U.P. Power Corporation Limited v. Ram Gopal

Supreme Court of India · 30 Jan 2020 · 2020 INSC 109
S. A. Bobde; B. R. Gavai; S. Ravindra Bhat
Civil Appeal No. 852 of 2020
2020 INSC 109
service_law appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that reinstatement granted to one candidate due to cancellation of appointment cannot be indiscriminately extended to others not similarly situated, especially where there is delay, and set aside the High Court's order reinstating Ram Gopal.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
समक्ष भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल/आपराति क अपीलीय न्यायक्षेत्र
सिसविवल अपील सं. 852 / 2020
(विवशेष अनुमति याति(का (सिसविवल) सं. 36253 / 2018 से उद्भू )
(ेयरमैन/प्रबं विनदेशक
उ.प्र. पावर कॉप रेशन लिलविमटेड एवं अन्य .... अपीलार्थी9(गण)
बनाम
राम गोपाल .... प्रत्यर्थी9

े सार्थी
आपराति क अपील सं. 204 / 2020
(विवशेष अनुमति याति(का (आपराति क) सं. 2014 / 2017 से उद्भू )
विनण@य
अनुमति प्रदान की गयी।
JUDGMENT

2. इस अपील को उ.प्र. पावर कॉप रेशन लिलविमटेड (ए स्मिEमनपश्चा “यूपीपीसीएल”) ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ खंडपीठ) की तिडवीजन बेन्( द्वारा पारिर आदेश 29.04.2016 विदनांविक को (ुनौ ी दे े हुए प्रार्थीविमक ा दी है, सिजसने विवद्व एकल न्याया ीश द्वारा पारिर आदेश 05.04.2016 विदनांविक को सही ठहराया सिजससे राम गोपाल (प्रत्यर्थी9) की रिरट याति(का को उनकी समाविS क े आदेश को अपाE कर े हुए और उसक े परिरणामEवरूप बहाली का विनदVश देने की अनुमति दी गई र्थीी। वाE विवक पृष्ठभूविम mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 2020 INSC 109

3. यूपीपीसीएल ने ( ुर्थी@ श्रेणी क े कविनष्ठ मीटर परीक्षक एवं विमस्त्री, सहायक और मीटर क ु ली/(ौकीदार क े क ु छ पदों क े लिलए (यन सं(ालिल विकया और विदनांक 31.08.1978 को काया@लय ज्ञापन क े माध्यम से परिरणाम घोविष विकए। मीटर क ु ली/(ौकीदार क े रूप में विनयुक्त होने क े लिलए प्रत्यर्थी9 सफल उम्मीदवारों में से एक क े रूप में (यविन हुआ। (यन प्रविeया में क ु छ अविनयविम ाओं क े परिरणामEवरूप यूपीपीसीएल ने विदनांक 03.11.1978 को इन (यनों को रद्द कर विदया और फलEवरूप विदनांक 07.11.1978 को विनयुक्त विकये गए सभी व्यविक्तयों की सेवाओं को समाS कर विदया।

4. एक अन्य सफल उम्मीदवार श्याम विबहारी लाल, सिजनकी सेवाओं को भी समाS कर विदया गया र्थीा, उसने त्काल उच्च न्यायालय में गुहार लगाई सिजसने विदनांक 26.10.1989 को उसकी रिरट याति(का का अवलोकन कर े हुए अनुमति दी गई विक सेवा समाविS का कोई कारण नहीं ब ाया गया र्थीा। यूपीपीसीएल ने असफल रूप से एक इंट्राकोट@ अपील दायर की, और उसक े पश्चा सिसविवल अपील सं. 7123/1993 (उ.प्र. राज्य विवद्यु बोड@ एवं अन्य बनाम श्याम विबहारी लाल) क े माध्यम से इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उक्त अपील को आदेश विदनांविक 22.11.1993 क े माध्यम से अनुमति दी गई र्थीी सार्थी ही यह अवलोकन विकया गया र्थीा विक पय@वसान का कारण Eवयं आदेश पर “एकदम Eपष्ट” र्थीा, अर्थीा@ ् “काय@(ालन कम@(ारिरयों क े (यन क े परिरणाम को रद्द करना” और मामला दनुसार गुणावगुण पर विनपटान क े लिलए उच्च न्यायालय को प्रेविष विकया गया र्थीा।

5. इसक े पश्चा, उच्च न्यायालय की तिडवीजन बेन्( ने श्याम विबहारी लाल क े मामले पर विव(ार विकया और अव ारिर विकया विक यद्यविप रिरट याति(का गुणावगुण क े आ ार पर खारिरज करने क े लिलए उत्तरदायी र्थीा, हालांविक, उन अजीब परिरस्मिEर्थीति यों पर विव(ार कर े हुए सिजनमें श्याम विबहारी लाल ने पहले ही 17 साल क यूपीपीसीएल की सेवा की र्थीी परिरणामEवरूप वह बेरोजगार हो सक ा है और यह बहु कठोर Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरणाम हो सक ा है। विदनांविक 30.05.1997 क े आदेश का प्रासंविगक काय@कारी भाग इस प्रकार है: "ऊपर जो ((ा@ की गई है उस दृविष्ट में यह सत्य है विक याति(काक ा@ खारिरज होने क े उत्तरदायी है परन् ु मामले की अजीब परिरस्मिEर्थीति यों में और इस थ्य क े मद्देनजर विक याति(काक ा@ विपछले सत्रह वषt से सेवा में जारी है, इस E र पर उसे बेरोजगार कर देना बहु ही कठोर होगा। अ ः हम यह उपबं करेंगे विक क े वल विवरो ी पक्ष सेवा ही उसक े सेवा की विनरं र ा पर विव(ार कर सक े हैं और ऐसा उपयुक्त विनण@य ले सक े हैं जो मामले क े थ्यों और परिरस्मिEर्थीति यों में शीघ्राति शीघ्र उति( समझा जा सक े ।" (प्रभाव वर्धि )

6. मुकदमेबाजी क े प्रारंभिभक दौर क े पश्चा सिजसमें श्याम विबहारी लाल ने 1989 में उच्च न्यायालय से राह प्राS की र्थीी, व @मान प्रत्यर्थी9 द्वारा जुलाई, 1990 में रिरट याति(का सं. 7897/1990 को भी दायर विकया गया, सिजसमें विदनांविक 07.11.1978 क े आदेश को आक्षेविप कर े हुए उनकी सेवाओं को समाS विकया गया। विदनांक 05.04.2007 को संक्षेप में इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े विवद्वान एकल न्याया ीश द्वारा इस आ ार पर प्रत्यर्थी9 की रिरट याति(का को अनुमति दी गयी विक श्याम विबहारी लाल का मामला उच्च न्यायालय क े विनण@य विदनांविक 26.10.1989 द्वारा “(ारों ओर से आच्छाविद ” र्थीा।

7. व्यभिर्थी यूपीपीसीएल ने विवशेष अपील सं. 643/2007 को प्रार्थीविमक ा दी, सिजसे तिडवीजन बेन्( द्वारा आक्षेविप आदेश 29.04.2016 विदनांविक क े माध्यम से खारिरज कर विदया गया। यद्यविप न्यायालय ने यह ध्यान विदया विक विवद्व एकल न्याया ीश द्वारा अवलस्मिम्ब 1989 क े आदेश को इस न्यायालय द्वारा अपाE कर विदया गया र्थीा और इस मामले पर नए सिसरे से विव(ार करने क े दौरान एक समस्मिन्व न्यायपीठ ने श्याम विबहारी लाल क े मामले को विकसी गुणागुण से रविह अव ारिर विकया र्थीा; विफर भी इसने प्रति पाविद साम्यापूण@ विव(ारों पर बल विदया जो उसक े परिरणामEवरूप सेवा में बने रहने क े लिलए श्याम विबहारी लाल क े मामले में सहाय ार्थी@ Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दबाए गए र्थीे। इस प्रकार, तिडवीजन बें( ने यूपीपीसीएल की अपील को खारिरज कर विदया और यह अभिभविन ा@रिर विकया: "प्रत्यर्थी9 का मामला उसी क े अनुरूप स्मिEर्थी उसकी विनयुविक्त क े समान (यन से संबद्ध है और प्रत्यर्थी9 की विनयुविक्त को रद्द करने क े eम में कोई कारण विनर्दिदष्ट नहीं विकया गया है। इसलिलए, विवद्वान एकल न्याया ीश ने रिरट याति(का की अनुमति दे े समय प्रति वादी को उपयु@क्त विनण@य और आदेश की समान ा को सही ढंग से विवE ारिर विकया है.” पक्षों क े क @

8. अवै समाविS क े प्रत्यर्थी9 क े दावे का जोरदार रीक े से खंडन कर े हुए, यूपीपीसीएल ने तिडवीजन बेन्( क े आदेश 29.04.2016 विदनांविक सार्थी ही सार्थी प्रत्यर्थी9 द्वारा उच्च न्यायालय क े समक्ष आरंभ की गई अवमानना काय@वाही दोनों क े विवरुद्ध इस सिसविवल अपील को प्रार्थीविमक ा दी है। यूपीपीसीएल ने कड़ी मेहन से क @ विदया है विक श्याम विबहारी लाल क े मामले और राम गोपाल क े व @मान मामले क े बी( थ्यों में कोई सहसम्बद्ध ा अर्थीवा कोई समान ा नहीं है।

9. दूसरी ओर, प्रत्यर्थी9 की ओर से प्रE ु अति वक्ता ने तिडवीजन बें( क े फ ै सले का ब(ाव कर े हुए कहा विक श्याम विबहारी लाल और राम गोपाल दोनों को समान काया@लय ज्ञापन क े माध्यम से भ 9 विकया गया र्थीा, और उनकी सेवाओं को समान आदेश क े माध्यम से समाS कर विदया गया र्थीा। यह क @ विदया गया र्थीा विक एक अभ्यर्थी9 क े लिलए जो स( है वही अन्य क े लिलए होना (ाविहए; और यह एक ऐसी स्मिEर्थीति को जन्म दे ी है जहां बेहद असमान स्मिEर्थीति यों में समान पाये गए व्यविक्त का समाS हो जाना अन्यायपूण@ और असमान होगा। विवश्लेषण

10. पक्षों क े विवद्व अति वक्ता को विव(ारणीय अवति क सुनने क े पश्चा, हम पा े हैं विक उच्च न्यायालय का आक्षेविप आदेश कानूनन अपुष्ट और कम से कम ीन प्रत्यक्ष कारणों से इसे विनरं र नहीं रखा जा सक ा है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA i) संवाद-रविह होने वाले समाविS आदेश का त्रुविटपूण@ विनष्कष@

11. प्रर्थीम, तिडवीजन बें( ने यह पाया विक “प्रत्यर्थी9 की विनयुविक्त रद्द करने क े eम में कोई कारण विनर्दिदष्ट नहीं विकया गया है”, Eपष्ट ः त्रुविटपूण@ है। इस न्यायालय ने पूव@ में ही सिसविवल अपील सं. 7123/1993 में पारिर आदेश 22.11.1993 विदनांविक को श्याम विबहारी लाल क े मामले में उच्च न्यायालय की कारण-रविह समाविS को पा े हुए रद्द कर विदया र्थीा और यह अव ारिर विकया विक समाविS आदेश वाE व में एक सशब्द आदेश र्थीा, सिजसमें समाविS का एकदम Eपष्ट और Eपष्ट ः कारण विदया गया र्थीा। इस प्रकार उच्च न्यायालय का विनष्कष@ विनEसंदेह इस न्यायालय द्वारा विकये गए अवलोकन गल हैं अ ः आक्षेविप आदेश इस एकाकी गणना पर अपाE विकया जाना (ाविहए। ii) श्याम विबहारी लाल और राम गोपाल क े बी( समान ा का अभाव

12. विद्व ीय, Eपष्ट ः उच्च न्यायालय यह विनष्कष@ विनकालने में भूल कर दी है विक प्रत्यर्थी9 का दावा श्याम विबहारी लाल क े मामले में अपने विपछले विनण@य क े (ारों ओर से कमजोर हो गया र्थीा। अवलंविब विनण@य 30.05.1997 विदनांविक से Eपष्ट या यह विन ा@रिर विकया विक रिरट याति(का में कोई गुणावगुण नहीं र्थीा और यह विक श्याम विबहारी लाल का दावा “खारिरज विकए जाने क े लिलए दायी” र्थीा। यह क े वल लंविब मुकदमेबाजी और न्यायालय क े अं रिरम विनदVशों क े कारण र्थीा विक श्याम विबहारी लाल ने यूपीपीसीएल को 17 वष@ सेवा प्रदान की र्थीी। इन न्यायसंग विव(ारों पर ध्यान दे े हुए और विकसी भी मामले क े विवति क अति कार क े रूप में नहीं, उच्च न्यायालय ने विनयोक्ता से रोजगार में प्रति ारण क े लिलए उनक े मामले पर सहानुभूति पूव@क विव(ार करने का आग्रह विकया। उच्च न्यायालय क े इस विनष्कष@ पर विकसी भी पक्ष द्वारा अपील नहीं की गई र्थीी और विनEसंदेह अंति म रूप प्राS कर लिलया है। इसलिलए, विवति में यह Eपष्ट है विक श्याम विबहारी लाल की समाविS कानूनी र्थीी, और उन्हें सेवा में विनरं र ा का कोई अति कार नहीं र्थीा, व @मान मामले में मांगी गई बहाली को अक े ले Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA छोड़ दें। इस प्रकार एकमात्र प्रश्न जो ब( ा है वह यह है विक क्या प्रत्यर्थी9 राम गोपाल समरूप ा का अनुसरण कर सक े हैं?

13. प्रारम्भ में, यह Eपष्ट है विक श्याम विबहारी लाल और राम गोपाल की र्थीोड़ी समान ा है। जबविक इसक े पूव@ वह सत्रह वषt क सेवा में रहा (1978 में अगE से नवंबर क े बी( एक संतिक्षS अवति को छोड़कर) और अपने मामले क े नख से दं क लड़ाई लड़ी र्थीी, प्रत्यर्थी9 1978 से यूपीपीसीएल की नौकरी में नहीं रहा है। श्याम विबहारी लाल क े मामले में थ्य स्मिEर्थीति अविद्व ीय र्थीी और राम गोपाल से विबल्क ु ल अलग र्थीी, और यहाँ उत्पन्न सम ा का अनुदान अर्थीवा लाश का कोई कारण नहीं है। अन्यर्थीा, यह सामान्य विवति की कसौटी पर कसा हुआ है जो न्यायसंग ा व्यविक्तलक्षी में काय@ कर ा है न विक इसक े सापेक्ष। इसलिलए, श्याम विबहारी लाल और राम गोपाल (प्रत्यर्थी9) क े मामले क े बी( समान ा का कोई विवE ार नहीं हो सक ा है। iii) रिरट याति(का दायर करने में असामान्य देरी

14. अं ः, कई वषt दीघ@कालीन विवलम्ब की अनदेखी अर्थीवा माफ नहीं की जानी (ाविहए। 1978 में उनकी विनयुविक्त क े महीनों क े भी र प्रत्यर्थी9 की सेवाएं समाS कर दी गई र्थीी। कभिर्थी रूप से, 1982 में प्रत्यर्थी9 ने एक प्रत्यावेदन विदया और कानूनी नोविटस क े सार्थी यूपीपीसीएल में नौकरी की, हालांविक जब कार@वाई का कारण उत्पन्न हुआ और उसने इसक े विनवारण (1990 में) की लाश करने क े लिलए इस रह क े कमजोर प्रयास क े बी( अं र को कम करने क े लिलए (ुना।

15. एक अलग दृविष्टकोण से भी, यह Eपष्ट है विक प्रत्यर्थी9 ने Eर्थीायी विवति क सिसद्धां ों क े लिलए म लब बहु कम विदखाया है। यहां क विक यविद प्रत्यर्थी9 द्वारा सेवाओं की समाविS को (ुनौ ी देने वाला सिसविवल वाद दायर विकया गया है, ो विनEसंदेह 1990 में सीमाओं द्वारा बाति कर विदया गया होगा। समान स्मिEर्थीति में जहां अपीलार्थी9 ने अपने कविनष्ठों क े प्रोन्नति को विवलम्ब ः (ुनौ ी दी और पी.एस. सदाभिशवEवामी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA बनाम विमलनाडु राज्य ((1975) 1 एससीसी 152) क े मामले में इस न्यायालय द्वारा यह अव ारिर विकया गया: “2..... यविद अपीलक ा@ इससे व्यभिर्थी र्थीा, ो उसे वष@ 1957 में भी न्यायालय का दरवाजा खटखटाना (ाविहए र्थीा, उसक े द्वारा विकए गए दो प्रति वेदन का कोई भी परिरणाम नहीं प्राS हुआ। कोई भी इस मामले पर अनदेखी नहीं कर सक ा और वष@ 1971 में ढील देने पर सवाल उठा सक ा है।...……..इसक े प्रभाव ः वह टूटी हुई कविड़यों को जोड़ देना (ाह ा है। सरकार क े लिलए यह विव(ार करना बेहद कविठन है विक क्या वष@ 1957 में अपीलार्थी9 क े पक्ष में विनयमों में विकसी प्रकार की ढील दी जानी (ाविहए र्थीी। 1957 में प्र(लिल स्मिEर्थीति यों को अब पुनप्र@E ुति नहीं की जा सक ी।.....यह नहीं है विक न्यायालयों क े लिलए अनुच्छेद 226 क े अ ीन अपनी शविक्तयों का प्रयोग करने क े लिलए कोई परिरसीमा अवति है और न ही यह विक ऐसा कोई मामला हो सक ा है जहां न्यायालय एक विनतिश्च अवति क े बी जाने क े पश्चा ् विकसी मामले में हE क्षेप नहीं कर सक े। परन् ु न्यायालयों क े लिलए Eवविववेक की यह एक आवाज और ज्ञानपूण@ प्रयोग होगा जो अनुच्छेद 226 क े ह अपनी असा ारण शविक्तयों क े प्रयोग से इनकार करने जो उन व्यविक्तयों क े मामले में राह क े लिलए अविवलम्ब नहीं आ े और जो खड़े होकर (ीजों को होने दे े हैं और विफर न्यायालय में बासी दावों को आगे बढ़ाने और सुलझाए गए मामलों को सुलझाने की कोभिशश कर े हैं...….. ”

16. जबविक यह स( है विक विनब@न् न भार क े संविव ान क े अनुच्छेद 32 या 226 क े ह काय@वाही पर कड़ाई से लागू नहीं हो ी है, विफर भी समय की अनुति( (ूक क े बाद ऐसे अति कारों को लागू नहीं विकया जा सक ा है। अEपष्टीकृ विवलंब और अकारण अति विवलंब का विव(ार हमेशा रिरट कायt में प्रासंविगक होगा, और रिरट न्यायालय Eवाभाविवक रूप से उन लोगों की रक्षा क े लिलए अपने विववेका ीन क्षेत्राति कार का प्रयोग करने में अविनच्छ ु क होना (ाविहए सिजन्होंने अनुति( रीक े से अनदेखी की है और गैरकानूनी काय@ करने की अनुमति दी है। हाभिशए पर बैठे लोगों को न्यायालय में दखल और उनकी सुविव ा पर उनक े अति कारों क े लिलए रोने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है और स क @ नागरिरकों को क े वल अवसरवाविदयों क े सार्थी एक जैसा व्यवहार नहीं करना (ाविहए। कई अवसरों पर, यह पुनक @ र्थीन विकया गया है विक समय की अं र्दिनविह सीमाएँ हैं सिजनक े भी र रिरट उप(ार लागू विकए जा सक े हैं। एसएस बालू बनाम क े रल राज्य ((2009 2 एससीसी 479) में इस न्यायालय ने यह अवलोकन विकया: Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ”17. विवति का यह भी सुEर्थीाविप सिसद्धां है विक “विवलंब न्यायसंग ा को पराE कर दे ा है.... यह अब एक तिघसे-विपटे विनयम हैं विक जहां रिरट याति(काक ा@ दीघ@कालीन विवलंब क े बाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा ा है, वहां राह क े लिलए की गई प्रार्थी@ना विवलंब क े आ ार पर उन्हें अEवीकार विकया जा सक ा है और इस थ्य क े अति विवलंब क े विनरपेक्ष विक वे समान रूप से अन्य उम्मीदवारों क े लिलए स्मिEर्थी हैं जो विनण@य का लाभ प्राS कर े हैं। ”

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17. उसी प्रकार, विवजय क ु मार कौल बनाम भार संघ ((2012) 7 एससीसी 610) में इस न्यायालय ने उन अभ्यर्थिर्थीयों क े दावे पर विव(ार कर े हुए, जो योग्य ा में उच्च होने क े बावजूद, योग्य ा क े आ ार पर बहु अति क समान ा क े अपने अति कार का प्रयोग विकया, जो हालांविक योग्य ा में कम र्थीे, लेविकन अपने अति कारों क े लिलए परिरश्रम कर रहे र्थीे, इस न्यायालय यह अवलोकन विकया विक: ”27......याति(का की रो(क ा में न्याय अर्थीवा अन्याय क े सं ुलन क े विव(ारग या विवलंब और अति विवलंब क े आ ार पर इसे अEवीक ृ करने का दातियत्व बन जा ा है। यह बहु महत्वपूण@ बा है विक एक समय में न्यायसंग ा जो एक क े पक्ष में मौजूद र्थीी, क ु ल महत्वहीन हो जा ी है और समय बी ने क े सार्थी विवलुS होने का माग@ प्रशE कर ी है।”

18. हालांविक, हम यह जोड़ने की शीघ्र ा कर सक े हैं विक ये सिसद्धां, उन विनण@यों पर लागू नहीं हो सक े हैं, जो इनक े सापेक्ष हैं। राज्य और उसक े सा न Eवयं इस प्रकार क े मामलों की श्रेणी में सभी समान कम@(ारिरयों को न्यातियक कर्थीन का विवकसिस लाभ प्रदान करने क े लिलए प्रत्येक व्यविक्त को मजबूर विकए विबना व्यविक्तग रूप से अदाल ों क े दरवाजे खटखटाना अपेतिक्ष है। यह विवभेद व्यविक्तत्व एवं विदये गए विनण@य क े सापेक्ष लंबन और अति विवलंब की काय@विवति क े बी( उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अरविंवद क ु मार श्रीवाE व ((2015) 1 एससीसी 347) क े मामले में Eपष्ट ः ग्रहण विकया गया है जो विक इस प्रकार प्रति पाविद विकया जा रहा है: “ 22.1. सामान्य विनयम यह है विक जब कम@(ारिरयों क े एक विवशेष समूह को न्यायालय द्वारा राह दी जा ी है, ो अन्य सभी अभिभन्न Eवरूप वाले व्यविक्तयों को उस लाभ का विवE ार करक े समान व्यवहार करने की आवश्यक ा हो ी है। ऐसा नहीं करने से विवभेद होगा और यह भार क े संविव ान क े अनुच्छेद 14 का अति eमण होगा। इस सिसद्धां को सेवा मामलों में अति क सशक्त रूप से लागू करने Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की आवश्यक ा है क्योंविक इस न्यायालय द्वारा समय-समय पर विवकसिस विकए गए सेवा न्यायशास्त्र क े अनुसार सभी समान रूप से स्मिEर्थी व्यविक्तयों क े सार्थी समान व्यवहार विकया जाना (ाविहए। इसलिलए, सामान्य विनयम यह होगा विक क े वल इसलिलए विक अन्य समान रूप से स्मिEर्थी व्यविक्तयों ने पूव@ में अदाल का दरवाजा नहीं खटखटाया र्थीा, उनक े सार्थी अलग व्यवहार नहीं विकया जाना (ाविहए।

22.2. हालांविक, यह सिसद्धां अति विवलंब और विवलंब सार्थी ही सार्थी मौन Eवीक ृ ति क े रूप में अच्छी रह से मान्य ा प्राS अपवादों क े अ ीन है। वे व्यविक्त जो अपने मामलों में अनुति( कार@वाई को (ुनौ ी नहीं दे े र्थीे और उसी में सं ुष्ट हो जा े र्थीे और लंबे समय क े बाद क े वल इस कारणवश जाग े र्थीे विक उनक े समकक्ष समय क े पूव@ ही न्यायालय से संपक @ कर (ुक े र्थीे और वे अपने प्रयासों में सफल हो गए, ब ऐसे कम@(ारी यह दावा नहीं कर सक े विक समान रूप से स्मिEर्थी व्यविक्तयों क े मामले में विदए गए विनण@य का लाभ उन्हें विदया जाए। उन्हें हाभिशए पर बैठे व्यविक्त और अति विवलंब एवं विवलंब क े रूप में माना जाएगा, और/या अति ग्रहण, उनक े दावे को खारिरज करने क े लिलए एक वै आ ार होगा।

22.3. हालाँविक, यह अपवाद उन मामलों में लागू नहीं हो सक ा है जहां न्यायालय द्वारा सुनाया गया विनण@य सभी समान रूप से स्मिEर्थी व्यविक्तयों को लाभ देने क े इरादे से र्थीा, (ाहे वे न्यायालय से संपक @ करें अर्थीवा नहीं। इस रह क े कर्थीन क े सार्थी सभी समान रूप से स्मिEर्थी व्यविक्तयों को इसका लाभ विवE ारिर करने क े लिलए प्राति कारिरयों पर दातियत्व डाला जा ा है। ऐसी स्मिEर्थीति ब हो सक ी है जब विनण@य का विवषय-वE ु नीति ग मामलों पर छ ू ा है, जैसे विनयविम ीकरण की योजना (देखें क े.सी. शमा@ बनाम भार संघ [क े सी शमा@ बनाम भार संघ, (1997) 6 एससीसी 721: 1998 एससीसी (एल एंड एस) 226])। दूसरी ओर, यविद न्यायालय का विनण@य विवरो ी क े पक्ष में र्थीा, सिजसमें यह अव ारिर विकया गया र्थीा विक उक्त विनण@य का लाभ न्यायालय क े समक्ष पक्षकारों को उपार्जिज होगा और ऐसा आशय विनण@य में Eपष्ट रूप से कहा गया है अर्थीवा विनण@य की भाषा इस आशय से प्राS विकया जा सक ा है, जो लोग उन्हें विदए गए उक्त विनण@य का लाभ प्राS करना (ाह े हैं, उन्हें सं ुष्ट करना होगा विक उनकी याति(का या ो अति विवलंब एवं विवलंब अर्थीवा अति ग्रहण से ग्रE नहीं है।"

19. श्याम विबहारी लाल को सेवा में प्रति ारण करने क े लिलए उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आदेश में, विनण@य क े सापेक्ष कोई संघटक प्राS नहीं है। अ ः उपयु@क्त उद्धृ अपवाद प्रत्यर्थी9 क े ब(ाव में नहीं आ ा है। यह उल्लेख करना भी उति( है विक न ो यह क @ विकया गया है और न ही अभिभलेख पर मौजूद सामग्री से यह Eपष्ट है विक प्रत्यर्थी9 विकसी भी सामासिजक अर्थीवा विवत्तीय अक्षम ा क े वाE े समय पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाने में असमर्थी@ र्थीा। यविद ऐसा हो ा ो उसे विनबा@ विवति क उपाय का लाभ उठाना (ाविहए र्थीा और यर्थीासमय अपनी भिशकाय ों को अभिभव्यक्त Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA करना (ाविहए र्थीा। इसक े बजाय, वह इस पूव@ ारणा क े ह प्र ी हो ा है विक समाविS का आदेश अवै है, फलEवरूप उसे पुनर्दिनयुविक्त करने का अति कार है, और वह अपने Eवेच्छानुसार उस पर क @ कर सक ा है। इन ीन ारणाओं में से कोई भी सत्य नहीं है, जैसा विक पूव@ में हमारे द्वारा सविवE ारिर है। विनष्कष@

20. उपरोक्त कारणों से, अपील को अनुमति प्रदान की जा ी है। विवद्वान एकल न्याया ीश द्वारा विदनांक 05.04.2007 को विदए गए आक्षेविप आदेश क े सार्थी ही सार्थी तिडवीजन बें( क े आदेश 29.04.2016 विदनांविक को बरकरार रख े हुए, इसे अपाE विकया जा ा है। परिरणामEवरूप प्रत्यर्थी9 की रिरट याति(का खारिरज की जा ी है. अगली कड़ी क े रूप में, उच्च न्यायालय क े अं रिरम आदेश 02.11.2016 विदनांविक क े अवमानना सं. 1271/2016 जो एसएलपी (विe.) सं. 2014/2017 में (ुनौ ी क े अ ीन है, को भी रद्द विकया जा ा है और अवमानना याति(का खारिरज कर दी गई है। लाग क े रूप में कोई आदेश नहीं। (भार क े मुख्य न्याया ीश, एस. ए. बोबड़े)......................................... (न्यायमूर्धि, बी. आर. गवई)......................................... (न्यायमूर्धि, सूय@कान् ).......................................... नई विदल्ली विदनांक: 30.01.2020 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA