Full Text
भार ीय सव च्च न्यायालय
दीवानी अपीलीय अति कारिर ा
सिसविवल अपील सं. 3735 वर्ष! 2020
(विवशेर्ष अनुमति याति(का (सिसविवल) सं.5452 वर्ष! 2020 से उद्भू )
मे. कालेडोविनया जूट एंड फाइबस! प्रा. लिल. ....अपीलार्थी8(गण)
बनाम
मे. एक्सि<सस विनमा!ण एंड इंडस्ट्रीज लिल. & अन्य ....प्रत्यर्थी8(गण)
विनण!य
न्यायमूर्ति वी.रामासुब्रमण्यन
JUDGMENT
1. अनुमति दी गयी।
2. कम्पनी न्यायालय (इलाहाबाद उच्च न्यायालय) द्वारा वहाँ लंविब परिरसमापन याति(का को राष्ट्रीय कम्पनी विवति न्यायाति करण (संक्षेप में एनसीएलटी ) स्र्थीानां रिर करने से इनकार क े आदेश से व्यथिर्थी एक विवत्तीय ऋणदा ा ने यह अपील दालिRल की है।
3. अपीलार्थी8 की ओर से प्रस् ु विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री हुजेफा अहमदी, प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 काप रेट ऋणी की ओर से प्रस् ु विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री ए. एन.एस. नादकण[8] और शासकीय समापक की ओर से प्रस् ु विवद्वान अति वक्ता ग्रुप क ै. करन सिंसह भाटी को सुना। पृष्टभूविम थ्य mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
4. एक मेसस! विगर र ट्रेडिंडग क ं पनी, जो विक विद्व ीय प्रति वादी है, ने क ं पनी अति विनयम, 1956 की ारा 433 क े ह इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े समक्ष क ं पनी याति(का संख्या 24 वर्ष! 2015 में प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 क ं पनी क े परिरसमापन क े लिलए इस आ ार पर एक याति(का दायर की विक क ं पनी अपना कज! (ुका पाने में अक्षम है। क ं पनी न्यायालय ने प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 को नोविटस देने का आदेश विदया, लेविकन प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 क ं पनी न्यायालय क े समक्ष पेश होने में विवफल रहा।
5. इसलिलए, 08.01.2016 विदनांविक एक आदेश द्वारा क ं पनी न्यायालय ने क ं पनी याति(का को स्वीकार करने का आदेश विदया और क ं पनी (न्यायालय) विनयम, 1959 क े विनयम 24 क े अनुसार याति(का क े विवज्ञापन क े प्रकाशन का भी विनदbश विदया। उक्त आदेश क े अनुसरण में, विद्व ीय प्रत्यर्थी8 (याति(काक ा! ऋणदा ा petitioning creditor) ने विदनांक 30.01.2016 को फॉम! संख्या 48 में आति कारिरक राजपत्र में विवज्ञापन का प्रकाशन विकया। क ं पनी की याति(का की सुनवाई की ारीR 29.02.2016 दशा! े हुए समा(ार पत्र में भी प्रकाशन कराया गया।
6. त्पश्चा, क ं पनी न्यायालय ने 10.03.2016 विदनांविक एक आदेश पारिर विकया सिजसमें प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 क ं पनी क े परिरसमापन का इस आ ार पर विनदbश विदया गया र्थीा विक क ं पनी अपने कज! का भुग ान करने में असमर्थी! रही है और प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 क ं पनी का परिसमापन सम्यक और न्यायसंरसमापन सम्यक और न्यायसंग र्थीा।
7. 10.03.2016 विदनांविक उक्त आदेश द्वारा, क ं पनी न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय से संलग्न शासकीय समापक को समापक क े रूप में विनयुक्त विकया और उसे क ं पनी की संपलित्त और बही Rा ों को अपने विनयंत्रण में लेने का विनदbश विदया। क ं पनी (न्यायालय) विनयम 1959 क े विनयम 113 क े ह यर्थीा अपेतिक्ष, परिरसमापन क े आदेश को भी दो समा(ार पत्रों में फॉम! 53 में विवज्ञाविप करने का विनदbश विदया गया। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
8. त्पश्चा, प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 ने 10.03.2016 विदनांविक परिरसमापन क े आदेश को वापस लेने क े लिलए एक आवेदन विदया। प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 ने अपनी सद्इच्छा को साविब करने क े लिलए याति(काक ा! ऋणदा ा (जो विक विद्व ीय प्रत्यर्थी8 है) को देय पूरी राथिश का भुग ान लाग क े सार्थी विकया। इसलिलए, याति(काक ा! ऋणदा ा को परिरसमापन आदेश वापस लिलये जाने पर कोई आपलित्त नहीं र्थीी
9. लेविकन शासकीय समापक ने आदेश वापस लेने क े आवेदन का इस आ ार पर विवरो विकया विक प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 क ं पनी पर विवथिभन्न देनदारों का 27 करोड़ रुपये की राथिश बकाया है और जब क उक्त राथिश का भुग ान नहीं विकया जा ा है, ब क े आदेश को वापस नहीं लिलया जा सक ा है। शासकीय समापक ने यह भी कहा विक उन्होंने पहले ही क ं पनी की संपलित्त का प्रभार ले लिलया है।
10. विवरो ी कr क े आलोक में, क ं पनी न्यायालय ने 10.03.2016 विदनांविक परिरसमापन आदेश को स्र्थीविग कर े हुए 22.08.2016 को एक आदेश पारिर विकया। हालांविक, क ं पनी न्यायालय ने शासकीय समापक को क ं पनी की संपलित्तयों को अपनी अथिभरक्षा में रRने का विनदbश विदया।
11. ऐसी क्सिस्र्थीति में, अपीलार्थी8, जो प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 का देनदार होने का दावा कर ा है, ने एनसीएलटी, इलाहाबाद क े समक्ष विदवाला और शो न अक्षम ा संविह ा, 2016 (संक्षेप में 'आईबीसी, 2016') की ारा 7 क े ह आवेदन विदया। एनसीएलटी क े समक्ष अपीलार्थी8 का दावा यह र्थीा विक प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 32 लाR रुपये की राथिश क े प्रति देय क े लिलए उत्तरदायी है और बार-बार मांगने क े बावजूद, प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 उक्त राथिश का भुग ान करने में विवफल रहा।
12. त्पश्चा, अपीलार्थी8 ने क ं पनी न्यायालय (उच्च न्यायालय) क े समक्ष सिसविवल प्रकीण! आवेदन संख्या 23 वर्ष! 2020 क े रूप में एक आवेदन विदया, सिजसमें mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परिरसमापन याति(का को एनसीएलटी, इलाहाबाद को स्र्थीानां रिर करने की मांग की गई र्थीी। इस आवेदन को क ं पनी न्यायालय ने 24.02.2020 क े एक आवृत्त आदेश द्वारा इस आ ार पर Rारिरज कर विदया विक विनयम 24 की आवश्यक ा का पहले ही पालन विकया जा (ुका र्थीा और एक परिरसमापन आदेश पहले ही पारिर विकया जा (ुका र्थीा। परिरसमापन काय!वाही को क ं पनी न्यायालय से एनसीएलटी को स्र्थीानां रिर करने से इनकार करने वाले उच्च न्यायालय क े इसी आदेश क े लिRलाफ विवत्तीय ऋणदा ा ने यह सिसविवल अपील की है। विव(ारण क े विवर्षय
13. इस अपील में विव(ारण क े लिलए उत्पन्न होने वाले मुख्य विवर्षय हैं: (i) ऐसी कौन सी परिरक्सिस्र्थीति याँ हैं सिजनक े ह विकसी उच्च न्यायालय में लंविब परिरसमापन काय!वाही को एनसीएलटी में स्र्थीानां रिर विकया जा सक ा है और (ii) विकसकी ओर से ऐसे स्र्थीानां रण का आदेश विकया जा सक ा है। बहस
14. यद्यविप क ं पनी अति विनयम, 2013 (2013 का अति विनयम 18) को 29.08.2013 को राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त हुई र्थीी और इसे भार क े राजपत्र में विदनांक 30.08.2013 को प्रकाथिश विकया गया र्थीा और 01.01.2014 को प्रकाथिश शुतिxपत्र क े माध्यम से संशोति विकया गया र्थीा, अति विनयम क े विवथिभन्न प्राव ान विवथिभन्न ति थिर्थीयों प्रवृत्त हुए। क ु छ प्राव ान 12.09.2013 को लागू हुए ो क ु छ अन्य प्राव ान 01.04.2014 को प्रभावी हुए। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
15. ारा 434 की उप- ाराा (1) क े Rंड (क) और (R) सार्थी ही ारा 434 की उप- ाराा (2) 01.06.2016 विदनांविक एस.ओ. 1934 (ई) क े माध्यम से 01.06.2016 प्रभावी हुई। ारा 434 की उप- ाराा (1) का Rंड (ग) 01.12.2016 विदनांविक एस.ओ. 3677 (ई) क े माध्यम से 15.12.2016 से लागू हुआ।
16. यहां यह ध्यान देना (ाविहए विक ारा 434, जैसा विक मूल रूप से क ं पनी अति विनयम, 2013 क े अति विनयविम होने क े समय र्थीा, आज की ुलना में अलग र्थीा। ारा 434 जैसा विक मूल रूप से क ं पनी अति विनयम, 2013 में शाविमल विकया गया र्थीा, वास् व में विदवाला और शो न अक्षम ा संविह ा, 2016 (2016 का अति विनयम 31) द्वारा प्रति स्र्थीाविप विकया गया र्थीा, जो 15.11.2016 को लागू हुआ।
17. ारा 434 जैसा विक मूल रूप से क ं पनी अति विनयम, 2013 (2013 का अति विनयम 18) में र्थीा और ारा 434, आईबीसी, 2016 (2016 का अति विनयम
31) द्वारा यर्थीा प्रति स्र्थीाविप, को पश्चा व 8 संशो नों क े सार्थी आसान समझ क े लिलए सारणीबx कॉलम में प्रस् ु विकया गया है। ारा 434 वर्ष! 2013 क े अति विनयम 18 में यर्थीा मूल रूप से विनर्मिम ारा 434 आईबीसी ए<ट 31 वर्ष! 2016 क े अन् ग! यर्थीा प्रति स्र्थीाविप “434. कति पय लंविब काय!वाविहयों अं रण (I)I)) ऐसी ारीR को जो क ें द्रीय सरकार द्वारा इस विनविमत्त अति सूति( की जाए (I)क) क ं पनी अति विनयम 1956 (I)1 वर्ष! 1956) की ारा 10 ङ की उप- ाराा (I)1) क े अ ीन गवि~ क ं पनी विवति प्रशासन बोड! (I) सिजसे इस ारा में इसक े पश्चा क ं पनी विवति बोड! कहा गया है ) क े समक्ष लंविब सभी विवर्षय काय!वाविहयां या मामले ऐसी ारीR से पूव! अति करण को अं रिर हो जाएंगे और अति करण उन विवर्षयों काय!वाविहयों या मामलों का इस अति विनयम क े उपबं ों क े अनुसार [ कति पय लंविब काय!वाविहयों का अं रण (I)I)) ऐसी ारीR को जो क ें द्रीय सरकार द्वारा इस विनविमत्त अति सूति( की जाए (I)क) क ं पनी अति विनयम 1956 (I)1 वर्ष! 1956) की ारा 10 ङ की उप- ाराा (I)1) क े अ ीन गवि~ क ं पनी विवति प्रशासन बोड! (I) सिजसे इस ारा में इसक े पश्चा क ं पनी विवति बोड! कहा गया है ) क े समक्ष लंविब सभी विवर्षय काय!वाविहयां या मामले ऐसी ारीR से पूव! अति करण को अं रिर हो जाएंगे और अति करण उन विवर्षयों काय!वाविहयों या मामलों का इस अति विनयम क े उपबं ों क े अनुसार mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विनपटारा करेगा। (I)R) ऐसी ारीR से पहले, क ं पनी विवति बोड! क े विकसी विवविनश्चय या आदेश से व्यथिर्थी कोई व्यविक्त क े विवविनश्चय या आदेश की उसे संसू(ना की ारीR से 60 विदन क े भी र उस आदेश से उद्भू होने वाले विवति क े विकसी प्रश्न पर उच्च न्यायालय को अपील कर सक े गा परं ु यविद उच्च न्यायालय का यह समा ान हो जा ा है विक अपीलार्थी8 उक्त अवति क े भी र अपील करने से पया!प्त कारणों से विनवारिर हुआ र्थीा ो वह उसे 60 विदन से अनति क और अवति क े भी र अपील करने क े लिलए अनुज्ञा कर सक े गा। (I)ग) क ं पनी अति विनयम 1956 क े अ ीन सिजसक े अं ग! क ं पविनयों क े माध्यस्र्थीम, समझौ ा, ~हराव और पुनस€र(ना र्थीा परिरसमापन से संबंति काय!वाविहयां भी हैं, जो उस ारीR से ~ीक पूव! विकसी सिजला न्यायालय या उच्च न्यायालय में लंविब हैं, अति करण को अं रिर हो जाएंगी और अति करण उन काय!वाविहयों क े संबं में उनक े अं रण से पहले क े प्रक्रम से काय!वाही कर सक े गा। (I)घ) औद्योविगक और विवत्तीय पुनर्मिनमा!ण अपील प्राति करण को की गई कोई अपील या औद्योविगक और विवत्तीय पुनर्मिनमा!ण बोड! क े समक्ष विकया गया विनदbश या लंविब अर्थीवा रुग्ड़ औद्योविगक क ं पनी (I)विवशेर्ष उपबं ) अति विनयम 1985 क े अ ीन औद्योविगक और विवत्तीय पुनर्मिनमा!ण अपील प्राति करण या औद्योविगक और विवत्तीय पुनर्मिनमा!ण बोड! क े समक्ष इस अति विनयम क े प्रारंभ से ~ीक पूव! विकसी भी प्रक ृ ति की कोई काय!वाही उपशमन की जाएगी परं ु कोई क ं पनी सिजस क े संबं में इस Rंड क े अ ीन ऐसी अपील या विनदbश या जां( का उपशमन विकया जा ा है इस अति विनयम क े प्रारंभ से 180 विदन क े भी र इस अति विनयम क े उपबं ों क े अनुसार इस अति विनयम क े अ ीन अति करण को विनदbश कर सक े गी। परं ु यह और विक इस अति विनयम क े अ ीन विकसी क ं पनी द्वारा सिजसकी अपील या विनदbश या जां( इस Rंड क े अ ीन उपशमन की जा ी है ऐसा विनदbश करने क े लिलए कोई फीस संदेय नहीं होगी। (I)2) क ें द्रीय सरकार इस अति विनयम क े अ ीन क ं पनी विवति बोड! या न्यायालयों क े समक्ष लंविब सभी विवर्षयों काय!वाविहयों या मामलों का अति करण विनपटारा करेगा। (R) ऐसी ारीR से पहले, क े विकसी विवविनश्चय या आदेश से व्यथिर्थी कोई व्यविक्त क े विवविनश्चय या आदेश की उसे संसू(ना की ारीR से 60 विदन क े भी र उस आदेश से उद्भू होने वाले विवति क े विकसी प्रश्न पर उच्च न्यायालय को अपील कर सक े गा परं ु यविद उच्च न्यायालय का यह समा ान हो जा ा है विक अपीलार्थी8 उक्त अवति क े भी र अपील करने से पया!प्त कारणों से विनवारिर हुआ र्थीा ो वह उसे 60 विदन से अनति क और अवति क े भी र अपील करने क े लिलए अनुज्ञा कर सक े गा। और (ग) क े अ ीन सिजसक े अं ग! क े माध्यस्र्थीम, समझौ ा, ~हराव और पुनस€र(ना र्थीा परिरसमापन से संबंति काय!वाविहयां भी हैं, जो उस ारीR से ~ीक पूव! विकसी सिजला न्यायालय या उच्च न्यायालय में लंविब हैं, अति करण को अं रिर हो जाएंगी और अति करण उन काय!वाविहयों क े संबं में उनक े अं रण से पहले क े प्रक्रम से काय!वाही कर सक े गा। परं ु यह विक क ं पनी क े परिरसमापन से जुड़ी क े वल ऐसी काय!वाविहयां अति करण को अं रिर की जाएगी जो क ें द्र सरकार द्वारा विवविह क्सिस्र्थीति में हों: [ परं ु यह और विक परिरसमापन से इ र से संबंति क े वल ऐसी काय!वाविहयां सिजन्हें अनुमति देने या अन्यर्थीा क े लिलए उच्च न्यायालय द्वारा आदेश आरतिक्ष नहीं है, अति करण को अं रिर विकये जाएंगे। [ परं ु यह भी विक-] (I) क े परिरसमापन की काय!वाही, सिजन्हें स्वीकार करने या अन्यर्थीा क े लिलए आदेश हे ु आरतिक्ष हैैैै, से इ र क े अन् ग! सभी काय!वाविहयां; या (II) क े परिरसमापन से संबंति काय!वाविहयां सिजन्हे उच्च न्यायालयों से अं रिर नहीं विकया गया है; क ं पनी अति विनयम, 1956 और क ं पनी (न्यायालय) विनयम, 1959 क े प्राव ानों क े अनुसार विव(ारण विकया जाएगा [ बश b यह भी विक क ं पनी क े स्वैक्सिच्छक परिरसमापन क े मामलों से संबंति काय!वाही जहां क ं पनी अति विनयम, 1956 की ारा 485 की उप- ाराा (1) क े ह विवज्ञापन द्वारा विवविनश्चय की सू(ना दी गई है, लेविकन क ं पनी 1 अप्रैल 2017 से पहले भंग नहीं हुई है, को क ं पनी अति विनयम, 1956 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को यर्थीा समय अं रण सुविनतिश्च करने क े लिलए इस अति विनयम क े उपबं ों से संग विनयम बना सक े गी और क ं पनी (न्यायालय) विनयम, 1959 क े प्राव ानों क े अनुसार विव(ारिर विकया जा ा रहेगा।] [परं ु आगे यह विक विदवाला और शो न अक्षम ा संविह ा (संशो न) अध्यादेश, 2018 क े प्रारंभ से पहले क े परिरसमापन से संबंति विकसी न्यायालय क े समक्ष लंविब काय!वाविहयों का / क े पक्षकार ऐसी काय!वाही क े स्र्थीानां रण क े लिलए आवेदन दे सक े हैं और न्यायालय आदेश द्वारा इस रह की काय!वाही को अति करण में स्र्थीानां रिर कर सक ा है और इस प्रकार स्र्थीानां रिर की गई काय!वाही को अति करण द्वारा द्वारा विदवाला और शो न अक्षम ा संविह ा, 2016 (2016 का 31) क े ह कॉप रेट विदवाला समा ान प्रविक्रया शुरू करने क े लिलए एक आवेदन माना जाएगा। (2) क ें द्र सरकार, क ं पनी विवति बोड! या न्यायालयों में लंविब सभी मामलों, काय!वाविहयों या वादों क े समय पर हस् ां रण को सुविनतिश्च करने क े लिलए इस अति विनयम क े उपबं ों से संग विनयम बना सक ी है।]
18. यह ध्यान रRना आवश्यक है विक उपरोक्त ालिलका क े दाविहने कॉलम में उxृ विवर्षयवस् ु में वर्ष! 2016 क े अति विनयम 31 द्वारा प्रति स्र्थीाविप क े आलावा ारा 434 में विकये गये क ु छ संशो न शाविमल हैं। वे संशो न विनम्नानुसार है:- (i) 07.12.2016 को प्रकाथिश क ं पनी (कवि~नाई विनवारण) (ौर्थीा आदेश, 2016, जो 15.12.2016 को प्रभावी हुआ; (ii) 29.06.2017 को प्रकाथिश क ं पनी (कवि~नाई विनवारण) (ौर्थीा आदेश, 2017, जो उसी ति थिर्थी को प्रभावी हुआ; और (iii) विदवाला और शो न अक्षम ा संविह ा (दूसरा संशो न) अति विनयम, 2018 अर्थीा! ् वर्ष! 2018 का 26, जो 06.06.2018 से प्रवृत्त हुआ। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
19. ारा 434, जैसी आज यह है, को ध्यान से पढ़ने पर प ा (ल ा है विक ारा 434 की उप- ारा (1) का Rंड (R) का उससे कोई लेना देना नहीं है जो ारा 434 का समग्र आशय है। ारा 434 समग्र ा में क ं पनी विवति प्रशासन बोड! या क ं पनी न्यायालय (उच्च न्यायालय या सिजला न्यायालय) क े समक्ष लंविब काय!वाविहयों क े अं रण से संंबंति है। उप- ारा (1) का Rंड (R) क ं पनी विवति बोड! क े विकसी विनण!य क े विवरुx उच्च न्यायालय में अपील क े अति कार से संबंति है और इसलिलए Rंड (R) ारा 434 की योजना में समायोसिज नहीं है।
20. जो भी हो,उप- ारा (1) का Rंड (ग) वह प्राव ान है जो वास् व में क े अन् ग! सिजला न्यायालय या उच्च न्यायालय क े समक्ष लंविब सभी काय!वाविहयों क े अति करण को स्र्थीानां रण को उपबंति कर ा है। मोटे ौर पर Rंड (ग) माध्यस्र्थीम, समझौ ा, ~हराव और पुनस€र(ना र्थीा परिरसमापन क े बारे में उल्लेR कर ा है। लेविकन Rंड (ग) अपनी प्रयोज्य ा में माध्यस्र्थीम, समझौ ा, ~हराव और पुनस€र(ना र्थीा परिरसमापन से संबंति काय!वाविहयों क सीविम नहीं है। यह Rण्ड (ग) "सविह ---सभी काय!वाविहयों "शब्दों क े प्रयोग क े कारण है।
21. हालांविक, Rण्ड (ग) का पहला परन् ुक, जो विक मूल ारा 434 में विनविह नहीं र्थीा बक्सि‘क आईबीसी अति विनयम,2016 क े अन् ग! अन् ःस्र्थीाविप विकया गया र्थीा जब ारा 434 को प्रति स्र्थीाविप विकया गया र्थीा, Rण्ड (ग) क े मुख्य भाग की विवर्षयवस् ु को सश ! बना ा है। Rण्ड (ग) का पहला परन् ुक परिरसमापन की काय!वाविहयों पर उच्च न्यायालय से अति करण को स्र्थीानान् रिर विकया जाना यह इस उपबन् द्वारा रोक दे ा है विक परिरसमापन की क े वल वही काय!वाविहयाँ जो ऐसी क्सिस्र्थीति में हैं जो क े न्द्र सरकार द्वारा विवविह की गयी हैं, अति करण को स्र्थीानान् रिर की जाएंगी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
22. ारा 434 की उप- ाराा (2) क े न्द्र सरकार को कम्पनी विवति बोड! या न्यायालयों क े समक्ष लंविब सभी मामलों क े समयबx स्र्थीानान् रण क े लिलए अति विनयम क े प्राव ानों से संग विनयम बनाने की शविक्त प्रदान कर ा है। इसलिलये कम्पनी अति विनयम 2013 की ारा 434 की उप- ारा (2) सपवि~ आईबीसी,2016 की ारा 239 की उप- ारा (1) द्वारा प्रदत्त शविक्तयों क े प्रयोग में क े न्द्र सरकार ने विनयमसू(ी जारी की जो "कम्पनी (लंविब काय!वाविहयों का स्र्थीानान् रण) विनयम, 2016 क े रूप में जाने जा े हैं।
23. विनयमों को पढ़ने से पहले इस बा को नोट करना आवश्यक है विक स्र्थीानान् रण क े लिलए उच्च न्यायालय क े समक्ष लंविब परिरसमापन काय!वाविहयों को ारा 434 द्वारा दो श्रेथिणयों में विवभक्त विकया गया हैः- (क) स्वैक्सिच्छक परिरसमापन क े लिलए काय!वाविहयाँ सिजसमें कम्पनी अति विनयम 1956 की ारा 485(1) क े अन् ग! इस विवविनश्चय का विवज्ञापन विदया गया है लेविकन कम्पनी 01.04.2017 से पूव! भंग नहीं की गयी है और (R) अन्य प्रकार की परिरसमापन काय!वाविहयाँ।
24. उपरोक्त दो श्रेथिणयों में से प्रर्थीम श्रेणी क े मामले ारा 434 की उप- ारा (1) क े Rण्ड (ग) क े अन् ग! (ौर्थीे परन् ुक द्वारा आवृत्त है। सिजसमे कहा गया हैः “परन् ु यह भी विक कम्पनी क े स्वैक्सिच्छक परिरसमापन क े मामलों से सम्बक्सिन् ऐसी काय!वाविहयाँ जहाँ विवविनश्चय की सू(ना का विवज्ञापन कम्पनी अति विनयम 1956 की ारा 485 की उप- ारा (1) क े ह विकया गया है लेविकन कम्पनी 01 अप्रैल 2017 से पहले बंद नहीं की गयी है, कम्पनी अति विनयम 1956 और कम्पनी (न्यायालय) विनयम 1959 क े अनुरूप व्यवहार विकया जाएगा।" उपरोक्त परं ुक में शाविमल स्वैक्सिच्छक परिरसमापन क े ऐसे मामलों पर उच्च न्यायालय द्वारा ही विव(ार विकया जाएगा। क े वल (i) (ौर्थीे परं ुक क े दायरे क े बाहर पड़ने वाले mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA स्वैक्सिच्छक परिरसमापन क े मामले (ii) अन्य प्रकार की काय!वाविहयां ही क े न्द्र सरकार द्वारा ारा 434(2) क े अन् ग! बनाए गये विनयमों क े अ ीन उच्च न्यायालय द्वारा अति करण को अं रिर विकये जाएंगे।
25. उन मामलों से इ र परिरसमापन काय!वाविहयों की स्र्थीानां रणीय ा जो परं ुक (4) क े अं ग! आ े हैं, विवति द्वारा उस क्सिस्र्थीति पर विनभ!र कर ा है सिजस पर वे कम्पनी न्यायालय क े समक्ष लंविब हैं। लेविकन विवति विनमा! ाओं ने इसे विनयमों क े रूप में अ ीनस्र्थी विव ायन क े द्वारा विन ा!रिर विकये जाने क े लिलए छोड़ रRा है।
26. विवति की प्रयोज्य ा द्वारा कति पय परिरसमापन काय!वाविहयों का स्र्थीानां रण का उपबं करने क े अलावा ारा 434(1) (ग) पक्षकारों को यह विवक‘प भी दे ी है विक वे ऐसी काय!वाविहयों का स्र्थीानां रण एनसीएलटी को विकये जाने की मांग कर सक े । यह Rंड (ग) क े पां(वे परं ुक क े अन् ग! है।
27. ारा 434 की उपरोक्त योजना को ध्यान में रR े हुए अब हमें विनयमों पर आना (ाविहए। जैसा विक पहले कहा गया है क ं पनी लंविब काय!वाविहयों का स्र्थीानां रण विनयम 2016 ारा 434 (2) सपवि~ ारा 239 (1) आईबीसी 2016, द्वारा प्रदत्त शविक्त क े प्रयोग में विनग! विकये गये र्थीे।
28. उपरोक्त विनयम परिरसमापन हे ु काय!वाविहयों को ीन श्रेथिणयों में विवभक्त कर े हैं (i) ारा 434 की उप- ाराा (1) क े Rंड (ग) क े (ौर्थीे परं ुक क े अं ग! आने वाली स्वैक्सिच्छक परिरसमापन क े लिलए काय!वाविहयां जो विक 1956 अति विनयम क े े अनुरूप ही (लेगीं। (ii) ऋणों का भुग ान करने में असमर्थी! ा क े आ ार पर परिरसमापन क े लिलए काय!वाविहयां और (iii) ऋणों का भुग ान करने में असमर्थी! ा क े अति रिरक्त अन्य आ ारों पर परिरसमापन हे ु काय!वाविहयां। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
29. उपरोक्त विनयमों का विनयम 4 ारा 434(1) (ग) क े (ौर्थीे परं ुक क े अन् ग! स्वैक्सिच्छक परिरसमापन से संबंति है। व !मान वाद में हम ऐसे मामलों पर विव(ार नहीं कर रहे हैं।
30. उपरोक्त विनयमों का विनयम 5 ऋणों का भुग ान करने में असमर्थी! ा क े आ ार पर परिरसमापन हे ु काय!वाविहयों क े स्र्थीानां रण का उपबं कर ा है। यह विनम्नव है: “5. ऋणों का भुग ान करने में असमर्थी! ा क े आ ार पर परिरसमापन क े लिलए लंविब काय!वाविहयों का स्र्थीानां रण; (i) उच्च न्यायालय क े समक्ष अपने ऋणों का भुग ान करने में अक्षम ा क े आ ार पर अति विनयम की ारा 434 क े अन् ग! क ं पनी क े परिरसमापन से संबंति सभी याति(काएं सिजनमें प्रत्यर्थी8 को विनयम क ं पनी (न्यायालय) विनयम 1959 क े विनयम 26 क े अन् ग! याति(का ामील नहीं की गयी है। क ं पनी अति विनयम 2013 की ारा 419 की उप- ाराा (4) क े अन् ग! स्र्थीाविप अति करण की पी~ को क्षेत्रीय अति कारिर ा का प्रयोग कर े हुए संविह ा क े भाग II क े अनुरूप विनस् ारिर विकये जाने हे ु स्र्थीानां रिर विकये जाएंगे। परं ु यह विक या(ी संविह ा की ारा 7,[8] या 9 क े अन् ग! याति(का क े स्र्थीापन हे ु यर्थीा अपेतिक्ष विनयम 7 क े अनुरूप स्र्थीानां रिर अथिभलेRीय सू(नाओं क े अति रिरक्त जुलाई 2017 क प्रस् ाविव दीवाला व्यवसायी क े विववरण सविह सभी सू(नाएं,या जैसा भी मामला हो, प्रदान करेगा। जो कर पाने में अक्षम ा क े आ ार पर याति(का अवै हो जाएगी। परं ु आगे यह विक याति(का का/क े कोई पक्षकार 1 जुलाई 2017 क े पश्चा संविह ा की ारा 7,[8] या 9 क े अ ीन,या जैसा भी मामला हो, संविह ा क े े अनुरूप नया आवेदन करने क े लिलए अह! होंगे। परं ु यह और विक जहां इस विनयम क ं पनी क े परिरसमापन से संबंति याति(का अति करण को स्र्थीानां रिर नहीं की जा ी और उच्च न्यायालय में रह ी है,और जहां अति विनयम की ारा 433 क े Rंड (ङ) क े अन् ग! 15 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विदसंबर,2016 को उसी क ं पनी क े विवरुx परिरसमापन क े लिलए एक अन्य याति(का है, ऐसी अन्य याति(का अति करण को स्र्थीानां रिर नहीं की जाएगी यद्यविप विक याति(का प्रत्यर्थी8 को ामील नहीं की गयी है।
31. उपरोक्त विनयमों का विनयम 6 ऋणों का भुग ान करने में अक्षम ा क े आ ार से इ र आ ारों पर परिरसमापन क े लिलए काय!वाविहयों क े स्र्थीानां रण से संबंति है। यह विनम्नव है: “6.ऋणों का भुग ान करने में अक्षम ा क े आ ार से इ र आ ार पर े लिलए लंविब काय!वाविहयों का स्र्थीानां रण- उच्च न्यायालय क े समक्ष क ं पनी अति विनयम 1956 की ारा 433 क े Rंड क और ( क े अन् ग! दालिRल सभी लंविब याति(काएं और सिजनमें क ं पनी (न्यायालय) विनयम 1959 क े विनयम 26 क े अन् ग! यर्थीा अपेतिक्ष प्रत्यर्थी8 को याति(का ामील नहीं की गयी है, वे क्षेत्रीय अति कारिर ा का प्रयोग करने वाले अति करण की पी~ को स्र्थीानां रिर विकये जाएंगे और ऐसी याति(काएं क ं पनी अति विनयम 2013 (18 वर्ष! 2013) क े अन् ग! याति(काएं मानी जाएंगी।
32. विनयम 5 और 6 क े अन् ग! आने वाली परिरसमापन काय!वाविहयों की स्र्थीानां रणीय ा सी े ौर पर परिरसमापन याति(का को क ं पनी (न्यायालय) विनयम 1959 क े अन् ग! प्रत्यर्थी8 पर ामील विकये जाने से जुड़ी हुई हैं। यविद परिरसमापन याति(का 1959 विनयम क े ह प्रत्यर्थी8 को पहले ही ामील की जा (ुकी है ो काय!वाविहयां स्र्थीानां रिर विकये जाने क े योग्य नहीं हो ी हैं। लेविकन यविद विनयम 26 क े ह प्रत्यर्थी8 पर परिरसमापन याति(का की ामीली पूरी नहीं की जा (ुकी है ो ऐसी परिरसमापन काय!वाविहयां (ाहे वे ारा 433 क े ह हों या ारा 433 क े Rंड (क) और (() क े अन् ग!, विनणा!यक रूप से एनसीएलटी को स्र्थीानां रिर हो जाएंगी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
33. दूसरे शब्दों में विनयम, कम्पनी (लंविब काय!वाविहयों का अं रण) विनयम 2016 क े विनयम 5 और 6 कम्पनी (न्यायालय) विनयम 1959 क े विनयम 26 क े अन् ग! नोविटस की ामील विकये जाने की क्सिस्र्थीति को उस क्सिस्र्थीति क े रूप में य कर े हैं सिजस पर परिरसमापन काय!वाही स्र्थीानां रिर की जा सक ी है। यह इसलिलए है विक ारा 434 की उप- ारा (1) का Rंड (ग) का पहला परं ुक क ें द्र सरकार को वह क्सिस्र्थीति विवविह करने में सक्षम बना ा है सिजस पर परिरसमापन हे ु काय!वाविहयां स्र्थीानां रिर की जा सक ी है और ारा 434 की उप- ारा (2) क ें द्र सरकार को विनयम बनाने की शविक्त प्रदान कर ी है।
34. कम्पनी (न्यायालय) विनयम 1959 का विनयम 26 विनम्नव है: “याति(का का ामीला- प्रत्येक याति(का,याति(का में नाविम प्रत्यर्थी8, यविद कोई,और ऐसे अन्य व्यविक्त पर जैसा अति विनयम या ये विनयम अपेतिक्ष करें, या जैसा न्याया ीश या रसिजस्ट्रार विनर्मिदष्ट करें,को ामील की जाएगी । अन्यर्थीा विनदbथिश विकये जाने क याति(का की एक प्रति याति(का की नोविटस क े सार्थी ामील की जाएगी।"
35. विनयम 26 की सामान्य अपेक्षा, जैसा विक इसक े सबसे अंति म विहस्से से विदRायी पड़ ा है, यह है विक अन्यर्थीा आदेथिश विकये जाने क, अति विनयम क े अन् ग! याति(का की प्रति प्रत्यर्थी8 को याति(का क े नोविटस क े सार्थी ामील की जाएगी। विनयम 26 क े अन् ग! यर्थीा अपेतिक्ष, याति(का की प्रति क े सार्थी याति(का की नोविटस विनयम 27 क े विनदbश क े कारण फाम! सं. 6 में होनी (ाविहए।
36. फाम! सं. 6 में “संक्सिस्र्थी की गयी" शब्द का प्रयोग होने क े कारण यह संशय र्थीा विक <या विनयम 26 में संदर्भिभ ामीला परिरसमापन काय!वाही में संक्सिस्र्थी mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विकये जाने से पूव! का है या संक्सिस्र्थी विकये जाने क े पश्चा का है। विवथिभन्न उच्च न्यायालयों ने थिभन्न-थिभन्न म व्यक्त विकये। बाद में इस न्यायालय ने फोरेक इंतिडया लिल. बनाम एडेलवीस एसेट्स रिरक ं स्ट्र<शन क ं.लिल.[1] क े मामले में क्सिस्र्थीति को यह ारिर कर े हुए य विकया " विक विनयम 26 और 27 स्पष्ट ः संक्सिस्र्थी े पूव! की क्सिस्र्थीति को संदर्भिभ कर े हैं।"
37. क ं पनी (न्यायालय)विनयम 1959 क े विनयम 26 और 27 को इस प्रकार व्याख्यातिय करने क े पश्चा, इस न्यायालय ने फोरेक इंतिडया लिल. (उपरोक्त) क े मामले में यह कहा विक "जब इस संविह ा को अति विनयविम विकया गया र्थीा ो क े वल उन्हीं परिरसमापन याति(काओं को एनसीएलटी को स्र्थीानां रिर विकया जाना र्थीा और उन्हें संविह ा क े अन् ग! याति(का माना जाना र्थीा सिजनमें विनयम 26 क े अन् ग! कोई नोविटस नहीं ामील की गयी र्थीी।" हालांविक अति विनयम 31, वर्ष! 2016 क े अन् ग! ारा 434 को एक नये प्राव ान द्वारा प्रति स्र्थीाविप विकये जाने और अति विनयम 26, वर्ष! 2018 द्वारा पां(वे परं ुक क े अन् ःस्र्थीाविप विकये जाने क े पश्चा पक्षकार या पक्षकारों क े इशारे पर भी परिरसमापन काय!वाविहयों का स्र्थीानां रण अनुमन्य हो गया। क्सिस्र्थीति में बदलाव को इस न्यायालय द्वारा फोरेक इंतिडया लिल. (उपरोक्त) क े मामले में नोट विकया गया।
38. लेविकन अति विनयम 26, वर्ष! 2018 क े द्वारा पां(वे परं ुक क े अं ःस्र्थीाविप े पश्चा इस न्यायालय ने क्सिस्र्थीति में आये बदलाव को नोट कर े हुए विनण!य क े प्रस् र 17 में इंविग विकया विक यद्यविप कोई व्यविक्त संविह ा क े अन् ग! ऐसी याति(का को एनसीएलटी को स्र्थीानां रिर विकये जाने क े लिलए आवेदन दे सक ा है। इसका लाभ उ~ा े हुए याति(काक ा! क े विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता द्वारा 1 2019 (2) SCR 477 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यह क ! विदया गया विक "कोई व्यविक्त" (और आवश्यक रूप से याति(का का पक्षकार नहीं) स्र्थीानां रण क े लिलए आवेदन कर सक ा है।
39. लेविकन हमें यह नहीं लग ा विक फोरेक इंतिडया लिल. (उपरोक्त) क े मामले में विनण!य इस उप- ाराणा क े लिलए कोई मानक या प्राति कार है विक ारा 434 की उप- ारा (1) क े Rंड (ग) का पां(वां परं ुक ऐसे विकसी व्यविक्त द्वारा लागू विकया जा सक ा है जो परिरसमापन हे ु काय!वाही का पक्षकार नहीं है। हमारे द्वारा पहले ही उxृ पां(वे परं ुक में,”विकसी न्यायालय क े समक्ष क ं पनी क े परिरसमापन से संबंति लंविब काय!वाही का/क े पक्षकार” शब्दों का प्रयोग विकया गया है।
40. दूसरे शब्दों में, पां(वे परं ुक को लागू कराने का अति कार विवविनर्मिदष्ट रूप से, काय!वाही क े पक्षकारों को विदया गया है। अ ः शाक्सिब्दक विनव!(न में ऐसे अति कार को "काय!वाविहयों क े पक्षकारों" क ही सीमति अव ारिर विकया जाना (ाविहए।
41. वह हमें एक दूसरे प्रश्न पर ले जा ा है विक परिरसमापन काय!वाविहयों क े "पक्षकार" कौन हैं। क ं पनी अति विनयम, 1956 "पक्षकार" शब्द को परिरभाविर्ष नहीं कर ा। क ं पनी (न्यायालय) विनयम, 1959 भी "पक्षकार" शब्द को परिरभाविर्ष नहीं कर ा। क ं पनी अति विनयम,2013 "पक्षकार" शब्द परिरभाविर्ष नहीं कर ा। क ं पनी (लंविब काय!वाविहयों का स्र्थीानां रण)विनयम, 2016 भी "पक्षकार" शब्द को परिरभाविर्ष नहीं कर ा। यहां क विक आईबीसी,2016 भी "पक्षकार" शब्द को परिरभाविर्ष नहीं कर ा।
42. लेविकन, क ं पनी अति विनयम 1956 में विनविह रूप से क ु छ ऐसे सक े विवद्यमान हैं जो उन लोगों का संक े कर े हैैैं जो "काय!वाविहयों क े पक्षकार" शब्द mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े अर्थी! क े भी र आ सक े हैं। वे उपबं सिजनमें ऐसे संक े विनविह है, विनम्नव हैं: (i) क ं पनी अति विनयम,1956 की ारा 447 जो विक क ं पनी अति विनयम,2013 की ारा 278 क े समान है, में कहा गया है विक े लिलए आदेश क ं पनी क े सभी ऋणदा ाओं और सभी सहभाविगयों क े पक्ष में,जैसे विक यह एक ऋणदा ा और एक सहभागी की संयुक्त याति(का पर विकया गया हो,काय! करेगा। वर्ष! 2013 क े अति विनयम की ारा 278 और 1956 क े अति विनयम की ारा 447 की शब्दावली में र्थीोड़ा अं र है। इस परिरव !न को दोनों प्राव ानों को ालिलका कॉलम में प्रस् ु कर समझा जा सक ा है: 1956 क े अति विनयम की ारा 447 परिरसमापन आदेश का प्रभाव.- े लिलए आदेश क ं पनी क े सभी ऋणदा ाओं और सभी सहभाविगयों क े पक्ष में,जैसे विक यह एक ऋणदा ा और एक सहभागी की संयुक्त याति(का पर विकया गया हो,काय! करेगा। 2013 क े अति विनयम की ारा 278 परिरसमापन आदेश का प्रभाव.- े लिलए आदेश क ं पनी क े सभी ऋणदा ाओं और सभी सहभाविगयों क े पक्ष में,जैसे विक यह ऋणदा ाओं और सहभाविगयों की संयुक्त याति(का पर विकया गया हो,काय! करेगा। 2013 क े अति विनयम की ारा 278 दर्भिश कर ी है विक एकल ऋणदा ा या सहभागी द्वारा कोई याति(का वास् व में ऋणदा ाओं और सहभाविगयों की संयुक्त याति(का मानी जा ी है ाविक परिरसमापन का आदेश सभी ऋणदा ाओं और सभी सहभाविगयों क े पक्ष में काय! कर सक े । mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) 1956 अति विनयम की ारा 454(6) क े अन् ग! स्वंय को लिललिR में ऋणदा ा ब ाने वाला कोई व्यविक्त शासकीय समापक को विदये गये क्सिस्र्थीति क विववरण का विनरीक्षण कराने का हकदार होगा। यविद ऐसे व्यविक्त का ऋणदा ा होने का दावा असत्य पाया जा ा है ो ऐसा व्यविक्त 1956 अति विनयम की ारा 454(7)क े अन् ग! दण्ड का भागी होगा। (iii) समापक की शविक्तयां 1956 क े अति विनयम की ारा 457 में दी गयी हैं। ारा 457 वास् व में, समापक की शविक्तयों को दो श्रेथिणयों में विवभक्त कर ा है (I) अति करण की संस् ुति से उपलब् (ii) वे जो सामान्य ः समापक को प्राप्त हो ी हैं। लेविकन 2013 अति विनयम की ारा 290 ने ऐसे विवभेद को समाप्त कर विदया है, हालांविक 1956 अति विनयम र्थीा 2013 अति विनयम समापक की शविक्त क े प्रयोग को अति करण क े विनयंत्रण क े अ ीन कर विदया है। इसे 1956 अति विनयम की ारा 457(3) और 2013 अति विनयम की ारा 290(2) क े द्वारा स्पष्ट विकया गया है। इसक े अति रिरक्त 1956 अति विनयम की ारा 457(3) विकसी भी ऋणदा ा या सहभागी को ारा 457 द्वारा प्रदत्त शविक्त समापक द्वारा प्रयोग क े संबं में न्यायालय में आवेदन करने में सक्षम बना ा है। (iv) 1956 क े अति विनयम की ारा 460 और 2013 क े अति विनयम की ारा 292 यह स्पष्ट कर ी है विक क ं पनी की परिरसंपलित्तयों क े प्रशासन में और ऋणदा ाओं में उसक े विव रण में समापक को ऋणदा ाओं की विकसी आम सभा में लिलये गये विकसी विवविनश्चय द्वारा विदये गये विनदbशों को ध्यान में रRना (ाविहए। यविद समापक कोई भी काय! अपनी शविक्त क े प्रयोग द्वारा कर ा है ो समापक क े ऐसे क ृ त्य या विनण!य से व्यथिर्थी कोई भी व्यविक्त 1956 अति विनयम की ारा 460(6) और 2013 अति विनयम की ारा 292(4) क ं पनी न्यायालय में आवेदन करने का हकदार होगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) 1956 अति विनयम की ारा 466(1) परिरसमापन क े संबं में सभी काय!वाविहयों क े स्र्थीगन क े लिलए विकसी ऋणदा ा को आवेदन करने में सक्षम बना ा है। यह अति कार परिरसमापन आदेश ैयार होने क े पश्चा विकसी भी समय विकसी भी ऋणदा ा द्वारा विकया जा सक ा है।
43. इस प्रकार, विकसी क ं पनी क े परिरसमापन की काय!वाविहयां वास् व में वे काय!वाविहयां हैं सिजसका सम्पूण! ऋणदा ा समूह पक्षकार हो ा है। काय!वाही विकसी एक या अति क ऋणदा ा द्वारा प्रारंभ की गयी हो लेविकन याति(का को संयुक्त याति(का मानकर (ला जा ा है। शासकीय समापक सम्पूण! ऋणदा ा समूह क े लिलए और उनकी ओर से काय! कर ा है इसलिलए ारा 434 की उप- ारा (1) क े पां(वे परं ुक में प्रयुक्त "पक्षकार" शब्द का अर्थी! क े वल एक याति(काक ा! ऋणदा ा या क ं पनी या शासकीय समापक नहीं लगाया जा सक ा। ारा 434 की उप- ारा (1) क े पां(वे परं ुक में प्रयुक्त "पक्षकार" “पक्षकारों" शब्द अपने अर्थी! में परिरसमापन अ ीन विकसी क ं पनी क े विकसी ऋणदा ा को समाविह कर ी है।
44. उपरोक्त विनष्कर्ष! विनगमनात्मक क ! की विवति से भी पाया जा सक ा है। यविद कोई ऋणदा ा शासकीय समापक क े विकसी विनण!य से व्यथिर्थी है ो वह 1956 अति विनयम क े अन् ग! उसे क ं पनी न्यायालय क े समक्ष (ुनौ ी देने का हकदार हो ा है। एक बार उसक े द्वारा ऐसा विकये जाने पर ारा की सामान्य भार्षा क े आ ार पर भी वह काय!वाही का पक्षकार हो जा ा है। विकसी पक्षकार से ऐसे टेढ़े-मेढ़े रास् े से गुजरने और विफर ारा 434(1)(ग) क े पां(वे परं ुक पर आने की अपेक्षा करने क े स्र्थीान पर ऐसे पक्षकार क े सी े स्र्थीानां रण क े अति कार को मान्य ा देना बेह र होगा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
45. फोरेक इंतिडया लिल. (उपरोक्त) क े मामले में इस न्यायालय द्वारा यर्थीा ारिर आईबीसी की उद्देश्य व्यर्थी! हो जाएगा यविद विवथिभन्न फोरमों में समानान् र काय!वाविहयों को स्वीक ृ ति दी जा ी है। यविद इलाहाबाद उच्च न्यायालय को परिरसमापन काय!वाही आगे बढ़ाने की स्वीक ृ ति दी जा ी है और एनसीएलटी को आईबीसी की ारा 7 क े अन् ग! आवेदन की जां( की अनुमति दी जा ी है ो आईबीसी का सम्पूण! उद्देश्य थिछन्न-थिभन्न हो जाएगा।
46. इसलिलए हमारा यह सुति(क्सिन् म है विक व !मान याति(काक ा! कम्पनी अति विनयम,2013 की ारा 434 की उप- ारा (1) क े पां(वे परं ुक में प्रयुक्त "पक्षकार" शब्द की परिरभार्षा क े भी र आयेगा और याति(काक ा! प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 क े विवरुx लंविब परिरसमापन काय!वाविहयों को एनसीएलटी को स्र्थीानां रिर करने की मांग करने का हकदार है। इस पर ध्यान देना आवश्यक है विक क ं पनी(लंविब काय!वाविहयों का स्र्थीानां रण) विनयम,2016 क े विनयम 5 और 6 क े अन् ग! उस क्सिस्र्थीति से संबंति विनब€ न सिजस पर स्र्थीानां रण का आदेश विदया जा सक ा है, का ारा 434 की उप- ारा (1) क े पां(वे परं ुक क े ह आने वाले स्र्थीानां रण क े मामलों में कोई प्रयोज्य ा नहीं है। इसलिलए, क ं पनी (न्यायालय) विनयम, 1959 क े आ ार पर स्र्थीानां रण की याति(का को विनरस् करने वाला उच्च न्यायालय का आक्षेविप आदेश त्रुविटपूण! है।
47. अ ैव, अपील को स्वीकार विकया जा ा है। आक्षेविप आदेश को अपास् विकया जा ा है और क ं पनी न्यायालय (इलाहाबाद उच्च न्यायालय) में प्रर्थीम प्रत्यर्थी8 क े विवरुx लंविब परिरसमापन की काय!वाविहयां एनसीएलटी को स्र्थीानां रिर विकये जाने का आदेश विदया जा ा है। इसे आईबीसी की ारा 7 क े mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अन् ग! अपीलार्थी8 क े आवेदन क े सार्थी लिलया जाय। लाग क े संबं में कोई आदेश नहीं होगा।..................भार क े मुख्य न्याया ीश (एस.ए.बोबड़े).....................................न्यायमूर्ति (ए.एस.बोपन्ना)....................................न्यायमूर्ति (वी. रामासुब्रमण्यन) नई विदल्ली नवम्बर 19, 2020 mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA