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भारत का सर्वोच्च न्यायालय
आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
आपराधिक अपील संख्या 2059/2013
राजस्थान राज्य ..…....अपीलार्थी(गण)
बनाम
महेश क
ु मार@महेश धौलपुरिया और अन्य ..…....प्रत्यर्थी (गण)
क
े साथ
आपराधिक अपील संख्या 2060/2013
निर्णय
JUDGMENT
1. ये दोनों अपीलें अभियोजन पक्ष द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय क े दिनांक 3 जनवरी, 2012 क े उस निर्णय को चुनौती देते हुए दायर की गई हैं, जिसमें प्रत्यर्थीगण को भा.दं.सं की धारा 302, 201 सहपठित धारा 34 क े तहत अपराधों क े लिए दोषमुक्त किया गया था।
2. अभियोजन पक्ष क े मामले क े अनुसार 19 अक्त ू बर, 2002 को दोपहर 12.30 बजे सूचनकर्ता अब्दुल हक ने एक लिखित रिपोर्ट दी कि 18 और 19 अक्त ू बर, 2002 की दरम्यानी रात को, जब वह रेलवे लाइन, कोटा क े निकट बोरखेड़ा पुलिया स्थित अपने रेलवे क्वार्टर में सो रहा था, लगभग 12.05 बजे, मदन भील और परमानंद भील उसक े क्वार्टर में आए और उसे जगाया । उन्होंने कहा कि एक अज्ञात व्यक्ति का शव 916/8.10 किलोमीटर रेलवे लाइन, कोटा (राजस्थान) स्थित पुलिया क े नीचे पड़ा है। इसक े बाद, वह वहां पहुंचा और देखा कि मृतक क े सिर, मुंह और चेहरे पर चोट क े निशान हैं। पूछताछ पर श्रीमती सरोती बाई भील ने खुलासा किया कि पेशाब करने क े लिए उठने से क ु छ समय पहले उसने एक ऑटो रिक्शा से दो तीन व्यक्तियों को आते देखा, जिन्होंने उक्त शव को रेलवे लाइन पर रखा था और चले गए थे। वहां खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि यह मृत शरीर रिटायर्ड कांस्टेबल बजरंगलाल का है। मुखबिर अब्दुल हक द्वारा की गई रिपोर्ट क े तथ्यों क े आधार पर थाना प्रभारी मौक े पर पहुंचे और धारा 302, 201 सहपठित धारा 34 आईपीसी क े तहत अपराध पाया। यह रिपोर्ट श्री फजलुर रहमान, हेड कांस्टेबल क े साथ पुलिस थाना नयापुरा, कोटा को मामला दर्ज करने क े लिए भेजी गई थी।
3. हेड कांस्टेबल द्वारा अपराध संख्या 679/02 दर्ज किया गया था और प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाना प्रभारी को भेजी गई थी। इसक े बाद, अनुसंधान किया गया और मजिस्ट्रेट की अदालत में प्रत्यर्थी महेश क ु मार, दीनू @ दीनदयाल और भैया @ देवकरण क े खिलाफ आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया। विद्वत मजिस्ट्रेट ने मामले को सत्र न्यायालय, कोटा को सौंप दिया, जहां से इसे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, संख्या 2, फास्ट ट्रैक, कोटा को स्थानांतरित कर दिया गया।
4. अपने समर्थन में अभियोजन पक्ष ने 25 गवाह पेश किए और अपने दस्तावेजी साक्ष्य में प्रदर्श पी-1 से पी-45 प्रदर्शित किया। इसक े बाद, प्रत्यर्थीयों क े बयान दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 313 क े तहत दर्ज किए गए। बचाव में, डीडब्ल्यू-1 राजेंद्र सिंह को पेश किया गया था और अभियोजन पक्ष क े गवाहों प्रताप और भूपेंद्र क े बयानों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 161 क े तहत दर्ज किया गया था, जिन्हें प्रदर्श डी-1 और डी-2 क े रूप में माना गया था।
5. विद्वान सत्र न्यायाधीश ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री क े आधार पर सभी प्रत्यर्थीयों को धारा 302, 201 सहपठित धारा 34 आईपीसी क े तहत दोषी ठहराया और उन्हें जुर्माने क े साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसे प्रत्यर्थीयों द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 374 क े तहत अपील में राजस्थान उच्च न्यायालय की खंड पीठ, जयपुर पीठ, जयपुर क े समक्ष चुनौती दी गई थी।
6. अभिलेखों क े मूल्यांकन पर, उच्च न्यायालय ने दिनांक 3 जनवरी, 2012 क े अपने आक्षेपित निर्णय में एक निष्कर्ष दर्ज किया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला बहुत ही संदिग्ध, विरोधाभासी होकर बिल्क ु ल भी विश्वसनीय नहीं है। साथ ही यह भी देखा गया कि अभियोजन पक्ष क े अधिकांश गवाहों को पक्षद्रोही घोषित कर दिया गया था और कई महत्वपूर्ण और प्रासंगिक गवाहों को बिना किसी कारण क े अभियोजन पक्ष द्वारा पेश नहीं किया गया है।
7. मृतक बजरंगलाल क े शव की शिनाख्त करने वाले और शव को रेलवे ट्रैक से उठाकर साइड में रखने वाले दयाराम और गुलाब को पेश नहीं किया गया है। मृतक क े समधी, बजरंगलाल और बृजगोपाल, पी डब्ल्यू-5 राजेशबाई क े पिता को पेश नहीं किया गया। इसक े अलावा हत्या का कारण बताने वाले गवाहों सुरेंद्रसिंह, रामगोपाल, रामस्वरूप, गिर्राज गुप्ता, प्रेमचंद व श्यामबाबू को पेश नहीं किया गया। इस घटना का उद्देश्य, जो कथित रूप से सुलोचना और प्रत्यर्थी समीर महेश क े अवैध संबंध से जुड़ा होना बताया गया है, उस कथित सुलोचना को अभियोजन पक्ष क े गवाह क े रूप में पेश नहीं किया गया है । फर्दों क े गवाह, प्रदर्श पी-13, पी-15, पी-41 दिलीप सिंह आदि को पेश नहीं किया गया है। फर्द प्रदर्शों पी-30, पी-35 और पी-36 क े गवाह हेमराज और फर्द प्रदर्श पी-41 क े गवाह विजय को पेश नहीं किया गया है। फजलुर रहमान, पुलिस हेड कांस्टेबल, जो लिखित रिपोर्ट प्रदर्श पी 24 लेकर थाने गए था और उनकी लिखित रिपोर्ट पर एफआईआर दर्ज की गई थी, को पेश नहीं किया गया है। रमेश की मौसी, जो पी.डब्ल्यु. 2 नरेंद्र क े साथ कथित तौर पर राजेश क े पास गई थी, को पेश नहीं किया गया है। प्रदर्श पी20 क े गवाहों- भरतराम, रईस मोहम्मद, सुरेंद्र सिंह और बृजगोपाल को पेश नहीं किया गया है। अभियुक्त की गिरफ्तारी फर्द प्रदर्श पी-26, पी- 27, पी-28, और पी-32 क े गवाह बालक उर्फ मानसिंह और इमाम पेश नहीं किए गए हैं।
8. यह भी देखा गया है कि अभियोजन पक्ष कोई भी न्यायसंगत जवाब देने में विफल रहा कि तीनों प्रत्यर्थीयों को 19 अक्टूबर, 2002 को रात 11:30 बजे गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 3 से 10 दिनों क े अंतराल क े बाद यानी 23, 25, 26 और 29 अक्टूबर, 2002 को बरामदगी की कार्यवाही क्यों की गई। उच्च न्यायालय द्वारा यह भी बताया गया है कि जांच अधिकारी ने अपने बयान में दर्ज किया है कि ऑटो में कोई खून क े निशान नहीं पाए गए थे, जो यह स्थापित नहीं कर सका कि कथित रूप से ऑटो मृतक क े शरीर को रेलवे लाइन पर ले जा रहा था। पी डब्ल्यू-1 मदन भील और पी डब्ल्यू-4 परमानंद भील को पक्षद्रोही घोषित किया गया और पी डब्ल्यू-5 श्रीमती राजेशबाई, मृतक की बहू, ने प्रतिपरीक्षा में कहा कि घटना क े संबंध में उन्होंने जो क ु छ भी पहले कहा था वह सुनी सुनाई बात थी और उसने अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया।
9. अभिलेखों से पता चलता है कि अभियोजन पक्ष क े अधिकांश गवाहों को पक्षद्रोही घोषित कर दिया गया है और पेश किए गए गवाहों क े बयान गंभीर महत्वपूर्ण विरोधाभासों से ग्रस्त हैं। महत्वपूर्ण/ सारवान कमियों से ग्रस्त अभियोजन पक्ष क े गवाहों क े बयानों क े आलोक में, उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्य संदिग्ध, विरोधाभासी प्रतीत होते हैं और उन पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है। प्रत्यर्थीयों को आईपीसी की धारा 302, 201 क े तहत आरोपों से बरी कर दिया गया और दिनांक 3 जनवरी, 2012 क े अपने आक्षेपित निर्णय क े तहत उन्हें न्यायिक हिरासत से रिहा कर दिया गया।
10. यह अच्छी तरह से स्थापित है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य क े मामलों में, जिन परिस्थितियों से अपराध का निष्कर्ष निकाला जाना है, उन्हें पहले पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए, और इस प्रकार स्थापित सभी तथ्य क े वल अभियुक्त क े अपराध की परिकल्पना क े अनुरूप होने चाहिए। परिस्थितियाँ एक निर्णायक प्रक ृ ति की होनी चाहिए और ऐसी होनी चाहिए कि हर परिकल्पना को बाहर किया जा सक े सिवाय उसक े जो साबित करने क े लिए प्रस्तावित है। दूसरे शब्दों में, साक्ष्य की एक पूर्ण श्रृंखला होनी चाहिए ताकि अभियुक्त की निर्दोषिता से संगत निष्कर्ष क े लिए कोई युक्तियुक्त आधार न छोड़ा जा सक े और यह ऐसा होना चाहिए जो यह दर्शित करे कि सभी मानवीय संभाव्यताओं क े भीतर कार्य अभियुक्त द्वारा किया गया होगा और किसी और क े द्वारा नहीं।
11. परिस्थितिजन्य साक्ष्य से संबंधित कानून का प्रतिपादन, इसकी प्रासंगिकता और निर्णायकता, एक दांडिक अपराध क े आरोप क े सबूत क े रूप में, शरद बिर्धीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य 1984 (4) एससीसी 116 में इस न्यायालय क े अन्य निर्णयों में से एक है। निर्णय क े पैरा 153 क े प्रासंगिक अंश निश्चित रूप से उपयुक्त हैं: “153. इस निर्णय का गहन विश्लेषण यह दर्शित करेगा कि किसी अभियुक्त क े विरुद्ध किसी मामले को पूर्णतः स्थापित किए जाने से पूर्व निम्नलिखित शर्तों को पूरा किया जाना चाहिएः (1) वे परिस्थितियां जिनसे दोष का निष्कर्ष निकाला जाना है, पूरी तरह से स्थापित की जानी चाहिए। यहाँ यह उल्लेख किया जा सकता है कि इस न्यायालय ने संक े त दिया हैं कि संबंधित परिस्थितियाँ "अनिवार्य या आवश्यक" होनी चाहिए ना की "शायद/ संभावित"। "साबित किया जा सकता है" और "साबित होना चाहिए/ किया जाना चाहिए" क े बीच न क े वल एक व्याकरणिक बल्कि एक कानूनी अंतर है जैसा कि इस न्यायालय द्वारा शिवाजी साहब राव बोबडे और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य [(1973) 2 एससीसी 793] में अभिनिर्धारित किया गया था, जहां निम्नलिखित टिप्पणियां की गई थीः "निश्चित रूप से, यह एक प्राथमिक सिद्धांत है कि किसी अभियुक्त को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए की वह अवश्य ही दोषी हो न की दोषी हो भी सकता हैं और 'हैं' और 'हो सकता है' क े बीच की मानसिक दूरी लंबी है और निश्चित निष्कर्षों से अस्पष्ट अनुमानों को अलग करती है।" (2) इस प्रकार स्थापित तथ्यों को क े े अनुरूप होना चाहिए, अर्थात् उन्हें किसी अन्य परिकल्पना पर व्याख्यात्मक नहीं किया जाना चाहिए सिवाय इसक े कि अभियुक्त दोषी है, (3) परिस्थितियाँ एक निर्णायक प्रक ृ ति और प्रवृत्ति की होनी चाहिए, (4) उन्हें साबित की जाने वाली परिकल्पना को छोड़कर प्रत्येक संभावित परिकल्पना को अपवर्जित करना चाहिए, और (5) साक्ष्य की ऐसी श्रृंखला होनी चाहिए जो अभियुक्त की निर्दोषिता से संगत निष्कर्ष क े लिए कोई युक्तियुक्त आधार न छोड़ें और यह दर्शित करे कि सभी मानवीय संभाव्यताओं में कार्य अभियुक्त द्वारा किया गया होगा।"
12. इस न्यायालय द्वारा सुजीत विश्वास बनाम असम राज्य 2013 (12) एससीसी 406 और राजा उर्फ़ राजिंदर बनाम हरियाणा राज्य 2015 (11) एससीसी 43 में यह आगे भरोसा किया गया है और यह प्रतिपादित किया गया है कि पारिस्थितिक साक्ष्य की जांच करते समय, यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह घटनाओं की श्रृंखला को स्पष्ट रूप से स्थापित करने क े लिए उसका मूल्यांकन करे और अभियुक्त क े निर्दोष होने की किसी भी उचित संभावना से पूरी तरह इंकार करे। यह सच है कि अंतर्निहित सिद्धांत, श्रृंखला पूर्ण है या नहीं, वास्तव में साक्ष्य से उत्पन्न प्रत्येक मामले क े तथ्यों पर निर्भर करेगा और इस प्रयोजन क े लिए कोई स्ट्रैटजैक े ट फार्मूला निर्धारित नहीं किया जा सकता है।यह हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सामूहिक रूप से विचार किए जाने पर प्रस्तुत की गई परिस्थितियों को क े वल इस निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए कि अभियुक्त क े अलावा कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता है जो अक े ले कथित अपराध का अपराधी है और परिस्थितियों को क े े अनुरूप निर्णायक प्रक ृ ति स्थापित करनी चाहिए।
13. समग्र तथ्य स्थिति क े विश्लेषण पर, हम पाते हैं कि उच्च न्यायालय ने अपने आक्षेपित निर्णय में व्यापक रूप से पारिस्थितिक साक्ष्य पर विचार किया है, जो अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किया गया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि अभियोजन द्वारा कई महत्वपूर्ण और प्रासंगिक गवाह पेश नहीं किए गए हैं, जिन पर आक्षेपित निर्णय क े पैरा 23 में एक विस्तृत संदर्भ दिया गया है, जिसे हम उद्धृत करना उचित समझते है: “23. यह भी उल्लेख किया जाना चाहिए कि मामले में अभियोजन पक्ष ने कई महत्वपूर्ण और प्रासंगिक गवाह पेश नहीं किए हैं। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि मृतक का मृत शरीर जिस स्थान पर पाया गया है, कि जिस व्यक्ति ने इसकी पहचान की है, उसक े पास बजरंगलाल का मृत शरीर है, उसे पेश नहीं किया गया है। शव को रेलवे ट्रैक से उठाकर साइड में रखने वाले दयाराम और गुलाब भी पेश नहीं किए गए हैं। पी डब्ल्यू 5 राजेशभाई क े अनुसार रमेशचंद और उसक े पिता ने उसक े ससुर बजरंगलाल की मौत की सूचना दी थी, इस रमेश को पेश नहीं किया गया है। मृतक बजरंगलाल व बृजगोपाल क े समधी,पी डब्ल्यू 5 राजेशभाई क े पिता को पेश नहीं किया गया है, जो प्रदर्श पी 20, पी 21 और पी 25 फर्दों क े गवाह भी हैं। अभियोजन पक्ष क े अनुसार हत्या का आरोप लगाने वाले गवाह सुरेंद्रसिंह, रामगोपाल, रामस्वरूप, गिर्राज गुप्ता, प्रेमचंद और श्यामबाबू को पेश नहीं किया गया है। ऑटो रिक्शा क े मालिक शोभा सिंह को पेश नहीं किया गया है। घटना का हेतुक सुलोचना व महेश क े किस संबंध का आरोप लगाया गया है कि सुलोचना को पेश नहीं किया गया है। फर्द प्रदर्श पी13, पी15, पी41 क े गवाह दिलीप सिंह आदि को पेश नहीं किया गया है। फर्द प्रदर्श पी30, पी35, पी36 क े गवाह हेमराज और फर्द प्रदर्श पी 41 क े गवाह मनोज विजय को पेश नहीं किया गया है। वह फजलुर रहमान पुलिस हेड कांस्टेबल भी पेश नहीं किया गया है, जो लिखित रिपोर्ट प्रदर्श पी 24 पुलिस स्टेशन लेकर गया था और इस पर एफ.आई.आर. प्रदर्श पी 44 लिखाकर वापस साइट पर एस.एच.ओ. क े पास लौट आया था। कथित तौर पर PW[2] नरेंद्र रमेश की चाची को अपने साथ लेकर राजेश क े पास गया था। रमेश की इस चाची को पेश नहीं किया गया है। नक्शा मौका प्रदर्श पी 25, लाश पड़ी हुई, मे दिखाये गये गवाह मद्रासी, भूर सिंह, शंभु सिंह, कौशी आदि पेश नहीं किए गए हैं। प्रदर्श पी 20 क े गवाह भरतराम, रईस मोहम्मद, सुरेंद्र सिंह और बृजगोपाल पेश नहीं किए गए हैं। फर्द गिरफ्तारी अभियुक्त प्रदर्श पी 26, पी 27, पी 28, और पी 32 क े गवाह बालक @मानसिंह और इमाम को पेश नहीं किया गया है।"
14. पक्षकारों क े विद्वान अधिवक्ताओं को सुनने क े बाद और अभिलेख पर मामले क े आक्षेपित निर्णय और सामग्री क े अवलोकन क े बाद, हमारा यह सुविचारित मत है कि अभियोजन पक्ष सभी मानवीय संभाव्यताओं क े अनुरूप निष्कर्ष क े लिए कोई उचित आधार छोड़ते हुए घटनाओं की श्रृंखला को पूरा करने में विफल रहा है कि यह कार्य क े वल प्रत्यर्थीयों द्वारा ही किया गया हैं।
15. हमें उच्च न्यायालय द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचने में कोई त्रुटि नहीं मिली है, जैसा कि हमने 3 जनवरी, 2012 क े आक्षेपित फ ै सले में देखा था।
16. परिणामस्वरूप, दोनों अपीलें पूरी तरह से आधारहीन हैं और तदनुसार खारिज की जाती हैं।
17. लंबित आवेदन (नों), यदि कोई हैं, का भी तद्नुसार निस्तारण किया जाता है। न्यायाधीश (इंदिरा बनर्जी) न्यायाधीश (अजय रस्तोगी) नई दिल्ली। 16 जुलाई, 2019 यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास' क े जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है। अस्वीकरण: यह निर्णय पक्षकार को उसकी भाषा में समझाने क े सीमित उपयोग क े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से भी अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।