Om Pal Singh v. Disciplinary Proceedings

Supreme Court of India · 14 Jan 2020 · 2020 INSC 40
L. Nageswara Rao; Hemant Gupta
Civil Appeal No 176 of 2020
labor appeal_dismissed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that an employee dismissed for proven charges and reinstated with reduced punishment is not entitled to pension benefits for the suspension period absent acquittal.

Full Text
Translation output
अप्रति वेद्य
भार क
े सव च्च न्यायालय में
दीवानी अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील संख्या 176 वर्ष" 2020
ओम पाल सिंसह ...... अपीलार्थी* (गण)
बनाम
अनुशासनात्मक प्राति करण और अन्य। ...... प्रत्यर्थी* (गण)
निनण"य
न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव
JUDGMENT

1. अपीलार्थी* ने मुजफ्फरनगर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (इसक े बाद 'बैंक') क े सार्थी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक सेवाओं क े एक अति कारी क े रूप में काय" निकया। 27.05.2003 को, उसे आरोप पत्र निदया गया और पंद्रह निदनों की अवति क े भी र अपना जवाब प्रस् ु करने क े लिलए कहा गया। अपीलक ा" क े निवरूद्ध निवरतिN निकए गए आरोप निनम्न हैं:

1. आपने प्र ान काया"लय क े निनदQशों और निवनिनयमों का पालन नहीं निकया।

2. आपने बैंक क े निह क े निवरूद्ध/ हानिनकारक काय" निकया है, आप अनति क ृ रूप से अनुपस्थिस्र्थी र्थीे। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 2020 INSC 40

3. आप बैंक क े निह और अपने क "व्यों क े लिलए अलगाव में (अलग- र्थीलग) हैं।

2. एक अन्य आरोप पत्र 30.05.2003 को जारी निकया गया र्थीा जिजसमें निनम्नलिललिZ आरोप निवरतिN निकए गए र्थीे: i. आपने बैंक क े अनुशासन का उल्लंघन निकया है। ii. आप पर कदाNार का आरोप है। iii. आपने बैंक की छनिव को Zराब करने का प्रयास निकया है और इसक े आ ार पर आपने ऐसा काय" निकया है जो बैंक क े निह क े लिलए हानिनकारक है।

3. अपीलार्थी* ने निदनांक 27.05.2003 और 30.05.2003 क े उक्त आरोप पत्रों का अपना जवाब प्रस् ु निकया। अपीलार्थी* को 29.07.2003 क े एक आदेश द्वारा निनलंबन क े ह रZा गया र्थीा। उसने रिरट यातिNका दायर करक े निनलंबन क े आदेश को Nुनौ ी दी, जिजसे बैंक को Nार महीने क े भी र जांN पूरी करने क े निनदQश क े सार्थी निनस् ारिर निकया गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बहाली करने से इनकार कर निदया। जांN अति कारी ने 23.12.2003 को जांN रिरपोट", अनुशासनात्मक प्राति करण को सौंप दी। अपीलक ा" को जांN रिरपोट" पर अपनी निटप्पणी प्रस् ु करने का अवसर निदया गया र्थीा। इसक े बाद, अपीलक ा" को यह ब ाने क े लिलए कारण ब ाओ नोनिटस जारी निकया गया निक उसे सेवा से क्यों नहीं बZा"स् निकया जाना Nानिहए। निदनांक 11.06.2004 को अपीलक ा" द्वारा एक जवाब प्रस् ु निकया गया र्थीा, जिजस पर अनुशासनात्मक प्राति करण द्वारा निवNार निकया गया र्थीा। निदनांक 23.06.2004 को अपीलक ा" द्वारा एक और जबाब प्रस् ु निकया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds गया र्थीा। 05.07.2004 क े एक आदेश द्वारा, अपीलक ा" को मुजफ्फरनगर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (संशोति ) अति कारी और कम"Nारी सेवा निवनिनयम, 2010 (इसक े बाद, 'निवनिनयम') क े निवनिनयमन संख्या 38 (क) (4) क े ह निबना निकसी लाभ क े सेवा से बZा"स् कर निदया गया र्थीा।

4. अपीलक ा" ने बZा"स् गी क े आदेश को Nुनौ ी दे े हुए एक रिरट यातिNका दायर की, जिजस पर उच्च न्यायालय द्वारा निवNार नहीं निकया गया र्थीा। अपीलक ा" को अपील दायर करने क े लिलए स्व ंत्र ा दी गई र्थीी। उच्च न्यायालय द्वारा दी गई स्व ंत्र ा क े अनुसरण में, अपीलक ा" ने अनुशासनात्मक प्राति करण क े आदेश क े लिZलाफ अपील प्रस् ु की, जिजसमें उसे निनदेशक मंडल, मुजफ्फरनगर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में सेवा से बZा"स् कर निदया गया। 24.03.2005 क े एक आदेश द्वारा निनदेशक मंडल द्वारा उक्त अपील को Zारिरज कर निदया गया र्थीा। अपीलक ा" उच्च न्यायालय क े समक्ष अपनी अपील को Zारिरज करने क े निनदेशक मंडल द्वारा पारिर आदेश क े लिZलाफ अपनी Nुनौ ी में सफल रहा। उच्च न्यायालय ने 24.03.2005 को निनदेशक मंडल द्वारा पारिर आदेश को अपास् कर निदया और अपीलक ा" द्वारा दायर अपील पर नये जिसरे से निवNार करने क े लिलए निनदेशक मंडल को मामले को वापस भेज निदया। निनदेशक मंडल ने पुनर्विवNार पर अपील को Zारिरज कर निदया। दूसरी बार अपील को Zारिरज करने क े निनदेशक मंडल क े आदेश क े निवरुद्ध दायर की गई रिरट यातिNका को अनुमति दी गई और अपीलीय प्राति करण को निनदQश निदया गया निक वह सजा की मात्रा पर अपने मस्थिस् ष्क का प्रयोग करे और नये जिसरे से आदेश पारिर करे। निनदेशक मंडल द्वारा एक उप-सनिमति का गठन निकया गया और सनिमति द्वारा यह माना गया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds निक अपीलक ा" क े लिZलाफ कदाNार क े आरोप सेवा से बZा"स् गी क े दंड को आकर्विर्ष नहीं कर े। सनिमति ने आगे जिसफारिरश की निक बZा"स् गी क े दंड की समीक्षा की जाए और वे न में 15 Nरणों में कमी की जाए, आठ साल की अवति क े लिलए समयबद्ध वे नमान में निनNले स् र पर निकया जाये और एक अन्य निनदQश निदया निक अपीलक ा" ऐसी कटौ ी (कमी) की अवति क े दौरान वे न वृतिद्ध प्राप्त नहीं करेगा और ऐसी अवति की समानिप्त पर, निवनिनयमन क े अध्याय IV क े निवनिनयमन 39 (1) (Z) (i) क े संदभ" में भनिवष्य में उसकी वे न वृतिद्ध को स्र्थीनिग करने का प्रभाव रZेगा। सनिमति द्वारा की गई जिसफारिरश को निनदेशक मंडल द्वारा स्वीकार कर लिलया गया और सनिमति द्वारा सुझाए गए दंड को निनदेशक मंडल द्वारा 10.09.2012 को लागू निकया गया। 31.12.2012 को सेवानिनवृलिv की आयु प्राप्त करने पर अपीलार्थी* सेवानिनवृv हुआ।

5. अपीलार्थी* द्वारा रिरट यातिNका दायर करक े 15 Nरणों क े वे न में कटौ ी क े दंड को Nुनौ ी दी गई। उच्च न्यायालय ने रिरट यातिNका की अनुमति दी और प्रत्यर्थी*-अनुशासनात्मक प्राति करण को मामले को नए जिसरे से जांNने का निनदQश निदया। अनुशासन प्राति करण ने उच्च न्यायालय क े आदेश क े अनुपालन में, मामले पर पुनर्विवNार निकया और आठ साल की अवति क े लिलए समयबद्ध वे नमान में निनNले स् र पर 15 Nरणों में कटौ ी का दण्ड दोहराया। बाद में, अनुशासनात्मक प्राति करण ने छह साल की अवति क े लिलए समयबद्ध वे नमान को निनNले स् र पर 10 Nरणों (वे न वृतिद्ध) क कटौ ी (कमी) की सजा को संशोति कर निदया और आगे निनदQश निदया निक अति कारी उक्त कमी (कटौ ी) की अवति क े दौरान वे न वृतिद्ध प्राप्त नहीं Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds करेगा और ऐसी अवति की समानिप्त पर, कटौ ी उसक े वे न क े भनिवष्य में वे न वृतिद्ध को स्र्थीनिग करने का प्रभाव रZेगा। इसक े बाद, अपीलक ा" ने एक अपील दायर की जिजसे अपीलीय प्राति करण ने Zारिरज कर निदया। उच्च न्यायालय ने अपीलक ा" द्वारा दायर रिरट यातिNका को Zारिरज करक े अपीलीय प्राति करण द्वारा पारिर आदेश को बरकरार रZा।

6. उच्च न्यायालय का यह म र्थीा निक अपीलार्थी* क े निवरुद्ध निवरतिN आरोप पूरी रह से सानिब हो गए र्थीे और उन्होंने आदेश निदनांक 29.10.2015 द्वारा शास्थिस् का अति रोपण अपीलक ा" क े दोर्ष क े अनुरूप र्थीा क्योंनिक अपीलक ा" पर लगाया गया दंड आश्चय"जनक रूप से असंग नहीं र्थीा। उच्च न्यायालय ने महसूस निकया निक 29.10.2015 क े आदेश में निकसी भी हस् क्षेप की आवश्यक ा नहीं है।

7. इस न्यायालय द्वारा प्रति वादी को कारण ब ाने क े लिलए नोनिटस जारी निकया गया र्थीा निक अपीलक ा" 29.07.2003 से 10.09.2012 क निनलंबन की अवति क े लिलए वे न का हकदार क्यों नहीं होगा।

8. अपीलक ा" की ओर से पेश वरिरष्ठ अति वक्ता श्री एम. करपागा निवनयागम ने कहा निक अपीलक ा" अपने निनलंबन की अवति क े दौरान वे न क े भुग ान का हकदार होगा क्योंनिक बZा"स् गी क े आदेश को अपास् कर निदया गया र्थीा और कम सजा द्वारा प्रति स्र्थीानिप निकया गया र्थीा। उनक े अनुसार, 'काम नहीं ो वे न नहीं' का जिसद्धां व "मान मामले पर लागू नहीं होगा। उन्होंने बैंक ऑफ इंतिडया बनाम टी. एस. क े लवला1, सिंसतिडक े ट बैंक बनाम क े. उमेश नायक[2], रणछोड़जी N ुरजी ठाक ू र बनाम अ ीक्षण अभिभयं ा, गुजरा 1 (1990) 4 एससीसी 744 2 (1994) 5 एससीसी 572 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds निवद्यु बोड"3 और आयुक्त, कना"टक हाउसिंसग बोड" बनाम मुद्देआ[4] में इस न्यायालय क े कई निनण"यों पर अवलम्ब लिलया।

9. बैंक की ओर से पेश निवद्वान अति वक्ता, श्री राजेश क ु मार-I ने कहा निक अपीलक ा" को आरोप से दोर्षमुक्त नहीं निकया गया र्थीा। अनुशासनात्मक प्राति करण ने क े वल बZा"स् गी क े दण्ड को समयबद्ध वे नमान क े दण्ड क घटा निदया, जो अपीलक ा" को निनलंबन की अवति क े लिलए पूण" वे न का दावा करने का अति कार नहीं दे ा है। एक आरोनिप कम"Nारी क े वल ब निनलंबन की अवति क े लिलए पूण" वे न का दावा करने का हकदार होगा यनिद दण्डादेश अपास् कर निदया जा ा है और उसे निकसी भी आरोप का दोर्षी नहीं माना जा ा है। उन्होंने प्रबं निनदेशक, ईसीआईएल, हैदराबाद और अन्य बनाम बी. करुणाकर और अन्य[5] में इस न्यायालय क े निनण"य पर अवलम्ब लिलया।

10. व "मान अपील में हमारे निवNार क े लिलए एकमात्र सवाल यह है निक क्या अपीलक ा" निनलंबन की अवति क े लिलए, अर्थीा" 29.07.2003 से 10.09.2012 क वे न क े भुग ान का हकदार है। यह दोहराने की कोई आवश्यक ा नहीं है निक बZा"स् गी क े आदेश को अपास् कर निदया गया र्थीा और अपीलक ा" क े समयबद्ध वे नमान में कमी की सजा दी गई र्थीी। यह स्पष्ट है निक जांN अति कारी क े निनष्कर्ष" निक अपीलक ा" क े लिZलाफ आरोप सानिब हुए र्थीे और उनमें फ े रबदल नहीं निकया गया है। बZा"स् गी की सजा को समयबद्ध वे नमान क घटाने की सजा क े परिरणामस्वरूप उसक े 3 (1996) 11 एससीसी 603 4 (2007) 7 एससीसी 689 5 (1993) 4 एससीसी 727 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds लिZलाफ लगाए गए आरोपों से अपीलक ा" को दोर्षमुनिक्त नहीं निमल ी है। हालांनिक, यह अनुशासनात्मक प्राति करण को निनण"य लेना है निक निनलंबन की अवति को क ै से माना जाएगा। 29.10.2015 निदनांनिक आक्षेनिप आदेश पारिर कर े हुए, अनुशासनात्मक प्राति करण ने कहा निक अपीलक ा" 06.07.2004 से 29.08.2012 क निकसी भी भुग ान का हकदार नहीं होगा।

11. जे.क े. सिंसर्थीेनिटक्स लिलनिमटेड बनाम क े.पी. अग्रवाल और अन्य[6] में, इस न्यायालय ने सेवा की निनरं र ा और बहाली क े सभी मामलों में परिरणामी लाभों का दावा करने क े लिलए एक आरोनिप क े हकदार होने क े संबं में निनम्न प्रकार इस मुद्दे पर निवNार निकया: "17. यह भी गल ारणा है निक जब भी बहाली का निनदQश निदया जा ा है, ो इस क्रम में 'सेवा की निनरं र ा' और 'परिरणामी लाभ' का पालन करना Nानिहए। ऐसे व्यनिक्त को, जिजसने 10 से 15 वर्ष" क काय" नहीं निकया है और जिजसक े पास पदोन्नति पद क े उच्च र क "व्यों और काय„ को करने का आवश्यक अनुभव का लाभ नहीं है, उसे एक 'परिरणामी लाभ' क े रूप में कई पदोन्नति देने का निवनाशकारी प्रभाव शायद ही कभी परिरणामी लाभ प्रदान कर े समय देZा जा ा है। जब भी अदाल ें या अति करण सी े बहाली कर े हैं, ो उन्हें अपने न्यातियक मस्थिस् ष्क को थ्यों और परिरस्थिस्र्थीति यों पर लागू करना Nानिहए ानिक यह य निकया जा सक े निक 'सेवा की निनरं र ा' और/या 'परिरणामी लाभ' का भी निनदQश निदया जाना Nानिहए। हम इस संबं में ए.पी.एस.आर.टी.सी. बनाम एस नरसा गौड [2003 (2) एससीसी 212], ए.पी.एस.आर.टी.सी. बनाम अब्दुल करीम [2005 (6) एससीसी 36] और आर.एस.आर.टी.सी. 6 (2007) 2 एससीसी 433 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds बनाम श्याम निबहारी लाल गुप्ता [2005 (7) एससीसी 406] में इस न्यायालय क े निनण"यों का उल्लेZ कर सक े हैं।"

12. उक्त निनण"य में आगे कहा गया निक यनिद कम सजा देने क े परिरणामस्वरूप बहाली हो ी है, ो ऐसी बहाली क े स्वाभानिवक या आवश्यक परिरणाम क े रूप में, न ो निपछला वे न और न ही सेवा की निनरं र ा और न ही परिरणामी लाभ प्राप्त होगा। इस न्यायालय ने यह माना निक जहां कदाNार को सानिब हुआ माना गया, ो बहाली स्वयं एक परिरणामी लाभ है जो कम सजा देने से प्राप्त हुई है। र्थीानिप, इस न्यायालय का म र्थीा निक उस अवति क े लिलए जब कम"Nारी ने काय" नहीं निकया है, निपछला वे न देने का निनण"य अपरा ी कम"Nारी को पुरूस्क ृ करने र्थीा कम"Nारी द्वारा निकए गए अवNार क े निवरुद्ध कार"वाई करने क े लिलए निनयोक्ता को दस्थिण्ड करने क े समान होगा, जिजससे बNा जाना Nानिहए।

12,172 characters total

13. उपयु"क्त निनण"य क े अनुसरण में, हमारा निवNार है निक निनलंबन की अवति क े लिलए वे न का भुग ान नहीं करने क े अनुशासनात्मक प्राति करण क े निनण"य को निवति क े निवपरी नहीं कहा जा सक ा है।

14. उपरोक्त कारणों से, अपील Zारिरज की जा ी है।....………………………. [न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव] …………………........… [न्यायमूर्ति हेमं गुप्ता] नई निदल्ली, 14 जनवरी 2020. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds