Vikesh Kumar Gupta v. Rajasthan State

Supreme Court of India · 07 Dec 2020
L. Nageswara Rao; Hemant Gupta; Ajay Rastogi
Civil Appeal Nos. 3649–3650 of 2020 @ SLP (C) Nos. 20512-20513 of 2019
administrative appeal_dismissed Significant

AI Summary

The Supreme Court upheld the revised merit list prepared by the Rajasthan Public Service Commission based on expert committee recommendations, limiting judicial interference in academic evaluations and dismissing the appellants' challenge to their non-selection.

Full Text
Translation output
भारत क
े सर्वोच्च न्यायालय में
सिविल अपीलीय क्षेत्राधिकार
सिविल अपील संख्या 3649–3650/2020
(एसएलपी (सी) संख्या 20512-20513/2019 से उत्पन्न)
विक
े श क
ु मार गुप्ता और एन.आर. .... अपीलकर्ता
बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य …. प्रतिवादी
साथ
सिविल अपील संख्या 3652-3657/2020
(एसएलपी (सी) संख्या 29990-29995/2019 से उत्पन्न)
सिविल अपील संख्या 3651/2020
(एसएलपी (सी) संख्या 21935/2019 से उत्पन्न)
सिविल अपील संख्या 3658-3659/2020
(एसएलपी (सी) संख्या 10035-10036/2020 से उत्पन्न)
सिविल अपील संख्या 3660/2020
(एसएलपी (सी) संख्या 9819/2020 से उत्पन्न)
निर्णय
एल. नागेश्वर राव, जे.
JUDGMENT

1. अनुमति दी गई।

2. अपीलकर्ता श्री विक े श क ु मार गुप्ता और श्री महेश क ु मार मीणा ने सामाजिक विज्ञान में वरिष्ठ शिक्षक (ग्रेड II) क े पद पर उनक े चयन न होने से व्यथित होकर राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर खंडपीठ में SBCWP संख्या 10992/2019 दायर की है। दिनांक 10.07.2019 क े एक आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने विज्ञापन दिनांक 13.07.2016 क े अनुसार वरिष्ठ शिक्षक (सामाजिक विज्ञान) क े पद पर नियुक्तियों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी। उक्त आदेश को क ु छ चयनित उम्मीदवारों ने चुनौती दी थी। दिनांक 24.07.2019 क े एक आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 10.07.2019 क े अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। ऐसा करते हुए, श्री विक े श क ु मार गुप्ता और श्री महेश क ु मार मीणा द्वारा दायर रिट याचिका का श्री मुक े श क ु मार शर्मा और अन्य द्वारा दायर संबंधित रिट याचिका क े साथ निस्तारण किया गया। अपीलकर्ताओं ने अपील में खंडपीठ क े दिनांक 24.07.2019 क े उक्त निर्णय को चुनौती दी।

2. सुविधा क े लिए, हम एसएलपी (सी) संख्या 20512-20513/2019 से उत्पन्न होने वाली अपीलों क े तथ्यों का उल्लेख करते हैं। सामाजिक विज्ञान, संस्क ृ त, हिंदी, अंग्रेजी और गणित में 9,551 वरिष्ठ शिक्षकों (ग्रेड II) क े चयन क े लिए राजस्थान लोक सेवा आयोग (संक्षेप में "आरपीएससी") द्वारा दिनांक 13.07.2016 को एक विज्ञापन जारी किया गया था। सामान्य ज्ञान और सामाजिक विज्ञान की क्रमशः दिनांक 01.05.2017 और 02.07.2017 को लिखित परीक्षा आयोजित की गई थी। आरपीएससी ने दिनांक 06.02.2018 को पहली उत्तर क ुं जी जारी की और परिणाम घोषित किया। याचिकाकर्ताओं क े नामों का उल्लेख चयनित उम्मीदवारों की सूची में किया गया था लेकिन उनक े चयन क े बाद याचिकाकर्ताओं द्वारा दाखिल किए गए विस्तृत प्रपत्रों में क ु छ दोषों क े कारण उन्हें नियुक्त नहीं किया जा सका। दिनांक 25.04.2018 को, राजस्थान क े उच्च न्यायालय, खंडपीठ जयपुर क े एकल न्यायाधीश ने एक विशेषज्ञ समिति द्वारा पुनर्विचार क े लिए पहली उत्तर क ुं जी में 3 प्रश्नों को प्रेषित किया। इसक े तुरंत बाद, राजस्थान क े उच्च न्यायालय क े एकल न्यायाधीश, जोधपुर खंडपीठ ने दिनांक 05.05.2018 को एक विशेषज्ञ समिति द्वारा पुनर्विचार क े लिए अन्य 8 प्रश्न भेजे। RPSC द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति ने सामाजिक विज्ञान में 2 प्रश्नों और सामान्य ज्ञान में 1 प्रश्न क े मुख्य उत्तरों को संशोधित किया। एक संशोधित उत्तर क ुं जी (जिसे दूसरी उत्तर क ुं जी क े रूप में संदर्भित किया जाएगा) को उसक े अनुसार जारी किया गया था और मेरिट सूची को भी दिनांक 17.09.2018 को संशोधित किया गया था। संशोधित मेरिट लिस्ट में याचिकाकर्ताओं क े नाम शामिल नहीं थे।

3. राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर खंडपीठ क े विद्वान एकल न्यायाधीश का दिनांक 05.05.2018 का निर्णय, जिसक े द्वारा 8 प्रश्नों को पुनर्विचार क े लिए विशेषज्ञ समिति को भेजा गया था, उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ क े समक्ष अपील का विषय था। इसमें अपीलकर्ताओं की शिकायत यह थी कि उन्होंने 33 प्रश्नों की सत्यता को चुनौती दी थी, जिन्हें एक विशेषज्ञ समिति को संदर्भित करने की आवश्यकता थी। उच्च न्यायालय ने स्वयं विवादित प्रश्नों की सत्यता की जांच की और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि 5 प्रश्नों क े उत्तर गलत थे। यह सूचित किए जाने क े बाद कि परिणाम घोषित कर दिए गए हैं और चयन प्रक्रिया पूरी हो गई है, उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अपने निर्णय दिनांक 12.03.2019 द्वारा डी.बी. विशेष अपील रिट संख्या 922/2018 में चयन सूची क े संशोधन का निर्देश दिया और संशोधन का लाभ क े वल न्यायालय क े समक्ष अपीलकर्ताओं को दिया। 2020 की एसएलपी (सी) संख्या 10035-36 से उत्पन्न होने वाली अपील को दिनांक 12.03.2019 क े निर्णय की शुद्धता पर सवाल उठाते हुए दायर किया गया है।

4. दिनांक 13.03.2019 को उच्च न्यायालय की राजस्थान जयपुर खंडपीठ क े विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा एक निर्देश जारी किया गया कि अपात्र उम्मीदवारों क े नाम चयन सूची से हटा दिए जाएं और एक संशोधित चयन सूची जारी की जाए। तीसरी उत्तर क ुं जी आरपीएससी द्वारा दिनांक 08.04.2019 को प्रकाशित की गई थी, लेकिन उक्त संशोधन का लाभ क े वल अपीलकर्ताओं को डीबी में दिया गया था। 2018 की विशेष अपील रिट संख्या 922/2918 में राजस्थान उच्च न्यायालय क े विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा दिनांक 13.03.2019 को जयपुर खंडपीठ द्वारा जारी निर्देश को लागू किया गया था और अपात्र उम्मीदवारों को छोड़कर चयन सूची को दिनांक 21.05.2019 को संशोधित किया गया था। दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर तैयार की गई उक्त संशोधित चयन सूची में 124 अभ्यर्थियों क े नाम शामिल किए गए थे। RPSC द्वारा दिनांक 22.05.2019 को फिर से दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर एक प्रतीक्षा सूची तैयार की गई।

5. रिट याचिका में अपीलकर्ताओं की शिकायत दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर दिनांक 21.05.2019 की संशोधित चयन सूची तैयार करने की थी। अपीलकर्ताओं द्वारा दायर रिट याचिका में विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा दिनांक 10.07.2019 को पारित अंतरिम आदेश क े खिलाफ दायर अपील में, उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले पर विस्तार से विचार किया और अपीलकर्ताओं द्वारा दायर रिट याचिका का निस्तारण किया। रिट याचिका में अपीलकर्ताओं क े पक्ष में अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया गया था।

6. वरिष्ठ अध्यापकों क े पदों पर चयन हेतु दिनांक 13.07.2016 को जारी अधिसूचना से उत्पन्न मुकदमेबाजी की संपूर्ण शृंखला को ध्यान में रखते हुए, खंडपीठ की सुविचारित राय थी कि उच्च न्यायालय की विभिन्न पीठों द्वारा दिए गए अलग- अलग निर्देशों क े कारण भ्रम की स्थिति हो गई थी। खंडपीठ ने पाया कि डी.बी. विशेष अपील रिट संख्या 922/2018 दिनांक 12.03.2019 में खंडपीठ क े निर्णय को विद्वान एकल न्यायाधीश क े ध्यान में नहीं लाया गया जब उन्होंने दिनांक 13.03.2019 को चयन सूची को संशोधित करने का निर्देश जारी किया। यह माना गया था कि अपीलकर्ता किसी भी राहत क े हकदार नहीं थे क्योंकि खंडपीठ ने अपने फ ै सले दिनांक 12.03.2019 में दर्ज किए गए निष्कर्षों क े आधार पर चयन सूची को संशोधित करने क े लिए दिए गए निर्देश को क े वल अपीलकर्ताओं पर लागू किया था न कि अन्य उम्मीदवारों को। दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर जारी की गई चयन सूची को डिवीजन बेंच द्वारा अनुमोदित किया गया था और आरपीएससी को दिनांक 16.04.2019 को प्रकाशित सूची क े आधार पर चयन और नियुक्ति जारी करने का निर्देश दिया गया था। दिनांक 22.05.2019 को तैयार की गई प्रतीक्षा सूची को भी खंडपीठ ने सही ठहराया।

7. जैसा कि उपरोक्त सभी अपीलों में विचारार्थ उत्पन्न होने वाले बिंदु समान हैं, अन्य अपीलों क े तथ्यों का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है। मामले में विचार करने क े लिए मुख्य बिंदु यह है कि क्या 2018 की डी.बी. विशेष अपील रिट संख्या 922 में उच्च न्यायालय की खंडपीठ क े निर्णय दिनांक 12.03.2019 को क े वल अपीलकर्ताओं तक ही सीमित किया जा सकता है। अपीलकर्ताओं की शिकायत यह है कि चयन सूची को तीसरी उत्तर क ुं जी लागू करक े संशोधित किया जाना चाहिए था जो कि 12.03.2019 क े फ ै सले क े आधार पर तैयार किया गया था।

8. श्री अखिलेश क ु मार पांडे, श्री राक े श करेला और श्री रणबीर यादव, अपीलकर्ताओं क े विद्वान अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि डिवीजन बेंच क े लिए कोई कारण नहीं था कि उसने अपने निर्णय दिनांक 12.03.2019 क े संचालन को क े वल अपीलकर्ताओं तक सीमित कर दिया। श्री पांडे ने प्रस्तुत किया कि अपीलकर्ताओं को दिनांक 21.05.2019 को तैयार की गई 124 उम्मीदवारों की सूची में शामिल किया गया होता, यदि तीसरी उत्तर क ुं जी सभी उम्मीदवारों क े संबंध में प्रभावी होती, क े वल उक्त अपील में अपीलकर्ताओं तक ही सीमित नहीं होती। उन्होंने प्रस्तुत किया कि प्रतीक्षा सूची भी दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर तैयार की गई थी न कि तीसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर। अपीलकर्ताओं की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता ने सुझाव दिया कि अभी भी पद की रिक्तियां हैं, जिन्हें अपीलकर्ताओं की नियुक्ति से भरा जा सकता है।

9. डॉ. मनीष सिंघवी, राजस्थान राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि राज्य द्वारा की गई प्रत्येक चयन प्रक्रिया मुकदमेबाजी का विषय है और अदालतों में लंबे समय से मामलों क े लंबित होने क े कारण, सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियों में देरी क े कारण राज्य मुश्किल स्थिति में है। विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा किए गए प्रस्तुतीकरण का जोर यह है कि दिनांक 07.09.2019 को दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर तैयार की गई चयन सूची अंतिम होनी चाहिए और ऐसे व्यक्ति जो जल्द से जल्द अदालत से संपर्क नहीं कर पाए, वे राहत क े हकदार नहीं हैं। डॉ. सिंघवी ने प्रस्तुत किया कि खंडपीठ क े दिनांक 12.03.2019 क े निर्णय का लाभ खंडपीठ क े निर्देश क े अनुसार क े वल 21 अपीलकर्ताओं को दिया गया था। इस स्तर पर अपीलकर्ताओं को दी गई कोई भी राहत भ्रम पैदा करेगी और दिनांक 13.07.2016 को जारी किए गए विज्ञापन क े अनुसार पहले से ही की गई नियुक्तियों को अस्थिर कर देगी। आरपीएससी की ओर से पेश हुए विद्वान अधिवक्ता श्री अमित लुभया ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों क े आधार पर मेरिट सूची तैयार की गई थी और इस स्तर पर किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। 124 योग्य उम्मीदवारों को बाहर करने क े बाद, दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर एक संशोधित चयन सूची तैयार की गई और 51 व्यक्तियों को पहले ही नियुक्त किया जा चुका है। इस न्यायालय द्वारा दिनांक 06.09.2019 को पारित अंतरिम आदेश क े मद्देनजर शेष नियुक्तियां नहीं की जा सकीं। लोक सेवा आयोग क े निर्देशों क े अनुसार, रिक्त पदों की संख्या दर्शाते हुए आरपीएससी की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता द्वारा एक नोट दायर किया गया था। उन्होंने आगे कहा कि खंडपीठ क े दिनांक 12.03.2019 क े निर्णय को क े वल उच्च न्यायालय क े समक्ष अपीलकर्ताओं क े संबंध में लागू किया गया था। प्रतिवादी प्रतिवादियों की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्री शारिक अहमद और श्री शादान फरासत ने तर्क दिया कि इस न्यायालय को खंडपीठ क े निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि उन अपीलकर्ताओं को कोई राहत नहीं दी जा सकती है जो रोक लगाने वाले हैं। उन्होंने प्रस्तुत किया कि हाईकोर्ट ने डिवीजन बेंच क े दिनांक 12.03.2019 क े फ ै सले को बरकरार रखा था, जिसक े द्वारा राहत क े वल अपीलकर्ताओं तक ही सीमित थी।

10. इस न्यायालय क े विचार क े लिए जो मुद्दा उठता है वह यह है कि क्या संशोधित चयन सूची दिनांक 21.05.2019 को दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर तैयार किया जाना चाहिए था। अपीलकर्ताओं का तर्क है कि प्रतीक्षा सूची भी तीसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर तैयार की जानी चाहिए न कि दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर। उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों क े अनुसार गठित विशेषज्ञ समिति द्वारा की गई सिफारिशों क े आधार पर आरपीएससी द्वारा दूसरी उत्तर क ुं जी जारी की गई थी। संशोधित चयन सूची से संतुष्ट नहीं होने पर, जिसमें क े वल क ु छ उम्मीदवार शामिल थे, क ु छ असफल उम्मीदवारों ने खंडपीठ क े समक्ष अपील दायर की, जिसका निस्तारण दिनांक 12.03.2019 को किया गया। जब खंडपीठ को सूचित किया गया कि चयनों को दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर अंतिम रूप दिया गया है, तो उसने दिनांक 17.09.2018 को तैयार चयन सूची में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालाँकि, खंडपीठ ने अपीलकर्ताओं द्वारा बताए गए प्रश्नों और उत्तर क ुं जियों की सत्यता की जांच की और इस निष्कर्ष पर पहुंची कि 5 प्रश्नों की उत्तर क ुं जी गलत थी। उक्त निष्कर्षों क े आधार पर, खंडपीठ ने आरपीएससी को संशोधित चयन सूची तैयार करने और इसे क े वल अपीलकर्ताओं पर लागू करने का निर्देश दिया।

11. हालांकि नियमों की अनुमति होने पर पुनर्मूल्यांकन को निर्देशित किया जा सकता है, इस न्यायालय ने अदालतों द्वारा प्रश्नों क े पुनर्मूल्यांकन और जांच की प्रथा को खारिज कर दिया है, जिसमें अकादमिक मामलों में विशेषज्ञता की कमी है। उच्च न्यायालय क े लिए प्रश्नपत्रों और उत्तर पुस्तिकाओं की स्वयं जांच करने की अनुमति नहीं है, खासकर जब आयोग ने उम्मीदवारों की पारस्परिक योग्यता का आकलन किया हो (हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग बनाम मुक े श ठाक ु र और अन्य)। न्यायालयों को सम्मान दिखाना होगा। और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर विचार करना जिनक े पास मूल्यांकन करने और सिफारिशें करने की विशेषज्ञता है [देखें बसवैयाह (डॉ.) बनाम डॉ. एच.एल. रमेश और अन्य।)। उत्तर पुस्तिकाओं क े पुनर्मूल्यांकन क े संबंध में न्यायिक समीक्षा क े दायरे की जांच करते हुए, इस अदालत ने रण विजय सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य क े मामले में कहा कि अदालत को किसी उम्मीदवार की उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन या जांच नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसक े पास मामलों में कोई विशेषज्ञता नहीं है और अकादमिक मामलों को शिक्षाविदों क े लिए छोड़ देना सबसे अच्छा है। उक्त निर्णय में इस न्यायालय ने आगे निम्नानुसार व्यवस्था की: "31। अपनी ओर से हम यह जोड़ सकते हैं कि उत्तर पुस्तिका क े पुनर्मूल्यांकन को निर्देशित करने या न करने क े मामले में सहानुभूति या करुणा कोई भूमिका नहीं निभाती है। यदि परीक्षा प्राधिकरण द्वारा कोई त्रुटि की जाती है, तो उम्मीदवारों का पूरा निकाय भुगतता है। संपूर्ण परीक्षा प्रक्रिया क े वल इसलिए पटरी से उतरने लायक नहीं है क्योंकि क ु छ उम्मीदवार निराश या असंतुष्ट हैं या उन्हें लगता है कि गलत प्रश्न या गलत उत्तर से उनक े साथ क ु छ अन्याय हुआ है। सभी उम्मीदवार समान रूप से पीड़ित होते हैं, हालांकि क ु छ अधिक पीड़ित हो सकते हैं लेकिन इसमें मदद नहीं की जा सकती क्योंकि गणितीय सटीकता हमेशा संभव नहीं होती है। इस न्यायालय ने गतिरोध से बाहर निकलने का एक रास्ता दिखाया है - संदिग्ध या आपत्तिजनक प्रश्न को बाहर कर दें।

32. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस न्यायालय क े कई निर्णयों क े बावजूद, जिनमें से क ु छ की ऊपर चर्चा की जा चुकी है, परीक्षाओं क े परिणाम में न्यायालयों का हस्तक्षेप है। यह परीक्षा अधिकारियों को एक अस्वीकार्य स्थिति में रखता है जहां वे जांच क े दायरे में हैं न कि उम्मीदवारों क े लिए। इसक े अतिरिक्त, बड़े पैमाने पर और कभी-कभी लंबे समय तक चलने वाला परीक्षा अभ्यास अनिश्चितता की हवा क े साथ समाप्त होता है। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि उम्मीदवार परीक्षा की तैयारी में जबरदस्त प्रयास करते हैं, यह नहीं भूलना चाहिए कि परीक्षा अधिकारियों ने भी परीक्षा को सफलतापूर्वक आयोजित करने क े लिए उतना ही प्रयास किया है। कार्य की विशालता बाद क े चरण में क ु छ चूक प्रकट हो सकती है, लेकिन अदालत को परीक्षा में सफलतापूर्वक भाग लेने वाले उम्मीदवारों और परीक्षा अधिकारियों द्वारा किए गए प्रयासों में हस्तक्षेप करने से पहले परीक्षा अधिकारियों द्वारा की गई आंतरिक जांच और संतुलन पर विचार करना चाहिए। वर्तमान अपील ऐसे हस्तक्षेप क े परिणाम का एक उत्क ृ ष्ट उदाहरण है जहां आठ साल बीत जाने क े बाद भी परीक्षाओं क े परिणाम को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता है। परीक्षा अधिकारियों क े अलावा उम्मीदवार भी परीक्षा क े परिणाम की निश्चितता या अन्यथा क े बारे में आश्चर्यचकित रह जाते हैं - चाहे वे पास हुए हों या नहीं; क्या उनका परिणाम न्यायालय द्वारा स्वीक ृ त या अस्वीक ृ त किया जाएगा; उन्हें किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलेगा या नहीं; और उनकी भर्ती होगी या नहीं। यह असंतोषजनक स्थिति किसी क े लाभ क े लिए काम नहीं करती है और अनिश्चितता की ऐसी स्थिति क े परिणामस्वरूप भ्रम की स्थिति बदतर हो जाती है। इन सबका समग्र और बड़ा प्रभाव यह है कि जनहित प्रभावित होता है।

12. इस न्यायालय द्वारा निर्धारित उपरोक्त कानून क े मद्देनजर, खंडपीठ प्रश्नों की शुद्धता की जांच करने क े लिए खुली नहीं थी और अपीलकर्ताओं ने अपने फ ै सले दिनांक 12.03.2019 में विशेषज्ञ समिति क े फ ै सले से अलग निष्कर्ष पर पहुंचने क े लिए उत्तर क ुं जी को रिचल और अन्य बनाम राजस्थान लोक सेवा आयोग और अन्य पर रखा था। उक्त निर्णय में, इस न्यायालय ने एक विशेषज्ञ समिति की राय प्राप्त करने क े बाद ही चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया, लेकिन स्वयं प्रश्नों और उत्तरों की शुद्धता में प्रवेश नहीं किया। इसलिए, उक्त निर्णय इस मामले में विवाद क े न्यायनिर्णयन क े लिए प्रासंगिक नहीं है।

13. उपरोक्त निर्णयों क े अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि न्यायालयों को शैक्षणिक मामलों में विशेषज्ञ राय में दखल देने में बहुत धीमी गति से काम करना चाहिए। किसी भी स्थिति में, सही उत्तरों पर पहुंचने क े लिए स्वयं न्यायालयों द्वारा प्रश्नों का मूल्यांकन करने की अनुमति नहीं है। सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियों को अंतिम रूप देने में देरी मुख्य रूप से अदालतों में लंबे समय से लंबित चयनों को चुनौती देने वाले मामलों क े लंबित रहने क े कारण हुई है। नियुक्तियों में देरी का व्यापक प्रभाव अस्थायी आधार पर नियुक्त लोगों की निरंतरता और नियमितीकरण क े उनक े दावों में है। सार्वजनिक पदों पर विलंबित नियुक्तियों क े परिणामस्वरूप अन्य परिणाम पर्याप्त कर्मियों की कमी क े कारण प्रशासन को होने वाली गंभीर क्षति है।

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14. उत्तरदाताओं द्वारा किया गया यह निवेदन कि अपीलकर्ता किसी भी राहत क े हकदार नहीं हैं क्योंकि न्यायालय का दरवाजा खटखटाने में अत्यधिक देरी हो रही है, पूर्ववर्ती पैराग्राफों में निष्कर्षों क े मद्देनजर अधिनिर्णय देने की आवश्यकता नहीं है। आरपीएससी द्वारा दायर किए गए बयान से यह स्पष्ट है कि रिक्तियां मौजूद हैं जिनका उपयोग अपीलकर्ताओं की नियुक्ति क े लिए किया जा सकता है। उम्मीदवारों की योग्यता क े अनुसार प्रतीक्षा सूची से मौजूदा रिक्तियों को भरने क े लिए आरपीएससी और राज्य सरकार को खुला छोड़ने क े अलावा हम कोई निर्देश देने क े इच्छ ु क नहीं हैं। इस न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश क े मद्देनजर रोकी गई चयन प्रक्रिया आज से 8 सप्ताह की अवधि क े भीतर पूरी की जानी चाहिए। खंडपीठ ने अपने निर्णय दिनांक 12.03.2019 द्वारा 05 प्रश्नों की सत्यता पर निष्कर्ष दर्ज करने में विशेषज्ञों की राय को गलत मानते हुए त्रुटि की है। हम फ ै सले को रद्द नहीं कर रहे हैं क्योंकि हमें सूचित किया गया है कि 21 अपीलकर्ताओं में से 05 को पहले ही नियुक्त किया जा चुका है और हम उनकी नियुक्तियों को रद्द करने क े इच्छ ु क नहीं हैं।

15. हम दूसरी उत्तर क ुं जी क े आधार पर तैयार चयन सूची दिनांक 21.05.2019 और प्रतीक्षा सूची दिनांक 22.05.2019 को बरकरार रखते हैं।

16. उपरोक्त कारणों से अपील खारिज की जाती है।..................................जे. [एल। नागेश्वर राव] [हेमंत गुप्ता] [अजय रस्तोगी] नयी दिल्ली, दिसम्बर 07, 2020. (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.