Krishna Kumar Tiwari v. State of U.P.

Supreme Court of India · 09 Jul 2019
Sanjay Krishan Kaul; K. M. Joseph
Criminal Appeal No. 1015 of 2019 (from SLP (Crl) No. 9654 of 2017)
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that Magistrates have independent jurisdiction to take cognizance on final police reports under Section 190(1)(b) CrPC and must follow procedural safeguards when considering protest petitions, remanding the case for fresh consideration after finding no sufficient evidence of dowry death.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
समक्ष भार ीय सव च्च न्यायालय
आपराति क अपीलीय न्यायक्षेत्र
आपराति क अपील सं. 1015/2019
(SLP (क्रि'.) सं. 9654 / 2017 से उद्भू )
क्रिवष्णु क
ु मार ति वारी ...अपीलार्थी3 (गण)
बनाम
उ.प्र. राज्य द्वारा गृह सति;व, दीवानी सति;वालय लखनऊ एवं अन्य ... प्रत्यर्थी3 (गण)
क्रिनणBय
न्यायमूर्ति , क
े . एम. जोसेफ
JUDGMENT

1. क्रिवशेष अनुमति याति;का से उत्पन्न इस अपील में, दूसरे प्रत्यर्थी3 ने, प्रर्थीम सू;ना रिरपोर्टB दजB कराई है जो क्रिक भार ीय दंड संक्रिह ा, 1860 (ए स्मिSमनपश्चा संतिक्षप्त ः 'आईपीसी' क े रूप में सन्दर्भिभ ) की ारा 201, 304B एवं 498A और दहेज क्रिनषे अति क्रिनयम, 1961 की ारा 3 और 4 का अवलंब लिलया है। संक्षेप में, शिशकाय की अन् वBS ु इस प्रकार है। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपीलार्थी3 ने दूसरे प्रत्यर्थी3 की पुत्री से क्रिदनांक 22.04.2004 को क्रिववाह क्रिकया। अपीलार्थी3 क े क्रिप ा ने ऑल्र्टो कार और क्रिवष्णु का बी.एड्. में प्रवेश क े लिलए रु. 2 लाख की मांग की। उसने दहेज की मांग को Sवीकार नहीं क्रिकया, और यहाँ क क्रिक क्रिववाह क े समय भी, उसने रू. 4 लाख की मांग की। यहाँ उसकी पुत्री का अपनी मा ा को सूति; करने का संदभB है क्रिक उसकी सास, ससुर, पति, देवर और भाभी उसे मार े र्थीे और दहेज लाने क े लिलए उसे प्र ाक्रिh क्रिकया कर े र्थीे। उसक े र्टेलीफोन कॉल का संदभB है क्रिक उसकी पुत्री संकर्टमय स्मिSर्थीति में र्थीी। यह बा क्रिदनांक 08.09.2010 की र्थीी और जब वे वहां पहुं;े, ो उनकी पुत्री वहां नहीं र्थीी। जोर देने पर, दूसरे प्रत्यर्थी3 की पुत्री की सास ने उन्हें ब ाया क्रिक वे उसे कहीं क्रिकसी अSप ाल में ले गए र्थीे। कई अSप ालों में खोज की गई लेक्रिकन उनकी पुत्री का प ा नहीं;ल सका। इसक े बाद, उन्होंने पाया क्रिक उनकी पुत्री की मृत्यु हो गई र्थीी। दूसरे प्रत्यर्थी3 की पुत्री का अपीलार्थी3 और ससुर, सास, देवर और भाभी द्वारा दहेज की माँग का संदभB क्रिदया गया र्थीा और यह क्रिक उन्होंने उसकी पुत्री की हत्या की है। इसक े आ ार पर ऐसा प्र ी हो ा है क्रिक, अपरा सं. 721/2007 दजB क्रिकया गया र्थीा। र्थीाक्रिप, जाँ; अति कारी ने, जाँ; क े आ ार पर, बयान लेने क े पश्चा ्, दंड प्रक्रि'या संक्रिह ा, 1973 की ारा 178 (ए स्मिSमनपश्चा संतिक्षप्त ः 'आईपीसी' क े रूप में सन्दर्भिभ ) क े ह अंति म रिरपोर्टB फाइल की।

2. दूसरे प्रत्यर्थी3 ने क्रिवरो याति;का दायर की। मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट ने एक आदेश पारिर क्रिकया जिजसमें कहा गया क्रिक दूसरे प्रत्यर्थी3/वादी की पुत्री, अपीलार्थी3 की पत्नी की मृत्यु बीमारी की वजह से हो Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds गई र्थीी। यह पाया गया क्रिक आरोक्रिपयों ने न ो उसे कोई उत्पीhन या या ना दी र्थीी और न ही दहेज हत्या की है। दहेज क्रिनषे अति क्रिनयम, 1961 की ारा 3 और 4 एवं ारा 498 ए, 304 बी और 201 क े ह आरोक्रिपयों क े क्रिवरूद्ध कोई प्रर्थीम दृष्टया मामला नहीं बनाया गया र्थीा। यह पाया गया क्रिक कारBवाई क े लिलए पयाBप्त आ ार नहीं बनाया गया है और प्रति वाद याति;का खारिरज कर दी गई और अंति म रिरपोर्टB Sवीकार कर ली गई।

3. दूसरे प्रत्यर्थी3 ने अति रिरक्त सत्र न्याया ीश क े समक्ष पुनरीक्षण याति;का दायर की। अति रिरक्त सत्र न्याया ीश ने योग्य ा नहीं पाई और आपराति क आवेदन को खारिरज कर क्रिदया। इसक े कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े समक्ष एक रिरर्ट याति;का दायर की गई। यह याति;का भार क े संक्रिव ान क े अनुच्छेद 226 का अवलम्ब ले े हुए दायर की गई र्थीी। उत्प्रेषण-लेख की रिरर्ट को अति रिरक्त सत्र न्याया ीश द्वारा पारिर आक्षेक्रिप आदेश और मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा पारिर आदेश को रद्द करने की मांग की गई र्थीी। पीक्रिh क े परिरवार और अन्य सातिक्षयों क े बयानों को ले े हुए और मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट क े समक्ष रिरपोर्टB प्रS ु करक े मामले की जां; करने क े लिलए क्रिनदyश पारिर करने की माँग की गई र्थीी। मामले में आरोक्रिपयों क े क्रिवरूद्ध संज्ञान लेने क े लिलए मामले को नए जिसरे से देखने क े लिलए मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट का क्रिनदyश मांगा गया र्थीा।

4. आक्षेक्रिप क्रिनणBय द्वारा, उच्च न्यायालय ने मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट और अति रिरक्त सत्र न्याया ीश द्वारा पारिर आदेशों को अपाS कर क्रिदया। मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट को क्रिनदyश क्रिदया गया र्थीा क्रिक वे अवलोकन क े प्रकाश में नए जिसरे से प्रति वाद याति;का पर क्रिव;ार करें। उक्त आदेश से पीक्रिh महसूस Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds कर े हुए, क्रिवशेष अनुमति याति;का दायर की गई र्थीी, जिजसक े लिलए अनुमति मांगी गई र्थीी और आदेश क्रिदनांक्रिक 04.12.2017 द्वारा अनुदत्त की गई र्थीी।

5. हमने पक्षों क े क्रिवद्व अति वक्ता को सुना और मामले में अनुमति अनुदत्त की है।

6. अपीलार्थी3 क े क्रिवद्व वरिरष्ठ अति वक्ता यह इंक्रिग करेंगे क्रिक उच्च न्यायालय ने यह ध्यान नहीं क्रिदया है क्रिक मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट ने वS ु ः प्रति वाद याति;का पर क्रिव;ार क्रिकया है। वह उच्च न्यायालय द्वारा दजB क्रिनम्नलिललिख जाँ;-परिरणाम क े आलोक में शिशकाय कर ा है: "11 उपरोक्त क्रिवति क े आलोक में, मेरी राय है क्रिक, यक्रिद पुलिलस द्वारा प्रS ु अंति म रिरपोर्टB क े क्रिवरूद्ध याति;काक ाB द्वारा प्रति वाद याति;का प्रS ु की गई र्थीी, ो प्रति वाद याति;का क े माध्यम से जाना क्रिवद्व मजिजSर्ट्रेर्ट का क Bव्य र्थीा और यक्रिद वहाँ प्रति वाद याति;का में कोई भी त्व र्थीा ो वह सीआर.पी.सी. की ारा 190(1) (बी) क े ह संज्ञान ले सक ा है।

12. क्रिवद्व मजिजSर्ट्रेर्ट क े अशिभलेख क े परिरशीलन से प ा;ल ा है क्रिक उसने याति;काक ाB की प्रति वाद याति;का पर क्रिव;ार नहीं क्रिकया है।;ूंक्रिक यह एक प्रति वाद याति;का र्थीी, इसलिलए प्रति वाद याति;का में उजि•लिख थ्यों पर क्रिव;ार करना और क्रिवति क े अनुसार इसे य करना क्रिवद्व सीजेएम का यह पक्रिवत्र क Bव्य र्थीा।"

7. मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा पारिर आदेश से प ा;ल ा है क्रिक प्रति वाद याति;का पर क्रिव;ार क्रिकया गया है। न ही मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट और न ही अति रिरक्त सत्र न्याया ीश क्रिवति क े उति; जिसद्धां ों को लागू करने में क्रिवफल रहे हैं। इस संबं में, उच्च न्यायालय क े आक्षेक्रिप क्रिनणBय में की गई क्रिनम्नलिललिख प्रेक्षणों पर ध्यान देना समी;ीन है: Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “10. पखाण्डो एवं अन्य बनाम उ.प्र. राज्य एवं अन्य 2001 (43) एसीसी 1096 क े मामले में, न्यायालय का यह म है क्रिक अंति म रिरपोर्टB क े मामले में मजिजSर्ट्रेर्ट क े पास;ार क्रिवकल्प हैं: - (1) वह पुलिलस क े क्रिनष्कषB से सहम हो सक ा है और अंति म रिरपोर्टB को Sवीकार कर कायBवाही को छोh देगा। (2) वह दंड प्रक्रि'या संक्रिह ा की ारा 190 (1) (ख) क े ह संज्ञान ले सक े गा और जाँ; एजेंसी क े क्रिनष्कषB द्वारा बाध्य क्रिकए क्रिबना शीघ्र ही अशिभयुक्त की कायBक्रिवति जारी कर सक े गा जहां उसको यह सं ुक्रिष्ट हो जा ी है क्रिक पुलिलस द्वारा खोजे गए थ्यों पर कायBवाही करने क े लिलए पयाBप्त आ ार है। (3) यक्रिद उसको यह सं ुक्रिष्ट हो जा ी है क्रिक जाँ; सम्यक ् रीति से क्रिकया गया है ो वह जाँ; क े लिलए आगे आदेश दे सक े गा। (4) वह प्रक्रि'या जारी क्रिकए क्रिबना और दंड प्रक्रि'या संक्रिह ा की ारा 190 (1) (क) क े ह कायBवाक्रिहयों को छोh कर मूल परिरवाद या क्रिवरो याति;का पर जो परिरवाद क े समान व्यवहार कर ी है और दंड प्रक्रि'या संक्रिह ा की ारा 200 और 202 क े ह कायB करने क े लिलए अग्रसर हो सक ा है और त्पश्चा ् परिरवाद खारिरज की जानी;ाक्रिहए या प्रक्रि'या जारी की जानी;ाक्रिहए।”

8. वह जोर देकर कहेगा क्रिक यह एक ऐसा मामला है जहां दूसरे प्रत्यर्थी3 की अपीलार्थी3/पुत्री की Sवग3य पत्नी की Sवाभाक्रिवक मृत्यु हो गई र्थीी। अपीलार्थी3 क े लिलए एक पक्ष यह है क्रिक वषB 2004 में उसका क्रिवति व क्रिववाह हुआ र्थीा। क ु छ समय बाद अपीलार्थी3 की पत्नी ने गभB ारण क्रिकया और बच्चे को जन्म क्रिदया।यह अपीलार्थी3 का पक्ष है क्रिक दुभाBग्य से बीमारी ने दूसरे प्रत्यर्थी3 की पुत्री को मारा। उप;ार क्रिकया गया, और जैसा क्रिक मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा पाया गया क्रिक, परिरवादी की पुत्री की बीमारी क े कारण मृत्यु हो गई। उच्च न्यायालय क े समक्ष आक्षेक्रिप आदेशों में हS क्षेप करने क े लिलए कोई मामला नहीं बनाया गया र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

9. इसक े क्रिवपरी, दूसरे प्रत्यर्थी3/परिरवादी की ओर से प्रS ु क्रिवद्व अति वक्ता ने प्रीति अSप ाल द्वारा जारी क्रिकए गए मृत्यु प्रमाण पत्र पर हमारा ध्यान आकर्षिष क्रिकया: "मृत्यु प्रमाणपत्र यह प्रमाशिण क्रिकया जा ा है क्रिक मरीज श्रीम ी जया ति वारी उम्र लगभग 31 वषB, मक्रिहला, पत्नी श्री क्रिवष्णु ति वारी, क्रिनवासी ग्राम सौराई, सैफाबाद, पट्टी प्र ापगढ़ उ.प्र जो इस र्ट्रSर्ट में क्रिदनांक 09.10.07 को शाम 10.29 बजे डॉक्र्टर ए. गुप्ता की देखरेख में सेप्र्टीसीक्रिमया सी रेस्मिSपरेर्टरी तिडSर्ट्रेस क े मामले में भ 3 क्रिकया गया र्थीा और क्रिदनांक 10.10.2007 को 8.00 बजे सुबह कार्तिडयो पल्मोनरी अरेSर्ट की वजह से मृत्यु हुई र्थीी।”

10. वह ब ा े हैं क्रिक एक ओर, वादी की पुत्री क े मामले का संदभB सेप्र्टीसीक्रिमया सी रेस्मिSपरेर्टरी तिडSर्ट्रेस में से एक है, परन् ु यह भी कहा गया है क्रिक दूसरे प्रत्यर्थी3/वादी की पुत्री की मृत्यु कार्तिडयो पल्मोनरी अरेSर्ट की वजह से हो गई र्थीी। यह उठाया गया प्रश्न जो उच्च न्यायालय क े समक्ष लगाए गए आक्षेक्रिप आदेशों से क्रिव;ारिर नहीं है।

11. उन्होंने साक्षी द्वारा क्रिदए गए बयानों को भी संदर्भिभ करक े यह क B क्रिदया क्रिक यह थ्य र्थीे जिजसको मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट को शिशकाय क े रूप में क्रिवरो याति;का का व्यवहार करने क े लिलए आश्वS करना;ाक्रिहए र्थीा और मामले को उक्त आ ार पर आगे बढ़ाया जाना;ाक्रिहए र्थीा।

12. न्यायालय ने अपीलार्थी3 से प्रश्न क्रिकया क्रिक क्यों अति रिरक्त सत्र न्याया ीश ने पाया क्रिक मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा आरोक्रिपयों क े क्रिवरूद्ध भा.दं.सं. की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds ारा 304 बी और 201 क े ह प्रर्थीम दृष्ट्या कोई मामला नहीं है, परन् ु भा.दं.सं. की ारा 498 ए का कोई संदभB क्यों नहीं है। क्रिवद्व अति वक्ता ने अति रिरक्त सत्र न्याया ीश द्वारा पारिर आदेश की ओर हमारा ध्यान आकर्षिष क्रिकया और यह क B क्रिदया क्रिक दूसरे प्रत्यर्थी3 /वादी ने भा.दं.सं. की ारा 498 ए क े ह मामले को नहीं दबाया। क B भा.दं.सं. की ारा 304 बी और 201 क सीक्रिम र्थीा। इस मामले में न्यायालय ने क्या कहा उस पर एक नजर

13. अशिभनंदन झा एवं अन्य बनाम क्रिदनेश क्रिमश्रा एआईआर [1968 एससी 117 / (1967) 3 एससीआर 668] क े मामले में, यह सवाल उठ ा है क्रिक जब एक रिरपोर्टB प्रS ु की जा ी है क्रिक यह ास्मित्वक नहीं है क्रिक अशिभयुक्त को क्रिव;ारण क े लिलए भेजने का कोई मामला बन ा है ो क्या मजिजSर्ट्रेर्ट सी े पुलिलस को आरोप-पत्र प्रS ु करने का क्रिनदyश दे सक ा है। इस न्यायालय ने यह क्रिव;ार क्रिकया क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट पुलिलस को अपनी राय बदलने क े लिलए मजबूर नहीं कर सक ा। हालांक्रिक, यह अव ारिर क्रिकया गया क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट इस रह की रिरपोर्टB को Sवीकार नहीं करने क े लिलए Sव ंत्र है और वह उपयुक्त कारBवाई कर सक ा है। मजिजSर्ट्रेर्ट संक्रिह ा की ारा 156(3) क े ह आगे की जां; का क्रिनदyश दे सक ा है। आगे यह अव ारिर क्रिकया गया क्रिक यह ऐसे मामले में होगा जहां मजिजSर्ट्रेर्ट को लग ा है क्रिक जां; असं ोषजनक अर्थीवा अ ूरी है। यह ऐसे मामले में भी हो सक ा है जहां आगे की जां; में गुंजाइश हो ी है।

14. यह अनुति; नहीं हो सक ा है क्रिक हम अशिभनंदन झा (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय द्वारा क्रिनम्नलिललिख;;ाB का उ•ेख कर े हैं क्रिक अंति म रिरपोर्टB क्या है: Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds ”13. यह देखा जाएगा क्रिक संक्रिह ा, इस प्रकार, ';ाजB-शीर्ट' या 'अंति म रिरपोर्टB' शब्द की अशिभव्यक्रिक्त का उपयोग नहीं कर ा है। लेक्रिकन यह ज्ञा है क्रिक पुलिलस क्रिनयम और क्रिवक्रिनयम, जिजसमें संक्रिह ा की ारा 170 क े ह पुलिलस द्वारा दजB की गई एक रिरपोर्टB को 'आरोप-पत्र' कहा जा ा है।परन् ु ारा 169 क े ह प्रेक्रिष की गई रिरपोर्टš क े बाब अर्थीाB ् जब क्रिकसी मजिजSर्ट्रेर्ट को अशिभयुक्त क े अग्रेक्रिष क्रिकए जाने को न्यायोति; ठहराने क े लिलए कोई पयाBप्त साक्ष्य नहीं है ो क्रिवशिभन्न राज्यों में इसे 'क्रिनर्षिदष्ट आरोप', 'अंति म रिरपोर्टB' अर्थीवा 'सार' कहा जा ा है।”

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15. ए;.एस. बैन्स, क्रिनदेशक, लघु ब; -सह-उप सति;व क्रिवत्त, पंजाब,;ंडीगढ़ बनाम राज्य (क ें द्र शाजिस प्रदेश;ंडीगढ़) [(1980) 4 एससीसी 631] क े मामले में, पुलिलस ने एक अंति म रिरपोर्टB प्रS ु की। हालांक्रिक, मजिजSर्ट्रेर्ट पुलिलस क े क्रिनष्कषB से असहम र्थीे और मामले का संज्ञान ले े हुए प्रक्रि'या जारी करने का क्रिनदyश क्रिदया। एक क B यह लिलया गया क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट ने संक्रिह ा की ारा 200 क े ह गवाहों और वादी की शपर्थी पर बयान दजB नहीं करने का अवै ाक्रिनक कायB क्रिकया है, अ ः मजिजSर्ट्रेर्ट को पुलिलस रिरपोर्टB पर संज्ञान लिलया जाना;ाक्रिहए जिजसक े लिलए वह सक्षम नहीं र्थीा क्योंक्रिक यह ारा 173 क े ह एक रिरपोर्टB नहीं र्थीी, लेक्रिकन ारा 169 क े अर्थीB क े भी र एक अंति म रिरपोर्टB र्थीी। यह क B क्रिदया गया क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट क े पास उसक े समक्ष क े वल दो क्रिवकल्प र्थीे- (i) ) वह या ो आगे की जां; का आदेश दे सक ा है। (i) i) ) वह क्रिकसी शिशकाय पर भी संज्ञान ले सक ा र्थीा किंक ु उसी क े लिलए वादी और सातिक्षयों क े कर्थीन अशिभलिललिख क्रिकए जाने होंगे।

16. ए;एस बैन्स (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय ने अपने क्रिनणBय में क्रिनम्नलिललिख रूप से अव ारिर क्रिकया: Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “6. यह उन प्राव ानों से देखा जा ा है जिजनक े बारे में हमने पूवBव 3 प्रS रों में उ•ेख क्रिकया है क्रिक एक शिशकाय प्राप्त होने पर एक मजिजSर्ट्रेर्ट क े पास उसक े लिलए कई क्रिवकल्प हो े हैं। वह अपरा का संज्ञान ले सक ा है और ारा 200 क े ह उपस्मिSर्थी वादी और गवाहों क े बयान दजB करने क े लिलए अग्रसर हो सक ा है। इसक े बाद, यक्रिद उनकी राय में कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार नहीं है ो वह ारा 203 क े ह शिशकाय को खारिरज कर सक े हैं। यक्रिद उनकी राय में कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार है ो वह ारा 204 क े ह प्रक्रि'या जारी कर सक ा है। यक्रिद उनकी राय में कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार है ो वह ारा 204 क े ह प्रक्रि'या जारी कर सक ा है। हालाँक्रिक, यक्रिद वह उति; समझ ा है, ो वह प्रक्रि'या क े मुद्दे को Sर्थीक्रिग कर सक ा है और या ो मामले में Sवयं से पूछ ाछ कर सक ा है अर्थीवा पुलिलस अति कारी अर्थीवा ऐसे अन्य व्यक्रिक्त द्वारा की जाने वाली जां; का क्रिनदyश दे सक ा है जैसा क्रिक वह सो; ा है क्रिक क्या कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार है अर्थीवा नहीं, यह य करने क े लिलए उति; है। वह ब प्रक्रि'या जारी कर सक ा है यक्रिद उसकी राय में कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार हो अर्थीवा यक्रिद कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार नहीं हो ो शिशकाय को खारिरज क्रिकया जा सक ा है। दूसरी ओर, पहली अवSर्थीा में, शिशकाय प्राप्त होने पर, मजिजSर्ट्रेर्ट अपरा का संज्ञान लेने क े बजाय, ारा 156 (3) क े ह जां; का आदेश दे सक ा है। पुलिलस ब ारा 173 (1) क े ह जां; करेगी और एक रिरपोर्टB प्रS ु करेगी। पुलिलस रिरपोर्टB प्राप्त होने पर मजिजSर्ट्रेर्ट ारा 190 (1) (बी) और सी े मामले की प्रक्रि'या क े ह अपरा का संज्ञान ले सक ा है। यह वह अपनी रिरपोर्टB में पुलिलस द्वारा व्यक्त क्रिकए गए दृक्रिष्टकोण क े बावजूद कर सक ा है क्रिक क्या अपरा क्रिकया गया है या नहीं। ारा 173 क े ह पुलिलस रिरपोर्टB में पुलिलस द्वारा खोजे गए या अप्राप्त थ्य और पुलिलस द्वारा उसक े द्वारा क्रिनकाले गए क्रिनष्कषB शाक्रिमल होंगे। मजिजSर्ट्रेर्ट पुलिलस द्वारा क्रिनकाले गए क्रिनष्कषš से बाध्य नहीं है और वह प्रक्रि'या जारी करने का फ ै सला कर सक ा है, यहाँ क क्रिक पुलिलस यह जिसफारिरश करे क्रिक कायBवाही आगे बढ़ाने क े लिलए पयाBप्त आ ार नहीं है। पुलिलस आख्या प्राप्त करने क े बाद मजिजSर्ट्रेर्ट प्रक्रि'या जारी क्रिकए क्रिबना अर्थीवा कायBवाही को छोhने क े क्रिबना, मूल रूप से उसे प्रS ु क्रिकए गये परिरवाद क े आ ार पर अपरा का संज्ञान लेने का क्रिनणBय ले सक ा है और परिरवादी एवं गवाहों क े शपर्थी पर आपराति क प्रक्रि'या संक्रिह ा की ारा 200 क े ह बयान दजB करने की कायBवाही कर सक ा है और उसक े बाद यह य करें क्रिक क्या परिरवाद अर्थीवा जारी प्रक्रि'या को खारिरज करना है अर्थीवा नहीं। मात्र थ्य यह है क्रिक उन्होंने पूवB में ारा 156 (3) क े ह जां; का आदेश क्रिदया र्थीा और ारा 173 क े ह एक आख्या प्राप्त की र्थीी, परिरवाद क े क ु ल क्रिवलोपन का प्रभाव नहीं होगा और इसलिलए मजिजSर्ट्रेर्ट को ारा 200, 203 और 204 क े ह कायBवाही से बाति नहीं क्रिकया जाएगा। इस प्रकार, कोई मजिजSर्ट्रेर्ट जो शिशकाय प्राप्त होने पर, ारा 156 (3) क े ह एक जां; का आदेश दे ा है और ारा 173 (1) क े ह एक पुलिलस Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds रिरपोर्टB प्राप्त कर ा है, उसक े बाद, ीन में से एक कर सक ा है: (1) वह क्रिनणBय ले सक ा है क्रिक आगे बढ़ने और कारBवाई छोhने क े लिलए कोई पयाBप्त आ ार नहीं है; (2) वह पुलिलस रिरपोर्टB और जारी प्रक्रि'या क े आ ार पर ारा 190 (1) (बी) क े ह अपरा का संज्ञान ले सक ा है; यह वह अपनी आख्या में पुलिलस द्वारा आए क्रिनष्कषB द्वारा क्रिकसी भी रह की बाध्य ा क्रिबना कर सक ा है; (3) वह मूल शिशकाय क े आ ार पर ारा 190 (1) (ए) क े ह अपरा का संज्ञान ले सक ा है और ारा 200 क े ह परिरवादी और उसक े गवाहों की शपर्थी पर छान-बीन करने क े लिलए प्रवृत्त हो सक ा है। यक्रिद वह ीसरे क्रिवकल्प को अपना ा है, ो वह ारा 202 क े ह जां; को ारण अर्थीवा क्रिनदyशिश कर सक ा है यक्रिद वह उति; समझ ा है। ए स्मिSमनपश्चा ् वह यर्थीास्मिSर्थीति क े अनुसार परिरवाद अर्थीवा जारी प्रक्रि'या को खारिरज कर सक ा है।" (प्रभाव वर्ति )

17. इस प्रकार, जब वह पुलिलस रिरपोर्टB में आए क्रिनष्कषš से असहम होकर संज्ञान क े माध्यम से कारBवाई करने क े लिलए आगे बढ़ ा है, ो वह पुलिलस रिरपोर्टB क े आ ार पर संज्ञान ले रहा होगा न क्रिक शिशकाय पर। और, इसलिलए, संक्रिह ा की ारा 200 क े ह वादी अर्थीवा उसक े सातिक्षयों की जां; करने का सवाल ही नहीं उठ ा। यह दृक्रिष्टकोण Sपष्ट ः प्रति पाक्रिद र्थीा।

18. महेश;ंद बनाम बी. जनादBन रेड्डी क े मामले में, अपीलार्थी3/वादी ने प्रति वादी द्वारा अपरा ों क े क ृ त्य का आरोप लगा े हुए रिरपोर्टB दजB कराई र्थीी। दोपरान्, जां; से असं ुष्ट होने क े कारण, उन्होंने मजिजSर्ट्रेर्ट क े न्यायालय में एक आपराति क शिशकाय दजB की। इसी बी;, जां; अति कारी ने एक अंति म रिरपोर्टB दायर की जिजसमें पाया गया क्रिक क्रिववाद दीवानी प्रकृ ति का र्थीा। अपीलार्थी3 ने क्रिवरो याति;का दायर की। अंति म रिरपोर्टB मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा Sवीकार कर लिलया गया। अपीलार्थी3 द्वारा दायर क्रिकया गया शिशकाय का मामला भी समाप्त कर क्रिदया गया र्थीा। यह क्रिनणाBयक हो गया। जैसा क्रिक संक्रिह ा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds की ारा 200 क े ह र्थीा, अपीलार्थी3 ने ीसरी शिशकाय दजB की। सम्मन जारी क्रिकए जाने पर, उच्च न्यायालय क े समक्ष सफल ापूवBक पूछ ाछ की गई। हम इस न्यायालय द्वारा लाभकारी रूप से क्रिनम्नलिललिख;;ाB को ध्यान कर सक े हैं। “12. इसमें कोई संदेह या क्रिववाद नहीं हो सक ा है क्रिक क े वल इसलिलए क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट ने एक अंति म रिरपोर्टB Sवीकार कर ली है, उसी क े द्वारा क्रिवरो /शिशकाय याति;का पर अपरा का संज्ञान लेने क े लिलए अपने राS े में खhा नहीं होगा; लेक्रिकन जिजस प्रश्न को उत्पन्न करने और उत्तर देने की आवश्यक ा है, वह यह होगा क्रिक उक्त शक्रिक्त का क्रिकस परिरस्मिSर्थीति में प्रयोग क्रिकया जा सक ा है। *** *** ***

16. मुन्नीलाल ठाक ु र [1985 Cri) LJ 437:1984 Pat LJR 774] मामले में पर्टना उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ इस प्रश्न से चिं; ाशील र्थीी क्रिक क्या पुलिलस द्वारा दायर अंति म रिरपोर्टB को Sवीकार करने क े पश्चा भी मजिजSर्ट्रेर्ट थ्य क े समान अर्थीवा सदृश आरोपों पर शिशकाय अर्थीवा क्रिवरो याति;का क े ऊपर अपरा का संज्ञान ले सक ा है; जिजसका उत्तर Sवीकारोक्रिक्त में क्रिदया गया र्थीा।

17. यहां क्रिव;ारार्थीB जो प्रश्न उत्पन्न हुआ है, वह न ो उसमें उत्पन्न हुआ और न ही प्र;ार क्रिकया गया र्थीा।

18. जयशंकर मुंड [1989 Cri) LJ 1578: (1989) 67 cut LT 426] मामले में उhीसा उच्च न्यायालय क े पास क्रिफर से यहां उठाए गए प्रश्न पर क्रिव;ार करने का कोई अवसर नहीं र्थीा। कोर्टB ने अव ारिर क्रिकया: (Cri) LJ pp. 1582-83, प्रS र

6) “यद्यक्रिप कोई क्रिवरो याति;का क्रिकसी शिशकाय की प्रक ृ ति में है ो वह स क B ा पुलिलस द्वारा पूवB से अव ारिर की गई अंति म रिरपोर्टB क े समापन की जां; क े संदभB में है और क्योंक्रिक सू;क क े संक्रिह ा की ारा 202 क े ह क्रिवति पूणB अशिभव;न पर छान-बीन नहीं की गई र्थीी, जिजससे अशिभयुक्त की वजह से कोई अवै ा अर्थीवा पक्षपा नहीं हुआ र्थीा। यक्रिद इस रह क े दृक्रिष्टकोण को Sवीकार क्रिकया गया है और ऐसा कोई कारण नहीं है क्रिक इस रह क े दृक्रिष्टकोण को Sवीकार नहीं क्रिकया जाना;ाक्रिहए, ो इस क्रिवशेष मामले में आवश्यक परिरणाम यह होगा क्रिक क्रिवरो याति;का जो याति;काक ाB द्वारा दायर शिशकाय याति;का की प्रक ृ ति की है क्रिनरं र ा और स क B ा पुलिलस द्वारा संSर्थीाक्रिप एवं जां; क्रिकए गए मामले क े संबं में होगी।” Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

19. Sर्थीाक्रिप क्रिवति क जिसद्धां ों को ध्यान में रख े हुए, हमारा म है क्रिक उच्च न्यायालय यह अव ारिर करने में सही नहीं र्थीा क्रिक दूसरी शिशकाय पूणB ः वर्जिज र्थीी। यह Sर्थीाक्रिप क्रिवति है क्रिक समान थ्यों पर दूसरी शिशकाय दजB करने में कोई वै ाक्रिनक रोक नहीं है। ऐसे मामले में जहां क्रिकसी पूवB शिशकाय को क्रिबना कोई कारण ब ाए खारिरज कर क्रिदया जा ा है, दंड प्रक्रि'या संक्रिह ा की ारा 204 क े ह मजिजSर्ट्रेर्ट क्रिकसी अपरा का संज्ञान ले सक ा है और कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार होने पर प्रक्रि'या जारी कर सक ा है। जैसा क्रिक प्रमार्थी नार्थी ालुकदार [एआईआर 1962 एससी 876: 1962 Supp (2) एससीआर 297: (1962) 1 क्रि' एलजे 770] में अव ारिर क्रिकया गया क्रिक परिरवादी क उसक े मामले क े पूणB क्रिव;ार करने पर क्रिपछले मामले में क्रिनणBय क्रिदए जाने क े बाद क्रिद्व ीय परिरवाद को खारिरज क्रिकया जा सक ा है। इसक े अलावा, समान थ्यों पर क्रिद्व ीय परिरवाद क े वल अपवाक्रिदक परिरस्मिSर्थीति यों में ही;लाई जा सक ी है, अर्थीाB ्, जहां क्रिपछले आदेश को अपूणB अशिभलेख पर हो अर्थीवा परिरवाद की प्रक ृ ति की गल फहमी पर हो अर्थीवा यह Sपष्ट ः क्रिववेकहीन, अन्यायपूणB हो अर्थीवा जहां नए थ्य हो सक े हों, युक्रिक्तयुक्त परिरश्रम क े सार्थी पारिर नहीं क्रिकया गया र्थीा, पूवB की कायBवाक्रिहयों में अशिभलेख पर लाया गया है, प्रS ु क्रिकया गया है। इसलिलए, इस मामले क े थ्यों और परिरस्मिSर्थीति यों में, मामले को क्रिवद्व मजिजSर्ट्रेर्ट क े पास वापस प्रेक्रिष क्रिकया जाना;ाक्रिहए ाक्रिक यह पाया जा सक े क्रिक कशिर्थी अपरा क े संज्ञान क े लिलए कोई मामला बनाया गया र्थीा अर्थीवा नहीं।”

19. गंगा र जनादBन म्हात्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य [(2004) 7 एससीसी 768] क े मामले में, इस न्यायालय ने दोहराया क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट अंति म रिरपोर्टB आने पर Sव ंत्र रूप से जां; से उभरने वाले थ्यों पर अपना क्रिव;ार लागू कर सक ा है और ारा 190 (1) (बी) क े ह संज्ञान ले सक ा है, और इस संबं में ारा 190 (1) (बी) क े ह संज्ञान लेने क े लिलए संक्रिह ा की ारा 200 और 202 क े ह प्रक्रि'या का पालन करने क े लिलए बाध्य नहीं है।हालांक्रिक, ऐसा करना मजिजSर्ट्रेर्ट क े ऊपर र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

20. प्रर्थीम सू;ना रिरपोर्टB दजB करने वाले सू;नादा ा द्वारा क्रिवरो याति;का दायर करने क े संबं में, इस न्यायालय द्वारा क्रिनम्नलिललिख;;ाB पर ध्यान देना आवश्यक है: “6. प्रर्थीम सू;ना रिरपोर्टB दजB करने वाले सू;नादा ा द्वारा क्रिवरो याति;का दायर करने क े लिलए संक्रिह ा में कोई प्राव ान नहीं है। लेक्रिकन यह अमल में रही है। क्रिवरो याति;का दायर करने से संबंति संक्रिह ा में एक प्राव ान की अनुपस्मिSर्थीति पर क्रिव;ार क्रिकया गया है। भगवं सिंसह बनाम कक्रिमश्नर आॅफ पुलिलस [(1985) 2 एससीसी 537: 1985 एससीसी (क्रि') 267: एआईआर 1985 एससी 1285] में इस न्यायालय ने सू;नादा ा को दी जा रही सू;ना की वांछनीय ा पर जोर क्रिदया जब ारा 173 (2) क े ह की गई रिरपोर्टB क्रिव;ारा ीन है। न्यायालय ने क्रिनम्नलिललिख अव ारिर क्रिकया जो इस प्रकार है: (एससीसी पी. 542, प्रS र 4) “इसलिलए, इसमें कोई संदेह नहीं है क्रिक, जब ारा 173 की उप- ारा (2) (i) ) क े ह क्रिकसी र्थीाने क े प्रभारी अति कारी द्वारा की गई रिरपोर्टB पर क्रिव;ार करने पर, मजिजSर्ट्रेर्ट अपरा और प्रक्रि'या जारी करने का संज्ञान लेने क े लिलए प्रवृत्त नहीं है, सू;नादा ा को सुनवाई का अवसर क्रिदया जाना;ाक्रिहए ाक्रिक वह अपरा और जारी प्रक्रि'या का संज्ञान लेने क े लिलए मजिजSर्ट्रेर्ट को सहम कराने क े लिलए अपने कš को प्रS ु कर सक े । दनुसार हम इस दृक्रिष्टकोण क े हैं क्रिक ऐसे मामले में जहां मजिजSर्ट्रेर्ट को ारा 173 की उप- ारा (2) (i) ) क े ह एक रिरपोर्टB अग्रेक्रिष की जा ी है, वह अपरा का संज्ञान नहीं लेने और कायBवाही को छोhने या यह क्रिव;ार करने क े लिलए क्रिक प्रर्थीम सू;ना रिरपोर्टB में वर्भिण क ु छ व्यक्रिक्तयों क कायBवाही क े लिलए कोई पयाBप्त आ ार नहीं है, मजिजSर्ट्रेर्ट को सू;नादा ा को नोक्रिर्टस देना;ाक्रिहए और रिरपोर्टB क े क्रिव;ार क े समय उसे सुनवाई का अवसर प्रदान करना;ाक्रिहए।“

9. जब पुलिलस द्वारा ारा 173 (2) (i) ) क े ह मजिजSर्ट्रेर्ट को प्रेक्रिष की गई एक आख्या उसक े समक्ष रखी जा ी है, ो कई स्मिSर्थीति यां उत्पन्न हो ी हैं। रिरपोर्टB यह क्रिनष्कषB क्रिनकाल सक ी है क्रिक कोई अपरा क्रिकसी व्यक्रिक्त क्रिवशेष अर्थीवा व्यक्रिक्तयों द्वारा कारिर क्रिकया गया प्र ी हो ा है और ऐसे मामले में, मजिजSर्ट्रेर्ट या ो (1) आख्या को Sवीकार कर सक ा है और अपरा और जारी करने की प्रक्रि'या का संज्ञान ले सक ा है, या (2) आख्या से असहम और कायBवाही को छोh सक े हैं, या (3) ारा 156 (3) क े ह अक्रिग्रम जां; का क्रिनदyश दे सक ा है और पुलिलस को अक्रिग्रम आख्या बनाने की आवश्यक ा हो सक ी है। दूसरी ओर पुलिलस क े अनुसार आख्या में कहा जा सक ा है क्रिक, कोई Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अपरा कारिर नहीं हुआ है। जब इस रह की आख्या मजिजSर्ट्रेर्ट क े समक्ष रखी जा ी है, ो उसक े पास ीन रीकों में से एक को अपनाने का क्रिवकल्प हो ा है जैसे क्रिक (1) वह आख्या को Sवीकार कर सक ा है और कायBवाही को छोh सक ा है; या (2) वह आख्या से असहम हो सक ा है और यह क्रिव;ार कर सक ा है क्रिक अक्रिग्रम कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार है, ो वह अपरा और प्रक्रि'या जारी करने का संज्ञान ले सक ा; या (3) वह पुलिलस द्वारा ारा 156 (3) क े ह अक्रिग्रम जां; करने का क्रिनदyश दे सक ा है। इसलिलए, स्मिSर्थीति अब ारा 173 (2) क े ह पुलिलस रिरपोर्टB प्राप्त होने पर अच्छी रह से य हो गई है क्रिक कोई मजिजSर्ट्रेर्ट संक्रिह ा की ारा 190 (1) (बी) क े ह अपरा का संज्ञान लेने का हकदार है, भले ही पुलिलस आख्या का प्रभाव हो क्रिक अशिभयुक्त क े क्रिवरूद्ध कोई मामला नहीं बन ा। मजिजSर्ट्रेर्ट जां; क े दौरान पुलिलस द्वारा जां; क्रिकए गए गवाहों क े बयानों को ध्यान में रख सक ा है और परिरवाद क्रिकए गए अपरा का संज्ञान ले सक ा है और अशिभयुक्त को प्रक्रि'या जारी करने का आदेश दे सक ा है। ारा 190 (1) (बी) यह प्रति पाक्रिद नहीं कर ी है क्रिक कोई मजिजSर्ट्रेर्ट क े वल अपरा का संज्ञान ले सक ा है यक्रिद जां; अति कारी एक म दे ा है क्रिक जां; ने अशिभयुक्त क े क्रिवरूद्ध मामला बनाया है। मजिजSर्ट्रेर्ट जां; अति कारी द्वारा प्राप्त क्रिनष्कषB की अनदेखी कर सक ा है और Sव ंत्र रूप से अपने क्रिदमाग को जां; से क्रिनकलने वाले थ्यों पर लागू कर सक ा है और मामले का संज्ञान ले सक ा है, यक्रिद वह उति; समझ ा है, ो ारा 190 (1) (बी) क े ह अपनी शक्रिक्तयों का प्रयोग करें और अशिभयुक्त को प्रक्रि'या जारी करने को क्रिनदyशिश करें। मजिजSर्ट्रेर्ट ारा 190 (1) (ए) क े ह क्रिकसी मामले का संज्ञान लेने क े लिलए संक्रिह ा की ारा 200 और 202 में प्रति पाक्रिद प्रक्रि'या का पालन करने क े लिलए ऐसी स्मिSर्थीति में बाध्य नहीं है, यद्यक्रिप अति क्रिनयम की ारा 200 अर्थीवा ारा 202 क े ह भी उसक े लिलए ही है। [देखें इंतिडया क ै रेर्ट (प्रा.) लिलक्रिमर्टेड बनाम कनाBर्टक राज्य [(1989) 2 एससीसी 132: 1989 एससीसी (क्रि') 306: एआईआर 1989 एससी 885]. ] जब मजिजSर्ट्रेर्ट मामले को आगे बढ़ाने और संज्ञान लेने का फ ै सला कर ा है, ो सू;नादा ा पूवाBग्रह से प्रभाक्रिव नहीं हो ा है। लेक्रिकन जहां मजिजSर्ट्रेर्ट यह य कर ा है क्रिक पयाBप्त आ ार आगे की कायBवाही क े लिलए क्रिनवाBह नहीं कर ी है और कायBवाही को छोh दे ी है अर्थीवा यह क्रिव;ार कर ी है क्रिक क्रिकसी क े क्रिवरूद्ध कायBवाही क े लिलए सामग्री है और अन्य क े संबं में अपयाBप्त आ ार हैं, सू;नादा ा पूणB ः अर्थीवा आंशिशक अप्रभावी दजB की गई प्रर्थीम सू;ना रिरपोर्टB क्रिनतिश्च रूप से पूवाBग्रक्रिह होगा। इसलिलए, इस न्यायालय ने भगवं सिंसह [(1985) 2 एससीसी 537: 1985 एससीसी (क्रि') 267: एआईआर 1985 एससी 1285] मामले में क्रिनर्षिदष्ट क्रिकया क्रिक जहां मजिजSर्ट्रेर्ट ने संज्ञान नहीं लेने और कायBवाही को छोhने या क्रिव;ार करने का फ ै सला क्रिकया है क्रिक प्रर्थीम सू;ना रिरपोर्टB में उजि•लिख कु छ व्यक्रिक्तयों क े क्रिवरूद्ध कायBवाही क े लिलए पयाBप्त आ ार नहीं है, सू;नादा ा को नोक्रिर्टस और मामले में सुनवाई का अवसर प्रदान करना अक्रिनवायB हो जा ा है। जैसा क्रिक ऊपर Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds क्रिनर्षिदष्ट है, इस संबं में नोक्रिर्टस जारी करने क े लिलए संक्रिह ा में कोई प्राव ान नहीं है।”

21. गंगा र जनादBन म्हात्रे (उपरोक्त) में इस न्यायालय ने क्रिनम्नलिललिख;;ाB में सू;नादा ा को नोक्रिर्टस जारी करने की आवश्यक ा पर भी जोर क्रिदया: “12. इसलिलए, रिरपोर्टB क े समय मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा नोक्रिर्टस जारी करने पर नाव है। यक्रिद सू;नादा ा को इस बा की जानकारी नहीं है क्रिक मामले पर क्रिव;ार कब क्रिकया जाना है, ो जाक्रिहर है, उससे गल ी नहीं हो सक ी है, भले ही देर से ही सही पुलिलस द्वारा जारी नोक्रिर्टस क े प्रत्युत्तर में क्रिवरो याति;का दायर की गई हो। क्रिकन् ु जैसा क्रिक भगवं सिंसह [(1985) 2 एससीसी 537: 1985 एससीसी (क्रि') 267: एआईआर 1985 एससी 1285] क े मामले में क्रिनर्षिदष्ट क्रिकया गया है यह अति कार मुखक्रिबर को प्रदत्त है और क्रिकसी को नहीं।"

22. क्रिकशोर क ु मार ज्ञान;ंदानी बनाम जी.डी. मेहरोत्रा [(2011) 15 एससीसी 513] मामले में क्रिनतिश्च अपरा ों क े संबं में एक प्रर्थीम सू;ना रिरपोर्टB दजB की गई र्थीी। पुलिलस ने एक अंति म रिरपोर्टB दायर की जिजसे Sवीकार कर लिलया गया। लगभग ीन महीने बाद, एक क्रिवरो याति;का दायर की गई र्थीी। मजिजSर्ट्रेर्ट ने उसी को परिरवाद क े रूप में माने जाने को क्रिनदyशिश क्रिकया। उन्होंने संक्रिह ा की ारा 202 क े ह जां; और संज्ञान लेने क े लिलए आगे बढ़ने को अव ारिर क्रिकया। प्रS र 4 प्रासंक्रिगक है और यह इस प्रकार है: “4. पक्षकारों क े बी; क ु छ क्रिववाद है क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा 27-1-1996 को अंति म रूप Sवीकार करने से पूवB परिरवादी को नोक्रिर्टस क्रिदया गया र्थीा और परिरवादी ने आपलित्तयां दायर नहीं की र्थीीं, जबक्रिक परिरवादी का मामला यह है क्रिक उसे न्यायालय से कोई नोक्रिर्टस प्राप्त नहीं हुआ र्थीा। जैसा क्रिक हो सक ा है, हम व Bमान मामले को य करने क े लिलए उस क्रिववाद में नहीं पh रहे हैं क्योंक्रिक हमारे दृक्रिष्टकोण में यह क्रिकसी भी रह से भौति क नहीं है और न ही यह Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अशिभयुक्त द्वारा कारिर क्रिकए गये कशिर्थी अपरा का संज्ञान लेने क े परिरवाद क े आ ार पर मजिजSर्ट्रेर्ट क े अति कार-क्षेत्र से बाहर है, भले ही वह पहले ही अंति म रूप Sवीकार कर;ुका हो, वही पुलिलस द्वारा दायर क्रिकया गया हो।"

23. वाS व में, इस मामले को न्यायालय में म क े क्रिव;लन क े मद्देनजर इस े ीन क्रिवद्व न्याया ीशों की खंडपीठ ने ही य क्रिकया र्थीा। न्यायालय ने क्रिनम्नलिललिख रूप से अव ारिर क्रिकया: “6. यह बहु अच्छी रह से य है क्रिक जब पुलिलस जां; क े बाद संक्रिह ा की ारा 173 क े ह अंति म रूप दायर कर ी है, ो मजिजSर्ट्रेर्ट पुलिलस द्वारा क्रिदए गए क्रिनष्कषB से असहम हो सक ा है और संक्रिह ा की ारा 190 क े ह शक्रिक्त क े प्रयोग में संज्ञान ले सक ा है। मजिजSर्ट्रेर्ट संक्रिह ा की ारा 156 क े ह मामले में अक्रिग्रम जां; का क्रिनदyश और संज्ञान नहीं ले सक ा है। जहां मजिजSर्ट्रेर्ट पुलिलस द्वारा प्रS ु अंति म रूप को Sवीकार कर ा है, सामान्य परिरवाद दायर करने क े लिलए परिरवादी क े अति कार को नहीं छीना जा सक ा और वाS व में ऐसा परिरवाद दायर होने पर मजिजSर्ट्रेर्ट संक्रिह ा की ारा 201 क े ह प्रक्रि'या का पालन कर ा है और संज्ञान ले ा है, यक्रिद परिरवादी द्वारा प्रS ु सामग्री अपरा कारिर कर ी है। गोपाल क्रिवजय वमाB बनाम भुनेश्वर प्रसाद जिसन्हा [(1982) 3 एससीसी 510:1983 एससीसी (क्रि') 110] मामले में इस प्रश्न को इस न्यायालय द्वारा उठाया और उत्तर क्रिदया गया है, जिजसक े अ ीन पर्टना उच्च न्यायालय क े असंग दृक्रिष्टकोण को उलर्ट क्रिदया गया है। न्यायालय ने पूव क्त मामले में कोई अक्रिनतिश्च श š क े क्रिबना यह दर्भिश क्रिकया है क्रिक अंति म रूप की Sवीक ृ ति मजिजSर्ट्रेर्ट को परिरवाद की कायBवाही में प्रS ु सामग्री क े आ ार पर संज्ञान लेने से क्रिनषे नहीं कर ी है। इस न्यायालय ने पाया क्रिक उच्च न्यायालय का मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा लिलए गए संज्ञान क े सार्थी हS क्षेप करने में त्रुक्रिर्ट र्थीी।

24. राक े श क ु मार एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य [(2014) (13) एससीसी 133] क े मामले में, पुलिलस द्वारा दायर की गई प्रर्थीम सू;ना आख्या क े आ ार पर जां; क े बाद एक अंति म आख्या दायर की गई। मजिजSर्ट्रेर्ट ने Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अंति म आख्या को Sवीकार कर लिलया। उन्होंने मामले को एक सार्थी परिरवाद मामले की रह आगे बढ़ाने का क्रिनदyश क्रिदया। संक्रिह ा की ारा 200 और 202 क े ह बयान दजB क्रिकए गए र्थीे। उच्च न्यायालय ने अशिभयुक्त की दलील को ठुकरा क्रिदया, जिजन्हें सम्मन जारी क्रिकया गया र्थीा। अशिभयुक्त का यह क B र्थीा क्रिक एक नकारात्मक अंति म आख्या Sवीकार करने पर, न्यायालय परिरवादी द्वारा दायर क्रिवरो याति;का क े आ ार पर कारBवाई नहीं कर सक ी र्थीी। यह न्यायालय ए;.एस. बैन्स (उपरोक्त) में क्रिनणBय को संदर्भिभ कर ा है। महेश;ंद (उपरोक्त) मामले क े प्रS र 12 में प्रति पाक्रिद क्रिवति क े जिसद्धां, जिजन्हें हमने पूवB में भी संदर्भिभ क्रिकया है, को Sवीक ृ ति दी गई। उच्च न्यायालय क े आदेश को Sवीक ृ ति दी गई र्थीी।

25. यह एक ऐसा मामला है जहां प्रर्थीम सू;ना आख्या का अनुसरण कर े हुए जां; अति कारी ने जां; सं;ालिल की। परिरवादी, उसकी पत्नी और उसक े पुत्र से बयान लिलए गए। यह उन बयानों से शिभन्न है जो डॉक्र्टरों से लिलए गए र्थीे जिजन्होंने दूसरे प्रत्यर्थी3/परिरवादी की पुत्री का इलाज क्रिकया र्थीा। जां; अति कारी ने क्रिनष्कषB क्रिनकाला क्रिक ऐसा कोई थ्य नहीं है जो अशिभयुक्त को क्रिव;ारण हे ु भेजे जाने का अति पत्र दे। जब इस रह की आख्या न्यायालय क े समक्ष दायर की जा ी है, ो यह संदेह की छाया से परे है क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट अभी भी अंति म आख्या को अSवीकार करने और अपरा ों का संज्ञान लेने क े लिलए अग्रसर हो सक ा है, जो उसक े दृक्रिष्टकोण में प्रति बद्ध है। दूसरी ओर, वह सामग्री जिजस पर क्रिव;ार करने क े बाद, जिजसमें जां; अति कारी द्वारा एकत्र क्रिकए गए गवाहों क े बयान शाक्रिमल होंगे, अंति म आख्या को Sवीकार करने का क्रिनणBय लें। वह इस दृष्टकोण पर क्रिव;ार कर सक ा है क्रिक यह एक ऐसा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds मामला है जहां अति कारी द्वारा आगे की जां; को क्रिनणBय लेने से पहले वारंर्ट क्रिकया जा ा है क्रिक क्या संज्ञान लिलया जाना है अर्थीवा नहीं।

26. क्रिनSसंदेह यह स; है क्रिक इससे पहले क्रिक कोई मजिजSर्ट्रेर्ट ारा 173 क े ह अंति म आख्या को Sवीकार करने क े लिलए आगे बढ़ ा है और अशिभयुक्त को दोषमुक्त कर ा है ो यह मजिजSर्ट्रेर्ट पर क्रिनभBर है क्रिक वह अपना लक्ष्य क्रिवरो याति;का की क्रिवषयवS ु पर लागू करे और उसक े पश्चा क्रिनष्कषB पर पहुं;े। जबक्रिक जां; अति कारी अंति म आख्या की उत्पलित्त कर े हुए क्रिवषयवS ु को Sर्थीाक्रिप कर सक ा है, उसक े अनुसार जो उसक े प्रयासों का परमोत्कषB है, मजिजSर्ट्रेर्ट का क Bव्य अंति म आख्या को सहज ही Sवीकार करने क सीक्रिम नहीं है। यह थ्यों को परखने क े लिलए उस पर अवलंक्रिब है, और परिरवादी को सुनने और क्रिवरो याति;का की क्रिवषयवS ु पर क्रिव;ार करने क े पश्चा, अं ोगत्वा भक्रिवष्य की कारBवाई क े दौरान यह य करना है क्रिक बा;ाहे जारी रखने की हो अर्थीवा इससे पदाB क्रिगराने की।

27. इस मामले में, जैसा क्रिक हमने ध्यान क्रिदया है क्रिक उच्च न्यायालय ने इस आ ार पर कायBवाही की, क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट ने क्रिवरो याति;का पर क्रिव;ार नहीं क्रिकया है और याति;का में उजि•लिख थ्यों पर क्रिव;ार करना उनका परम् क Bव्य र्थीा। हमने मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा पारिर आदेश की जां; की है। वह क्रिवरो याति;का का उ•ेख कर ा है। इसमें दी गई क्रिवषयवS ु क्रिनःसंदेह ध्यान दी गई है। मजिजSर्ट्रेर्ट का कहना है क्रिक उसने प्रर्थीम सू;ना आख्या क े माध्यम से जाँ; की है। वह पा ा है क्रिक परिरवादी अपनी पुत्री की मृत्यु क े संबं में;श्मदीद गवाह नहीं है। उन्होंने यह अशिभलिललिख क्रिकया क्रिक ारा 161 क े ह क्रिदए गए सातिक्षयों क े बयान लिलए। हम यह ध्यान दे सक े हैं क्रिक परिरवादी की पुत्री Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds क े क्रिवरूद्ध कारिर क्रिकए गए या ना क े मामले क े संबं में क्रिनम्नलिललिख क्रिनष्कषB दजB क्रिकए गए र्थीे: “.... सवBप्रर्थीम मैं इस मामले क े परिरवादी शिशव शंकर ओझा क े बयान क े माध्यम से गुजरे हैं। यद्यक्रिप इस गवाह ने आंशिशक रूप से इस घर्टना का पक्ष लिलया है, परन् ु यहां यह उ•ेख करना समी;ीन है क्रिक मृ क जया की मृत्यु क े समय, यह गवाह मौजूद नहीं र्थीा। जब इस गवाह से पूछा गया क्रिक क्या जब आपको आपकी पुत्री पर की पई या ना की सू;ना क्रिमलने क े बाद आपने कहीं पर कोई प्रार्थीBना पत्र क्रिदया या क्रिकसी रिरश् ेदार को क्रिकसी माध्यम से सू;ना दी इत्याक्रिद। इस प्रश्न क े उत्तर में, उन्होंने कहा है क्रिक 'नहीं'। मैं भी मृ क की मा ा श्रीम ी शक ुं ला देवी क े बयान से क्रिवति व गुजरा हूं। मृ क की मा ा ने जां; अति कारी को बयान क्रिदया है क्रिक मेरा दामाद हरिरयाणा में क्रिनजी नौकरी कर रहा है। ”

28. ए स्मिSमनपश्चा, उन्होंने मृ क की मा ा और भाई क े बयान का उ•ेख क्रिकया। वह ति;क्रिकत्सकों क े बयानों का उ•ेख कर ा है। ति;क्रिकत्सकों ने क्रिनष्कषB क्रिनकाला क्रिक मृ क की मृत्यु उसकी बीमारी की वजह से हुई। ति;क्रिकत्सकों में से एक ने कहा है क्रिक मरीज की मा ा श्रीम ी शकुं ला ने प्रवेश प्रपत्र पर हS ाक्षर क्रिकए र्थीे। मरीज की जां; की गई। मरीज ने दो माग पूवB सीजेरिरयन ऑपरेशन क े द्वारा एक बच्चे को जन्म क्रिदया र्थीा। वह बुखार से ग्रS र्थीी। वह ेजी से सांस ले रही र्थीी। उसका शरीर पीलिलया से ग्रS र्थीा। उसे श्वसन सहायक मशीन की आवश्यक ा र्थीी। मरीज की बीमारी रूति र क्रिवन आघा और कई अंग की क्रिवफल ा र्थीी। क्रिदनांक 08.10.2017 को उसकी मृत्यु हो गई। मौ उसकी बीमारी की वजह से पाई गई।

29. वाS व में, मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट इसक े दृक्रिष्टग प्रवृत्त हुए क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट को जां; अति कारी और एकत्र क्रिकये गए थ्यों द्वारा अशिभलिललिख क्रिकये गए गवाहों क े बयानों क े आ ार पर संज्ञान लेना होगा। वह आगे पा े हैं Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds क्रिक यक्रिद क्रिवरो याति;का और दS ावेजों क े आ ार पर संज्ञान लिलया जा ा है, ो यह अवै है। इसक े बाद यह पाया गया क्रिक मृ क की मृत्यु उसकी बीमारी की वजह से हुई और अशिभयुक्तों क े क्रिवरूद्ध कोई प्रर्थीम दृष्टया मामला नहीं बनाया गया।

30. हम यह ध्यान दे सक े हैं क्रिक मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट और अपर सत्र न्याया ीश क े आदेश क े क्रिवरुद्ध दूसरे प्रत्यर्थी3 ने भार क े अनुच्छेद 226 क े ह अति कारिर ा का अवलंब लिलया है. रिरर्ट याति;का में मांगी गई राह आदेशों को रद्द करने क े लिलए उत्प्रेषण-लेख में से एक है। हम संक े दे सक े हैं क्रिक रा ेश्याम एवं अन्य बनाम छबी नार्थी एवं अन्य [(2015) 5 एससीसी 423] में, इस संबं में यह न्यायालय सूयB देव राय बनाम राम;ंदर राय एवं अन्य [(2003) 6 एससीसी 675] मामले में इस न्यायालय क े फ ै सले को अति प्रभावी करने क े बाद, यह प्रति पाक्रिद क्रिकया गया क्रिक उत्प्रेषण-लेख का रिरर्ट दीवानी न्यायालय क े आदेश को रद्द करने क े लिलए झूठ नहीं होगा। उच्च न्यायालय को क्रिकसी भी मूल्य पर भार क े अनुच्छेद 226 क े ह शक्रिक्तयों का प्रयोग कर े हुए, अ ीनSर्थी न्यायालयों क े आदेशों क े व्यवहार क े सार्थी अपनी अति कार-क्षेत्र की सीक्रिम प्रक ृ ति को ध्यान में रखना;ाक्रिहए।

31. इस मामले क े थ्यों में, उच्च न्यायालय द्वारा क्रिनष्कषB क्रिनकाला गया क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट ने दूसरे प्रत्यर्थी3/परिरवादी द्वारा क्रिवरो याति;का पर क्रिव;ार नहीं क्रिकया है। ऐसे मामले में जहां क्रिवरो याति;का पर क्रिव;ार नहीं क्रिकया गया र्थीा, ो यह न्यायालय क े लिलए मुक्त हो सक ा है क्रिक वह इस क्रिनष्कषB पर पहुं;े क्रिक अंति म आख्या क े सार्थी व्यवहार ः अपने अति कार-क्षेत्र क े प्रयोग में Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अवै ा कारिर की गई र्थीी। परन् ु यह एक अन्य मामला है जब मजिजSर्ट्रेर्ट ने क्रिनःसंदेह क्रिवरो याति;का पर क्रिव;ार करने क े लिलए न्यायालय को क्रिनदyश क्रिदया क्रिक कायBवाही को अपाS करने क े उद्देश्य क े लिलए वह इस मामले पर क्रिफर से क्रिव;ार करे।

32. हमें लग ा है क्रिक, जैसा क्रिक हमारे द्वारा ध्यान क्रिदया गया है, उच्च न्यायालय को यह क्रिनष्कषB क्रिनकालने में Sपष्ट ः त्रुक्रिर्ट र्थीी क्रिक क्रिवरो याति;का पर क्रिव;ार नहीं क्रिकया गया र्थीा। यह क्रिक उच्च न्यायालय मामले क े दो दृक्रिष्टकोणों में से एक को ले सक ा है, अति रिरक्त सत्र न्याया ीश द्वारा पुक्रिष्ट क े रूप में मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा पारिर आदेशों क े सार्थी अपने हS क्षेप क े लिलए एक असुरतिक्ष आ ार हो सक ा है।

33. थ्यों क े आ ार पर जिजसमें ति;क्रिकत्सकों क े बयान शाक्रिमल हैं और क्रिवरो याति;का क े कš पर ध्यान आकर्षिष करने क े पश्चा, मजिजSर्ट्रेर्ट इस क्रिनष्कषB पर पहुं;े हैं क्रिक यह मामला जारी रखने क े लिलए उपयुक्त नहीं है और यह दूसरे प्रत्यर्थी3/परिरवादी की पुत्री का बीमारी की वजह से मृत्यु क े रूप में समाप्त होना;ाक्रिहए। यह छान -बीन जो न्यायालय द्वारा ति;क्रिकत्सकों क े बयानों क े संदभB क े सार्थी पहुं;ी है। समान रूप से, जिजन परिरस्मिSर्थीति यों में दूसरे प्रत्यर्थी3/परिरवादी की पुत्री की दुभाBग्यपूणB मृत्यु प्रति पाक्रिद क्रिकया गया है, यह पाया गया क्रिक भा.द.सं. की ारा 201 क े ह कोई मामला नहीं बनाया गया र्थीा। ऐसा प्र ी हो ा है क्रिक सत्र न्याया ीश क े समक्ष, ारा 498 ए से संबंति पहलू अर्थीवा वाS व में दहेज क्रिनषे अति क्रिनयम, 1961 की ारा 3 और 4 से संबंति प्राव ानों को दूसरे प्रत्यर्थी3 द्वारा जोर नहीं क्रिदया गया र्थीा। इसक े अति रिरक्त, हमे यह भी ध्यान क्रिदया क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट ने Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds परिरवादी क े बयान का उ•ेख क्रिकया है क्रिक कशिर्थी रूप से दहेज की मांग क े आ ार पर Sपष्ट या या ना क े संबं में कोई परिरवाद दायर नहीं की गई र्थीी।

34. हम प्रति -शपर्थीपत्र क े सार्थी क्रिवरो याति;का से भी गुजरे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है क्रिक प्रS र 2 में मृ क और मृ क क े क्रिप ा से संपलित्त की मांग और या ना का सामान्य संदभB है। ए स्मिSमनपश्चा प्रS र 3 से 15 में दूसरे प्रत्यर्थी3 की पुत्री क े परिरस्मिSर्थीति जन्य मृत्यु से से संबंति है। उक्त प्रS रों में, इस मामले को बाहर क्रिकये जाने की मांग की गई क्रिक जां; अति कारी क े समक्ष जाली दS ावेजों को प्रS ु क्रिकया गया र्थीा। अन्य बा ों क े सार्थी, मृ क की मा ा और भाई क े शपर्थी पत्रों को भी जालसाजी क े मामले को परिरयोजिज करने क े लिलए दायर क्रिकए गए र्थीे। उदाहरण ः, मृ क की मा ा क े शपर्थीपत्र में, वह दावा कर ी है क्रिक वह 9 और 10 अक्र्टूबर, 2007 को अSप ाल नहीं गई है, जबक्रिक, बयान क े अनुसार संक्रिह ा की ारा 161 क े ह, उसने कशिर्थी ौर पर कहा है क्रिक क्रिदनांक 09.10.2007 को, मृ क को उनक े द्वारा प्रीति अSप ाल में भ 3 कराया गया र्थीा, जिजसमें Sपष्ट रूप से उसकी मा ा शाक्रिमल है। इस संबं में हमारे द्वारा ध्यान क्रिदया गया है क्रिक इसमें कोई संदेह नहीं है क्रिक मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट ने मोहम्मद यूसुफ एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य [2008 Cri) LJ 493] मामले क े फ ै सले पर भरोसा क्रिकया है और यह क्रिव;ार क्रिकया है क्रिक यक्रिद क्रिवरो याति;का और संलग्न दS ावेजों क े आ ार पर संज्ञान लिलया जा ा है, ो यह अवै है। उन्होंने यह भी क्रिव;ार क्रिकया क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट को क े स डायरी और जां; क े दौरान एकत्र क्रिकए गए थ्यों में जां; अति कारी द्वारा अशिभलिललिख क्रिकये गए गवाहों क े बयानों क े आ ार पर संज्ञान लेना है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

35. उपरोक्त क्रिनणBय में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े क्रिवद्व एकल न्याया ीश का प्रS र 11 में यह कहना र्थीा: "11 जहां मजिजSर्ट्रेर्ट जां; अति कारी द्वारा क्रिनष्कषš पर पहुँ;ने की की अनदेखी कर े हुए ारा 190 (1) (बी) क े ह संज्ञान लेने का फ ै सला कर ा है और अपने क्रिदमाग को Sव ंत्र रूप से लागू कर ा है, वह क े वल क े स-डायरी और जां; क े दौरान एकक्रित्र क्रिकये गए थ्यों में पुलिलस द्वारा दजB क्रिकए गए गवाहों क े बयानों पर कारBवाई कर सक ा है। जां; अति कारी द्वारा एकक्रित्र क्रिकये गए थ्यों क े अति रिरक्त क्रिकसी भी थ्य पर क्रिव;ार करना उस S र पर SवीकायB नहीं है। त्काल मामले में क्रिवरो याति;का और संग शपर्थी-पत्रों क े आ ार पर संज्ञान लिलया गया र्थीा। मजिजSर्ट्रेर्ट को दं.प्र.सं. क े अध्याय XV क े ह परिरवाद मामले की प्रक्रि'या को अपनाना;ाक्रिहए और परिरवादी क े बयानों को अशिभलिललिख करना;ाक्रिहए एवं वे गवाह जिजन्होंने दं.प्र.सं. की ारा 200 और 202 क े ह हलफनामा दायर क्रिकया र्थीा। मजिजSर्ट्रेर्ट क्रिवरो याति;का और उसक े समर्थीBन में दायर शपर्थी-पत्रों क े आ ार पर दं.प्र.सं. की ारा 190 (1) (बी) क े ह संज्ञान नहीं ले सक ा। मजिजSर्ट्रेर्ट ने दं.प्र.सं. की ारा 190 (1) (बी) क े ह संज्ञान ले े हुए बाह्य थ्यों अर्थीाB ् क्रिवरो याति;का और शपर्थीपत्र को ध्यान में रखा है, आक्षेक्रिप आदेश दूक्रिष क्रिकया गया है।"

36. मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट ने क्रिवद्व एकल न्याया ीश द्वारा क्रिन ाBरिर क्रिवति का पालन क्रिकया है। वाS व में, हम इस पहलू क े संबं में यह ध्यान दे सक े हैं क्रिक यक्रिद क्रिवद्व एकल न्याया ीश, जिजसने इस मामले में आक्षेक्रिप आदेश का प्रति पादन क्रिकया है, एक अलग दृक्रिष्टकोण र्थीा ो उन्हें इस मामले को एक वृहद पीठ को क्रिनर्षिदष्ट करना;ाक्रिहए।

37. ए;.एस. बैन्स (उपरोक्त) में, संक्रिह ा की ारा 190 (1) (ए) क े अर्थीB क े भी र क्रिनजी परिरवाद र्थीा। मामला ारा 156 (3) क े ह पुलिलस को प्रेक्रिष क्रिकया गया र्थीा। जां; अति कारी ने अंति म आख्या दायर की। उसमें, न्यायालय ने यह दृक्रिष्टग क्रिकया क्रिक ारा 190 (1) (बी) क े ह अंति म Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds आख्या क े बावजूद संज्ञान लेने क े लिलए मजिजSर्ट्रेर्ट की शक्रिक्त क े अति रिरक्त, वह क्रिनजी परिरवाद पर भी वापस आ सक ा है जो प्रारम्भ में दायर की गई र्थीी परन् ु जां; क े पश्चा परिरवादी एवं उसक े गवाहों, जैसा क्रिक संक्रिह ा की ारा े ह परिरकस्मिल्प क्रिकया गया र्थीा। क्रिनःसंदेह, संक्रिह ा की ारा 190 (1) (बी) क े ह अंति म आख्या को संज्ञान लेने क े संबं में, परिरवादी अर्थीवा उसक े गवाहों की जां; करना आवश्यक नहीं है, यद्यक्रिप वह ऐसा कर सक ा है।

38. महेश;ंद (उपरोक्त) में, इसमें कोई संदेह नहीं है क्रिक मामला प्रर्थीम सू;ना आख्या द्वारा प्रारम्भ क्रिकया गया र्थीा और संक्रिह ा की ारा 190 (1) (ए) क े ह न्यायालय में परिरवादी द्वारा आगे की कारBवाई की गई र्थीी। प्रर्थीम सू;ना आख्या पर, जां; क े पश्चा, अंति म आख्या दायर की गई र्थीी। अंति म आख्या Sवीकार की गई और इसे बंद कर क्रिदया गया। यह इस वाS क्रिवक ा क े बावजूद है क्रिक क्रिवरो याति;का र्थीी। जैसा क्रिक ीसरा परिरवाद परिरवादी द्वारा दायर की गई र्थीी। यह न्यायालय अव ारिर कर ा है क्रिक अंति म आख्या की Sवीक ृ ति क्रिवरो /परिरवाद याति;का पर संज्ञान लेने क े रीक े में नहीं होगी।

39. क्रिकशोर क ु मार ज्ञान;ंदानी (उपरोक्त) मामले में, अंति म आख्या को क्रिवरो याति;का पर Sवीकार करने क े बाद जिजसे परिरवाद क े रूप में माना गया र्थीा, संक्रिह ा की ारा 200 क े अशिभप्राय क े अन् गB साक्ष्य लिलया गया र्थीा।

40. राक े श क ु मार (उपरोक्त) में, अंति म आख्या दायर की गई र्थीी जिजसे मजिजSर्ट्रेर्ट ने Sवीकार कर लिलया र्थीा, लेक्रिकन उन्होंने एक सार्थी मामले को परिरवाद मामले क े रूप में आगे बढ़ाने का क्रिनदyश क्रिदया और संक्रिह ा की ारा े ह बयान दजB क्रिकए गए। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

41. इस मामले क े थ्यों में, क्रिवरो याति;का में क्रिनक्रिह आरोपों की प्रक ृ ति और उन अनुलग्नकों क े संबं में जो अक्रिनवायB रूप से शपर्थीपत्रों में शाक्रिमल र्थीे, यक्रिद मजिजSर्ट्रेर्ट अंति म आख्या क े आ ार पर आश्वS र्थीा ो संक्रिह ा की ारा 161 क े ह बयान का कोई भी प्रर्थीम दृष्टया मामला नहीं बन ा है, क्रिनतिश्च रूप से मजिजSर्ट्रेर्ट को परिरवाद क े रूप में क्रिवरो याति;का का व्यवहार करने क े द्वारा संज्ञान लेने क े लिलए मजबूर नहीं क्रिकया जा सक ा है। थ्य यह है क्रिक उसक े पास क्रिकसी मामले में परिरवाद क े रूप में क्रिवरो याति;का का व्यवहार क े लिलए अति कार-क्षेत्र हो सक ा है, यह एक अलग मामला है। क्रिनःसंदेह, यक्रिद वह क्रिवरो याति;का को एक परिरवाद क े रूप में व्यवहार कर ा है ो उसे संक्रिह ा की ारा 200 और 202 क े ह क्रिन ाBरिर प्रक्रि'या का पालन करना होगा यक्रिद परव 3 अनुभाग भी मजिजSर्ट्रेर्ट को Sवयं सौंप ा है। दूसरे शब्दों में, आवश्यक रूप से परिरवादी एवं उसक े गवाहों की जां; करनी होगी। इसमें कोई संदेह नहीं है क्रिक क्रिवरो याति;का में परिरवादी द्वारा क्रिकसी मजिजSर्ट्रेर्ट को उपलब् कराए गए थ्यों क े ऊपर क्रिनभBर कर ा है, यह क्रिकसी क्रिवशेष मामले में अपनी अं र्षिनक्रिह प्रकृ ति और अंति म आख्या में क्रिनष्कषB पर प्रभाव क े संबं में अवलस्मिम्ब होने में सक्षम हो सक ा है। अर्थीाB, यक्रिद सामग्री ऐसी है क्रिक यह न्यायालय को जां; अति कारी द्वारा क्रिदए गए क्रिनष्कषš से असहम होने क े लिलए राजी कर ा है ो संक्रिह ा की ारा 190 (1) (बी) क े ह संज्ञान लिलया जा सक ा है जिजसक े लिलए संक्रिह ा की ारा 200 क े ह गवाहों की जां; करने की कोई आवश्यक ा नहीं है। परन् ु जैसा क्रिक मजिजSर्ट्रेर्ट को परिरवाद क े रूप में क्रिवरो याति;का का व्यवहार करने क े लिलए मजबूर नहीं क्रिकया जा सक ा है, परिरवादी को इसक े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds उपाय क े ह नया परिरवाद दायर करना होगा और मजिजSर्ट्रेर्ट को संक्रिह ा की ारा 200 क े ह प्रक्रि'या का पालन करने क े लिलए आमंक्रित्र करना होगा अर्थीवा संक्रिह ा की ारा 200 क े सार्थी ारा 202 पढ़ा जाए। इसलिलए, हमारे दृक्रिष्टकोण में इस मामले क े थ्यों में हम उच्च न्यायालय क े फ ै सले का समर्थीBन नहीं कर सक े।

42. यह सत्य है क्रिक क्रिवति शासनादेश सू;नादा ा/परिरवादी को सू;ना दे ा है जहां मजिजSर्ट्रेर्ट अंति म आख्या को Sवीकार करने पर चिं; न कर ा है। सू;ना प्राप्त होने पर सू;नादा ा अंति म आख्या पर अपनी आपलित्तयों को प्रकाश में ला े हुए न्यायालय को संबोति कर सक ा है। यह वह आम ौर पर क्रिवरो याति;का क े रूप में कर ा है। महाबीर प्रसाद अग्रवाल बनाम राज्य [AIR 1958 Ori). 11] मामले में उच्च न्यायालय उhीसा क े क्रिवद्व न्याया ीश ने माना क्रिक एक क्रिवरो याति;का परिरवाद की प्रक ृ ति में है और द.प्र.सं. क े अध्याय XVI क े प्राव ानों क े अनुसार जाँ; की जानी;ाक्रिहए। हालाँक्रिक, हमने यह भी ध्यान क्रिदया क्रिक काजिसम एवं अन्य बनाम राज्य एवं अन्य [1984 Cri) LJ 1677] मामले में अन्य बा ों क े सार्थी, इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े न्यायाति करण क े क्रिवद्व एकल न्याया ीश द्वारा क्रिनम्नलिललिख अव ारिर क्रिकया गया: “4.... अशिभनंदन झा MANU/SC/0054/1967 (उपरोक्त) क े मामले में भी जो अवलोकन क्रिकया गया र्थीा वह 'यह बहु Sपष्ट नहीं है क्रिक क्या मजिजSर्ट्रेर्ट ने क्रिवरो याति;का को परिरवाद क े रूप में;ुना है।' इस अवलोकन का म लब यह नहीं होगा क्रिक प्रत्येक क्रिवरो याति;का को आवश्यक रूप से और शिशकाय क े रूप में माना जाना;ाक्रिहए क्रिक क्या यह शिशकाय की श š को सं ुष्ट कर ा है अर्थीवा नहीं। एक क्रिनजी परिरवाद में जाँ; क्रिकये जाने क े लिलए गवाहों की पूरी सू;ी होनी;ाक्रिहए। परिरवादी की आगे की जाँ; दं.प्र.सं. की ारा 200 क े ह की जा ी है। यक्रिद मजिजSर्ट्रेर्ट ने क्रिवरो याति;का को एक परिरवाद क े रूप में न माना हो ो क्रिवरो याति;का उनक े मन से परिरवाद की सभी श š को सं ुष्ट नहीं कर ी, इसका म लब यह नहीं होगा क्रिक मामला एक परिरवाद का मामला बन गया है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds वाS व में, अति कांश मामलों में जब अंति म आख्या प्रS ु की जा ी है, ो मजिजSर्ट्रेर्ट को क े वल इस बा पर क्रिव;ार करना हो ा है क्रिक क्या क े स डायरी में थ्यों पर अंति म आख्या को Sवीकार करने क े लिलए कोई मामला नहीं बन ा अर्थीवा क्या क े स डायरी एक प्रर्थीम दृष्टया मामले क े संज्ञान लेने क े रूप में खुलासा कर ी है। ऐसी स्मिSर्थीति में क्रिवरो याति;का क े वल क े स डायरी में थ्यों पर मजिजSर्ट्रेर्ट का ध्यान खीं;ने और मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा से साव ानीपूवBक जां; और मन क े प्रयोग को आमंक्रित्र करने क े उद्देश्य से कायB कर ी है, इसलिलए क े वल यह अव ारिर नहीं क्रिकया जा सक ा क्रिक एक क्रिवरो याति;का मामले का एक परिरवाद मामला बन जाना।"

43. हम यह भी ध्यान दे सक े हैं क्रिक वीरप्पा और अन्य बनाम भीमारेडप्पा [2002 Cri) LJ 2150 (Karnataka)] में, कनाBर्टक उच्च न्यायालय ने अवलोक्रिक क्रिकया जो इस प्रकार है: “9. उपरोक्त से, जो स्मिSर्थीति उभर ी है वह यह है: जहां प्रारम्भ में परिरवादी ने दं.प्र.सं. की ारा 200 क े ह मजिजSर्ट्रेर्ट क े समक्ष कोई परिरवाद दायर नहीं की है, लेक्रिकन क े वल पुलिलस से संपक B क्रिकया है और जहां जां; क े बाद पुलिलस ने 'बी' रिरपोर्टB दजB की है, यक्रिद परिरवादी क्रिवरो करना;ाह ा है ो एक परिरवाद पर वह दं.प्र.सं. की ारा 190 (1) (ए) क े ह संज्ञान लेने क े लिलए मजिजSर्ट्रेर्ट को आमंक्रित्र कर रहा है। यक्रिद ऐसा होना र्थीा ो क्रिवरो याति;का जो उसने दायर की है, को उसे दं.प्र.सं. की ारा 2 (डी) में परिरभाक्रिष परिरवाद की आवश्यक ाओं को पूरा करना होगा, और इसमें ऐसे थ्य शाक्रिमल होने;ाक्रिहए जो अपरा का गठन कर े हैं, जिजसक े लिलए, क्रिवद्व मजिजSर्ट्रेर्ट दं.प्र.सं. की ारा 190 (1) (ए) क े ह संज्ञान ले रहे हैं। इसक े बजाय, यक्रिद यह क े वल उन सभी आवश्यक क्रिववरणों को शाक्रिमल क्रिकए क्रिबना क्रिवरो याति;का क े रूप में क्रिनर्षिम क्रिकया जाना है जिजसमें एक सामान्य परिरवाद को शाक्रिमल करना है, ो इसे दं.प्र.सं. की ारा 200 क े ह कायBवाही क े उद्देश्य क े लिलए परिरवाद क े रूप में अर्थीB नहीं लगाया जा सक ा।"

44. परिरवाद को संक्रिह ा की ारा 2 (डी) में इस प्रकार परिरभाक्रिष क्रिकया गया है: “(घ) "परिरवाद" का ात्पयB कोई आरोप जो मौलिखक या लिललिख रूप में मजिजSर्ट्रेर्ट को क्रिदया गया हो, इस संक्रिह ा क े ह कारBवाई करने की दृक्रिष्टकोण में Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds क्रिकसी व्यक्रिक्त द्वारा,;ाहे वह ज्ञा हो अर्थीवा अज्ञा, कोई अपरा कारिर क्रिकया गया हो, परन् ु पुलिलस आख्या में शाक्रिमल नहीं है। Sपष्टीकरण-क्रिकसी मामले में एक पुलिलस अति कारी द्वारा की गई एक रिरपोर्टB जां; क े बाद जो खुलासा कर ी है क्रिक एक गैर-संज्ञेय अपरा क े आयोग को परिरवाद समझा जाएगा; और पुलिलस अति कारी जिजसक े द्वारा ऐसी आख्या ैयार की जा ी है, उसे परिरवादी समझा जाएगा;”

45. यक्रिद कोई क्रिवरो याति;का क्रिकसी परिरवाद की आवश्यक ाओं को पूरा कर ी है ो मजिजSर्ट्रेर्ट क्रिवरो याति;का को परिरवाद क े रूप में मान सक ा है और जैसा आवश्यक हो संक्रिह ा की ारा 202 क े सार्थी पक्रिठ ारा 200 क े ह व्यवहार कर सक ा है। वाS व में इस मामले में, क्रिवरो याति;का में ऐसे गवाहों की कोई सू;ी नहीं है। क्रिवरो याति;का में प्रार्थीBना अंति म आख्या को अपाS और अंति म आख्या क्रिवरूद्ध आवेदन को अनुमति देना है। हालांक्रिक हम यह सुझाव नहीं दे रहे हैं क्रिक यह Sवरूप पूणB ः इस प्रश्न का क्रिनणाBयक होना;ाक्रिहए क्रिक क्या यह एक परिरवाद क े रूप में अर्थीवा एक परिरवाद क े रूप में व्यवहार क्रिकये जाने की उत्तरदायी हो, हम अक्रिनवायB रूप से सो;ेंगे क्रिक इस मामले में क्रिवरो याति;का अंति म आख्या क े क्रिवरूद्ध दूसरे प्रत्यर्थी3 की आपलित्तयों का उपसंहार है ।

46. यह हमें मामले क े एक पहलू पर ला ा है जो वाS व में बार में क B नहीं क्रिदया गया र्थीा। क्रिवशेष अनुमति और आज्ञा से मृ क क े पति द्वारा अपील दायर की गई है। प्रर्थीम सू;ना आख्या में आरोपों को अपीलार्भिर्थीयों क े अन्य रिरश् ेदारों जैसे क्रिक, उनक े मा ा-क्रिप ा और ससुराल वालों और उनक े भाई- बहनों क े क्रिवरूद्ध भी उठाया गया है। उन्होंने उच्च न्यायालय क े आदेश को;ुनौ ी नहीं दी है। उनक े द्वारा क्रिकए गए अपरा ों क े संबं में भी आरोप लगाए गए हैं। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds

47. इस संबं में हम एक पहलू पर ध्यान दे सक े हैं। मुख्य न्यातियक मजिजSर्ट्रेर्ट द्वारा अंति म आख्या को Sवीकार कर लिलया गया और अपीलार्थी3 सक्रिह क्रिकसी भी अशिभयुक्त क े क्रिवरूद्ध कारBवाई नहीं करने का फ ै सला क्रिकया। इस कदम की अति रिरक्त सत्र न्याया ीश द्वारा पुक्रिष्ट की गई। उच्च न्यायालय क े समक्ष, न ो अपीलार्थी3 और न ही उसक े क्रिकसी रिरश् ेदार को पक्षकार बनाया गया र्थीा। जब उच्च न्यायालय द्वारा आख्या को Sवीकार करने और पुनर्षिव;ार का क्रिनदyश देने का आदेश पारिर क्रिकया गया र्थीा ो क्या अपीलार्थी3 और अन्य रिरश् ेदारों को अशिभयोजिज करने क े लिलए दूसरे प्रत्यर्थी3/प्रति वादी क े लिलए यह आवश्यक र्थीा? क्या हम उच्च न्यायालय क े क्रिनणBय को क े वल अपीलार्थी3 की हैजिसय से अपाS कर सक े हैं अर्थीवा क्या हम इस मामले क े थ्यों में भी सभी अशिभयुक्त क े क्रिवरुद्ध उच्च न्यायालय क े आदेश में हS क्षेप कर सक े हैं?

48. यह स; हो सक ा है क्रिक जब क प्रक्रि'या जारी नहीं की जा ी है ब क अशिभयुक्त को सुनवाई का अति कार नहीं हो सक ा है (देखें आइरिरस क ं प्यूर्टर लिलक्रिमर्टेड बनाम असकरी इंफोर्टेक प्राइवेर्ट लिलक्रिमर्टेड एवं अन्य [(2015) 14 एससीसी 399] मामले में इस न्यायालय का क्रिनणBय)।

49. वाS व में, उच्च न्यायालय ने आक्षेक्रिप आदेश क े प्रS र 11 में, जिजसे हमने अपने फ ै सले क े प्रS र 6 में क्रिनकाला है, क्रिवरो याति;का पर क्रिव;ार क्रिकया ाक्रिक संक्रिह ा की ारा 190 (1) (बी) क े ह संज्ञान लिलया जा सक े । यह आ ारिरका जहाँ क क्रिबना क्रिकसी आ ार क े मयाBदानुसार बना ा है वह अन्य अशिभयुक्त जो अपीलार्थी3 क े सम्बन् ी हैं, हमें लग ा है क्रिक आक्षेक्रिप आदेश को अपाS होना;ाक्रिहए। आरोपों की प्रक ृ ति और भार क े संक्रिव ान Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds क े अनुच्छेद 142 क े ह भी हमारी शक्रिक्तयों क े प्रयोग क े संबं में हमें उच्च े आदेश को अपाS रखना;ाक्रिहए।

50. हमें लग ा है क्रिक इस मामले क े थ्यों में, उच्च न्यायालय ने हS क्षेप क्रिकया और आदेशों को अपाS करने में उच्च न्यायालय क े थ्यों का कोई औति;त्य नहीं र्थीा।

51. परिरणामSवरूप, अपील की अनुमति दी जाएगी, उच्च न्यायालय का आक्षेक्रिप आदेश अपाS रखा जाएगा। हालांक्रिक, हम यह Sपष्ट कर े हैं क्रिक यह अति रिरक्त सत्र न्याया ीश क े आदेश में पहले से ही देखा गया परिरवाद दायर करने क े लिलए दूसरे प्रत्यर्थी3 क े अति कारों क े पक्षपा क े क्रिबना होगा। (न्यायमूर्ति, संजय क्रिकशन कौल)........................................... (न्यायमूर्ति, क े. एम. जोसेफ)............................................ नई क्रिद•ी, 09 जुलाई, 2019 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds