Full Text
भार की सव च्च न्यायालय में
दीवानी अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील सं. 2077/2020
[विवशेष अनुमति याति#का(सी) सं. 8550/2019 से उद्भू ]
सा ना #ौ री ....अपीलार्थी*
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य .....प्रत्यर्थी*गण
विनण3य
अनुमति प्रदत्त।
JUDGMENT
2. यह अपील उच्च न्यायालय द्वारा पारिर विदनांक 12.12.2018 क े आदेश क े विवरूद्ध व्यथिर्थी होने से सा ना #ौ री द्वारा दायर विकया गया है जि@समें प्रत्यर्थी* सं. 1 द्वारा उत्तर प्रदेश उच्च र न्यातियक सेवा से उसक े विनकाले @ाने की न्यातियक समीक्षा की मांग करने वाली उसकी रिरट याति#का को अस्वीकृ विकया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 2020 INSC 292 थ्यात्मक पृष्ठभूविम
3. अपीलक ा3 को विदनांक 05.06.1975 को उत्तर प्रदेश न्यातियक सेवा में भ * विकया गया र्थीा और वह अपर मुंजिसफ, देहरादून क े रूप में ैना र्थीीं। बाद में उन्हें 1981 में मुख्य न्यातियक मजि@स्ट्रेट क ै डर में और विफर से विदनांक 21.03.1987 को उत्तर प्रदेश उच्च र न्यातियक सेवाओं में पदोन्न विकया गया।
4. उच्च न्यायालय इलाहाबाद की खंडपीठ ने एक भूविम अति ग्रहण संदभ[3] क े विवरूद्ध पहली अपील की सुनवाई कर े समय विदनांक 05.03.2004 को उन रीकों क े संबं में क ु छ विटप्पणीयाँ की, जि@समें समान प्रक ृ ति क े क ु छ अन्य भूविम अति ग्रहण वाद उत्तर प्रदेश राज्य[1] में अ ीनस्र्थी न्यातियक अति कारिरयों द्वारा अति विनण* विकये @ा रहे र्थीे। विनण3य की एक प्रति उति# काय3वाही क े लिलए उच्च न्यायालय की प्रशासविनक सविमति क े समक्ष रजि@स्ट्रार द्वारा रखी गई। प्रशासविनक सविमति ने भूविम अति ग्रहण मामलों में विमलीभग की थिशकाय ों की @ां# क े लिलए दो न्याया ीशों की एक सविमति का गठन विकया। इस @ां# सविमति ने पतिWमी उत्तर प्रदेश (यूपी) क े कई जि@लों का दौरा करने और कई विनण3यों की @ां# करने क े बाद, विदनांक 19.09.2004 को एक रिरपोट[3] प्रस् ु की, जि@समें अपीलक ा3 सविह क ु छ न्यातियक अति कारिरयों क े लिखलाफ अनुशासनात्मक कार3वाई शुरू करने की जिसफारिरश की गई र्थीी। 1 आगरा विवकास प्राति करण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2004 ऑल एल@े 1853 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
5. दनुसार, अपीलक ा3 पर गाजि@याबाद में अपर जि@ला न्याया ीश क े रूप में अपने काय3काल क े दौरान अपने द्वारा विदए गए दो न्यातियक आदेशों क े संबं में एक आरोप पत्र विदया गया। अपीलक ा3 पर विनम्नलिललिख आरोप लगाए गए र्थीे: "आरोप सं. 1- यह विक आपने विदनांक 10.02.2003 को विद्व ीय अपर जि@ला न्याया ीश गाजि@याबाद क े रूप में ैना रह े हुए भूविम अति ग्रहण संदभ[3] सं. 193/1996 लीली सिंसह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 35 अन्य में अवै रूप से और सभी न्यातियक मानदंडों और औति#त्य क े लिखलाफ दावेदारों को ह@ा3ना दे े हुए अति रिरक्त राथिश और ब्या@ उस दर से अति क पर विनण* विकया जि@स पर दो अन्य दावेदारों ने समझौ ा विकया र्थीा, @ो 276 बीघा 12 विबस्वा और 15 विबस्वंसी भूविम क्षेत्र क े लिलए एस.एल.ए.ओ. द्वारा विन ा3रिर रू. 74.40 क े सापेक्ष रु. 265/प्रति वग[3] ग@ की बढ़ी हुई दर पर इस रह क े अन्य लाभों को शाविमल विकया गया र्थीा रू. 47,73,39,903.86 की अति रिरक्त राथिश को असम्यक रूप से विदया गया र्थीा, @ो इस अनुमान की ओर ले @ा ा है विक आपने बाह्य विव#ारों द्वारा काय[3] विकया गया र्थीा और आप इस प्रकार क 3व्य क े प्रति पूण[3] ईमानदारी और पूण[3] विनष्ठा बनाए रखने में विवफल रहे और इस प्रकार आपने लोक सेवक आ#रण विनयमावली 1956 क े विनयम 3 क े अन् ग[3] कदा#ार विकया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds आरोप सं.2- यह विक आप विदनांक 7.11.2003 को अपर जि@ला न्याया ीश, कोट[3] सं. 1, गाजि@याबाद क े रूप में ैना र्थीे भूविम अति ग्रहण संदभ[3] सं. 91 वष[3] 2001 उमेश #न्द्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 66 अन्य मामलों को विनण* कर े समय एस.एल.ए.ओ. द्वारा विन ा3रिर रु. 100 प्रति वग[3] ग@ से रु. 160 प्रति वग[3] ग@, प्रति वाविदयों द्वारा दायर विकए गए प्रति मानों की अवहेलना कर े हुए अवै रूप से मुआव@े की दर को बढ़ाया, जि@समें 483 बीघा 14 विबस्वा व 8 विबस्वन्सी भूविम क्षेत्रफल क े दावेदारों को रू. 28,53,24,896.80 की एक अति रिरक्त राथिश देने क े क्रम में समान यो@ना क े अन् ग[3] व समान क्षेत्र में, समान वष[3] में भूविम अति ग्रहण क े लिलए आपका अपना विनण3य भूविम अति ग्रहण संदभ[3] सं. 1 सन् 1992 सुरेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य विदनांक 24.03.1993 को विनण*, भी शाविमल है, यह अनुमान दे ा है विक आपने बाह्य विव#ारों द्वारा काय[3] विकया गया र्थीा और आप इस प्रकार क 3व्य क े प्रति पूण[3] ईमानदारी और पूण[3] विनष्ठा बनाए रखने में विवफल रहे और इस प्रकार आपने लोक सेवक आ#रण विनयमावली 1956 क े विनयम 3 क े अन् ग[3] कदा#ार विकया।" (प्रभाव वर्धि )
6. अपीलक ा3 ने आरोप-पत्र का विवस् ृ @वाब, सार्थी ही अति रिरक्त लिललिख क 3 प्रस् ु विकए। बाद में, एक @ां# की गई और @ां# सविमति ने अपनी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds रिरपोट[3] विदनांक 09.09.2005 क े माध्यम से अव ारिर विकया विक इन दोनों आरोपों क े लिलए साविब हो गया र्थीा विक दोनों मामलों में स्पष्ट त्रुविटयां र्थीीं @ो इस रह की '#ौकने वाली #ूक' र्थीीं विक उन्हें मात्र गल विनण3य क े लिलए जि@म्मेदार नहीं ठहराया @ा सक ा र्थीा और परिरणामस्वरूप '@ानबूझकर' विकया गया साविब हुआ। उक्त रिरपोट[3] को प्रशासविनक सविमति क े समक्ष रखा गया र्थीा जि@सने इसे विदनांक 29.11.2005 क े संकल्प द्वारा स्वीकार कर लिलया र्थीा और स@ा की मात्रा क े विन ा3रण क े लिलए मामले को पूण[3] न्यायालय में भे@ विदया र्थीा। पूण[3] न्यायालय ने अपीलक ा3 को सेवा से बखा3स् करने का विनWय विदया और फलस्वरूप राज्य (प्रत्यर्थी* सं. 1) को अपनी जिसफारिरश अग्रेविष की, जि@सक े माध्यम से विदनांक 17.01.2006 को उसक े विनयुविक्त विवभाग द्वारा @ारी एक काया3लय ज्ञापन क े माध्यम से अपीलक ा3 को त्काल प्रभाव से सेवा से बखा3स् कर विदया। अपीलक ा3 ने रिरट क्षेत्राति कार का प्रयोग कर े हुए न्यातियक रीक े से उच्च न्यायालय क े समक्ष बखा3स् गी क े आदेश को #ुनौ ी दी।
7. उच्च न्यायालय की खण्ड़ पीठ ने दो भूविम अति ग्रहण संदभm पर ध्यान विदया @ो अपीलक ा3 द्वारा विनण* विकए गए र्थीे। लिलली सिंसह बनाम राज्य[2] क े पहले मामले क े संबं में यह अव ारिर विकया विक अपीलक ा3 ने 74.40/वग[3] ग@ (विवशेष भूविम अति ग्रहण अति कारी द्वारा विन ा3रिर ) से 264/वग[3] ग@ मुआवज़ा बढ़ाने क े लिलए दो अन्य दावेदारों क े एक समझौ ा विवलेख पर गल रीक े से अवलम्ब लिलया र्थीा। इसक े अलावा, उन्होनें उक्त विन ा3रिर दर से अति क ह@ा3ना और ब्या@ का फ ै सला विदया र्थीा, जि@सक े कारण रू. 720/वग[3] ग@ की 2 भूविम अति ग्रहण संदभ[3] सं. 193/2006, विदनांक 10.02.2003 को विनण* Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds भारी वृतिद्ध हुई। भूविम अति ग्रहण अति विनयम 1894 की ारा 11(3) की वै ाविनक सीमा क े कारण समझौ ा विवलेख अबो गम्य होने से उस पर इस रह की विनभ3र ा को मान े हुए वृतिद्ध को असंग और न्यातियक औति#त्य क े विवरूद्ध माना गया।
8. उमेश #न्द्र बनाम राज्य[3] में दूसरे संदभ[3] क े सम्बन् में न्यायालय ने अव ारिर विकया विक न्याया ीश क े रूप में अपीलार्थी* ने राज्य -प्रति वाविदयों द्वारा दायर विकए गए विमसालों की अवै रूप से अवहेलना की, विवशेष रूप से, रू. 108/वग[3] ग@ का पं#ाट उनक े द्वारा इसी प्रकार क े मामले में क े वल कु छ मास पूव[3] पारिर विकया गया। इस रह क े सबू ों क े बाव@ूद, अपीलक ा3 क े बारे में कहा गया विक उन्होनें सभी न्यातियक मानदंडों क े उल्लंघन में मुआव@े को रू. 100/वग[3] ग@ से बढ़ाकर रू. 160/वग[3] ग@ कर विदया।
9. खंडपीठ ने म विदया विक यह स्र्थीाविप विवति र्थीी हालांविक एक न्यातियक अति कारी द्वारा विदए गए अंति म विनण3य की अनुशासनात्मक @ां# क े उद्देश्यों क े लिलए कोई प्रासंविगक ा नहीं है, हालांविक विनण3य लेने की प्रविक्रया की वै ा और शुद्ध ा क े सार्थी-सार्थी अपने क 3व्यों क े विनव3हन में अति कारिरयों क े आ#रण पर विव#ार विकया @ाना #ाविहए। उच्च न्यायालय ने दनुसार प्रत्यर्थी* की इस दलील का समर्थी3न विकया विक पूव क्त दो भूविम अति ग्रहण संदभm का विनण3य कर े समय अपीलार्थी* की विनण3य लेने की प्रविक्रया स्र्थीाविप न्यातियक मानदंड़ों व न्यातियक औति#त्य से परे र्थीी और बाह्य विव#ारों द्वारा काय[3] विकया गया र्थीा। इसक े अति रिरक्त, उच्च न्यायालय ने दावेदारों को उपलब् कराए गए अप्रत्याथिश लाभ पर @ोर विदया @ो बाहरी विव#ारों क े प्रति विक्रया में 3 भूविम अति ग्रहण संदभ[3] सं. 91/2001 विदनांक 07.11.2003 को विनण* Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अपीलक ा3 द्वारा विकए गए @ानबूझकर खाविमयों क े सबू क े रूप में हैं और न विक क े वल विनण3य की त्रुविटयाँ हैं। इसे उच्च न्यायालय ने @ां# सविमति द्वारा विदए गए म क े रूप में कदा#ार माना।
10. इसक े अलावा, न्यायालय ने उल्लेख विकया विक, अन्यर्थीा भी, साक्ष्य क े सख् विनयम विवभागीय @ाँ# क े लिलए अनुपयुक्त र्थीे, और ऐसे मामलों में न्यातियक समीक्षा का दायरा भी बहु सीविम र्थीा, अनुशासनात्मक @ां# क े विनष्कषm को क े वल सामग्री की पूण[3] अनुपस्थिस्र्थीति में हस् क्षेप विकया @ा सक ा र्थीा, @ो प्रस् ु मामलें में नही र्थीा। पक्षकारों क े क
11. अपीलक ा3 क े अति वक्ता ने @ोरदार क 3 विदया विक हालांविक उच्च न्यायालय ने विनःसंदेह सही विवति की व्याख्या की विफर भी प्रस् ु वाद क े थ्यों पर इसे उति# रूप से लागू करने में असफल रहा। उन्होनें क 3 विदया विक आरोप पत्र 'विनण3य लेने क े प्रविक्रया' क े अवै होने का कोई आरोप नहीं लगा ा और इसे बाद में अपीलार्थी* की सेवामुविक्त क े लिलए आ ार नहीं बनाया @ा सक ा। आरोप पत्र क े माध्यम से अदाल को अथिभलेख पर ले े हुए, यह दर्शिश विकया गया र्थीा विक साविब होना ो दूर, विकसी भी अवै पारिर ोषण की प्राविƒ या विकसी विवथिशष्ट बाहरी कारक द्वारा प्रभाविव विकए @ाने का कोई आरोप भी उसक े लिखलाफ नहीं लगाया गया र्थीा। जिसवाय दो भूविम अति ग्रहण संदभ[3] आदेशों को छोड़कर, विनण3य लेने की प्रविक्रया पर संदेह करने क े लिलए कोई गवाह या सामग्री प्रस् ु नहीं की गयी र्थीी। यह पीसी @ोशी Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds बनाम उत्तर प्रदेश राज्य[4] क े अनुसार स्पष्ट रूप से अननुज्ञेय र्थीी। अन्यर्थीा भी, न्यातियक आदेशों क े सार की उपयुक्त ा का विन ा3रण अपीलीय अदाल ों का अति कार-क्षेत्र कहा गया र्थीा न विक @ां# सविमति यों का।
12. गुणावगुण क े आ ार पर भी, यह क 3 विकया गया र्थीा विक उच्च न्यायालय ने यह अथिभविन ा3रिर करने में गल ी की है विक अपीलार्थी* ने लिलली सिंसह में आदेश को संदर्शिभ कर े हुए अवै रूप से समझौ ा विवलेख पर अवलम्बन लिलया र्थीा, क्योंविक एलए अति विनयम की ारा 11(3) क े ह कथिर्थी व@3न क े वल कलेक्टर द्वारा विदए गए पं#ाट पर लागू र्थीा। संदभ[3] न्यायालयों को ारा 23 और 24 क े ह विवथिभन्न कानूनी प्राव ानों द्वारा विनद…थिश विकया गया र्थीा, जि@सक े अनुसार समझौ ा विवलेखों को अपवर्जि@ नहीं विकया गया र्थीा। वृतिद्ध को मनमाने नहीं होने क े रूप में भी विदखाया गया र्थीा, बस्थिल्क न्यू ओखला औद्योविगक विवकास प्राति करण की समझौ ा नीति पर आ ारिर ब ाया गया र्थीा, जि@से राज्य क े प्राति कारिरयों द्वारा दी @ा रही अति रिरक्त 10% विवकजिस भूविम क े ब@ाय मुआव@ा और ब्या@ की वै ाविनक बकाया राथिश देने क े लिलए बदल विदया गया र्थीा। इसलिलए, यह अथिभकथिर्थी विकया गया र्थीा विक यविद कोई हो, ो 720/वग[3] ग@ रुपये का शुद्ध मुआवज़ा प्रभावी रूप से राज्य को लाग में कम र्थीा, @ो विक उनकी स्वयं की नीति क े ह 1120/ वग[3] ग@ वहन विकया @ा रहा है।
13. उमेश #ंद क े अनुसार, यह प्रस् ु विकया गया र्थीा विक पां# महीने पहले विदए गए अपीलक ा3 क े अपने फ ै सले से थिभन्न ा, सारवान विवकास और कीम ों में वृतिद्ध का परिरणाम र्थीा @ो बी# में हुई र्थीी। यह विवति व रूप से 4 (2001) 6 एससीसी 491 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विवजि@लेंट दावेदारों द्वारा प्रस् ु दस् ावे@ी साक्ष्य द्वारा समर्शिर्थी र्थीा और इसलिलए मुआव@े को 60% से बढ़ाकर 160/वग[3] ग@ कर विदया गया र्थीा। सुस्पष्ट या, यह मुआवज़ा ही, @ो विक @ां# सविमति द्वारा एक #ौंकाने वाली गड़बड़ी क े रूप में पाया गया र्थीा, शीष[3] अदाल द्वारा क ु छ अन्य दावेदारों द्वारा दायर एसएलपी में 297/वग[3] ग@ रुपये आगे बढ़ा विदया र्थीा और स्र्थीानीय विवकास प्राति करण द्वारा दायर अपील को खारिर@ कर विदया गया र्थीा। इस प्रकार, कदा#ार क े अनुमान क े आ ार पर ही शेष नहीं होने (ब#ा नहीं रहना) का दावा विकया गया र्थीा।
14. उच्च न्यायालय द्वारा स्र्थीाविप विवति की स्थिस्र्थीति को दोहरा े हुए, अपीलक ा3 ने क 3 विदया विक यह अपने क 3व्यों क े विनव3हन में एक न्यातियक अति कारी का आ#रण र्थीा और उसक े विनण3य की वै ा/शुद्ध ा, अनुशासनात्मक कार3वाई क े अ ीन नहीं हो सक ी है। अपीलक ा3 द्वारा दोनों संदभm में विवस् ृ कारणों को दे े हुए, 'क 3व्यों का लापरवाह विनव3हन' नहीं र्थीा। यविद अवै पारिर ोषण क े विकसी आरोप क े अभाव में क 3व्य में ऐसा लोप विकया गया र्थीा ो भी, यह भार संघ बनाम @े अहमद[5] में इस न्यायालय क े आदेश क े अनुसार 'उपेक्षा' होगा न विक 'कदा#ार' होगा। आरोपों को क े वल विनरा ार संदेह पर आ ारिर कहा गया र्थीा और न्यातियक अति कारी संरक्षण अति विनयम 1850 से लेकर न्यातियक प्रति रक्षा क े सुस्र्थीाविप जिसद्धां ों क क े कारण, न्यातियक आदेशों में विकसी भी संभाविव त्रुविटयों को काय3वाही क े लिलए आ ार नहीं होने का क 3 विदया गया र्थीा। 5 एआईआर 1979 एससी 1022 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
15. विबना विकसी क 3 संग आ ार क े, क े वल उन दो मामलों का #यन करने क े लिलए @ां# की प्रक ृ ति को भटका हुआ कहा गया र्थीा। आगरा विवकास प्राति करण (उपरोक्त) में उच्च न्यायालय का आदेश क े वल उन मामलों, @हां न्यातियक असंग ा या भूविम अति ग्रहण संदभ[3] मामलों में विमलीभग क े आरोप न्यातियक अति कारिरयों क े लिखलाफ लगाए गए र्थीे, क े लिलए लागू होना र्थीा, @ो व 3मान मामला नहीं र्थीा। अपरा क े बाव@ूद, अपीलक ा3 ने आग्रह विकया विक स@ा की मात्रा अनुति# र्थीी। लगभग ीस साल की बेदाग सेवा प्रदान करने क े बाद, उपरोक्त ब ाये गये आरोपों क े आ ार पर उसे बखा3स् करना असंग है, यह प्रार्थी3ना की गई।
16. दूसरी ओर, उच्च न्यायालय (प्रत्यर्थी* सं. 2) क े विवद्वान अति वक्ता ने क विदया विक न्यातियक अति कारी सामान्य सरकारी कम3#ारी नहीं हैं और यह विक उन्हें सत्यविनष्ठा क े उच्च मानक का पालन करना #ाविहए और संदेह से परे होना #ाविहए। ऐसे उच्च पदों को ारण करने वाले व्यविक्तयों में उच्च अखंड ा, ईमानदारी, नैति क शविक्त, विनष्पक्ष ा होनी #ाविहए और भ्रष्ट या बुरे प्रभावों क े लिलए अभेद्य होना #ाविहए। घरेलू @ां# क े मामलों में हस् क्षेप की सीविम गुं@ाइश @हां विवथिशष्ट थ्यों पर स्र्थीाविप आरोपों को साविब विकया गया है, को भी रेखांविक विकया गया र्थीा।
17. इस प्रकार, व 3मान काय3वाविहयों का क्षेत्र, न्यायपालिलका की स्व ंत्र ा को बनाए रखने क े उद्देश्य से, अ ीनस्र्थी न्याया ीशों पर उच्च न्यायालय का अनन्य विनयंत्रण रखने वाले संवै ाविनक उपबं ों पर ध्यान आकर्षिष कर े हुए, विनब3ति विकए @ाने की माँग की गई र्थीी। इस थ्य को देख े हुए विक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अपीलार्थी* को अथिभलेख पर लिललिख कर्थीन प्रस् ु करने और सुने @ाने का अवसर प्रदान विकया गया र्थीा और उसक े विवस् ृ @बाब पर विव#ार विकया गया र्थीा और खारिर@ कर विदया गया र्थीा, यह उसक े लिलए इस न्यायालय क े माध्यम से उसक े मामले क े पुनः-विन ा3रण की माँग करने क े लिलए खुला नहीं र्थीा। यह क 3 विदया गया र्थीा विक @ां# सविमति और पूण[3] न्यायालय दोनों द्वारा अपने मस्थिस् ष्क का प्रयोग विकया गया र्थीा और क 3 पूण[3] आदेश पारिर विकए गए र्थीे, जि@समें यह स्पष्ट रूप से पाया गया र्थीा विक अपीलक ा3 अपने आ#रण को सही ठहराने में पूरी रह से विवफल रहा र्थीा और उसने बहु लापरवाह और मनमाने रीक े से काम विकया र्थीा, @ो सभी न्यातियक औति#त्यों से परे र्थीा। न्यायपालिलका में @न ा क े विवश्वास को बनाए रखने क े लिलए सेवाओं की बखा3स् गी को न्यायोति# ठहरा े हुए इसे विनःसंदेह 'गंभीर कदा#ार' की कोविट में आने का अथिभकर्थीन विकया गया र्थीा विवश्लेषण
18. विनस्संदेह, उच्च न्यायालय प्रयोज्य विवति क े अपने अवलोकन में सही है। वास् व में, न्यातियक प्रविक्रया का अंति म परिरणाम मायने नहीं रख ा है, और क े वल कसूरवार अति कारी द्वारा अपनायी गयी विनण3य लेने की प्रविक्रया ही मायने रख ी है। स्पष्ट रूप से यह उन्नीसवीं श ाब्दी से ही एक जिसद्धां है विक न्याया ीशों को अंति म परिरणाम या उनक े विनण3यों क े प्रभाव क े लिलए जि@म्मेदार नहीं ठहराया @ा सक ा है।6 यह आवश्यक है विक दोनों विवति क े शासन को बनाए रखें और बाह्य कारकों से न्यातियक कm को पृर्थीक रखें। 6 देखें, न्यातियक अति कारी संरक्षण अति विनयम 1850 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
19. इसक े अलावा, इस प्रस्र्थीापन क े लिलए कोई दूसरा विवकल्प नहीं है विक न्याया ीश को स्वच्छ व्यविक्तत्व की रह संदेह से परे होना #ाविहए। न्यातियक अति कारी बहु संवेदनशील और महत्वपूण[3] संवै ाविनक भूविमका का विनव3हन कर े हैं। वे न क े वल काय3पालिलका की अति क ा को विनयंवित्र कर े हैं, नागरिरकों क े अति कार और कानून व व्यवस्र्थीा को बनाए रख े हैं। बस्थिल्क वे सभ्य समा@ क े ढ़ाँ#े को भी सहारा दे े हैं। न्यायालय ही कानून को अव ारिर कर ी है और इसक े प्रव 3न को सुविनतिW कर ी है। वे लोगों में संवै ाविनक व्यवस्र्थीा का भरोसा पैदा कर ी है और कानून की सव च्च ा और इसक े जिसद्धां ों का पालन सुविनतिW कर ी है। इसलिलए अदाल ें लोगों को उनकी पाशविवक प्रवृलित्त का सहारा लेने से रोक ी हैं और इसक े ब@ाय उन्हें विववादों को सुलझाने क े लिलए एक सरल और थिशष्ट विवकल्प प्रदान कर ी हैं। अदाल ें व्यविक्तयों को उसक े आदेश का पालन कराने क े लिलए बंदूक या अन्य गल सा नों का उपयोग नहीं कर ी हैं, बस्थिल्क इसक े ब@ाय उनक े क 3 की शविक्त और सामान्य @न ा क े मन में विवश्वास और सम्मान पर विनभ3र ा रख ी हैं। इसलिलए यह आवश्यक है विक कानून क े संरक्षकों द्वारा न्यातियक उपयुक्त ा से विकसी भी भ्रष्टा#ार या विव#लन को सख् ी से और े@ी से विनपटाया @ाए।
20. इस न्यायालय द्वारा कई बार यह दोहराया गया है विक न्यातियक अति कारिरयों को ईमानदारी, सत्यविनष्ठा और नैति क ा क े उच्च मानकों का होना #ाविहए और पालन करना #ाविहए। हाल ही में इस न्यायालय की एक खंडपीठ ने श्रीरंग यादवराव वाघमारे बनाम महाराष्ट्र राज्य[7] में बहु ही सारगर्शिभ रूप से इन जिसद्धां ों का संकलन विकया और दोहराया विक: 7 (2019) 9 एससीसी 144 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “5. एक न्याया ीश में आवश्यक पहली और सबसे महत्वपूण[3] गुणवत्ता सत्यविनष्ठा है। न्यायपालिलका में सत्यविनष्ठा की आवश्यक ा अन्य संस्र्थीानों की ुलना में बहु अति क है। न्यायपालिलका एक ऐसी संस्र्थीा है जि@सकी नींव ईमानदारी और सत्यविनष्ठा पर आ ारिर हो ी है। इसलिलए यह आवश्यक है विक न्यातियक अति कारी में उत्कृ ष्ट सत्यविनष्ठा का गुण होना #ाविहए। ारक सिंसह बनाम ज्योति बसु [ ारक सिंसह बनाम ज्योति बसु, (2005) 1 एससीसी 201] में इस न्यायालय ने इस प्रकार अव ारिर विकया: (एससीसी पे@ 203) ''अन्य क े अलावा, सत्यविनष्ठा न्यातियक अनुशासन की पह#ान है। समय आ गया है विक न्यायपालिलका इस बा का पूरा ध्यान रखे विक न्याय क े मंविदर में आं रिरक दरार न पड़े, जि@ससे न्याय-विव रण प्रणाली में बाही होगी जि@सक े परिरणामस्वरूप इस प्रणाली में @न ा क े विवश्वास में कमी हो @ाएगी। यह याद रखना #ाविहए विक अंदर क े कठफोड़वा बाहर क े ूफान से अति क ख रा पैदा कर े हैं।''
6. न्याया ीश का व्यवहार न्यायालय क े भी र और बाहर, दोनों @गह एक विनतिW मानक का होना #ाविहए। इस न्यायालय ने दया शंकर बनाम उच्च न्यायालय, इलाहाबाद [दया शंकर बनाम उच्च न्यायालय, इलाहाबाद (1987) 3 एससीसी 1: 1987 एससीसी (एल एंड एस) 132] में इस प्रकार अव ारिर विकया: (एससीसी पे@ 1) Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “न्यातियक अति कारिरयों क े दो मानक नहीं हो सक े हैं, एक न्यायालय में और दूसरा न्यायालय क े बाहर। उनका क े वल सदा#ार, ईमानदारी और सत्यविनष्ठा का एक मानक होना #ाविहए। वे अपने द्वारा ारिर पद में र्थीोड़ी सी अयोग्य ा से भी काय[3] नहीं कर सक े।''
7. न्याया ीश भी लोक सेवक हैं। एक न्याया ीश को हमेशा याद रखना #ाविहए विक वह @न ा की सेवा करने क े लिलए वहां है। एक न्याया ीश को न क े वल उसक े विनण3यों की गुणवत्ता, बस्थिल्क उसक े #रिरत्र की गुणवत्ता और शुद्ध ा से भी आंका @ा ा है। एक न्याया ीश क े साव3@विनक और व्यविक्तग @ीवन, दोनों में अनुकरणीय सत्यविनष्ठा परिरलतिक्ष होनी #ाविहए। @ो दूसरों पर विनण3य दे ा है, उसे अदोषपूण[3] होना #ाविहए। यह उच्च मानक है @ो न्याया ीशों से अपेतिक्ष है।
8. न्याया ीशों को यह याद रखना #ाविहए विक वे क े वल कम3#ारी नहीं हैं बस्थिल्क उच्च लोक पद ारण कर े हैं। आर. सी. #ंदेल बनाम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय [आर. सी. #ंदेल बनाम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, (2012) 8 एससीसी 58: (2012) 4 एससीसी (जिसविवल) 343: (2012) 3 एससीसी (आपराति क) 782: (2012) 2 एससीसी (एल एण्ड़ एस) 469] में, इस न्यायालय ने यह अव ारिर विकया विक न्याया ीश से अपेतिक्ष आ#रण का मानक, एक सामान्य व्यविक्त की ुलना में बहु अति क है। इस न्यायालय क े विनम्नलिललिख संप्रेक्षण सुसंग हैं: (एससीसी पृष्ठ 70, प्रस् र 29) Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds “29. न्यातियक सेवा एक सा ारण सरकारी सेवा नहीं है और न्याया ीश इस रह क े कम3#ारी नहीं हैं। न्याया ीश लोक पद ारण कर े हैं; उनका काय[3] राज्य क े आवश्यक कायm में से एक है। अपने कायm और क 3व्यों क े विनव3हन में, न्याया ीश राज्य का प्रति विनति त्व कर े हैं। न्याया ीश @ो पद ारण कर ा है वह लोक न्यास का पद है। एक न्याया ीश को विनष्कलंक सत्यविनष्ठा और असंविदग् स्व ंत्र ा का व्यविक्त होना #ाविहए। उच्च नैति क मूल्यों क े सार्थी उसे अं रात्मा क ईमानदार होना #ाविहए। @ब कोई वादकारी अदाल में प्रवेश कर ा है, ो उसे सुरतिक्ष महसूस करना #ाविहए विक न्याया ीश, जि@सक े समक्ष उसका मामला आया है, विनष्पक्ष रूप से और विबना विकसी प्रभाव क े न्याय प्रदान करेगा। न्याया ीश से अपेतिक्ष आ#रण का मानक, सा ारण व्यविक्त से बहु अति क है। यह कोई बहाना नहीं है विक #ूंविक समा@ में मानक विगर गए हैं, इसलिलए @ो न्याया ीश समा@ से विनकलकर आ े हैं, उनसे न्याया ीश क े लिलए अपेतिक्ष आवश्यक उच्च मानकों और नैति क दृढ़ ा की उम्मीद नहीं की @ा सक ी है। सी@र की पत्नी की रह (विबना संदेह क े ) एक न्याया ीश को संदेह से ऊपर होना #ाविहए। न्यातियक प्रणाली की विवश्वसनीय ा उन न्याया ीशों पर विनभ3र है @ो इसे कर े हैं। विकसी लोक ंत्र को फलीभू होने क े लिलए और विवति क े शासन को बनाए रखने क े लिलए, न्याय प्रणाली और न्यातियक प्रविक्रया को म@बू होना Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds #ाविहए और प्रत्येक न्याया ीश को अपने न्यातियक कायm को सत्यविनष्ठा, विनष्पक्ष ा और बौतिद्धक ईमानदारी क े सार्थी विनव3हन करना #ाविहए।"
9. इसमें कोई संदेह नहीं हो सक ा है विक विकसी न्याया ीश को क े वल अथिभलेख पर मौ@ूद थ्यों और मामले पर लागू कानून क े आ ार पर मामले का फ ै सला करना #ाविहए। यविद कोई न्याया ीश विकसी भी बाहरी कारणों से प्रभाविव होकर कोई मामला विनण* कर ा है, ो कानून क े अनुसार वह अपने क 3व्य का पालन नहीं कर रहा है।
10. हमारे विव#ार से "पारिर ोषण" शब्द का अर्थी3 क े वल मौविद्रक पारिर ोषण नहीं है। पारिर ोषण कई प्रकार का हो सक ा है। यह न का पारिर ोषण, शविक्त का पारिर ोषण, कामना इत्याविद का पारिर ोषण हो सक ा है...” (प्रभाव वर्धि )
21. हम इस थ्य से भी अन@ान नहीं हैं विक मात्र संदेह 'कदा#ार' का गठन नहीं कर सक ा है। कदा#ार की विकसी भी 'संभाव्य ा' को मौलिखक या दस् ावे@ी साक्ष्य क े सार्थी समर्थी3न करने की आवश्यक ा है, भले ही सबू का मानक स्पष्ट रूप से एक आपराति क मुकदमे में कदा#ार क े सम ुल्य न हो। इन मापदण्ड़ों को लागू कर े समय, उच्च न्यायालय से विवथिभन्न न्याया ीशों क े बी# थिभन्न मानकों और दृविष्टकोणों क े अस्थिस् त्व पर विव#ार करने की अपेक्षा की @ा ी है। न्यातियक अति कारिरयों क े असंख्य उदाहरण हैं @ो @मान देने, एम.ए.सी.टी. क े ह मुआवज़ा देने या अति ग्रविह भूविम क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds लिलए, कम3कारों की बकाया राथिश या अपक ृ त्यपूण[3] दातियत्व क े अन्य मामलों में अविनवाय[3] मुआवज़ा प्रदान करने में उदार हैं। इस रह क े अनु ोष उन्मुख न्यातियक दृविष्टकोण अपने आप में एक अति कारी की ईमानदारी और सत्यविनष्ठा पर आक्षेप लगाने क े लिलए आ ार नहीं हो सक े हैं।
22. इसक े अलावा, कोई भी हमारे देश की वास् विवक ा को न@रअंदा@ नहीं कर सक ा है, जि@समें अनविगन थिशकाय क ा3 अक्सर र्थीोड़े से रूपये या यहां क विक सस् ी क्षथिणक लोकविप्रय ा क े लिलए विबना विकसी संको# क े न्यायपालिलका की छविव को ूविमल करने क े लिलए आसानी से उपलब् हैं। कभी-कभी बार (अति वक्ता) क े क ु छ असं ुष्ट सदस्य भी उनक े सार्थी विमल @ा े हैं और अ ीनस्र्थी न्यायपालिलका क े अति कारी आम ौर पर सबसे आसान लक्ष्य हो े हैं। इसलिलए उच्च न्यायालयों का यह क 3व्य है विक वे अपनी सुरक्षात्मक छ री (ब#ाव) का विवस् ार करें और यह सुविनतिW करें विक ईमानदार और सरल न्यातियक अति कारिरयों को नासाविब हमले क े अ ीन न विकया @ाए।
23. इस मामले में यह स्पष्ट है विक उच्च न्यायालय को स्वयं विवति क े इस स्र्थीाविप जिसद्धां की @ानकारी र्थीी। अपीलक ा3 क े विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता को भी इन जिसद्धां ों में कोई गल ी नहीं विमली, और वह क े वल व 3मान मामले क े थ्यों पर इनको लागू करना #ाह े हैं।
24. यह अथिभलेखीय थ्य बा है विक जि@स समय उच्च न्यायालय क े समक्ष यह मामला विव#ार में आया, ो अपीलक ा3 क े दोनों भूविम अति ग्रहण विनण3यों क े लिखलाफ रिरट याति#काओं को उनकी समन्वय पीठों द्वारा खारिर@ कर विदया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds गया र्थीा। विफर भी, उच्च न्यायालय ने ठीक ही संप्रेतिक्ष विकया विक अपीलक ा3 क े आदेशों क े विवरूद्ध रिरट याति#काओं का खारिर@ होना उसक े आदेशों क े अनुमोदन या पुविष्ट क े रूप में काय[3] नहीं कर ा है। उच्च न्यायालय द्वारा ठीक ही उजिल्ललिख विकया गया विक वास् व में अनुच्छेद 226 क े ह न्यातियक समीक्षा का क्षेत्र सीविम है। रिरट अति कारिर ा क े प्रयोग में हस् क्षेप करने से पूव[3] प्राƒ विकए @ाने वाले मानक बहु उच्च हैं और संदभ[3] न्यायालय क े आदेश को पलटने क े लिलए एक रिरट अदाल क े विनष्कष[3] में घोर सारवान अन्याय, स्पष्ट प्रविक्रयात्मक अविनयविम ाएँ होनी #ाविहए या कानून क े महत्वपूण[3] प्रश्नों को हल करने की आवश्यक ा हो। इसलिलए रिरट याति#का को खारिर@ करना विकसी विवशेष मामले में इन उच्च मानकों में से विकसी को प्रदर्शिश करने में विवफल ा का संक े दे ा है, न विक विकसी अ ीनस्र्थी प्राति कारी द्वारा पारिर आदेशों का समर्थी3न।
25. हालांविक, व 3मान मामले क े थ्य अलग हैं। वास् व में इस न्यायालय ने कथिर्थी गल आदेशों क े गुणावगुण पर विव#ार विकया। न क े वल विनण3य की पुविष्ट की गई, बस्थिल्क मुआव@े को और बढ़ाया गया। अ ः अब यह नहीं कहा @ा सक ा विक अपीलार्थी* का आदेश विनष्कष[3] में गल र्थीा। यह थ्य महत्वपूण[3] है क्योंविक यह स्र्थीाविप कर ा है विक अपीलक ा3 द्वारा मुआव@े में वृतिद्ध घृथिण (विवरो ी) नहीं र्थीी।
26. यविद आरोप विवथिशष्ट र्थीा विक विनण3य लेने की प्रविक्रया बाहरी विव#ारों से प्रभाविव र्थीी, ो अपीलक ा3 क े विनष्कषm की शुद्ध ा शायद उ नी मायने नहीं रख ी। हालांविक ऊपर ब ाये गए आरोपों क े अवलोकन से यह स्पष्ट है विक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds @ां# का विवशेष कारण, बेईमानी का अनुमान और सार्थी ही @ुमा3ना लगाना क े वल मुआव@े की वृतिद्ध क े विनष्कष[3] क े आ ार पर र्थीा। यह देख े हुए विक उन दो आदेशों में से एक को उच्च न्यायालय क े स् र पर क ै से अस्वीकार कर विदया गया र्थीा और दूसरे की इस न्यायालय द्वारा सैद्धांति क रूप से पुविष्ट की गयी र्थीी और आगे बढ़ाया गया र्थीा, ो आरोपों का आ ार अब शेष नहीं रह @ा ा है।
27. हम इस जिसद्धां में कोई गल ी नहीं विनकाल सक े हैं विक न्यायविनण3यन का अंति म परिरणाम मायने नहीं रख ा है और क े वल यह प्रासंविगक हो ा है विक क्या दोषी अति कारी ने अवै पारिर ोषण (मौविद्रक या अन्यर्थीा) लिलया र्थीा या प्रविक्रया का सं#ालन कर े समय बाहरी #ी@ों द्वारा प्रभाविव र्थीा। वास् व में, कई बार यह संभव है विक एक न्यातियक अति कारी एक आदेश दे े समय अपने पद से अशोभनीय आ#रण में लिलƒ हो सक ा है, जि@सका परिरणाम कानूनी रूप से सही हो। इस रह का अशोभनीय आ#रण या ो एक न्याया ीश क े रूप में हो सक ा है @ो विकसी मामले को सामान्य अनुक्रम से हटकर ले ा है, स्र्थीगन क े माध्यम से सुनवाई में देरी कर ा है, पार्षिटयों को उनक े कानूनी बकाया देने क े लिलए रिरश्व मांग ा है आविद। अविनवाय[3] रूप से इनमें से विकसी को भी परिरणाम को प्रभाविव करने की आवश्यक ा नहीं है। हालांविक, व 3मान मामले में महत्वपूण[3] बा यह है विक आरोप-पत्र क े परिरशीलन से प ा #ल ा है विक प्रविक्रया का ऐसा कोई आरोप अपीलक ा3 क े लिखलाफ नहीं लगाया गया है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
28. अपीलक ा3 क े पक्ष में विकसी भी बाहरी #ी@ को वास् व में प्राƒ करने या अशोभनीय आ#रण करने का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसक े ब@ाय, 'कदा#ार' क े विनष्कष[3] का आ ार ही स्वयं अंति म परिरणाम है, @ो उच्च न्यायालय क े अनुसार इ ना #ौंकाने वाला र्थीा विक इसने अपीलार्थी* की सत्यविनष्ठा और ईमानदारी क े बारे में एक स्वाभाविवक संदेह पैदा कर विदया। हालांविक यह विनवा3 में (विकसी खाली @गह में) सही हो सक ा है, हालांविक यह देख े हुए विक स्वयं अंति म परिरणाम को उच्च र न्यायालयों द्वारा छेड़ा नहीं गया है और दो मामलों में से एक में, क े वल मुआव@े में वृतिद्ध हुई है, अ ः इस रह का कोई विनष्कष[3] नहीं विनकाला @ा सक ा है। इस प्रकार, अपीलक ा3 क े विवरूद्ध पूरा मामला काड[3] क े घर की रह (असं ुलिल होकर) ढह @ा ा है। विनष्कष[3]
29. उपरोक्त ##ा3 क े आलोक में, अपील को अनुमति दी @ा ी है। उच्च न्यायालय क े विनण3य को अपास् विकया @ा ा है और अपीलक ा3 द्वारा दायर रिरट याति#का की अनुमति दी @ा ी है। प्रति वादी संख्या 1 द्वारा पारिर 17.01.2006 विदनांविक बखा3स् गी क े आदेश को अपास् विकया @ा ा है, और सेवाविनवृत्त लाभों सविह परिरणामी लाभों क े सार्थी बहाली क े लिलए अपीलक ा3 की प्रार्थी3ना को स्वीकार विकया @ा ा है। ख#™ क े लिलए कोई आदेश नहीं। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds ……………...…………………….. (भार क े मुख्य न्याया ीश एस.ए. बोबड़े)..……………...................………... (न्यायमूर्धि बी.आर. गवई) …………………...………………. (न्यायमूर्धि सूय[3] कां ) नई विदल्ली विदनांकः 06.03.2020 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds