Sardar Ali Khan v. State of Uttar Pradesh

Supreme Court of India · 24 Jan 2020
Mohan M. Shanbagoudar; R. Subhash Reddy
Criminal Appeal No 161 of 2020 @ SLP (Crl) No 3627 of 2018
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court allowed the criminal appeal and quashed the criminal proceedings against the appellant, holding that initiating criminal cases in a pending civil property dispute with delayed complaints amounts to abuse of process.

Full Text
Translation output
प्रति वेद्य
समक्ष भार ीय सव च्च न्यायालय
आपराति क अपीलीय न्यायक्षेत्र
आपराति क अपील सं. 161/2020
(SLP (क्रि&.) सं. 3627 / 2018 से उद्भू )
सरदार अली खान ... अपीलार्थी2
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य

े माध्यम से प्र ान सति8व
गृह क्रिवभाग एवं अन्य .... प्रत्यर्थी2
क्रिन र्ण? य
न्यायमूर्ति , आर. सुभाष रेड्डी
JUDGMENT

1. अनुमति प्रदान की गयी।

2. यह आपराति क अपील अभिभयुक्तों द्वारा दायर भिशकाय वाद सं. 708/2012, जो क्रिक र्थीाना- कायमगंज, जिजला-फर्रु ? खाबाद, उत्तर प्रदेश में भा.दं.सं. की ारा 418, 419, 420, 467, 468 और 471 क े ह पंजीक ृ है जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारिर mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आदेश 12 मा8?, 2018 क्रिदनांक्रिक क े आपराति क प्रकीर्ण? आवेदन सं. 5684/2016 द्वारा व्यभिर्थी हैं। उपयु?क्त आक्षेक्रिप आदेश द्वारा, अपीलार्थी2 द्वारा दंड प्रक्रि&या संक्रिह ा की ारा 482 क े ह दायर आवेदन को उच्च न्यायालय द्वारा खारिरज कर क्रिदया गया।

3. हमने अपीलार्थी2 की ओर से प्रस् ु क्रिवद्वान अति वक्ता श्री प्रशां भूषर्ण क े सहायक अति वक्ता श्री ओमानकु ट्टन क े.क े. और श्री 8ेरिरल तिडसूजा और क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2/प्रति वादी की ओर से प्रस् ु क्रिवद्वान अति वक्ता श्री सुदश?न राजन को सुना।

4. यह क्रिववाद प्लॉट सं. 102 (0.101 हेक्टेयर माप े हुए) जिजसे याक्रिहयापुर, पोस्ट कायमगंज, परगना क ं क्रिपल, हसील कायमगंज, जिजला फर्रु ? खाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थिस्र्थी प्लॉट सं. 102/2 क े रूप में पुनना?मांक्रिक क्रिकया गया है, से संबंति है। मूल ः उपयु?क्त भूखंड क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 क े क्रिप ा स्वग2य फहीम अली खान क े स्वाक्रिमत्व में र्थीा जो क्रिक क्रिदनांक 5 जनवरी, 1994 को पंजीक ृ र्थीा और अपीलार्थी2 क्रिदनांक्रिक 29 क्रिदसंबर, 1993 को पंजीक ृ क्रिब&ी क्रिवलेख द्वारा इस भूखंड की खरीद का दावा कर ा है। फहीम अली खान का क्रिदनांक 3 क्रिदसंबर, 1997 को क्रिन न हो गया और क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 स्वग2य फहीम अली खान क े उत्तराति कारिरयों में से एक है। फहीम अली खान की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj मृत्यु पर क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 को क्रिवरास में क्रिमली संपत्तित्तयों क े त्तिलए क्रिदनांक 16 नवंबर, 1998 को दात्तिखल खारिरज क्रिकया गया र्थीा।

5. क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 द्वारा मूल वाद सं. 160/2008 दायर क्रिकया गया जो वाद सं.160/2008 में फर्रु ? खाबाद जिजले में न्यातियक मजिजस्ट्रेट, कायमगंज फाइल पर लंक्रिब है। उपयु?क्त वाद में क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 ने क्रिनम्नत्तिलत्तिख राह का दावा क्रिकया है: - '' (ए) यह क्रिक आवेदक क े मुकदमे को प्रति वादी क े क्रिवरूद्ध स्र्थीायी क्रिनषे ाज्ञा देने क े क्रिनदnशों क े सार्थी यह घोक्रिष क्रिकया जाना 8ाक्रिहए क्रिक प्रति वादी को क्रिववाक्रिद संपत्तित्त क े समस् अर्थीवा उसक े क्रिकसी भी क्रिहस्से से अवै और जबरन आवेदक को क्रिनरूद्ध कर क्रिदया जाना 8ाक्रिहए और आवेदक को कब्जे और शांति पूर्ण? स्वाक्रिमत्व क े सार्थी हस् क्षेप नहीं करना 8ाक्रिहए। (एए) क्रिब&ी क्रिवलेख क े तिड&ी का क्रिनरस् ीकरर्ण 29.12.1993 क्रिदनांक्रिक, जो क्रिदनांक 25.01.1994 को पंजीकरर्ण क े त्तिलए प्रस् ु क्रिकया गया र्थीा और जिजसकी फोटोप्रति क े पृष्ठ सं. 65 पर 111-252 लोगों पर &म सं. 22 में उप रजिजस्ट्रार कायमगंज क े काया?लय में, पत्र सं.[1] में कवर सं. 1156 पृष्ठ सं. 85/93 &म सं. 22 पर क्रिदनांक 20.01.1994 को दज? की गई र्थीी, ति8ली ? ने प्रति वादी क े क्रिवरूद्ध और अपीलार्थी2 क े पक्ष में आदेभिश क्रिकया और उप रजिजस्ट्रार काया?लय को दनुसार प्रक्रिवक्रिuयां बनाने को क्रिनदnभिश क्रिकया जाना 8ाक्रिहए। (बी) यह क्रिक प्रति वादी आवेदक को वाद व्यय का संदाय करे। (सी) यह क्रिक आवेदक को समुति8 समझे जाने वाली कोई अन्य राह अनुदाक्रिन हो सक ी है।'' Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj

6. उसी भूखंड क े संबं में, अपीलार्थी2 ने भी मूल वाद सं. 474/2008 में स्र्थीायी क्रिनषे ाज्ञा क े त्तिलए एक वाद दायर क्रिकया, जिजसमें अपीलार्थी2 द्वारा उपयु?क्त भूखंड पर क्रिकए गए क्रिनमा?र्णों का ध्वस् ीकरर्ण करने से क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 को रोक क्रिदया गया। उक्त वाद फर्रु ? खाबाद जिजले में न्यातियक मजिजस्ट्रेट, कायमगंज की फाइल पर वाद सं. 474/2008 में भी लंक्रिब है। पूव क्त मुकदमों को संयोजिज क्रिकया गया र्थीा और पक्षों द्वारा दायर क्रिकए गए अन् रव 2 आवेदनों में, क्रिववाद में भूक्रिम क े संबं में यर्थीास्थिस्र्थीति बनाए रखने क े त्तिलए एक सामान्य आदेश पारिर क्रिकया गया र्थीा। अं रिरम आदेश क े क्रिवरूद्ध, मामलों को अपीलार्थी2 द्वारा दायर जिसक्रिवल प्रकीर्ण? संख्याओं 30 और 27/2009 जबक्रिक प्रत्यर्थी2 सं. 2 द्वारा जिसक्रिवल प्रकीर्ण? संख्याओं 28 और 29/2009 दायर की गयी र्थीी, को त्तिलया गया र्थीा। यह कहा गया है क्रिक उक्त सभी अपीलों का क्रिनर्ण?य अपर जनपद न्याया ीश द्वारा एक सामान्य आदेश द्वारा क्रिकया गया र्थीा और अपीलार्थी2 द्वारा दायर क्रिनषे ाज्ञा क े त्तिलए आवेदन की अनुमति दी गई र्थीी और क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 द्वारा दायर आवेदन को खारिरज कर क्रिदया गया र्थीा, जिजसक े क्रिवरूद्ध जिसक्रिवल प्रकीर्ण? रिरट याति8काओं क े माध्यम से मामलों को आगे बढ़ाया गया र्थीा जिजन्हें उच्च न्यायालय क े समक्ष लंक्रिब ब ाया गया है और इसमें कोई अं रिरम आदेश पारिर नहीं क्रिकया गया है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj

7. क्रिदनांक 10 अप्रैल, 2012 को अपीलार्थी2 क े भाई वसीम अली खान ने क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 क े क्रिवरूद्ध नामान् रर्ण फाइल से मूल क्रिब&ी क्रिवलेख 8ुराने का आरोप लगा े हुए दं.प्र.सं. की ारा 200 क े ह भिशकाय दज? की। क्रिदनांक 20 जिस ंबर, 2012 को क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 ने अपीलार्थी2 और वसीम अली खान क े क्रिवरूद्ध भिशकाय दज? की है। ऐसे भिशकाय पर, अपीलार्थी2 और अन्य क े क्रिवरूद्ध भा.दं.सं. की ारा 418, 419, 420, 467, 468 और 471 क े ह कभिर्थी अपरा क े त्तिलए मामला दज? क्रिकया गया र्थीा। प्रारंभ ः, अपीलार्थी2 ने दोषमुक्रिक्त क े त्तिलए एक आवेदन दायर क्रिकया जिजसे अस्वीकार कर क्रिदया गया र्थीा। त्पश्चा, उसने उक्त काय?वाही और मजिजस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश को रद्द करने क े त्तिलए दं.प्र.सं. की ारा 482 क े ह आवेदन दायर क्रिकया है। दायर क्रिकए गए ऐसे आवेदन को उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आक्षेक्रिप आदेश को उसी प्रकार खारिरज क्रिकया जा ा है।

8. पक्षों की ओर से क्रिवद्वान अति वक्ता को सुनने क े पश्चा, हमने अभिभलेख पर आक्षेक्रिप आदेश और अन्य थ्यों का अवलोकन क्रिकया।

9. प्रारम्भ ः यह ध्यान क्रिदया जाना 8ाक्रिहए क्रिक अपीलार्थी2 ने क्रिदनांक 29 क्रिदसंबर, 1993 को क्रिब&ी क्रिवलेख द्वारा प्रश्नग भूखंड &य क्रिकया है, जो क्रिदनांक 5 जनवरी, 1994 को पंजीक ृ क्रिकया गया र्थीा। क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 क े क्रिप ा की मृत्यु क्रिदनांक 3 क्रिदसंबर, 1997 को हो गई। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj यद्यक्रिप पंजीक ृ क्रिब&ी क्रिवलेख 1994 का है, क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 ने वाद दायर क्रिकया जो ओ.एस. सं. 160/2008 में लंक्रिब है, क े वल वष? 2008 में क्रिब&ी क्रिवलेख को रद्द करने की मांग कर े हुए आरोप लगाया गया क्रिक उपरोक्त क्रिब&ी क्रिवलेख अपीलार्थी2 और उसक े भाई द्वारा अपने क्रिप ा क े सार्थी क्रिकसी परिरति8 का उपयोग करक े गल और ोखे से क्रिनष्पाक्रिद क्रिकया गया र्थीा। क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 द्वारा दायर वाद में हस् ाक्षर क े प्रति रूपर्ण अर्थीवा जालसाजी का कोई आरोप नहीं है। यह अपीलार्थी2 का मामला है क्रिक यहां क क्रिक क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 साक्षी क े रूप में क्रिब&ी क्रिवलेख का हस् ाक्षरक ा? है। यद्यक्रिप यह वाद वष? 2008 में दायर क्रिकया गया र्थीा और क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 ने क े वल वष? 2012 में आपराति क भिशकाय दज? करने क े त्तिलए 8ुना है, जिजसमें जालसाजी और प्रति रूपर्ण का आरोप लगाया गया है। क्रिब&ी क्रिवलेख की वै ा क े संबं में, क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 क े क्रिदवंग क्रिप ा पर क्रिब&ी क्रिवलेख प्राप्त करने क े त्तिलए मामले को सक्षम दीवानी न्यायालय क े समक्ष जब् कर त्तिलया गया और दीवानी न्यायालय क े त्तिलए यह य करना है क्रिक क्या अपीलार्थी2 द्वारा कोई ोखा ड़ी की गई है अर्थीवा नहीं। दीवानी न्यायालय क े समक्ष जब एक ही क्रिववाद को त्तिलया जा ा है ो क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 अपीलार्थी2 क े क्रिवरूद्ध भा.द.स. की ारा 418, 419, 420, 467, 468 और 471 क े ह कभिर्थी अपरा क े त्तिलए आपराति क काय?वाही नहीं कर सक ा है। यद्यक्रिप, क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 की ओर से प्रस् ु क्रिवद्वान अति वक्ता द्वारा यह क ? क्रिदया गया क्रिक दायर की गई Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj भिशकाय को सीमा द्वारा बाति नहीं क्रिकया जा ा है, लेक्रिकन सार्थी ही यह प्र ी हो ा है क्रिक वष? 2012 में क्रिनजी भिशकाय दज? करने का कोई कारर्ण नहीं है। क्रिब&ी क्रिवलेख, जिजसक े आ ार पर अपीलार्थी2 द्वारा हकदारी और कब्जे का दावा क्रिकया जा ा है जो क्रिदनांक 5 जनवरी, 1994 को पंजीक ृ क्रिकया गया र्थीा, वाद को लगभग 14 वष? पश्चा दायर क्रिकया गया है। क्रिदनांक 24 अगस्, 2008 को वाद दायर करने क े पश्चा ् भी यहाँ अपीलार्थी2 क े क्रिवर्रुद्ध आपराति क भिशकाय दायर करने में लगभग 4 वष? की देरी है। अपीलार्थी2 क े क्रिवरूद्ध काय?वाही करने की अनुमति देना, जिजसे लगभग 87 वष? का ब ाया गया है, उपरोक्त थ्यों क े समूह में प्रक्रि&या क े दुर्रुपयोग क े अ रिरक्त और क ु छ नहीं है। यह ध्यान क्रिदया जाना 8ाक्रिहए क्रिक क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 द्वारा दायर वाद में हस् ाक्षर क े प्रति रूपर्ण और जालसाजी का कोई आरोप नहीं है। क्रिकसी भी घटना में, जब क्रिब&ी क्रिवलेख को रद्द करने क े त्तिलए क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 द्वारा दायर क्रिकया गया वाद, सक्षम न्यायालय क े समक्ष क्रिव8ारा ीन है, ो क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 अपने मामले में सु ार कर े हुए आपराति क काय?वाही में अपनी भिशकाय का अनुशीलन नहीं कर सक ा। गंभीर थ्यात्मक क्रिववाद जो दीवानी प्रक ृ ति क े हैं, क े संबं में, जिजसक े त्तिलए दीवानी वाद लंक्रिब हैं, क्रिद्व ीय प्रत्यर्थी2 को आपराति क काय?वाही में अपने भिशकाय को अनुशीलन की अनुमति देना कानून की प्रक्रि&या का दुर्रुपयोग करने क े अति रिरक्त और क ु छ नहीं है। उपरोक्त कारर्णों से हमारा दृक्रिuकोर्ण इस क्रिव8ार से है क्रिक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj आपराति क काय?वाक्रिहयाँ इस अपील को रद्द करने की अनुमति देने हे ु अनुक ू ल है।

10. उपरोक्त कारर्णों से, इस आपराति क अपील को अनुमति दी गयी और आक्षेक्रिप आदेश को 12 मा8?, 2018 क्रिदनांक्रिक क े आपराति क प्रकीर्ण? आवेदन सं.5684/2016 में पारिर क्रिकया गया र्थीा जिजसे इलाहाबाद में उच्च न्यायालय द्वारा अपास् क्रिकया है, परिरर्णामस्वरूप अपीलार्थी2 द्वारा दायर क्रिकये गए आवेदन को दं.प्र.सं. की ारा 482 क े ह र्थीाना-कायमगंज, जिजला-फर्रु ? खाबाद, उत्तर प्रदेश की पत्रावली पर भा.दं.सं. की ारा 418, 419, 420, 467, 468 और 471 क े ह अपरा क े त्तिलए भिशकाय वाद सं. 708/2012 में काय?वाक्रिहयों को रद्द करने की अनुमति दी गई है और मजिजस्ट्रेट द्वारा पारिर परिरर्णामी आदेश भी रद्द हो गए।

11. यह स्पu क्रिकया जा ा है क्रिक इस आदेश में अभिभत्तिलत्तिख अवलोकनों और जाँ8-परिरर्णाम क े वल दं.प्र.सं. की ारा 482 क े ह दायर आवेदन से उद्भू इस अपील क े क्रिनपटान क े उद्देश्य से हैं। यह दीवानी न्यायालय क े त्तिलए है क्रिक इस आदेश से अप्रभाक्रिव वह लंक्रिब वादों में क्रिवभिभन्न मुद्दों को अपनी गुर्णों क े आ ार पर य करे। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj (न्यायमूर्ति मोहन एम. शान् ानगौदर).................................................... (न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी)................................................... नई क्रिदल्ली; 24 जनवरी, 2020 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj