Full Text
उच्च म न्यायालय क
े समक्ष
अपराति क अपीलीय अति कारिर ा
अपराति क अपील संख्या - 250/2020
विवशेष अनुमति याति$का (अपराति क) संख्या - 5224/2017
अरून सिंसह आैर अन्य .......अपीलार्थी1(गण)
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य क
े सति$व आैर अन्य क
े द्वारा .......प्रति वादी(गण)
विनण9य
JUDGMENT
1. अनुमति प्रदान की गर्इ9।
2. यह अपील उच्च न्यायालय 1 द्वारा पारिर 24.11.2016 क े आक्षेविप विनण9य और आदेश क े विवरुद्ध विनद@शिश है, जिCसमें अपीलक ा9ओं द्वारा आपराति क प्रविFया संविह ा की ारा 482 (संक्षेप में 'सीआरपीसी) क े ह दायर याति$का को खारिरC कर े हुए उनक े खिखलाफ दायर आरोपपत्र को $ुनौ ी दी गई है उच्च न्यायालय ने vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 2020 INSC 163 सीआरपीसी की ारा 482 को खारिरC कर े हुए आरोपी अपीलक ा9ओं को आदेश की ारीख से 30 विदनों क े भी र संबंति न्यायालय क े समक्ष आत्मसमप9ण करने का विनद@श विदया और यविद वे विन ा9रिर अवति क े भी र ऐसा कर े हैं और Cमान क े खिलए आवेदन कर े हैं, अमराव ी आैर अन्य बनाम यूपी राज्य क े मामले में उच्च न्यायालय की पूण[9] पीठ द्वारा विन ा9रिर कानून क े मद्देनCर ो र्इस पर विव$ार विकया Cा सक ा है और विनण9य खिलया Cा सक ा है आैर र्इसे लाल कमलेंद्र प्र ाप सिंसह बनाम यूपी राज्य में र्इस अदाल द्वारा पुविX की गई।
3. अनावश्यक विववरणों क े बारे में संतिक्षप्त थ्य Cो र्इस अपील को दाखिखल करने क े खिलए प्रेरिर कर े हैं, को विनम्नानुसार संक्षेप में प्रस् ु विकया Cा सक ा है प्रत्यर्थी1 संख्या 2 ने पुखिलस स्टेशन र्इज्ज नगर, जिCला बरेली में अपीलक ा9ओं क े खिखलाफ आईपीसी की ारा 493 आैर दहेC प्रति षे अति विनयम की ारा 3/4 क े ह प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] दC[9] की, जिCसे अपरा संख्या 431/2014 क े रूप में दC[9] विकया गया र्थीा। प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] में आरोप लगाये गये र्थीे विक प्रत्यर्थी1 संख्या -2 अपीलार्थी1 क े पास अपनी पुत्री 'ज्यो ी' क े विववाह का प्रस् ाव अपीलार्थी1 संख्या 1 क े खिलए उनक े पास गये र्थीे। विदनांक 30 Cून 2013 को अपीलार्थी1 प्रत्यर्थी1 संख्या 2 क े र गया आैर उनकी पुत्री से विमलने क े पश्चा प्रस् व क े खिलए सहम ी दे दी। विदनांक 21.07.2013 को सगार्इ[9] समारोह हुआ र्थीा आैर विववाह की ति र्थीी 19.11.2013 को य कर दी गर्इ[9] र्थीी। र्इसक े पश्चा, अपीलार्थी1 संख्या -2 शिशकाय क ा9/प्रत्यर्थी1 संख्या -2 क े घर अक्सर आना Cाना प्रारम्भ कर विदया आैर उसकी पुत्री को बहकाने लगा विक क्याकी उनका विववाह य हो गया आैर क े वल 'फ े रा' की रस्म ब$ी है आैर विवशिभन्न अवसरों में उसे बाहर ुमाने ले गया। विदनांक 16.08.2013 को अपीलार्थी1 संख्या -2 ज्यो ी को एक कमरे में ले Cाने क े खिलए प्रेरिर विकया आैर उसक े सार्थी शारीरिरक सम्बन् स्र्थीाविप विकये। हालांविक, र्इसक े अति रिरक्त अपीलार्थी1 पाँ$ लाख रूपये की राशी को दहेC क े रूप माँगना प्रारम्भ कर विदया। र्इस सम्बन् में एक शिशकाय मविहला र्थीाना में दC[9] करार्इ[9] गर्इ[9] परन् ु कोर्इ[9] vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk काय9वाही नही की गर्इ9। यह Cानने क े पश्चा विक अपीलार्थी1 संख्या -2 की शादी विकसी अन्य लड़की क े सार्थी दहेC की मोटी रकम क े सार्थी य कर दी गर्इ[9] है, प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] दC[9] करा दी गर्इ[9] र्थीी।
4. मामले की फ् ीश सम्बन्धिन् पुखिलश स्टेशन क े द्वारा की गर्इ[9] आैर अपीलार्थी1 क े विवरूद्घ एक आरोपपत्र दायर विकया गया, जिCसे उच्च न्यायायल क े समक्ष रिरट याति$का सी.आर.पी.सी की ारा 482 क े ह $ुनौ ी दी गर्इ9।
5. वाद को उच्च न्यायालय क े समक्ष अपीलार्थी1 क े द्वारा यह कह े हुए प्रस् ु विकया विक शिशकाय क ा9 आैर परिरवार क े सदस्यों का व्यवहार शादी की ति र्थीी य करने क े पश्चा बदल गया आैर उन्हाेनें शादी क े ख$k को साझा करने से र्इंकार कर विदया जिCसे पक्षकारों क े मध्य बराबर वहन करने की सहम ी बनी र्थीी। र्इसक े आगे, अपीलार्थी1 से 10 लाख रूपये की माॅंग यह मका े हुए विकया विक उन्हे एक झूठे क े श में फसा देगें यविद उनकी माॅंग पूरी न की गर्इ9। आगे यह दलील दी गर्इ[9] विक अपीलार्थी1 संख्या -2 ने सीआरपीसी की ारा 156(3) क े ह एक आवेदन शिशकाय क ा9 आैर अन्य परिरवार क े सदस्यों क े विवरूद्घ एसीCेएम क े समक्ष प्रस् ु विकया। काय9वाही में देरी क े कारण अपीलार्थी1 संख्या - 2 क े द्वारा एक शिशकाय सीआरपीसी की ारा 156(3) क े ह मविहला र्थीाना में दC[9] करार्इ[9] गर्इ9। मविहला र्थीाना क े प्रभारी विनरीक्षक क े द्वारा दोनों विववाविद पक्षकारों को समझौ ा करने क े खिलए बुलाया। समक्षौ े क े दृविXकोण से उपन्धिस्र्थी हुए अपीलार्थी1 अावेदन को सीआरपीसी की ारा 156(3) क े ह दायर नहीं विकया। हालाकिंक, शिशकाय क ा9-प्रति वादी संख्या -2 समझौ े क े 10 माह क े पश्चा प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] दC[9] करवार्इ9।
6. उच्च न्यायालय क े विनष्कष[9] यह है विक याति$का को खारिरC करने क े खिलए आैर आरोप पत्र को खारिरC करने का कोर्इ[9] अति कार नही र्थीा। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk
7. अपीलार्थी1 क े खिलए विवद्व अति वक्ता ने Cोर देकर क 9 विदया विक उच्च न्यायालय क े द्वारा मामलें को विव$ारण करने आैर मुल्याकन करनें में असफल रहा विक नये अपराति क क ृ त्य को उसी वादहे ुक क े ह प्रस् ु नहीं विकया Cा सक ा जिCसे पहले 10 महा पूव[9] समझौ े क े द्वारा य कर विदया गया र्थीा जिCसे दोनों पक्षकारों क े द्वारा विकया गया र्थीा।
8. विवद्व अति वक्ता ने आगे दलील दी विक उच्च न्यायालय क े द्वारा मामलें को विव$ारण करने आैर मुल्याकन करनें में असफल रहा विक यद्यविप प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] में लगाये गये आरोप यविद पूण[9] रूप से देखा Cाये आैर पूण[9] रूप से सही माना Cाये ो प्रर्थीमदृXया विकसी अपरा करने क े बारे मे नहीं ब ा े है आैर एक ुच्छ संज्ञेय अपरा मात्र है। अपीलार्थी1 की रफ से यह भी कहा गया है विक उच्च न्यायालय ने सभी थ्यों को सही से मूल्यांकन आैर विव$ारण नहीं विकया विक एफ.आर्इ[9].आर में दC[9] आरोप, प्रर्थीमदृXया, विकसी आपरा का गठन नहीं कर े आैर 482 की याति$का को विबना उल्लेख विकए हुए मामले क े पहलू को देख े हुए खरिरC करने योग्य है।
9. प्रति वादी क े खिलए उपन्धिस्र्थी विवद्व अति वक्ता क े अपीलक ा9 की रफ से प्रस ु उक्त कk का खंडन विकया गया आैर कहा विक प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] भार ीय दण्ड सकिंह ा (संक्षेप में आर्इ[9].पी.सी.) की ारा 493 क े सार्थी दहेC प्रति षे अति विनयम की ारा ¾ क े ह दC[9] करार्इ[9] गर्इ[9] है आैर उपराेक्त अपरा प्रकृ ति में अशमनीय अपरा है आैर र्इस प्रकार उनका समझौ ा नही विकया Cा सक ा है। प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] में लगाये आरोप विववे$ना में सही पाये गये है आैर र्इस प्रकार पुखिलस क े दाखिखल आरोपपत्र क े ह उच्च न्यायालय ने उपरोक्त क े खंडन क े खिलए याति$का को खारिरC कर सही विकया। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk
10. हमने विवरो ी दलीलों पर विव$ार विकया है आैर अशिभलेखिख थ्यों का अवलोकन विकया है।
11. ारा 493 क े ह अपरा अ-शमनीय अपरा है। र्इसी प्रकार दहेC प्रति षे अति विनयम की ारा ¾ क े ह भी अपरा अ-शमनीय है, उपरोक्त अति विनयम की ारा 8(2) क े दृविXकोण में, Cो हमे यह ब ा ा है विक र्इस अति विनयम क े ह प्रत्येक अपरा गैरCमान ीय आैर अशमनीय होगें।
12. यद्यविप प्रश्नग अपरा अशमनीय अपरा है लेविकन न्यायालय की सीआरपीसी की ारा 482 क े ह उच्च न्यायालय द्वारा र्इस प्रकार क े अपरा ों की काय9वाही को समाप्त करने की शविक्तयाॅं र्इस न्यायालय क े विवशिभन्न विनण9यों से मान्य ा प्राप्त है आैर मुद्दा अब अविनण[1] विवषय नही है र्इस न्यायालय ने ीन न्यया ीश की पीठ क े जिCयान सिंसह बनाम पंCाब राज्य वाद में विदए गये अवलोकनों का सन्दभ[9] विदया गया है। “ ब$ावक ा9 आैर पीविड़ पक्ष क े मध्य समझौ े क े आ ार पर अपराति क काय9वाविहयों का खडंन अपरा का शमनीय करने क े समान नहीं है। वे शिभन्न है आैर परिरव 9नीय नही है। ारा 320 क े ह न्यायालय को प्रदत्त अपरा को शमन करने की शविक्तयाँ उच्च न्यायालय क े अन् 9विनविह क्षेत्राति कार क े ह अपराति क काय9वाविहयों का खड़ंन करने की शविक्तयाँ क े विवषय में कडा़र्इ[9] से कहा विक वह भौति क रूप से शिभन्न है। अपरा को शमन कर े हुए एक आपराति क न्यायालय की शविक्त ारा 320 में विनविह प्राव ानों द्वारा परिर$ाखिल है आैर न्यायालय पूरी रह से विनद@शिश है आैर Cबविक दूसरी ओर, एक दन्धिण्डक अपरा या आपराति क काय9वाही या आपराति क शिशकाय को रद्द करने क े खिलए उच्च न्यायालय द्वारा राय का गठन अशिभलेखिख सामग्री द्वारा विनद@शिश हो ा है विक क्या न्याय क े उद्देश्य शविक्त क े र्इस रह क े प्रयोग को उति$ ठहराएंगे, हालांविक अं ः परिरणाम अशिभयोग से बरी या बखा9स् गी हो सक ा है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk बी.एस. Cोशी, विनखिखल म$€ट, मनोC शमा9 और शिशCी को र्इस जिसद्धां को स्पX करने क े खिलए विक उच्च न्यायालय आपराति क काय9वाही या प्रार्थीविमकी या शिशकाय को संविह ा की ारा 482 क े ह अपनी अं र्निनविह शविक्त का प्रयोग करक े रद्द कर सक ा है और ारा 320 ारा 482 क े ह उच्च न्यायालय की शविक्तयों को सीविम या प्रभाविव नहीं कर ा। क्या यह कहा Cा सक ा है विक बी.एस. Cोशी, विनखिखल म$€ट, मनोC शमा9 और शिशCी र्इस न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से गैर-शमनीय अपरा ों को कम विकया है? हम ऐसा नहीं सो$ े। ारा 320 क े ह और ारा 482 क े ह विकसी अपरा क े गठन क े खिलए विनविह शविक्त क े प्रयोग में एक उच्च न्यायालय द्वारा एक आपराति क मामले को रद्द करने क े बी$ अं र मौCूद है। दोनों शविक्तयां शिभन्न आैर अलग हैं, हालांविक अंति म परिरणाम एक ही हो सक ा है Cैसे आरोपी को बरी करना या अशिभयोग को खारिरC करना।
13. परब भाई अहीर और अन्य बनाम गुCरा राज्य और अन्य५ क े मामले में र्इस न्यायालय की एक अन्य ीन न्याया ीशों की खंडपीठ ने उदाहरणों का विवश्लेषण करने क े बाद, उपरोक्त मुद्दे ने रिरपोट[9] क े पैराग्राफ 15 में व्यापक जिसद्धां ों को संक्षेप में प्रस् ु विकया है:-
15. “ र्इस विवषय पर उदाहरणों से उत्पन्न होने व्यापक जिसद्धां ों को विनम्नखिलखिख प्रस् ावों में संक्षेविप विकया Cा सक ा है: (I). ारा 482 विकसी भी अदाल की प्रविFया क े दुरुपयोग को रोकने या न्याय क े अं को सुरतिक्ष करने क े खिलए उच्च न्यायालय की अं र्निनविह शविक्तयों को सुरतिक्ष रख ा है। यह प्राव ान नई शविक्तयां प्रदान नहीं कर ा है। यह क े वल उन शविक्तयों को मान्य ा दे ा है और संरतिक्ष कर ा है Cो यहां उच्च न्यायालय में विनविह हैं; (II) प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] या आपराति क काय9वाही को र्इस आ ार पर रद्द करने क े खिलए उच्च न्यायालय क े अति कार क्षेत्र का आह्वान विक अपरा ी vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk और पीविड़ क े बी$ समझौ ा हो गया है, अपरा क े गठन क े उद्देश्य क े खिलए अति कार क्षेत्र क े आह्वान क े समान नहीं है। विकसी अपरा का गठन होने पर, अदाल की शविक्त दंड प्रविFया संविह ा, 1973 की ारा 320 क े प्राव ानों द्वारा शाजिस हो ी है। Cबकी अपरा यविद गैर -शमनीय हाे ो ारा 482 क े ह रद्द करने की शविक्त आकर्निष हो ी है। (III) एक राय बनाने में विक क्या ारा 482 क े ह अपने अति कार क्षेत्र क े प्रयोग में एक आपराति क काय9वाही या शिशकाय को रद्द कर विदया Cाना $ाविहए या उच्च न्यायालय को यह मूल्यांकन करना $ाविहए विक क्या न्याय क े उद्देश्य विनविह शविक्त क े प्रयोग को उति$ ठहराएंगे।
(IV) Cबविक उच्च न्यायालय की अं र्निनविह शविक्त का दायरा बहु व्यापक और बहु ाय है आैर र्इसका प्रयोग (i) ) न्याय क े लक्ष्य को सुरतिक्ष करने क े खिलए या (i) i) ) विकसी अदाल की प्रविFया क े दुरुपयोग को रोकने क े खिलए विकया Cाना है; (V) शिशकाय या प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] को र्इस आ ार पर रद्द करने का विनण9य विक अपरा ी और पीविड़ ने विववाद सुलझा खिलया है, अं ः प्रत्येक मामले क े थ्यों और परिरन्धिस्र्थीति यों पर विनभ9र कर ा है और जिसद्धां ों का कोई विवस् ृ विववरण ैयार नहीं विकया Cा सक ा है; (VI) ारा 482 क े ह शविक्त क े प्रयोग में और एक याति$का पर विव$ार कर े समय विक विववाद का विनपटारा हो गया है, उच्च न्यायालय को अपरा की प्रक ृ ति और गंभीर ा का उति$ ध्यान रखना $ाविहए।मानजिसक विवक ृ ति या हत्या, बलात्कार और डक ै ी Cैसे अपरा ों से Cुड़े Cघन्य और गंभीर अपरा ों को उति$ रूप से रद्द नहीं विकया Cा सक ा है, हालांविक पीविड़ या पीविड़ क े परिरवार ने विववाद को सुलझा खिलया है। र्इस रह क े अपरा, वास् व में, प्रक ृ ति में विनCी नहीं हैं, लेविकन समाC पर गंभीर प्रभाव डाल े हैं। ऐसे मामलों में सुनवाई Cारी रखने का विनण9य गंभीर अपरा ों क े खिलए vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk व्यविक्तयों को दंतिड करने में साव9Cविनक विह क े प्रमुख त्व पर आ ारिर है;
(VII) Cैसा विक गंभीर अपरा ों से अलग है, ऐसे आपराति क मामले हो सक े हैं जिCनमें दीवानी विववाद का अपरिरहय[9] या प्रमुख त्व हो। Cहां क रद्द करने की अं र्निनविह शविक्त क े प्रयोग का संबं है, वे एक अलग पायदान पर खड़े हैं
(vi) i) i) ) वाशिणन्धिज्यक, विवत्तीय, व्यापारिरक, साझेदारी या अविनवाय[9] रूप से नागरिरक स्वाद क े सार्थी र्इसी रह क े लेन-देन से उत्पन्न होने वाले अपरा ों से Cुड़े आपराति क मामले उति$ परिरन्धिस्र्थीति यों में रद्द विकये Cा सक े हैं Cहां पक्षकारों ने विववाद सुलझा खिलया है (IX) ऐसे मामले में, उच्च न्यायालय आपराति क काय9वाही को रद्द कर सक ा है यविद विववाविद व्यविक्तयों क े बी$ समझौ े को देख े हुए, दोषजिसतिद्ध की संभावना बहु कम है और आपराति क काय9वाही Cारी रहने से उत्पीड़न और पूवा9ग्रह पैदा होगा; र्थीा (X) उपरोक्त प्रस् ावों (vi) i) i) ) और (i) x) ) में विन ा9रिर जिसद्धां का अभी क अपवाविद है। राज्य क े विवत्तीय और आर्थिर्थीक कल्याण से Cुड़े आर्थिर्थीक अपरा ों क े विनविह ार्थी9 हैं Cो विनCी विववादों क े बी$ एक मात्र विववाद क े दायरे से परे हैं। उच्च न्यायालय को उस मामले को रद्द करने से र्इंकार करना उति$ होगा Cहां अपरा ी विवत्तीय या आर्थिर्थीक ोखा ड़ी क े अपरा क े समान गति विवति में शाविमल है। विवत्तीय या आर्थिर्थीक प्रणाली पर शिशकाय विकए गए अति विनयम क े परिरणाम सं ुलन में होंगे।.”
14. नरिंरदर सिंसह बनाम पंCाब राज्य क े मामले६ क े एक अन्य विनण9य में यह देखा गया है विक समाC क े खिखलाफ अपरा क े संबं में अपरा ी को दंतिड करना क 9व्य है। र्इसखिलए, यहां क विक Cहां अपरा ी और पीविड़ क े बी$ समझौ ा हो गया है, vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk वही मान्य नहीं होगा क्योंविक यह समाC क े विह में है विक अपरा ी को दंतिड विकया Cाना $ाविहए Cो दूसरों क े खिलए समान अपरा करने से रोक ा है। दूसरी ओर, उस श्रेणी में आने वाले अपरा हो सक े हैं Cहां आपराति क कानून क े सु ारात्मक उद्देश्य को विनवारक दंड क े जिसद्धां की ुलना में अति क महत्व देना होगा। ऐसे मामलों में, अदाल की राय हो सक ी है विक पक्षकारों क े बी$ एक समझौ ा उनक े बी$ बेह र संबं ों को बढ़ावा देगा और एक विनCी विववाद को हल करेगा और र्इस प्रकार काय9वाही या शिशकाय या प्रार्थीविमकी या Cैसा भी मामला हो को रद्द करने क े खिलए ारा 482 सीआरपीसी क े ह शविक्त का प्रयोग कर सक ा है।
15. उपरोक्त जिसद्धां ों को ध्यान में रख े हुए, Cो विन ा9रिर विकए गए हैं, उनमें हमारा विव$ार है विक जिCन अपरा ों क े खिलए अपीलक ा9ओं को आरोविप विकया गया है, वे वास् व में समाC क े खिखलाफ अपरा हैं और प्रक ृ ति में विनCी नहीं हैं। ऐसे अपरा ों का समाC पर गंभीर प्रभाव पड़ ा है और ऐसे मामलों की सुनवाई Cारी रखना ऐसे गंभीर अपरा ों क े खिलए व्यविक्तयों को दंतिड करने में साव9Cविनक विह ों क े गंम्भीर प्रभाव पर आ ारिर है। यह न ो वाशिणन्धिज्यक, विवत्तीय, व्यापारिरक, साझेदारी या र्इसी रह क े लेन-देन से उत्पन्न होने वाला अपरा है या र्इसमें नागरिरक विववाद का कोई त्व है, र्इसखिलए यह एक अलग स् र पर खड़ा है। ऐसे मामलों में, शिशकाय क ा9 और आरोपी क े बी$ समझौ ा होने पर भी, वह प्रार्थीविमकी या आरोपपत्र रद्द करने क े खिलए एक वै आ ार नहीं बन सक ा है।
16. र्इस प्रकार उच्च न्यायालय को पक्षकारों क े बी$ समझौ े क े आ ार पर आरोप पत्र को रद्द करने से र्इनकार करने को अनुति$ नहीं कहा Cा सक ा है।
17. अगला मुद्दा Cो विव$ारण क े खिलए उत्पन्न हो ा है वह यह है विक क्या एफआईआर में लगाए गए आरोप एक अपरा क े क ृ त्य का गठन कर े हैं। Cैसा विक यहां ऊपर कहा Cा $ुका है, अपीलक ा9ओं पर भार ीय दंड संविह ा की ारा 493 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk और दहेC विनषे अति विनयम की ारा 3 क े सार्थी पविठ ारा 4 क े ह आरोप लगाया गया है। ारा 493 र्इस प्रकार है:- "विवति पूण[9] विववाह का प्रवं$ना से विवश्वास उत्प्रेरिर करने वाले पुरुष द्वारा कारिर सहवास- हर पुरुष Cो विकसी स्त्री को, Cो विवति पूव9क उससे विववाविह न हो, प्रवं$ना से यह विवश्वास कारिर करेगा विक वह विवति पूव9क उससे विववाविह है और र्इस विवश्वास में उस स्त्री का अपने सार्थी सहवास या मैर्थीुन कारिर करेगा, वह दोनों में से विकसी भांति क े कारावास से, जिCसकी अवति दस वष[9] क की हो सक े गी, दन्धिण्ड विकया Cाएगा और Cुमा9ने से भी दण्डनीय होगा ।"
18. ारा का एक सादा वा$न यह दशा9 ा है विक र्इस ारा क े ह अपरा का गठन करने क े खिलए, यह प्रदर्थिश करना होगा विक एक पुरुष ने ोखे से विकसी भी मविहला को, Cो उससे कानूनी रूप से विववाविह नहीं है, यह विवश्वास करने क े खिलए प्रेरिर कर ा विक वह कानूनी विववाविह पत्नी रूप से है और उसक े सार्थी सहवास कर ा है। दूसरे शब्दों में, अशिभयुक्त को एक मविहला को, Cो उसक े सार्थी कानूनी रूप से विववाविह नहीं है, यह विवश्वास करने क े खिलए प्रेरिर करना $ाविहए विक वह उससे विववाविह है और र्इस रह क े गल प्रति विनति त्व क े परिरणामस्वरूप, मविहला को यह विवश्वास करना $ाविहए विक उसका पुरुष से कानूनी रूप से विववाह हुआ र्थीा और र्इस प्रकार ऐसा सहवास या संभोग होना $ाविहए।
19. राम $ंद्र भग बनाम झारखंड राज्य क े मामले में र्इस न्यायालय की ीन- न्याया ीशों की खंडपीठ ने आर्इ[9].पी.सी. की ारा 493 क े प्राव ानों का विवश्लेषण करने क े बाद विनम्नानुसार अव ारिर विकया है: - " ारा 493 आईपीसी क े अवलोकन पर, यह स्र्थीाविप करने क े खिलए विक एक व्यविक्त ने उक्त ारा क े ह अपरा विकया है, यह स्र्थीाविप विकया Cाना $ाविहए विक एक व्यविक्त ने ोखे से एक मविहला को विवश्वास विदलाया र्थीा, Cो उससे कानूनी रूप से विववाविह नहीं है, विक वह एक है उस व्यविक्त की vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk कानूनी रूप से विववाविह पत्नी और उसक े बाद उसे सहवास करना $ाविहए या उस व्यविक्त क े सार्थी संभोग करना $ाविहए र्थीा। उपरोक्त ारा को देख े हुए, यह स्पX है विक आरोपी को एक मविहला को, Cो उसक े सार्थी कानूनी रूप से विववाविह नहीं है, यह विवश्वास करने क े खिलए प्रेरिर करना $ाविहए विक वह उससे विववाविह है और उपरोक्त बहकावे क े परिरणामस्वरूप,मविहला को विवश्वास करना $ाविहए विक उसने उससे कानूनी रूप से शादी की र्थीी और ोखे क े परिरणामस्वरूप सहवास या संभोग होना $ाविहए।" "यविद एक मविहला को एक अविववाविह से एक विववाविह मविहला की न्धिस्र्थीति बदलने क े खिलए प्रेरिर विकया Cा ा है, ो बदले हुए रिरश् े से संबंति सभी क 9व्यों और दातियत्वों क े सार्थी और उस परिरणाम को छल से पूरा विकया Cा ा है ो विव ी क े अन् ग[9] ऐसी मविहला को कहा Cा सक ा है विक उसे ोखा विदया गया है और ारा 493 आईपीसी क े ह अपरा को माना Cा सक ा है। एक व्यविक्त द्वारा ोखे से विकसी मविहला को अविववाविह मविहला से कानूनी रूप से विववाविह मविहला क े रूप में अपनी न्धिस्र्थीति बदलने क े खिलए प्रेरिर करना और उस प्रलोभन पर उसक े सार्थी सहवास करना र्इस विवश्वास में विक वह उससे कानूनी रूप से विववाविह है, ारा 493 क े ह अपरा का गठन कर ा है।पीविड़ मविहला को वह करने क े खिलए प्रेरिर विकया गया है, लेविकन झूठी प्रर्थीा क े खिलए, उसने ऐसा नहीं विकया होगा और उसकी सामाजिCक और घरेलू न्धिस्र्थीति को बदलने क े खिलए उसे प्रेरिर विकया गया है। ारा 493 क े अवयवों को जिसद्ध होने पर पूण[9] ः सं ुX कहा Cा सक ा है।- (अ) एक वै विववाह क े अन्धिस् त्व का झूठा विवश्वास पैदा करने वाला ोखा, और (ब) ऐसा विवश्वास पैदा करने वाले व्यविक्त क े सार्थी सहवास या संभोग। व्यविक्तग कानून क े अनुसार विववाह क े थ्य को स्र्थीाविप करना आवश्यक नहीं है, लेविकन एक पुरुष द्वारा एक मविहला को एक अविववाविह से कानूनी रूप से विववाविह मविहला की न्धिस्र्थीति में अपनी न्धिस्र्थीति बदलने और विफर उस मविहला को उसक े सार्थी रहने क े खिलए प्रेरिर करने का सबू आवश्यक है। ारा 493 आईपीसी क े ह अपरा स्र्थीाविप कर ा है।"
20. आईपीसी की ारा 493 क े ह एक अपरा का मूल त्व यह है विक एक पुरुष द्वारा एक मविहला पर ोखे का अभ्यास है, जिCसक े परिरणामस्वरूप मविहला को यह विवश्वास हो Cा ा है विक वह उससे कानूनी रूप से विववाविह है, हालांविक वह नहीं है और विफर उसे उसक े सार्थी सहवास करना। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk
21. ोखे को विकसी व्यविक्त द्वारा Cानबूझकर और लापरवाही से र्इस आशय से विदया गया झूठा बयान कहा Cा सक ा है विक उस पर विकसी अन्य द्वारा कार9वाई की Cाएगी, Cो उस पर विवश्वास करने क े बाद उस पर कार9वाई करने क े बाद एक कानूनी काय9वाही का शिशकार हो ा है। यह ोखा देने का एक प्रयास है और र्इसमें ऐसी घोषणा और बयान शाविमल है Cो दूसरों को गुमराह कर ा है या उसे विवश्वास विदला ा है Cो अन्यर्थीा गल और गल है।
22. दूसरे शब्दों में, ारा 493 आईपीसी क े ह एक अपरा का गठन करने क े खिलए, प्रार्थीविमकी में आरोपों को प्रदर्थिश करना $ाविहए विक अपीलक ा9 ने शिशकाय क ा9 की बेटी क े सार्थी ोखा देकर बहकाया र्थीा, जिCससे वै विववाह क े अन्धिस् त्व का झूठा विवश्वास पैदा हुआ और जिCसक े कारण वह उसक े सार्थी रहने लगी।
23. एफ.आई.आर. क े अवलोकन से, हम यह नहीं पा े हैं विक र्इसमें लगाए गए आरोपों को आईपीसी की ारा 493 क े ह विकसी भी अपरा का गठन करने क े खिलए कहा Cा सक ा है। पीविड़ ा को यह विवश्वास विदलाने क े खिलए विक उसने अपीलक ा9 से कानूनी रूप से शादी की र्थीी, विकसी भी प्रलोभन या विकसी ोखे का आरोप नहीं है, Cो उसे आरोपी अपीलक ा9 संख्या 1 क े सार्थी संभोग करने क े खिलए गुमराह कर ा है। र्इस संबं में प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] में क े वल आरोप यह है विक "शादी य होने क े बाद, अपीलक ा9 सख्यां 1 शिशकाय क ा9 क े घर बार-बार आना शुरू कर दे ा र्थीा और उनकी बेटी को गुमराह और उकसा ा र्थीा विक उनका विववाह य हो गया है और क े वल 'फ े रा होना' शेष है। दुभा9ग्यपूण[9] विदन, यानी 16.08.2013 को, अपीलक ा9 नंबर 1 ने छ ु ट्टी ली और बहला-फ ु सलाकर उनकी बेटी को अपने कमरे में ले गया और वादा कर े हुए विक वह उसकी पत्नी है और उसने शारीरिरक संबं स्र्थीाविप विकए। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk
24. बयानों का अवलोकन करने से प ा $ल ा है विक ारा 493 आर्इ[9].पी.सी क े ह अपरा करने क े खिलए सामग्री बयान से लुप्त है। आरोप प्रर्थीम दृXया पीविड़ ा में विवश्वास क े विकसी भी प्रलोभन को समाप्त नहीं कर े हैं विक उसने अपीलक ा9 संख्या 1 से कानूनी रूप से शादी की है और र्इस कपटपूण[9] गल बयान क े कारण, पीविड़ ा ने आरोपी क े सार्थी सहवास विकया। $ूंविक ारा 493 आर्इ[9].पी.सी क े ह अपरा का गठन करने क े खिलए आवश्यक सामग्री एफ.आर्इ[9]. आर में लगाए गए आरोपों से गायब हैं, र्इसखिलए उक्त ारा क े ह अपरा को अपीलक ा9ओं क े खिखलाफ नहीं कहा Cा सक ा है।
25. यह भी ध्यान विदया Cाना $ाविहए विक र्इस संबं में Cो भी आरोप लगाए गए हैं, वे क े वल आरोपी-अपीलक ा9 संख्या 1 क े खिखलाफ लगाए गए हैं, Cो भी अपरा नहीं हैं और अन्य पां$ आरोविपयों-अपीलार्थी1यों क े संबं में र्इस संबं में कोई आरोप नहीं हैं।
26. उच्च न्यायालय यहां ऊपर $$ा9 विकए गए उपरोक्त पहलुओं पर स्वयं उल्लेख करने में विवफल रहा है और उस सीमा क, विनण9य कायम रहने क े खिलए उत्तरदायी नहीं है।
27. अपीलक ा9ओं क े विवरुद्ध अन्य आरोप दहेC विनषे अति विनयम की ारा 3/4 क े अं ग[9] हैं। उक्त ाराएँ विनम्नानुसार हैं: - दहेC देने या दहेC लेने क े खिलए शान्धिस् - (1) यविद कोई व्यविक्त, र्इस अति विनयम क े प्रारम्भ क े पश्चा ् दहेC देगा या लेगा अर्थीवा दहेC देना या लेना दुष्प्रेरिर करेगा ो वह् कारावास से, जिCसकी अवति पां$ वष[9] से कम की नहीं होगी, और Cुमा9ने से, Cो पन्द्रह हCार रुपए से या ऐसे दहेC क े मूल्य की रकम क का, र्इनमें से Cो भी अति क हो, कम नहीं होगा, दण्डनीय होगा: vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk परन् ु न्यायालय, ऐसे पया9प्त और विवशेष कारणों से Cो विनण9य में लेखबद्ध विकए Cाएंगे, [पां$ वष9] से कम की विकसी अवति क े कारावास का दण्डादेश अति रोविप कर सक े गा। [(2) उप ारा (1) की कोई बा,या क े सम्बन् में- (क) ऐसी भेटों को, Cो ब ू को विववाह क े समय (उस विनविमत्त कोई मांग विकए विबना) दी Cा ी है या उनक े संबं में लागू नहीं होगी परन् ु यह ब क विक ऐसी भेंटें र्इस अति विनयम क े अ ीन बनाए गए विनयमों क े अनुसार रखी गई सू$ी में दC[9] की Cा ी हैं, (ख) ऐसी भेंटों को Cो वर को विववाह क े समय (उस विनविमत्त कोई मांग विकए विबना) दी Cा ी है या उनक े संबं में लागू नहीं होगी: परन् ु यह ब Cब विक ऐसी भेंटें, र्इस अति विनयम क े अ ीन बनाए गए विनयमों क े अनुसार रखी गई सू$ी में दC[9] की Cा ी हैं, परन् ु यह और विक Cहां ऐसी भेंटें Cो व ू द्वारा या उसकी ओर से या विकसी व्यविक्त द्वारा Cो व ू का ना ेदार है दी Cा ी हैं वहां ऐसी भेंटें रुविढ़ग प्रक ृ ति की हैं और उनका मूल्य, ऐसे व्यविक्त की विवत्तीय प्रान्धिस्र्थीति को ध्यान में रख े हुए, जिCसक े द्वारा या जिCसकी ओर से ऐसी भेंटें दी गई हैं अति क नहीं हैं। दहेC मांगने क े खिलए शान्धिस् - यविद कोई व्यविक्त, यर्थीान्धिस्र्थीति, व ू या बर क े मा ा-विप ा या अन्य ना ेदार या संरक्षक, से विकसी दहेC की प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से मांग करेगा ो वह् कारावास से, जिCसकी अवति छह मास से कम की नहीं होगी, विकन् ु दो वष[9] क की हो सक े गी और Cुमा9ने से Cो दस हCार रुपए क का हो सक े गा, दण्डनीय होगा। परन् ु न्यायालय ऐसे पया9प्त और विवशेष कारणों से, Cो विनण9य में उजिल्लखिख विकए Cाएंगे, छह मास से कम की विकसी अवति क े कारावास का दण्डादेश अति रोविप कर सक े गा।
28. दहेC विनषे अति विनयम की ारा 3/4 क े संबं में प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] में आरोप बहु विवशिशX हैं। प्रासंविगक आरोप यहां पुन: प्रस् ु विकए Cा रहे हैं: - “र्इस आवेदक ने न क े वल बारा घर ओम लॉन को शादी की पाट[1] क े खिलए अंति म रूप विदया और 20,000 / – रुपये का अविग्रम भुग ान विकया, बन्धिल्क अरुण अपने मा ा-विप ा और सभी विवरो ी दलों क े सार्थी 5 लाख रुपये नकद की अपनी मांग पर कायम रहे। आवेदक एक गरीब कम9$ारी है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk र्इ नी बड़ी रकम देने में उन्होंने अपनी असमर्थी9 ा Cाविहर की। लेविकन बहु विवनम्र अनुरो और प्रार्थी9ना करने क े बावCूद विवरो ी पक्ष राCी नहीं हो सक े और उन्होंने पूरी पं$ाय में 5 लाख रुपये की मांग की….”
29. उपरोक्त प्राव ानों को पढ़ने से प ा $ल ा है विक दहेC विनषे अति विनयम की ारा 3/4 क े ह अपरा क े आवश्यक त्व यह हैं विक आरोपी व्यविक्तयों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दुल्हन क े मा ा -विप ा या अन्य रिरश् ेदारों या अशिभभावकों से मांग करनी $ाविहए र्थीी। दूल्हा, Cैसा भी मामला हो, $ाहे कोई भी दहेC हो और/या दहेC लेने और देने क े खिलए उकसा ा हो। एफ.आर्इ.आर क े आरोप यहां ऊपर उद्धृ स्पX रूप से यह दशा9 ा है विक अपीलक ा9ओं द्वारा शिशकाय क ा9ओं से 5 लाख रुपये क े दहेC की मांग की गई र्थीी और र्इस प्रकार यह नहीं कहा Cा सक ा है विक दहेC विनषे अति विनयम क े ह अपीलक ा9ओं क े खिखलाफ कोई अपरा नहीं बन ा है। प्रर्थीम सू$ना रिरपोट[9] में दहेC की मांग क े प्रत्यक्ष आरोप होने क े कारण, आरोप प्रर्थीम दृXया दहेC विनषे अति विनयम क े ह एक अपरा क े क ृ त्य का गठन कर े हैं और र्इस प्रकार उक्त अति विनयम की ारा 3/4 क े ह अपीलक ा9ओं क े खिखलाफ लगाए गए आरोप विनरस् विकये Cाने योग्य नहीं है।
30. उपरोक्त थ्यों और $$ा9ओं क े मद्देनCर, हमारा विव$ार है विक Cहां क आईपीसी की ारा 493 क े ह अपरा का संबं है, क्योंविक प्रार्थीविमकी उक्त ारा क े ह विकसी भी अपरा क े होने क े बारे में नही ब ा ी है और र्इस प्रकार आपराति क मुकदमा Cारी है उक्त ारा न्यायालय की प्रविFया का दुरूपयोग मानी Cाएगी और उस सीमा क उच्च न्यायालय का आदेश अपास् विकए Cाने योग्य है। हालांविक, Cहां क दहेC विनषे अति विनयम की ारा 3/4 क े ह अपीलक ा9ओं क े खिखलाफ अपरा का संबं है, $ूंविक आरोप प्रार्थीविमकी में संज्ञेय अपरा क े क ृ त्य क े बारे में ब ा ा हैं, यह ारा 482 सीआरपीसी क े ह शविक्त का प्रयोग करने क े vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk खिलए उपयुक्त मामला नहीं है और उक्त अपरा क े खिलए अपीलक ा9ओं क े विवरुद्ध आपराति क काय9वाही को रद्द की Cा ी है।
31. हमारी उपरोक्त $$ा9 क े परिरणामस्वरूप, ारा 493 आर्इ[9] पी सी क े संबं में आरोप पत्र विनरस् विकया Cा ा है। र्थीाविप, दहेC विनषे अति विनयम की ारा 4 क े सार्थी पविठ ारा 3 क े ह आरोप पत्र क े संबं में अपील खारिरC की Cा ी है। ………….…………… (न्यायमूर्ति नवीन जिसन्हा) ………...…………….. (न्यायमूर्ति क ृ ष्ण मुरारी) नर्इ[9] विदल्ली, 10 फरवरी,2020. vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk