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भारत का सर्वोच्च न्यायालय
दाण्डिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
दाण्डिक अपील संख्या 883/2019
[विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 1907/2019 से उत्पन्न]
नारद पटेल ... अपीलार्थी
बनाम
छत्तीसगढ़ राज्य ... प्रतिवादी
निर्णय
उदय उमेश ललित, न्यायाधीश
JUDGMENT
1. अनुमति प्रदान की गई ।
2. यह अपील छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर द्वारा आपराधिक अपील संख्या 1101/2002 में पारित अंतिम निर्णय और आदेश दिनांक 27/11/2018 की वैद्यता को चुनौती देती है ।
3. अपीलार्थी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 294, 506-बी और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 ("अधिनियम", संक्षेप में) की धारा 3(1)(x) क े अंतर्गत दंडनीय अपराध क े आरोप में विशेष न्यायाधीश, रायगढ़, छत्तीसगढ़ की फाइल क े विशेष वाद संख्या 13/2002 क े तहत मुकदमा चलाया गया। आरोप था कि दिनांक 30/09/2001 और 01/10/2001 की मध्यरात्रि में अपीलार्थी ने शिकायतकर्ता देशीराम क े धान क े खेत की मेड़ (मेध) को काट दिया, जिसक े परिणामस्वरूप देशीराम क े खेत में पानी नहीं पहुंच पाया। अगले दिन दिनांक 01/10/2001 को, पंचायत बुलाई गई जिसमें अपीलार्थी ने शिकायतकर्ता देशीराम और उसक े भाई श्याम सुंदर को कथित तौर पर अपशब्द कहे और उन्हें जान से मारने की धमकी दी। आरोप था कि अपीलार्थी ने उक्त शिकायतकर्ता देशीराम और उनक े भाई, जो अनुसूचित जनजाति क े सदस्य थे, को अपशब्द कहे और इस प्रकार अधिनियम की धारा 3(1)(x) क े अंतर्गत अपराध कारित किया। मुकदमे क े दौरान, पंचायत की बैठक में भाग लेने वाले क ु छ गवाहों को परीक्षित किया गया और विशेष न्यायाधीश, रायगढ़ ने अपने निर्णय और आदेश दिनांक 23/09/2002 द्वारा अपीलार्थी को भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और अधिनियम की धारा 3(1)(x) क े तहत अपराधों क े लिए दोषी पाया। अपीलार्थी को पहले अपराध क े लिए तीन महीने और दूसरे अपराध क े लिए छह महीने की कठोर कारावास, जुर्माना और व्यतिक्रम पर सजा सुनाई गई। हालांकि अपीलार्थी को भारतीय दंड संहिता की धारा 506 क े आरोप से विमुक्त कर दिया गया।
4. उपरोक्त दोषसिद्धि एवं सजा से उद्भूत दाण्डिक अपील संख्या 1101/2002 में, उच्च न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश द्वारा लिए गए दृष्टिकोण की पुष्टि की और अपील को अपने निर्णय और आदेश दिनांक 27/11/2018 द्वारा खारिज कर दिया, जो वर्तमान में अपील क े तहत है।
5. हमने अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री विक्रांत सिंह बैस और प्रतिवादी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री निजाम पाशा को सुना।
6. अभिलेखानुसार, अपीलार्थी पहले ही चार महीने से अधिक का कारावास भुगत चुका है।
7. यह पाया गया है कि अपीलार्थी भारतीय दंड संहिता क े धारा 506 क े तहत अपराध का दोषी नहीं था और अभियोजन पक्ष द्वारा उस सम्बन्ध में प्रस्तुत मामले को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया था। अभिलेखानुसार, अपीलकर्ता द्वारा नियत क ृ त्य क े पश्चात पंचायत बुलाई गई, जिसमें अपीलार्थी द्वारा क ु छ अपशब्द कहे गए थे। शिकायतकर्ता देशीराम क े कथन क े अनुसार, विवाद क े दौरान अपीलार्थी द्वारा प्रयोग किए जाने वाले वाक्यांशों में शिकायतकर्ता से सम्बंधित जाति या जनजाति का उल्लेख नहीं था, हालांकि इस तरह क े अभिकथन अन्य साक्षियो क े साक्ष्य में आये हैं।
8. इस प्रकार, यह तथ्य स्पष्ट है कि अपीलार्थी ने शिकायतकर्ता देशीराम को अपशब्द कहे और इस प्रकार भारतीय दंड संहिता क े धारा 294 क े तहत दी गई उसकी दोषसिद्धि और सजा पूरी तरह से उचित थी । हालाँकि, शिकायतकर्ता देशीराम क े अभिकथन में उसक े जाति या जनजाति का कोई उल्लेख नहीं था अतः अधिनियम की धारा 3 (1) (x) क े आरोप का सिर्फ संदेह है।
9. ऐसी परिस्थिति में, अपीलार्थी की भारतीय दंड संहिता की धारा 294 क े तहत दोषसिद्धि और सजा की पुष्टि करते हुए उसे संदेह का लाभ दिया जाता है और उसे अधिनियम की धारा 3(1)(x) क े आरोप से दोषमुक्त किया जाता है।
10. उपरोक्त सीमा तक अपील स्वीकार की जाती है। जब तक किसी अन्य मामले में अपीलार्थी की हिरासत की आवश्यकता न हो, उसे मुक्त किया जाये।........................न्यायाधीश (अरुण मिश्रा)........................न्यायाधीश (उदय उमेश ललित) नई दिल्ली, 10 मई, 2019 खंडन (डिस्क्लेमर): स्थानीय भाषा निर्णय क े अनुवाद का आशय, पक्षकारों को इसे अपनी भाषा में समझने क े उपयोग तक ही सिमित है और अन्य प्रयोजनार्थ इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता. समस्त व्यावहारिक एवं कार्यालयीन प्रयोजनार्थ, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक होगा एवं निष्पादन तथा कार्यान्वयन क े प्रयोजनार्थ क्षेत्र धारित करेगा I