Bihari Lal v. Rajasthan State and Others

Supreme Court of India · 15 Apr 2019
Abhay Manohar Sapre; Dinesh Maheshwari
Criminal Appeal No 676 of 2019 @ SLP (Criminal) No 8823 of 2018
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that accused cannot be acquitted at the charge framing stage under Section 307 IPC if a prima facie case is made out by prosecution evidence, and remanded the matter for framing charges and trial.

Full Text
Translation output
प्रतिवेद्य
भारत का उच्चतम न्यायालय
आपराधिक अपील क्षेत्राधिकारिता
आपराधिक अपील क्रमांक 676/2019
[विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) क्र. 8823/2018 से उत्पन्न]
बिहारी लाल ... अपीलार्थी
बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य ...प्रत्यर्थीगण
निर्णय
न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे
JUDGMENT

1. अनुमति प्रदान की गयी।

2. यह अपील राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर बेंच द्वारा आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संख्या (एकल पीठ) 708/2018 में पारित अंतिम निर्णय और आदेश दिनांक 12.09.2018 क े विरुद्ध प्रस्तुत की गयी है जिसमे उच्च न्यायालय की एकल बेंच ने अपीलार्थी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, भद्रा, जिला हनुमानगढ़, द्वारा सत्रवाद संख्या 40 /2017 में पारित आदेश दिनांकित 02.06.2018 की पुष्टि की।

3. इस अपील क े निपटान क े लिए क ु छ निम्न तथ्यों क े उल्लेख की जरूरत है, जो संक्षिप्त बिंदुओं में हैं।

4. प्रत्यर्थी (आरोपी) सं.2, 3 और 4 को धारा 307, 323, 325 336, और 341 सपठित धारा 34 भारतीय दंड संहिता, 1860 (ऐतमिनपश्चात्त "भा.दं.सं" कहा जायेगा) क े अंतर्गत दंडनीय अपराध कारित करने लिए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, भद्रा, जिला हनुमानगढ़ की कोर्ट में अभियोजित किया गया है।

5. प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि उनक े विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत कोई अपराध नहीं बनता, इसलिए उनक े विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत कोई आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए। इस बिंदु पर अभियोजन पक्ष द्वारा अपने वाद क े समर्थन में प्रस्तुत दो चिकित्सा प्रतिवेदन और आरोप पत्र का सन्दर्भ लेते हुए और विश्वास प्रकट करते हुए प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 द्वारा तर्क प्रस्तुत किया गया।

6. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े तर्क को स्वीकार करते हुए तदनुसार अपने आदेश दिनांकित 02.06.2018 द्वारा उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत दंडनीय अपराध कारित करने क े आरोप से मुक्त कर उपरोक्त अन्य अपराधों क े लिए आरोप विरचित किये गए। अन्य शब्दों में, जहाँ तक भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत दंडनीय अपराध का सम्बन्ध है तो अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश का मत था कि प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े विरुद्ध कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता।

7. व्यथित होकर अपीलार्थी (शिकायतकर्ता) ने उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने आलोच्य आदेश द्वारा आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया जिस कारण अपीलार्थी (शिकायतकर्ता) ने इस न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका क े रूप में अपील दायर की।

8. इस अपील में विचारण क े लिए जो संक्षिप्त प्रश्न उत्पन्न होता है वो यह है कि क्या दोनों अवर न्यायालय द्वारा प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 को, जहाँ तक भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत दंडनीय अपराध का सम्बन्ध है, से मुक्त कर देना न्यायोचित था।

9. अपीलार्थी क े विद्वान अधिवक्ता श्री एच.डी. थानवी और प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े विद्वान अधिवक्ता श्री समर विजय सिंह और प्रत्यर्थी (राज्य) सं.[1] की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री अनीश माहेश्वरी को सुना। 10.पक्षकारों क े विद्वान अधिवक्ताओं को सुनने और वाद क े अभिलेखों का अवलोकन करने क े बाद हम इस अपील को अनुमति प्रदान करने और आलोच्य आदेश को निरस्त करने क े लिए बाध्य हैं। 11.हमारे सुविचारित मतानुसार, दोनों अवर न्यायालय ने प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत दंडनीय अपराध से आरोपमुक्त करक े भूल की है। दू सरे शब्दों में, दोनों निचली अदालतों ने ये अवधारित करने में भूल की है कि प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है, अतः भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत अभियोजित करने क े लिए कोई आरोप विरचित नहीं किया जा सकता। 12.वास्तव में, जिस प्रकार दोनों निचली अदालतों ने प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े आरोप से मुक्त किया है और यह अवधारित किया है कि उनक े विरुद्ध कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता, त्रुटिपूर्ण और अस्वीकार्य है। 13.हमारे विचार में, दोनों निचली अदालतों ने दोनों चिकित्सा प्रतिवेदनों का गलत प्रकार से मूल्यांकन किया है, उसमें त्रुटि और विसंगतियां पाते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जहाँ तक भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत दंडनीय अपराध का सम्बन्ध है तो प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े विरुद्ध कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता। 14.दोनों चिकित्सा प्रतिवेदनों में त्रुटि या/और विसंगतियाँ खोजने की दृष्टि से साक्ष्य का मूल्यांकन करने की अवस्था क े वल तब उत्पन्न होगी जब अभियोजन साक्ष्य का परीक्षण डॉक्टर द्वारा चिकित्सा प्रतिवेदन क े समर्थन में कराती है। वह अवस्था इस मामले में अभी आनी बाक़ी है। 15.अभियोजन द्वारा प्रस्तुत चिकित्सा प्रतिवेदन क े अवलोकन मात्र से प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत दंडनीय अपराध का प्रथम दृष्टया मामला दर्शित होता है। इसलिए प्रतियार्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े विरुद्ध अन्य आरोपों क े साथ साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क आरोप भी विरचित किया जाना चाहिए था। 16.पूर्ववर्ती चर्चा क े आलोक में अपील सफल होती है और तदनुसार स्वीकार की जाती है। आलोच्य आदेश को अपास्त किया जाता है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जिनक े पास परीक्षण लंबित है, को निर्देशित किया जाता है कि वह प्रत्यर्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 क े विरुद्ध वाद में भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत दंडनीय अपराध का आरोप विरचित करें। 17.यधपि हम यह स्पष्ट कर देते हैं कि प्रतियार्थी (आरोपी) सं. 2 से 4 साक्ष्य प्रस्तुत करने क े पश्चात् तर्क करने क े अधिकारी होंगे कि उनक े विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 307 क े अंतर्गत दंडनीय अपराध का कोई मामला नहीं बनता और न्यायालय अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य को गुणावगुण क े आधार पर दृढ़ता से विधि सम्मत इस न्यायालय द्वारा किये गए अवलोकन से प्रभावित हुए बिना मामले का न्याय निर्णय करेगी। न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी नई दिल्ली, अप्रैल 15, 2019