Full Text
सव च्च न्यायालय क
े समक्ष
आपराति क अपीलीय क्षेत्राति कार
आपराति क अपील सं. 87/2020
(विवशेष अनुमति याति&का(अप०) सं. 6990/2018 से उत्पन्न)
प्रमाेद क
ु मार .... अपीलार्थी1
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य ... प्रति वादी
विनर्ण6य
माननीय न्यायमूर्ति , आर. भानुमति
JUDGMENT
1. अनुमति प्रदान की गर्इ6।
2. यह अपील र्इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े आपराति क संशो न सं. 511/ 2006 क े आक्षेविप अादेश विदनांविक 19. 02. 2018 में पारिर आदेश को &ुनौ ी देने क े लिलए दायर की गर्इ[6] है, जिIसक े ह उच्च न्यायालय ने अपीलक ा6 द्वारा दायर पुनरीक्षर्ण याति&का को खारिरI कर 2020 INSC 37 विदया आैर भार ीय दण्ड संविह ा की ारा 467 और 468 क े ह उनको कारावास की सIा प्रदान की गर्इ6।
3. संक्षेप में अभिभयोIन पक्ष का मामला र्इस प्रकार है: - अपीलक ा6-पदम क ु मार ब से र्इंविदरा नगर डाकघर, लखनऊ में पोस्टमैन क े रूप में काम कर रहे र्थीे। 09. 04. 1992 को, PW-3- डा. एम. एल. वास6नी, प्रोफ े सर, क ृ विष संस्र्थीान, नैनी, र्इलाहाबाद ने उक्त संस्र्थीान क े उप-डाकघर से भिशकाय क ा6- डॉ. क े बी वार्ष्णेर्ण`य (PW- 1) को एक पंIीक ृ लिलफाफा नंबर-0095 भेIा र्थीा। उक्त लिलफाफ े में प्रत्येक रु.5,000/- क े मूल्य क े &ार र्इंविदरा विवकास पत्र र्थीे, Iो क ु ल रु. 20,000/- र्थीा। लिलफाफा PW-1-डॉ. क े बी वार्ष्णेर्ण`य क नहीं पहुं&ा; र्इसलिलए, 27. 04. 1992 को, PW-3-डॉ. एम.एल. वार्ष्णेर्ण`य ने पोस्ट मास्टर, डाकघर, क ृ विष संस्र्थीान, नैनी, र्इलाहाबाद क े समक्ष भिशकाय की। PW-1-भिशकाय क ा6-डॉ. क े बी वार्ष्णेर्ण`य ने र्इंविदरा नगर डाकघर से भी पूछ ाछ की। 29. 04. 1992 को, PW-1 ने डाक विवभाग क े वरिरष्ठ अ ीक्षक को भी एक भिशकाय दI[6] करवार्इ[6] र्थीी विक लिलफाफा रजिIस्ट्री नंबर 0095 प्राप्त नहीं हुआ है। 14. 05. 1992 को, वरिरष्ठ अ ीक्षक, पोस्ट एंड टेलीग्राफ, लखनऊ से Iानकारी प्राप्त हुई विक “ मोहन” नाम क े एक व्यविक्त को 13. 04. 1992 को पूव क्त रजिIस्ट्री प्राप्त हुई है। विफर, PW-1 और उनक े बेटे देवेश मोहन-PW-2 र्इंविदरा नगर डाकघर गए और हस् ाक्षर देखा Iहां र्इसे 'डी' क े रूप में लिलखा गया है। मोहन” भिशकाय क ा6 क े बेटे का नाम देवेश मोहन (PW-2) भी है। हस् ाक्षर विदखाए Iाने पर, PW-2 ने र्इस बा से र्इनकार विकया विक प्रश्न ः हस् ाक्षर उसक े हैं। पी.एस. गाIीपुर, लखनऊ में आई.पी.सी ारा 420,467 और 468 क े ह अपरा सं. 394/1992 में मामला दI[6] विकया गया र्थीा। मामले की Iां& की गई। बाद में, मामले की Iां& सीबीसीआईडी को सौंपी गई
4. Iां& अति कारी ने विवभिभन्न गवाहों क े बयान दI[6] विकए हैं। Iां& अति कारी ने PW-2-देवेश मोहन क े नमूना हस् ाक्षर क े सार्थी विववाविद हस् ाक्षर को फॉरेंजिसक सार्इंस लेबोरेटरी, लखनऊ भेIा र्थीा। फोरेंजिसक सार्इंस लेबोरेटरी, लखनऊ द्वारा दी गई रिरपोट[6] क े अनुसार, जिIस व्यविक्त ने नमूना हस् ाक्षर विकए हैं, उसने तिडलीवरी स्लिस्लप-प्रद6श-पी 4 में विववाविद हस् ाक्षर भी विकए हैं। PW-2 “S-1 से S-6” क े नमूना हस् ाक्षर क े सार्थी विववाविद हस् ाक्षर “ Q-1” को विनIी हस् ाक्षर विवशेषज्ञ श्रीम ी खान-PW-5 को भेIा गया र्थीा अपने साक्ष्य में, PW- 5 ने कहा है विक PW-2 “एस-1 से एस-6” क े सार्थी तिडलीवरी स्लिस्लप प्रद6श-पी-4 में विववाविद हस् ाक्षर “ क्यू-1” की ुलना करने पर, वह र्इस विनर्ष्णेकष[6] पर पहुं&ी विक विववाविद हस् ाक्षर नमूना हस् ाक्षर से भिभन्न है और PW-5 ने अपनी रिरपोट6-एक्स-पी 9 Iारी की र्थीी विफर भी एक अन्य हस् लेख विवशेषज्ञ जिसया राम गुप्ता ने नमूना हस् ाक्षर क े संदभ[6] में विववाविद हस् ाक्षर की भी Iां& की र्थीी। जिसया राम गुप्ता ने कहा र्थीा विक तिडलीवरी स्लिस्लप में विववाविद हस् ाक्षर PW-2-देवेश मोहन द्वारा नहीं विकया गया है। मुकदमे क े समय, हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञ जिसया राम गुप्ता का विन न हो गया और उनक े बेटे रंIी क ु मार की पीडब्ल्यू-8 क े रूप में परीक्षर्ण विकया। &ूंविक PW-8- रंIी क ु मार अपने विप ा-जिसया राम गुप्ता क े हार्थी से लिलखने से परिरति& र्थीे, र्इसलिलए हस् लिललिख विवशेषज्ञ जिसया राम गुप्ता की रिरपोट[6] को उनक े बेटे PW-8 क े माध्यम से ति&वि} विकया गया है, Iां& से प ा &ला विक अपीलक ा6 ने तिडलीवरी स्लिस्लप-प्रद6श-पी 4 पर हस् ाक्षर Iाली र्थीे। Iां& पूरी होने पर, अपीलार्थी1 अभिभयुक्त क े लिखलाफ आई.पी.सी. की ारा 420, 467 और 468 क े ह आरोप पत्र दायर विकया गया है।
5. अपीलक ा6 क े लिखलाफ आरोपों को साविब करने क े लिलए अभिभयोIन पक्ष ने PW-1- डा. क े.बी.वार्ष्णेर्ण`य, PW-2-देवेश मोहन, PW-3-डा. एम.एल,वार्ष्णेर्ण`य हस् लेख विवशेषज्ञ-PW-5-MY खान, PW-8-रर्णIी क ु मार, एक अन्य हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञ-जिसया राम गुप्ता क े पुत्र और अन्य गवाहों का परीक्षर्ण विकया गया है। मौलिखक और दस् ावेIी साक्ष्यों पर विव&ार करने पर, विव&ारर्ण न्यायालय ने उल्लेख विकया विक ीन हस् लेख विवशेषज्ञ अभिभलेख मे हैं। एक विवशेषज्ञ क े अनुसार, देवेश मोहन-PW-2 द्वारा विववाविद हस् ाक्षर विकए गए हैं। विव&ारर्ण न्यायालय ने यह भी उल्लेख विकया विक अन्य दो विवशेषज्ञों ने अपनी रिरपोट[6] में यह उल्लेख विकया है विक परिरदान प&1 में विववाविद हस् ाक्षर “ Q-1” नमूना हस् ाक्षर “S-1 से S-6” से मेल नहीं खा े हैं विव&ारर्ण न्यायालय ने अभिभविन ा6रिर विकया विक अपीलार्थी1 क े डाविकया होने क े कारर्ण रजिIस्ट्री क े परिरदान का काय[6] विकया गया र्थीा और परिरदान प&1 उसक े पास रखी गई र्थीी र्इसलिलए, विनर्ष्णेकष[6] यह है विक अपीलार्थी1 ने परिरदान प&1 में मोहन “डी” क े हस् ाक्षर विकए र्थीे। ट्रायल कोट[6] ने माना विक अपीलक ा6 अक्सर रजिIस्ट्ररी और पत्र लेकर भिशकाय क ा6-PW- 1 क े घर का दौरा कर ा र्थीा और र्इस प्रकार, वह PW-2-देवेश मोहन क े हस् ाक्षर से अच्छी रह से अवग र्थीा। PW 1 से 3 क े साक्ष्य और हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञों की रिरपोट[6] क े आ ार पर, ट्रायल कोट[6] ने कहा विक अपीलक ा6 ने IालसाIी का अपरा विकया र्थीा और उसे ारा 467 और 468 आईपीसी क े ह दोषी ठहराया र्थीा और उसे &ार साल आैर ीन साल क्रमशः क े कठोर कारावास की सIा सुनाई र्थीी। दोनों वाक्यों को समव 1 &लाने क े लिलए विनद`भिश विकया गया र्थीा।
6. सIा को &ुनौ ी दे े हुए अपीलक ा6 ने अपीलीय अदाल - अति रिरक्त मुख्य न्यातियक मजिIस्ट्रेट, लखनऊ क े समक्ष अपील दायर की है। अपीलीय अदाल ने यह कह े हुए अपील को खारिरI कर विदया विक अभिभयोIन पक्ष द्वारा Iोड़े गए सबू ों क े उति& विवश्लेषर्ण पर, ट्रायल कोट[6] ने अपीलक ा6 को आईपीसी की ारा 467 और 468 क े ह सही ठहराया है।
7. आदेश से व्यभिर्थी होने क े कारर्ण, अपीलक ा6 ने र्इलाहाबाद क े उच्च न्यायालय क े समक्ष फौIदारी विनगरानी सं. 511/2006 दायर विकया, जिIसे आक्षेविप आदेश द्वारा खारिरI कर विदया गया। उच्च न्यायालय ने यह अभिभविन ा6रिर विकया विक अभिभयोIन पक्ष ने यह साविब कर े हुए साक्ष्य Iोड़ विदए हैं विक “डी” क े हस् ाक्षर. मोहन 'परिरदान प&1 में और PW-2- देवेश मोहन क े नमूना हस् ाक्षर अलग-अलग हैं। उच्च न्यायालय ने आगे कहा विक अपीलक ा6 वह व्यविक्त र्थीा जिIसने लिलफाफा विदया र्थीा और ऐसी परिरस्लिस्र्थीति यों में, अपीलक ा6 क े लिलए यह ब ाना है विक विववाविद हस् ाक्षर पर हस् ाक्षर विकसने विकये र्थीे और अपीलक ा6 से र्इस रह क े विकसी भी स्पष्टीकरर्ण क े अभाव में, अपीलक ा6 क े लिखलाफ यह अनुमान लगाया गया है विक वह एकमात्र व्यविक्त है जिIसक े पास उसी का ज्ञान है। पुनरीक्षर्ण को दनुसार खारिरI कर विदया गया और अपीलक ा6 की सIा की पुविष्ट की गई।
8. आक्षेविप आदेश पर क 6 दे े हुए, अपीलक ा6 क े विवद्व अति वक्ता श्री सौरभ विमश्रा ने कहा विक विबना यह जिसद्घ विकये हुए विक प्रद6श पी-4 परिरदान प&1 में अपीलक ा6 ने Iाली हस् ाक्षर बनाये र्थीे,अ ः आईपीसी की ारा 467 और 468 क े ह अपीलक ा6 की सIा बरकरार नहीं रह सक ी है। विवद्व अति वक्ता ने आगे प्रस् ु विकया विक विन&ली अदाल ों ने सरकारी हस् लेख विवशेषज्ञ की रिरपोट[6] Iो अपीलक ा6 क े पक्ष में र्थीी पर विव&ारर्ण न करक े गल ी की है. यह प्रस् ु विकया गया र्थीा विक हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञ जिसया राम गुप्ता की Iां& क े अभाव में, राय देने वाले जिसया राम गुप्ता की रिरपोट[6] को उनक े बेटे-रंIी क ु मार- PW-8 को Iां& करक े साविब नहीं विकया Iा सक ा है आैर विन&ली अदाल ों द्वारा हस् लेख विवशेषज्ञ -PW-5-एम.वार्इ[6] खान और एक अन्य हस् लेख विवशेषज्ञ जिसया राम गुप्ता की राय पर अवलंम्ब नहीं ले सक ी है। यह क 6 विदया गया र्थीा विक उच्च न्यायालय ने यह कह े हुए रोक लगाई विक यह अपीलक ा6 क े लिलए यह साविब करने क े लिलए है विक विकसने Ex.-P4-विव रर्ण प&1 में हस् ाक्षर विकए र्थीे और उच्च न्यायालय ने अपीलक ा6 क े लिखलाफ अनुमान लगाने और दोषी ठहराए Iाने ऋ ु विट की र्थीी। आैर अपीलार्थी1 की दोष जिसद्घी पोषर्णीय नही है।
9. दूसरी ओर, प्रति वादी-राज्य क े विवद्व अति वक्ता श्री आदश[6] उपाध्याय, ने प्रस् ु विकया है विक अभिभयोIन पक्ष द्वारा Iोड़े गए सबू ों क े उति& मूल्यांकन पर, विन&ली अदाल ों ने अपीलक ा6 को न्यायोति& रूप से दोषी ठहराया। यह प्रस् ु विकया गया र्थीा विक अभिभयोIन न क े वल हस् लेख विवशेषज्ञों की राय पर अवलंम्ब लिलया है, बस्लिल्क भिशकाय क ा6-डॉ क े बी वार्ष्णेर्ण`य(PW-1) क े बेटे PW-2-विदनेश मोहन जिIन्होंने प्रदश[6] -पी 4 परिरदान प&1 में अपना हस् ाक्षर करने से र्इनकार विकया है और अभिभयोIन पक्ष ने अपीलक ा6 क े अपरा को अच्छी रह से स्र्थीाविप विकया है।
10. हमने ध्यान से प्रस् ुति याँ पर विव&ार विकया है और अभिभलेख में आक्षेविप आदेश और अन्य सामविग्रयों का अवलोकन विकया है।
11. डॉ. एमएल वार्ष्णेर्ण`य (PW-3) क े साक्ष्य को प्रस् ु करने पर, अभिभयोIन पक्ष ने साविब विकया है विक 09. 04. 1992 को, PW-3 ने PW-1-Dr क े. बी. वार्ष्णेर्ण`य, र्इंविदरा नगर, लखनऊ को एक पंIीक ृ लिलफाफा नंबर 0095 भेIा र्थीा। Iब PW-1 को उक्त लिलफाफा नहीं विमला, 27. 04. 1992 को, PW-3 ने संबंति सब-पोस्ट ऑविफस, नैनी, र्इलाहाबाद को र्इसकी भिशकाय की। PW-1- डा. क े.बी.वार्ष्णेर्ण`य ने 29. 04. 1992 को वरिरष्ठ अ ीक्षक, डाक विवभाग, लखनऊ को भी एक भिशकाय दI[6] की। Iां& क े बाद, यह प ा &ला विक 14. 05. 1992 को, मोहन नाम क े एक व्यविक्त को 13. 04. 1992 को पूव क्त रजिIस्ट्री प्राप्त हुई है।
12. अपने साक्ष्य में, भिशकाय क ा6-PW-2-देवेश क ु मार क े बेटे ने कहा है विक उक्त रजिIस्ट्री उनक े घर पर 13. 04. 1992 को प्राप्त हुई र्थीी और उक्त ति भिर्थी को वह घर पर मौIूद नहीं र्थीा क्योंविक वह सुबह 10: 00 बIे कोचिं&ग गया र्थीा और लगभग 04: 00 बIे वापस घर आया र्थीा। परिरदान प&1-प्रदश6-P[4] विदखाए Iाने पर, PW-2 ने स्पष्ट रूप से र्इनकार विकया विक यह उनक े हस् ाक्षर नही है। PW-2 ने आगे कहा विक अपीलक ा6 रजिIस्ट्री लेकर आया र्थीा और उसकी मां ने उन्हें प्राप्त विकया र्थीा। यह ब ाया Iाना &ाविहए विक परिरदान प&1 पर न ो “देवेश मोहन” का नाम और न ही “ PW-2 की मां” का नाम लिलखा गया र्थीा; लेविकन क ु छ अन्य बा लिलखी गई र्थीी PW-2-परिरदान प&1 क े सबू Ex.-P[4] में अपने हस् ाक्षर से र्इनकार कर े हैं अभिभयोIन पक्ष क े मामले का समर्थी6न करने वाले साक्ष्य का एक मूल्यवान भाग है। विन&ली अदाल ों ने समव 1 विनर्ष्णेकष” को सही ढंग से दI[6] विकया विक PW-2 क े साक्ष्य से अभिभयोIन पक्ष ने स्पष्ट रूप से स्र्थीाविप विकया है विक PW-2-देवेश मोहन ने Ex.-P4-परिरदान प&1 में हस् ाक्षर नहीं विकए र्थीे।
13. अभिभयोIन पक्ष PW-2-देवेश मोहन क े साक्ष्य की पुविष्ट करने क े लिलए क े वल हस् लेख विवशेषज्ञों की रिरपोट[6] पर विनभ6र कर ा है। बेशक, सरकारी फोरेंजिसक विवज्ञान प्रयोगशाला, लखनऊ द्वारा हस् लेख विवशेषज्ञ की रिरपोट[6] में कहा गया है विक जिIस व्यविक्त ने नमूना हस् ाक्षर “S-1 से S-6” लिलखा है उसने Ex.-P4-तिडलीवरी स्लिस्लप में विववाविद हस् ाक्षर “ Q-1” विकया र्थीा। फोरेंजिसक सार्इंस लेबोरेटरी, लखनऊ की रिरपोट[6] अपीलक ा6 क े पक्ष में है। लेविकन Iैसा विक विन&ली अदाल ों ने सही कहा है विक &ूंविक फोरेंजिसक सार्इंस लेबोरेटरी, लखनऊ क े हस् लेख विवशेषज्ञ की Iां& नहीं की गई र्थीी, र्इसलिलए उक्त रिरपोट[6] पर गौर नहीं विकया Iा सक ा है। यह ध्यान रखना उति& है विक अपीलक ा6-अभिभयुक्तों ने अपने ब&ाव की पुविष्ट क े लिलए सरकारी फोरेंजिसक विवज्ञान प्रयोगशाला, लखनऊ क े हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञ को भी नहीं बुलाया र्थीा।
14. Iैसा विक हो सक ा है, हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञ एम. वाई. खान (PW-5) ने अपनी रिरपोट6-एक्स-पी 9 में कहा है विक जिIस व्यविक्त ने नमूना हस् ाक्षर लिलखे र्थीे “एस-1 से एस-6” ने Ex. P4- परिरदान प&1 में विववाविद हस् ाक्षर “ Q-1” नहीं लिलखा र्थीा और यह विक PW-2-देवेश मोहन क े हस् ाक्षर से अलग है। PW-5 ने अपनी रिरपोट[6] में यह भी ब ाया र्थीा विक विववाविद हस् ाक्षर PW-2-देवेश मोहन क े सार्थी क ै से मेल नहीं खा े हैं। र्इसी रह, अपनी रिरपोट[6] में, हस् लेख विवशेषज्ञ जिसया राम गुप्ता ने यह भी कहा र्थीा विक Ex.-P4-परिरदान प&1 में विववाविद हस् ाक्षर PW-2-देवेश मोहन द्वारा नहीं लिलखे गए हैं। Iब मुकदमा &लाया गया, ब क हस् लेख विवशेषज्ञ जिसया राम गुप्ता का विन न हो गया और उनका बेटा-रंIी क ु मार (PW-8) Iो जिसया राम गुप्ता क े हस् लिलविप से परिरति& र्थीे आैर रिरपोट[6] को ति&वि} करने क े लिलए उपस्लिस्र्थी र्थीा।
15. अपीलक ा6 क े विवद्व अति वक्ता ने प्रस् ु विकया है विक स्व ंत्र और विवश्वसनीय पुविष्ट क े विबना, सIा को आ ार बनाने क े लिलए लिलखावट विवशेषज्ञों की राय पर भरोसा नहीं विकया Iा सक ा है। अपने क 6 क े समर्थी6न में, अपीलार्थी1 क े विवद्व अति वक्ता ने एस. गोपाल रेड्डी बनाम एपी राज्य (1996) 4 एस.सी.सी 596 पर अवलंम्ब लिलया है जिIसमें सव च्च न्यायालय ने विनम्न क े रूप में आयोजिI विकया: - “28. र्इस प्रकार, PW-3 क े सबू विनति˜ नहीं हैं और र्इसे विववाविद पत्रों क े सार्थी अपीलक ा6 को Iोड़ने क े लिलए एक वि™विनक प्रक ृ ति का नहीं कहा Iा सक ा है। एक विवशेषज्ञ का साक्ष्य बस्लिल्क एक कमIोर प्रकार का साक्ष्य है और अदाल ें आम ौर पर र्इसे 'विनर्णा6यक' सबू की पेशकश क े रूप में नहीं मान ी हैं और र्इसलिलए स्व ंत्र और विवश्वसनीय पुविष्ट प्राप्त विकए विबना उसी पर भरोसा करना सुरतिक्ष नहीं है। मगन विबहारी लाल(1977) 2 एससीसी 210, में हस् लेख विवशेषज्ञ क े साक्ष्य से विनपटने क े दौरान, र्इस न्यायालय ने यह म व्यक्त विकया: “.... हमें लग ा है विक हस् लेखन विवशेषज्ञ की राय क े सबू की क्षम ा क े आ ार पर अपीलक ा6 की दोषी करना बेहद ख रनाक होगा। अब यह अच्छी रह से य हो गया है विक विवशेषज्ञ की राय हमेशा बड़ी साव ानी क े सार्थी ली Iानी &ाविहए और शायद कोई भी हस् लेख विवशेषज्ञ की राय को अति क साव ानी क े सार्थी प्राप्त करना &ाविहए। पूव6व 1 प्राति कारी का एक प्र&ुर ा है Iो यह मान ा है विक पया6प्त पुविष्ट क े विबना विवशेषज्ञ की राय पर एक सIा को आ ार बनाना असुरतिक्ष है। र्इस विनयम पर साव6भौविमक रूप से कार6वाई की गई है और यह लगभग कानून का विनयम बन गया है। यह र्इस न्यायालय द्वारा राम &ंद्र बनाम उत्तर प्रदेश ए.आई.आर. 1957 एससी 381 में आयोजिI विकया गया र्थीा विक हस् लेख विवशेषज्ञ की राय को सIा क े लिलए पया6प्त आ ार क े रूप में मानना असुरतिक्ष है, लेविकन आं रिरक और बाहरी साक्ष्य क े आ ार पर अन्य मदों द्वारा समर्थिर्थी होने पर र्इस पर अवलम्ब लिलया Iा सक ा है। र्इस न्यायालय ने विक ईश्वरी प्रसाद विमश्रा बनाम मोहम्मद. र्इसा AIR 1963 SC 1728 को ति&स्लिन्ह कर े हुए कहा विक हस् लेख विवशेषज्ञ साक्ष्य कभी विनर्णा6यक नहीं हो सक े क्योंविक यह अन् ः, राय का साक्ष्य है, और र्इस दृविष्टकोर्ण को शभिश क ु मार बनI[1] बनाम सुबो क ु मार बैनI[1] ए.आई.आर. 1964 एस. सी. 529 दोहराया गया र्थीा, Iहां र्इस न्यायालय द्वारा यह र्इंविग विकया गया र्थीा विक विवशेषज्ञ क े साक्ष्य क े रूप में हस् लिलविप का साक्ष्य शायद ही कभी हो सक ा है, यविद कभी, सारवान साक्ष्य का स्र्थीान ले और ऐसे साक्ष्य पर काय[6] करने से पूव[6] यह विव&ार करना वांछनीय होगा विक क्या यह स्पष्ट प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा या पारिरस्लिस्र्थीति क साक्ष्य द्वारा पुविष्ट विकया गया है र्इस न्यायालय क े पास विफर से हस् लेख क े संबं में फखरुद्दीन बनाम एम.पी. राज्य ए.आर्इ[6].आर 1967 एस.सी 1326 में विवशेषज्ञ की राय क े स्पष्ट मूल्य पर विव&ार करने का अवसर र्थीा। राज्य और र्इनक े द्वारा एक साव ानी का नोट यह ति&स्लिन्ह कर े हुए विदया गया है, जिIसमें कहा गया है विक क े वल एक हस् लेख विवशेषज्ञ क े साक्ष्य पर दोषी पाया Iाना Iोलिखम भरा होगा और र्इस रह क े साक्ष्य पर कार6वाई करने से पहले, अदाल को हमेशा यह देखने की कोभिशश करनी &ाविहए विक क्या यह अन्य सबू ों, प्रत्यक्ष या परिरस्लिस्र्थीति Iन्य सबू ों द्वारा पुविष्ट की गई है।
16. बेशक, क े वल हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञ क े साक्ष्य पर सIा को आ ार बनाना सुरतिक्ष नहीं है। Iैसा विक उच्च म न्यायालय ने मगन विबहारी लाल बनाम पंIाब राज्य (1977) 2 एस.सी.सी. 210 में अभिभविन ा6रिर विकया है विक “विवशेषज्ञ राय हमेशा बड़ी साव ानी से ली Iानी &ाविहए...... पया6प्त पुविष्ट क े विबना विवशेषज्ञ की राय पर दोषी बनाना असुरतिक्ष है र्इस विनयम पर साव6भौविमक रूप से कार6वाई की गई है और यह विवति का विनयम बन गया है।
17. यह काफी अच्छी रह से य विकया गया है विक हस् लेख विवशेषज्ञ की राय पर कार6वाई करने से पहले, विववेक की आवश्यक ा है विक अदाल को यह देखना &ाविहए विक र्इस रह क े साक्ष्य अन्य प्रत्यक्ष या परिरस्लिस्र्थीति Iन्य साक्ष्य द्वारा पुविष्ट की Iा ी है। मुरारी लाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य में(1980) 1 एससीसी 704, में सव च्च न्यायालय ने विनम्न क े रूप में आयोजिI विकया: - 4.... सत्य, यह अवसर स्वरूप बहु उच्च् प्राति कारी क े लिलए कहा Iा ा है विक यह हस् लेख विवशेषज्ञ क े क 6 क े आ ार पर दोषी जिसद्घ करना ख रनाक होगा। विकन् ु विवशेषज्ञ, हस् लेख विवशेषज्ञ, विकसी अन्य प्रकार क े विवशेषज्ञ की राय स्वीकार करना ख रा र्इसलिलए नहीं है क्योंविक यह विवशेषज्ञ क े द्वारा विदया गया है बस्लिल्क सामान्य ः अविवश्वनीय साक्ष्य हाेने क े कारर्ण से है-विवश्वसनीय ा या अविवश्वसनीय ा की गुर्णवत्ता Iो विवशेषज्ञ अन्य सभी सातिक्षयों क े सार्थी शेयर कर ा है -विकन् ु &ूंविक सभी मानव विनर्ण6य प नशील है और विवशेषज्ञ अवलोकन क े क ु छ दोष, परिरसर की क ु छ गल ी या विनर्ष्णेकष[6] की ईमानदार गल ी क े कारर्ण गल ी कर सक ा है विवज्ञान जिI ना अति क विवकजिस और अति क पूर्ण[6] हो ा है, एक गल राय की संभावना कम हो ी है और यविद विवज्ञान कम विवकजिस और अपूर्ण[6] है ो उसका विवलोम हो ा है। उंगली क े विनशान की पह&ान का विवज्ञान पूर्ण[6] ा क े पास पहुं& गया है और एक गल राय का Iोलिखम व्यावहारिरक रूप से अस्लिस् त्वहीन है। दूसरी ओर, लिलखावट की पह&ान का विवज्ञान लगभग र्इ ना सही नहीं है और र्इसलिलए Iोलिखम अति क है। लेविकन यह एक हस् लेख विवशेषज्ञ की राय को एक अपरिरव 6नीय विनयम क े रूप में संदेह करने और प्रत्येक मामले में पया6प्त पुविष्ट पर Iोर देने से दूर है, यद्यविप वह राय कारर्णों मे भी सबसे अच्छा कारर्ण से समर्थिर्थी हो। एक विवशेषज्ञ क े लिलए प्रारंभिभक संदेह क े सार्थी उसकी राय को देखना और उसे एक हीन गवाह क े रूप में मानना शायद ही उति& है। उनकी राय को उनक े द्वारा विदए गए कारर्णों की स्वीकाय[6] ा द्वारा परीक्षर्ण विकया Iाना है। एक विवशेषज्ञ सग्रंह कर ा है और विनर्ण6य नहीं ले ा है। उसका क 6व्य “अपने विनर्ष्णेकष[6] की यर्थीार्थी6 ा का परीक्षर्ण करने क े लिलए आवश्यक वैज्ञाविनक मानदंड क े सार्थी न्याया ीश को प्रस् ु करना है ाविक साक्ष्य में साविब हुए थ्यों क े लिलए र्इन साक्ष्यों से जिसद्घ थ्यों क े मानदंडों क े लागू होने से न्याया ीश को अपना स्व ंत्र विनर्ण6य देने में समर्थी6 बनाया Iा सक े (लाड[6] प्रेजिसडेन्ट कोपर क े द्वारा डेविवस बनाम ई ं डुरघ मजिIस्ट्रेट, 1953 एस. सी. 34 में प्रो. क्रास द्वारा अपने साक्ष्य में उद्धु विकया गया) 5......
6. साक्ष्य अति विनयम की ारा 45 द्वारा विवशेषज्ञ परिरसाक्ष्य को सुसंग बनाया गया है और Iहां न्यायालय को लिलखावट की पह&ान क े बारे में एक विबन्दु पर राय बनानी है, वहां प्रश्न में “विवशेषकर क ु शल” व्यविक्त की हस् लिलविप की पह&ान क े बारे में राय स्पष्ट रूप से सुसंग थ्य बनाई गई है...........................................................................................................................................र्इसलिलए, हस् लेख विवशेषज्ञ की राय पर विव&ार करने से पहले सम्पुष्टी पर Iोर नहीं विदया Iा सक ा है और कोई प्रारंभिभक प्रयास की आवश्यक ा नहीं है। लेविकन, विकसी विवशेष मामले क े थ्यों पर, एक अदाल को अलग-अलग तिडग्री क े राज्याभिभषेक की आवश्यक ा हो सक ी है। कोई कविठन और ेज़ विनयम नहीं हो सक ा है, लेविकन क ु छ भी एकमात्र आ ार पर विबना विकसी कारर्ण क े समर्थिर्थी विवशेषज्ञ की राय की अस्वीक ृ ति को सही नहीं ठहराएगा विक यह पुविष्ट नहीं है। हस् लेखन विवशेषज्ञ की राय से विनपटने क े दौरान एक अदाल का दृविष्टकोर्ण साव ानी से आगे बढ़ना &ाविहए, राय क े कारर्णों की Iां& करना &ाविहए, अन्य सभी प्रासंविगक सबू ों पर विव&ार करना &ाविहए और अं में र्इसे स्वीकार करने या अस्वीकार करने का विनर्ण6य लेना &ाविहए। '
18. Iैसा विक पहले ब ाया Iा &ुका है, हस् लिललिख विवशेनज्ञों-एम. वाई. खान (PW-5) और जिसया राम गुप्ता ने यह म व्यक्त विकया है विक परिरदान प&1-एक्स-पी 4 में विववाविद हस् ाक्षर -“स-1” नमूना हस् ाक्षर से मेल नहीं खा ा-“S-1 से S-6” हैंड-रार्इटिंटग विवशेषज्ञों ने यह भी कहा है विक जिIस व्यविक्त ने नमूना हस् ाक्षर लिलखे र्थीे, उसने Ex.- P[4] में विववाविद हस् ाक्षर 'Q-1' नहीं लिलखा र्थीा। Iैसा विक नी&े की अदाल ों द्वारा ब ाया गया है, हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञ क े साक्ष्य PW-2-देवेश मोहन क े साक्ष्य को पुष्ट करने क े लिलए अभिभयोIन पक्ष द्वारा विदए गए साक्ष्य हैं जिIन्होंने एक्स-पी 4 में अपने हस् ाक्षर से र्इनकार विकया है। अपीलक ा6 क े लिलए विवद्व अति वक्ता यह क 6 देने में सही नहीं है विक विन&ली अदाल ों ने क े वल हार्थी से लिलखने वाले विवशेषज्ञों की राय पर सIा को आ ार बनाया है। पीडब्ल्यू-2-देवेश मोहन क े साक्ष्य को पुष्ट करने क े लिलए हस् लेख विवशेषज्ञों का प्रमार्ण क े वल साक्ष्य का एक आ ारभू भाग है।
19. PW 1 से 3 और अन्य साक्ष्यों क े साक्ष्य क े आलोक में, उच्च न्यायालय ने सही पाया विक भिशकाय क ा6 -PW-1 क े स्र्थीान पर पंIीक ृ लिलफाफा देने वाले अपीलक ा6 को यह ब ाने क े लिलए बाध्य विकया गया है विक कभिर्थी हस् ाक्षर Ex.-P4-विपरदान प&1 में विकसने विकए हैं । अपीलक ा6-अभिभयुक्त द्वारा विकसी भी स्पष्टीकरर्ण क े अभाव में, Iैसा विक उच्च न्यायालय द्वारा आयोजिI विकया गया है, अपीलक ा6 क े लिखलाफ एक अनुमान लगाया Iाना है जिIसने लिलफाफा विदया र्थीा क्योंविक वह एकमात्र व्यविक्त है अौर उसी को उसका ज्ञान है। PW-3- आर क े साक्ष्य से। एमएल वार्ष्णेर्ण`य, अभिभयोIन पक्ष ने साविब विकया है विक लिलफाफ े में प्रत्येक रु. 5,000/- क े मूल्य क े &ार मूल्यवान सुरक्षा र्इंविदरा विवकास पत्र र्थीे, Iो क ु ल रु. 20, 000/- र्थीा। अभिभयोIन पक्ष द्वारा Iोड़े गए सबू ों की सराहना करने पर, विन&ली अदाल ों ने समव 1 विनर्ष्णेकष” को सही ढंग से दI[6] विकया विक अपीलक ा6 ने PW-2- देवेश मोहन क े हस् ाक्षर को Iाली कर विदया है और ारा 467 और 468 आईपीसी क े ह अपीलक ा6 की सIा सबू ों पर आ ारिर है और सIा विकसी भी दुब6ल ा वारंट हस् क्षेप से ग्रस् नहीं है।
20. आईपीसी की ारा 467 क े ह सIा क े लिलए अपीलक ा6 को &ार साल क े कारावास और आईपीसी की ारा 468 क े ह अपीलक ा6 को 500/- रुपये क े Iुमा6ने क े सार्थी ीन साल क े कारावास की सIा सुनाई गई है। घटना वष[6] 1992 की र्थीी। Iैसा विक अभिभरक्षा प्रमार्ण पत्र से देखा गया है, अपीलक ा6 04. 07. 2018 से यानी अठारह महीने से अति क की अवति से विहरास में है। यह देख े हुए विक घटना वष[6] 1992 की र्थीी और मामले क े थ्य और परिरस्लिस्र्थीति याँ, अपीलार्थी1 पर लगाए गए कारावास की सIा पहले व्य ी की गर्इ[6] सIा से घटा देना है।
21. परिरर्णाम में, ारा 467 और 468 आईपीसी क े ह अपीलार्थी1- अभिभयुक्त की सIा की पुविष्ट की Iा ी है और उस पर लगाए गए कारावास की सIा पहले से की गर्इ[6] सIा से कम कर दी गर्इ[6] है। आपराति क संशो न सं. 511/ 2006 में र्इलाहाबाद क े उच्च न्यायालय क े न्यातियक द्वारा पारिर आक्षेविप आदेश 19. 02. 2018 को लागू विकया गया, विनर्ण6य दनुसार संशोति विकया गया है और अपील आंभिशक रूप से अनुम है। अपीलार्थी1-अभिभयुक्त को ब क रिरहा करने का आदेश विदया Iा ा है Iब क विक उसकी उपस्लिस्र्थीति विकसी अन्य मामले में आवश्यक न हो।................................ [न्यायमूर्ति आर. भानुमति ]............................... [न्यायमू 1 ए.एस. बोपन्ना] नई विदल्ली;