Full Text
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प्रतिवेद्य
भारिीय सवोच्च न्यायालय
दीवानी अपीलीय अधिकाररिा
सिविल अपील िं. 2896/2009
राजाराम ………….अपीलार्थी(गण)
बनाम
जयप्रकाश ससिंह एविं अन्य …………..प्रत्यार्थी(गण)
निर्णय
न्यायमूनतण, ििीि सिन्हा
1- अपीलार्थी प्रतिवादी द्वारा वािंतिि द्वविीय अपील क
े अनुज्ञाि आदेश से
व्यधर्थि है। उच्च न्यायालय ने अपील न्यायालय क
े आदेश, जजसमें उन्होंने
अपीलार्थी क
े अपील को अनुज्ञाि ककया र्था, को अपास्ि कर ददया एविं
सार्थ ही सार्थ अपीलार्थीगण क
े वाद को भी अपास्ि कर ददया।
2- वादी एविं प्रतिवादी सिं. 2 भाई है। प्रतिवादी सिं. 1 प्रतिवादी सिं. 2 की
पत्नी र्थी। प्रत्यर्थी सिं. 1 से 3 िक मृिक प्रतिवादी सिं.1 क
े पुत्र है। मूल वादी
सिं. 2 एविं अन्य भाई अपील न करने का चयन ककये हैं। वादी गण ने आरोप
लगाया कक मूल प्रतिवादी ने ददनािंक 02.03.1970 को उनक
े वपिा वैजई, जो
कक मृिक है, जो बचाव पक्ष क
े सार्थ रहिे र्थे, वृद्िावस्र्था एविं कमजोरी क
े
कारण कपटपूववक िोखा देकर एविं अनुधचि प्रभाव डालकर बचाव सिं. 1 क
े
पक्ष में ववक्रय ववलेख को प्राप्ि कर सलया और वाद को खाररज कर ददया
गया र्था। अपील न्यायालय ने यह िाररि करिे हुए कक प्रतिवादीगण अनुधचि
प्रभाव डालकर मृिक की इच्िा को अधिशाससि करने की जस्र्थति में होने क
े
अपने भार को तनववहन करने में असफल र्थे, अपील को मिंजूरी दे दी। उच्च
न्यायालय ने प्रर्थम अपील न्यायालय क
े अपील को सुरक्षक्षि कर सलया एविं
वाद क
े तनरस्िीकरण को बहाल कर ददया।
3- अपीलार्थी क
े ववद्वान अधिवक्िा का कर्थन है कक मृिक वपिले लगभग 8
से 10 साल िक वृद्ि, दुबवल, शय्याग्रस्ि और बीमार र्था। उसकी मानससक
जस्र्थति भी क्षीण र्थी अि: वह पूणव रूप से मूलप्रतिवाददयों पर तनभवर र्था जो
कक इसीसलए उसपर असम्यक् असर का प्रयोग करने की जस्र्थति में र्थे। मृिक
का ववक्रय ववलेख क
े तनष्पादन क
े 10 महीने क
े भीिर 21.04.1971 को
तनिन हो गया। ववक्रय ववलेख क
े साक्षी प्रतिवादी सिं. 2 से सम्बिंधिि र्थे।
यह स्र्थावपि नहीिं ककया गया कक पूरा प्रतिफल चुका ददया गया र्था। प्रतिवादी
सिं. 1 क
े पास क्रय मूल्य चुकाने का कोई स्रोि नहीिं र्था। मृिक की पत्नी का
साक्षी क
े रूप में परीक्षण नहीिं कराया गया है। प्रतिवादी ने उप पिंजीयक क
े
साक्ष्य को प्रस्िुि नहीिं ककया जजसने ववक्रय ववलेख को पिंजीकृ ि ककया र्था।
मृिक ने वर्व 1968 में ककसी भी व्यजक्ि को भूसम की बबक्री नहीिं की र्थी
जैसा की प्रतिवादीगण द्वारा िक
व ददया गया।
4- प्रत्यार्थी/प्रतिवादी क
े ववद्वान अधिवक्िा द्वारा कहा गया है कक साक्ष्य
अधितनयम 1872 की िारा 101 क
े अन्िगवि प्रर्थम दृष्टया असम्यक् असर
साबबि करने का प्रारजम्भक भार वादी पर होिा है। और उसक
े बाद ही यह
भार उन पर स्र्थानान्िररि होिा है। इस सिंबि में आवश्यक असभवचन
पूणविया नामौजूद र्थी। प्रर्थम अपीलीय न्यायालय ने त्रुदट पूववक यह भार
प्रत्यार्थी गण पर स्र्थानान्िररि कर ददया। मृिक वृद्ि एविं बीमार रहा होगा
ककन्िु मानससक क्षमिा इिनी क्षीण नहीिं र्थी कक वह स्वयिं द्वारा तनष्पाददि
प्रलेखों की प्रकृ ति को न जान सक
े । वह ववलेख क
े तनष्पादन क
े लगभग
10 महीने क
े बाद िक जीववि रहा लेककन इसे कभी भी प्रश्नगि नहीिं
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd
ककया। मृिक ने 2 वर्व पहले 1968 में प्रदशव सिं.10 क
े रूप में अन्य लोगों
क
े पक्ष में एक दूसरा ववक्रय ववलेख तनष्पाददि ककया र्था। जजसे प्रत्यार्थी
द्वारा प्रश्नगि नहीिं ककया गया। इससे यह साबबि होिा है कक मृिक ऐसी
जस्र्थति में नहीिं र्था कक उसक
े ऊपर असम्यक् असर डाला जा सक
े । अि:
क
े वल उसकी वयोवृद्ि उम्र क
े आिार पर उपिारणा नहीिं की जा सकिी।
प्रतिवादी साक्षी सिं.1 ववक्रय ववलेख का साक्षी र्था और वह पिंजीकरण क
े
समय उपजस्र्थि र्था। मृिक ने उप पिंजीयक क
े समक्ष 2000 रू. पहले प्राप्ि
होना स्वीकार ककया है और 4000 रू. पिंजीकरण क
े समय ददया गया र्था।
5- वाद में उपरोक्ि कर्थन का समर्थवन Anil Rishi vs. Gurbaksh Singh, (2006)
JUDGMENT
11. वह हमें असम्यक प्रभाव क े प्रश्न की ओर ले जािा है। वाद क े असभवचन में मूल प्रतिवादी द्वारा मृिक पर डाले गये असम्यक असर की प्रकृ ति, िरीक े या प्रकार क े सम्बिंि में ककसी वववरण या पररजस्र्थतियों का अभाव है। मृिक की अक्षमिा क े हवाले एक सरल कर्थन ककया गया है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd हमने पहले ही यह माना है कक मृिक शारीररक और मानससक रूप से पूणविः अक्षम नहीिं र्था। इसमें कोई सिंदेह नहीिं कक मूल प्रतिवादीगण मृिक से ववश्वासाधिि रूप से सिंबिंधिि र्थे। वृद्िावस्र्था में मृिक एविं उसकी पत्नी की देखभाल करने क े उनक े आचरण ने मृिक की सोच प्रभाववि ककया होगा। लेककन इसक े अनुरूप एकमात्र बेलाग तनष्कर्व नहीिं तनकलिा कक मूल प्रतिवादीगण मृिक की इच्िा अधिशाससि करने की जस्र्थति में र्थे या तनष्पाददि ववक्रय ववलेख अवववेकपूणव र्था। अतनल ससिंह बनाम गुरुबक्श ससिंह (उपयुवक्ि) क े मामले में यर्था अविाररि सिंववदा अधितनयम की िारा-16 सपदिि साक्ष्य अधितनयम की िारा 111 क े अनुसार वादी क े प्रर्थम दृष्टया वाद स्र्थावपि करने क े बाद ही भार मूल प्रतिवादीगण पर स्र्थानान्िररि होगा। मृिक की पत्नी उसक े सार्थ रह रही र्थी और उप-पिंजीयक क े कायावलय िक उसक े सार्थ गयी र्थी। वादी ने ऐसा कोई असभवचन या साक्ष्य प्रस्िुि नही ककया है कक मृिक की पत्नी भी मूल प्रतिवाददयों द्वारा पूणवि: अधिशाससि र्थी। प्रत्येक जाति िमव, सम्प्रदाय एविं सभ्य समाज में बडों की देखभाल करना एक पववत्र कायव माना जािा है। लेककन आज यह गिंभीर धचिंिा का ववर्य बन गया है। इसे ध्यान में रखकर सिंसद ने मािा-वपिा और वररष्ि नागररकों का भरण पोर्ण िर्था कल्याण अधितनयम, 2007’ अधितनयसमि ककया है। बदलिे समय एविं सामाजजक नैतिकिा क े दौर में हमारा सुधचजन्िि ववचार है कक क े वल इस आिार पर असम्यक् असर का सीिा तनष्कर्व तनकालना कक कोई भाई-बहन पररवार क े बडे-बुजुगव की देखभाल कर रहा र्था, एक अतिवादी उपिारणा है जो पयावप्ि साक्ष्य क े अभाव में दटक नहीिं सकिी। जो बडों की देखभाल कर रहे र्थे उनक े द्वारा असम्यक् असर डाला जाना मानकर ववपरीि साक्ष्य का भार देकर ककया गया तनववचन बहुि अवािंतिि पररणाम दे सकिा है। इससे आवश्यक रूप से अनदेखी ही नहीिं होगी, वरन् सन्देह और सिंशय का वािावरण बनेगा जजसमें असम्यक् प्रभाव डालने क े आरोप क े भय से पूरी व सही देखभाल भी नहीिं हो पाएगी। ववधि और जीवन सार्थ-सार्थ चलिे हैं। यदद पररवार क े क ु ि Þ{ks=h; 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15. कृ ष्णा मोहन (उपयुवक्ि) का मामला अपने िर्थय क े आिार पर अलग है। तनष्पादक तनववववाद रूप से 100 वर्व से ऊपर की आयु का र्था। साक्ष्य से यह ससद्ि हुआ कक वह पैराससदटक और लगभग शय्याग्रस्ि र्था। कोई भी साक्षी यह ससद्ि नहीिं कर सका कक तनष्पादक ने अपना अगूिंिा लगाया र्था।
16. मामले में िर्थय एविं पररजस्र्थतियों को समझने में प्रर्थम अपीलीय न्यायालय ने पूणविः भूल की। ककसी मामले में िर्थय रदहि ववधि का कोई आवेदन नहीिं हो सकिा। ककसी ववधि का प्रार्थसमक अवयव प्रासिंधगक िर्थयों से समधर्थवि सम्यक अधिवचन द्वारा स्र्थावपि होना चादहए। मामलों का असभतनिावरण िारणाओिं या उपिारणाओिं क े आिार पर नहीिं हो सकिा। हमें नहीिं लगिा कक विवमान मामला सिंवविान क े अनुच्िेद 136 क े अन्िगवि चिुर्थव अपील न्यायालय क े रुप में वववेकीय क्षेत्राधिकार की प्रयोग की आवश्यकिा है। प्रीिम ससिंह (उपयुवक्ि) क े मामले में यह पाया गया: “9. …सामान्यिया यह न्यायालय ववशेर् अनुमति नहीिं देगी जब िक कक यह दसशवि न ककया जाय कक ववशेर् एविं अपवादस्वरूप पररजस्र्थतियािं ववद्यमान हैं, कक भारी अन्याय हुआ है और प्रश्नगि मामले में ववरुद्ि अपील ककये गये तनणवय की समीक्षा को आवश्यक बनाने वाले पयावप्ि गुरुिा वाले लक्षण मौजूद हैं। चूिंकक यह मामला हमारे मि से ऐसी कोई भी शिव पूरी नहीिं करिा, हम उच्च न्यायालय क े तनणवय में हस्िक्षेप नहीिं कर सकिे और यह अपील खाररज की जानी चादहए।” 17- मामले पर पूरी िरह ववचार करने क े पश्चाि् हमें दो न्यायालयों द्वारा पहुिंचे समवेि तनष्कर्ों में हस्िक्षेप करने का कोई कारण नहीिं ददखाई देिा। अपील तनरस्ि की जािी है। व्यय का कोई आदेश नहीिं होगा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ………………………………………………. न्यायमूतिव, िी नवीन ससन्हा