Full Text
समक्ष भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपीलीय न्यायक्षेत्र
सिसविवल अपील संख्याएँ 5740-5741/2015
वित्रजुगी नारायन (मृ )
विवति,क प्रति विनति,यों एवं अन्य द्वारा .......अपीलार्थी2(गण)
बनाम
संक
ू (मृ )
विवति,क प्रति विनति,यों एवं अन्य .........प्रत्यर्थी2(गण)
विनण7य
न्यायमूर्ति , संजीव खन्ना, विद्व ीय अपील सं. 1930/1983 {चंद्र नार्थी काला (डी) विवति,क
प्रति विनति,यों द्वारा बनाम वित्रजुगी नारायण (डी) विवति,क प्रति विनति,यों द्वारा एवं
अन्य} और विद्व ीय अपील सं. 2017/1983 {संक
ू एवं अन्य बनाम वित्रजुगी
नारायण (डी) विवति,क प्रति विनति,यों द्वारा एवं अन्य} क
े वाद में मा. उच्च
न्यायालय क
े न्यायक्षेत्र इलाहाबाद द्वारा विदनांविक 12 सिस ंबर 2008 को
पारिर ये सिसविवल अपील सामान्य विनण7य और तिडक्री से उत्पन्न हैं।
JUDGMENT
2. व 7मान अपीलों में उठाया गया मुद्दा संपत्तिR क े प्रक ृ ति से संबंति, है, अर्थीा7 ्, क्या प्लॉट सं. 16 (पुराना प्लॉट सं. 9), चौखंडी कीडगंज, इलाहाबाद - नज़ूल प्लॉट (संक्षेप में 'संपत्तिR') में सव7कात्तिलक पट्टे पर अति,कार सहदातियकी संयुक्त हिंहदू परिरवार की संपत्तिR र्थीी अर्थीवा मैहर राज्य की जागीर का एक विहस्सा होने क े चल े, स्व-अर्जिज और अलग संपत्तिR क े अन् ग[7] र्थीा।
3. विववाद को यर्थीाक्रम विवविनतिd करने में, हम थ्यों को संक्षेप में अभिभत्तिलत्तिख करेंगे। क. विदनांक 12 सिस ंबर 1873 को बच्चू लोविनया ने सरकार द्वारा विनष्पाविद सव7कात्तिलक पट्टे क े विवलेख क े माध्यम से संपत्तिR का अति,ग्रहण विकया र्थीा। बच्चू लोविनया की मृत्यु क े पdा, विदनांक 12 अगस् 1896 को उनक े पुत्र रामभरोसे ने एक पंजीक ृ विबक्री विवलेख क े माध्यम से मैहर राज्य क े त्कालीन महाराजा रघुबीर सिंसह को सव7कात्तिलक पट्टे क े अति,कार हस् ां रिर कर विदए र्थीे। ख. त्पdा, बृज नार्थी सिंसह मैहर राज्य क े सिंसहासन/गद्दी पर आसीन हुए। बृज नार्थी सिंसह ने विदनांविक 11 फरवरी, 1966 को अभिभत्तिलत्तिख वसीय क े माध्यम से अपनी पहली पत्नी सुरेंद्र कु मारी क े बड़े बेटे गोहिंवद सिंसह और उनकी दूसरी पत्नी रानी ेज क ु मारी क े पुत्र क े त्तिलए उनक े जीवनकाल क े दौरान उसक े रखरखाव क े त्तिलए प्राव,ान करने क े बाद संपत्तिR सविह बाकी संपत्तिRयों को मैहर क े महल और राज्य भRे (विप्रवी पस[7]) को वसीय में रखा र्थीा। विदनांक 13 अक्टूबर 1968 को बृज नार्थी सिंसह की मृत्यु हो गई र्थीी। ग. इस वसीय क े बावजूद, बृज नार्थी सिंसह की पहली पत्नी क े बड़े बेटे गोहिंवद सिंसह, संयुक्त हिंहदू परिरवार क े पेशवा और क ा7 क े रूप में, पंजीक ृ विबक्री विवलेख क े माध्यम से विदनांविक 18 नवंबर 1968 को वित्रजुगी नारायण दुबे और सुरेंद्र नार्थी प्रयागवाल को संपत्तिR बेच दी र्थीी। घ. विदनांक 20 नवंबर 1968 को, चंद्र नार्थी काला और संक ू ने विपछले ीस सालों से संपत्तिR पर अति,कार का दावा कर े हुए वित्रजुगी नारायण और सुरेंद्र नार्थी क े विवरूद्ध स्र्थीायी विनषे,ाज्ञा क े त्तिलए मूल वाद सं. 194/1968 की संस्थिस्र्थी विकया र्थीा। उसक े पdा, उन्होंने वादपत्र क े संशो,न क े त्तिलए एक अज[2] दायर की र्थीी क्योंविक रानी ेज क ु मारी क े पावर आॅफ अटॉन[2],ारक विवमल कु मार सिंसह ने चंद्र नार्थी काला क े पक्ष में विदनांक 6 जून 1969 को संपत्तिR का विबक्री विवलेख विनष्पाविद विकया र्थीा, परीक्षण विबक्री विवलेख क े आ,ार पर दावा करने वाले संशो,न क े शीष7क क े त्तिलए सत्र न्यायालय द्वारा आवेदन की अनुमति दी गई र्थीी। हालांविक, संशो,नों को मंजूरी देने वाला यह आदेश मा. उच्च न्यायालय द्वारा विदनांविक 10 विदसंबर 1971 को अपास् कर विदया गया। ङ. ब विदनांक 7 माच[7] 1972 को चंद्र नार्थी काला ने वित्रजुगी नारायण और सुरेंद्र नार्थी क े त्तिखलाफ घोषणा और विनषे,ाज्ञा क े त्तिलए मूल वाद सं. 64/1972 संस्थिस्र्थी विकया र्थीा, सिजसमें संक ू को ीसरे प्रति वादी क े रूप जोड़ े हुए विवक्रय विवलेख पर उसक े अति,कार का प्रति पादन विदनांविक 6 जून 1969 को रानी ेज क ु मारी द्वारा उसक े पक्ष में विनष्पाविद विकया गया र्थीा। संक ू ने चंद्र नार्थी काला क े दावे को स्वीकार विकया, जबविक वित्रजुगी नारायण और सुरेंद्र नार्थी ने परस्पर त्तिलत्तिख बयान दायर विकया र्थीा, सिजसमें कहा गया र्थीा विक बृज नार्थी सिंसह को रानी ेज क ु मारी क े नाम पर वसीय को विनष्पाविद करने का कोई अति,कार नहीं र्थीा यद्यविप यह संयुक्त हिंहदू परिरवार की सहदातियकी संपत्तिR र्थीी। आगे, गोहिंवद सिंसह परिरवार क े क ा7 र्थीे, सिजन्होंने वै, रूप से वित्रजुगी नारायण और सुरेंद्र नार्थी क े पक्ष विदनांविक 18 नवंबर 1968 को विबक्री विवलेख में विनष्पाविद विकया र्थीा।
4. सत्र न्यायालय ने दोनों वादों को अलग -अलग विनण7य द्वारा खारिरज कर विदया, दोनों ने विदनांविक 25 माच[7] 1983 को कई मुद्दों का संदभ[7] विदया सिजसमें अपीलक ा7ओं द्वारा उठाए गए सीविम चुनौ ी क े दृवि|ग आवश्यक नहीं है, यद्यविप यह माना गया र्थीा विक बृज नार्थी सिंसह का वसीय क े द्वारा संयुक्त विहन्दू परिरवार से सम्बस्थिन्, सम्पत्तिR का उRरदायन नहीं हो सक ा और इसत्तिलए, रानी ेज क ु मारी द्वारा विनष्पाविद विबक्री विवलेख विदनांविक 6 जून 1969 को शून्य हो गया क्योंविक उनक े पास कोई हक नहीं र्थीा। आगे, गोहिंवद सिंसह संयुक्त हिंहदू परिरवार क े क ा7 क े रूप में वित्रजुगी नारायण और सुरेंद्र नार्थी क े पक्ष में स्र्थीानां रण द्वारा संपत्तिR का लाभ और पूण[7] या विवति,क र्थीा। वाद सं. 194/1968 को इस आ,ार पर खारिरज कर विदया गया र्थीा विक चंद्र नार्थी काला और संक ू प्रति क ू ल कब्जे द्वारा विकसी भी अति,कार क े अति,ग्रहण को साविब करने में विवफल रहे र्थीे।
5. विनण7य और तिडक्री क े विवरूद्ध दायर की गई सिसविवल अपील सं. 476/1983 क े वाद सं. 194/1968 में अपर सिजला न्याया,ीश, इलाहाबाद क े विनण7य द्वारा विदनांविक 25 अगस् 1983 को खारिरज कर विदया गया र्थीा। उसी ारीख क े एक पृर्थीक विनण7य क े द्वारा, सिसविवल अपील सं. 517/1983 को वाद सं. 64/1972 में विनण7य और तिडक्री क े विवरूद्ध दी गयी वरीय ा को खारिरज विकया गया र्थीा, अन्य बा ों क े सार्थी, यह अभिभत्तिलत्तिख कर े हुए विक मैहर राज्य का 1948 में अस्थिस् त्व का स्र्थीगन हो गया र्थीा, और इसत्तिलए अति,विनण[2] को विनयंवित्र करने वाले ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) लागू होना बंद हो गया र्थीा। फलस्वरूप, गोहिंवद सिंसह को अपने विप ा से विवरास में विमली संपत्तिR का विवति,क अति,कार बृज नार्थी सिंसह द्वारा वसीय का विनष्पादन करने में नहीं त्तिलया जा सक ा र्थीा, गोहिंवद सिंसह को क े वल महल और राज्य भRे (विप्रवी पस[7]) और रानी ेज क ु मारी को बाकी संपत्तिRयां दे दी गई र्थीीं।
6. मा. उच्च न्यायालय ने विदनांविक 12 सिस ंबर 2008 को विदए गए सामान्य आक्षेविप विनण7य से, दो जुड़ी हुई अपीलों में, सत्र न्यायालय और अपीलीय न्यायालय क े विनष्कष• को उलट विदया, अन्य बा ों क े सार्थी, यह मान े हुए विक संपत्तिR ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) क े द्वारा शासिस अचल संपत्तिR का एक विहस्सा र्थीी। दनुसार, गोहिंवद सिंसह सविह संयुक्त हिंहदू परिरवार क े विकसी भी सदस्य का जन्म से संपत्तिR में कोई अति,कार नहीं र्थीा। बृज नार्थी सिंसह संपत्तिR का वसीय करनेे क े त्तिलए पूण[7] ः हकदार र्थीे, जो उन्होंने विदनांक 11 फरवरी 1966 को रानी ेज क ु मारी क े पक्ष में विकया।
7. हम उठाए गए प्रश्न को परस्पर दो भागों में विवभासिज कर े हैं। सबसे प्रर्थीम, हमारे द्वारा ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) क े अन् ग[7] विकसी संपत्तिR की उRराति,कार और उRराति,कार से संबंति, प्रर्थीाग विवति, की जाँच विकया जाना अपेतिक्ष है, और क्या यह संपत्तिR पर लागू र्थीा। दूसरा पहलू भार क े स्व ंत्र उपविनवेश और हिंहदू उRराति,कार अति,विनयम, 1956 (संतिक्षप्त ः 'उRराति,कार अति,विनयम') का अति,विनयमन क े सार्थी बृज नार्थी सिंसह द्वारा प्रसंविवदा और विवलय समझौ े पर इंविग करने क े सार्थी संप्रभु सव7श्रेष्ठ ा की त्रुविट क े विवति,क प्रभाव से संबंति, है। दूसरे शब्दों में, क्या पूव[7] शासक क े अविवभाज्य सम्पत्तिR क े विवलय समझौ े या उRराति,कार अति,विनयम क े अति,विनयमन होने पर, अविवभाज्य संपत्तिR क े रूप में जारी रहना बंद हो गए र्थीे और संयुक्त हिंहदू परिरवार की सहदातियकी संपत्तिR में परिरवर्ति हो गए र्थीे। प्रश्न का फ ै सला कर े हुए, हम अपीलार्थी2गणों क े इस क 7 की भी जांच करेंगे विक नज़ूल भूविम पर होने वाले सव7कात्तिलक पट्टे क े अति,कार को शासक की विनजी संपत्तिR क े रूप में रखा गया र्थीा और वह रघुबीर सिंसह और बृज नार्थी सिंसह की संप्रभु या राज्य संपत्तिRयों का विहस्सा नहीं र्थीे।
8. इस बा को य करने क े त्तिलए, हमें प्रर्थीम ः संयुक्त हिंहदू परिरवार और सहदातियकी क े बीच भिभन्न ा पर ध्यान देना चाविहए। सहदातियकी, जैसा विक सुरजी लाल छाबड़ा बनाम कविमश्नर ऑफ इनकम टैक्स, बॉम्बे ((1976) 3 SCC
142) क े मामले में अवलोविक विकया गया है, संयुक्त हिंहदू परिरवार की अपेक्षा एक संक ु तिच विनकाय है। विम ाक्षरा हिंहदू कानून क े ह, विकसी भी हिंहदू पुरूष को अपने विप ा, विप ा क े विप ा या विप ा क े विप ा क े विप ा से विवरास में विमली संपत्तिR पै ृक संपत्तिR है। उपरोक्त रीक े से विवरास में संपत्तिR पाने वाले पुरुष वंशज ने संपत्तिR को विबल्क ु ल एक पृर्थीक संपत्तिR क े रूप में विवरास में नहीं, परन् ु सहदातियकी संपत्तिR क े रूप में विदया। सहदातियकी में क े वल वे व्यविक्त शाविमल हो े हैं जो जन्म से ही सहदातियकी संपत्तिR में रुतिच रख े हैं। सहदातियकी संपत्तिR की उRरजीविव ा उRराति,कार में है। कोई भी सहदातियक अन्य सहदातियकों की सहमति क े सिसवाय उपहार क े माध्यम से अपने अविवभासिज सहदातियकी ब्याज को विनस् ारिर नहीं कर सक ा। सहदातियकी संपत्तिR क े विवलगाव पर विनब•,न हैं, जो विक भी वै, होगा जब यह सम्पूण[7] वयस्क सहदायी विनकाय क े द्वारा विकये गये हों, क ा7/प्रबं,क सीमाओं/श • क े अ,ीन विप ा, और क ु छ परिरस्थिस्र्थीति यों में एकमात्र उRरजीविव सहदातियक द्वारा ( देखें मुल्ला हिंहदू लॉ, 22 वाँ संस्करण, 2016 पृष्ठ 397 पर, § 253- सहदातियक संपत्तिR का विवलगाव कौन कर सक ा है ’)।
9. सहदातियकी क े सीमाओं से परे, पुरुष और मविहला दोनों का एक समूह हो ा है, जो अविवभासिज या संयुक्त परिरवार का गठन कर े हैं, सिजसमें एक पूव7ज से पै ृक वंशज और इसमें उनकी पस्थित्नयां और अविववाविह पुवित्रयाँ शाविमल हो ी हैं। इस प्रकार, संयुक्त हिंहदू परिरवार, एक बड़ा विनकाय है, जो उन वयविक्तयों क े समूह से बन ा है जो जन्म, विववाह या दRक ग्रहण द्वारा उत्पन्न होने वाले सविपण्ड क े बं,न से युक्त हो े हैं। एक व्यविक्त जो संयुक्त हिंहदू परिरवार का सदस्य है, वह पृर्थीक या व्यविक्तग संपत्तिR,ारिर कर सक ा है और इसक े अति रिरक्त, यविद वह एक सहदातियक है, ो संयुक्त हिंहदू परिरवार की सहदातियक संपत्तिR में रुतिच है।
10. हालांविक, विदनांक 17 जून 1956 से उRराति,कार अति,विनयम क े लागू होने क े सार्थी, 17 जून 1956 क े बाद घटने वाली मृत्यु की घटना में विनव7सीय उRराति,कार क े द्वारा विवरास में विमली कोई भी संपत्तिR पूण[7] अर्थीवा व्यविक्तग संपत्तिR है और पै ृक संपत्तिR नहीं है। व 7मान वाद में, हमारा विकसी सहदातियक की मृत्यु पर मौजूदा सहदातियकी संपत्तिR क े वैचारिरक विवभाजन से सरोकार नहीं हैं, विदनांक 9 सिस ंबर 2005 से प्रभावी रूप से लागू अति,विनयम सं. 39/2005 क े माध्यम से उRराति,कार अति,विनयम में विकए गए संशो,नों या उRराति,कार अति,विनयम की,ारा 30 क े माध्यम से अपने अविवभासिज ब्याज क े सहदातियक वसीय का विनष्पादन हो ा है।
11. एक संपत्तिR यद्यविप विवरास में विमली हो और पै ृक हो, सिजसका विवभाजन प्रर्थीा और उRराति,कार द्वारा विनविषद्ध है, जहाँ सामान्य ः ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) द्वारा 'अविवभाज्य संपत्तिR' क े रूप में संदर्भिभ विकया जा ा है। एक अविवभासिज संपत्तिR अविनवाय[7] रूप से प्रर्थीा की एक सृजन है, यद्यविप अनुदान की श • की उत्पत्तिR द्वारा भी, एक संविवति, अर्थीवा एक परिरवार क े समझौ े क े त्तिलए मूल को छोड़ सक ा है। ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) क े गुण आ,ार पर, सबसे बड़ा या पहला पुत्र अपने छोटे भाइयों क े अपवज7न क े त्तिलए ग,ारक की संपत्तिR क े त्तिलए सफल हो ा है। पै ृक पुरुष ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) क े अन् ग[7] भी उRराति,कार हो सक ा है, सिजसका अर्थी7 है विक वंश,र की बड़ी शाखा क े सबसे बड़े पुरुष सदस्य का लगा ार वंशज होगा। अविवभाज्य े बीच का वैभिशष्ट्य, सिजसक े त्तिलए ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) लागू हो ा है, और सहदातियकी संपत्तिR को शीबा प्रसाद सिंसह बनाम रानी प्रयाग क ु मारी देबी एवं अन्य 2 (AIR 1932 PC 216) में विनम्नानुसार उद्धृ विकया गया है: “अविवभाज्य ा अविनवाय[7] रूप से प्रर्थीा का एक सृजन है। सा,ारण संयुक्त परिरवार की संपत्तिR क े मामले में, परिरवार क े सदस्यों क े पास: (1) विवभाजन का अति,कार; (2) आवश्यक ा क े सिसवाय परिरवार क े मुत्तिखया द्वारा हस् ां रण पर विनयंत्रण करने का अति,कार; (3) रखरखाव का अति,कार; और (4) उRरजीविव ा का अति,कार है। इनमें प्रर्थीम अति,कार में संपत्तिR की प्रक ृ ति से, यद्यविप एक पै ृक संपत्तिR क े मामले में मौजूद नहीं हो सक ी है। दूसरा, सर ाज क ु आरी क े मामले और राम क ृ ष्ण बनाम वेंकट क ु मार क े रूप में प्रति पाविद अविवभाज्य ा की प्रर्थीा क े सार्थी असंग है, और इसत्तिलए ीसरा भी गंगा,र बनाम राजा आॅफ विपRापुर क े में अव,ारिर विकया गया। इस सीमा क, विम ाक्षरा क े सामान्य विवति, को प्रर्थीा और अविवभाज्य संपत्तिR द्वारा अति विष्ठ विकया गया है, यद्यविप पै ृक, स्व-अति,गृही और पृर्थीक े सार्थी आवरिर है। लेविकन उRरजीविव ा का अति,कार अविवभाज्य ा की प्रर्थीा क े सार्थी असंग नहीं है। इसत्तिलए उनका अति,कार अभी भी अवशेष है, और यही बैजनार्थी क े वाद में अव,ारिर विकया गया र्थीा। इस सीमा क भू-संपत्तिR अभी भी संयुक्त परिरवार की संपत्तिR अपने स्वरूप को कायम रख ी है, और इसक े हस् ां रण को ऐसी संपत्तिR पर लागू सामान्य विम ाक्षरा कानून द्वारा विनयंवित्र विकया जा ा है। यद्यविप संयुक्त परिरवार की संपत्तिR में जन्म से एक सहदातियक को जो अन्य अति,कार प्राप्त हो े हैं, वे अब मौजूद नहीं हैं, लेविकन उRरजीविव ा क े त्तिलए वरिरष्ठ सदस्य का जन्मसिसद्ध अति,कार अभी भी बना हुआ है। न ो यह अति,कार, विहन्दू विव,वा की मृत्यु पर उसक े पति की सम्पत्तिR का वारिरस होने वाले उRरभोगी क े अति,कार क े समान, एक संभाव्य उRराति,कारी मात्र है।"
12. उपरोक्त अंश में भिशबा प्रसाद सिंसह(उपरोक्त) को इस न्यायालय क े कई विनण7यों में अनुमोदन क े सार्थी उद्धृ विकया गया है, सिजसमें ठाकोरे श्री विवनयसिंसहजी(मृ ) द्वारा एलआरएस. बनाम क ु मार श्री नटवरसिंसहजी और अन्य 3 ((1988) Supp. SCC 133) शाविमल हैं। जहाँ यह विनम्नानुसार अवलोविक विकया गया है:- “अविवभाज्य संपत्तिR, यद्यविप पै ृक, स्व-अति,गृही और पृर्थीक संपत्तिR की घटनाओं से आवरिर है, सिसवाय उRरजीविव ा क े अति,कार को छोड़कर, जो विक अविवभाज्य ा की प्रर्थीा क े सार्थी असंग नहीं है.......”
13. इसत्तिलए, यह अच्छी रह से स्र्थीाविप है विक एक अविवभाज्य संपत्तिR को स्व-अर्जिज और पृर्थीक संपत्तिR की घटनाओं क े सार्थी आवरिर है। अविवभाज्य सम्पत्तिR यहाँ क विक वंशाग और पै ृक संपत्तिR, सहदातियकी द्वारा सहदातियकी सम्पत्तिR क े विहस्से क े रूप में अव,ारिर नहीं की गई हो, क्योंविक सहदातियक अर्थीवा संयुक्त हिंहदू परिरवार क े सदस्यों को विवभाजन का अति,कार नहीं है या हस् ां रण पर विनयंत्रण का अति,कार नहीं है। यद्यविप उRरजीविव ा का अति,कार, अविवभाज्य संपत्तिR की प्रर्थीा क े सार्थी असंग नहीं है, हालाँविक यह विम ाक्षरा विहन्दू विवति, क े अन् ग[7] उRराति,कार क े सामान्य विनयम से अलग है जहां विप ा की सम्पत्तिR में उसक े सभी पुत्र बराबर की विहस्सेदारी क े हकदार हैं, उRराति,कार क े कानून क े त्तिलए जब ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) लागू हो ा है, ो यह विक जन्म लेने वाला प्रर्थीम पुत्र संपूण[7] संपत्तिR को अन्य पुत्रों क े अपवज7न में सफल हो ा है।
14. जैसा विक ऊपरोक्त में अवलोविक विकया गया है, एक संपत्तिR की अविवभाज्य ा और ज्येष्ठ ा (प्राइमोगेविनचर) का उद्भव प्रर्थीा सविह चार रूपों में हो सक ी है। न्यातियक दृ|ां हैं विक अविवभाज्य संपत्तिR की प्रर्थीा को स्वीकार और मान े हुए विक ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) राजसRा का शासन सभी रिरयास ों में उRराति,कार का एक सामान्य विनयम र्थीा। हमें इस प्रर्थीा की न्यातियक सूचना लेना चाविहए, जो साक्ष्य अति,विनयम 1872 की,ारा 48 क े माध्यम से राजोतिच राज्य पर लागू हो ा है। लेस्थि¤टनेंट कन7ल जेम्स टॉड ने अपने काय[7] को' एनल्स एंड एंटीस्थिक्वटीज ऑफ राजस्र्थीान’ 4 (Oxford University Press, 1920. Reprinted in 1978 by M.N. Publishers, New Delhi) शीष7क क े पृष्ठ 307 में कहा है:- “.......ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) सभी राजपू संप्रभु ा में व्याप्त है; दुल7भ उदाहरण सिजसमें इसे अपास् विकया गया है, क े वल विनयम क े अपवाद हैं।” न्यायमूर्ति जी.क े. विमRर ने मा,व राव जीवाजी राव सिंसति,या बनाम भार संघ और अन्य 5 ((1971)1 SCC 85) क े अपने विनण7य में अवलोविक विकया र्थीा: "अपरिरव 7नीय रूप से ऐसा प्र ी हो ा है विक पै ृक पुरूष ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) एक पुत्र क े अपनाने की प्रर्थीा क े सार्थी युत्तिºम है जो हिंहदू शासकों क े मामले में जो शरीर क े ढेर क े सार्थी पृक ृ ति स्र्थी है।" बाबू गुनेश दR सिंसह बनाम महाराजा मोहेशुर सिंसह 6 ((1854-7) MIA 164: 1 Sar PCJ
521) क े मामले में, इसे विनम्नानुसार उद्धृ विकया गया र्थीा: “हम इस बा को आशंका कर े हैं विक सिजस सिसद्धां पर हम इस मामले में आगे बढ़ने वाले हैं वह विबना विकसी संदेह या प्रश्न क े स्वीकार कर ा है। इस सिजले में प्रचत्तिल सामान्य कानून द्वारा, और वास् व में आम ौर पर हिंहडू कानून क े ह, बेटों क े बीच संपत्तिR का विवभाजन हो ा है, इस जनपद में प्रचत्तिल सामान्य कानून द्वारा, और वास् व में आम ौर पर हिंहदू विवति, क े अन् ग[7], जब एक से अति,क पुत्र हो े हैं; ो पुत्रों क े बीच संपत्तिR का विवभाजन हो ा है, वे बड़े पुत्र को ही नहीं प्राप्त हैं, परन् ु सभी क े बीच विवभाज्य हैं। एक रिरयास क े रूप में एक राज क े सम्बन्, में, सामान्य विनयम अन्यर्थीा है, और ऐसा होना चाविहए। इसमें कोई संदेह नहीं है विक यह एक संप्रभु ा, एक रिरयास, एक अ,ीनस्र्थी संप्रभु ा और रिरयास है, लेविकन विफर भी एक सीविम संप्रभु ा और रिरयास है, जो अपनी प्रक ृ ति में विवभाजन क े विवचार को उस अर्थी7 में शाविमल नहीं कर ा है सिजसमें उस शब्द का उपयोग व 7मान मामले में विकया जा ा है।"
15. प्र ाप सिंसह बनाम सरोसिजनी देवी एवं अन्य 7 ((1994) Supp 1 SCC 734) क े संदभ[7] में बाबू गणेश दR सिंसह(उपरोक्त) क े फ ै सले का उल्लेख विकया गया र्थीा और न्यायमूर्ति विमRर की राय मा,व राव जीवाजी राव सिंसति,या(उपरोक्त) में यह अव,ारिर विकया गया: “65. यद्यविप, जमींदारी सम्पदा या अन्य अविवभाज्य सम्पत्तिR क े संबं, में विनष्पक्ष ा और प्र,ान ा प्रर्थीा द्वारा स्र्थीाविप हो ी है, एक संप्रभु शासक क े मामले में, उन्हें अस्थिस् त्व में प्रकस्थिल्प विकया जा ा है।” प्र ाप सिंसह (उपरोक्त) में इस न्यायालय ने उपरोक्त सिसद्धां ों को दोहराया है और यह भी अवलोविक विकया है विक संप्रभु शासक क े मामले में अविवभाज्य संपत्तिR और ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) क े आवेदन को अस्थिस् त्व में रखा जाना चाविहए, जबविक ज़मींदारी संपत्तिR या विकसी अन्य अविवभाज्य संपत्तिR क े मामले में ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) को प्रर्थीा क े माध्यम से स्र्थीाविप विकया जाना चाविहए।
16. शासक क े पास संप्रभु क े रूप में संबंति, कोई भी संपत्तिR, जो ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) क े आवेदन से उRरजीविव ा द्वारा उRराति,कार पर न्यायग होगी, एक सहदातियकी संपत्तिR की घटना वहन नहीं होगी। संपत्तिR एक व्यविक्त से संबंति, र्थीी, अर्थीा7, संप्रभु शासक की अं र्हिह संप्रभु ा की अव,ारणा क े रूप में पूण[7] प्राति,कारी, शविक्त और स्वाविमत्व को विकसी अन्य व्यविक्त द्वारा विवभाजन या विनषे,ाज्ञा की कानूनी कार7वाई क े अ,ीन नहीं विकया जा सक ा है। फलस्वरूप, संप्रभु शासक की सम्पदाएं/संपत्तिRयां क े अविवभाज्य होने क े बावजूद पै ृक र्थीीं। सिजन पुरुष सदस्यों क े पास उRरजीविव ा का अति,कार र्थीा, वे विवभाजन क े अति,कार अर्थीवा संप्रभु शासक द्वारा हस् ां रण को विनयंत्रण करने क े अति,कार का दावा नहीं कर सक े र्थीे क्योंविक उनक े पास कोई प्रव 7नीय अति,कार नहीं र्थीा सिजसे विवति,क रूप से उपचारिर विकया जा सक ा र्थीा। संक्षेप में, सहदातियकी क े पुत्रों अर्थीवा अन्य सदस्यों का अति,कार या विह संप्रभु ा क े सार्थी असंग र्थीा क्योंविक एक संप्रभु शासक को नगरपात्तिलका विवति, और नगर विनगम न्यायालयों क े अ,ीन नहीं विकया जा सक ा र्थीा। सिसविवल अपील सं. 226/ 1965 क े महं हरविदयाल सिंसह बनाम अजमेर सिंसह क े एक अप्राप्य विनण7य में पविटयाला क े महाराजा की शविक्तयों क े संबं, में 20 नवंबर 1968 को विनण7य त्तिलया गया र्थीा, इस न्यायालय ने अवलोविक विकया र्थीा:- "हमारा विवचार है विक यह अपील छोटे आ,ार पर विवफल होना चाविहए विक सेठ बनारसी दास क े पक्ष में विबक्री उनक े महामविहम पविटयाला क े महाराजा द्वारा विकए गए आदेशों क े दृवि|ग नहीं की जा सक ी है। यह स्मरण रखना चाविहए विक सिजस समय लेन-देन हुआ, उस समय पविटयाला एक देशी राज्य र्थीा और महाराजा अविनयंवित्र संप्रभु शविक्तयों का आनंद ले े र्थीे। उस समय वह सव च्च विव,ातियका, सव च्च न्यायपात्तिलका और काय7पात्तिलका क े सव च्च प्रमुख र्थीे विकसी भी सामथ्य[7] में काय[7] करने क े त्तिलए उसक े अति,कार पर कोई संवै,ाविनक सीमा नहीं र्थीी। उनक े आदेश संप्रभु इच्छा की अभिभव्यविक्त र्थीे और वे विकसी अन्य विवति, की भाँति ही बाध्यकारी र्थीे, नहीं, वे अन्य सभी कानूनों को अति,रोहण कर देंगे जो उनक े सार्थी विवरो, में र्थीे। जब क उनक े आदेश में यह क्षेत्र र्थीा विक अक े ले ही संबंति, पक्षों क े अति,कारों को विनयंवित्र या विवविनयविम करेगा, यद्यविप यह विकसी भी समय उनक े द्वारा रद्द या संशोति, विकया जा सक ा र्थीा। ” अ ः, अविवभाज्य सम्पत्तिR से संबंति, प्रर्थीा और ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) क े अनुसार, एक रिरयास का राजा या शासक संपत्तिR को क ा7 या सहदातियक क े रूप में अव,ारिर नहीं करेगा, परन् ु पूण[7] मात्तिलक और संपत्तिR क े रूप में अविवभाज्य होगा। पुत्र(गण) जन्म क े समय न ो अविवभाज्य संपत्तिR में कोई विदलचस्पी लेगा और न ही विवभाजन को अवरूद्ध कर सक ा है। शासक की मृत्यु होने पर, राज ंत्र क े उRराति,कार क े रूप में, यह भी विक अविवभाज्य संपत्तिR, जीविव रहने क े विम ाक्षरा विवति, क े अन् ग[7] नहीं र्थीी, लेविकन ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) द्वारा शासिस र्थीी। हालांविक, अन्य को अनुरक्षण प्रदान करने क े त्तिलए नैति क दातियत्व र्थीा, चाहे वह छोटे भाई या परिरवार क े सदस्य हों, जो बाद में प्रर्थीा क े माध्यम से, वस् ु ः एक दातियत्व बन गए।
17. वेंकट सूय[7] मविहपति राम क ृ ष्ण राव बहादुर बनाम कोट[7] ऑफ़ वॉर्ड्सस[7] और अन्य 8 ((1899) LR 26 Ind App 83) में विप्रवी काउंसिसल ने पूव[7] क े वाद विवति, का संदभ[7] दे े हुए अव,ारिर विकया र्थीा विक एक अविवभासिज संपत्तिR का,ारक जीविव व्यविक्तयों क े बीच एक उपहार क े माध्यम से संपत्तिR को हस् ां रिर कर सक ा है। अर्थीवा यहाँ क विक वसीय द्वारा, यद्यविप परिरवार अविवभासिज है; उनकी शविक्त पर एकमात्र सीमा परिरवार की प्रर्थीा क े विवपरी, या काय7काल की स्थिस्र्थीति से प्रवाविह हो ी है सिजसका समान प्रभाव हो ा है। श्री राजा वेलुगोटी कु मार क ृ ष्णा यचेंद्र वरु और अन्य बनाम श्री राजा वेलुगोटी सवा7ग्ना कु मार क ृ ष्णा यचेंद्र वरू और अन्य 9 ((1969) 3 SCC 281); भैया रामानुज प्र ाप देव बनाम लालू महेशानुज प्र ाप देव और अन्य 10 ((1981) 4 SCC 613); प्र ाप सिंसह (उपरोक्त) और अन्य मामले में उपरोक्त अभ्युविक्त को इस न्यायालय द्वारा स्वीक ृ ति दी गई है।
18. एडवोक े ट जनरल आॅफ बाॅम्बे बनाम आमेरचन्द 11 (12ER 340, 345: (1830)
1 Knapp 316,329-30) में लॉड[7] टेंटरडेन ने चचा7 क े दौरान पूछा र्थीा: “एक पूण[7] संप्रभु की साव7जविनक और विनजी संपत्तिR क े बीच विवभेद क्या है? साव7जविनक संपत्तिR से आपका आशय सामान्य ः राज्य की संपत्तिR से है, लेविकन एक पूण[7] संप्रभु की संपत्तिR में, जो विकसी भी समय सब क ु छ विनपटान कर सक ा है, और विकसी भी रह से वह प्रसन्न है, क्या कोई विवभेद है?" […] लॉड[7] टेंटरडेन ने अपने विनण7य में यह अवलोकन विकया: “दूसरा हिंबदु विनर्हिम विकया गया, जो क े वल सूचना क े एक विहस्से पर ही लागू हो ा है, वह यह है विक संपत्तिR साविब नहीं हुई र्थीी विक वह पेशवा की साव7जविनक संपत्तिR र्थीी। उस हिंबदु पर मैंने अपनी राय पहले ही ब ा दी है, और मुझे इसक े सार्थी परिरषद क े अन्य गणमान्यों की सहमति है, विक जब आप एक पूण[7] संप्रभु की संपत्तिR की बा कर रहे हैं, ो एक विवभेद क े रेखातिचत्र हे ु कोई विमथ्याकर्थीन नहीं है, संपूण[7] ः यह उसक े त्तिलए संप्रभु क े रूप में है, और वह अपने साव7जविनक या विनजी प्रयोजनों क े त्तिलए इसका विनपटान कर सक ा है, चाहे वह विकसी भी रीक े से उतिच हो।”
19. संप्रभु और राज्य की संपत्तिR की विवति,क प्रसंगति यों को गुजरा उच्च न्यायालय ने डी.एस. मरमवाला भायावाला बनाम बाई श्री अमबा7 जेठसुरभाई 12 (1968) 9 GLR 609) में विनम्नत्तिलत्तिख शब्दों में समझाया: “5. […] एक संप्रभु शासक क े रूप में उसका सम्पत्तिR पर पूण7स्वाविमत्व होगा इसत्तिलए वह अपनी सम्पत्तिR क े सार्थी क ु छ भी करने का हकदार है। उनक े दौरान संपत्तिR में हक का दावा कोई दूसरा नहीं कर सक ा है। ऐसा हक उसकी संप्रभु ा क े सार्थी असंग होगा। यह हक अर्जिज करने क े त्तिलए विक पुत्रों को सम्पत्तिR में जन्म या गोद लेने का अनुदान विमल ा है, जो नगरपात्तिलका कानून क े अन् ग[7] उद्भू होने वाला परिरणाम है, जो विक प्रमुख को नगर पात्तिलका कानून क े अ,ीन संपत्तिR का संप्रभु शासक बनाना होगा। इसक े अति रिरक्त, यविद पुत्र जन्म या गोद लेने क े द्वारा सम्पत्तिR अज7न में हक रख े हैं, ो वे ऊपर प्रगभिण अति,कारों का दावा करने क े हकदार होंगे, लेविकन वे अति,कार एक संप्रभु संपत्तिR में मौजूद नहीं हो सक े। इनमें से कोई भी अति,कार नगरपात्तिलका न्यायालयों में एक उपाय द्वारा प्रमुख क े त्तिखलाफ लागू नहीं विकया जा सक ा है। प्रमुख संप्रभु शासक होने क े ना े, इन अति,कारों को प्रव 7न करने क े त्तिलए कोई विवति,क मंजूरी नहीं हो सक ी है। इन अति,कारों का प्रव 7न करने का उपचार विवति,क उपचार नहीं होगा परन् ु बल का सहारा लेना होगा, क्योंविक संप्रभु शासक नगरपात्तिलका विवति, क े अ,ीन नहीं होगा और उसक े काय• को नगरपात्तिलका न्यायालयों द्वारा विनयंवित्र नहीं विकया जाएगा। अब ऐसे विवति,क अति,कार की कल्पना करना असंभव है सिजसका कोई कानूनी उपचार न हो। यविद कोई दावा विवति,क रूप से अप्रव 7नीय है, ो यह एक विवति,क अति,कार नहीं होगा और इसत्तिलए, एक संप्रभु संपत्तिR की प्रक ृ ति से, पुत्रों क े पास ये अति,कार नहीं हो सक े हैं और यविद ये अति,कार पुत्रों में मौजूद नहीं हैं, ो इसका आवश्यक परिरणाम क े रूप में पालन करना चाविहए विक पुत्रों को जन्म या गोद लेने क े द्वारा संपत्तिR में हक अर्जिज नहीं है।" प्रस् र 14 से 16 (उपरोक्त) में स्प| की गई विवति,क स्थिस्र्थीति को डी. एस. मरमवाला (उपरोक्त) में तिचस्थिन्ह विकया गया र्थीा, सिजसमें कहा गया है विक पुत्र(गण) क े विवषय में एक भी उदाहरण नहीं है जहां प्रमुख क े दौरान संपत्तिR क े बंटवारे क े त्तिलए संपत्तिR में हक होने की मान्य ा प्राप्त र्थीी। अ ः, यह स्प| है विक जब ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) लागू हो ा है, ो पै ृक सहदातियक संपत्तिR क े सिसद्धां लागू नहीं होंगे। एक अविवभाज्य संपत्तिR क े मामले में, पुत्र(गण) को जन्म द्वारा कोई हक नहीं प्राप्त होगा, एक हिंहदू पुत्र क े रूप में सहदातियक संपत्तिR में जन्म से ही हक रख ा है।
20. लॉड[7] टेंटड7न का विवचार उन मामलों में से एक र्थीा, सिजसे रेवभिर्थीन्नल बालगोपाल वमा7 बनाम श्री पद्मनाभ दास बाला राम वमा7 (मृ क) एवं अन्य 13 ((1993) Supp 1 SCC 233) क े मामले में अनुमोदन क े सार्थी उद्धृ विकया गया र्थीा। आगे इस पहलू को रेवभिर्थीन्नल बालगोपाल वमा7 (उपरोक्त) (देखें प्रस् र 30) क े मामले में न्यायमूर्ति एन.डी. ओझा द्वारा स्प| विकया गया र्थीा।
21. भार ीय स्व ंत्र ा अति,विनयम, 1947 क े गमन क े सार्थी, विÍविटश प्रयास ने भार ीय साम्राज्य को विवदाई दी और राजनीति क शविक्त का हस् ां रण विकया। भार का विवभाजन भी हुआ र्थीा। सवाल यह उठेगा विक क्या विवति,क स्थिस्र्थीति को स्व ंत्र ा क े बाद 15 अगस् 1947 को इस थ्य क े प्रकाश में बदल विदया र्थीा विक रिरयास ों क े शासक विÍविटश सव परिर ा की चूक क े बाद भार ीय संघ में शाविमल हो गए र्थीे। अविवभासिज भार में लगभग 4095852 वग[7] विकमी. में समाविव| र्थीे। विÍविटश साम्राज्य का 2241505 वग[7] विकमी. पर सी,ा विनयंत्रण र्थीा, और राजसी या देशी राज्यों में लगभग 565 की संख्या में, 1854346 वग[7] विकमी. पर अति,कार र्थीा। सRा और प्रशासन क े हस् ां रण क े अलावा, स्व ंत्र भार ीय संघ में रिरयास ों का एकीकरण एक जविटल और कविठन काय[7] र्थीा। जुलाई 1947 में, रिरयास ों और राज्य मंवित्रयों क े कई शासकों ने अं रिरम सरकार में गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से मुलाका की र्थीी, ाविक उनक े भविवष्य की स्थिस्र्थीति का विन,ा7रण और चचा7 विकया जा सक े । श्री वी.पी. मेनन ने अपने काय[7] 'इंटीग्रेशन आॅफ दी इस्थिण्डयन स्टेट्स ' में कहा है विक रिरयास ों ने संविव,ान सभा में भाग लेने क े त्तिलए, अपनी शविक्तयों को त्यागने और भार ीय संघ को ीन विवषयों, नाम ः, रक्षा, विवदेशी मामलों और संचार की आवश्यक ा र्थीी, जो अनौपचारिरक बैठकों और रिरयास ों क े शासकों और उनक े सलाहकारों क े सार्थी चचा7 क े बाद सहम हुए सिजन्होंने साव7जविनक भावनाओं और राजनीति क शविक्त क े हस् ां रण क े प्रभाव का एहसास विकया र्थीा। दनुसार, राज्यारोहण क े विवलेखों पर विकये गये हस् ाक्षर क े अन् ग[7] विवदेशी मामले, रक्षा और संचार को जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर क े अपवाद क े सार्थी रिरयास क े अति,कांश शासकों द्वारा अति,क्षेत्र को सौंप विदया गया र्थीा।
22. अगला चरण रिरयास ों का एकीकरण र्थीा, जो 1948-49 में, शासकों/राजाओं ने विवलय समझौ ों और प्रसंविवदाओं पर हस् ाक्षर करने क े सार्थी हुआ र्थीा। दोपरान्, रिरयास ों का विवलय राज्यों या यूविनयनों में प्रशासिस क्षेत्रों में हो गया, सिजससे व्यविक्तग शासकों से लेकर आम जन ा यानी स्व ंत्र भार क े नागरिरकों क विनरपेक्ष सRा का हस् ां रण सुविनतिd हो गया। विवलय समझौ ों ने पूव[7] रिरयास ों को भार संघ में एकीकरण सुविनतिd विकया। पूण[7] शविक्त और संप्रभु ा क े अभ्यप7ण क े बदले में, शासकों को आस्थिस् यों क े उतिच आवंटन, संपत्तिR और विनतिd व्यविक्तग आय को राज्य भRे (विप्रवी पस[7]) क े माध्यम से आश्वासन विदया गया र्थीा। विवलय क े करार ने पूव[7] शासकों को विवशेषाति,कारों और रिरयाय ों को भी मंजूरी दी र्थीी सिजन्होंने एक शासक की स्थिस्र्थीति का उपभोग विकया र्थीा। इस अवस्र्थीा में, राज्य और शासकों की व्यविक्तग संपत्तिRयों का सीमांकन करना आवश्यक हो गया। पहला पूव7व 2 राजक ु मारों की सम्पत्तिR रह गई जबविक दूसरा राज्य की संपत्तिR हो गई।
23. इस प्रविक्रया में भार सरकार द्वारा सिजन सिसद्धां ों का पालन विकया जा ा है, उन्हें श्री वी.पी. मेनन द्वारा अपने काय[7] में स्प| ः विनम्नत्तिलत्तिख रीक े से कहा है: “ इस सम्मेलन में विवकसिस व्यापक सिसद्धां इस प्रकार र्थीे। अचल संपत्तिRयों को पूव पयोगी आ,ार पर शासकों को उनकी वास् विवक और प्रशासन की जरूर ों क े संबं, में आवंविट विकया जाना र्थीा। कु छ शासकों द्वारा क ृ विषक्षेत्रों, उद्यानों और चरागाह क्षेत्रों को बनाए रखने की अनुमति दी गई र्थीी, लेविकन इन क े संबं, में शासक की स्थिस्र्थीति एक विनजी भू-स्वामी क े समान होगी और वह राजस्व विवति,यों और आकलन क े अ,ीन होगा। विनवेश और शेष राभिश क े संबं, में, क े वल वे राज्य सिजनमें से कोई दावा नहीं कर सक े र्थीे, उन्हें शासक की विनजी संपत्तिR क े रूप में मान्य ा दी जानी र्थीी। यद्यविप हमने सRारूढ़ परिरवार क े व्यविक्तग आभूषणों क े त्तिलए कोई दावा नहीं विकया र्थीा, लेविकन ‘विवरास ’(हेयरलूम) क े रूप में इस रह क े पै ृक आभूषण को सRारूढ़ परिरवार क े त्तिलए संरतिक्ष विकया जाना र्थीा; और मूल्यवान राजतिचन्ह को समारोह काय[7] अवसर पर उपयोग क े त्तिलए शासक की अभिभरक्षा में रहेगा…”
24. ये सिसद्धां भार सरकार द्वारा भार ीय राज्यों पर श्वे पत्र में स्प| रूप से प्रति हिंबविब हो े हैं, सिजसका प्रासंविगक भाग इस प्रकार पढ़ा गया: "157. पूव[7] में शासकों ने विनजी और राज्य की संपत्तिR में कोई अं र नहीं विकया; वे व्यविक्तग रूप से अपने संबंति, राज्यों क े स्वाविमत्व वाली विकसी भी संपत्तिR क े त्तिलए स्व ंत्र रूप से उपयोग कर सक े र्थीे। राज्यों क े एकीकरण क े सार्थी, शासक की विनजी संपत्तिR को स्प| रूप से परिरभाविष और सीमांविक करना आवश्यक हो गया।"
25. इसमें कोई संदेह नहीं है विक पूव[7] क े शासकों का विवलय समझौ ों क े बाद संप्रभु ा का स्र्थीगन हो गया। हालांविक, वे रिरयाय ों क े संदभ[7] में लाभ क े हकदार र्थीे जो विवलय समझौ ों क े अन् ग[7] मंजूर विकये गए र्थीे, सिजसक े आ,ार त्व अग्रत्तिलत्तिख र्थीे: “ xx xx xx xx xx अनुच्छेद III: इस समझौ े (ए स्थिस्मनपdा ् "प्रसंविवदा राज्यों" क े रूप में संदर्भिभ ) की अनुसूची में राज्य क े प्रत्येक शासक को ए द्द्वारा भार सरकार को सौंप े हैं, पूव क्त विदवस क े प्रभावस्वरूप, पूण[7] और विवभिश| प्राति,करण, न्यायक्षेत्र और शविक्तयों क े त्तिलए, और उस राज्य क े शासन क े संबं, में; और त्पdा भार सरकार उक्त शविक्तयों, प्राति,कार और क्षेत्राति,कार का इस प्रकार और ऐसी अभिभकरण क े माध्यम से प्रयोग करने क े त्तिलए सक्षम होगी, जैसा विक वह सोच सक ी है। अनुच्छेद IV: (1) प्रत्येक प्रसंविवदा राज्य क े शासक को भार सरकार से अपने राज्य भRे को प्रति वष[7] प्राप्त करने का हक होगा, जो इस समझौ े की अनुसूची में उस प्रसंविवदा राज्य क े विवरूद्ध विन,ा7रिर करेगा। (2) उक्त राभिश का आशय शासक और उसक े परिरवार क े सभी खच• को समावेश करना है, सिजसमें व्यविक्तग कम7चारिरयों क े खच[7], उनक े विनवास, विववाह और अन्य समारोहों क े रखरखाव आविद शाविमल हैं, और विकसी भी कारण से जो भी हो न ो बढ़ाया जाएगा और न ही कम विकया जाएगा। (3) उक्त राभिश सभी करों से मुक्त होगी और प्रत्येक ति माही की शुरुआ में चार बराबर विकश् ों में भुग ान विकया जाएगा। अनुच्छेद V: प्रत्येक प्रसंविवदा राज्य क े शासक, उसक े परिरवार क े सदस्य की रह भी सभी व्यविक्तग विवशेषाति,कारों, सम्मानों और उपाति,यों क े हकदार होंगे, चाहे वे अगस् 1947 क े 15 विदन पहले उस राज्यक्षेत्रों क े भी र या बाहर हों। अनुच्छेद VI: विवति, और प्रर्थीा क े अनुसार, प्रत्येक प्रसंविवदा राज्य क े गद्दी क े त्तिलए, शासक क े व्यविक्तग अति,कारों, विवशेषाति,कारों, सम्मान और उपाति,यों क े त्तिलए भार सरकार उRराति,कार की गारंटी दे ा है। अनुच्छेद VII: (1) प्रत्येक प्रसंविवदा राज्य क े शासक, प्रसंविवदा क े अनुसरण में उस राज्य क े प्रशासन से लेकर राजप्रमुख बनने क की ति भिर्थी पर उससे संबंति, सभी विनजी संपत्तिRयों (राज्य संपत्तिRयों से अलग) में पूण[7] स्वाविमत्व, उपयोग और उपभोग का हकदार होगा। (2) यविद कोई विववाद उत्पन्न हो ा है विक क्या संपत्तिR का कोई भी विहस्सा शासक या राज्य की विनजी संपत्तिR है, ो इसे भार सरकार द्वारा नाविम न्यातियक अति,कारी क े त्तिलए विनर्हिद| विकया जाएगा, और अति,कारी का फ ै सला सभी संबंति, पक्षों पर बाध्यकारी होगा। अनुच्छेद VIII: भार सरकार क े प्राति,कार क े अन् ग[7] या उसक े अ,ीन कोई जांच नहीं की जाएगी, और प्रसंविवदा राज्य क े शासक क े विवरूद्ध चाहे वह व्यविक्तग क्षम ा में हो अर्थीवा नहीं, उस राज्य क े अपने प्रशासन की अवति, क े दौरान उसक े अर्थीवा उसक े प्राति,कारी क े द्वारा विकसी चीज क े पूण[7] ा अर्थीवा अपूण[7] ा संबं, में विकसी भी न्यायालय में कोई काय7वाही नहीं होगी। xx xx xx ”
26. भार का संविव,ान अनुच्छेद 363 में खंड 2 क े माध्यम से अति,विनयविम है, 'भार ीय राज्य' की अभिभव्यविक्त को विकसी भी राज्यक्षेत्र क े रूप में परिरभाविष विकया गया र्थीा सिजसे उसक े महामविहम अर्थीवा भार संघ सरकार क े द्वारा संविव,ान क े प्रारंभ से पहले राज्य को मान्य ा दी गई र्थीी और भार ीय राज्य क े शासक क े रूप में उसक े महामविहम अर्थीवा भार संघ सरकार क े द्वारा एेसे प्रारंभ क े पहले 'शासक' क े रूप में मान्य ा दी गई र्थीी। 'शासक' का अर्थी7 राजक ु मार क े रूप में परिरभाविष र्थीा, प्रमुख अर्थीवा विकसी अन्य व्यविक्त सिजसक े द्वारा अनुच्छेद 291 क े खंड(1) में उसिल्लत्तिख ऐसी विकसी भी प्रसंविवदा अर्थीवा समझौ े को शाविमल विकया गया र्थीा और सिजसे सभापति द्वारा रिरयास क े शासक क े रूप में मान्य ा दी गई र्थीी।
27. इसत्तिलए, यह स्प| है विक विवलय समझौ े पर हस् ाक्षर करने पर, शासकों ने अपनी संप्रभु ा खो दी र्थीी और एक रीक े से, संविव,ान में उसिल्लत्तिख क ु छ विवशेष अति,कारों और विवशेषाति,कारों क े सार्थी सामान्य नागरिरक बन गए र्थीे।
28. विवलय क े समझौ ों का विवति,क प्रभाव और क्या अविवभाज्य संपत्तिR क े प्रर्थीाग विनयम ‘cessante ratione legis, cessat ipsa lex’ का सिसद्धां लागू होने क े द्वारा समाप्त होने क े योºय होगा सिजसको कई फ ै सलों में जाँच विकया गया है। प्रर्थीाग विनयम क े विवरूद्ध क 7 को जारी रख े हुए इस दलील पर स्र्थीाविप है विक यद्यविप संप्रभु ा की विवशेष ा ज्येष्ठ ा और अविवभाज्य ा में नहीं र्थीा जो प्रर्थीाओं में विवद्यमान र्थीा क्योंविक राजशाही अस्थिस् त्व में र्थीा, और इसत्तिलए जब राजशाही की हाविन हुई, ो प्रर्थीा क े अस्थिस् त्व की कोई आवश्यक ा नहीं र्थीी। इस क 7 को रेवभिर्थीन्नल बालगोपाल वमा7 (उपरोक्त) क े मामले की जांच की गई और न्यायमूर्ति एस. रंगनार्थीन द्वारा विनम्नत्तिलत्तिख शब्दों में अस्वीक ृ कर विदया गया: “5. अपीलार्थी2 की रफ से ब ाए गए प्रमुख क 7 पर चचा7 करने से पूव[7], अपीलार्थी2 क े दावे का पूण[7] उRर को ात्पर्तिय करने क े त्तिलए प्रर्थीम प्रत्यर्थी2 की रफ से पेश विकये गए अा,ार को स्प| करना सुविव,ाजनक हो सक ा है…इस मुद्दे को शासक और भार सरकार क े बीच व्यवस्र्थीाविप कर विदया गया और उक्त संपत्तिRयों को भार सरकार क े समक्ष आत्मसमप7ण विकए विबना शासक द्वारा बनाए रखने की अनुमति दी गयी। हालांविक, घोविष की गयी संपत्तिRयों में ीसरे पक्ष पर, यविद कोई है, ो इसक े अति,कारों पर प्रभाव या प्रति क ू ल प्रभाव नहीं डाल ा। इसने शासक क े त्तिलए विकसी भी अन्य संपत्तिR या उससे अति,क की उपाति, नहीं दी, विनय विदन से ठीक पहले उसका क्या हुआ....यह विकसी भी रह से विकसी भी संपत्तिR की प्रक ृ ति को उसक े हार्थीों अर्थीवा दावों को, यविद कोई हो, प्रभाविव नहीं कर ा र्थीा, जो दूसरों को शासक क े विवरूद्ध उन सम्पत्तिRयों को स्थिस्र्थीति क े अनुसार प्राप्त कर सक ा र्थीा। ये प्रस्र्थीापनाएँ विवश्वेश्वर राव बनाम एम.पी. राज्य (1952 एससीआर 1020), डालविमया दादरी सीमेंट क ं पनी त्तिलविमटेड बनाम सीआईटी (1959 एससीआर 729) और राजेंद्र सिंसह बनाम भार संघ (1970-2 एससीआर 631) क े फ ै सलों में सार्थी ही भार सरकार क े ज्ञापन विदनांक 18.05.51 (प्रदश[7] ए-4) क े प्रस् र 4 में विनविह स्प|ीकरण में स्प| है।"
29. मा. न्यायमूर्ति, एन.डी. ओझा ने उसी विनण7य डी.एस. मेरमवाला (उपरोक्त) क े मामले में गुजरा उच्च न्यायालय क े विनण7य को अनुमोविद और संदर्भिभ विकया विकया, सिजसको विनम्नानुसार अव,ारिर विकया गया है: “57....अब मेरमवाला की ओर से यह विववाविद नहीं विकया गया र्थीा विक यविद संपत्तिR का विवलय करने से पूव[7] पै ृक सहदातियक संपत्तिR की प्रक ृ ति को सस्थिम्मत्तिल नहीं विकया गया र्थीा, विवलय समझौ े क े अन् ग[7] भायावाला क े सार्थी छोड़ी गई संपत्तिRयां पै ृक सहदातियक संपत्तिRयां नहीं होंगी: यविद विवलय से पहले मेरमवाला को एस्टेट में कोई रुतिच नहीं र्थीी, ो विवलय क े अन् ग[7] भायावाला क े सार्थी शेष संपत्तिRयों में उनकी कोई विदलचस्पी नहीं होगी। यह मेरमवाला का मामला नहीं र्थीा और यह मामला नहीं हो सक ा है चूँविक विवलय समझौ ा राज्य का एक काय[7] होगा जो विवलय क े परिरणामस्वरूप भायवाला द्वारा अव,ारिर की गयी संपत्तिRयों में उसक े द्वारा विकसी भी ब्याज का अज7न विकया गया र्थीा। इसत्तिलए, भायावाला उसक े द्वारा अव,ारिर की गई संपत्तिRयों क े पूण[7] मात्तिलक र्थीे और उनकी वसीय क े अनुसार उन्हें विनस् ारण क े त्तिलए सक्षम र्थीे..….....हालांविक श्री आई.एम. नानावटी का क 7 यह र्थीा विक सव परिर शविक्त द्वारा ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) की प्रयोज्य ा का प्रभाव यह र्थीा विक सामान्य हिंहदू विवति, क े अन् ग[7] सहदातियकी क े अति,कारों पर ग्रहण लगा विदया गया र्थीा: इन अति,कारों को न| नहीं विकया गया र्थीा, लेविकन वे विनस्थिष्क्रय बने रहे और सव परिर की गल ी पर, ग्रहण की छाया को हटा विदया गया, अति,कार पूरी रह से प्रभावी हो गए। यह क 7 पूण[7] ः सिसद्धां पर अपरिरहाय[7] है …" यह अनुपा न्यायमूर्ति, एस. रंगनार्थीन (देखें प्रस् र 11) द्वारा स्वीकार विकया गया र्थीा, सिजसमें उन्होंने अवलोकन विकया र्थीा विक यविद मुद्दा एक सामान्य अविवभाज्य संपत्तिR से विनपटने क े त्तिलए हो ा ो मामला अलग हो ा, लेविकन एक संप्रभु राज्य क े मामले में सिजसका प्रमुख पहले एक संप्रभु शासक र्थीा, एक संप्रभु शासक द्वारा अर्जिज संयुक्त परिरवार की संपत्तिR होने का दावा नहीं विकया जा सक ा है।
31. इसक े बाद रेवभिर्थीन्नल बालगोपाल वमा7 (उपरोक्त) में, न्यायमूर्ति एन.डी. ओझा का अवलोकन अग्रसारिर विकया र्थीा: “63. इस संबं, में यह ध्यान में रखा जाना चाविहए विक एक संप्रभु शासक क े उRराति,कार की रीति और ऐसे शासक की शविक्तयां दो अलग अव,ारणाएं हैं। उRराति,कार की रीति उस प्रविक्रया को विवविनयविम कर ी है सिजसक े द्वारा एक संप्रभु शासक दूसरे क े द्वारा सफल हो ा है। यह सामान्य ज्येष्ठ ा अर्थीवा पै ृक ज्येष्ठ ा का विनयम अर्थीवा विकसी अन्य स्र्थीाविप विकया गया उRराति,कार शासन का विनयम, अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी शासिस हो सक ा है। यह प्रविक्रया एक संप्रभु दूसरे क े सफल होने क े सार्थी समाप्त हो ी है। त्पdा संप्रभु द्वारा शविक्तयों, विवशेषाति,कारों और विवशेषाति,कार का प्रयोग विकया जाना एक प्रश्न है, जो उRराति,कार की प्रविक्रया से संबंति, नहीं है, बस्थिल्क संप्रभु ा की कानूनी घटनाओं से संबंति, है। यह प्रविक्रया एक संप्रभु का दूसरे क े सफल होने सार्थी समाप्त हो ी है। त्पdा संप्रभु द्वारा शविक्तयों, विवशेषाति,कारों और परमाति,कार का प्रयोग विकया जाने का प्रश्न है, जो उRराति,कार की प्रविक्रया से संबंति, नहीं है, परन् ु संप्रभु ा की विवति,क घटनाओं से संबंति, है।
64. यविद कोई यह प्राख्यान कर ा है विक एक संप्रभु द्वारा अव,ारिर एक विवभिश| संपत्तिR संप्रभु ा की विवति,क घटनाओं पर लागू नहीं हो ा है, ो यह उसक े द्वारा अभिभवचन और स्र्थीाविप विकया जाएगा विक उक्त संपत्तिR को संप्रभु द्वारा संप्रभु क े रूप में अव,ारिर की गई र्थीी, लेविकन विकसी अन्य क्षम ा में। त्काल मामले में यह प्राख्यान कर े हुए विक संपत्तिR क े वाद से सम्बस्थिन्, संयुक्त परिरवार और प्रत्यर्थी2 1 र्थीा, यहाँ क विक एक संप्रभु शासक, उन्हें उस परिरवार क े प्रमुख क े रूप में अव,ारिर कर ा र्थीा, सिजसक े पास संपत्तिR र्थीी, अपीलार्थी2 ने न ो विवशेष रूप से दलील और न ही ऐसे प्राख्यान क े समर्थी7न में कोई विवश्वसनीय साक्ष्य की प्रस् ुति दी है। अपीलार्थी2 की ओर से यह ब ाया गया है विक प्रर्थीा द्वारा क े वल सबसे बड़े पुरुष, जो विक बड़ी महारानी क े सबसे बड़ी सन् ान है, शासक हो सक े हैं और राविनयों क े सभी उRराति,कारी, जो संयुक्त हिंहदू परिरवार का गठन कर े हैं, राविनयों की सम्पत्तिRयों की विहस्सेदारी क े हकदार होंगे और सम्पत्तिRयों क े वाद में प्रत्यर्थी2 1 ारवाड़ क े प्रमुख क े रूप में अव,ारिर विकया र्थीा यहाँ क विक यद्यविप उसक े अति,कार में अविवभाज्य र्थीे। इस क 7 को विवचारण न्यायालय क े सार्थी-सार्थी उच्च न्यायालय ने भी रद्द कर विदया है और हमारे संज्ञान में ऐसी कोई आश्वस् कारी बा नहीं आई है सिजसक े आ,ार पर अपीलार्थी2 की ओर से उसिल्लत्तिख उप,ारणा की जा सक े और अ,ीनस्र्थी न्यायालयों क े विनष्कष• को उलटा जा सक े । हम एक अपील क े सार्थी व्यवहार कर रहे हैं और जैसा विक इस न्यायालय ने ठाक ु र सुखपाल सिंसह बनाम ठाक ु र कल्याण सिंसह में ब ाया है, अपीलार्थी2 का यह क 7व्य है विक वह यह विदखाए विक अपील क े अन् ग[7] विनण7य त्रुविटपूण[7] है।"
31. इससे पहले भी, विमजा7 राजा पुष्पाव ी विवजयराम गजपति राज मन्ने सुल् ान बहादुर इत्याविद बनाम श्री पुषाव ी विवश्वेश्वर गजपति राज राजकु मार आॅफ विवसिजयानगरम और अन्य 15 (AIR 1964 SC 118) में, इस न्यायालय ने अवलोविक विकया र्थीा विक विनम्नत्तिलत्तिख अवलोकनों क े सार्थी उन चीजों की श × सिजसको उन्होंने बनाया है प्रर्थीाएँ उससे ज्यादा विदनों क जीविव रह ी हैं: “यह क 7 विक ज़मींदारी संपत्तिR का उन्मूलन उन जवाहरा ों की प्रर्थीाग अविवभाज्य ा को स्वचात्तिल रूप से समाप्त कर देना चाविहए सिजन्हें परिरवार द्वारा राजतिचन्ह क े रूप में माना गया र्थीा, इस थ्य को नजरअंदाज कर दे ा है विक कई बार प्रर्थीा चीजों की अपनी स्थिस्र्थीति को अति,क समय क जीविव रह ी हैं सिजसने इसे जन्म विदया। जैसा विक लॉड[7] एटविकन्सन द्वारा राव विकशोर सिंसह बनाम एमएसटी गहेनाबाई, AIR 1919 P.C.100, में बोड[7] की राय देने में अवलोविक विकया गया र्थीा। “यह देखना मुस्थिश्कल है विक क्यों एक परिरवार क े अनुरूप अभिभव्यक्त या विववतिक्ष से सहम नहीं होना चाविहए उस स्थिस्र्थीति क े पूण[7] ः बदल जाने क े पdा प्राचीन काल में मौजूद चीजों की श • द्वारा आवश्यक की गई प्रर्थीा का अवलोकन करना जारी रखना चाविहए। इसत्तिलए, अभिभव्यविक्त ‘cessat ratio cessat lex’ में सतिन्नविह सिसद्धां लागू नहीं हो ा है, जहां प्रर्थीा उन चीजों की श • को अति,क समय क जीविव रख ा है, सिजन्होंने इसे जन्म विदया र्थीा। इसीत्तिलए हम सोच े हैं विक इस क 7 को इस आ,ार पर उठाया गया विक आत्तिखरकार आरस्थिम्भक समय में राजतिचन्ह का कोई औतिचत्य नहीं र्थीा और यविद प्रारम्भ में कोई औतिचत्य र्थीा, ो यह जमींदारी सम्पत्तिR क े उन्मूलन क े पdा समाप्त हो गया, इसे बरकरार नहीं रखा जा सक ा। पारिरवारिरक प्रर्थीा क े प्रमाण क े मामले में, यह उस विवति, की कनीविक नहीं है जो प्रबल होगा परन् ु आचरण क े साक्ष्य जो सुस्प| ः साविब कर े हैं विक पार्हिटयां पुरानी प्रर्थीा को जारी रखना चाह ी र्थीीं।”
32. इस बा पर कोई संदेह या बहस विक क्या अविवभाज्य ा की प्रर्थीा एवं ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) ने प्रसंविवदाओं और विवलय को इस न्यायालय द्वारा प्र ाप सिंसह (उपरोक्त) में जारी रखी र्थीीं, सिजसमें राज्य सभा में विव,ेयक पेश विकया गया र्थीा ब उRराति,कार अति,विनयम की,ारा 5(ii) और बहस क े त्तिलए विवशेष संदभ[7] विदया गया र्थीा। इस विनण7य का प्रासंविगक भाग विनम्नानुसार है: "71. हिंहदू उRराति,कार अति,विनयम, 1956 (1956 का क ें द्रीय अति,विनयम 30) की,ारा 5 इस प्रकार है: “यह अति,विनयम लागू नहीं होगा- (I) * * * * (ii) कोई भी संपत्तिR जो भार सरकार क े सार्थी विकसी भी भार ीय राज्य क े शासक द्वारा अर्थीवा इस अति,विनयम क े प्रारंभ होने से पहले पारिर विकसी अति,विनयमन की श • द्वारा प्रविव| की गई विकसी भी प्रसंविवदा अर्थीवा समझौ े की श • क े अनुसार एकल उRराति,कारी क े पास आ ी है; (iii) * * * *”
72. मुल्ला क े हिंहदू विवति, में, 16 वां संस्करण पृष्ठ सं. 766 पर यह कहा गया है: "भार ीय राज्यों क े उRराति,कार क े अविवभाज्य सम्पत्तिRयों क अपवाद सीविम है, सिजसे विवशेष प्रसंविवदाओं अर्थीवा समझौ ों एवं सम्पत्तिRयों द्वारा विवविनयविम विकया जा ा है, उRराति,कार को विकसी भी पूव[7] विव,ान, और उप,ारा(iii) में उसिल्लत्तिख सम्पत्तिR एवं राजमहल कोष द्वारा विवविनयविम विकया जा ा है।"
73. 1954 में विबल की स्थिस्र्थीति में, यह स्प| रूप से राज्य सभा वाद- विववाद में 7115 और 7116 पृष्ठों पर इस रूप क े अन् ग[7] लाया गया र्थीा: " ब एक और खंड, उप-खंड(ii) है जो कह ा है: ‘कोई भी संपत्तिR जो भार सरकार क े सार्थी विकसी भी भार ीय राज्य क े शासक द्वारा अर्थीवा इस अति,विनयम क े प्रारंभ होने से पहले पारिर विकसी अति,विनयमन की श • द्वारा प्रविव| की गई विकसी भी प्रसंविवदा अर्थीवा समझौ े की श • क े अनुसार एकल उRराति,कारी क े पास आ ी है;’ यह खंड इसत्तिलए रखा गया है, क्योंविक जैसा विक हम जान े हैं, यह विक क े वल स्व ंत्र ा प्राविप्त क े पdा बड़े पैमाने पर राज्यों का एकीकरण हुआ है, और क ु छ समझौ े और प्रसंविवदाएं हैं जो सरकार और उन राज्यों क े शासकों क े मध्य प्रविव| की गई हैं, और क ु छ व्यवस्र्थीाएँ क े वल हाल ही में उनकी उRराति,कार क े क्रम क े संबं, में की गई है। यह एक विवशेष बा है। यह क्या कह ा है: ‘विकसी भी प्रसंविवदा या समझौ े को शासक द्वारा प्रविव| विकया गया’। स्वाभाविवक रूप से, यविद हमने हाल ही में 1947 या 1948 जैसे विकसी भी समझौ े में प्रविव| विकया है और बहु समय नहीं बी ा है, ो यह समुतिच नहीं है विक इस रह की एक सामान्य प्रक ृ ति क े अति,विनयमन क े द्वारा हमें क ु छ ऐसा करना चाविहए जो समझौ ों को शून्य कर देगा और प्रसंविवदाएं जो भार सरकार ने पूण[7] ः उन लोगों क े सार्थी सत्यविनष्ठापूव7क दज[7] की हैं और सिजनक े बल पर उन्होंने अपने राज्यों को भार क े सार्थी एकीक ृ करने की अनुमति देने क े त्तिलए सहमति प्रदान की र्थीी। बेशक, मैं इस बा से सहम हूं विक शायद यह पूरी रह से एक समाजवादी स्वरूप नहीं है अर्थीवा सिजसे आपने माँग की है, परन् ु जैसा विक मैं हमेशा कह रहा हूं, मैं यह अव,ारिर कर ा हूं विक हमें विवकास की प्रविक्रया से आगे बढ़ना होगा। मैं अस्प| कर्थीन नहीं कर ा।”
74. इसत्तिलए, यह विनतिd रूप से कहा जा सक ा है विक यह विनयम 1947-48 क े बाद भी जारी रहा।”
33. हिंहदू उRराति,कार विव,ेयक 22 विदसंबर 1954 को राज्यसभा में प्रस् ाविव विकया गया और इसक े ह खंड(iv) को विनम्न रूप से पढ़ा गया है: “(iv) कोई भी संपत्तिR जो उRराति,कार क े प्रर्थीाग विनयम अर्थीवा विकसी अनुदान या अति,विनयमन की श • क े द्वारा एकल उRराति,कारी क े त्तिलए अा ी है” हालाँविक, विव,ेयक को संसद की एक संयुक्त सविमति को विनर्हिद| विकया गया र्थीा, जो इस रिरपोट[7] 16 (Gazette of India Extraordinary dated 28.9.1955 Part II Sec.2, page 365, ‘8) में विनम्न रूप में अवलोविक विकया गया र्थीा: "संयुक्त सविमति की आगे यह राय है विक उपखंड(iv) में अपवाद भार ीय राज्यों क े उRराति,कारिरयों क े अविवभाज्य सम्पत्तिRयों क ही सीविम होना चाविहए, जो विवशेष प्रसंविवदाओं या समझौ ों द्वारा विवविनयविम है और…",ारा 5(ii), अपने व 7मान रूप में, संयुक्त सविमति द्वारा ऊपर उद्धृ अपनी राय क े अनुसरण में अनुशंसिस की गई र्थीी, सिजसका अर्थी7 है विक शासकों क े पास अविवभाज्य सम्पत्तिR र्थीी और इन क े उRराति,कार को विवशेष प्रसंविवदाओं अर्थीवा समझौ ों द्वारा विवविनयविम विकया गया र्थीा। इस प्रकार, चचा7 क े बाद, विव,ेयक में (iv) अपवाद को हटा विदया गया और विवति, क े रूप में अति,विनयविम नहीं विकया गया। इसका प्रभाव यह हुआ विक जमींदारों या उन जागीरों को रखने वालों क े मामले में ज्येष्ठ ा और अविवभाज्य सम्पत्तिR की प्रर्थीा विदनांक 17 जून 1956 से उRराति,कार अति,विनयम का पूव[7] प्रव 7न लागू नहीं होगा। यह एक ऐसा पहलू है सिजसे अक्सर ही उपेतिक्ष विकया जा ा है और एन. पद्मम्मा एवं अन्य बनाम एस. रामक ृ ष्ण रेड्डी एवं अन्य 17 ((2008) 15 SCC 517) में इस न्यायालय द्वारा विकए गए व्याख्या क े अनुपा की जांच कर े हुए इस पर विवचार नहीं विकया जा ा है सिजसमें यह अवलोविक विकया गया है विक ज्येष्ठ ा की विवति, भार में अब लागू नहीं है और इस रह क े प्राव,ान को संविव,ान क े अनुच्छेद 14 क े द्वारा असंवै,ाविनक होने क े त्तिलए अव,ारिर विकया जा सक ा है। एन. पद्मम्मा(उपरोक्त) दतिक्षण अफ्रीका क े सव च्च न्यायालय क े एक विनण7य को विनर्हिद| कर ा है। इस विनण7य द्वारा यह कहा जाना सुसंग हो सक ा है विक, इस मामले और मुद्दे को एक वृहद पीठ को विनर्हिद| विकया गया र्थीा, सिजसक े संदभ[7] को एन. पद्मम्मा एवं अन्य बनाम एस. रामक ृ ष्ण रेड्डी एवं अन्य 18 ((2015) 1 SCC 417) में मा. न्यायमूर्ति टी.एस. ठाक ु र द्वारा त्तिलत्तिख, ीन न्याया,ीशों की पीठ द्वारा विनण7य विदनांविक 23 सिस ंबर 2014 को विनण[2] विकया गया र्थीा। एन. पद्मम्मा(उपरोक्त) में यह विनण7य विवविनर्हिद| ः ज्येष्ठ ा की विवति, का उल्लेख नहीं कर ा है क्योंविक यह मुद्दा नहीं उठाया गया र्थीा। न ो वृहद पीठ द्वारा विवचार की गई संपत्तिR की अविवभाज्य ा की प्रर्थीा र्थीी।
34. विटक्का शत्रुसिज सिंसह एवं अन्य बनाम विÍग सुखजी सिंसह एवं अन्य 19 (ILR 2011 (1) Del 704) में विदल्ली उच्च न्यायालय ने स्प| रूप से, एक सारणीबद्ध रूप में, रिरयास ों और जमींदारों/जागीरों क े शासकों क े त्तिलए लागू ज्येष्ठ ा का सिसद्धां (प्राइमोगेविनचर का विनयम) और अविवभाज्य संपत्तिR क े बीच अं र रिरयास ों और ज़मींदारों/जागीरदारों क े शासकों क े त्तिलए विनम्न स्थिस्र्थीति यों में प्रयोज्य है: क्र.सं. भार ीय राज्य क े शासक एक जमींदारी क े,ारक
1. शासक (संप्रभु) राज्य और उसकी संपत्तिRयों का पूण[7] स्वामी होगा। उनकी संपत्तिR में विकसी और का कोई विह या विहस्सा नहीं होगा। एक जमींदारी का,ारक, जो विक एक भार ीय राज्य क े शासक से अलग है, एक अविवभाज्य संपत्तिR क े रूप में इसे अव,ारिर कर सक ा है। यविद यह पै ृक है, ो वह इसे परिरवार की ओर से,ारण कर ा है और यद्यविप विवभाजन का कोई अति,कार नहीं होगा, लेविकन उसकी रुतिच विकसी पूण[7] स्वामी से नहीं होगी, सिजसका एक संप्रभु शासक र्थीा। यह पारिरवारिरक संपत्तिR हो ी और उस संबं, में विनण7यों की श्रृंखला द्वारा समझे जाने वाले प्रकार की हो ी।
2. उRराति,कार क े त्तिलए एक विनयम क े रूप में लागू करने क े त्तिलए ज्येष्ठ ा को परिरकस्थिल्प विकया जायेगा। ज्येष्ठ ा, नहीं दोहराएगा, लागू करने क े त्तिलए परिरकस्थिल्प नहीं विकया जाएगा, लेविकन एक प्रर्थीा क े रूप में साविब करना होगा। 3 वह प्रर्थीम ः अपने राज्य को (15.8.1947) ीन विवषयों, बाह्य मामलों, संचार और रक्षा पर भार संघ क े त्तिलए एक प्रसंविवदा/समझौ े पर हस् ाक्षरिर करने वाला हो ा। और त्पdा - 26.01.1950 से पूव[7] अपने संघ राज्य अर्थीवा अन्य सरकार क े प्रशासन को रोकने वाले प्रसंविवदा अर्थीवा विवलय समझौ े द्वारा। वह प्रर्थीम स् म्भ में 3 से 5 मदों क े त्तिलए कोई भी एक पक्ष नहीं होगा। यह एक रफ पूव[7] शासक और दूसरी रफ जमींदारी क े बीच स्थिस्र्थीति का अं र स्र्थीाविप कर ा है। यह बदले में, प्रयोज्य विवति, क े त्तिलए सभी अं र बना ा है। 4 26 जनवरी, 1950 क े बाद, संविव,ान क े अनुच्छेद 366 क े ह उन्हें भार क े रा|्रपति द्वारा एक पूव[7] भार ीय राज्य क े शासक क े रूप में मान्य ा दी जाएगी।