Full Text
समक्ष भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपीलीय न्यायक्षेत्र
सिसविवल अपील संख्या 3740/2019
[ एस. एल. पी. (सी.) सं. 15358/2018 से उद्भू ]
श्री एन. क
े . जानू .......अपीलार्थी$गण
उप विनदेशक
सामासिजक वाविनकी प्रभाग, आगरा व अन्य
बनाम
लक्ष्मी चन्द्रा .........प्रत्यर्थी$
विनण0य
न्यायमूर्ति हेमन् गुप्ता
JUDGMENT
1. अनुमति प्रदान की गयी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
2. व 0मान अपील क े आदेश विदनांक 16.02.2018 में चुनौ ी है सिजसक े ह आवेदन क े खण्डन क े लिलए आदेश विदनांक 06.12.2017 को समीक्षा आवेदन में कमी से विनस् ारिर कर विदया गया र्थीा।
3. मामले का एक विवविवध ापूण0 इति हास रहा है। आरंभ में प्रत्यर्थी$ ने एक सिसविवल प्रकीण0 रिरट यातिचका को उ. प्र. राज्य एवं अन्य बनाम पुत्ती लाल (1998) 1 यूपीएलबीईसी 313 क े रूप में प्रति वेविद मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद क े तिडवीजन बेन्च क े विनण0य की श R में विनपटान विकया गया र्थीा। उक्त विनण0य विदनांक 21.02.2002 को विनण$ उ. प्र. राज्य एवं अन्य बनाम पुत्ती लाल (2006) 9 एससीसी 337 क े मामले में इस न्यायालय द्वारा पुविU की गई है। इस न्यायालय ने यह माना विक दैविनक वे नभोगी न्यून म वे नमान क े हकदार हैं जैसा विक सरकार क े समकक्ष में उन्हें प्राप्त हो रहा है और जब क वे दैविनक वे नभोगी क े रूप में काय0र रहेंगे कोई अन्य भत्ते या वे न वृतिY क े हकदार नहीं होंगे। आगे यह आदेशिश हुआ विक चूंविक सांविवतिधक विनयमों, यर्थीा उत्तर प्रदेश विनयविम ीकरण दैविनक वे न भोविगयों की विनयुविक्त क े लिलए समूह “घ” पदों क े विनयम, 2001 (विनयमावली २००१) को फ ँ साया गया है। अ ः राज्य द्वारा विकसी अन्य योजना को ैयार करने का प्रश्न ही नहीं उठ ा।
4. उक्त आदेश को मा. उच्च न्यायालय द्वारा पारिर विकये जाने क े पश्चा प्रत्यर्थी$ ने दोबारा सिसविवल प्रकीण0 रिरट यातिचका सं. 43443/2004 दायर विकया। उक्त रिरट यातिचका विदनांक 23.10.2008 को विनम्नलिललिख विनदmशों क े सार्थी विनस् ारण विकया गया- “ विनयम 4 उत्तर प्रदेश विनयविमति करण दैविनक वे न भोविगयों की विनयुविक्त क े लिलए समूह “घ” पदों क े विनयम,2001 की व्याख्या मा. न्यायालय द्वारा विवश्वेश्वर बनाम प्रधान सतिचव, वन अनुभाग-3 द्वारा की गई है और यह न्यायालय ने उक्त मामले में यह माना है विक यविद कम0चारी विनर्दिदU ारीख पर काय0र है और उपरोक्त विनयमों की अतिधसूचना की घोषणा की ारीख पर इस प्रकार क े दैविनक वे न पद पर बना रह ा है ो वह विनयविम ीकरण होने क े लिलए हकदार है, इस थ्य क े बावजूद विक कम0चारी ने रूक रूककर काय0 विकया है। व 0मान मामले में, जैसा विक यातिचकाक ा0 से अतिधवक्ता द्वारा कहा गया विक वष0 1983 से काम में लगा हुआ है, यद्यविप उसने रूक रूक कर काय0 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकया है, परन् ु उसकी सेवा क े विनयविमति करण क े विवचारार्थी0 2001 क विनयविम रूप से काय0 विकया,उपरोक्त विनयम 4 क े प्रावधान क े दृविUग इस न्यायालय द्वारा विवश्वेश्वर बनाम प्रधान सतिचव, वन (उपरोक्त) क े मामले में व्याख्या की गई है। उपरोक्त क े आलोक में मामले क े गुण-दोषों पर गये विबना यातिचकाक ा0 को उत्तर प्रदेश विनयविमति करण दैविनक वे न भोविगयों की विनयुविक्त क े लिलए समूह “घ” पदों क े विनयम 2001 प्रावधान क े अन् ग0 विवपक्षी दलों को विनदmशिश विकया जा ा है विक उसकी सेवाओं क े विनयविम ीकरण पर विवचार करें और कानून और सार्थी ही सार्थी शीष0 न्यायालय द्वारा प्रति पाविद कानून क े अन् ग0 विनयविम वे नमान क े न्यून म भुग ान क े सार्थी न्यायालय द्वारा इस आदेश क े प्रमाशिण प्रति की प्रस् ुति की ारीख से 3 माह क े अन्दर शीघ्र ा से अतिधमाविन विकया जाए। ”
5. इस प्रकार की श R में प्रभागीय विनदेशक, सामासिजक वाविनकी प्रभाग आगरा ने विदनांक 19.11.2008 को एक आदेश पारिर विकया विक प्रत्यर्थी$ विनयविमति करण / समकक्ष वे न क े लिलए योग्य नहीं है। आदेश का प्रासंविगक उYरण अग्रलिललिख है- “ क्योंविक उपरोक्तानुसार दैविनक कम0चारी को लगा ार काय0 कर े नहीं पाया गया र्थीा। अ ः श्री लक्ष्मी चन्द्रा विनयविम ीकरण / े लिलए पात्र ा श्रेणी में नहीं आ े। मा. सव च्च न्यायालय क े आदेश विदनांक 10.04.2005 क े एस. एल. पी. संख्या 3393/1999, एस. एल. पी. संख्या 91/03, 01/95 (सेक्र े टरी आॅफ स्टेट आॅफ कना0टक एवं अन्य बनाम उमा देवी) में स्पU विनदmश है विक सिजन व्यविक्तयों का चयन विबना विकसी चयन प्रविक्रया क े विकया गया है वे स्र्थीायी पद क े सापेक्ष विनयविम ीकरण क े लिलए पात्र नहीं हो सक े। अ ः यर्थीोतिच विवमश0 क े पश्चा अधोहस् ाक्षरी ने फ ै सला विकया है विक श्री लक्ष्मी चन्द्र पुत्र श्री प ी राम विनयविम ीकरण / े लिलए अपात्र पाये गये हैं और उत्तर प्रदेश दैविनक वे नभोगी विनयुविक्त विनयमावली 2001 समूह-घ क े लाभ को अर्जिज नहीं कर सक ा। अ ः उसक े अशिभवेदन विदनांक 06.11.2008 को ए द्द्वारा विनस् ारिर की जा ी है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
6. प्रत्यर्थी$ ने विनयविम ीकरण और / अर्थीवा न्यून म वे नमान क े उपरोक्त आदेश क े दावे को अस्वीकार करने को चुनौ ी देने क े बजाय एक अवमानना आवेदन (सी) संख्या 1632/2009 दायर की। इस रह की अवमानना यातिचका में, जब व 0मान अपीलार्थी$गणों को एक सूचना जारी की गयी र्थीी ो विदनांक 08.05.2009 को विनम्नलिललिख आदेश पारिर विकया गया र्थीा- “ यह आरोप लगाया गया है विक इस न्यायालय द्वारा पारिर विदनांक 23.10.2008 क े आदेश का उल्लंघन विकया गया है। यातिचका क े परिरशीलन से, एक प्रर्थीम दृष्ट्या मामला बनाया गया है। प्रति पतिक्षयों को एक सप्ताह क े अन्दर जारी सूचनाएँ छः सप्ताह क े अन्दर वापसी योग्य हैं। प्रति पतिक्षयों को व्यविक्त को इस अवस्र्थीा में विदखाई देने की आवश्यक ा नहीं है। प्रति शपर्थीपत्र पूव0कशिर्थी अवतिध क े अन्दर दायर हो सक ी है इसक े अति रिरक्त सूचना आहू होने क े पश्चा आरोप य विकये जा सक े हैं। हालाँविक प्रति पक्षीगणों को एक महीने क े अन्दर आदेश का अनुपालन और सूचनाओं क े सार्थी ही छः सप्ताहों क े पश्चा एक य ारीख का एक अन्य अवसर प्रदान विकया गया है। ”
7. त्पश्चा विदनांक 29.06.2009 को अपीलार्थी$गणों द्वारा एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा विक प्रत्यर्थी$ को ₹ 2550-3200/- क े न्यून म वे नमान क े रूप में ₹2550/- अनुमोविद विकया गया है। दोपरान् मा. न्यायालय द्वारा विदनांक 31.08.2009 को एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा विक यद्यविप समूह “घ” क े कम0चारिरयों का न्यून म वे न ₹ 6050/- य विकया गया है ो प्रत्यर्थी$ को ₹ 2550/- क े न्यून म मासिसक वे न की दर से क्यों विदया जा रहा है। त्पश्चा राज्य क े अतिधकारिरयों की वयविक्तग मौजूदगी समय समय पर माँगने क े लिलए बहु से आदेशों को पारिर विकया गया र्थीा। विदनांक 03.12.2009 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक उ. प्र. को विनदmशिश कर े हुए एक आदेश पारिर विकया गया र्थीा विक यह सुविनतिश्च करें विक परिरशुY पात्र ा और वरिरष्ठ ा सूची सभी खण्डों में ैयार की जाय Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और पदग्राविहयों को सुनने क े पश्चा अंति म रूप विदया जाय। उक्त आदेश विनम्नानुसार पढ़ा गया- “ पक्षों क े लिलए विवद्वान अतिधवक्ता ने सुना। व्यविक्त में प्रधान मुख्य वन संरक्षक उ. प्र. और प्रधान सतिचव (वन) मौजूद हैं। राज्य का वन विवभाग विवशिभन्न योजना एवं परिरयोजनाओं में अपने काय0 क े विनष्पादन क े लिलए दैविनक वे नभोविगयों का उपयोग कर ा है और वे एक सार्थी दशकों क जारी रह े हैं। उनक े विनयविमति करण का मामला इस न्यायालय द्वारा य विकया गया र्थीा और सव च्च न्यायालय द्वारा इसकी पुविU की गई र्थीी सिजसने इस रह क े दैविनक वे नभोविगयों क े विनयविम ीकरण क े लिलए एक योजना ैयार करने का विनदmश विदया र्थीा। उसक े अनुसरण में, उ. प्र. विनयविम ीकरण दैविनक वे नभोविगयों की विनयुविक्त क े लिलए समूह “घ” पदों की विनयमावली 2001 को सरकार द्वारा अतिधविनयविम विकया गया। विनयमों क े ह प्रातिधकारिरयों को विनयविमति करण क े प्रयोजनों हे ु पात्र ा और वरिरष्ठ ा सूची ैयार करने क े लिलए विनदmशिश विकया गया र्थीा और इसक े आधार पर चयन सविमति को फ ै सला लेना र्थीा। विवशिभन्न रिरट यातिचकाओं में इस न्यायालय द्वारा सेवा में रूकावट क े मुद्दे पर भी विवचार विकया गया र्थीा और यह माना गया विक यविद पदग्राही द्वारा 2001 की विनयमावली क े आह्वान क विनर्दिदU ारीख से काय0 विकया जा रहा है, यद्यविप रूकावट क े सार्थी, विदये गये विदशाविनदmशों क े अनुसार विवचार विकया जाना चाविहये और पूव0कशिर्थी विनयमों और विनण0यों क े आधार पर अनुमति दी गयी और बड़ी संख्या में रिरट यातिचकाओं को दायर विकया गया है। हालाँविक, न्यायालय को पत्र और मनोभाव में गैर अनुपालन का आरोप लगा े हुए अवमानना आवेदन क े सार्थी भर विदया गया है। विवशिभन्न मामलों में इस न्यायालय द्वारा या ो काल्पविनक आधार पर या नकली वरिरष्ठ ा और पात्र ा सूची क े आधार पर अनुपालन को अस्वीक ृ कर विदया गया है और यहाँ क विक यविद पदों की अल्प ा का हवाला दे े हुए अनुपालन हुआ र्थीा ो भी कम0चारी को क े वल न्यून म स् र विदया गया र्थीा। इस यातिचका पर लंबी सुनवाई की गई और स्पU प्रश्नों पर उपस्थिस्र्थी अतिधकारी स्वीकार कर े हैं विक विवभन्न प्रभागों में वरिरष्ठ ा और पात्र ा सूची ैयार नहीं की गयी है। यह भी अशिभलेख पर लाया गया है विक सिजन Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA व्यविक्तयों ने विवभाग में कभी काय0 नहीं विकया है उन्हें भी विनयुक्त और विनयविम विकया गया है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक उ. प्र. यह सुविनतिश्च करेंगे विक सभी प्रभागों में परिरशुY पात्र ा और वरिरष्ठ ा सूची ैयार की जाय और अंति म रूप से सुनवाई क े बाद पदग्राही और न्यायालय को विवतिधव रूप से अगली ारीख क े विवषय में सूतिच विकया जाय। प्रति उत्तर शपर्थीपत्र का जवाब भी दायर विकया जाय। विदनांक 25.02.2010 को आगे क े आदेशों की सूची। ”
8. उक्त आदेश को मा. उच्च न्यायालय क े न्यायक्षेत्र इलाहाबाद क े विवशेष यातिचका संख्या 215/2010 में अपीलार्थी$गणों द्वारा चुनौ ी दी गई र्थीी। विवशेष यातिचका संख्या 215/2010 विनस् ारिर कर विदया गया र्थीा। मा. उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आदेश इस न्यायालय क े समक्ष चुनौ ी का विवषय बन गये। इस न्यायालय में उप विनदेशक, सामासिजक वाविनकी प्रभाग एवं अन्य बनाम लक्ष्मी चन्द्रा (2016) 4 एससीसी 721 क े रूप में प्रति वेविद विनण0य को वन विवभाग क े प्रधान सतिचव उ. प्र. और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को विनदmशिश विकया गया विक आदेशों क े काया0न्वयन पर मा. उच्च न्यायालय क े समक्ष अलग अलग शपर्थीपत्र दायर करना है ाविक सुविनतिश्च हो विक पारिर आदेशों की श R में ीन महीने क े अन्दर कामगारों को वे न विदया गया है। इस न्यायालय ने मा. उच्च न्यायालय से भी आग्रह विकया है विक इस न्यायालय द्वारा पारिर आदेशों की श R में सभी आगामी विवकासों क े ार्दिकक विनष्कष0 क पहुँचने पर विवचार विकया जाए। विदनांक 17.02.2016 को मा. उच्च न्यायालय क े समक्ष उपस्थिस्र्थी होने क े लिलए पक्षों को विनदmशिश विकया गया र्थीा।
9. विदनांक 30.03.2016 को मा. उच्च न्यायालय द्वारा सुनवाई क े लिलए अवमानना आवेदन (सी) संख्या 1632/2009 दुबारा लिलया गया र्थीा। यह आदेशिश विकया गया विक विवभाग क े लिलए कोई क 0 करने का कोई कारण शेष नहीं रह गया है विक सभी दैविनक वे न कम0चारी, चाहे वे विनयविम ीकरण क े लिलए विवचाराधीन हों अर्थीवा नहीं न्यून म वे नमान क े हकदार नहीं हैं। उ. प्र. राज्य एवं अन्य बनाम शिछद्दी एवं अन्य (2016) (1) एएलजे 226 (विवशेष यातिचका सं. 1530/2007 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 24.09.2015 को विनण$ ) क े मामले में तिडवीजन बेन्च क े विनण0य क े बल पर विवभाग क े क 0 पर इस न्यायालय क े आदेश को ध्यान में रख े हुए उपलब्ध नहीं हो सक े।
10. उक्त आदेश को अपीलार्थी$गणों द्वारा विवशेष यातिचका संख्या 261/2016- एन. क े. जानू. एवं अन्य बनाम लक्ष्मी चन्द्रा क े मामले में तिडवीजन बेन्च क े समक्ष चुनौ ी दी गयी र्थीी। मा. न्यायालय ने अवलोविक विकया विक शिछद्दी का मामला (उपरोक्त) का आदेश दूसरे तिडवीजन बेन्च क े विनण0य चंचल क ु मार ति वारी एवं अन्य बनाम श्री हरिर शंकर [(2011) आईएलएलजे 581 आॅल] क े विवपरी है और न्यायालय क े पास अब इस मामले में हस् क्षेप करने का कोई अवसर नहीं है, अब मा. सव च्च न्यायालय क े लक्ष्मी चन्द्रा का मामला (उपरोक्त) क े आदेश को ध्यान में रख े हुए शिछद्दी का मामला (उपरोक्त) क े आदेश पर बल विदया गया है। यह अवलोकन विकया गया विक स्पUीकरण मांगने क े लिलए इस न्यायालय से आग्रह करना राज्य क े लिलए खुला है। मा. न्यायालय ने विनम्नलिललिख रूप से अवलोकन विकया- “ विदनांक 02.02.2016 को सव च्च न्यायालय द्वारा आदेश पारिर विकया गया, प्रभावी रूप से पूव0 क े अवसर पर पारिर अादेशों क े प्रव 0न को सुविनतिश्च करने क े लिलए स्पU ः प्रति बिंबविब कर ा है, हमारे वैचारिरक म क े दृविUकोण में यह सत्य है विक विवशेष यातिचका संख्या 1530/2007 क े उत्तर प्रदेश राज्य बनाम शिछद्दी एवं अन्य क े मामले में तिडवीजन बेन्च का विनण0य विवशेष यातिचका संख्या 1205/2010 क े चंचल क ु मार ति वारी बनाम उ. प्र. राज्य क े मामले में सम्पूण0 रूप से असंग है। काय0 क े सामान्य प्रणाली में, यविद एक ही विवषय-वस् ु पर दो विनण0य सम्पूण0 रूप से असंग विदशाओं में हों ो स्थिस्र्थीति क े सामंजस्य क े लिलए पूम0 पीठ क े पास भेज विदया जा ा है लेविकन यहाँ मामले का थ्य यह है विक मामला विदनांक 02.02.2016 को मा. सवा0च्च न्यायालय द्वारा पारिर आदेश से बाहर विनग0 हो रहा है। मामले क े थ्यों क े आलोक में एक बार विवशेष यातिचका संख्या 1530/2007 में इस न्यायालय क े तिडवीजन बेन्च द्वारा आदेशों को पारिर विकया गया र्थीा सिजस पर राज्य द्वारा भरोसा विकया गया र्थीा सिजसक े विवषय में श्री पंकज श्रीवास् व, अतिधवक्ता द्वारा सूतिच विकया गया र्थीा विक समीक्षा आवेदन पहले ही दायर विकया जा चुका है। एक बार विवद्व एकल न्यायाधीश द्वारा पारिर आदेश सिसविवल यातिचका संख्या 879-883 द्वारा पारिर आदेश क े सार्थी सामंजस्यपूण0 ढंग से है, ब हमारे पास उक्त आदेश क े सार्थी हस् क्षेप करने का कोई अवसर नहीं है और यह हमेशा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA राज्य और इसकी शाखा क े लिलए खुला है और विवशेष यातिचका संख्या 1530/2007 में आगामी अवसर पर तिडवीजन बेन्च द्वारा पारिर विनण0य क े आलोक में स्पU आवेदन क े सार्थी मा. सव च्च न्यायालय को प्रस् ाविव विकया ाविक स्थिस्र्थीति का समाधान विकया जा सक े । ”
11. दी गयी स्व ंत्र ा क े श R में राज्य द्वारा आई ए 29-33/2016 में लक्ष्मी चन्द्रा का मामला (उपरोक्त) दो दायर विकया गया। उक्त आवेदन विदनांक 25.07.2016 को प्रत्याहृ विकया गया र्थीा। इसक े पश्चा अपीलार्थी$गणों ने विवशेष अनुमति यातिचका (सी) संख्या................/2016 सी सी संख्या 25207/2016 दायर की। विवशेष अनुमति यातिचका को मा. उच्च न्यायालय क े प्रस् ाव की स्व ंत्र ा क े सार्थी समीक्षा यातिचका दायर कर े हुए प्रत्याहृ क े रूप में विनस् ारिर कर विदया गया। आदेश विनम्नानुसार पढ़ा गया- “ क ु छ कR क े पश्चा ्, प्रत्यर्थी$गणों की रफ से प्रस् ु विवद्वान वरिरष्ठ अतिधवक्ता श्री हरिरन पी. रावल समीक्षा यातिचका क े ढंग से मा. उच्च न्यायालय में इस यातिचका को प्रस् ाव की स्व ंत्र ा क े सार्थी विनकालने की अनुमति चाह े हैं ाविक यह प्रमाशिण हो विक प्रत्यर्थी$ 1992 से 2001 क लगा ार विनयोसिज नहीं र्थीा। अनुमति जैसा विक माँगी गयी र्थीी, प्रदान की गई। दनुसार, विवशेष अनुमति यातिचका उपरोक्त स्व ंत्र ा क े सार्थी वापस लेने क े रूप में विनस् ारिर की जा ी है। ”
12. इसक े पश्चा अपीलार्थी$गणों ने विवशेष यातिचका संख्या 261/2016 में पारिर आदेश विदनांक 07.04.2016 क े विवरूY मा. उच्च न्यायालय क े न्यायक्षेत्र इलाहाबाद में एक समीक्षा यातिचका संख्या 313796/2017 दायर की। देरी की माफी क े लिलए समीक्षा यातिचका क े सार्थी एक आवेदन विदनांक 06.12.2017 को अशिभयोजन की इच्छा क े लिलए मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा दायर की जा रही समीक्षा यातिचका को विनस् ारिर कर विदया गया र्थीा। विदनांक 06.12.2017 क े आदेश को Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वापस लेने क े लिलए उक्त आवेदन जो असफल रहा जो व 0मान अपील में चुनौ ी का विवषय वस् ु है।
13. अपीलार्थी$गणों की रफ से विवद्वान वरिरष्ठ अतिधवक्ता ने क 0 विदया विक प्रत्यर्थी$ को न्यून म वे नमान का भुग ान विकया गया है और उसने 31.07.2018 को सेवाविनव 0न की आयु को प्राप्त विकया और सेवाविनवृत्त हो गया। यह विववाविद है विक इस न्यायालय का विनदmश दो भागों में है-(अ) इस न्यायालय क े विनदmशानुसार पुत्ती लाल क े मामले (उपरोक्त) में सभी दैविनक वे नभोविगयों को न्यून म वे न का भुग ान करना और (ब) सांविवतिधक विनयमों की श R में कम0चारिरयों क े विनयविम ीकरण पर विवचार करना। चूंविक न्यून म वे नमान का भुग ान प्रत्यर्थी$ को विकया जा ा है, इसलिलए इस सम्बन्ध में इस विववाद का कोई अस्थिस् त्व नहीं है।
14. हालांविक सेवा क े विनयविम ीकरण क े सम्बन्ध में, यह क 0 विदया गया विक इस बा का कोई प्रमाण नहीं है विक प्रत्यर्थी$ ने दैविनक वे नभोगी क े रूप में वष0 1994 से 2000 यानी लगभग सा वषR क काय0 विकया। अ ः उसने दैविनक वे नभोगी क े रूप में 2001 से 2003 क रूक रूककर काय0 विकया है और ऐसा कोई अशिभलेख उपलब्ध नहीं है विक प्रत्यर्थी$ ने विदसम्बर 2003 से काय0 विकया हो। अ ः जब विदनांक 19.11.2008 को अादेश पारिर विकया गया र्थीा उसक े विनयविमति करण क े लिलए उसक े दावे को स्वीकार नहीं विकया गया र्थीा।
15. एक बार आदेश विवभाग द्वारा पारिर विकया गया है, यह प्रत्यर्थी$ क े लिलए रिरट यातिचका क े माध्यम से उक्त आदेश की चुनौ ी क े लिलए मुक्त र्थीा, लेविकन अवमानना न्यायक्षेत्र को उत्पन्न नहीं विकया जा सका। अवमानना न्यायालय ने यह सुविनतिश्च विकया है विक न्यायालय का आदेश क े सार्थी अनुपालन विकया गया है। न्यायालय क े आदेश विदनांक 23.10.2008 को उसकी सेवाओं को विनयविम ीकरण और न्यून म विनयविम वे नमान क े लिलए प्रत्यर्थी$ क े मामले में विवचार करना र्थीा।
16. चूँविक अपीलार्थी$ ने विनयविम ीकरण और/अर्थीवा न्यून म वे नमान भुग ान क े दावे पर विवचार विकया है, प्रत्यर्थी$ का एकमात्र उपाय रिरट यातिचका क े माध्यम से र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मा. उच्च न्यायालय ने राज्य क े अतिधकारिरयों को न्यायालय में उपस्थिस्र्थी होने क े लिलए विववश करने क े लिलए अवमानना न्यायक्षेत्र को पार कर लिलया है और वस् ु ः मा. उच्च न्यायालय विदनांक 23.10.2008 को एकल पीठ द्वारा पारिर आदेशों क े बहु परे विनकल गये।
17. अपीलार्थी$गणों की रफ से विवद्वान वरिरष्ठ अतिधवक्ता द्वारा यह क 0 विदया गया विक शिछद्दी क े मामले (उपरोक्त) में मा. उच्च न्यायालय क े तिडवीजन बेन्च द्वारा े प्रश्न पर विवचार विकया गया है सिजसमें न्यून म वे नमान का मुद्दा और सार्थी ही सार्थी सेवा में क ृ वित्रम विवराम को य विकये गये श R में सेवा क े े मामले में परीक्षण विकया गया र्थीा। सेवा क े सम्बन्ध में मा. न्यायालय का क 0 विनम्नानुसार है- “ इस प्रकार, उपरोक्त सभी कारणों क े लिलए कहा गया विक विदनांक 17 अक्टूबर 2005 को विवद्व न्यायाधीश द्वारा राज्य सरकार को विनदmश जारी विकये गए, जो विक अंश ः रिरट यातिचकाओं की अनुमति दे े हुए न्यून म शैतिक्षक योग्य ा अर्थीवा शारीरिरक धैय0 की आवश्यक ा को अनदेखा कर े हुए उनकी सेवाओं को विनयविम ीकरण हे ु रिरट यातिचकाक ा0ओं क े मामले का पुनर्दिवचार सेवा विनयमावली में एक और विदशाविनदmश क े सार्थी विनधा0रिर विकया गया है विक जब क सभी यातिचकाक ा0गण जो अभी भी काय0 कर रहे हैं उन्हें दैविनक वे नभोगी क े आधार पर जारी रखने की अनुमति दी जानी चाविहए और न्यून म वे नमान का भुग ान होना चाविहए, दनुसार विनरन् र नहीं हो सक ा, और, अपास् । राज्य सरकार ऊपर विकये गये अवलोकनों क े आलोक में दैविनक वे नभोविगयों क े मामले पर विवचार करेगी और दैविनक भोविगयों क े रूप में उनक े अनबंध में क ृ वित्रम विवराम की अनदेखी करेगी। ”
18. विफर भी आगे, मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने सुरेन्द्र सिंसह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [विवशेष यातिचका सं. 1016/2005 24.09.2015 को विनण$ ] एक विनण0य प्रति वेविद विकया और कहा विक दो वष0 की अवतिध को एक कृ वित्रम विवराम क े रूप में उपचारिर नहीं विकया जा सक ा सिजसे विनयविम ीकरण क े दावे क े उद्देश्य हे ु उपेतिक्ष विकया जा सक ा है। न्यायालय ने विनम्नांविक रूप से कहा- “ विवद्व न्यायाधीश ने पाया विक रिरट यातिचकाक ा0गणों क े रूप में दैविनक वे नभोविगयों क े अनुबंध का विववरण विदये जाने वाले लेखा में वष0 2001-02 में काय0 कर रहे लोगों से संबंतिध स् ंभ को खाली छोड़ विदया गया र्थीा और Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वष0 2013 क े विवरूY, यह उल्लेख विकया गया विक दोनों रिरट यातिचकाक ा0 क्रमशः फरवरी 2003 और जुलाई 2003 से काय0 कर रहे र्थीे। विवद्व नयायाधीश ने यह भी अशिभलिललिख विकया और पाया विक रिरट यातिचकाक ा0गण स्र्थीापना क े बोझ का विनव0हन करने में विवफल हो चुक े हैं, यह विक, संबंतिध अवतिध क े दौरान वन विवभाग में दैविनक वे नभोगी क े रूप में काय0 कर रहे र्थीे और रिरट यातिचकाक ा0गणों का क 0 इस कारण क े लिलए भी स्वीकार नहीं विकया गया र्थीा विक वे विबना विकसी वे न भुग ान क े काय0 कर रहे है यह विवश्वास करना मुस्थिश्कल र्थीा विक रिरट यातिचकाक ा0 वास् व में दो वष0 क विबना वे न भुग ान क े काय0 कर रहे हैं। अपीलर्थी$गणों की रप से प्रस् ु विवद्वान अतिधवक्ता ने क 0 प्रस् ु विकया है विक भले ही रिरट यातिचकाक ा0गणों द्वारा क ु छ अवतिध क े लिलए काय0 न विकया गया हो, विफर भी इस विवराम को क ृ वित्रम विवराम माना जाना चाविहए और े लिलए उनक े दावे को विवचाराधीन उद्देश्य क े लिलए उपेतिक्ष विकया जाना चाविहए। व 0मान मामले में, रिरट यातिचकाक ा0ओं ने दैविनक वे नभोगी क े आधार पर दो वष0 की लंबी अवतिध क े लिलए काय0 नहीं विकया र्थीा। इस विवराम को सेवा में एक क ृ वित्रम विवराम क े रूप में उपचारिर नहीं विकया जा सक ा। रिरट यातिचकाक ा0गणों ने 2001 विनयमावली में विनविह अविनवाय0 आवश्यक ाओं की पूर्ति नहीं विकया। अ ः वे 2001 विनयमावली क े ह े लिलए हकदार नहीं है। ”
19. मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद की विवद्व एकल पीठ ने विवशेशवर बनाम प्रधान सतिचव वन अनुभाग-3 एवं अन्य [सिसविवल प्रकीण0 रिरट यातिचका सं. 47568/2002 29.11.2004 को विनण$ ] क े रूप में एक आदेश प्रति वेविद विकया, सिजसमें यह कहा गया विक विनयविम ीकरण क े मामले में क ृ वित्रम विवराम को उपेतिक्ष विकया गया। न्यायालय द्वारा विनम्नानुसार कहा गया- ” इन सभी मामलों में, मैंने पाया है विक सेवा में लघु विवराम क े आधार पर चयन सविमति द्वारा विनयविमति करण क े लिलए विवचार करने से वंतिच कर विदया गया र्थीा। प्रति शपर्थीपत्र में लिलए गये फ ै सले क े अनुसार, उन सभी व्यविक्तयों को बाहर करने क े लिलए प्रभागीय से र पर एक नीति अपनाई गयी र्थीी सिजन्होंने एक क ै लेण्डर वष0 में 240 विदनों क े काय0 पर तिचन् न नहीं विकया र्थीा। मेरी राय में यह विवचार पूण0 ः एकपक्षीय र्थीा क्योंविक हम औद्योविगक विववाद अतिधविनयम, 1947 क े ह छँटनी क े प्रश्न से व्यवहार नहीं कर रहे Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA हैं। इसक े विवपरी मैंने पाया विक इलाहाबाद प्रबाग में वन संरक्षक / क्षेत्रीय विनदेशक, सामासिजक वाविनकी इलाहाबाद उत्तर प्रदेश विवविनयविम ीकरण क े लिलए समान व्यविक्तयों क े मामले में इस नीति की अनदेखी की गई और विनदmशिश विकया गया विक 'सेवा में जारी' शब्द की व्याख्या करने में विकसी छोटे क 0 को इस स्थिस्र्थीति क े सार्थी अनदेखा विकया जा सक ा है विक उस व्यविक्त को दैविनक वे नभोविगयों पर आगामी विनयुविक्त की गई है। श्री एम. सी. च ुवmदी, अपर मुख्य स्र्थीायी अतिधवक्ता ने यह क 0 विदया विक यह आदेश त्काल खस्थिण्ड कर विदया गया। श्री पंकज श्रीवास् व ने आदेश का प्रत्याहार कर े हुए क 0 विदया विक आादेश में दी गयी व्याख्या क े सार्थी प्राप्त विनयविम ीकरण को विनरस् विकया गया र्थीा। जैसा विक वह हो सक ा है, चूँविक मैं यह जान रहा हूँ विक विनयविम ीकरण क े मामले में क ृ वित्रम विवराम को नजरअंदाज करना होगा; मुझे इस प्रश्न का फ ै सला करने की आवश्यक ा नहीं है। ”
20. उक्त आदेश विवशेष यातिचका संख्या 305/2015 में भी चुनौ ी की विवषय वस् ु र्थीी। मा. न्यायालय ने न्यून म वे नमान क े भुग ान क े सम्बन्ध में अपील की अनुमति दी परन् ु सेवा में विवराम क े सम्बन्ध में जाँच को सही ठहराया। आदेश से प्रासंविगक उYरण विनम्नांविक रूप से पढ़ा गया- “ रिरट यातिचकाक ा0गणों द्वारा यह क 0 विदया गया विक विनयमों क े ह े लिलए उनक े मामले क े सिसवा न्यायोतिच नहीं र्थीा क े वल इस कारण से विक दैविनक वे नभोविगयों क े रूप में काय0 करने क े दौरान सेवा में क ु छ विवराम र्थीे। विवद्व न्यायाधीश ने माना विक क ृ वित्रम विवराम को अनदेखा करना है, और इसलिलए प्रत्यर्थी$गणों को विनदmशिश विकया गया विक नये सिसरे से े लिलए रिरट यातिचकाक ा0 क े मामले पर विवचार करें। यह आगे विनदmशिश विकया गया र्थीा विक यविद यातिचकाक ा0 अभी भी रोजगार में है ो उसे जारी रखा जाना चाविहए और ब क न्यून म वे नमान का भुग ान होना चाविहए जब क उसका मामला विवचाराधीन है जैसा विक पुत्ती लाल बनाम अन्य एवं उ. प्र. राज्य क े मामले में मा. सवा च्च न्यायालय द्वारा विनदmशिश विकया गया है। अपीलार्थी$गणों की रफ से विवद्वान अपर महातिधवक्ता द्वारा यह कहा गया विक अपीलार्थी$गण सेवा में क ृ वित्रम विवराम की अनदेखी करने क े लिलए जारी विकए गये विदशा-विनदmश से पीविड़ नहीं है परन् ु विवद्व न्यायाधीश द्वारा रिरट यातिचकाक ा0 को न्यून म वे नमान का भुग ान करने का विनदmश अपास् होना चाविहए। ” Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
21. इस प्रकार, हम पा े हैं विक सेवा में विवराम की वजह से सेवा की े संबंध में शिशकाय को काय0वाविहयों की अवमानन में नहीं लिलया जा सक ा, जब इस रह क े मुद्दे को मा. उच्च न्यायालय में परिरसमाविप्त प्राप्त हो चुकी है।
22. उपरोक्त कहने क े पश्चा, हम पा े हैं विक मा. उच्च न्यायालय अतिधकारिरयों की उपस्थिस्र्थीति को सुरतिक्ष रखने क े लिलए समय समय पर पारिर आदेशों में न्यायोतिच नहीं र्थीा। राज्य क े अतिधकारी साव0जविनक कायR और क 0व्यों का विनव0हन कर े हैं। आदेशों को सामान्य ः अच्छे विवश्वास में पारिर होने क े लिलए परिरकस्थिल्प विकया गया न विक अन्यर्थीा साविब करने क े लिलए। अतिधकारी साव0जविनक धन क े संरक्षक क े रूप में आदेश पारिर कर े हैं अ ः मात्र इसलिलए विक एक आदेश पा 0 विकया गया है, यह उनक े व्यविक्तग उपस्थिस्र्थीति को वारंट नहीं कर ा है। काय0वाविहयों में भाग लेने क े लिलए अतिधकारिरयों को न्यायालय में सम्मन कर े हुए अतिधकारिरयों क े काय0विवतिध पर अति क्रमण कर ा है और अं ः जन ा बड़े पैमाने पर उन्हें सौंपे गये क 0व्यों पर उनकी अनुपस्थिस्र्थीति की वजह से प्रभाविव हो े हैं। अतिधकारिरयों को न्यायालय द्वारा सम्मन करने की प्रणाली सही नहीं है और यह काय0पालिलका और न्यायपालिलका की शविक्तयों क े अलगाव क े मद्देनजर न्याय प्रशासन क े उद्देश्य को पूरा नहीं कर ा है। यविद कोई आदेश कानूनी नहीं है ो मा. न्यायालयों क े पास इस रह क े आदेश को अलग करने और मामले क े थ्यों में वारंट विकये जा सकने वाले विनदmशों का जारी करने क े लिलए पया0प्त अतिधकार क्षेत्र हैं।
23. उपरोक्त कR क े मद्देनजर, हम पा े हैं विक अवमानना आवेदन संख्या 1632/2009 में सम्पूण0 काय0वाविहयाँ पूण0 रूप से अन्यायपूण0 है और इससे अतिधक अतिधकार क्षेत्र में अवमानना न्यायालय क े पास है। फलस्वरूप, अपील को अनुमति दी गयी और अवमानना अावेदन को खारिरज कर विदया गया है।................................... न्यायमूर्ति संजय विकशन कौल............................. न्यायमूर्ति हेमन् गुप्ता Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA नई विदल्ली, 10 अप्रैल, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA