Raj Narayan v. Union of India & Ors.

Supreme Court of India · 01 Apr 2019 · 2019 INSC 442
L. Nageswara Rao; M. R. Shah
Civil Appeal No. 3339 of 2019
2019 INSC 442
labor appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that an employee acquitted in criminal proceedings initiated by the employer is entitled to full back wages for the entire suspension period and reinstatement with all consequential benefits.

Full Text
Translation output
अप्रति वेद्य
भार ीय सव च्च न्यायालय
दीवानी अपीलीय अति कारिर ा
सिसविवल अपील सं. 3339 वर्ष 2019
( विव.अ. या. (सिसविवल) सं. 100 वर्ष 2016 से उद्भू )
राज नारायन ...... अपीलार्थी, बनाम
भार संघ एवं अन्य ........प्रत्यर्थी,गण
विनणय
न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव
अनुमति प्रदान की गई ।
JUDGMENT

1. रेलवे मेल सर्विवस (RMS)) में सॉर्टिंAग असिसस्AेंA क े रूप में मुगल सराय में काय कर रहे अपीलार्थी, को उच्च मूल्य क े मनी ऑर्डर क े जाली भुग ान में संलिलप्त ा क े आरोप पर अनुशासनात्मक कायवाही क े चल े 23.10.1979 को विनलम्बिPब विकया गया र्थीा । अपीलार्थी, क े विवरूद्ध मुगलसराय र्थीाने में एफ. आई. आर. दज की गई र्थीी और भा.दं.सं की ारा 409/420 क े अन् ग ् अपरा सं. 358 वर्ष 1979 क े रूप में मामला पंजीक ृ विकया गया र्थीा । विनलPबन आदेश 21.10.1987 को रद्द विकया गया सिजसक े आ ार पर उसने कायभार ग्रहण विकया और 28.02.1997 क काय विकया जब उसे भा.दं.सं की ारा 409,467 और 420 क े अन् ग ् दोर्ष सिसद्ध होने क े कारण सेवाओं से बर्खाास् कर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 2019 INSC 442 विदया गया । उसे ीन वर्ष क ै द की सजा सुनाई गयी । अपीलार्थी, ने उसक े बाद अपनी दोर्षसिसतिद्ध क े विवरुद्ध अपील दायर की । अपीलार्थी, क े द्वारा दायर आपराति क अपील स्वीक ृ की गयी और उसे भा.दं.सं की ारा 409, 420 और 467 क े अन् ग अपरा ों क े आरोप से दोर्षमुक्त कर विदया गया ।

2. दोर्षमुक्त होने क े बाद अपीलार्थी, की बहाली की प्रार्थीना को13.06.2002 को अस्वीक ृ कर विदया गया । मेमों विदनांविक 13.06.2002 में यह उल्लेर्खा विकया गया, विक अपीलार्थी, को इसलिलए बहाल विकया जा सका क्योंविक वह छः वर्ष से अति क समय से पहले ही बर्खाास् कर विदया गया र्थीा । (?) 28.02.1997 विदनांविक बर्खाास् गी और 13.06.2002 विदनांविक बहाली क े आदेश को अस्वीक ृ करने संबं ी आदेश को अपीलार्थी, द्वारा न्यायाति करण क े समक्ष चुनौ ी दी गयी । न्यायाति करण ने मूल आवेदन को स्वीक ृ विकया और अपीलार्थी, की बहाली का विनदlश यह कह कर विदया, विक वह वरिरष्ठ ा और Notional Fixation of Pay सार्थी ही बर्खाास् गी की ति थिर्थी से बहाली की ति थिर्थी क बढ़ोत्तरिरयों का हकदार होगा । लेविकन न्यायाति करण ने यह माना विक अपीलार्थी, उस अवति क े लिलए, जब वह सेवा में नहीं र्थीा, विपछले वे न का हकदार नहीं होगा । न्यायाति करण क े आदेश क े आ ार पर अपीलार्थी, को 20.01.2003 को बहाल कर विदया गया। 01.05.2003 विदनांविक आदेश द्वारा आर.एम.एस. इलाहाबाद क े वरिरष्ठ अ ीक्षक ने अपीलार्थी, क े विनलPबन अवति अर्थीा ् 30.10.1979 से 11.11.1987 की अवति क े लिलए पूण वे न और भत्तों संबं ी अपीलार्थी, क े प्रति विनति त्व को नकार विदया । अपीलार्थी, द्वारा न्यायाति करण क े आदेश क े विवरूद्ध दायर रिरA यातिचका सिजसमें उसे विपछला वे न न देने की बा की गई र्थीी, उच्च न्यायालय द्वारा अंश ः स्वीकार कर ली गयी । उच्च न्यायालय ने यह अव ारिर विकया की अपीलार्थी, अपनी दोर्षमुविक्त की ति थिर्थी 31.08.2001 से बहाली की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds ति थिर्थी 20.01.2003 क की अवति में पूरे विपछले वे न का हकदार होगा। अपीलार्थी, ने हमारे समक्ष उच्च न्यायालय क े उस विनणय की वै ाविनक ा और वै ा को चुनौ ी दी है सिजसक े द्वारा विपछले वे न का भुग ान उसकी दोर्षमुविक्त की ति थिर्थी से बहाली की ति थिर्थी क की अवति क े लिलए सीविम कर विदया गया र्थीा ।

3. याची क े विवद्वान अति वक्ता ने इस न्यायालय द्वारा रणछोड़ जी च ुज, ठाक ु र बनाम गुजरा विवद्यु बोर्ड अथिभयं ा अ ीक्षक एवं अन्य (1996 (11) S)CC 603) और भार संघ एवं अन्य बनाम जयपाल सिंसह (2004 (1) S)CC 121) क े आ ार पर यह प्रति वाद विकया गया है, विक उस म्बिस्र्थीति में जब आपराति क कायवाही विनयोक्ता की और से प्रारPभ की गई हो, और कमचारी दोर्षमुक्त हो जा ा है वह आपराति क कायवाविहयों क े विवलPबन क े दौरान कायभार से बाहर रर्खाे गये अवति क े लिलए पूण वे न का हकदार होगा, उन्होंने यह भी कहा, विक अपीलार्थी, 1979 से 1987 की अवति क े लिलए पूण वे न का हकदार है । उन्होंने कहा, विक अपीलार्थी, ने उच्च न्यायालय में उक्त अनु ोर्ष पाने क े लिलए अन् रव, आवेदन दालिर्खाल विकया है ।

4. विवद्वान अति रिरक्त महाति वक्ता ने क विदया है, विक अपीलार्थी, विपछले वे न का हकदार नहीं है, उन्होंने कहा है, विक विनयोक्ता की ओर से और पुलिलस की ओर से प्रारPभ विकए गए आपराति क मामलों में कोई अन् र नहीं हो ा है । उन्होंने यह भी कहा, विक अपीलार्थी, 1979 से 1987 क क े सPपूण विपछले वे न क े भुग ान का अनु ोर्ष पाने का हकदार नहीं है । क्योंविक अपीलार्थी, उत्तर द्वारा दालिर्खाल आई. ए. का उच्च न्यायालय क े आक्षेविप आदेश में उल्लेर्खा नहीं है ।

5. रणछोड़ जी च ुज, ठाक ु र (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय ने कमचारी क े एक मामले पर विवचार विकया, सिजसने भा.दं.सं. की ारा 302 क े अन् ग ् अपरा में संलिलप्त ा क े आपराति क मामले क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विवलPबन क े दौरान सेवा से बाहर रर्खाे गये अवति क े लिलए विपछले वे न की माँग की र्थीी । याची का दावा यह र्थीा, विक आपराति क न्यायालय द्वारा दोर्षमुक्त विकए जाने पर उसे पूरा वे न पाने का अति कार है । न्यायालय ने उक्त कर्थीन को यह कह े हुए अस्वीकार कर विदया, विक विपछले वे न क े भुग ान का प्रश्न विवभागीय जाँच क े आ ार पर प्राप्त विनष्कर्ष… क े अंविक होने क े कारण सेवा की बर्खाास् गी क े मामले में ही उठेगा । बर्खाास् गी आदेश को न्यायालय द्वारा अपास् कर विदए जाने की म्बिस्र्थीति में अनुपम्बिस्र्थी रहा कमचारी विपछले वे न का दावा करने का हकदार होगा, क्योंविक उसे गैर-कानूनी रीक े से विनयोक्ता द्वारा सेवा से दूर रर्खाा गया । न्यायालय का यह म र्थीा, विक एक ऐसे कमचारी का मामला जो विवभागीय जाँच का सामना कर रहा हो ऐसे कमचारी क े मामले से अलग होगा, सिजसक े विवरुद्ध आपराति क कायवाही आरPभ की गयी हो । अपरा में लिलप्त कमचारी ने जेल में बंद होने क े कारण, स्वंय को सेवाएं देने में अक्षम बना लिलया है । अपीलीय न्यायालय द्वारा अनुव, दोर्षमुविक्त उसे विपछले वे न का दावा करने का हकदार नहीं बनाएगा ।

6. रणछोड़ जी च ुज, ठाक ु र (उपरोक्त) क े बाद भार संघ एवं अन्य बनाम जयपाल सिंसह (उपरोक्त) क े विनणय में भी इस न्यायालय ने ऐसे कमचारी को विपछले वे न का भुग ान अस्वीक ृ कर विदया, जो शुरू में. भा.दं.सं. की ारा 302 सपविठ ारा 34 क े अन् ग ् दोर्षसिसद्ध हुआ र्थीा और बाद में आपराति क अपील में उच्च न्यायालय द्वारा दोर्षमुक्त कर विदया गया । उस मामले में याची को अनु ोर्ष देने से इन्कार कर े हुए न्यायालय ने ारिर विकया, विक अनुव, दोर्षमुविक्त विकसी कमचारी को विपछले वे न की माँग का हकदार नहीं बना ी । हालांविक, न्यायालय का म र्थीा, विक यविद अथिभयोजन की शुरुआ विवभाग द्वारा की जाए और कमचारी दोर्षमुक्त हो ा है, ो थिभन्न प्रकार की समीचीन बा ें होंगी । अपीलार्थी, क े विवद्व अति वक्ता ने कमचारी की आपराति क मामले में Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds संलिलप्त ा क े लिलए पुलिलस द्वारा आरंभ विकए गए अथिभयोजन और विनयोक्ता की ओर से आरंभ की गई आपराति क कायवाविहयों क े बीच अं र करने का प्रयास विकया । भार संघ एवं अन्य बनाम जयपाल सिंसह (उपरोक्त) क े मामले में की गई समुविक्त इस रीक े से समझी जानी चाविहए, विक, ऐसे विनष्कर्ष विक म्बिस्र्थीति में विक आपराति क कायवाही आरंभ विकया जाना दोर्षपूण र्थीा या दुराशयपूण र्थीा, विवभाग विपछले वे न क े लिलए उत्तरदायी होगा । अन्य सभी मामलों में हमें, विवभाग द्वारा आपराति क कायवाही आरंभ विकए जाने और पुलिलस द्वारा आपराति क मामला दज विकए जाने क े बीच, कोई अन् र नहीं विदर्खा ा, उदाहरण क े लिलए यविद कमचारी विनति यों क े गबन में संलिलप्त है या घूँस मांगने या लेने में लिलप्त पाया जा ा है, विनयोक्ता पर, ऐसे व्यविक्त का आपराति क न्यायालय द्वारा दोर्षमुक्त विकए जाने पर, विपछला वे न देने का हरजाना नहीं लगाया जा सक ा । जब क यह न पाया जाय विक अथिभयोजन दोर्षपूण र्थीा।

7. सिजस विबन्दु पर विवचार विकया जाना है वह यह है, विक क्या अपीलार्थी, 1979 से 1987 क े बीच पूरे वे न का हकदार है, अपीलार्थी, को 23.10.1979 को विनलंविब विकया गया र्थीा और 21.10.1987 को उसका विनलंबन वापस ले लिलया गया । इस अं राल में एक ऐसी घAना हुई सिजससे अनुशासनात्मक कायवाही 21.03.1983 को बंद कर दी गयी । रिरकार्ड से यह स्पष्ट है, विक अपीलार्थी, ही आपराति क मामले क े विवलंबन क े दृविष्टग ् विवभागीय जाँच को मुल वी करवाना चाह ा र्थीा । विनलंबन का आदेश अनुशासनात्मक कायवाविहयों क े आ ार पर र्थीा । अनुशासनात्मक कायवाही बंद हो जाने क े आ ार पर अपीलार्थी, विनलंबन की ति थिर्थी से विवभागीय जाँच बंद होने की ति थिर्थी क की अवति क े लिलए पूरा वे न का दावा करने का हकदार हो गया । त्पश्चा ् प्रत्यर्थी,गण ने उसका विनलंबन रद्द कर उसे बहाल करने में चार वर्ष का समय लिलया । 23.10.1979 विदनांविक विनलंबन आदेश 21.03.1983 को र्खात्म हो गया र्थीा । सिजस विदन अनुशासनात्मक कायवाविहयां बंद की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds गयी र्थीी । अपीलार्थी, को उसक े त्काल बाद बहाल कर विदया जाना चाविहए र्थीा, जब क विक, आपराति क विवचारण, जो विक नहीं हुआ, क े विवलंबन क े दौरान उसे विनलंविब करने का आदेश न विदया गया हो । अं ः अपीलार्थी, को 21.10.1987 विदनांविक आदेश द्वारा विनलंबन रद्द कर बहाल कर विदया गया । हालांविक, कनीकी रूप से, विवद्वान अति रिरक्त महाति वक्ता का यह कहना ठीक है विक आक्षेविप विनणय आई.ए. को सन्दर्भिभ भी नहीं कर ा, इस म्बिस्र्थीति में इस विबन्दु पर विवचार क े लिलए मामले को विफर से विवचारण क े लिलए उच्च न्यायालय पर छोड़ने का हमारा विवचार नहीं है । हम ारिर कर े हैं विक अपीलार्थी, 23.10.1979 से 21.10.1987 क पहले विदए गए विनवाह भत्ता क े समायोजन क े पश्चा ्, सPपूण वे न का हकदार है।

8. उपरोक्त उसिल्ललिर्खा कारणों से, हम यह ारिर कर े हुए उच्च न्यायालय क े विनणय का अनुमोदन कर े हैं, विक अपीलार्थी, दोर्षमुक्त होने की ति थिर्थी 31.08.2001 से बहाल होने की ति थिर्थी 20.01.2003 क विपछले वे न का हकदार होगा । आगे, अपीलार्थी, 23.10.1979 से 21.10.1987 क पूरे वे न का हकदार होगा ।

9. द्नुरूप, अपील विनस् ारिर की जा ी है ।..................................... (न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव)....................................... (न्यायमूर्ति एम. आर. शाह) नई विदल्ली, अप्रैल 01, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds