द्वारा, प्रत्यर्थी6 द्वारा दाखिHल की गयी आपराति क पुन?रीक्षण याति)का को Hारिरज कर विदया गया। अपीलार्थी6 द्वारा आपराति क पुन?रीक्षण याति)का, दण्ड़ प्रविक्रया संविह ा की ारा 239 सपविP ारा 245 क े अन् ग? उसक े उन्मो)न आवेदन को अपर मुख्य न्यातियक मजिजस्ट्रेट द्वारा भार ीय दण्ड संविह ा की ारा 504 व 506 क े अन् ग? परिरवाद संख्या 483/2013 में अस्वीक ृ कर े हुए पारिर आदेश विदनांविक 29.11.2016 को )ुनौ ी दे े हुए दाखिHल विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

3. वाद क े संतिक्षप्त थ्य, जिजनका इस अपील को विनण[6] करने क े खिलए उल्लेH विकया जाना आवश्यक हैः- 3.[1] प्रत्यर्थी6 संख्या 2( ए स्मिस्मनपश्चा ् “वादी” क े रूप में उल्लेखिH ), लकड़ी प्रसंस्करण व विवक्रय में लगी मैसस? राम कम्पनी का एक भागीदार र्थीा। कम्पनी का अपना भवन कोसीकला, जिजला मर्थीुरा, उत्तर प्रदेश में र्थीा। 3.[2] विदनांक 18.12.2010 को सुबह 3 बजे मैसस? राम कम्पनी क े परिरसर में आग लग गयी। अविdशामक दल और पूखिलस को सूति) विकया गया, जो घटनास्र्थील पर पहुँ)े और क ु छ घंटों क े बाद आग पर काबू पाया जा सका। आग लगने का कारण विबजली क े बल में इलेस्मिiट्रक शॉट? सर्किकट होना पाया गया। आग ने भण्डार, संयन्त्र व उपकरण और भवन को नुकसान पहुँ)ाया। मैसस? राम कम्पनी ने एक स्टैण्डड? फायर एण्ड स्पेशल पेरिरल्स पॉखिलसी मैसस? यूनाइटेड इंतिडया इन्श्योरेन्स क ं पनी खिलविमटेड से खिलया र्थीा। मैसस? राम कम्पनी ने विदनांक 20.10.2010 को बीमा दावा प्रस् ु विकया। क ं पनी द्वारा विकया गया कु ल दावा 3,62,45,114 रूपये का र्थीा। यूनाइटेड इंतिडया इन्श्योरेन्स क ं पनी खिलविमटेड (ए स्मिस्मनपश्चा ् “इंश्योरेन्स क ं पनी” क े रुप में उल्लेखिH ) ने अपीलार्थी6 मैसस? प्रोटोकॉल सवpयर और इंजीविनयस? प्राइवेट खिलविमटेड को विनयुक्त विकया, जो इंश्योरेन्स विनयामक और विवकास प्राति कारी द्वारा एक प्रामाणिणक सवpक्षक है। अपीलार्थी6 मैसस? प्रोटोकॉल सवpयर और इंजीविनयस? प्राइवेट खिलविमटेड का विनदेशक होने से क ं पनी क े बीमा दावे का सवpक्षण विकया। 3.[3] अपीलार्थी6 ने सवpक्षण रिरपोट? ैयार करने क े उद्देश्य से विदनांक 04.04.2011 को कोसीकला, जिजला मर्थीुरा क े परिरसर को देHा। ज्वाइंट विनरीक्षण नोट विदनांक 04.04.2011 को ैयार विकया गया, जिजसक े खिलए क ं पनी से विवणिभन्न दस् ावेज मांगे गये। विवविव खिलHा पढ़ी क े बाद, अपीलार्थी6 ने विदनांक 23.09.2011 को अस्मिन् म सवpक्षण रिरपोट? विदनांक 23.09.2011 को प्रस् ु की। मैसस? राम कम्पनी ने विदनांक 15.07.2011 और 22.07.2011 को सवpक्षक को पत्र खिलHा, जिजसका सवpक्षक द्वारा विदनांक 23.07.2011 को Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds सम्यक रूप से उत्तर विदया। मैसस? राम कम्पनी ने बीमा क ं पनी को भी खिलHा, जिजसका बीमा क ं पनी ने विदनांक 08.08.2011 को यह सूति) कर े हुए जबाव विदया विक सवpक्षक को अपनी रिरपोट? जल्द से जल्द प्रस् ु करने को कहा गया है। 3.[4] मैसस? राम कम्पनी ने विदनांक 11.09.2011 को बीमा क ं पनी को 285.60 लाH रूपये की पॉखिलसी नराणिश का भुग ान करने की प्रार्थी?ना कर े हुए एक पत्र प्रस् ु विकया। उक्त पत्र में सवpक्षक क े विवरूद्ध कु छ णिशकाय ें भी की गयी र्थीी। मैसस? राम कम्पनी द्वारा पुनः विदनांक 19.09.2011 को बीमा कम्पनी को एक पत्र भेजा गया, जिजसमें सवpक्षक क े विवरूद्ध आरोप लगाये गये र्थीे। सवpक्षक, अर्थीा? ्, अपीलार्थी6 ने मामले क े सभी पहलूओं को विवस् ृ उजिल्लखिH कर े हुए मैसस? राम कम्पनी क े दावे क े सम्बन् में विदनांक 23.09.2011 को अस्मिन् म रिरप ट प्रस् ु की। सवpक्षण रिरपोट? में अस्मिन् म प्रस् र में, विनस्मिम्नखिलखिH कहा गया र्थीाः- “15) बीमाक ा? का दातियत्व उपरोक्त क े दृविyग, यह स्र्थीाविप हो ा है विक (a)बीमाक ृ ने भवन का अपना दावा दुर्व्यय?पदेणिश विकया है। (b)बीमाक ृ ने संयन्त्र और उपकरण का अपना दावा दुर्व्यय?पदेणिश विकया है। (c) बीमाक ृ ने भंडार मात्रा बढ़ाने क े खिलए झूPी घोषणा की र्थीी। (d)बीमाक ृ ने भंडार मूल्य घोषणा पर झूPी घोषणा की र्थीी। यह पॉखिलसी दुर्व्यय?पदेशन, गल वण?न, या विवशेष रूप से विकसी सामग्री क े गैर प्रकटीकरण क े प्रसंग में शून्यकरणीय होगी। यविद दावा विकसी कपटपूण? क े सम्बन् में है, या यविद कोई झूPी घोषणा की गयी है या उसका सहारा खिलया गया है पाखिलसी क े अन् ग? कोई लाभ प्राप्त करने क े खिलए बीमाक ृ या उसकी ओर से काय? करने वाले विकसी क े द्वारा यविद विकसी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds कपटपूण? माध्यम या यन्त्र का प्रयोग विकया गया है या यविद लाभ या हाविन विकसी जानबूझकर विकये गये काय? द्वारा या बीमाक ृ की मौनानुक ु ल ा से घविट हुआ है, इस पॉखिलसी क े अन् ग? सभी लाभ समपहरिर कर खिलये जायेंगें। यह स्पy है विक बीमाक ृ क े दुर्व्यय?पदेशन और झूPी घोषणा ने उपरोक्त दोनो ब ायी गयी पॉखिलसी श • को भंग कर विदया है। उपरोक्त क े दृविyग, यह विक बीमा की अनुशीष?क पाखिलसी क े अन् ग? विबषय दावा स्वीकारयोग्य नहीं है। यह रिरपोट? विबना पक्षपा क े प्रस् ु की जा रही है और बीमा की पॉखिलसी क े विनयमों व श • का विवषय है। हस् ाक्षरिर प्रोटोकॉल सवpक्षक और इंजीविनयस? प्राइवेट खिलविमटेड” 3.[5] प्रत्यर्थी6 संख्या 2, अर्थीा? ्, वादी ने भार ीय दण्ड संविह ा की ारा 383, 384, 471, 504 व 506 क े अन् ग? अपरा का आरोप लगा े हुए विदनांक 14.11.2011 को दण्ड़ प्रविकया संविह ा की ारा 156(3) क े अन् ग? एक प्रार्थी?ना पत्र दाखिHल विकया। परिरवाद में अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध यह आरोप लगाया गया विक वह दो या ीन अन्य अज्ञा र्व्ययविक्तयों क े सार्थी, जिजसमें से एक रिरवॉल्वर खिलया हुआ र्थीा, विदनांक 02.10.2011 को शाम क े 7 बजे वादी क े घर आया और उसे गन्दी गाखिलयाँ दी और उस पर हमला करने वाला र्थीा, जब क ु छ पड़ोसी वहाँ पहुँ)े, अपीलार्थी6 और दो या ीन अन्य अज्ञा र्व्ययविक्त मौक े से अपनी गाड़ी से भाग गये। उक्त प्रार्थी?ना पत्र विदनांविक 14.11.2011 पर, मजिजस्ट्रेट क े आदेश पर, विदनांक 24.11.2011 को प्रर्थीम सू)ना रिरपोट? सं. 367/2011 अन् ग? ारा 383, 384, 471, 504, 506 भार ीय दण्ड संविह ा की प्रर्थीम सू)ना रिरपोट? दज? की गयी। बीमा क ं पनी ने विदनांक 12.12.2011 क े पत्र द्वारा मैसस? राम कम्पनी क े दावे को नामंजूर कर विदया। उक्त पत्र क े प्रस् र सं. 3, 4, और 5 विनम्नखिलखिH प्रभाव क े हैः- Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “3. यह विक इस दावे क े सवpक्षण और मूल्यांकन करने की अवति क े दौरान, सवpक्षक का सम्पूण? रूझान और आ)रण सं ोषजनक पाया गया।

4. यह विक उक्त सवpक्षक ने अपनी अस्मिन् म सवpक्षण रिरपोट? सं. 2010-DEC- 131 विदनांविक 23 जिस म्बर 2011 की एक प्रति इस काया?लय को 27 जिस म्बर 2011 को प्रस् ु की।

5. यह विक प्रस् ु सवpक्षण रिरपोट? क े परीक्षण और हमारे प्रमुH काया?लय की कनीकी टीम से सलाह से, हमने उपरोक्त दावे को हमारे पत्र सन्दभ? सं. VKJ:RK:FC:2011: 235:11 विदनांविक 06.12.2011 क े द्वारा नामंजूर विकया है।” 3.[6] विववे)क ने अपीलार्थी6 को भी बुला े हुए अन्वेषण विकया और क्लोजर रिरपोट? प्रस् ु की। क ् लोजर रिरपोट? में, विववे)क ने यह ब ाया विक विवक्रम सिंसह (अपीलार्थी6) क े मोबाइल की लोक े शन और कॉल विववरण क े अनुसार, विदनांक 1 अiटूबर से 4 अiटूबर क उसक े मोबाइल का कोई रोमिंमग नहीं र्थीा और उसकी लोक े शन एन.सी.आर. क्षेत्र में र्थीी। क ु छ र्व्ययविक्तयों क े बयानों को दज? करने क े बाद, विववे)क ने अस्मिन् म प्रारूप, क ् लोजर रिरपोट? प्रस् ु की। रिरपोट? क े विवरूद्ध, वादी द्वारा एक विवरो याति)का न्यातियक मजिजस्ट्रेट क े समक्ष दाखिHल की गयी, जिजन्होने विदनांक 18.05.2012 क े आदेश द्वारा विवरो याति)का स्वीकर की और अपरा सं. 448 सन् 2011 में पुनः विववे)ना को विनदpणिश विकया। पुनः विववे)ना भी अन्य विववे)क द्वारा की गयी, जिजसने दोबारा अस्मिन् म आख्या यह म र्व्ययक्त कर े हुए प्रस् ु की विक कोई अपरा नहीं विकया गया है। पुनः, एक विवरो याति)का दाखिHल की गयी। न्यातियक मजिजस्ट्रेट ने विदनांविक 21.12.2012 क े आदेश द्वारा अव ारिर विकया विक आगे विववे)ना की कोई आवश्यक ा नहीं है और वाद को परिरवाद क े रूप में विव)ारण करना और विनस् ारिर करना न्यायोति) होगा। परिरवादी का बयान दण्ड प्रविकया संविह ा की ारा 200 क े अन् ग? दज? विकया गया। वादी ने पी.डब्लयू.1- गणेश शमा? और पी. डब्लयू2- रूप सिंसह उफ ? मुन्ना का भी बयान दज? कराया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds 3.[7] मजिजस्ट्रेट ने अपीलार्थी6 को भार ीय दण्ड संविह ा की ारा 504 और 506 क े अन् ग? विदनांविक 07.02.2014 क े आदेश द्वारा समन विकया। विदनांविक 07.02.2014 क े आदेश क े विवरूद्ध अपीलार्थी6 द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में दण्ड प्रविकया संविह ा की ारा 482 क े अन् ग? एक आवेदन दाखिHल विकया गया, जिजस आवेदन को माननीय उच्च न्यायालय द्वारा विदनांविक 30.07.2014 आदेश द्वारा विनस् ारिर कर विदया गया। माननीय उच्च न्यायालय ने आवेदन अन् ग? ारा 482 दण्ड प्रविकया संविह ा को विनस् ारिर कर े हुए यह अवलोकन विकया विक उस परिरस्मिस्र्थीति में, जब अपीलार्थी6 द्वारा 30 विदनो क े अन्दर उन्मो)न प्रार्थी?ना पत्र डाला गया है, यह अपेतिक्ष है विक इसे क ? और मौखिHक आदेश द्वारा विव)ारिर और विनण[6] विकया जायेगा और गुण दोष पर आवेदन क े विनस् ारण क, अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध कोई विवपरी काय?वाही नहीं की जाएगी। 3.[8] आवेदक द्वारा न्यातियक मजिजस्ट्रेट क े समक्ष दण्ड प्रविकया संविह ा की ारा 239 सपविP ारा 245 क े अन् ग? प्रार्थी?ना कर े हुए एक आवेदन दाखिHल विकया गया विक अपीलार्थी6 उन्मोति) विकया जाये। ारा 239 और 245 क े अन् ग? आवेदन में, दावे का विववरण, विवणिभन्न रिरपोट? और बीमा क ं पनी द्वारा विव)ारण को ब ाया गया। अपर न्यातियक मजिजस्ट्रेट ने विदनांविक 29.11.2016 क े अपने आदेश द्वारा उन्मो)न क े आवेदन को अस्वीक ृ कर विदया जिजसक े विवरूद्ध माननीय उच्च न्यायालय में पुन?रीक्षण याति)का दाखिHल की गयी, जिजसको विदनांक 06.02.2017 को Hारिरज कर विदया गया है। उपरोक्त आदेश द्वारा र्व्ययणिर्थी होने से यह अपील दाखिHल की गयी है।

4. इस अपील क े समर्थी?न में अपीलार्थी6 क े विवद्वान अति वक्ता ने यह क ? विदया विक परिरवादी द्वारा दाखिHल परिरवाद और क ु छ नही बस्मिल्क अपीलार्थी6 को उत्पीविड़ करने क े खिलए काय?वाही र्थीी। अपीलार्थी6, जो क ं पनी क े अविd दावे क े सम्बन् में विवपरी रिरपोट? देने वाला सवpक्षक र्थीा, वादी ने ति)ढ़कर और अपीलार्थी6 को सबक सीHाने क े खिलए परिरवाद दाखिHल विकया है। यह क ? विदया गया है विक घटना विदनांक 02.10.2011 को ब ायी गयी है जब अपीलार्थी6 को उसक े घर पर आने Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds और उसको मकाने का दावा विकया गया है जबविक मुख्य न्यातियक मजिजस्ट्रेट क े न्यायालय में परिरवाद विदनांक 14.11.2011 को दाखिHल विकया गया अर्थीा? ् एक माह और बारह विदन से ज्यादा समय क े बाद, जो स्वंयमेव दर्शिश कर ा है विक सम्पूण? कहानी अपीलार्थी6 को उत्पीविड़ करने क े गढ़ी गयी। यह क ? विदया गया है विक पुखिलस ने दो बार विववे)ना क े उपरान् कोई अपरा नहीं विकया गया होना पाया है और क्लोजर रिरपोट? प्रस् ु विकया। यह कहा गया है विक परिरवाद को पढ़ने पर ारा 504 और 506 क े अन् ग? अपरा क े आवश्यक त्व नही बन े हैं और मुख्य न्यातियक मजिजस्ट्रेट ने उन्मो)न याति)का को अस्वीक ृ कर े हुए त्रुविट कारिर की। माननीय उच्च न्यायालय ने भी परिरवाद क े आरोपो को ध्यान नहीं विदया और यह नोविटस करने में असफल हुए विक ारा 504 और 506 क े अन् ग? अपरा क े आवश्यक त्व नहीं बन े हैं।

5. प्रत्यर्थी6 की ओर से उपस्मिस्र्थी विवद्वान अति वक्ता ने अपीलार्थी6 क े क• का Hण्डन विकया है और यह कहा विक न्यातियक मजिजस्ट्रेट क े समक्ष अपीलार्थी6 को समन की प्रविक्रया जारी करने क े खिलए पया?प्त सामग्री र्थीी और अपीलार्थी6 को अपरा से उन्मोति) करने क े खिलए कोई आ ार नहीं र्थीा। परिरवाद में लगाया गये आरोप ारा 504 और 506 क े अन् ग? एक वाद बना े हैं और उन्मो)न आवेदन को अस्वीक ृ कर े हुए विवद्वान मुख्य न्यातियक मजिजस्ट्रेट द्वारा और माननीय उच्च न्यायालय द्वारा आपराति क पुन?रीक्षण याति)का को Hारिरज कर े हुए कोई गल ी नहीं की गयी है।

6. पक्षकारों क े विवद्वान अति वक्ता इस न्यायालय क े विवणिभन्न विनण?यो पर भी अवलस्मिम्ब हुए है, जो क• पर विव)ार कर े समय विवस् ृ में सन्दर्शिभ विकए जाएँगें।

7. हमने पक्षकारों क े विवद्वान अति वक्ता क े क• को विव)ार में खिलया है और अणिभलेHों का परिरशीलन विकया है।

8. इस अपील में इस प्रश्न पर विव)ार करना और उत्तर देना है विक iया व ?मान मामले में अपीलार्थी6 ारा 504 और 506 क े अन् ग? अपरा से उन्मोति) होने का अति कारी र्थीा और iया अ ीनस्र्थी न्यायालयों ने उन्मो)न आवेदन को अस्वीक ृ कर े हुए गल ी कारिर की।

9. हमने उन थ्यों और घटनाओं क े क्रम पर विव)ार विकया है, जिजसने वादो को अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध ारा 156(3) क े अन् ग? आवेदन को दाखिHल करने क े खिलए बाध्य विकया। व ?मान Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds मामलें में, विदनांक 18.12.2010 क े आग की घटना क े सम्बन् में वादी क े बीमा दावे से सम्बस्मिन् वादी क े दावे क े गुण दोष पर हमारा सरोकार नही है। हमारा विव)ार क े वल उसी प्रश्न क सीविम है विक iया अपीलार्थी6 को ारा 504 और 506 भा.द.सं. क े अन् ग? उन्मो)न करने का वाद बन ा है।

10. उपरोक्त उल्लेHनीय थ्यो से, यह स्पy है विक अपीलार्थी6 की भूविमका क े वल सवpक्षण करने क े खिलए बीमा क ं पनी द्वारा विनयुक्त सवpक्षक की र्थीी और घटना विदनांविक 18.12.2010 क े सम्बन् में वादी द्वारा कणिर्थी अविd बीमा दावे पर रिरपोट? प्रस् ु करना र्थीा, जो उसकी क ं पनी क े परिरसर कोसीकला, जिजला मर्थीुरा में हुई र्थीी।

11. अपीलार्थी6 सैiटर-7, नोएडा, उत्तर प्रदेश में मैसस? प्रोटोकॉल सवpयस? और इंजीविनयस? प्रा.खिल. का विनदेशक है। अपीलार्थी6 ने कोसीकला परिरसर को देHा और विदनांक 04.04.2011 को ज्वाइंट विनरीक्षण विकया। परिरवादी द्वारा अपीलार्थी6 क े सार्थी ही सार्थी बीमा क ं पनी से विवणिभन्न पत्रा)ार विकये गये। पत्र विदनांविक 11.09.2011 में, अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध कोई आरोप नहीं लगाये गये र्थीे और मैसस? राम कम्पनी द्वारा भेजे गये पत्र विदनांविक 19.09.2011 में पहली बार अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध आरोप लगाये गये र्थीे विक अपीलार्थी6 ने अस्मिन् म सवpक्षण क े खिलए न की मांग की है, अस्मिन् म सवpक्षण रिरपोट? को अपीलार्थी6 द्वारा विदनांक 23.09.2011 को प्रस् ु विकया गया, जिजसे विदनांक 27.09.2011 को बीमा क ं पनी द्वारा प्राप्त कर खिलया गया।

12. हमने ऊपर नोविटस विकया है विक अपीलार्थी6 द्वारा ैयार अस्मिन् म सवpक्षण रिरपोट? अनुशंसा में विमथ्यादुर्व्यय?पदेशन और झूPी घोषणा क े कारण, जो विक पाखिलसी श • का उल्लंघन है, दावे को नामंजूर विकया गया है। अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध कणिर्थी घटना विदनांक 02.10.2011 की है, अर्थीा? ्, अस्मिन् म सवpक्षण रिरपोट? क े प्रस् ुति क े ुरन् बाद। यह क े वल अपीलार्थी6 द्वारा विदनांक 23.09.2011 को अस्मिन् म सवpक्षण रिरपोट? की प्रस् ुति क े बाद र्थीा जो विदनांक 27.09.2011 को प्राप्त हुआ यह विक अपीलार्थी6 को घटना विदनांविक 02.10.2011 क े खिलए आरोविप विकया जिजसमें वादी को मकाने का अपीलार्थी6 पर आरोप लगाया। यह उल्लेHनीय है विक दण्ड प्रविक्रया संविह ा की ारा 156(3) क े अन् ग? आवेदन पहली बार विदनांक 14.11.2011 को दाखिHल विकया गया, जिजसकी प्रति यां सलंdक पी-9 क े रुप में हैं। घटना विदनांविक 02.10.2011 क े सम्बन् में अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध परिरवाद में आरोप विनम्नखिलखिH रुप में हैः- Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “............ जब परिरवादी ने अणिभयुक्त सवpक्षक विवक्रम जोहर को नहीं सुना, ो वह और 2-3 अन्य अज्ञा र्व्ययविक्त, जिजसमें से एक रिरवॉल्वर पकड़े हुए र्थीा, जिजनको वादी पह)ान सक ा है, वादी क े घर विदनांक 02.10.201 को शाम 7 बजे आये और उसे भद्दी गाखिलयाँ दी और उस पर हमला करने वाले र्थीे। जब क ु छ पड़ोसी वहाँ पहुँ)े, ो सवpक्षक विवक्रम जोहर और 2-3 अन्य अज्ञा र्व्ययविक्त मौक े से अपने वाहन से भाग गये। उन लोगो ने जिजन्होने वादी की जान ब)ायी, घटना को देHा है।”

13. विववे)क ने दो बार विववे)ना की र्थीा क्लोजर रिरपोट? प्रस् ु विकया, जिजस पर विवरो याति)का दाखिHल की गयी। विवरो याति)का पर, अन् ः, न्यातियक मजिजस्ट्रेट ने आदेश विदनांविक 21.12.2012 द्वारा मामले को परिरवाद क े रुप में मान े हुए विनण[6] विकया। परिरवादी सार्थी ही सार्थी उसक े गवाह न्यायालय में उपस्मिस्र्थी हुए और घटना विदनांविक 02.10.2011 का समर्थी?न विकया।

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14. हमारे व ?मान मामले क े थ्यो क े परीक्षण को आगे बढ़ने से पहले, हम उन्मो)न प्रार्थी?ना पत्र पर विव)ारण कर े समय न्यायालय की शविक्त क े विवस् ार और काय?क्षेत्र पर नोविटस कर सक े हैं। 15, भार संघ बनाम प्रफ ु ल्ल क ु मार सामल और अन्य, (1979) 3 एससीसी 4 क े वाद में इस न्यायालय ने दण्ड प्रविक्रया संविह ा की ारा 277 पर विव)ार विकया र्थीा, जो विक उन्मो)न क े आदेश को पारिर करने क े खिलए विवशेष न्याया ीश की शविक्त है। ारा 227 को प्रस् र सं. 7 में उल्लेखिH करने क े बाद, इस न्यायालय ने विनम्नखिलखिH अव ारिर विकयाः- “7. XXXXXXXXX शब्द “अणिभयुक्त क े विवरूद्ध काय?वाही क े खिलए पया?प्त आ ार नहीं” स्पy ब ा ा है विक अणिभयोजन पक्ष क े इशारे पर आरोप य करने क े खिलए न्याया ीश मात्र एक डाकघर नहीं है, बस्मिल्क आदेश क े विन ा?रण क े खिलए, विक iया अणिभयोजन द्वारा विव)ारण क े खिलए वाद बनाया गया है, वाद क े थ्यों पर अपनी न्यातियक बुतिद्ध का प्रयोग करना )ाविहए। इस थ्य क े मूल्यांकन क े खिलए, न्यायालय क े खिलए मामले क े पक्ष व विवपक्ष में प्रवेश करना और साक्ष्यों व संभावनाओं को ोलना व सं ुखिल करना आवश्यक नही हैं जो वास् व में जाँ) शुरू होने क े बाद उसका काय? हो ा है। ारा 227 क े प्रक्रम पर, न्याया ीश को क े वल यह प ा लगाने क े खिलए साक्ष्यों को Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds जाँ)ना है विक iया अणिभयुक्त क े विवरूद्ध काय?वाही करने क े खिलए पया?प्त आ ार है या नही। आ ार की पया?प्त ा, पुखिलस द्वारा दज? की गयी साक्ष्यों की प्रक ृ ति और न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु दस् ावेजों को अपने दायरे में लेगी जो प्र ीयमान कर ी है विक अणिभयुक्त क े विवरूद्ध संविदग् परिरस्मिस्र्थीति यां है ाविक उसक े विवरूद्ध आरोप य विकया जा सक े ।”

16. इस न्यायालय क े हाखिलया वादों को विव)ार में लेने क े बाद, प्रस् र 10 में, विनम्नखिलखिH जिसद्धान् नोविटस विकए गएः- “10. इस प्रकार, प्राति कारिरयों क े उपरोक्त उजिल्लखिH को ध्यान देने पर, विनम्नखिलखिH जिसद्धान् प्रकट हो े हैः (1) यह विक संविह ा की ारा 227 क े अन् ग? आरोप य करने क े प्रश्न पर विव)ार कर े समय न्याया ीश क े पास विनःसन्देह, यह प ा लगाने क े सीविम उद्देश्य क े खिलए साक्ष्य को जाँ)ने और ोलने क े खिलए शविक्त है विक iया अणिभयुक्त क े विवरूद्ध प्रर्थीम दृy या मामला बन ा है। (2) जहाँ न्यायालय क े समक्ष रHे गयी सामग्री से अणिभयुक्त क े विवरूद्ध गंभीर संदेह उत्पन्न हो ा है जिजसको उति) रूप से स्पyीक ृ नहीं विकया गया है न्यायालय आरोप य करने और काय?वाही करने क े खिलए पूण? ः न्यायोति) होगा। (3)प्रर्थीम दृy या मामले को विन ा?रिर करने का परीक्षण स्वभाव ः प्रत्येक मामले क े थ्यों पर विनभ?र करेगा और साव?भौविमक अनुप्रयोग का एक विनयम प्रति पाविद करना कविPन है। हालांविक सामान्य ः यविद दो विव)ार समान रूप से संभव हो और न्याया ीश सं ुष्ठ है विक उसक े समक्ष प्रस् ु साक्ष्य क ु छ संदेह उत्पन्न कर े हुए लेविकन अणिभयुक्त क े विवरूद्ध गंभीर सन्देह नहीं हैं, उसे अणिभयुक्त को उन्मोति) करने का अपना अति कार पूरा रह होगा। (4) यह विक संविह ा की ारा 227 क े अन् ग? अपनी अति कारिर ा को प्रयोग कर े हुए न्याया ीश जो विक व ?मान संविह ा क े अन् ग? वरिरष्ठ और अनुभवी न्यायालय है, क े वल अणिभयोजन क े डाक घर या प्रवक्ता क े रूप में काय? नहीं कर सक ा, बस्मिल्क मामले की र्व्ययापक संभावनाओं, न्यायालय क े समक्ष प्रस् ु साक्ष्य और दस् ावेजों का पूरा प्रभाव, मामले में उपस्मिस्र्थी कोई बुविनयादी दुब?ल ा इत्याविद पर विव)ार करना है। हालांविक इसका यह अर्थी? नहीं है विक न्याया ीश को मामले क े पक्ष व विवपक्ष और साक्ष्य को ौलने में जाँ) कर े रहना )ाविहए जैसे विक वह विव)ारण कर रहा र्थीा।”

17. उड़ीसा राज्य बनाम देबेन्द्र नार्थी पाति, (2005) 1 एससीसी 568, क े वाद में इस न्यायालय की ीन-न्याया ीशों की पीP ने ारा 277 क े अन् ग? उन्मो)न पर विव)ार विकया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds र्थीा, न्यायालय द्वारा यह विन ा?रिर विकया गया विक अणिभयुक्त को दीघ?कालीन उत्पीड़न से ब)ाने की दृविy से संविह ा में ारा 277 को सस्मिम्मखिल विकया गया जो एक लम्बे आपराति क विव)ारण का एक आवश्यक सहव 6 है। इसको अणिभयुक्तो को उत्पीड़न से ब)ाने क े खिलए बनाया गया है जब विववे)ना क े बाद जुटायी गयी सास्मिक्ष्यक सामग्री न्यून म विवति क आवश्यक ाओं से कम हो ी है।

18. इस न्यायालय का अन्य विनण?य, जिजसको सन्दर्शिभ विकया जाना है विप्रयंका श्रीवास् व और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य, (2015) 6 एससीसी 287 का है। उपरोक्त वाद में इस न्यायालय ने ारा 156(3) क े दुष्प्रयोग क े क्षम ा को उनको उत्पीविड़ करने क े खिलए, जिजन्हें विवणिभन्न संवै ाविनक काय• को सौंपा गया है, पर विव)ार विकया है। इस न्यायालय ने, वास् व में, यह अवलोकन विकया है विक ारा 156(3)दण्ड प्रविक्रया संविह ा क े अन् ग? आवेदन को शपर्थी पत्र द्वारा समर्शिर्थी होना )ाविहए ाविक आरोप लगाने वाले र्व्ययविक्त परिरवाद में कही गयी बा ों की जिजम्मेदारी ले। प्रस् र सं. 30, में विनम्नखिलखिH अव ारिर विकया गया हैः- “30. हमारे सुविव)ारिर म में, इस देश में )रण आ गया है जहाँ दण्ड प्रविक्रया संविह ा की ारा 156(3) क े अन् ग? आवेदनों को आवेदक द्वारा सशपर्थी एक शपर्थीपत्र द्वारा समर्शिर्थी विकया हो जो मजिजस्ट्रेट की अति कारिर ा की प्रार्थी?ना कर ा हो। इसक े अलावा, एक उपयुक्त मामले में, विवद्वान मजिजस्ट्रेट को सच्चाई को सत्याविप करने की अच्छी रह से सलाह दी जाएगी और आरोपों की सत्य ा की भी पुyी कर सक े हैं। यह शपर्थीपत्र आवेदक को ज्यादा जिजम्मेदार बना सक ा है। हम ऐसा कहने को बाध्य हुए है iयोविक इस प्रकार क े आवेदन विनयविम )या? में क े वल कु छ र्व्ययविक्तयों को उत्पीविड़ करने क े खिलए, विबना कोई जिजम्मेदारी खिलए दाखिHल विकए जा े रहें है। इसक े अलावा, यह ज्यादा परेशान करने वाला और H रनाक हो जा ा है जब कोई ऐसे लोगों को पकड़ने की कोणिशश कर ा है जो एक वै ाविनक प्राव ान क े अन् ग? आदेश पारिर कर रहे हैं जिजन्हें उक्त अति विनयम की संर)ना क े अन् ग? या भार ीय संविव ान क े अनुच्छेद 226 क े अन् ग? )ुनौ ी दी जा सक ी है। लेविकन यह आपराति क न्यायालय में अनुति) लाभ लेने क े खिलए नहीं विकया जा सक ा है जैसे विक विकसी ने विहसाब बराबर करना विन ा?रिर विकया है।” Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

19. इस प्रकार यह स्पy है विक उन्मो)न प्रार्थी?ना पत्र को विव)ार में ले े समय, न्यायालय को यह विन ा?रिर करने क े खिलए विक iया विव)ारण क े खिलए मामला बन ा है या नहीं, अपनी न्यातियक बुतिद्ध का प्रयोग करना है। यह सत्य है विक इस प्रकार की काय?वाही में, न्यायालय साक्ष्य को क्रमबद्ध करक े लघु विव)ारण करने क े खिलए नहीं हो ा।

20. न्यायालय द्वारा उन्मो)ने क े समय प्रयोग की जाने वाली अति कारिर ा की प्रकृ ति को उल्लेखिH करने क े बाद, अब हम वापस व ?मान मामले क े थ्यों पर आ े हैं, जहाँ परिरवाद क े आरोप को प्रत्यक्ष ः सही मानकर, iया ारा 504 और 506 क े अन् ग? अपरा बन ा है, यह एक प्रश्न है जिजसका उत्तर विदया जाना है।

21. हमें विववाद्य को समझने क े खिलए ारा 503, 504 और 506 को देHने की आवश्यक ा है, जो विव)ार क े खिलए आयें है, जो विनम्नखिलखिH प्रभाव क े हैः- “503. आपराति क अणिभत्रास.- जो कोई विकसी अन्य र्व्ययविक्त शरीर, ख्याति या सम्पखित्त को, या विकसी ऐसे र्व्ययविक्त क े शरीर या ख्याति को, जिजससे विक वह र्व्ययविक्त विह बद्ध हो या कोई क्षति करने की मकी उस अन्य र्व्ययविक्त को इस आशय से दे ा है विक उसे संत्रास कारिर विकया जाए, या उससे ऐसी मकी क े विनष्पादन का परिरवज?न करने क े सा न स्वरूप कोई ऐसा काय? कराया जाए, जिजसे करने क े खिलए वह वै रूप से आबद्ध न हो, यह विकसी ऐसे काय? को करने का लौप कराया जाए, जिजसे करने क े खिलए वह वै रूप से हकदार हो, वह आपराति क अणिभत्रास कर ा है। स्पyीकरण.-विकसी ऐसे मृ र्व्ययविक्त की ख्याति को क्षति करने की मकी जिजससे वह र्व्ययविक्त, जिजसे मकी दी गई है, विह बद्ध हो इस ारा क े अन् ग? आ ा है।

504. लोक शांति भंग कराने को प्रकोविप करने क े आशय से साशय अपमान.-जो कोई विकसी र्व्ययविक्त को साशय अपमाविन करेगा और द्द्वारा उस र्व्ययविक्त को इस आशय से, यह सम्भार्व्यय जान े हुए, प्रकोविप करेगा विक ऐसे प्रकोपन से वह लोक शास्मिन् भंग या कोई अन्य अपरा कारिर करेगा, यह दोने में से विकसी भांति क े कारावास से, जिजसकी अवति दो वष? क हो सक े गी, या जुमा?ने स, या दोनों से, दस्मिण्ड विकया जाएगा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

506. आपराति क अणिभत्रास क े खिलए दण्ड.- जो कोई आपराति क अणिभत्रास का अपरा करेगा, वह दोनों में से विकसी भांति क े कारावास से, जिजसकी अवति दो वष? क की हो सक े गी, या जुमा?ने से, या दोनों से, दस्मिण्ड विकया जाएगा। यविद मकी मृत्यु या घोर उपहति इत्याविद कारिर करने की हो.- र्थीा यविद मकी मृत्यु या घोर उपहति कारिर करने की, या अविd द्वारा विकसी सम्पखित्त का नाश कारिर करने की या मृत्यु दण्ड से या आजीवन कारावस से, या सा वष? की अवति क क े कारावस से दण्डनीय अपरा कारिर करने की, या विकसी स्त्री पर अस्मिस् त्व का लांछन लगाने की हो, ो वह दोनों में से विकसी भांति क े कारावास से, जिजसकी अवति सा वष? क की हो सक े गी, या जुमा?ने से, या दोनों से, दस्मिण्ड विकया जायेगा।”

22. विफओना श्रीHन्डे बनाम महाराy्र राज्य और अन्य, (2013) 14 एसीसी 44 क े वाद में इस न्यायालय क े समक्ष भार ीय दण्ड संविह ा की ारा 504 विव)ार क े खिलए आया। उक्त वाद में, इस न्यायालय क े पास ारा 504 क े आवश्यक त्व का परीक्षण करने का अवसर र्थीा, जिजसे वाद क े विव)ारण की काय?वाही से पहले आना आवश्यक है। न्यायालय ने अव ारिर विकया विक उक्त वाद में, आपराति क पुन?रीक्षण याति)का दाखिHल करक े आदेश जारी करने की प्रविक्रया को )ुनौ ी दी गयी। इस न्यायालय ने अव ारिर विकया विक परिरवाद क े )रण पर, मजिजस्ट्रेट का सरोकार मात्र परिरवाद में लगाये गये आरोपों से है और क े वल प्रर्थीम दृy या सं ुy होना है विक iया अणिभयुक्त क े विवरूद्ध काय?वाही क े खिलए पया?प्त आ ार हैं। प्रस् र संख्या 11 में विनम्नखिलखिH जिसद्धान् प्रति पाविद विकए गयें हैः- “11. व ?मान वाद में, हमारा सरोकार क े वल इस प्रश्न से हैं विक iया, परिरवाद को पढ़ने पर मजिजस्ट्रेट द्वारा प्रविक्रया जारी करने का प्रर्थीम दृy या मामला बन ा है या नहीं। आपराति क मामलों में प्रविक्रया क े जारी करने क े सम्बन् में विवति पूण? ः स्र्थीाविप है। परिरवाद स् र पर, मजिजस्ट्रेट मात्र परिरवाद में लगाये गये आरोपों से सम्बस्मिन् है और क े वल प्रर्थीम दृy या सं ुy होना है विक iया अणिभयुक्त क े विवरूद्ध काय?वाही करने क े खिलए पया?प्त आ ार हैं और वाद क े गुणों और अवगुणों पर विवस् ृ विवमश? करना मजिजस्ट्रेट का काय?क्षेत्र नहीं है। ारा 202 क े अन् ग? जाँ) का क्षेत्र इस अर्थी? में अत्यति क सीविम है विक मजिजस्ट्रेट से, इस स् र पर, परिरवाद में लगाये गये आरोपों की सत्य ा या असत्य ा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds का प्रर्थीम दृy या परीक्षण करना अपेतिक्ष है। मजिजस्ट्रेट से वाद क े गुणों या अवगुणों की विवस् ृ ))ा? आरंभ करना अपेतिक्ष नहीं है, बस्मिल्क क े वल परिरवाद में विकए गए बयान में अन् र्किनविह प्रत्यक्ष संभावनाओं पर विव)ार करना है। नगर्व्यवा बनाम वीरन्ना णिशवलिंलगप्पा कोनजल्गी, (1976) 3 एससीसी 736 क े वाद में, इस न्यायालय ने अव ारिर विकया विक एकबार मजिजस्ट्रेट यह म बनाने में अपने विववेकाति कार का प्रयोग कर ले ा है विक काय?वाही करने क े खिलए आ ार हैं, ो उच्च र न्यायालय का काय? अपने स्वयं क े विववेकाति कार को मजिजस्ट्रेट से प्रति स्र्थीाविप करना नहीं है। मजिजस्ट्रेट को सभी प्रति रक्षा को ध्यान विदए विबना जो अणिभयुक्त को हो सक ी है, परिरवाद क े दृविyकोंण से प्रश्न को विवशुद्ध ः विनण[6] करना है।”

23. इस न्यायालय ने विनण?य क े प्रस् र संख्या 13 में ारा 504 क े आवश्यक त्वों को उल्लेखिH विकया है, जो विनम्नखिलखिH प्रभाव की हैः- “13. ारा 504 विनम्नखिलखिH आवश्यक त्वों को सस्मिम्मखिल कर ी है यर्थीा (a)) साशय अपमान, (b) ) अपमान इस प्रकार का होना )ाविहए जो अपमाविन र्व्ययविक्त को प्रकोविप कर ा हो, और (c) ) अणिभयुक्त का आशय या यह जान ा हो विक ऐसे प्रकोपन से अन्य लोक शांति भंग कर देगा या कोई अन्य अपरा कारिर करेगा। साशय अपमान इस मात्रा का होना )ाविहए जो एक र्व्ययविक्त को लोक शांति भंग को या कोई अन्य अपरा कारिर करने को प्रकोविप कर दें। र्व्ययविक्त जो साशय अपमान इस आशय से या यह सम्भार्व्यय जान े हुए विक यह विकसी अन्य र्व्ययविक्त प्रकोविप करेगा और ऐसा प्रकोपन लोक शांति भंग करेगा या कोई अन्य अपरा कारिर करेगा, इस परिरस्मिस्र्थी में, ारा 504 क े आवश्यक त्व सं ुy हो े हैं। अपरा को विनर्किम करने का एक आवश्यक त्व यह है विक एक काय? या आ)रण साशय अपमान की मात्रा क होना )ाविहए और क े वल यह थ्य विक अणिभयुक्त ने परिरवादी को प्र ाविड़ विकया, ारा 504 क े अन् ग? दोषजिसतिद्ध साविब क े खिलए स्वयं में पया?प्त नहीं है।”

24. माविनक नेजा और अन्य बनाम कना?टक राज्य और अन्य, (2015) 7 एससीसी 423, क े अन्य विनण?य में, इस न्यायालय क े पास ारा 503 और 506 क े आवश्यक त्व क े परीक्षण का पुनः अवसर र्थीा। उक्त वाद में भी, ारा 353 और ारा 506 भार ीय दण्ड संविह ा क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अन् ग? अपरा क े खिलए वाद दज? विकया गया। ारा 503 को उल्लेखिH करने क े बाद, जो आपराति क अणिभत्रास को परिरभाविष कर ा है, इस न्यायालय ने प्रस् र संख्या 11 और 12 में विनम्नखिलखिH प्रति पाविद विकयाः- “11. Xxxxxxxxxxxxxx “आपराति क अणिभत्रास” की परिरभाषा को पढनें पर यह दर्शिश कर ा है विक विकसी अन्य र्व्ययविक्त क े शरीर, ख्याति या सम्पखित्त को, या ऐसे र्व्ययविक्त को, जिजससे विक वह र्व्ययविक्त विह बद्ध हो कोई क्षति कारिर करने की मकी देने का कोई काय? होना )ाविहए और मकी मकाये गये र्व्ययविक्त को संत्रास कारिर क े आशय से होनी )ाविहए और इसे कोई काय? जिजसे करने क े खिलए वह वै रूप से आबद्ध न हो, या विकसी ऐसे काय? को करने का लोप, जिजसे करने क े खिलए वह वै रूप से हकदार हो, क े रूप में होना )ाविहए।

12. प्रस् ु मामले में, यह आरोप है विक अपीलार्शिर्थीयों ने परिरवादी को गाखिलयाँ दी है और दूसरे प्रत्यर्थी6 को अपने लोक क ?र्व्ययो क े विनव?हन में बा ा पहुँ)ायी और दूसरे प्रत्यर्थी6 की विनष्ठा को Pेस पहुँ)ायी। अणिभयुक्त का आशय जिजसको यह विनण[6] करने क े खिलए विव)ार विकया जाना है विक iया जो उसने कहा “आपराति क अणिभत्रास” की परिरभाषा में आ ा है। मकी विकसी काय? को करने या लोप करने क े खिलए संत्रास कारिर करने क े आशय से की जानी )ाविहए। संत्रास कारिर करने क े आशय क े विबना विकन्ही शब्दो की मात्र अणिभर्व्ययविक्त इस ारा की प्रयोज्य ा क े खिलए पया?प्त नहीं है। लेविकन यह दर्शिश करने क े खिलए अणिभलेH पर सामग्री रHी जानी )ाविहए विक परिरवादी को संत्रास कारिर करने क े खिलए आशय है। वाद क े थ्यो और परिरस्मिस्र्थीति यों से यह दर्शिश हो ा है विक अपीलार्थी6 की ओर से दूसरे प्रत्यर्थी6 क े मस्मिस् ष्क में उसक े क ?र्व्यय क े विनव?हन में बा ा पहुँ)ाने का संत्रास कारिर का आशय नहीं र्थीा। जहाँ क फ े सबुक पर विटप्पणी डालने का सम्बन् है, यह दर्शिश हो ा है विक यह लोक की सहाय ा करने क े खिलए लोक मं) है और अपीलार्शिर्थीयों का फ े सबुक पर विटप्पणी डालने का काय?, भार ीय दण्ड संविह ा की ारा 503 में आपराति क अणिभत्रास क े आवश्यक त्व को आकर्किष नहीं कर ा।” Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

25. उपरोक्त वाद में, यह आरोप र्थीा विक अपीलार्थी6 ने परिरवादी को गाखिलयाँ दी र्थीीं। न्यायालय ने अव ारिर विकया विक मात्र यह थ्य विक यह आरोप विक अणिभयुक्त ने परिरवादी को गाखिलयाँ दी र्थीीं, ारा 506 क े आवश्यक त्वों को सं ुy नहीं कर े हैं।

26. अब, हम अपीलार्थी6 क े विवरूद्ध परिरवाद में लगायें गयें आरोपों पर वापस आ े हैं। यह आरोप विक अपीलार्थी6 दो या ीन अन्य अज्ञा र्व्ययविक्तयों क े सार्थी, जिजसमें से एक ने रिरवॉल्वर पकड़े हुए र्थीा, परिरवादी क े घर आया और उसे भद्दी गाखिलयाँ दी और उस पर हमला करने का प्रयास विकया और जब क ु छ पड़ोसी वहाँ पहुँ)ें ो अपीलार्थी6 और उसक े सार्थी अन्य र्व्ययविक्त मौक े से भाग गये। उपरोक्त आरोपों क े प्रार्थीविमक मूल्यांकन पर ारा 504 और 506 क े आवश्यक त्व जैसे विक इस न्यायालय द्वारा उपरोक्त दो विनण?यों में ब ाये गये, सं ुy नहीं हो े है। साशय अपमान इस मात्रा क होना )ाविहए विक यह एक र्व्ययविक्त को लोक शांति भंग करने या कोई अन्य अपरा कारिर करने को प्रकोविप करे। मात्र यह आरोप विक अपीलार्थी6 आया और परिरवादी को गाखिलयाँ दी, आवश्यक त्वों को सं ुy नहीं कर ा है जैसा विक विफओना श्रीHंडे (उपरोक्त) में इस न्यायालय क े विनण?य क े प्रस् र 13 में प्रति पाविद विकया गया।

27. अब, ारा 506 पर वापस आने पर, जो विक आपराति क अणिभत्रास का अपरा है, विफओना श्रीHण्डे (उपरोक्त) द्वारा प्रति पाविद विकए गए जिसद्धान् को भी लागू विकया जाना )ाविहए जब यह प ा लगाने का प्रश्न हो विक iया अपरा क े आवश्यक त्व बन े हैं या नहीं। यहाँ, क े वल यह आरोप है विक अपीलार्थी6 ने परिरवादी को गाली दी। भार ीय दण्ड संविह ा की ारा 506 क े अन् ग? अपरा को साविब करने क े खिलए, iया आवश्यक त्व हैं जिजसे अणिभयोजन द्वारा साविब विकया जाना है? अपरा को साविब करने क े सम्बन् में र नलाल एण्ड ीरजलाल ऑन लॉ ऑफ क्राइम्स, 27 वाँ संस्करण विनम्नखिलखिH ब ा े हैः- “.... अणिभयोजन को साविब करना )ाविहएः (i)यह विक अणिभयुक्त ने विकसी र्व्ययविक्त को मकी दी। (ii)यह विक ऐसी मकी र्व्ययविक्त क े शरीर, ख्याति या सम्पखित्त को, या विकसी ऐसे र्व्ययविक्त क े शरीर या ख्याति को, जिजससे विक वह र्व्ययविक्त विह बद्ध हो, कोई क्षति करने क े खिलए हो। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds (iii) यह विक उसने ऐसा उस र्व्ययविक्त को संत्रास कारिर करने क े आशय से, या उससे ऐसी मकी क े विनष्पादन का परिरवज?न करने क े सा न स्वरूप कोई ऐसा काय? कराया जाए, जिजसे करने क े खिलए वह वै रूप से आबद्ध न हो, या विकसी ऐसै काय? को करने का लोप कराया जाए, जिजसे करने क े खिलए वह वै रूप से हकदार हो, विकया हो। परिरवाद में आरोपो को सा ारण या पढ़ने पर उपरोक्त उल्लेखिH सभी आवश्यक त्व सं ुy नहीं हो े हैं।

28. विफओना श्रीHण्डे (उपरोक्त) और माविनक नेजा (उपरोक्त) में इस न्यायालय द्वारा प्रति पाविद जिसद्धान् से, हम सं ुy हैं विक परिरवादी द्वारा दाखिHल विकए गए परिरवाद से ारा 504 और 506 क े आवश्यक त्व नहीं बन े हैं। जब दण्ड प्रविक्रया संविह ा की ारा 156(3) क े अन् ग? परिरवाद दाखिHल विकया गया, जो परिरवाद प्रकरण क े रूप में माना गया, ारा 504 और 506 क े आवश्यक त्व शाविमल नहीं हैं, हमारा यह दृविyकोंण है विक अ ीनस्र्थी न्यायालय ने अपीलार्थी6 द्वारा दाखिHल विकया गया उन्मो)न क े आवेदन को अस्वीकृ कर े हुए त्रुविट कारिर की। व ?मान वाद क े थ्यों से, हम इस दृविyकोंण पर हैं विक अपीलार्थी6 ारा 504 और 506 क े अन् ग? अपरा क े खिलए उन्मोति) होने का हकदार र्थीा।

29. इस प्रकार, फलस्वरूप, अपील स्वीक ृ की जा ी है। उच्च न्यायालय क े आदेश विदनांविक 06.02.2017 क े सार्थी सार्थी मुख्य न्यातियक मजिजस्ट्रेट का आदेश विदनांविक 29.11.2016 अपास् विकये जा े हैं और अपीलार्थी6 ारा 504 और 506 क े अन् ग? अपरा से उन्मोति) हो ा है।...................................... ( न्यायमूर्ति अशोक भूषण ).................................... ( न्यायमूर्ति क े.एम. जोसेफ ) नई विदल्ली, 26 अप्रैल, 2019. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds