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भार ीय सव च्च न्यायालय
दीवानी अपीलीय अति कारिर ा
सिसविवल अपील सं. 3339 वर्ष 2019
( विव.अ. या. (सिसविवल) सं. 100 वर्ष 2016 से उद्भू )
राज नारायन ...... अपीलार्थी, बनाम
भार संघ एवं अन्य ........प्रत्यर्थी,गण
विनणय
न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव
अनुमति प्रदान की गई ।
JUDGMENT
1. रेलवे मेल सर्विवस (RMS)) में सॉर्टिंAग असिसस्AेंA क े रूप में मुगल सराय में काय कर रहे अपीलार्थी, को उच्च मूल्य क े मनी ऑर्डर क े जाली भुग ान में संलिलप्त ा क े आरोप पर अनुशासनात्मक कायवाही क े चल े 23.10.1979 को विनलम्बिPब विकया गया र्थीा । अपीलार्थी, क े विवरूद्ध मुगलसराय र्थीाने में एफ. आई. आर. दज की गई र्थीी और भा.दं.सं की ारा 409/420 क े अन् ग ् अपरा सं. 358 वर्ष 1979 क े रूप में मामला पंजीक ृ विकया गया र्थीा । विनलPबन आदेश 21.10.1987 को रद्द विकया गया सिजसक े आ ार पर उसने कायभार ग्रहण विकया और 28.02.1997 क काय विकया जब उसे भा.दं.सं की ारा 409,467 और 420 क े अन् ग ् दोर्ष सिसद्ध होने क े कारण सेवाओं से बर्खाास् कर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विदया गया । उसे ीन वर्ष क ै द की सजा सुनाई गयी । अपीलार्थी, ने उसक े बाद अपनी दोर्षसिसतिद्ध क े विवरुद्ध अपील दायर की । अपीलार्थी, क े द्वारा दायर आपराति क अपील स्वीक ृ की गयी और उसे भा.दं.सं की ारा 409, 420 और 467 क े अन् ग अपरा ों क े आरोप से दोर्षमुक्त कर विदया गया ।
2. दोर्षमुक्त होने क े बाद अपीलार्थी, की बहाली की प्रार्थीना को13.06.2002 को अस्वीक ृ कर विदया गया । मेमों विदनांविक 13.06.2002 में यह उल्लेर्खा विकया गया, विक अपीलार्थी, को इसलिलए बहाल विकया जा सका क्योंविक वह छः वर्ष से अति क समय से पहले ही बर्खाास् कर विदया गया र्थीा । (?) 28.02.1997 विदनांविक बर्खाास् गी और 13.06.2002 विदनांविक बहाली क े आदेश को अस्वीक ृ करने संबं ी आदेश को अपीलार्थी, द्वारा न्यायाति करण क े समक्ष चुनौ ी दी गयी । न्यायाति करण ने मूल आवेदन को स्वीक ृ विकया और अपीलार्थी, की बहाली का विनदlश यह कह कर विदया, विक वह वरिरष्ठ ा और Notional Fixation of Pay सार्थी ही बर्खाास् गी की ति थिर्थी से बहाली की ति थिर्थी क बढ़ोत्तरिरयों का हकदार होगा । लेविकन न्यायाति करण ने यह माना विक अपीलार्थी, उस अवति क े लिलए, जब वह सेवा में नहीं र्थीा, विपछले वे न का हकदार नहीं होगा । न्यायाति करण क े आदेश क े आ ार पर अपीलार्थी, को 20.01.2003 को बहाल कर विदया गया। 01.05.2003 विदनांविक आदेश द्वारा आर.एम.एस. इलाहाबाद क े वरिरष्ठ अ ीक्षक ने अपीलार्थी, क े विनलPबन अवति अर्थीा ् 30.10.1979 से 11.11.1987 की अवति क े लिलए पूण वे न और भत्तों संबं ी अपीलार्थी, क े प्रति विनति त्व को नकार विदया । अपीलार्थी, द्वारा न्यायाति करण क े आदेश क े विवरूद्ध दायर रिरA यातिचका सिजसमें उसे विपछला वे न न देने की बा की गई र्थीी, उच्च न्यायालय द्वारा अंश ः स्वीकार कर ली गयी । उच्च न्यायालय ने यह अव ारिर विकया की अपीलार्थी, अपनी दोर्षमुविक्त की ति थिर्थी 31.08.2001 से बहाली की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds ति थिर्थी 20.01.2003 क की अवति में पूरे विपछले वे न का हकदार होगा। अपीलार्थी, ने हमारे समक्ष उच्च न्यायालय क े उस विनणय की वै ाविनक ा और वै ा को चुनौ ी दी है सिजसक े द्वारा विपछले वे न का भुग ान उसकी दोर्षमुविक्त की ति थिर्थी से बहाली की ति थिर्थी क की अवति क े लिलए सीविम कर विदया गया र्थीा ।
3. याची क े विवद्वान अति वक्ता ने इस न्यायालय द्वारा रणछोड़ जी च ुज, ठाक ु र बनाम गुजरा विवद्यु बोर्ड अथिभयं ा अ ीक्षक एवं अन्य (1996 (11) S)CC 603) और भार संघ एवं अन्य बनाम जयपाल सिंसह (2004 (1) S)CC 121) क े आ ार पर यह प्रति वाद विकया गया है, विक उस म्बिस्र्थीति में जब आपराति क कायवाही विनयोक्ता की और से प्रारPभ की गई हो, और कमचारी दोर्षमुक्त हो जा ा है वह आपराति क कायवाविहयों क े विवलPबन क े दौरान कायभार से बाहर रर्खाे गये अवति क े लिलए पूण वे न का हकदार होगा, उन्होंने यह भी कहा, विक अपीलार्थी, 1979 से 1987 की अवति क े लिलए पूण वे न का हकदार है । उन्होंने कहा, विक अपीलार्थी, ने उच्च न्यायालय में उक्त अनु ोर्ष पाने क े लिलए अन् रव, आवेदन दालिर्खाल विकया है ।
4. विवद्वान अति रिरक्त महाति वक्ता ने क विदया है, विक अपीलार्थी, विपछले वे न का हकदार नहीं है, उन्होंने कहा है, विक विनयोक्ता की ओर से और पुलिलस की ओर से प्रारPभ विकए गए आपराति क मामलों में कोई अन् र नहीं हो ा है । उन्होंने यह भी कहा, विक अपीलार्थी, 1979 से 1987 क क े सPपूण विपछले वे न क े भुग ान का अनु ोर्ष पाने का हकदार नहीं है । क्योंविक अपीलार्थी, उत्तर द्वारा दालिर्खाल आई. ए. का उच्च न्यायालय क े आक्षेविप आदेश में उल्लेर्खा नहीं है ।
5. रणछोड़ जी च ुज, ठाक ु र (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय ने कमचारी क े एक मामले पर विवचार विकया, सिजसने भा.दं.सं. की ारा 302 क े अन् ग ् अपरा में संलिलप्त ा क े आपराति क मामले क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विवलPबन क े दौरान सेवा से बाहर रर्खाे गये अवति क े लिलए विपछले वे न की माँग की र्थीी । याची का दावा यह र्थीा, विक आपराति क न्यायालय द्वारा दोर्षमुक्त विकए जाने पर उसे पूरा वे न पाने का अति कार है । न्यायालय ने उक्त कर्थीन को यह कह े हुए अस्वीकार कर विदया, विक विपछले वे न क े भुग ान का प्रश्न विवभागीय जाँच क े आ ार पर प्राप्त विनष्कर्ष… क े अंविक होने क े कारण सेवा की बर्खाास् गी क े मामले में ही उठेगा । बर्खाास् गी आदेश को न्यायालय द्वारा अपास् कर विदए जाने की म्बिस्र्थीति में अनुपम्बिस्र्थी रहा कमचारी विपछले वे न का दावा करने का हकदार होगा, क्योंविक उसे गैर-कानूनी रीक े से विनयोक्ता द्वारा सेवा से दूर रर्खाा गया । न्यायालय का यह म र्थीा, विक एक ऐसे कमचारी का मामला जो विवभागीय जाँच का सामना कर रहा हो ऐसे कमचारी क े मामले से अलग होगा, सिजसक े विवरुद्ध आपराति क कायवाही आरPभ की गयी हो । अपरा में लिलप्त कमचारी ने जेल में बंद होने क े कारण, स्वंय को सेवाएं देने में अक्षम बना लिलया है । अपीलीय न्यायालय द्वारा अनुव, दोर्षमुविक्त उसे विपछले वे न का दावा करने का हकदार नहीं बनाएगा ।
6. रणछोड़ जी च ुज, ठाक ु र (उपरोक्त) क े बाद भार संघ एवं अन्य बनाम जयपाल सिंसह (उपरोक्त) क े विनणय में भी इस न्यायालय ने ऐसे कमचारी को विपछले वे न का भुग ान अस्वीक ृ कर विदया, जो शुरू में. भा.दं.सं. की ारा 302 सपविठ ारा 34 क े अन् ग ् दोर्षसिसद्ध हुआ र्थीा और बाद में आपराति क अपील में उच्च न्यायालय द्वारा दोर्षमुक्त कर विदया गया । उस मामले में याची को अनु ोर्ष देने से इन्कार कर े हुए न्यायालय ने ारिर विकया, विक अनुव, दोर्षमुविक्त विकसी कमचारी को विपछले वे न की माँग का हकदार नहीं बना ी । हालांविक, न्यायालय का म र्थीा, विक यविद अथिभयोजन की शुरुआ विवभाग द्वारा की जाए और कमचारी दोर्षमुक्त हो ा है, ो थिभन्न प्रकार की समीचीन बा ें होंगी । अपीलार्थी, क े विवद्व अति वक्ता ने कमचारी की आपराति क मामले में Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds संलिलप्त ा क े लिलए पुलिलस द्वारा आरंभ विकए गए अथिभयोजन और विनयोक्ता की ओर से आरंभ की गई आपराति क कायवाविहयों क े बीच अं र करने का प्रयास विकया । भार संघ एवं अन्य बनाम जयपाल सिंसह (उपरोक्त) क े मामले में की गई समुविक्त इस रीक े से समझी जानी चाविहए, विक, ऐसे विनष्कर्ष विक म्बिस्र्थीति में विक आपराति क कायवाही आरंभ विकया जाना दोर्षपूण र्थीा या दुराशयपूण र्थीा, विवभाग विपछले वे न क े लिलए उत्तरदायी होगा । अन्य सभी मामलों में हमें, विवभाग द्वारा आपराति क कायवाही आरंभ विकए जाने और पुलिलस द्वारा आपराति क मामला दज विकए जाने क े बीच, कोई अन् र नहीं विदर्खा ा, उदाहरण क े लिलए यविद कमचारी विनति यों क े गबन में संलिलप्त है या घूँस मांगने या लेने में लिलप्त पाया जा ा है, विनयोक्ता पर, ऐसे व्यविक्त का आपराति क न्यायालय द्वारा दोर्षमुक्त विकए जाने पर, विपछला वे न देने का हरजाना नहीं लगाया जा सक ा । जब क यह न पाया जाय विक अथिभयोजन दोर्षपूण र्थीा।
7. सिजस विबन्दु पर विवचार विकया जाना है वह यह है, विक क्या अपीलार्थी, 1979 से 1987 क े बीच पूरे वे न का हकदार है, अपीलार्थी, को 23.10.1979 को विनलंविब विकया गया र्थीा और 21.10.1987 को उसका विनलंबन वापस ले लिलया गया । इस अं राल में एक ऐसी घAना हुई सिजससे अनुशासनात्मक कायवाही 21.03.1983 को बंद कर दी गयी । रिरकार्ड से यह स्पष्ट है, विक अपीलार्थी, ही आपराति क मामले क े विवलंबन क े दृविष्टग ् विवभागीय जाँच को मुल वी करवाना चाह ा र्थीा । विनलंबन का आदेश अनुशासनात्मक कायवाविहयों क े आ ार पर र्थीा । अनुशासनात्मक कायवाही बंद हो जाने क े आ ार पर अपीलार्थी, विनलंबन की ति थिर्थी से विवभागीय जाँच बंद होने की ति थिर्थी क की अवति क े लिलए पूरा वे न का दावा करने का हकदार हो गया । त्पश्चा ् प्रत्यर्थी,गण ने उसका विनलंबन रद्द कर उसे बहाल करने में चार वर्ष का समय लिलया । 23.10.1979 विदनांविक विनलंबन आदेश 21.03.1983 को र्खात्म हो गया र्थीा । सिजस विदन अनुशासनात्मक कायवाविहयां बंद की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds गयी र्थीी । अपीलार्थी, को उसक े त्काल बाद बहाल कर विदया जाना चाविहए र्थीा, जब क विक, आपराति क विवचारण, जो विक नहीं हुआ, क े विवलंबन क े दौरान उसे विनलंविब करने का आदेश न विदया गया हो । अं ः अपीलार्थी, को 21.10.1987 विदनांविक आदेश द्वारा विनलंबन रद्द कर बहाल कर विदया गया । हालांविक, कनीकी रूप से, विवद्वान अति रिरक्त महाति वक्ता का यह कहना ठीक है विक आक्षेविप विनणय आई.ए. को सन्दर्भिभ भी नहीं कर ा, इस म्बिस्र्थीति में इस विबन्दु पर विवचार क े लिलए मामले को विफर से विवचारण क े लिलए उच्च न्यायालय पर छोड़ने का हमारा विवचार नहीं है । हम ारिर कर े हैं विक अपीलार्थी, 23.10.1979 से 21.10.1987 क पहले विदए गए विनवाह भत्ता क े समायोजन क े पश्चा ्, सPपूण वे न का हकदार है।
8. उपरोक्त उसिल्ललिर्खा कारणों से, हम यह ारिर कर े हुए उच्च न्यायालय क े विनणय का अनुमोदन कर े हैं, विक अपीलार्थी, दोर्षमुक्त होने की ति थिर्थी 31.08.2001 से बहाल होने की ति थिर्थी 20.01.2003 क विपछले वे न का हकदार होगा । आगे, अपीलार्थी, 23.10.1979 से 21.10.1987 क पूरे वे न का हकदार होगा ।
9. द्नुरूप, अपील विनस् ारिर की जा ी है ।..................................... (न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव)....................................... (न्यायमूर्ति एम. आर. शाह) नई विदल्ली, अप्रैल 01, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds