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समक्ष भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपीलीय न्यायक्षेत्र
सिसविवल अपील सं. 4794 वर्ष 2019
(विवशेर्ष अनुमति याति'का (सिसविवल) सं. 9527 वर्ष 2018 से उद्भू )
लाल बहादुर गौ म .... अपीलार्थी5
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य .... प्रत्यर्थी5(गण)
विन ण य
न्यायमूर्ति नवीन सिसन्हा
देरी माफ की गई। अनुमति प्रदान विकया गया।
JUDGMENT
2. अपीलार्थी5 उत्तर प्रदेश राज्य विवश्वविवद्यालय अतिAविनयम, 1973 (इसक े बाद "अतिAविनयम" क े रूप में संदर्भिभ ) क े ह 'ौAरी 'रण सिंसह विवश्वविवद्यालय मेरठ (ए स्मिLमनपश्चा 'सीसीएस विवश्वविवद्यालय' क े रूप में संदर्भिभ ) से संबद्ध एक विनजी असहाय ा प्राप्त कॉलेज में एक प्रवक्ता र्थीा और उसे अतिAविनयम क े प्रावAानों क े विवपरी विदनांक 24.04.2017 को सेवामुक्त कर विदया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 2019 INSC 648
3. अपीलार्थी5 क े लिलए विवद्वान अतिAवक्ता ने यह क विदया विक सेवामुविक्त अतिAविनयम की Aारा 35(2) क े उल्लंघन में र्थीी क्योंविक कोई पूव अनुमोदन नहीं ली गई र्थीी। उच्च न्यायालय ने की गई त्रुवि] को अवAारिर कर े हुए कहा विक रिर] याति'का पोर्षणीय नहीं र्थीी। विनष्कासन क े पूव क े आदेश 04.06.2015 विदनांविक को क ु लपति द्वारा विदनांक 16.07.2016 को इस कारण से अपाL विकया गया र्थीा और विवश्वविवद्यालय विवविनयमों क े विनयम संख्या 16.06 का भी उल्लंघन विकया जा रहा र्थीा। आदेश को प्रत्यर्थी5 क े प्रबंAन द्वारा विकसी भी 'ुनौ ी क े अभाव में अंति म रूप विदया गया र्थीा।
4. प्रत्यर्थी5 प्रबंAन क े लिलए विवद्वान अतिAवक्ता ने क विदया विक रिर] याति'का एक विनजी असहाय ा प्राप्त कॉलेज क े विवरूद्ध अपोर्षणीय र्थीी क्योंविक यह संविवAान क े अनुच्छेद 12 क े अर्थी क े ह "राज्य" नहीं र्थीा। उच्च न्यायालय का आदेश विकसी भी हL क्षेप क े लिलए नहीं कह ा है। व्यविक्तग सेवा क े अनुबंA का कोई प्रव न नहीं हो सक ा है। यहाँ गुरु और सेवक का सामान्य रिरश् ा र्थीा। विवतिA क े अनुसार विवभागीय कायवाही की गई। कॉलेज की प्रबंA सविमति एक वैAाविनक विनकाय नहीं र्थीी। एक्सक्यूवि]व कविम]ी ऑफ वैश तिkग्री कॉलेज, शामली एवं अन्य बनाम लक्ष्मी नारायण एवं अन्य (1976) 2 एससीसी 58 पर अवलम्ब लिलया गया र्थीा।
5. हमने पक्षकारों की ओर से कp पर विव'ार विकया है। उच्च न्यायालय ने अवAारिर विकया विक क े वल सीसीएस विवश्वविवद्यालय से संबद्ध ा क े कारण, रिर] याति'का एक विनजी असहाय ा प्राप्त कॉलेज क े विवरूद्ध अपोर्षणीय र्थीी। यह आदेश अतिAविनयम क े वैAाविनक प्रावAानों क े विकसी भी विव'ार से रविह अप्रक] और संवाद रविह है। क ु लपति क े आदेश विदनांक 16.07.2016 क े प्रभाव और परिरणामों पर भी विव'ार नहीं विकया गया है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
6. प्रत्यर्थी5 कॉलेज ने विदनांक 04.06.2015 को अपीलार्थी5 की सेवाओं को विबना विकसी सू'ना क े त्काल प्रभाव से सेवामुक्त कर विदया। अपीलार्थी5 क ु लपति से विमला, क ु लपति ने कॉलेज को सुनने क े बाद Aारिर विकया विक 'ूंविक अतिAविनयम की Aारा 35(2) और सपविठ विनयम संख्या 16.06, विवश्वविवद्यालय विवविनयम क े ह पूव अनुमोदन प्राप्त नहीं विकया गया है इसलिलए सेवामुविक्त का आदेश गल र्थीा और इसे अपाL कर विदया जाए। लेविकन क्योंविक विवत्तीय गड़बड़ी क े गंभीर आरोप र्थीे इसलिलए प्रबंAन को विवभागीय कायवाही Aारिर करने की Lव ंत्र ा दी गई र्थीी। प्रबंAन ने आदेश को Lवीकार कर लिलया और 24.04.2017 विदनांविक को सेवामुविक्त क े नए आदेश में विवभागीय कायवाही प्रारम्भ की। सेवामुविक्त क े नए आदेश में पुनः अतिAविनयम और सीसीएस विवश्वविवद्यालय क े विवविनयमों क े प्रावAानों का उल्लंघन र्थीा।
7. अतिAविनयम की Aारा 35 (2) में इसक े महत्वपूण अंश विनम्नानुसार हैं:- “35. मान्य ा प्राप्त अर्थीवा संबद्ध कॉलेजों क े शिशक्षकों की सेवा की श x जो सरकार या Lर्थीानीय प्रातिAकारी द्वारा पोविर्ष नहीं हैं- (1) प्रत्येक शिशक्षक मान्य ा प्राप्त या संबद्ध कॉलेज (राज्य सरकार द्वारा विवशेर्ष रूप से पोर्षणीय एक कॉलेज क े अलावा) में एक लिललिy अनुबंA क े ह विनयुक्त होगा सिजसमें ऐसे विनयम और श x होंगी सिजन्हें विनय विकया जाएगा। अनुबंA को विवश्वविवद्यालय में अशिभलिललिy विकया जाएगा और इसकी एक प्रति संबंतिA शिशक्षक को दी जाएगी और दूसरी प्रति संबंतिA कॉलेज द्वारा रyी जाएगी। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds (2) इस प्रकार क े कॉलेज क े प्रबंAन का प्रत्येक विनणय विकसी शिशक्षक को विनलंविब करने या ह]ाने या श्रेष्ठ ा में कमी या विकसी अन्य रीक े से उसे दंतिk करने से पहले उसको सूति' विकए जाने से पूव क ु लपति को सूति' विकया जाएगा और जब क विक इसे क ु लपति द्वारा अनुमोविद नहीं विकया जा ा है ब क यह प्रभावी नहीं होगा। XXXXXXXX”
8. विवश्वविवद्यालय से मान्य ा प्राप्त कॉलेज को अतिAविनयम क े प्रावAानों द्वारा अनुपालन न करने क े लिलए संबंतिA परिरणामों क े सार्थी बाध्य र्थीा। कॉलेज ने क ु लपति क े आदेश को Lवीकार कर लिलया और विवभागीय कायवाही अवAारिर करक े उस पर कारवाई की है विक वह आदेश क े एक भाग से बाध्य है और दूसरे से नहीं। इस आदेश क े ह अपने दातियत्वों का अनुपालन विकए विबना आदेश का लाभ नहीं हो सक ा है। वैAाविनक प्रावAान क े बारे में यह प ा 'ल ा है विक क ु लपति की पूव Lवीक ृ ति अपीलार्थी5 की सेवामुविक्त से पहले अविनवाय र्थीी। यविद कॉलेज प्रबंAन की राय अन्यर्थीा हो ी ो उन्हें क ु लपति क े आदेश विदनांविक 16.07.2016 को 'ुनौ ी देनी 'ाविहए, यविद ऐसा आदेश पोर्षणीय हो ा। आदेश को अंति म रूप की अनुमति देकर अब यह कॉलेज प्रबंAन आग्रह नहीं कर सक ा विक वह प्रवि•या का पालन करने क े लिलए बाध्य नहीं र्थीा। अतिAविनयम की Aारा 35 (2) क े ह सेवामुविक्त आदेश विदनांविक 24.04.2017 Lपष्ट रूप से पोर्षणीय नहीं है।
9. लक्ष्मी नारायण (उपरोक्त) मामले में अवलंब लेना पूण रूप से त्रुवि]पूण है। व मान मामले में या ो थ्यों पर या कानून में इसका कोई भी आवेदन नहीं है। उक्त मामले में सेवामुविक्त का आदेश विदनांक 29.03.1967 को हुआ र्थीा और Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds आगरा विवश्वविवद्यालय अतिAविनयम, 1926 क े ह बनाया गया र्थीा, सिजसमें अतिAविनयम की Aारा 35(2) क े समान प्रावAान नहीं र्थीे। इसक े अति रिरक्त आगरा विवश्वविवद्यालय अतिAविनयम, 1926 को अतिAविनयम की Aारा 74(1)(सी) द्वारा विनरसिस कर विदया गया है। यह वाL व में दुभाग्यपूण है विक विवद्वान अतिAवक्ता ने प्रति वादी प्रबंAन क े लिलए विनरसन अतिAविनयम क े ह विनणय पर अवलम्ब लेने की मांग की है। लक्ष्मी नारायण (उपरोक्त) मामले में Lवीक ृ स्मिLर्थीति यह र्थीी विक कॉलेज का प्रबंAन विवतिAयों और आगरा विवश्वविवद्यालय अतिAविनयम, 1926 क े प्रावAानों से बाध्य नहीं र्थीा, लेविकन क े वल एक प्रर्थीाग मामले क े समान र्थीा। आगरा विवश्वविवद्यालय हैंk बुक क े संविवतिA 14(ए) में भी अतिAविनयम की Aारा 35(2) जैसे कोई प्रावAान नहीं र्थीे। "संविवतिA 14 (ए): प्रत्येक कॉलेज, जो पहले से ही संबद्ध है या जब संबद्ध है, सिजसे विवशेर्ष रूप से सरकार द्वारा नहीं 'लाया जा ा है, एक विनयविम रूप से गविठ शासी विनकाय (सिजसमें प्रबंAन सविमति शाविमल है) क े प्रबंAन क े ह होना 'ाविहए, सिजस पर कॉलेज क े कम'ारिरयों का प्रति विनतिAत्व कॉलेज क े प्रिंप्रसिसपल द्वारा विकया जाएगा और कॉलेज क े शिशक्षकों का कम से कम एक प्रति विनतिA कॉलेज में कायावतिA क े आAार पर विनAारिर वरिरष्ठ ा •म में '•ण द्वारा विनयुक्त विकया जाएगा, जो एक शैक्षशिणक वर्ष क े लिलए पद Aारण करेगा।”
10. आदेश से पूव, हम विनजी कॉलेज क े प्रति वादी प्रबंAन की ओर से हमें दी जाने वाली सहाय ा क े रीक े क े बारे में अवलोकन करने क े लिलए विववश हैं। आज अनुसंAान क े लिलए सू'ना प्रौद्योविगकी की आसान पहुं' क े बावजूद, विवतिAक व्यवLर्थीा की बहुल ा, सिजनका पूव अध्ययन विकया जाना र्थीा, की ुलना में व मान Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अतिAविनयम द्वारा Lपष्ट रूप से विनरसिस अतिAविनयम क े आAार पर एक yारिरज विकए गए विनणय पर अवलम्ब लेने क े सदृश विनणय पर अवलम्ब लिलया गया र्थीा। इसक े परिरणामLवरूप क े वल न्यायालय क े न्यातियक समय की बबादी हुई है, सार्थी ही आवश्यक शोA करने क े लिलए न्यायाAीशों पर एक कविठन क व्य भी शाविमल है। हम यह मानने में पूरी रह से गल नहीं होंगे विक यद्यविप यह उपेक्षा भी हो सक ी है, लेविकन न्यायालय को एक गल फ ै सले क े लिलए भ्रामक ब ाकर न ीजे घा क हो सक े हैं।
11. ऐसे ही, देश में न्याय विव रण प्रणाली क े विवरूद्ध उस क व्य में विवफल ा गल है। यह देy े हुए विक विपछले क ु छ वर्षp में, इस Lकोर पर सिजम्मेदारी और देyभाल में विगराव] आई है, और इस थ्य क े बावजूद विक समाज क े लिलए न्याय इ ना महत्वपूण है, यह समय है विक हमने समLया पर ध्यान विदया, और समLया को दूर करने क े लिलए ऐसे कदमों पर विव'ार विकया। हम सभी L रों पर पक्षकारों और उनक े अतिAवक्ता क े क व्य को बार बार कह े हैं, ाविक न्यायालय में कोई भी प्रL ुति देने से पूव उसकी जाँ' और सत्यापन विकया जा सक े । यह संदेश भेजा जाना 'ाविहए विक प्रत्येक को न्यायालय में प्रL ु होने क े लिलए सिजम्मेदार और सावAान रहना होगा। इन मुद्दों पर विव'ार करने का समय आ गया है ाविक न्याय प्रणाली में नागरिरकों का विवश्वास न yोए। यह सभी L रों पर न्यायालयों क े लिलए भी है विक वे इस बा पर विव'ार करें विक क्या विकसी पक्षकार द्वारा विवशेर्ष प्रL ुति या विकसी पक्षकार द्वारा आ'रण ने न्यायालय क े समय की अनावश्यक बबादी की है, और यविद ऐसा है, ो उस संबंA में उति' आदेश पारिर करें। इन सबक े बाद न्यायालय क े समय का उपयोग न्याय विव रण और विवरोAात्मक प्रणाली क े लिलए विकया जाना, बबादी का लाइसेंस नहीं है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
12. न्यायालय क े एक सिजम्मेदार अतिAकारी और न्याय प्रशासन क े एक महत्वपूण सहायक क े रूप में, अतिAवक्ता विनLसंदेह न्यायालय क े सार्थी-सार्थी विवपरी पक्ष क े प्रति भी क व्य का पालन कर ा है। न्याय सुविनतिश्च करने क े लिलए उसे विनष्पक्ष रहना होगा। यविद वह अपने मुववि‰ल क े प्रवक्ता क े रूप में काय कर ा है, ो वह Lवयं को अवन कर ा है जैसा विक पंजाब राज्य एवं अन्य बनाम बृजेश्वर सिंसह 'हल एवं अन्य, (2016) 6 एससीसी 1 में अवलोविक विकया गया: “34.…अतिAवक्ता और उसक े मुववि‰ल क े बी' भरोसा और विवश्वास का रिरश् ा हो ा है। न्यायालय क े एक सिजम्मेदार अतिAकारी और न्याय प्रशासन क े एक महत्वपूण सहायक क े रूप में अतिAवक्ता न्यायालय क े सार्थी-सार्थी विवपरी पक्षकार क े लिलए भी क व्य मान े हैं। न्याय सुविनतिश्च करने क े लिलए उन्हें विनष्पक्ष रहना होगा। यविद वह अपने मुववि‰ल क े प्रवक्ता क े रूप में काय कर े हैं ो वह Lवयं को अवन कर े हैं। …..”
13. एक अतिAवक्ता क े क व्य और विनष्पक्ष ा और आवश्यक सत्यविनष्ठा क े उच्च म विबन्दु क े संबंA में kी.पी. 'ड्ढा बनाम वित्रयुगी नारायण विमश्रा एवं अन्य, (2001) 2 एससीसी 221 में अवलोकन विकए गये र्थीे:- “22. क े वल विनणय की त्रुवि] या यर्थीोति' अशिभम या कानून क े एक संविदग्A या कनीय मुद्दे पर कदम उठाना कदा'ार नहीं है; यह शब्द अं र्निनविह इरादे से अपना रंग ले ा है। लेविकन एक ही समय में कदा'ार जरूरी नहीं विक नैति क अAम ा से जुड़ी कोई 'ीज हो। यह विवर्षय-वL ु Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds और संदभ क े विवर्षय में माना जा ा है, सिजसमें इस शब्द को विनयोसिज करने क े लिलए कहा जा ा है। अपने व्यावसातियक काय का विनवहन करने वाले अतिAवक्ता का अपने मुववि‰ल क े प्रति क व्य, अपने विवपक्षी क े प्रति क व्य, न्यायालय क े लिलए क व्य, बड़े L र पर समाज क े लिलए क व्य और Lवयं क े लिलए क व्य है। इसमें सं ुलन बनाने और सत्यविनष्ठ अपनाने क े लिलए उच्च L र की सत्यविनष्ठा और सं ुलन की आवश्यक ा हो ी है, और अतिAक ब, जब परLपर विवरोAी दावे हों। न्यायालय में क व्य का विनवहन कर े हुए, एक अतिAवक्ता को कभी भी जानबूझकर विकसी भी Aोyे, र्षkयन्त्र या AोyाAड़ी क े पक्ष में नहीं होना 'ाविहए। एक अतिAवक्ता न्यायालय क े समक्ष प्रL ाव रy े हुए अपनी श्रेष्ठ ा और क्षम ा को प्रदर्भिश कर ा है जो उसक े मुववि‰ल क े विह में हो और यह वह अपनी ार्निकक क्षम ा को अपनाकर कर ा है। हालांविक, अच्छी रह से सुलझाया गया कानून क े एक प्रिंबदु को या विनर्निववाद रूप से Lवीकार कर े हुए, क े वल संदेह में या न्यायाAीश को गुमराह करने क े आलोक में नहीं प्रदर्भिश करना 'ाविहए और सिजससे मुववि‰ल को अनुति' लाभ हो सक ा हो, सिजसक े वह हकदार नहीं हो सक े। एक अतिAवक्ता का ऐसा आ'रण ब और yराब हो जा ा है जब उसक े द्वारा ति'वित्र कानून क े बारे में विव'ार विकया जा ा है जो न क े वल विवतिA में असमर्थीनीय हो ा है बस्मि•क यविद Lवीकार विकया जा ा है ो मुववि‰ल क े विह को नुकसान पहुं' ा है और प्रति वादी पर विवतिAविवरूद्ध लाभ हो ा है। ऐसी स्मिLर्थीति में आ'रण की मंशा और अनुपयुक्त ा का गल होना अवाL विवक से अतिAक है। व्यावसातियक कदा'ार ब गंभीर हो ा है जब इसमें मुववि‰ल क े विवश्वास को Aोyा देना शाविमल हो ा है और यह सबसे गंभीर हो ा है जब यह न्यायालय को जानबूझकर गुमराह करने का प्रयास या Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds न्यायालय में Aोyे या AोyाAड़ी का काय करने का प्रयास विकया जा ा है। मुववि‰ल अपने विवश्वास और भाग्य को उस मामले क े उद्देश्य क े लिलए अतिAवक्ता क े सुपुद कर ा है और न्यायालय अतिAवक्ता पर मामले दर मामले को विदन पर विदन अपना विवश्वास बनाए रy ी है। एक मुववि‰ल अपने अतिAवक्ता से असं ुष्ट होकर उन्हें बदल सक ा है, लेविकन न्यायालय ऐसा नहीं कर सक ा। और इसलिलए न्यायालय और अतिAवक्ता क े बी' विवश्वास का बंAन विबना ]ू]े Lवीकार कर ा है। XXX XXX XXX
24. यह पुरानी कहाव है विक न्यायालय और अतिAवक्ता का पेशा न्याय क े रर्थी क े दो पविहए हैं। प्रति क ू ल प्रणाली में, यह कहना अतिAक उति' होगा विक जब न्यायाAीश क े शासन कर ा है, दो प्रति वादी अतिAवक्ता उसी रर्थी क े पविहए हैं। जब कायविवतिA की विदशा शासन करने वाले न्यायाAीश द्वारा विनयंवित्र हो ी है, इन कायविवतिA को पविहयों की सुविवAा प्राप्त हो ी है सिजसक े विबना न्याय का रर्थी आगे नहीं बढ़ सक ा है और यहां क विक विगर भी सक ा है। पीठ और बार क े बी' क व्यों और सौहादपूण संबंAों क े विनवहन में पारLपरिरक विवश्वास रर्थी की गति को सहज कर दे ा है। न्यायालय क े सिजम्मेदार अतिAकारिरयों, जैसा विक उन्हें कहा जा ा है क े रूप में, और सही कहें ो, अतिAवक्ता को न्याय क े न्यायपूण और उति' प्रशासन में न्यायपूण और उति' रीक े से न्यायालयों की सहाय ा करने का एक समग्र दातियत्व है। जोश और उत्साह पेशे में सफल ा क े लक्षण हैं, लेविकन पर्थीभ्रष्ट जोश और अति उत्साह का एक पेशेवर क े व्यविक्तत्व में कोई Lर्थीान नहीं है। XXXX XXXX XXXX Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
26. एक अतिAवक्ता को न्यायालय को कानून की सही स्मिLर्थीति ब ाने में संको' नहीं करना 'ाविहए जब वह विनर्निववाद हो और अपवाद रविह मान ा हो। विकसी उच्च न्यायालय क े विनणय द्वारा य विकए गए कानून का एक दृविष्टकोण या एक बाध्यकारी विमसाल भले ही वह अपने मुववि‰ल क े उद्देश्य की सेवा न करे परन् ु विनःसंको' न्यायालय क े संज्ञान में लाया जाना 'ाविहए। एक अतिAवक्ता का यह दातियत्व दोनों पक्षों में से विकसी एक क े लिलए पेश होने वाले अतिAवक्ता में न्यायालय द्वारा विदए गए विवश्वास से आ ा है। एक अतिAवक्ता, जो न्यायालय का एक अतिAकारी है, न्यायाAीश को कानून की सही स्मिLर्थीति से अवग कराएगा 'ाहे वह विकसी भी पक्ष क े विवरूद्ध हो अर्थीवा नहीं।"
14. एक संLर्थीान का प्रति विनतिAत्व करने वाले एक अतिAवक्ता पर बड़ी सिजम्मेदारी राजLर्थीान राज्य एवं अन्य बनाम सुरेंद्र मोहनो] एवं अन्य (2014) 14 एससीसी 77 में Aारिर विकया गया:- “33. जहां क राज्य क े लिलए अतिAवक्ता का प्रश्न है, यह विनतिश्च रूप से कहा जा सक ा है विक उनक े पास एक बड़ी सिजम्मेदारी है। एक अतिAवक्ता जो राज्य का प्रति विनतिAत्व कर ा है उसे थ्यों को सही और ईमानदार रीक े से ब ाना आवश्यक है। उसे अपने क व्य का विनवहन बड़ी सिजम्मेदारी क े सार्थी करना होगा और प्रत्येक काय को समझदारी से करना होगा। उनसे आ'रण क े उच्च L र की उम्मीद की जा ी है। न्यायालय क े प्रति सहाय ा प्रदान करने में उनका विवशेर्ष क व्य है। ऐसा इसलिलए है क्योंविक उनका लोक अशिभलेy क पहुं' है और वह लोक विह की रक्षा क े लिलए भी बाध्य है। इसक े अलावा, उसक े पास न्यायालय Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds की एक नैति क सिजम्मेदारी है। जब ये मू•य yराब हो जा े हैं, ो कोई कह सक ा है विक "'ीजें अलग हो जा ी हैं"। उसे हमेशा Lवयं को याद विदलाना 'ाविहए विक एक अतिAवक्ता, महत्वाकांक्षा और उपलस्मिब्A क े प्रति असंवेदनशील नहीं होने क े बावजूद, उसकी हति•यों में कानूनी पेशे की नैति क ा और बड़प्पन की भावना को महसूस होनी 'ाविहए। हमें उम्मीद है विक पविवत्र और सम्माविन क व्य का क व्य की ओर प्रति वि•या होगी।”
15. इस विनष्कर्ष क े मद्देनजर विक सेवामुविक्त अतिAविनयम क े सीAे विवरोA में है, इसे अपाL रyा गया है। अपीलार्थी5 को बहाली को अवAारिर विकया जा ा है। प्रति वादी क े प्रबंAन को अविनयविम ा क े 'रण से कानून क े अनुसार नए सिसरे से आगे बढ़ने से नहीं रोका गया है। उस स्मिLर्थीति में कु लपति व मान आदेश में विकसी भी अवलोकन से प्रभाविव हुए विबना कानून क े अनुसार अपनी गुणावगुण क े आAार पर अनुमोदन क े विकसी भी अनुरोA पर विव'ार करेंगे। मेहन ाने का प्रश्न, यविद कोई हो ो क ु लपति का इस रह क े विकसी भी विनणय द्वारा बाध्य होगा।
16. अपील का विनप]ारा विकया गया।............................... (न्यायमूर्ति अरुण विमश्रा) Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA.................................. (न्यायमूर्ति नवीन सिसन्हा) नई विदल्ली, 08 मई, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds