United India Insurance Company Limited v. Shiraj Uden Khan

High Court of Allahabad · 11 Jul 2019
Ashok Bhushan; Naveen Sinha
Civil Appeal No 5390 of 2019 @ Special Leave Petition (Civil) No 174 of 2019
2019 INSC 752
labor appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that an employee absent without leave is not entitled to salary arrears for that period, but termination after retirement is invalid, and directed proper adjudication of arrears claims for the disputed period.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
भार का सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपील अति कारिर ा
सिसविवल अपील संख्या 5390/2019
(विवशेष अनुमति याति का (सिसविवल) संख्या 174/2019 से उत्पन्न)
मुख्य क्षेत्रीय प्रबं क, यूविनटेड इण्डि,डया
इन्श्योरेंश कम्पनी लिलविमटेड .......अपीलार्थी3
बनाम
शीराज उदेन खां ......प्रत्यर्थी3
विनर्ण8य
मा. न्यायमूर्ति अशोक भूषर्ण
अनुमति अनुदत्त। mn~?kks"k.kk
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
2019 INSC 752
JUDGMENT

2. प्रस् ु अपील प्रत्यर्थी3 की रिरट याति का को भाग ः अनुमति प्रदान कर े हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा विदनांक 03.07.2018 को पारिर विनर्ण8य सिजसमें उच्च न्यायालय ने बकाये वे न एवं अन्य लाभों का भुग ान करने का विनदDश जारी विकया है, को ुनौ ी दे े हुए दायर की गयी है।

3. विदनांक 02.01.2019 को हमारे आदेश द्वारा, इस प्रश्न से संबंति सीविम सू ना जारी की गयी र्थीी विक क्या प्रत्यर्थी3 14.05.2009 से 20.06.2012 की अवति क े बाद वे न प्राप्त करने का हकदार र्थीा। जब विदनांक 01.07.2019 को जब मामल सुना गया ब प्रत्यर्थी3 ने प्रति शपर्थीपत्र प्रस् ु विकया और स्वयं उपण्डिस्र्थी रहा।

4. हमने अपीलार्थी3 क े विवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता श्री पी. पी. मलहोत्रा एवं व्यविक्तग उपण्डिस्र्थी प्रत्यर्थी3 को सुना।

5. सीविम विववाद्य, सिजसे इस न्यायालय द्वारा सुना गया, विनर्ण[3] करने क े अवलोकनार्थी8 इस अपील में मामले क े संतिक्षप्त थ्य इस प्रकार हैः- 5.[1] प्रत्यर्थी3 को अपीलार्थी3 की कम्पनी द्वारा सहायक /टाइविपस्ट क े पद पर विनयुक्त विकया गया है। विदनांक 19.08.2006 क े आदेश द्वारा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds प्रत्यर्थी3 को कम्पनी क े इलाहाबाद ब्रां से जौनपुर स्र्थीानान् रिर कर विदया गया र्थीा और इस आदेश क े अनुपालन में विदनांक 01.02.2006 को जौनपुर ब्रां ऑविSस ज्वाइन करने क े लिलए उसे मुक्त विकया गया र्थीा। प्रत्यर्थी3 ने ज्वाइन नहीं विकया र्थीा विदनांक 02.02.2007 से अप्राति क ृ रूप से अनुपण्डिस्र्थी रहा। विदनांक 02.02.2007 से 07.06.2007 क उसक े अप्राति क ृ अनुपण्डिस्र्थीति क े संबं में एक आरोप पत्र विदनांक 02.02.2007 को जारी विकया गया, सिजसक े लिलए अनुशासनात्मक काय8वाही प्रारम्भ की गयी, विवभागीय जां क े शीघ्र विनस् ारर्ण एवं 23.07.2007 से प्रभावी वे न क े भुग ान क े लिलए अपीलार्थी3 को आगे विनदDश देने की प्रार्थी8ना कर े हुए प्रत्यर्थी3 द्वारा रिरट याति का संख्या 11840 सन् 2008 दायर की गयी। 5.[2] उच्च न्यायालय क े विवद्वान न्यायमूर्ति अपने विवस् ृ आदेश द्वारा विदनांविक 05.03.2008 को रिरट याति का का विनस् ारर्ण कर काय8वाही क े शीघ्र विनस् ारर्ण का विनदDश जारी विकया एवं प्रत्यर्थी3 क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds वे न क े दावे क े संबं में विदनांक 11.11.2007 को प्रत्यर्थी3 क े प्रति विनति त्व पर विव ार करने र्थीा उसे विनर्ण[3] करने का विदशा विनदDश जारी विकया। अप्राति क ृ रूप से अनुपण्डिस्र्थी रहने का परिरर्णाम यह हुआ विक अनुशासनात्मक प्राति कारी ने अपने आदेश विदनांविक 14.05.2009 क े आदेश में प्रत्यर्थी3 को अप्राति क ृ अनुपण्डिस्र्थीति क े अपरा का दोषी पाया और सामान्य बीमा विनयमावली, 1975 (आ रर्ण, अनुशासन एवं अपील) क े विनयम 23(अ) क े अ ीन उसक े मूल वे न में दो स् रों में कटौ ी का द,ड़ विदया। प्रत्यर्थी3 ने अपील दायर विकया लेविकन उसको भी खारिरज कर विदया गया। 5.[3] एक दूसरा आरोप पत्र जारी विकया गया सिजसमें 663 विदनों क अप्राति क ृ रूप से अनुपण्डिस्र्थी रहने का आरोप लगाया गया। आरोप पत्र प्रत्यर्थी3 को भेजा गया विकन् ु उसने उसे प्राप्त नहीं लिलया। एकपक्षीय जां की गयी। उसी बी विदनांक 20.06.2012 को प्रत्यर्थी3 ने सेवाविनवृलित्त की आयु प्राप्त कर ली। अनुशासन प्राति कारी द्वारा विदनांक 26.06.2012 को उसकी सेवा को समाप्त करने का Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds एक आदेश पारिर विकया गया। आदेश विदनांविक 26.06.2012 क े विवरूद्ध विवभागीय अपील विदनांक 18.07.2014 को खारिरज कर विदया गया। प्रत्यर्थी3 द्वारा रिरट याति का संख्या 59041 सन् 2014 दायर की गयी सिजसमें यह प्रार्थी8ना की गयी विक आदेश विदनांविक 14.05.2009, 26.06.2012 एवं 18.07.2014 को खारिरज कर विदया जाए। विवद्व एकल न्यायमूर्ति ने अपने विवस् ृ आदेश विदनांविक 29.05.2015 द्वारा प्रत्यर्थी3 द्वारा दायर याति का को विनर्ण[3] विकया। 26.06.2012 क े उसक े सेवा समाविप्त का आदेश दो आ ारों पर अपास् कर विदया गया। प्रर्थीम, जां प्रवि\या दूविष है क्योंविक आरोप पत्र प्रत्यर्थी3 को नहीं विदया गया र्थीा। द्व ीय, ूंविक प्रत्यर्थी3 पहले से ही विदनांक 20.06.2012 को सेवाविनवृत्त हो ुका र्थीा इसलिलए उसे 26.06.2012 को नौकरी से नहीं विनकाला जा सक ा र्थीा। जहां क आदेश विदनांविक 14.05.2009 क े ुनौ ी का प्रश्न है, रिरट याति का सिजसमें मूल वे न को दो स् रों की कटौ ी का द,ड़ विदया गया र्थीा उसको इस आ ार पर खारिरज कर विदया गया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विक वह अनुति विवलम्ब क े ल े बाति है और उस सीमा क अनु ोष नहीं प्रदान विकया गया। 5.[4] विवद्वान एकल न्यायामूर्ति द्वारा पारिर आदेश विदनांक 29.05.2015 से पीविड़ अपीलार्थी3 विवशेष अनुमति याति का (सिसविवल) संख्या 26395 सन् 2015 दायर विकया र्थीा सिजसे इस न्यायालय ने विदनांक 18.09.2015 को खारिरज कर विदया। विवद्वान एकल न्यायमूर्ति क े आदेश से व्यथिर्थी प्रत्यर्थी3 उच्च न्यायालय क े ख,ड़पीठ क े समक्ष विवशेष अनुमति याति का दायर की हालांविक न्यायालय ने उस रिरट याति का को खारिरज कर विदया सिजसमें आदेश विदनांविक 14.05.2009 को ुनौ ी दी गयी र्थीी। विदनांविक े आदेश को खारिरज कर विदया गया और यह ारिर विकया गया विक अपीलार्थी3 सभी आनुषांविगक लाभों को पाने का हकदार है। विवशेष अपील में ख,ड़पीठ द्वारा पारिर 15.02.2016 क े आदेश को ुनौ ी नहीं दी गयी और जो अण्डिन् म रूप ले ुकी है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds 5.[5] प्रत्यर्थी3 द्वारा एक अवमान प्रार्थी8ना पत्र संख्या 2680 सन् 2016 दालिखल विकया सिजसमें विवद्वान एकल न्यायमूर्ति क े विनर्ण8य विदनांविक 29.05.2015 एवं ख,ड़पीठ क े आदेश विदनांविक 15.02.2016 क े अवमान का आक्षेप लगाया गया। 5.[6] प्रत्यर्थी3 ने एक अन्य रिरट याति का संख्या 61102 सन् 2017 दायर विकया सिजसमें जनवरी 2007 से 2012 क े अवति की ब्याज सविह वे न एवं सभी आनुषांविग लाभों जैसे पदोन्नति बकाया, मेतिडकल विबल, एकमुश् मेतिडकल प्रति पू 8, पुनः अव ारिर पेंशन प्रदान करने की प्रार्थी8ना की गयी। उक्त रिरट याति का पर न्यायालय ने अपने आक्षेविप विनर्ण8य विदनांक 03.07.2018 द्वारा भाग ः स्वीक ृ ति प्रदान कर विदया है। 5.[7] विवद्वान एकल न्याया ीश ने ारिर विकया विक आदेश विदनांविक 14.05.2009 सिजसमें अपीलार्थी3 को द,ड़ विदया गया, ूंविक इस आदेश को उच्च न्यायालय की ख,ड़पीठ द्वारा अपने आदेश विदनांविक 15.02.2016 को अपास् कर विदया गया, इसलिलए अपीलार्थी3 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विदनांक 02.02.2007 से 14.05.2009 क वे न प्राप्त करने का हकदार है। विदनांक 02.02.2007 से 20.06.2012 क अपीलार्थी3 द्वारा वे न क े गैर अदायगी संबं ी क 8 को आक्षेविप आदेश क े प्रस् र 16 में अवलोकन विकया गया सिजसका प्रभाव यह है विक प्रत्यर्थी3 को आदेश विदनांविक 01.02.2007 द्वारा इलाहाबाद ब्रां काया8लय पद मुक्त कर विदये जाने पर जौनपुर ब्रां काया8लय को ज्वाइन नहीं विकया इसलिलए वह विकसी भी प्रकार वे न का हकदार नहीं है। जहां क विदनांक 02.02.2007 से 14.05.2009 क क े वे न पाने का प्रश्न है, विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने प्रस् र संख्या 17 एवं 19 में विनम्नलिललिख विदशाविनदDश जारी विकये जो इस प्रकार हैं- “17. हालांविक इस न्यायालय ने विवशेष अपील त्रुविटपूर्ण[8] संख्या 87 वष[8] 2016 में द,ड़ादेश विदनांविक 14.05.2009 को अपने आदेश विदनांविक 15.09.2016 द्वारा अपास् कर विदया और विनदDथिश विकया विक अपीलार्थी3 आनुषांविगक अनु ोषों का हकदार Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds होगा। इस न्यायालय ने वादी द्वारा आनुषांविगक लाभ विदये जाने का आदेश देकर, और ूंविक 14 मई का आदेश खारिरज हो गयी है, इसलिलए वादी उस विदन से वे न पाने का हकदार होगा सिजस विदन उसक े मूल वे न का दो स् रों क वे न कटौ ी का आदेश पारिर विकया गया र्थीा और जो विदनांक 02.02.2007 से 14.05.2009 क प्रभावी होगा। इस प्रकार वे न का भुग ान प्रत्यर्थी3 द्वारा ‘काय[8] नहीं वे न नहीं’ क े सिसद्धान् पर नहीं विकया गया।

19. या ी विदनांक 02.02.2007 से 14.05.2000 क प्रभावी 18 प्रति श वार्षिषक ब्याज सविह वे न का हकदार है।” 5.[8] विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने विदनांक 14.05.2009 क े बाद अपीलार्थी3 क े वे न से दावे क े संबं में यह दृविgकोर्ण लिलया विक ूंविक विदनांक 29.05.2015 को एकल न्यायमूर्ति द्वारा विदनांक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds 26.06.2012 क े आदेश को अपास् कर विदया गया है सिजसे इस न्यायलय में ुनौ ी दी गयी है विकन् ु वह असSल हो ुका है और अण्डिन् म रूप ले लिलया है इसलिलए विदनांक 14.05.2009 से 20.06.2012 क क े वे न को नहीं रोका जा सक ा है और न्यायलय ने 18 प्रति श ब्याज सविह वे न क े भुग ान का विनदDश जारी विकया। उच्च न्यायालय ने अन्य दावों क े संबं में प्रत्यर्थी3 को भुग ान विकया गये भविवष्य विनति, सेवोपहार लाभ, जीएसएलआई दावा, अवकाश नकदीकरर्ण एवं अन्य भुग ान क े प्रति सिजसकी कु ल कीम 25,73,830/- रूपये है, पर ध्यान विदया। 5.[9] यहां प्रस् ु अपील में विदनांक 14.05.2009 से 20.06.2012 क क े बाद वे न क े भुग ान क े अलावा कोई अन्य विवषय नहीं है।

6. अपीलार्थी3 क े विवद्व अति वक्ता ने कर्थीन विकया विक विदनांक 14.05.2009 से 20.06.2012 क े बाद वे न क े भुग ान का विनदDश जारी करने में उच्च न्यायालय ने गल ी पारिर की है, जबविक प्रत्यर्थी3 इस Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अवति क े दौरान काय[8] पर नहीं र्थीा और ‘काय[8] नहीं वे न नहीं’ क े सिसद्धान् क े आ ार पर उसे वे न पाने का हक नहीं है। यह कर्थीन विकया गया है विक प्रस् ु ऐसा मामला नहीं है जहां पर सेवा समाविप्त से संबं ी की कोई आदेश हो सिजससे वह काय[8] न कर पाया। विदनांक 14.05.2009. से 20.06.2012 क की अवति क े उपरान् वे न भुग ान क े संबं में विवद्वान एकल न्यायमूर्ति दावे को न्याय विनर्ण[3] नहीं विकया है, सिसवाय यह अवलोकन विकया है विक विदनांक 29.05.2015 क े उच्च न्यायालय क े विनर्ण8य क े आलोक में सिजसक े विवरूद्ध विवशेष अनुमति याति का खारिरज कर दी गयी और यह पाया गया विक प्रत्यर्थी3 बकाये वे न प्राप्त करने का हकदार है। उन्होंने आगे कर्थीन विकया विक विदनांक 29.05.2015 क े एकल न्यायमूर्ति क े विनर्ण8य क े आ ार पर यह थ्य विक प्रत्यर्थी3 क े सेवा में माने जाने से वे न क े भुग ान का विनदDश स्व ः परिरथिर्ण नहीं हो ा है क्योंविक विदनांक 29.05.2015 क े एकल न्यायमूर्ति क े विनर्ण8य में ऐसा कोई विनदDश नहीं जारी विकया गया। उक्त अवति क े लिलए वे न क े भुग ान की कोई बा एकल न्यायमूर्ति क े विनर्ण8य से स्व ः अथिभव्यक्त नहीं हो ी है। वह कर्थीन कर े हैं विक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds ूंविक अपीलार्थी3 की कम्पनी एक लोक विनति है इसलिलए जब अपीलार्थी3 स्वयं काय[8] से दूर रहा हो ो वे न का भुग ान नहीं विकया जा सक ा।

7. व्यविक्तग उपण्डिस्र्थी प्रत्यर्थी3 ने अपीलार्थी3 क े कर्थीनों का ख,ड़न विकया और कर्थीन विकया विक वह वे न पाने का अति कारी र्थीा क्योंविक उसक े सेवा समाविप्त का आदेश विदनांविक 26.06.2012 को विदनांक 29.05.2015 को अपास् कर विदया गया र्थीा। इस आदेश क े विवरूद्ध कम्पनी ने विवशेष अनुमति याति का दालिखल की सिजसे विदनांक 18.09.2015 को इस न्यायालय ने खारिरज कर विदया र्थीा। उसने कर्थीन विकया विक वह विदनांक 23.07.2007 को इलाहाबाद ब्रां ऑविSस ज्वाइन करने गया र्थीा विकन् ु इलाहाबाद ब्रां ऑविSस-1 क े मैनेजर द्वारा उसे ाज[8] लेने से मना कर विदया गया। उसने इस न्यायालय द्वारा पारिर विनर्ण8य शोभा राम र ूरी बनाम विहरयार्णा विवद्यु प्रसारर्ण विनगम लिलविमटेड़ एवं अन्य (2016) 16 एससीसी 663 का अवलम्ब लिलया। उसने कर्थीन विकया विक ‘काय[8] नहीं वे न नहीं’ का सिसद्दान् व 8मान मामले क े थ्यों में नहीं लागू हो ा है और विवद्वान एकल Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds न्याया ीश ने विदनांक 14.05.2009 से 20.06.2012 क की अवति क े बाद क े वे न क े भुग ान का जो आदेश विकया है वह सही है।

8. हमने पक्षकारों क े विवद्व अति वक्ताओं क े कm पर विव ार विकया एवं अथिभलेखों का परिरशीलन विकया।

9. रिरट याति का संख्या 59041 सन् 2014 में दो आदेशों को ुनौ ी दी गयी। प्रर्थीम, विदनांक 14.05.2009 का आदेश सिजसक े द्वारा विदनांक 02.02.2007 से 07.06.2007 क की अवति क अप्राति क ृ अनुपण्डिस्र्थीति क े लिलए उसे दो स् रों क मूल वे न में कटौ ी का द,ड़ विदया गया र्थीा द्व ीय, विदनांक 26.06.2012 का उसकी सेवा समाविप्त एवं 18.07.2014 का विवभागीय अपील खारिरज विकये जाने आदेश। विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने उक्त वर्णिर्ण विदनांक 29.05.2015 क े विवस् ृ आदेश द्वारा विदनांविक 26.06.2012 क े आदेश को अपास् कर विदया। विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने आदेश विदनांविक 26.06.2012 को विनम्नलिललिख दो आ ारों पर रद्द् कर विदया। प्रर्थीम, द्व ीय आरोप पत्र सिजसमें प्रत्यर्थी3 क े ऊपर 663 विदनों क अप्राति क ृ अनुपण्डिस्र्थी रहने का आरोप लगाया गया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds वह कभी भी अपीलार्थी3 को नहीं विदया गया। द्व ीय, प्रत्यर्थी3 क े विदनांक 20.06.2012 को सेवामुक्त हो जाने पर, विदनांक 26.06.2012 को उसकी सेवा समाविप्त का कोई भी आदेश पारिर नहीं विकया जा सका। मामले से जुड़ी हुई ा8एँ एवं विदनांक 26.06.2012 क े आदेश से संबंति विवद्वान एकल न्यायमूर्ति क े आदेश इस प्रकार हैः- “अथिभलेख में यह कहीं दर्णिश नहीं है विक आरोप पत्र पंजीकृ डाक द्वारा याति काक ा8 को विदया गया और इस बा का पृष्ठांकन कहां से आया है यह ज्ञा नहीं है और यह विटप्पर्णी विकसने की विक “घर बंद रह ा है” या “नहीं विमला”। भले ही यविद यह मान लिलया जाए विक याति काक ा8 अपने घर में नहीं र्थीा इसलिलए घर बंद र्थीा, ब प्रत्यर्णिर्थीयों से आशा की जा ी है विक उनको अगला कदम यह उठाना ाविहए विक वे याति काक ा8 से संबंति आरोप पत्र को समा ार पत्र में प्रकाथिश करवाएं। इस प्रविकया को अपनाया गया विक नहीं, यह बा प्रति शपर्थी पत्र में दर्णिश नहीं है। अ ः यह पूर्ण8रूपेर्ण स्पg है आरोप पत्र विदनांक 20.06.2012 क वादी को नहीं विदये गये और इसक े बाद विदनांक 20.06.2012 को सेवा समाविप्त का आदेश पारिर कर विदया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds गया। मामले क े इस दृविgकोर्ण से यह नहीं कहा जा सक ा है विक याति काक ा8 को र्थीी, इसलिलए यविद प्रत्यर्थी3 एकपक्षीय काय8वाही कर े हैं ो ऐसी काय8वाही पूर्ण8रूपेर्ण दोषपूर्ण[8] है और यह ारिर विकया जाना ाविहए विक याति काक ा8 को युविक्तयुक्त एवं पया8प्त सुनवाई का अवसर नहीं प्रदान विकया गया है। मामले का एक अन्य पहलू यह भी है विक याति काक ा8 विदनांक 20.06.2012 को अवकाश प्राप्त कर ुका र्थीा और उसकी सेवा समाविप्त का आदेश विदनांक 26.06.2012 को पारिर विकया गया। प्रति शपर्थी पत्र में विकये गये बयानों से भी स्पg हो ा है विक याति काक ा8 अपनी सेवा से अवकाश प्राप्त कर ुका र्थीा और अवकाश प्राविप्त की ति थिर्थी को आरोपपत्र लेने से मना कर विदया और काया8लय से भाग गया र्थीा। ऐसा इसलिलए र्थीा, एक बार जब विदनांक 20.06.2012 को याति काक ा8 अवकाश प्राप्त कर लिलया ो विदनांक 26.06.2012 को उसकी सेवा समाविप्त का कोई आदेश नहीं पारिर विकया जा सक ा र्थीा क्योंविक प्रत्यर्थी3 की सेवा में रहना समाप्त हो जा ा है जो Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds 20.06.2012 से प्रभावी है। विकसी भी व्यविक्त को सेवा से नहीं विनकाला जा सक ा जब वह पहले से ही अवकाश प्राप्त कर ुका हो। मामले क े इस दृविg में, आक्षेविप आदेश विदनांविक 26.06.2012 एवं 18.07.2014 ठहर नहीं सक े हैं और दनुरूप रद्द् विकये जा े हैं। रिरट याति का स्वीक ृ की जा ी है।”

10. एकल न्यायमूर्ति ने रिरट याति का को खारिरज कर विदया जहां क विदनांक े आदेश का प्रश्न है, विवथिशg अपील संख्या 87 सन् 2016 में जो इस आदेश को जो ुनौ ी दी गयी है उसे ख,ड़पीठ द्वारा स्वीकार कर लिलया गया है, जहां पर ख,ड़पीठ ने विदनांक 14.05.2009 क े आदेश को अपास् कर विदया है और आनुषांविगक लाभों क े सार्थी वे न क े भुग ान का विनदDश जारी विकया। विदनांक 15.02.2016 क े ख,ड़पीठ क े आदेश क े अनुसरर्ण में प्रत्यर्थी3 विदनांक 02.02.2007 से 14.05.2009 की अवति क वे न प्राप्त करने का हकदार है सिजसक े संबं में हमने अपील पर विव ार नहीं विकया है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

11. अब जो प्रश्न है सिजसका हमारे द्वारा उत्तर विदया जाना है वह इस संबं में है विक क्या विदनांक 26.06.2012 क े आदेश को अपास् हो जाने से, प्रत्यर्थी3 विपछले वे न का हकदार हो गया र्थीा? विदनांक 29.05.2015 को पारिर एकल न्यायमूर्ति क े आदेश क े परिरशीलन से यह दर्णिश हो ा है विक भले ही एकल न्यायमूर्ति ने 26.06.2012 क े आदेश को अपास् कर विदया हो लेविकन पुराने वे न और आनुषांविगक लाभों क े भुग ान का कोई आदेश नहीं विदया र्थीा। विवद्वान एकल न्याया ीन ने 26.06.2012 क े आदेश को अपास् कर यहां पर मामले को छोड़ विदया है।

12. आगे यह ध्यान देना उति है विक जब प्रत्यर्थी3 द्वारा अवमान प्रार्थी8ना पत्र सिजसकी संख्या 2680 वष[8] 2016 है, को दालिखल विकया गया ब उच्च न्यायालय ने यह अवलोकन विकया विक इस प्रश्न पर कोई न्यायविनर्ण8न नहीं विकया गया है विक क्या 2007 से 2012 क की अवति क े लिलए प्रत्यर्थी3 वे न क े पाने का दायी र्थीा? अण्डिन् म दो प्रस् रों में अवमान न्यायालय क े प्रेक्षर्ण इस प्रकार हैः- Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “अथिभलेख में जो थ्य हमारे समक्ष लाये गये हैं उससे यह प ा ल ा है विक रिरट न्यायालय द्वारा इस विवषय पर कोई न्यायविनर्ण8यन नहीं है विक क्या 2007 से 2012 क की अवति क े लिलए अपीलार्थी3 वे न पाने का हकदार है? विवशेष ौर से ब जब उसने उस अवति में काय[8] नहीं विकया र्थीा। अपीलार्थी3 पदोन्नति या ति विकत्सकीय ख D पाने का अति कार है या नहीं इस बा पर भी न्यायविनर्ण8यन नहीं है। अ ः इस स् र पर यह विवषय जो अपीलार्थी3 द्वारा याति का में उठाया जा रहा है उसे न्यायालय द्वारा विव ारिर करने की आवश्यक ा नहीं है। इससे यह दर्णिश हो ा है विक आदेश क े बखा8स् गी को अपास् करने क े कारर्ण याति काक ा8 क े सेवाविनवृत्त पर जो उसका बकाया है उसका भुग ान कर विदया गया है। यह बा अपीलार्थी3 पर छोड़ े हुए विक वह 2007-2012 क े दौरान वे न को प्राप्त करने क े अपने हक और अन्य सुविव ाएं सिजसमें पदोन्नति क े वे नमान, ति विकत्सकीय विबल, पेंशन क े पुनर्षिन ारर्ण हैं, को विनर्ण[3] करने क े लिलए उति काय8वाही लाकर मांग करे। यह रिरट याति का रिरकाड[8] में भेजी जा ी है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

13. यह ब की बा है जब प्रत्यर्थी3 द्वारा रिरट याति का संख्या 61102 सन् 2017 दायर की गयी। इस प्रकार रिरट याति का संख्या 61102 सन् 2017 में विवद्वान एकल न्यायमूर्ति से अपेक्षा की गयी विक वे न क े भुग ान हे ु प्रत्यर्थी3 क े दावे को न्यायविनर्ण[3] करें। विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने 02.02.2007 से 14.05.2009 क वे न क े दावे क े संबं में विनर्ण8य पारिर विकया है और उसक े अ ीन विदशाविनदDश जारी विकये हैं। हम देखेंगे विक ख,ड़पीठ ने 14.05.2009 क े आदेश को अपास् कर े समय आनुषांविग लाभों क े भुग ान का विनदDश जारी विकया है। अपील न्यायालय क े उक्त विदनांक 15.02.2016 क े आदेश कारगर भाग को लेना उपयोगी है, सिजसका विनम्नलिललिख प्रभाव हैः- “हम दनुरूप विवशेष अपील को स्वीक ृ ति प्रदान कर े हैं। विवद्वान एकल े विदनांक 29 मई 2015 एवं 2 विदसम्बर 2015 विनर्ण8य एवं आदेश जो अपीलार्थी3 द्वारा उठायी गयी विदनांक 14 मई 2009 की आपविप्तयों को नकार े हैं वह द्नुसार अपास् विकये जा े हैं। परिरर्णामस्वरूप Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds 14 मई 2009 क े आदेश को भी खारिरज विकया जा ा है। अपीलार्थी3 को सभी आनुषांविगक लाभों का हक होगा।

14. जहां क विदनांक 14.05.2009 और 26.06.2012 क े आदेश को अपास् करने का प्रश्न है, उच्च न्यायालय क े विनदDश में स्पg अन् र है जबविक विदनांक 14.05.2009 क े आदेश को अपास् कर े समय न्यायालय ने आनुषांविगक अनु ोषों क े भुग ान का स्पg विनदDश विदया र्थीा विदनांक 26.06.2012 क े आदेश को अपास् कर े समय वे न क े भुग ान का कीई विनदDश नहीं विदया। इस प्रकार विवद्वान एकल न्यायमूर्ति द्वारा रिरट याति का संख्या 61102 वष[8] 2017 क े विनस् ारर्ण क े समय इस प्रश्न की जां आपेतिक्ष र्थीी। विदनांक 26.06.2012 क े आदेश को समाप्त र्थीा अपास् करने क े प्रत्यर्थी3 क े दावे पर विव ार कर े समय विवद्वान एकल े विव ार पर हमें भी ध्यान देना होगा। विदनांक 26.06.2012 क े आदेश को अपास् करने संबं ी सम्पूर्ण[8] ा8 प्रस् र 20 एवं 21 विदया गया है, जो इस प्रकार हैः- Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “20. याति काक ा8 क े काया8लय से अनुपण्डिस्र्थीति क े संबं में उसक े विवरूद अनुशासनात्मक काय8वाही प्रारम्भ की गई और सिजसक े लिलए एक आरोप पत्र जारी विकया गया सिजसमें 663 विदनों की अनुपण्डिस्र्थीति का आरोप लगाया गया। उसक े विवरूद्ध एकपक्षीय जां की गयी और अन् ः विदनांक 26.06.2012 को अनुति रूप से अनुपण्डिस्र्थीति क े आ ार पर बरखास् गी का आदेश पारिर कर विदया गया। उसी बी याति काक ा8 विदनांक 20.06.2012 को अवकाश प्राप्त कर ुका र्थीा और रिरट याति का संख्या 59041 वष[8] 2014 में इस न्यायालय ने अपने विनर्ण8य एवं आदेश विदनांक 29.05.2015 में बखा8स् गी एवं अपील आदेश को अपास् कर विदया। इस न्यायालय क े इस विनर्ण8य को प्रत्यर्थी3 द्वारा विवशेष अनुमति याति का में ुनौ ी दी गयी सिजसे विदनांक 18.09.2015 को खारिरज कर विदया गया और विदनांक 29.05.2015 को विनर्ण8य एवं आदेश अण्डिन् म रूप ारर्ण कर लिलया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

21. अब इ नी देर बाद याति काक ा8 यह नहीं कह सक ा है विक प्रत्यर्थी3 उक्त अवति क अनुति रूप से अनुपण्डिस्र्थी र्थीा। याति काक ा8 बकाये वे न, विदनांक 14.05.2009 से अवकाश प्राविप्त की ति थिर्थी यानी 20.06.2012 क, 18 प्रति श प्रति वष[8] ब्याज क े सार्थी प्राप्त का अति कारी है जो वास् विवक भुग ान की ति थिर्थी से बकाया रह गयी है।

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15. प्रत्यर्थी3 क े वे न क े दावे या पूव[8] वे न क े संबं में विवद्वान एकल न्यायमूर्ति द्वारा पारिर इस आक्षेविप आदेश में 15.05.2009 से 20.06.2012 क की अवति क े लिलए कोई न्याय विनर्ण8यन नहीं विदया गया है। विवद्वान एकल न्यायमूर्ति का यह राय र्थीी विक विदनांक 26.06.2012 क े आदेश को अपास् करने क े बाद वे न का भुग ान स्व ः हो जा ा है, जो सही नहीं है। व 8मान मामला इस प्रकार नहीं है जहां पर प्रत्यर्थी3 को सेवा से मुक्त गया और सिजसक े परिरर्णामस्वरूप वह काय[8] नहीं कर सक ा र्थीा और जब Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds सेवामुविक्त क े आदेश को अपास् विकया गया ो स्व ः ही पूव[8] वे न पाने का अति कारी हो जा ा है।

16. हम इस न्यायालय द्वारा पारिर क ु छ विनर्ण8यों का अवलोकन करेंगे जहां पर पूव[8] वे न पाने क े अति कार संबं ी विवषय को विव ारिर विकया गया। दीपाली गुंडू सुवा8से बनाम \ांति जूविनयर अध्यापक महाविवद्यालय (डी.एड़.) एवं अन्य (2013) 10 एस.सी.सी. 324 मामले का विव ारर्ण कर े समय इस प्रश्न पर विव ार विकया विक क्या अपीलार्थी3 उस अवति क े लिलए पूव[8] वे न पाने का अति कारी है सिजसे उस अवति क े लिलए उसे विवद्यालय प्रबं क द्वारा सेवा से हटा विदया गया र्थीा। प्रस् र 22 में विनम्नलिललिख अव ारिर विकया गया हैः- “20. विकसी कम[8] ारी को उस पद पर पुनः बहाल करने का विव ार सिजसको वह सेवामुविक्त या पदच्युति या विनष्काषन से पूव[8] ारर्ण कर ा र्थीा उसका यह अर्थी8 है विक कम[8] ारी को उसी पद पर स्र्थीाविप करना सिजसपर वह अवै ाविनक काय8वाही क े पूव[8] आसीन र्थीा। सेवामुविक्त या पदच्युति या अन्यर्थीा विनष्काषन से हुयी क्षति की माप न से नहीं की जा सक ी है। विनयोक्ता कम[8] ारी क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds संबं ों को ोड़ने वाले आदेश को पारिर करने से बाद वाले की आय क े स्रो समाप्त हो जा े है। न क े वल संबंति कम[8] ारी बण्डिzक पूरा उसका परिरवार गम्भीर परेशानी उठा ा है। वे जीविवका से सा न से वंति हो ा े हैं। बच्चे अच्छे पोषर्ण और थिशक्षा एवं जीवन में आगे बढ़ने क े सभी अवसरों से वंति हो जा े हैं। उस समय उस परिरवार को भुखमरी से ब ने क े लिलए अपने रिरश् ेदारों एवं अन्य संबंति यों से जीविवकोपाज8न हे ु न उ ार लेना पड़ ा है। यह परेशानी ब क रह ी है जब क न्यायालय द्वारा विनयोक्ता द्वारा उसक े विवरूद्ध की गयी अवै ाविनक काय8वाही का विनपटान नहीं कर विदया जा ा है। ऐसे कम[8] ारी की बहाली जो सक्षम न्यातियक/अ 8न्यातियक विनकाय या न्यायालय द्वारा पूव[8] में की गयी हो विक विनयोक्ता द्वारा की गयी काय8वाही अति कारा ी है। प्रासांविगक सांविवति क प्राव ान एवं प्राकृ ति क न्याय क े सिसद्धान् कम[8] ारी को पूव[8] वे न प्राप्त करने क े अति कार प्रदान कर े है। यविद विनयोक्ता कम[8] ारी क े पूव[8] वे न को प्रदान करने से मना कर ा है या आनुषांविगक लाभ देने का विवरो कर ा है ो वह विवशेष ौर इस बा का अथिभव न करे और सिसद्ध करे विक उस अवति क े दौरान कम[8] ारी लाभप्रद Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds रूप से विनयुक्त र्थीा और परिरलाभ प्राप्त कर रहा र्थीा। कम[8] ारी को पूव[8] वे न प्रदान करने से मना करना, सिजसने विनयोक्ता क े अवै ाविनक काय8वाही क े ल े कg भोगा है, संबंति क कम[8] ारी को अप्रत्यक्ष रूप से द,ड़ देने और विनयोक्ता को परिरलाभों सविह पूव[8] वे न को प्रदान करने क े दातियत्व से मुक्त करने क े बराबर है।

17. यह कहने में जzदबाजी होगी विक व 8मान मामला ऐसा नहीं है जहां पर प्रत्यर्थी3 को पदच्युति क े ल े काय[8] से मुक्त रखा गया। हम इस बा को स्वीकार कर े हैं विक प्रत्यर्थी3 विदनांक 20.06.2012 को अवकाशप्राविप्त की की आयु प्राप्त कर लिलया और उसकी सेवा मुविक्त का आदेश विदनांक 26.06.2012 को पारिर विकया गया, सिजसे ठीक ही अप्रभावी अथिभविनर्ण[3] विकया गया।

18. हम इस न्यायालय द्वारा पारिर अन्य विनर्ण8य एयरपोट[8] अर्थीॉरिरटी ऑS इण्डि,ड़या एवं अन्य बनाम शम्भूनार्थी दास उS 8 एस.एन. दास, (2008) 11 एस.सी.सी. 498 पर ध्यान आकर्षिष करना ाहेंगें। उक्त मामले में प्रत्यर्थी3 छ ु ट्टी समाप्त होने क े बाद ऑविSस ज्वाइन नहीं विकया। प्रत्यर्थी3 को Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds एक सू ना जारी की गयी विक यविद वह विदनांक 30.10.1985 से पहले ऑविSस ज्वाइन नहीं कर ा ो ऐसा माना जाएगा विक वह स्वैण्डिच्छक रूप से सेवा में नहीं रहना ाह ा सिजसका यह परिरर्णाम होगा विक विदनांक 1.11.1985 से कम[8] ारी नामावली से हटा विदया जाएगा। प्रत्यर्थी3 ने उक्त आदेश को ुनौ ी दी और विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने विदनांक 10.11.1995 को एयरपोट[8] अर्थीॉरिरटी को विनदDश जारी विकया विक वह प्रत्यर्थी3 को ड्यूटी ज्वाइन कराये लेविकन न्यायालय ने अथिभविन ा8रिर विकया विक प्रत्यर्थी3 सिजस अवति क ड्यूटी से अनुपण्डिस्र्थी रहा है उस अवति क े लिलए पूव[8] वे न प्राप्त करने का अति कारी नहीं होगा। प्रत्यर्थी3 ने ड्यूटी ज्वाइन नहीं विकया और विवद्वान एकल न्यायमूर्ति क े इस आदेश को पुनः ुनौ ी दी। ख,ड़पीठ ने विवद्वान एकल न्यायमूर्ति क े आदेश को अपास् कर मामले को उन्हीं क े पास प्रति प्रेविष कर विदया। विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने अपीलार्थी3 प्रत्यर्थी3 को बहाल करने का विनदDश जारी विकया और आगे यह विनदDथिश कर े हुए कहा विक जहां क रिरट याति काक ा8 क े वे न का प्रश्न है सिजस अवति क वह काय[8] से विवर रहा, भार ीय एयरपोट[8] एर्थीॉरिरटी को यह विनदDश विदया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds जा ा है विक वह मामले पर सहानुभूति पूव8क विव ार करे और यविद संबंति विनयमावली में ऐसा कहीं विनयम है ो प्रत्य 3 को 17.10.1985 से 10.11.1995 की अवति क े लिलए अन्य लाभों सविह आ ा वे न देने पर स्वीक ृ ति प्रदान करे। एयरपोट[8] एर्थीॉरिरटी ने उक्त विनर्ण8य को स्वीकार कर लिलया और प्रत्यर्थी3 को 01.11.1999 से ज्वाइन करने की अनुमति प्रदान कर दी और विदनांक 14.05.2002 को यह कह े हुए एक आदेश पारिर विकया विक अप्राति क ृ अनुपण्डिस्र्थीति की अवति को डायस नॉन यानी उस अवति क े दौरान कोई काय[8] नहीं हुआ माना जाएगा और पूव[8] वे न क े दावे को दनुरूप नो वक 8 नो पे यानी काय[8] नहीं वे न नहीं क े सिसद्धान् पर अस्वीकृ कर विदया गया। विदनांक 14.05.2002 क े आदेश को पूव[8] वे न की मांग कर े हुए प्रत्यर्थी3 द्वारा पुनः ुनौ ी दी गयी सिजसे विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने अनुज्ञा कर विदया। आगे मांग खारिरज कर विदये जाने क े उपरान् प्रत्यर्थी3 ने विनदDश जारी करने हे ु मामले को एकल न्यायमूर्ति क े समक्ष रखा। विवद्वान एकल े आदेश क े विवरूद्द मामले को ख,ड़पीठ क े समक्ष विव ार हे ु लाया गया जहां पर पूव[8] वे न का 50 प्रति श भुग ान करने का विनदDश जारी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विकया गया। अपील अनुज्ञा कर े हुए इस न्यायालय ने प्रस् र 8 में विनम्नलिललिख विटप्पर्णी कीः- “8. विवद्वान एकल न्यायमूर्ति का यह आदेश विदनांक 21.03.2007 क े आक्षेविप आदेश द्वारा इस अवलोकन क े सार्थी अपास् कर विदया गया है विक सिसविवल अपील (रिरट) सं. 5715 वष[8] 1986 में उच्च न्यायालय क े इस आदेश सिजसमें उसने प्रत्यर्थी3 को 17.10.1985 से 10.11.1995 क की अवति क पूव[8] वे न का 50 प्रति श देने का विनदDश विदया र्थीा उसका अनुपालन विकया जाए।

9. अपीलार्थी3 क े विवद्वान अति वक्ता ने उल्लेख विकया है विक कई बार ड्यूटी ज्वाइन करने की सू ना जारी करने क े बावजूद प्रत्यर्थी3 15 वषm क ड्यूटी ज्वाइन नहीं विकया है इसलिलए ख,ड़पीठ का 17.10.1985 से 10.11.1995 की अवति क पूव[8] वे न क े भुग ान का विनदDश नो वक 8 नो पे क े सिसद्दान् पर न्यायोति नहीं है। उन्होंने उल्लेख विकया है विक अपील Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds प्राति कारी क े इस आदेश को ब न्यायोति कहा जा सक ा र्थीा जब वे प्रत्यर्थी3 को उसकी सेवा से पदच्यु कर दे े, लेविकन इसक े विवपरी, उसको बहु बड़ा लाभ विदया जा ुका र्थीा क्योंविक उसको सेवा में पुनः लिलया गया र्थीा बावजूद इसक े विक वह करीब 15 वषm क सेवा में अनुपण्डिस्र्थी रहा।

10. हालांविक प्रत्यर्थी3 क े विवद्व अति वक्ता ने ख,ड़पीठ क े विनर्ण8य का समर्थी8न विकया। हमारी राय यह है विक इऩ थ्य क े प्रकाश में विक प्रत्यर्थी3 15 वषm क ड्यूटी क े लिलए रिरपोट[8] नहीं विकया, सामान्य ः उसे पूव[8] वे न देने का कोई औति त्य नहीं र्थीा और कोई भी उस अवति क े लिलए वे न क े दावे हे ु विनदDथिश नहीं विकया जा सक ा सिजस अवति क े लिलए वह विबना छ ु ट्टी या विबना न्यायपूर्ण[8] औति त्य क े सेवा से अनुपण्डिस्र्थी र्थीा। जो अण्डिन् म हो ुका र्थीा और विनम्नलिललिख विनदDथिश विकया गया र्थीाः “(क). जहां क रिरट या ी क े काय[8] से विवर रहने क े दौरान वे न प्राप्त करने का प्रश्न है, Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds प्रत्यर्थी3, भार ीय एयरपोट[8] एर्थीॉरिरटी, को विनदDथिश विकया गया विक वे मामले का सहानुभूति पूव8क विनपटारा करे, यविद विनमयावली में इस संबं में कोई प्राव ान हो ो उसे वे न एवं अन्य लाभों का आ ा भाग अनुज्ञा करे।”

11. प्रस् ु दावे को सक्षम प्राति कारी द्वारा विव ारिर विकया गया और वै कारर्णों से रद्द कर विदया। इस प्रकार हम उच्च न्यायालय का आदेश, सिजसमें उन्होंने 17.10.1985 से 10.11.1995 की अवति क क े पूव[8] वे न क े भुग ान का विनदDश विदया, का समर्थी8न करने करने की दशा में नहीं हैं, ूंविक विदनांक 13.08.1999 क े आदेश में जो विनदDश विदये गये र्थीे उससे परे है। हम दनुरूप इस अपील को अनुज्ञा कर े हैं, ख,ड़पीठ क े आदेश को अपास् कर े हैं और विदनांक 15.4.2004 क े एकल न्यायमूर्ति क े आदेश को बहाल कर े है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

19. न्यायालय ने अथिभविन ा8रिर विकया विक सामान्य सिसद्धान् यह है विक प्रत्यर्थी3 को पूव[8] वे न प्रदान करने का कोई औति त्य नहीं र्थीा और विकसी को विनदDथिश नहीं विकया जा सक ा विक वह उस अवति क े लिलए वे न का दावा करे सिजस अवति क े लिलए विबना छ ु ट्टी या विकसी औति त्य क े काय[8] से विवर रहा है।

20. हम आगे इस न्यायालय द्वारा पारिर विनर्ण8य शोभाराम र ूरी बनाम हरिरयार्णा विवद्यु प्रसारर्ण विनगम लिलविमटेड़ एवं अन्य (उपरोक्त) पर ध्यान आकर्षिष करेगें सिजसका प्रत्यर्थी3 ने भी अपने प्रति शपर्थीपत्र में अवलम्ब लिलया है। उक्त मामले में अपीलार्थी3 विदनांक 31.12.2002 को सेवा से मुक्त कर विदया गया, भले ही सामान्य दशा में उसने 31.12.2005 को अपनी सेवाविनवृलित्त की ति थिर्थी को प्राप्त विकया। अपीलार्थी3 ने सेवविनवृलित्त क े आदेश को ुनौ ी दी सिजसे विवद्वान एकल न्यायमूर्ति ने अनुज्ञा कर विदया। विवद्वान एकल न्यायामूर्ति ने नो वक 8 नो वेज क े सिसद्धान् पर पूव[8] वे न क े भुग ान को मना कर विदया। विवद्वान एकल न्यायमूर्ति क े आदेश को अपीलार्थी3 द्वारा लेटस[8] पेटेंट अपील दायर कर ुनौ ी दी गयी सिजसको भी खारिरज कर विदया गया। इस Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds न्यायालय ने अपीलार्थी3 की अपील को अनुज्ञा कर विनम्नलिललिख अवलोकन विकया जो प्रस् र 3 एवं 4 में इस प्रकार हैः- “3. इस विववाद को गहराई से विव ार करने क े उपरान् हम सन् ुg है विक विदनांक 31.12.2002 क े सेवाविनवृलित्त आक्षेविप आदेश क े अपास् कर विदये जाने क े उपरान् अपीलार्थी3 सभी आनुषंविगक लाभों का हकदार हो गया। यह गल ी प्रत्यर्थी3गर्णों की है विक विदनांक 01.012003 से 31.12.2005 क की अवति क े लिलए अपीलार्थी3 की सेवाओं का प्रयोग नहीं विकया है। यविद अपीलार्थी3 को सेवा में रहने विदया जा ा ो वह अपने क 8व्यों का सम्यक रूप से विनव8हन कर ा। ूंविक अपीलार्थी3 को 01.01.2003 से 31.12.2005 क सेवा करने से प्रत्यर्थी3 द्वारा रोक विदया गया इसलिलए प्रत्यर्थी3 क े इस अथिभव न को अनुज्ञा नहीं विकया जा सक ा विक वह नो वक 8 नो पे क े सिसद्धान् पर प्रश्नग अवति क े लिलए अपीलार्थी3 को उसका वे न देने से मना करे।” Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

4. उक्त रिरकाड[8] विकये गये कारर्णों से हम सं ुg हैं विक उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आदेश सिजसमें क ु छ सीमा क विदनांक 01.01.2003 से 31.12.2005 अपीलार्थी3 को वे न का भुग ान करने से मना कर विदया गया है, अपास् विकये जाने योग्य है। इसको दनुसार ए दद्वारा अपास् विकया जा ा है।”

21. इस न्यायलय ने उपरोक्त मामले में अथिभविन ा8रिर विकया विक ूंविक अपीलार्थी3 को 01.01.2003 से 31.12.2005 क सेवा करने से प्रत्यर्थी3 द्वारा रोक विदया गया इसलिलए प्रत्यर्थी3 क े इस अथिभव न को अनुज्ञा नहीं विकया जा सक ा विक वह नो वक 8 नो पे क े सिसद्धान् पर प्रश्नग अवति क े लिलए अपीलार्थी3 को उसका वे न देने से मना करे। उपरोक्त मामले में अपीलार्थी3 को विदनांक 31.12.2002 क े सेवाविनवृलित्त क े आदेश द्वारा काय[8] करने से रोक विदया गया सिजसक े कारर्ण वह सिजस ति थिर्थी को वास् व में सेवाविनवृत्त हो ा उस ति थिर्थी क काय[8] नहीं कर सका। जब विदनांक 31.12.2002 को आदेश पारिर विकया गया ो वह स्व ः पूव[8] वे न पाने का हकदार हो जा ा है और नो वक 8 नो पे का सिसद्दान् आकर्षिष नहीं हुआ। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

22. ऊपर उसिल्ललिख व 8मान मामले में प्रत्यर्थी3 को अपीलार्थी3 क े विकसी भी आदेश द्वारा काय[8] से विवर नहीं रखा गया। उसकी सेवामुविक्त का आदेश विदनांक 26.06.2012 को पारिर विकया गया, विदनांक 26.06.2012 को उसकी सेवाविनवृलित्त क े उपरान्, उसको विकसी भी रह सेवा से विवर नहीं रखा गया। प्रत्यर्थी3 ने कर्थीन विकया विक उसे अवै ाविनक रूप से इलाहाबाद से ब्रां ऑविSस जौनपुर स्र्थीानान् रिर विकया गया। वह 40 प्रति श से अति क अक्षम ा से ग्रस् र्थीा इसलिलए उसका अन्य स्र्थीान पर नहीं विकया जा सक ा र्थीा। अथिभलेख में ऐसा क ु छ भी नहीं है सिजससे यह दर्णिश हो विक प्रत्यर्थी3 का स्र्थीानान् रर्ण इलाहाबाद ब्रां ऑविSस से जौनपुर ब्रां ऑविSस विकसी भी समय अपास् विकया गया या वापस लिलया गया। विदनांक 14.05.2009 क े आदेश क े अपास् हो जाने क े कारर्ण प्रत्यर्थी3 को विदनांक 14.05.2009 क वे न अनुज्ञाति विकया गया सिजसमें सभी आनुषंविगक लाभ शाविमल र्थीे, लेविकन 14.05.2009 से 20.06.2012 की अवति क े बाद वे न प्राप्त करने क े संबं में उच्च न्यायालय द्वारा कोई न्यायविनर्ण8यन नहीं विकया गया है Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds जो विदनांक 03.07.2018 क े उच्च न्यायालय क े उपरोक्त यर्थीा उसिल्ललिख विनर्ण8य से स्पg हो ा है।

23. विवद्वा एकल न्याया ीश स्वयं 14.05.2009 से 20.06.2012 क े बाद अपीलार्थी3 क े वे न प्राप्त करने क े हक को विन ा8रिर न कर अपीलार्थी3 को विनदDथिश विकया र्थीा विक हक पर विव ार करे र्थीा उस पर विनर्ण8य लें। हमारी राय यह है विक 14.05.2009 क े बाद 20.06.2012 क अपीलार्थी3 को वे न का भुग ान करने का विनदDश दे े हुए उच्च न्यायालय क े विनदDश को अपास् करने में ही न्याय क े उद्देश्यों की प्राविप्त होगी, अपीलार्थी3 को इस विनदDश क े सार्थी विक वे 14.05.2009 से 20.06.2012 क प्रत्यर्थी3 क े पूव[8] वे न क े दावे पर विव ार करे और आज की ारीख से ीन माह क े भी र उति आदेशों को पारिर करें। प्रत्यर्थी3 को छ ू ट है विक वे आज की ारीख से एक माह क े भी र अपीलार्थी3 को 15.05.2009 से 20.06.2012 की अवति क े लिलए वे न हे ु अपने हक संबं ी महत्वपूर्ण[8] थ्यों क े सार्थी अपनी प्रस् ुति जमा करे। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

24. अपील उपरोक्त वर्णिर्ण सीमा क भाग ः अनुज्ञा की जा ी है। पक्षकार अपना-अपना ख 8 स्वयं वहन करें।...................... न्यायमूर्ति अशोक भूषर्ण...................... न्यायमूर्ति नवीन सिसन्हा नई विदल्ली, 11 जुलाई, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds