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भार ीय सव च्च न्यायालय
आपराति क अपीलीय अति कारिर ा
क्रि क्रि नल अपील संख्या . 71 वर्ष" 2012
रूपाली देवी ...... अपीलार्थी(
बना
उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य ........
प्रत्यर्थी(गण
सह
क्रि क्रि नल अपील सं. 619 वर्ष" 2019
(क्रिव. अ. या. (क्रि .) सं. 5695/2010 से उद्भू )
क्रि क्रि नल अपील सं. 620 वर्ष" 2019
(क्रिव. अ. या. (क्रि .) सं. 8246/2010 से उद्भू )
क्रि क्रि नल अपील सं. 621 वर्ष" 2019
(क्रिव. अ. या. (क्रि .) सं. 7387/2011 से उद्भू )
क्रि क्रि नल अपील सं. 622 वर्ष" 2019
(क्रिव. अ. या. (क्रि .) सं. 5052/2014 से उद्भू )
क्रि क्रि नल अपील सं. 623 वर्ष" 2019
(क्रिव. अ. या. (क्रि .) सं. 5139/2014 से उद्भू ) mn~?kks"k.kk
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
न्याय ूर्ति रंजन गोगोई
JUDGMENT
1. " क्या कोई क्रिहला जिजसे अपना वैवाक्रिहक घर, ऐसे कायI एवं आचरण जो ू र ा की श्रेणी ें आ े हैं, क े आ ार पर छोड़ने को बाध्य क्रिकया गया हो न्यायालयों की अति कारिर ा ें ऐसी अवस्र्थीा ें जब उसे अपने ा ा-क्रिप ा या अन्य पारिरवारिरक सदस्यों क े यहां आश्रय लेने को बाध्य क्रिकया गया हो क्रिवति क प्रक्रि या की शरण ले काय"वाही प्रारम्भ कर सक ी है । " ठीक यही वह प्रश्न है जो इन अपीलों क े स ूह ें क्रिन ा"रण क े लिलए उठ ा है ।
2. उपरोक्त प्रश्न पर न्यायालय का क्रिवभाजिज होने क े कारण ऊपर क्रिनर्दिदष्ट प्रश्न पर क्रिवचार क े लिलए बड़ी बेंच को व " ान ें सन्दर्भिभ क्रिकया गया है ।
3. (i) वाई. अब्राह अजी एवं अन्य बना पुलिलस क्रिनरीक्षक चेन्नई एवं अन्य (2004) 8 SCC 100 (ii) र ेश एवं अन्य बना क्रि लनाडु राज्य (2005) 3 SCC 507 (iii) नीर्ष र न एवं अन्य बना ध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य (2007) 1 SCC 262 (iv) अ रेन्दु ज्योति एवं अन्य बना छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
क े वाद ें Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds यह व्यक्त क्रिकया गया है, क्रिक यक्रिद वैवाक्रिहक घर ें पत्नी क े प्रति की गई ू र ा क े कारण वह अपने पै ृक घर ें आश्रय ले ी है और यक्रिद पै ृक घर ें ू र ा कारिर करने का क्रिवशेर्ष क ृ त्य पति या उसक े क्रिकसी संबं ी क े कारण नहीं हुआ है, ो ारा 498 क क े अन् ग" ऐसे न्यायालय ें काय"वाही का आरम्भ, जिजसकी, जहां उसका पै ृक घर स्थिस्र्थी है, पर अति कारिर ा है, अनु न्य नही होगी । उपरोक्त ा लों ें जो ुख्य थ्य ध्यान देने योग्य है, वह यह है, क्रिक पीक्रिड़ पत्नी की ओर से वैवाक्रिहक घर छोड़ने क े पश्चा ् पै ृक घर ें ू र ा या उत्पीड़न कारिर करने का आरोप नहीं लगाया गया र्थीा । इन्हीं परिरस्थिस्र्थीति यों ें उपरोक्त ा लों ें यह व्यक्त क्रिकया गया र्थीा, क्रिक वैवाक्रिहक घर ें ू र ा का अपरा कारिर क्रिकया जाना, पै ृक घर, जहां पर बाद ें पीक्रिड़ पत्नी चली गई हो, ें अपरा क े चालू रहने क े बराबर नहीं है ।
4. सुजा ा ुखज( बना प्रशान् क ु ार ुखज( (1997) 5 SCC 30; सुनी ा क ु ारी कश्यप बना क्रिबहार राज्य एवं अन्य (2011) 11 SCC 301 और ध्य प्रदेश राज्य बना सुरेश कौशल एवं अन्य (2003) 11 SCC 126 क े ा लों ें स्पष्ट ः अलग दृक्रिष्टकोण अपनाया गया है । हालांक्रिक उक्त दृक्रिष्टकोण प्रत्येक प्रश्नग ् ा लों क े क्रिवशेर्ष थ्यों पर आ ारिर प्र ी हो सक ा है । उदाहरण क े लिलए सुजा ा ुखज( (उपरोक्त) क े ा ले ें एक क्रिवशेर्ष आरोप यह लगाया गया र्थीा, क्रिक पति ने वैवाक्रिहक घर ें ू र ा कारिर करने क े पश्चा पत्नी क े पै ृक घर जाकर, जहां पर उसने आश्रय लिलया र्थीा, उसका उत्पीड़न क्रिकया । उक्त थ्यों क े आ ार पर सुजा ा ुखज( (उपरोक्त) क े ा ले ें इस न्यायालय ने अव ारिर क्रिकया, क्रिक यह अपरा दं. प्र. सं. की ारा 178 (ग) क े अन् ग" एक स अपरा है । सुनी ा क ु ारी कश्यप (उपरोक्त) क े ा ले ें यह आरोप र्थीा, क्रिक पति क े द्वारा पत्नी से बुरा ब ा"व क्रिकया गया । जिजसने उसे उसक े पै ृक घर Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds छोड़ क्रिदया और उसक े बाद पति ने उसक े बारे ें कोई खोजबीन नहीं की । आगे यह भी आरोप र्थीा, क्रिक जब पत्नी ने पति से सम्पक " करने का प्रयास क्रिकया, ो उसने कोई उत्तर नहीं क्रिदया । उक्त थ्यों ें न्यायालय ने यह व्यक्त क्रिकया, क्रिक पै ृक घर ें ारा 498 क क े अन् ग" अपरा क े क्रिनक्रिह ार्थी" घक्रि{ हुए और इसलिलए उस जगह की न्यायालय को दं. प्र. सं. की ारा 179 क े आलोक ें आरोक्रिप अपरा का संज्ञान लेने की अति कारिर ा होगी । इसी रह ध्य प्रदेश राज्य बना सुरेश कौशल (उपरोक्त) क े ा ले ें पत्नी को वैवाक्रिहक घर ें की गई ू र ा क े कारण उसक े पै ृक घर जबलपुर ें गभ"पा हो गया । यह अव ारिर क्रिकया गया, क्रिक पत्नी क े पै ृक घर क े स्र्थीान की न्यायालय को दं. प्र. सं. की ारा 179 क े अन् ग" परिरवाद की सुनवाई का क्षेत्राति कार होगा ।
5. उपरोक्त दो जिजस पर सन्दर्भिभ क्रिवद्व बेंच ने व " ान सन्दभ" दे े हुए क्रिवचार क्रिकया है, यर्थीा पूव" ः दृष्टव्य, न्यायलय क े स क्ष दो रह क े ा लों क े क्रिवशिशष्ट थ्यों पर आ ारिर र्थीे । ा लों क े थ्यों क े आलोक ें जिजस ें वे न्यायालय द्वारा व्यक्त क्रिकए गए र्थीे, दोनों ों की संवहनीय ा संभव र्थीी । प्रश्नग ् ा ले ें न्यायालय क े स क्ष हालांक्रिक अलग क्रिवर्षय है । क्या एक ऐसे ा ले ें जहां पति क े द्वारा या पति क े संबंति यों द्वारा वैवाक्रिहक घर ें ू र ा कारिर की गई हो और पत्नी वैवाक्रिहक घर छोड़कर अन्यत्र स्थिस्र्थी पै ृक घर ें आश्रय लिलया हो, क्या पत्नी क े पै ृक घर क े स्र्थीान पर स्थिस्र्थी न्यायालय को, ारा 498 क क े अन् ग", परिरवाद क े सुनवाई की अति कारिर ा होगी । यह एक ऐसी स्थिस्र्थीति ें, जहां पर पति क े द्वारा, पै ृक घर पर जहां पत्नी ने आश्रय लिलया है, ू र ा या उत्पीड़न क े स्पष्ट क ृ त्य का आरोप नहीं है ।
6. दण्ड प्रक्रि या संक्रिह ा 1973 ( दं.प्र.सं.) का आपराति क न्यायलयों की जाँच व क्रिवचारण संबं ी अति कारिर ा से संबंति अध्याय XIII क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds उपबं ो पर एक दृक्रिष्टपा आवश्यक होगा । दण्ड प्रक्रि या संक्रिह ा की ारा 177 का यह उपबं है, क्रिक "प्रत्येक अपरा की जाँच और क्रिवचारण सा ान्य ः ऐसे न्यायालय द्वारा क्रिकया जाएगा, जिजसकी स्र्थीानीय अति कारिर ा क े अन् ग" वह क्रिकया गया है । " अ ः यह स्पष्ट है, क्रिक सा ान्य स्थिस्र्थीति यों ें जिजस न्यायालय की अति कारिर ा ें अपरा कारिर क्रिकया जा ा है उसी न्यायालय को प्रश्नग ् अपरा का संज्ञान लेने की शक्रिक्त और प्राति कार होगा ।
7. ारा 178 और 179 उपरोक्त क्रिनय क े अपरा हैं जो इस प्रकार हैं - "178. जाँच या क्रिवचारण का स्र्थीान, - (क) जहां यह अक्रिनश्च है, क्रिक कई स्र्थीानीय क्षेत्रों ें से क्रिकस ें अपरा क्रिकया गया है, अर्थीवा (ख) जहां अपरा अंश ः एक स्र्थीानीय क्षेत्र ें और अंश ः क्रिकसी दूसरे ें क्रिकया गया है, अर्थीवा (ग) जहां अपरा चालू रहने वाला हो और उसका क्रिकया जाना एक से अति क स्र्थीानीय क्षेत्रों ें चालू रह ा है, अर्थीवा (घ) जहां वह क्रिवशिभन्न स्र्थीानीय क्षेत्रों ें क्रिकए गए कायI से क्रि लकर बन ा है, वहां उसकी जाँच या क्रिवचारण ऐसे स्र्थीानीय क्षेत्रों ें से क्रिकसी पर अति कारिर ा रखने वाले न्यायालय द्वारा क्रिकया जा ा है । " "179. अपरा वहां क्रिवचारणीय होगा जहां काय" क्रिकया गया या परिरणा क्रिनकला - जब कोई काय" क्रिकसी की गई बा क े और क्रिकसी क्रिनकले हुए परिरणा क े कारण अपरा है, ब ऐसे अपरा की जाँच या क्रिवचारण ऐसे न्यायालय द्वारा क्रिकया जा सक ा है, जिजसकी स्र्थीानीय अति कारिर ा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds क े अन्दर ऐसी बा की गई या परिरणा क्रिनकला । "
8. ारा 178 दूसरे स्र्थीानीय क्षेत्रों ें स्थिस्र्थी न्यायालयों को जहां अपरा अंश ः क्रिकया गया हो, को संज्ञान लेने की अनु ति देकर "सा ान्य क्रिनय " यर्थीा ारा 177 ें क्रिवक्रिह, का अपवाद सृजिज कर ी है और यक्रिद एक स्र्थीानीय क्षेत्र ें क्रिकया गया अपरा दूसरे स्र्थीानीय क्षेत्र ें चालू रह ा है, ो दूसरे स्र्थीानीय क्षेत्र ें स्थिस्र्थी न्यायालय ा ले का संज्ञान लेने ें सक्ष होगा । ारा 179 क े अन् ग" यक्रिद क्रिकसी आपराति क क ृ त्य से क्रिनकले परिरणा क े कारण कोई अपरा दूसरे क्षेत्राति कार ें हो ा है ो वहां पर स्र्थीानीय अति कारिर ा रखने वाला न्यायालय भी संज्ञान लेने ें सक्ष होगा । इस प्रकार यक्रिद अपरा अंश ः एक स्र्थीान पर क्रिकया गया हो और अंश ः दूसरे; या अपरा चालू रहने वाला अपरा हो या जहां क्रिकसी आपराति क क ृ त्य का परिरणा दूसरे स्र्थीान पर होने वाले अपरा क े रूप ें परिरण हो, "सा ान्य क्रिनय " का अपवाद लागू होगा और जिजस न्यायालय की अति कारिर ा ें आपराति क क ृ त्य क्रिकया जा ा है, उसकी अपरा का क्रिवचारण करने की अनन्य अति कारिर ा जा ी रहेगी ।
9. इस स्थिस्र्थीति ें 'चालू रहने वाले अपरा ' से क्या ात्पय" है, इस पर ध्यान देना आवश्यक होगा । यह क्रिवर्षय क्रिबहार राज्य बना देव करन नेन्सी (1972) 2 SCC 890 क े ा ले ें उत्तरिर होने क े कारण अक्रिनण( क्रिवर्षय नहीं है । पैराग्राफ 5 पर ध्यान देना उपयोगी होगा । "5. एक ' चालू रहने वाला अपरा ' वह है जिजसका सा त्य बो गम्य है और जो एक बार क्रिक े ए गए अपरा से पृर्थीक्करणीय है । यह उन अपरा ों ें से एक है, जो क्रिकसी क्रिनय या इसकी श I को ानने या उसका पालन करने ें क्रिवफल ा से उत्पन्न हो ा है और जिजस ें दण्ड का क्रिव ान हो ा है, जिजसका उत्तरदातियत्व ब क जारी रह ा है, जब क Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds क्रिनय या इसकी श I का पालन नहीं हो जा ा । प्रत्येक ऐसे अवसर पर जब ऐसी अवज्ञा या गैर अनुपालन हो ा है और पुनः हो ा है ो अपरा कारिर हो ा है । दो रह क े अपरा ों क े बीच भेद ऐसे काय" या क्रिवलोप क े बीच हो ा है जिजस ें क्रिक एक अपरा एक बार हो ा है और एक ऐसा काय" या क्रिवलोप जो चालू रह ा है और इसलिलए प्रत्येक बार या प्रत्येक अवसर पर जब यह हो ा है, अपरा बन ा है । ' चालू रहने वाला अपरा ' क े ा ले ें अपरा क े सा त्य का त्व हो ा है, जो ऐसे अपरा क े ा ले ें अनुपस्थिस्र्थी हो ा है, जो ब घक्रि{ हो ा है जब कोई काय" या क्रिवलोप एक बार क े लिलए हो ा है । "
10. जो प्रश्न उत्तर क े लिलए उठा है, उसका ारा 178 (ख) या (ग) क े प्राव ानों से कोई लेना- देना नहीं है । जिजस बा का क्रिन ा"रण क्रिकया जाना है, वह यह है, क्रिक क्या ारा 179 द्वारा सृजिज अपवाद का उस न्यायालय को अति कारिर ा प्रदान करने ें कोई प्रयोग होगा, जो क्रिक उस जगह स्थिस्र्थी है जहां पत्नी का पै ृक घर अवस्थिस्र्थी है ।
11. इस प्रश्न का उत्तर देने क े लिलए आपराति क क्रिवति ( दूसरा संशो न अति क्रिनय, 1983 (अति क्रिनय 46 वर्ष" 1983) ) क े उद्देश्य और युक्रिक्तयुक्त ा कर्थीन को देखना होगा, जिजसक े द्वारा ारा 498 क को जोड़ा गया र्थीा । इस ारा क े सन्दभ" ें प्रर्थी ः ध्या व्य है: "498 क. क्रिकसी स्त्री क े पति या पति क े ना ेदार द्वारा उसक े प्रति ू र ा करना--- जो कोई, क्रिकसी स्त्री का पति या पति का ना ेदार हो े हुए, ऐसे स्त्री क े प्रति ू र ा करेगा, वह कारावास से, जिजसकी अवति ीन वर्ष" क की हो सक े गी, दस्थिण्ड क्रिकया जाएगा और जु ा"ने से भी दण्डनीय होगा । स्पष्टीकरण--- इस ारा क े प्रयोजनों क े लिलए, " ू र ा " से क्रिनम्नलिललिख अशिभप्रे है- Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds (क) जानबूझकर क्रिकया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रक ृ ति का है जिजससे उस स्त्री को आत् हत्या करने क े लिलए प्रेरिर करने की या उस स्त्री क े जीवन, अंग या स्वास्थ्य को (जो चाहे ानजिसक हो या शारीरिरक) गंभीर क्षति या ख रा कारिर करने की संभावना है; या (ख) क्रिकसी स्त्री को ंग करना, जहां उसे या उससे संबंति क्रिकसी व्यक्रिक्त को क्रिकसी सम्पलित्त या ूल्यवान प्रति भूति क े लिलए क्रिकसी क्रिवति क्रिवरुद्ध ाँग को पूरी करने क े लिलए प्रपीक्रिड़ करने की दृक्रिष्ट से या उसक े अर्थीवा उससे संबंति क्रिकसी व्यक्रिक्त क े ऐसे ाँग पूरी करने ें असफल रहने क े कारण इस प्रकार ंग क्रिकया जा रहा है । "
12. भार ीय दण्ड संक्रिह ा की ारा 498 क को आपराति क क्रिवति (दूसरा संशो न) अति क्रिनय, 1983 क े द्वारा जोड़ा गया र्थीा । भार ीय दण्ड संक्रिह ा ें उपरोक्त संशो न क े अति रिरक्त दण्ड प्रक्रि या संक्रिह ा 1973 की ारा 174 और 176 क े, आत् हत्या क े द्वारा ृत्यु क े ा ले ें पुलिलस जाँच और ऐसी ृत्यु क े कारणों की जिजस्{्रे{ द्वारा जाँज संबं ी -- प्राव ानों को भी संशोति क्रिकया गया र्थीा । दण्ड प्रक्रि या संक्रिह ा ें ारा 498 क क े अन् ग" अपरा ों क े अशिभयोजन हे ु ारा 198 क को भी जोड़ा गया र्थीा । आगे दं.प्र.सं. की प्रर्थी अनुसूची ें संशो न द्वारा ारा 498 क क े अन् ग" अपरा को संज्ञेय और गैर- ज ान ी बनाया गया । आपराति क क्रिवति (दूसरा संशो न) अति क्रिनय, 1983 द्वारा भार ीय साक्ष्य अति क्रिनय ें ारा 113 क जोड़ा जाना अत्यति क हत्व का है, जो क्रिववाक्रिह स्त्री द्वारा आत् हत्या क े दुष्प्रेरण की उप ारणा क्रिकए जाने का उपबं कर ा है । यक्रिद ऐसी आत् हत्या क्रिववाक्रिह स्त्री क े क्रिववाह की ति शिर्थी क े सा वर्ष" की अवति क े भी र की गई है और उसक े सार्थी ू र ा की गई है । ारा 113 क इन शब्दों ें है: "113-क. क्रिववाक्रिह क्रिहला द्वारा आत् हत्या क े दुष्प्रेरण क े संबं ें Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds उप ारणा- जब प्रश्न यह हो, क्रिक क्रिकसी स्त्री द्वारा की गई आत् हत्या उसक े पति द्वारा या पति क े क्रिकसी ना ेदार द्वारा दुष्प्रेरिर की गई र्थीी और यह दशा"या जा ा है, क्रिक उसने आत् हत्या क्रिववाह की ति शिर्थी क े सा वर्ष" की अवति क े भी र की र्थीी और यह क्रिक उसक े पति या पति क े क्रिकसी ना ेदार ने उसक े सार्थी ू र ा की र्थीी, ा ले क े अन्य परिरस्थिस्र्थीति यों क े दृक्रिष्टग ्, न्यायालय यह उप ारणा कर सक ा है, क्रिक ऐसी आत् हत्या उसक े पति या पति क े ऐसे ना ेदार द्वारा दुष्प्रेरिर की गई र्थीी । स्पष्टीकरण- इस ारा क े उद्देश्यों क े लिलए " ू र ा " का वही अर्थी" होगा जो क्रिक भार ीय दण्ड संक्रिह ा की ारा 498 क ें है । ( 45, वर्ष"
1860) "
13. उपरोक्त संशो न क े पीछे उद्देश्य स्त्री का या उससे संबंति क्रिकसी व्यक्रिक्त को क्रिकसी संपलित्त या क्रिवति क्रिवरूद्ध ाँग को पूरा करने क े लिलए उत्पीड़न क े ा ले से क्रिनप{ने क े अलावा क्रिनःसंदेह पत्नी पर पति और पति क े ना ेदारों द्वारा ू र ा क े बढ़ े ा लों का ुकाबला करना र्थीा । जिजससे क्रिक पत्नी आत् हत्या कर ले ी है या उसे गंभीर क्षति पहुंच ी है । संशो न क े उपरोक्त अशिभकशिर्थी उद्देश्य को प्रश्नग ् ा ले ें उठ े प्रश्नों का उत्तर दे े स य नजरअंदाज नही क्रिकया जा सक ा । अ ः न्यातियक प्रयास प्रश्नग ् उपबं ों को जोड़ने क े पीछे क े स्पष्य उद्देश्य क े आलोक ें यर्थीा पूव" ः ध्या व्य आपराति क क्रिवति (क्रिद्व ीय संशो न) अति क्रिनय, 1983 द्वारा जोड़ी गई क्रिवति यों क े उपबं ों को सदैव अति क परिरणा ोत्पादक और प्रभावी बनाना होना चाक्रिहए ।
14. " ू र ा " को जो क्रिक भा.दं.सं. की ारा 498 क क े अन् ग" अपरा का सार है, ब्लैक्स लॉ तिडक्शनरी ें क्रिकसी जीक्रिव जीव क्रिवशेर्ष ः ानव पर ानजिसक या शारीरिरक कष्ट क े "सोद्देश्य" और दोर्षपूण" अति रोपण; बुरे ब ा"व; गुस्सा (गाली-गलौज, अ ानवीय Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds व्यवहार, अ या"क्रिद आचरण) क े रूप ें परिरभाक्रिर्ष क्रिकया गया है । ू र ा शारीरिरक या ानजिसक दोनों प्रकार की ू र ा हो सक ी है । पति की या उसक े ना ेदारों की ओर से ऐसे स्पष्ट कायI का पत्नी क े ानजिसक स्वास्थ्य पर प्रभाव; वैवाक्रिहक घर से क्रिनकाले जाने की ानजिसक यंत्रणा और उसी घर ें बुरे ब ा"व क े भय क े चल े वापस जाने की उसकी असहाय ा, ऐसे आया हैं, जिजन्हें भार ीय दण्ड संक्रिह ा की ारा 498 क ें आने वाले " ू र ा" क े अर्थी" को स झ े स य नजरअंदाज नहीं क्रिकया जा सक ा । पत्नी पर भावनात् क अवसाद या नोवैज्ञाक्रिनक प्रभाव, चाहे शारीरिरक क्षति भले न हो, उसक े वैवाक्रिहक घर छोड़ने और पै ृक घर ें आश्रय लेने क े बाद भी या ना दे े रहेंगे । चाहे भले ही वैवाक्रिहक घर ें की जाने वाली शारीरिरक ू र ा रुक गई हो और पै ृक घर ें ऐसे क ृ त्य न हो े हों, इस ें कोई सन्देह नहीं क्रिक गाली-गलौज सक्रिह, यक्रिद ऐसा क ु छ हो ो, पति क े कायI, जिजसने पत्नी को वैवाक्रिहक घर छोड़ने और ा ा-क्रिप ा क े यहां आश्रय लेने को बाध्य क्रिकया र्थीा, द्वारा ानजिसक या ना और नोवैज्ञाक्रिनक अवसाद पै ृक घर ें भी जारी रहेंगे । शारीरिरक ू र ा से उत्पन्न ानजिसक ू र ा या गाली-गलौज पै ृक घर ें भी जारी रहेंगे चाहे ऐसे स्र्थीान पर स्पष्ट शारीरिरक ू र ा का कोई काय" भले न हो ।
15. क्रिहलाओं का घरेलू हिंहसा से संरक्षण अति क्रिनय, जैसा क्रिक इसक े अति क्रिनय न का उद्देश्य दर्भिश करेगा, भार ीय दण्ड संक्रिह ा की ारा 498 क क े अन् ग" दी गई आपराति क क्रिवति ें उपचार की ुलना ें घरेलू हिंहसा क े भुक्तभोक्रिगयों को जिसक्रिवल उपचार प्रदान करने क े लिलए है । क्रिहलाओं का घरेलू हिंहसा से संरक्षण अति क्रिनय, 2005 ें घरेलू हिंहसा की परिरभार्षा क्षति या उपहति जो स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, अंग या क ु शलक्षे, ानजिसक या शारीरिरक को ख रा हो, और भावनात् क दुव्य"वहार को ध्यान ें रखकर की गई है । उक्त परिरभार्षा का, उक्त कारणों से, क्रिनश्चय ही भार ीय दण्ड संक्रिह ा की ारा 498 क क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds स्पष्टीकरण क & ख क े सार्थी क्रिनक{ संबं है जो क्रिक ू र ा को परिरभाक्रिर्ष कर ी है । भार ीय दण्ड संक्रिह ा की ारा 498 क ें क्रिनक्रिह प्राव ान क्रिनःसंदेह पत्नी क े ानजिसक और शारीरिरक क ु शरक्षे को स ाक्रिवष्ट कर े हैं । पत्नी की खा ोशी ें भी भावनात् क अवसाद और ानजिसक व्यर्थीा का त्व हो सक ा है । पै ृक घर पर उसका कष्ट, वैवाक्रिहक घर पर पति द्वारा की गई ू र ा क े कारण हो सक ी है । जो क्रिक क्रिनःसंदेह वैवाक्रिहक घर पर क्रिकए गए कायI का परिरणा हो सक ा है । ऐसे परिरणा स्वंय पै ृक घर जहां पर उसने आश्रय लिलया है, पर अलग अपरा क े बराबर होंगे । पै ृक घर ें उसक े ानजिसक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रति क ू ल प्रभाव, यद्यक्रिप क्रिक वैवाक्रिहक घर पर क्रिकए गए कायI क े कारण, ह ारे सुतिचस्थिन् क्रिवचार से, पै ृक घर पर ारा 498 क क े अर्थीI ें ू र ा क्रिकए जाने क े बराबर होंगे । वैवाक्रिहक घर पर की गई ू र ा का परिरणा पै ृक घर पर एकाति क बार क्रिकए गए अपरा क े रूप ें हो ा है । यह उस प्रकार का अपरा है जो दं. प्र. सं. की ारा 179 ें कस्थिल्प है । जो क्रिक सी े व " ान ा ले ें उठाए गए प्रश्न क े उत्तर क े रूप ें लागू होगा ।
16. अ ः ह ारा ानना है, क्रिक उस स्र्थीान की न्यायालय जहां पर पत्नी पति द्वारा या उसक े ना ेदारों द्वारा ू र ा क े क ृ त्य की वजह से अपना वैवाक्रिहक घर छोड़ने या क्रिनकाले जाने क े बाद आश्रय ले ी है, का थ्यात् क परिरस्थिस्र्थीति क े आ ार पर भार ीय दण्ड संक्रिह ा की ारा 498 क क े अन् ग" कारिर अपरा ों क े आरोप क े परिरवाद की सुनवाई की भी अति कारिर ा होगी ।
17. उपरोक्त क े द्देनजर ें सभी अपीलों का क्रिनप{ारा क्रिकया जा ा है ।................................... Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds (रंजन गोगोई, भार क े ुख्य न्याया ीश)................................... (न्याय ूर्ति एल. नागेश्वर राव)...................................... (न्याय ूर्ति संजय क्रिकशन कौल) नई क्रिदल्ली; अप्रैल 09, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds