Bikash Ranjan Raut v. State

Supreme Court of India · 16 Apr 2019 · 2019 INSC 536
M. R. Shah
Criminal Appeal No. 687 of 2019 @ SLP (Crl.) No. 297 of 2015
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

A Magistrate cannot suo motu order further investigation after taking cognizance and issuing summons without police application under Section 173(8) CrPC; such orders are beyond jurisdiction and liable to be quashed.

Full Text
Translation output
संप्रकाशनीय
उच्चतम न्यायालय, भारत
दाण्डिक अपीलीय अधिकाररता
क्रिममनल अपील सं. 687/2019
(SLP (Crl.) No. 297/2015 से उद्भूत)
बिकाश रंजन राउत ........ अपीलार्थी
िनाम
राज्य, सधचव (गृह), ददल्ली सरकार, नई ददल्ली क
े माध्यम से ........प्रत्यर्थी
निर्णय
एम.आर.शाह, न्यायाधीश
JUDGMENT

1. अनुमतत प्रदान की गयी |

2. क्रिममनल एम. सी. सं. 3386/2013 में ददनांक 20.08.2014 को पाररत क्रकये गए आक्षेपपत तनर्णय एवं आदेश ण्जसक े द्वारा ददल्ली उच्च न्यायालय ने कधर्थत याधचका ख़ाररज की और पवद्वान अततररक्त मुख्य दंिाधिकारी (पण्चचम) ददल्ली द्वारा ददनांक 05.02.2013 को पाररत आदेश की पुण्टि की, ण्जससे दंिाधिकारी ने अततररक्त जााँच करने का आदेश ददया, से खिन्न एवं असंतुटि होकर मूल अमभयुक्त ने वतणमान अपील दायर की है |

3. यह क्रक, अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त, क े खिलाफ़ ददनांक 28.09.2007 को FIR सं. 426/2007 र्थाना जनकपुरी, ददल्ली में भारतीय दडि संदहता की िारा 420, 468 एवं 471 क े तहत FIR दजण की गई र्थी | यह क्रक, जााँच पूरी होने पर, जााँच अधिकारी ने 2019 INSC 536 अमभयुक्त-अपीलार्थी क े पवरुद्द भारतीय दडि संदहता की िारा 420, 468 एवं 471 क े तहत आरोप पत्र दायर क्रकया | यह क्रक, आरोप की पवरचना क े समय एवं आरोप-पत्र क े दस्तावेज़ात का संज्ञान लेते हुए, पवद्वान दंिाधिकारी ने ददनांक 05.02.2013 क े आदेश द्वारा अपीलार्थी अर्थाणत् मूल अमभयुक्त को उम्मोधचत कर ददया र्था | हालााँक्रक, अमभयुक्त को उम्मोधचत करते हुए और/अर्थवा अमभयुक्त क े उम्मोचन क े पचचात्, उसी आदेश में, पवद्वान दंिाधिकारी ने अततररक्त पुमलस आयुक्त (पण्चचम) ददल्ली को मामले में की गई जााँच की गुर्वत्ता क े मूल्यांकन और क्रकसी भी आरोप पत्र को छंिनी क े प्रयोजन हेतु अमभयोजन शािा क े समक्ष भेजने की प्रभावकाररता की प्रक्रिया का पवचलेषर् करने हेतु तनदेश ददया र्था| पवद्वान दंिाधिकारी ने यह भी अवलोकन क्रकया और तनदेश ददया क्रक मामले को तक ण संगत पररर्ाम पर पहुाँचने हेतु अततररक्त जााँच की आवचयकता है और इसे पूरी ण्जम्मेदारी से क्रकया जाना चादहए और इस ररपोिण को 11.04.2012 (.sic.) तक दायर क्रकया जाए | 3.[1] पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा ददनांक 05.02.2013 को पाररत आदेश क े उस भाग, ण्जसमें पवद्वान दंिाधिकारी ने अततररक्त जााँच करने और ररपोिण दायर करने हेतु तनदेश ददया र्था, से खिन्न एवं असंतोष होकर अपीलार्थी अर्थाणत् मूल अमभयुक्त ने उच्च न्यायालय में Cr. M.C. No. 3386/2013 में अपील दायर की र्थी | इसी दौरान, ददनांक 05.02.2013 को पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा पाररत आदेश में जारी तनदेशों का अनुसरर् करते हुए, ण्ज़ला जााँच यूतनि पण्चचम ण्ज़ला, पुमलस चौकी एम.आई.जी. फ्लैि, जे. ब्लाक, राजौरी गािणन, नई ददल्ली ने CrPC की िारा 160 क े तहत ददनांक 22.04.2013 को समन जारी कर ददए | अपीलार्थी ने CrPC की िारा 160 क े तहत जारी कधर्थत नोदिस/समन को भी चुनौती दी र्थी | मूलतः अपीलार्थी ने पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा ददनांक 05.02.2013 को पाररत आदेश क े उस भाग को चुनौती दी है, ण्जस क े द्वारा दंिाधिकारी ने अवलोकन और अततररक्त जााँच क े तनदेश ददए र्थे और जााँच अधिकारी द्वारा ररपोिण दायर करने का भी तनदेश ददया र्था | यह क्रक, आक्षेपपत तनर्णय एवं आदेश द्वारा, हाई कोिण ने कधर्थत याधचका ख़ाररज कर दी और पवद्वान दडिाधिकारी द्वारा ददनांक 05.02.2013 को पाररत आदेश में दिल देने से इंकार कर ददया, ण्जसमें दंिाधिकारी ने पाया क्रक जााँच दोषपूर्ण र्थी और/अर्थवा क ु छ आयामों पर कोई उधचत जााँच नहीं की गई, अततररक्त जााँच क े तनदेश ददए र्थे और इसमलए पवद्वान दंिाधिकारी तक ण पूर्ण पररर्ाम पर पहुाँचने हेतु अततररक्त जााँच क े तनदेश देने में न्यायोधचत र्थे | पररर्ामस्वरूप, उच्च न्यायालय ने कधर्थत याधचका ख़ाररज कर दी | इसमलए, अपीलार्थी- मूल अमभयुक्त इस न्यायालय क े समक्ष आये हैं |

4. श्री मृर्ाल कांतत मंिल, अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त क े पवद्वान अधिवक्ता ने पुरज़ोर रूप से यह कहा क्रक, मामले क े तथ्यों और पररण्स्र्थततयों में, उच्च न्यायालय ने पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा पाररत ददनांक 05.02.2013 क े अधिम जााँच क े आदेश की पुण्टि करते हुए गंभीर गलती की है | 4.[1] अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त क े पवद्वान अधिवक्ता ने पुरज़ोर रूप से कहा क्रक, उच्च न्यायालय ने तथ्य का उधचत मूल्यांकन नहीं क्रकया, अमभयुक्त जि पवद्वान अधिवक्ता द्वारा उम्मोधचत हो गया र्था तो इसक े िाद CrPC की िारा 173(8) क े तहत उनकी अततररक्त जााँच हेतु आदेश पाररत करने की उनकी कोई अधिकाररता नहीं है| 4.[2] अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त की तरफ से उपण्स्र्थत पवद्वान अधिवक्ता ने यह भी कहा क्रक जि अमभयुक्त को पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा ररकॉिण पर आये आरोप पत्र और तथ्यों को पवचार करने क े िाद उम्मोधचत कर ददया जाता है तो इसक े िाद पवद्वान दंिाधिकारी अधिकारहीन हो जाते है और यहााँ तक क्रक CrPC की िारा 173(8) की तहत भी अततररक्त जााँच क े आदेश देने हेतु उनकी कोई अधिकाररता नहीं रहती | 4.[3] अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त की तरफ से उपण्स्र्थत पवद्वान अधिवक्ता ने यह भी कहा क्रक, अमभयुक्त क े िाद पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा अततररक्त जााँच हेतु आदेश पाररत करना CrPC की िारा 167(2) से द्वारा भी रोका गया है | 4.[4] अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त की तरफ से उपण्स्र्थत पवद्वान अधिवक्ता ने यह भी कहा क्रक, उच्च न्यायालय ने पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा अमभयुक्त क े िाद अततररक्त जााँच क े पाररत आदेश की पुण्टि करते हुए अपने आक्षेपपत तनर्णय और आदेश में, उच्च न्यायालय ने, पवद्वान अधिवक्ता द्वारा पूवण-संज्ञान स्तर और उत्तर-संज्ञान स्तर पर शण्क्तयों क े प्रयोग क े िीच में अंतर को उधचत रूप से न ही मूल्यांकन अर्थवा पवचार क्रकया गया है | यह भी कहा गया क्रक, वह शण्क्तयााँ जो दंिाधिकारी को पूवण-संज्ञान स्तर पर उपलब्ि है, उन्हें उत्तर-संज्ञान स्तर पर प्रयोग नहीं क्रकया जा सकता है | 4.[5] अपने उपरोक्त कर्थनों क े समर्थणन में, अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त क े पवद्वान अधिवक्ता ने इस न्यायालय द्वारा Bhagwat Singh v/s Commissioner of Police

े मामले में ददये गए तनर्णयों पर भी अत्यधिक भरोसा क्रकया | अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त क े पवद्वान अधिवक्ता ने इस न्यायालय द्वारा Vinay Tyagi v/s Irshad Ali @ Deepak (2013) 5 SCC 762; Vasanti Dubey v/s State of Madhya Pradesh (2012) 2 SCC 731; Amit Kapoor v/s Ramesh Chander (2012) 9 SCC 460 और Randhir Singh Rana v/s State (Delhi Administration) (1997) 1 SCC 361, क े मामलों में ददए गए तनर्णयों पर भी भरोसा जताया | 4.[6] इस न्यायालय क े उपरोक्त कधर्थत तनर्णयों पर भरोसा करते हुए, अपीलार्थी-मूल अमभयुक्त क े पवद्वान अधिवक्ता ने पुरज़ोर रूप से कहा क्रक, पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा पाररत आदेश और उच्च न्यायालय द्वारा पुटि क्रकया गया यह आदेश, ण्जसमें अमभयुक्त क े िाद अततररक्त जााँच का आदेश ददया गया है, पूर्णत: अनुधचत है | इसमलए, यह प्रार्थणना है क्रक वतणमान अपील को अनुमतत प्रदान की जाये और उच्च न्यायालय द्वारा पाररत आक्षेपपत तनर्णय और आदेश क े सार्थ-सार्थ पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा अततररक्त जााँच हेतु पाररत आदेश को भी अमान्य एवं रद्द क्रकया जाये |

5. राज्य की तरफ से उपण्स्र्थत पवद्वान वररटठ अधिवक्ता सुश्री पवभा दत्ता ने वतणमान अपील का पुरज़ोर रूप से पवरोि क्रकया | प्रत्यर्थी-राज्य क े अधिवक्ता ने कहा क्रक पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा और उच्च न्यायालय द्वारा भी यह सही अवलोकन क्रकया है क्रक, क ु छ आयामों पर कोई जााँच की ही नहीं गई और न ही कोई साक्ष्य एकबत्रत क्रकये गए, जो मामले की तह तक जायेंगे और इसमलए जााँच की प्रक्रिया ण्जस तरह की गई है एवं ण्जस प्रकार से आरोप पत्र दाखिल क्रकया गया र्था उस से असंतुटि हो कर ही जि पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा अततररक्त जााँच हेतु आदेश क्रकया गया, इसी कारर् उसमें उच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप नहीं क्रकया गया, जोक्रक उधचत है| 5.[1] प्रत्यर्थी-राज्य की तरफ से उपण्स्र्थत पवद्वान अधिवक्ता ने आगे यह भी कहा क्रक, इसी तरह, यदद पवद्वान दंिाधिकारी इस तनटकषण में पहुाँचते है क्रक जााँच उधचत नहीं र्थी और/अर्थवा जााँच लापरवाही से की गई है और इसका लाभ अमभयुक्त को जा सकता है, तो वह अततररक्त जााँच हेतु आदेश की शण्क्त रिते है | यह भी कहा गया क्रक दंिाधिकारी को अततररक्त जााँच हेतु आदेश देने की शण्क्त CrPC की िारा 173(8) क े सार्थ-सार्थ इस न्यायालय द्वारा ददए गए तनर्णयों की श्रृंिला, ण्जसमें इस न्यायालय द्वारा Bhagwat Singh (उपयुणक्त) और Reeta Nag (उपयुणक्त) में ददए गए तनर्णय भी सण्म्ममलत है, कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है | यह भी िताया गया क्रक इसमलए, मामले क े तथ्यों और पररण्स्र्थततयों में, पवद्वान दंिाधिकारी अततररक्त जााँच हेतु आदेश देने में न्यायोधचत र्थे | 5.[2] Kishan Lal v/s Dharmendra Bafna (2009) 7 SCC 685 में इस न्यायालय क े तनर्णय पर भरोसा करते हुए प्रत्यर्थी-राज्य क े अधिवक्ता ने िताया क्रक, जैसा क्रक इस न्यायालय द्वारा अवलोक्रकत और तनखर्णत है, दंिाधिकारी जााँच एजेंसी द्वारा ररकॉिण में लाये गए सामिी क े आिार पर संज्ञान ले सकते है| यह भी तनटकषण तनकाला गया क्रक दंिाधिकारी को अततररक्त जााँच हेतु तनदेश देना अनुज्ञेय है | यह भी कहा गया क्रक, जैसा क्रक इस न्यायालय द्वारा भी तनटकषण तनकाला गया है, यह दंिाधिकारी का कतणव्य है क्रक वह देिे क्रक जााँच को उधचत तरीक े से क्रकया जाये| यह भी कहा गया क्रक, यह अवलोकन क्रकया गया है क्रक, अततररक्त जााँच हेतु आदेश, दंि क े संज्ञान लेने क े िाद भी, मामले क े पवमभन्न स्तरों क े सार्थ-सार्थ पवचारर् क े स्तर पर भी ददया जा सकता है | 5.[3] Hemant Dhasmana v/s Central Bureau of Investigation (2001) 7 SCC 536 क े मामले में इस न्यायालय क े तनर्णय पर तनभणर होते हुए यह भी कहा गया क्रक, जि न्याय हेतु पवद्वान दंिाधिकारी अततररक्त जााँच हेतु आदेश पाररत करते है तो, उसमें उच्च न्यायालय द्वारा अपनी पुनरीक्षर् अधिकाररता का प्रयोग करते हुए हस्तक्षेप करने की आवचयकता नहीं है | 5.[4] प्रत्यर्थी-राज्य क े अधिवक्ता ने इस न्यायालय द्वारा Sajjan Kumar v/s Central Bureau of Investigation (2010) 9 SCC 368 में ददए गए तनर्णय पर भी भरोसा जताया | यह भी कहा गया क्रक, आरोप पत्र दायर करने क े िाद भी दंिाधिकारी अमभयुक्त को उपण्स्र्थत होने एवं दंि हेतु पवचारर् करने क े मलए CrPC की िारा 227 एवं 228 क े स्तर पर भी तनदेश देने में सक्षम है | 5.[5] उपरोक्त तनवेदन करते हुए एवं इस न्यायालय द्वारा उपरोक्त तनर्णयों पर तनभणर जताते हुए, वतणमान अपील को ख़ाररज करने हेतु प्रार्थणना की गई |

6. सम्िंधित पक्षों क े अधिवक्ताओं को लम्िे समय तक सुना गया | प्रारंभ में, यह ध्यान देने आवचयक है क्रक, वतणमान अपील में उच्च न्यायालय द्वारा पाररत आदेश को चुनौती दी गई है, ण्जसमें पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा अमभयुक्त क े समय/िाद ददए गए अततररक्त जााँच हेतु आदेश की पुण्टि की गई है | यह ध्यान देना आवचयक है क्रक, वतणमान मामले में, जााँच अधिकारी ने दंिाधिकारी क े समक्ष जााँच पूर्ण करने क े िाद ररपोिण/आरोप-पत्र दायर कर दी र्थी | इसक े िाद, मामला जैसा की CrPC की िारा 227 और 228 क े प्राविानों क े तहत है पवद्वान दंिाधिकारी क े समक्ष आरोप क े तय करने क े स्तर पर र्था | आरोप-पत्र क े सार्थ दायर ररकॉिण तथ्यों पर पवचार क े िाद, पवद्वान दंिाधिकारी ने अमभयुक्त को प्रर्थमतः उम्मोधचत कर ददया र्था | हााँलाक्रक, इसक े सार्थ- सार्थ, अमभयुक्त को उम्मोधचत करते समय, पवद्वान दंिाधिकारी ने अततररक्त जााँच हेतु एवं जााँच अधिकारी को मामले में अततररक्त जााँच करने और ररपोिण दायर करने हेतु आदेश भी पाररत कर ददया र्था | मामले क े पववाद का पवषय आदेश का वह भाग है ण्जसक े द्वारा पवद्वान दंिाधिकारी ने अततररक्त जााँच हेतु आदेश क्रकया र्था | इसमलए, इस न्यायालय क े समक्ष पवचार करने हेतु संक्षक्षप्त प्रचन यह उठता है क्रक, अमभयुक्त क े उम्मोचन हेतु जि पवद्वान दंिाधिकारी आदेश पाररत कर देते है, तो उसक े िाद क्या दंिाधिकारी अततररक्त जााँच और जााँच अधिकारी को ररपोिण दायर करने हेतु आदेश देने क े मलए अनुज्ञेय है या नहीं? 6.[1] उपरोक्त पववाद/मुद्दे पर पवचारर् क े समय, इस न्यायालय क े क ु छ तनर्णय, दंिाधिकारी द्वारा प्रक्रिया पर अनुसरर् करने हेतु लागू होंगे जि जााँच अधिकारी CrPC की िारा 173(2) क े तहत ररपोिण दायर करते है और दंिाधिकारी की शण्क्तयां क्या हैं और/अर्थवा दंिाधिकारी को उस समय क्या पवकल्प उपलब्ि है जि जााँच अधिकारी जााँच पूरी करने क े िाद दंिाधिकारी क े समक्ष ररपोिण/चालान/आरोप-पत्र दायर करते है, को संदमभणत और पवचार करने की आवचयकता हैं| 6.[2] Bhagwant Singh (उपयुणक्त) क े मामले में इस न्यायालय क े चधचणत तनर्णय में ण्जसका लगातार अनुसरर् क्रकया जा रहा है, पवद्वान दंिाधिकारी द्वारा अनुसरर् क्रकये जाने और/अर्थवा पवकल्प जो दंिाधिकारी को उस वक्त उपलब्ि है जि जााँच अधिकारी द्वारा उनक े समक्ष ररपोिण/चालान/आरोप-पत्र दायर क्रकये गये र्थे, को पवचारर् हेतु इस न्यायालय क े पास अवसर र्था| उस तनर्णय में, इस न्यायालय ने Para 4 में तनम्नमलखित दिपडर्ी और तनर्णय ददया:- “4. अि, जि िारा 173(2)(i) क े तहत पुमलस स्िेशन क े प्रभारी अधिकारी द्वारा दंिाधिकारी को पवचारर् हेतु ररपोिण अिेपषत की जाती है, तो दो पवमभन्न ण्स्र्थतत में से एक उत्पन्न हो सकती है | ररपोिण यह तनटकषण दे सकती है क्रक, एक अपराि जो घदित प्रतीत हुआ है उसे पवशेषत: एक व्यण्क्त या व्यण्क्तयों द्वारा क्रकया गया है और ऐसे मामले में, दंिाधिकारी तीन कायों में से एक कायण कर सकते है: (1) वह ररपोिण स्वीकार कर सकते है और अपराि का संज्ञान ले सकते है और समन (Process) जारी कर सकते है अर्थवा (2) वह ररपोिण से असहमत हो सकते है और कायणवाही को रोक सकते है अर्थवा (3) वह िारा 156(3) क े तहत अततररक्त जााँच हेतु और पुमलस को अततररक्त ररपोिण िनाने हेतु तनदेश दे सकते है | दूसरी ओर ररपोिण यह भी हो सकती है क्रक, पुमलस क े मत में, कोई अपराि घदित नहीं हुआ है और जहााँ ऐसे ररपोिण िनी है, दंिाधिकारी पुनः तीन पवकल्पों में से एक पवकल्प को अपना सकते है: (1) वह ररपोिण को स्वीकार कर सकते है और कायणवाही को रोक सकते है या (2) वह ररपोिण से असहमत हो सकते है और इस िात पर ध्यान देते हुए क्रक अततररक्त कायणवाही हेतु पयाणप्त आिार है, अपराि का संज्ञान ले सकते है और समन (Process) जारी कर सकते है या (3) वह िारा 156(3) क े तहत अततररक्त जााँच करने हेतु पुमलस को तनदेश दे सकते है | जहााँ, इन दोनों ण्स्र्थततयों में से क्रकसी भी एक ण्स्र्थतत में, दंिाधिकारी अपराि का संज्ञान लेने और समन (Process) जारी करने हेतु तनर्णय लेते है तो न तो सूचक और न ही घायल अर्थवा मृत्यु की दशा में, मृतक का कोई व्यधर्थत ररचतेदार प्रततक ू ल रूप से प्रभापवत होता है या क्षततिस्त होता है, क्योंक्रक अपराि का संज्ञान दंिाधिकारी द्वारा मलया गया है और यह दंिाधिकारी द्वारा तनखर्णत क्रकया गया है क्रक मामला आगे चले | लेक्रकन यदद, दंिाधिकारी यह तनर्णय लेते है क्रक आगे की कायणवाही करने हेतु कोई पयाणप्त आिार नहीं है और इसमलए कायणवाही समाप्त कर देते है या यह देिते हुए क्रक हााँलाक्रक FIR में िताये गए क ु छ व्यण्क्तयों क े खिलाफ़ कायणवाही, या क े खिलाफ़ कायणवाही नहीं करने हेतु पयाणप्त आिार है, सूचक तनण्चचत रूप से प्रततक ू लत: प्रभापवत होगा क्योंक्रक FIR जो उसक े द्वारा करी गई र्थी, अपने उददेशय में पूर्णतः अर्थवा आंमशक रूप से तनटफल हो जाएगी | इसक े अलावा, जि सूचक क े दहत में उसक े द्वारा दजण की गई FIR पर जो त्वररत और प्रभावी कायणवाही की जा रही है, वह िारा 154(2), िारा 157(2) और िारा 173(2)(ii) क े तहत प्राविानों से स्पटि रूप से है, यह आवचयक रूप से माना जाना चादहए क्रक सूचक को भी यह देिने में समान रूप से रुधच होगी क्रक दंिाधिकारी अपराि का संज्ञान लेते है और समन (Process) जारी करते है, क्योंक्रक यह उसक े द्वारा दजण की गई FIR का परमोत्कषण होगा | इसमलए, कोई संदेह नहीं हो सकता क्रक जि, िारा 173(2)(i) क े प्रभारी अधिकारी द्वारा दी गई ररपोिण पर पवचार करक े, दंिाधिकारी का झुकाव अपराि का संज्ञान लेने और समन (Process) जारी करने में नहीं है, सूचक को सुने जाने का अवसर ममलना ही चादहए ताक्रक वह दंिाधिकारी को अपराि का संज्ञान लेने और समन (Process) जारी करने हेतु मनाने क े मलए अपने कर्थन प्रस्तुत कर सक े | इसमलए, हमारा यह पवचार है क्रक एक मामले में जहााँ दंिाधिकारी क े समक्ष िारा 173(2)(i) क े तहत ररपोिण अिेपषत हुई है और वह अपराि का संज्ञान नहीं लेने और कायणवाही को ित्म करने का तनर्णय लेते है या यह तनर्णय लेते है क्रक FIR में िताये गए क े खिलाफ़ कायणवाही हेतु कोई उधचत आिार नहीं है, दंिाधिकारी को सूचक को ररपोिण पर दिपडर्ी करते समय सुने जाने का अवसर प्रदान करने हेतु उसे नोदिस अवचय रूप से देना चादहए | हमारे समक्ष प्रत्याधर्थणयों की तरफ से जोर देकर कहा गया क्रक यदद ऐसे मामले में सूचक को नोदिस देना आवचयक है तो यह सूचक को नोदिस तामील करने में आयी मुण्चकल क े कारर्, अनावचयक पवलंि का आिार िन जायेंगे | लेक्रकन हमें नहीं लगता क्रक इसे हमारे पवचार क े पवरद्ि एक वैि आपपत्त क े रूप में माना जाना चादहए, क्योंक्रक क्रकसी भी मामले में FIR पर की गई पुमलस द्वारा कायणवाही को सूचक को प्रेपषत करना ही पड़ता है और िारा 173(2)(i) क े तहत ररपोिण की एक प्रततमलपप उसे देनी ही होती है और अगर यदद ऐसा है, तो, हमें कोई कारर् नहीं ददिता है क्रक सूचक को ररपोिण की दिपडर्ी हेतु नोदिस तामील करने में कोई मुण्चकल होगी | इसक े अलावा, क्रकसी भी ण्स्र्थतत में, दंिाधिकारी द्वारा जि ररपोिण पर दिपडर्ी की जा रही है उस वक्त सूचक को नोदिस की तामील में आयी मुण्चकल क े कारर् सूचक को सुनने क े अवसर से वंधचत रिने में संभवतः कोई न्यायोधचत आिार प्रदान नहीं कर सकते है |” 6.[3] Vinay Tyagi (उपयुणक्त) क े मामले में, इस न्यायालय द्वारा ददए गए तनर्णयों की श्रृंिला समेत, इस न्यायालय द्वारा Bhagwant Singh (उपयुणक्त) और Reeta Nag (उपयुणक्त) क े मामलों में ददए गए तनर्णयों पर पवचारर् क े िाद, यह न्यायालय para 40 में अंततः तनम्नमलखित तनटकषण तनकालती है: “40. सदहंता क े प्राविानों और उपरोक्त िताये गए पवमभन्न तनर्णयों का पवचलेषर् करते हुए, हम, सदहंता की िारा 173(2) सहपदठत िारा 173(8) और िारा 156(3) क े तहत दंिाधिकारी की शण्क्तयों क े संदभण में तनम्नमलखित तनटकषण तनकालते है: 40.[1] पुमलस ररपोिण क े आिार पर शुरू क्रकये गए मामले में दंिाधिकारी को “पुनः जााँच” अर्थवा “नई जााँच” (शुरुआत से) क े आदेश देने की शण्क्त नहीं है | 40.[2] सदहंता की िारा 173(6) क े तहत पुमलस ररपोिण दायर करने क े िाद दंिाधिकारी क े पास “अततररक्त जााँच” हेतु आदेश देने की शण्क्त है | 40.[3] उपरोक्त उप-पैरा 40.[2] में व्यक्त क्रकये गए पवचार, Bhagwant Singh [Bhagwant Singh v/s Commissioner of Police, (1985) 2 SCC 537: 1985 SCC (Cri) 267] क े मामले में तीन न्यायािीशों वाली पीठ द्वारा िताये गए पवधि क े मसद्िांत क े अनुरूप है और इस प्रकार से यह पूवण तनर्णय क े मसद्िांत क े भी अनुरूप है | 40.[4] न तो सदहंता की योजना और न ही क्रकसी पवमशटि प्राविान क े तहत दंिाधिकारी द्वारा ऐसी अधिकाररता िाधित है | िारा 173(2) की भाषा का, दंिाधिकारी को पवशेषतः िारा 156(3) और िारा 173(8) क े तहत ऐसी शण्क्तयों से वंधचत करने हेतु, ऐसा प्रततिंिात्मक आशय नहीं लगाया जा सकता है | वास्तव में, ऐसी शण्क्त को िारा 173(8) की भाषा में पढ़ा जा सकता है | 40.[5] संदहता एक प्रक्रियात्मक दस्तावेज है, इसमलए, इसे ऐसा तनमाणर् प्राप्त करना चादहए जो न्याय और पविायी क े लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु सहायक िने | यह कोई कारर् नहीं है क्रक पुमलस को ररपोिण दायर करने क े िाद भी अततररक्त जााँच करने हेतु पविानसभा शण्क्त प्रदान करती है, लेक्रकन न्यायालय की शण्क्त को इस सीमा तक कम करने का इरादा रिती है क्रक जहााँ मामले क े तथ्यों और न्याय क े अमभप्राय की मांग है, वहां न्यायालय जााँच एजेंसी को अततररक्त जााँच हेतु जो वह अपने आप कर सकती है को करने का आदेश नहीं दे सकती है | 40.[6] यह औधचत्य की प्रक्रिया रही है क्रक पुमलस को “अततररक्त जााँच” जारी रिने और पूरक आरोप-पत्र दायर करने हेतु न्यायालय की अनुमतत लेनी पड़ती है | इस दृण्टिकोर् को इस न्यायालय क े कई तनर्णयों में भी अनुमोददत क्रकया गया हैं | यह, इस तरह, इस पवचार को समर्थणन करेगा, जो हम प्रस्तुत मामले में ले रहे हैं|” 6.[4] Minu Kumari v/s State of Bihar (2000) 4 SCC 359, क े मामले में इस न्यायालय ने देिा क्रक, जि दंिाधिकारी क े समक्ष पुमलस िारा 173(2)(i) क े तहत ररपोिण पेश करती है तो कई पररण्स्र्थततयााँ उत्पन्न होती है | ररपोिण यह तनटकषण तनकाल सकती है क्रक जो अपराि हुआ है, उसे क्रकसी पवशेष व्यण्क्त अर्थवा व्यण्क्तयों ने क्रकया है, और ऐसे मामले में, दंिाधिकारी या तो (1) ररपोिण को स्वीकार कर लेंगे और अपराि का संज्ञान ले सकते है और समन (process) जारी कर सकते है, या (2) ररपोिण से असहमत हो सकते है और कायणवादहयों को ख़त्म कर सकते है, या (3) िारा 156(3) क े तहत अततररक्त जााँच हेतु और पुमलस को अततररक्त ररपोिण िनाने हेतु आदेश दे सकते है|

7. उपरोक्त तनर्णयों में इस न्यायालय द्वारा स्र्थापपत कानूनों का पवचारर् करते हुए और CrPC की िाराओं 167(2), 173, 227, और 228 में आवचयक प्राविानों पर भी पवचार करते हुए, यह स्पटि होता है क्रक जााँच ित्म होने क े िाद और CrPC की िारा 173(2)(i) क े तहत पुमलस द्वारा दंिाधिकारी को ररपोिण अिेपषत करने क े िाद, पवद्वान दंिाधिकारी या तो (1) ररपोिण को स्वीकार कर सकते है और अपराि का संज्ञान लेते हुए समन (process) जारी कर सकते है, या (2) ररपोिण से असहमत हो सकते है और कायणवादहयों को ख़त्म कर सकते है, या (3) िारा 156(3) क े तहत अततररक्त जााँच हेतु और पुमलस को अततररक्त ररपोिण िनाने हेतु आदेश दे सकते है| यदद दंिाधिकारी ररपोिण से असहमत है और कायणवादहयों को ित्म करते है, तो सूचक को आपपत्त आवेदन देने हेतु एक अवसर ददया जाना चादहए और इसक े िाद, सूचक को अवसर देने क े िाद, दंिाधिकारी आगे तनर्णय ले सकते है क्रक, अमभयुक्त क े खिलाफ़ कायणवादहयों को ित्म करना है अर्थवा नहीं| यदद दंिाधिकारी आपपत्तयों को स्वीकार करते है, उस ण्स्र्थतत में, वह समन जारी कर सकते है और/अर्थवा अमभयुक्त क े खिलाफ़ आरोप भी तय कर सकते है | जैसा की उपरोक्त पवचलेषर् क्रकया गया है, CrPC की िारा 173(2)(i) क े तहत पुमलस द्वारा अिेपषत ररपोिण पर पवचारर् क े िाद जााँच से संतुटि न होते हुए, दंिाधिकारी चाहे तो क्रकसी भी स्तर पर अततररक्त जााँच और पुमलस को अततररक्त ररपोिण िनाने हेतु तनदेश दे सकते है | हााँलाक्रक, यह ध्यान देने योग्य है क्रक उपरोक्त सभी कायो को पूवण- संज्ञान स्तर पर ही क्रकया जाना चादहए | एक िार जि दंिाधिकारी संज्ञान ले लेते है और, CrPC की िारा 173(2)(i) क े तहत पुमलस द्वारा अिेपषत ररपोिण क े सार्थ दायर ररकॉिण सामिी पर पवचार करते हुए, दंिाधिकारी CrPC की िारा 227 क े तहत शण्क्तयों का प्रयोग करते हुए अमभयुक्त को उम्मोधचत कर देते है तो इसक े िाद, यह दंिाधिकारी क े मलए अनुज्ञेय नहीं है क्रक वह अततररक्त जााँच हेतु आदेश और जााँच अधिकारी को ररपोिण दायर करने हेतु तनदेश, स्वप्रेरर्ा से दे | अमभयुक्त क े िाद ददया गया ऐसा आदेश, उत्तर-संज्ञान स्तर पर ही माना जायेगा | पूवण-संज्ञान स्तर और उत्तर-संज्ञान स्तर एवं दंिाधिकारी द्वारा पूवण-संज्ञान स्तर और उत्तर-संज्ञान स्तर पर अततररक्त जााँच हेतु आदेश देने में शण्क्तयों क े प्रयोग क े िीच में पवभेद और/अर्थवा अंतर है | पूवण-संज्ञान स्तर पर दंिाधिकारी को उपलब्ि अततररक्त जााँच हेतु आदेश की शण्क्त, उत्तर-संज्ञान स्तर पर दंिाधिकारी को नहीं ममल सकती, पवशेषतः जि उसक े द्वारा अमभयुक्त को उम्मोधचत क्रकया गया है | जैसा की उपरोक्त पवचलेषर् क्रकया गया है क्रक, यदद दंिाधिकारी जााँच अधिकारी द्वारा की गई जााँच और CrPC की िारा 173(2)(i) क े तहत दायर ररपोिण से संतुटि नहीं है, जैसा की इस न्यायालय द्वारा तनर्णयों की श्रृंिला में देिा गया और जैसा की उपरोक्त पवचारर् क्रकया गया है, यह दंिाधिकारी क े मलए हमेशा अनुज्ञेय है क्रक वह अततररक्त जााँच हेतु जााँच एजेंसी को तनदेश दे सकते है और आरोप तय करने और/अर्थवा उस स्तर पर ररपोिण पर कोई भी अंततम तनर्णय सुनाने को भी स्र्थधगत कर सकते है | हााँलाक्रक, दंिाधिकारी जि एक िार, ररपोिण और ररपोिण क े सार्थ दायर सामिी क े आिार पर, अमभयुक्त को उम्मोधचत करते है, हमें भय है क्रक, इसक े िाद दंिाधिकारी स्वप्रेरर्ा से जााँच एजेंसी को अततररक्त जााँच क े मलए आदेश कर सकते है | उम्मोचन का आदेश जि एक िार पाररत हो जाता है, इसक े िाद दंिाधिकारी की कोई अधिकाररता नहीं रहती क्रक वह स्वप्रेरर्ा से अततररक्त जााँच और ररपोिण को दायर करने हेतु जााँच अधिकारी को तनदेश दे | ऐसी पररण्स्र्थतत में, क े वल दो उपचार उपलब्ि हैं: (i) उम्मोचन क े पवरुद्ि एक पुनरीक्षर् आवेदन दायर क्रकया जा सकता है अर्थवा (ii) न्यायालय CrPC की िारा 319 क े स्तर आने तक प्रतीक्षा करे | हााँलाक्रक, इसी समय, CrPC की िारा 173(8) क े प्राविानों को ध्यान में रिते हुए, यह जााँच एजेंसी क े मलए अनुज्ञेय है क्रक वह अततररक्त जााँच हेतु आवेदन पत्र दायर करे और इसक े िाद नई ररपोिण दायर करे और न्यायालय, जााँच एजेंसी द्वारा दायर आवेदन पत्र पर अततररक्त जााँच की अनुमतत दे सकता है और जााँच अधिकारी को नई ररपोिण दायर करने की अनुमतत दे सकता है और इसी को दंिाधिकारी द्वारा पवधि क े अनुसार पवचारर् क्रकया जा सकता है| दंिाधिकारी CrPC की िारा 173(8) क े तहत अततररक्त जााँच अर्थवा मामले क े उत्तर- संज्ञान स्तर पर पुनः जााँच हेतु स्वप्रेरर्ा से तनदेश नहीं दे सकते है, पवशेषत: ति, जि दंिाधिकारी ने CrPC की िारा 227 क े तहत शण्क्तयों का प्रयोग करते हुए अमभयुक्त को उम्मोधचत कर ददया है | हााँलाक्रक, CrPC की िारा 173(8) क े प्रभारी अधिकारी को अततररक्त जााँच और साक्ष्य, मौखिक या दस्तावेज, को CrPC की िारा 173(2) क े तहत ररपोिण अिेपषत करने क े िाद, दायर करने हेतु शण्क्त प्रदान करती है | इसमलए, यह जााँच अधचकारी को अनुज्ञेय है क्रक वह CrPC की िारा 173(2) क े तहत ररपोिण अिेपषत करने क े िाद भी और अमभयुक्त क े िाद भी, अततररक्त जााँच हेतु आवेदन कर सक े | हााँलाक्रक, उपरोक्त, जााँच अधिकारी/प्रभारी पुमलस अधिकारी क े कहने पर ही होगा और दंिाधिकारी की कोई अधिकाररता नहीं होगी क्रक जि जााँच हेतु आदेश पाररत कर सक े | 7.[1] प्रस्तुत मामले में, जााँच प्राधिकारी ने अततररक्त जााँच हेतु आवेदन नहीं क्रकया और दंिाधिकारी ने अततररक्त जााँच हेतु स्वप्रेरर्ा से आदेश पाररत क्रकया और अततररक्त जााँच करने क े मलए जााँच अधिकारी को और ररपोिण को दायर करने हेतु स्वप्रेरर्ा से तनदेश ददया, जो पवधि क े अनुसार अनुधचत है| यह कायण दंिाधिकारी की अधिकाररता से परे है| इसमलए, दंिाधिकारी द्वारा पाररत आदेश का वह भाग ण्जसमे उन्होंने अमभयुक्त क े उम्मोचन क े िाद अततररक्त जााँच का आदेश पाररत क्रकया र्था, संिारर् नहीं क्रकया जा सकता है और इसे ख़ाररज एवं आपस्त क्रकया जाने योग्य है | पररर्ामस्वरुप, उच्च न्यायालय द्वारा पाररत आक्षेपपत तनर्णय एवं आदेश जो दंिाधिकारी क े आदेश की पुण्टि करता है, को भी ख़ाररज एवं आपस्त क्रकया जाता है | इसी समय, यह जााँच अधिकारी क े मलए अनुज्ञेय है क्रक वह िारा 173(8) की शण्क्तयों का प्रयोग करते हुए अततररक्त जााँच हेतु एक उधचत आवेदन दायर करे और क्रफर अततररक्त जााँच करते हुए एक अततररक्त ररपोिण दायर करे |

8. उपरोक्तानुसार और उपरोक्त में पवददत कारर्ों क े मद्देनजर, वतणमान अपील स्वीकार की जाती है| ददनाक ं 20.08.2014 क े आक्षेपपत तनर्णय एवं आदेश क े सार्थ-सार्थ ददनाक ं 05.02.2013 को दंिाधिकारी द्वारा पाररत आदेश क े उस भाग ण्जसमे उन्होंने जााँच अधिकारी को अततररक्त जााँच और ररपोिण दायर करने हेतु तनदेश ददया है, को एतद्द्वारा ख़ाररज एवं आपस्त क्रकया जाता है| 8.[1] हााँलाक्रक, दंिाधिकारी द्वारा क्रकये गए पवचलेषर् और दंिाधिकारी द्वारा जााँच में कमी की तरफ इशारे पर पवचारर् करते हुए और असली दोषी पर आरोप तय करना और/अर्थवा सजा देने क े अंततम लक्ष्य क े पवचारर् हेतु, यह जााँच अधिकारी क े मलए अनुज्ञेय होगा क्रक वह दंिाधिकारी क े समक्ष अततररक्त जााँच और नई जााँच करने हेतु एक उधचत आवेदन दे और CrPC की िारा 173(8) क े तहत शण्क्तयों का प्रयोग करते हुए अततररक्त ररपोिण दायर करे और इसक े िाद दंिाधिकारी इस पर कानून क े अनुसार और इसक े अपने गुर्ागुर् क े आिार पर पवचलेषर् करें |

9. वतणमान अपील उपरोक्त दिप्पखर्यों क े सार्थ स्वीकृ त की जाती है और उपरोक्त अनुसार, जााँच अधिकारी क े पक्ष में अधिकार स्वातंत्रय है | एल. नागेचवर राव, न्यायािीश एम. आर. शाह, न्यायािीश नई ददल्ली: 16 अप्रैल, 2019 अस्वीकरर्: देशी भाषा में तनर्णय का अनुवाद मुकद्द्मेिाज़ क े मसममत प्रयोग हेतु क्रकया गया हैं ताक्रक, वो अपनी भाषा में इसे समझ सक े एवं यह क्रकसी अन्य प्रयोजन हेतु प्रयोग नहीं क्रकया जायगा | समस्त कायाणलयी एवं व्यावहाररक प्रयोजनों हेतु तनर्णय का अंिेज़ी स्वरूप ही अमभप्रमाखर्त माना जाएगा और कायाणन्वयन तर्था लागू क्रकए जाने हेतु उसे ही वरीयता दी जाएगी |