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भार क
े सव च्च न्यायालय में
सिसविवल अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील संख्या 268-269 वर्ष& 2021
(एसएलपी (दीवानी) संख्या 17665-17666 वर्ष& 2019 से उद्भू )
पूरन चंद ...... अपीलार्थी4 (गण)
बनाम
क
ु लाति पति और अन्य ...... प्रत्यर्थी4 (गण)
विनण&य
न्यायमूर्ति अशोक भूर्षण
अनुमति प्रदान की गयी।
JUDGMENT
2. इन अपीलों को इलाहाबाद, उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्ड़पीठ क े 12.4.2018 विदनांविक विनण&य को चुनौ ी दे े हुए दायर विकया गया है, सिLसक े ह प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा दायर रिरट यातिचका को अनुमति प्रदान की गई है और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा विदए गए प्रत्यावेदन को अस्वीकार कर े हुए क ु लाति पति क े 08.07.2009 विदनांविक आदेश को अपास् कर विदया गया।
3. इन अपीलों को विनण[4] करने क े लिलए मामले क े संतिक्षप्त थ्य विनम्न हैं: mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 3.[1] किंकग LाL& तिचविकत्सा विवश्वविवद्यालय, उ.प्र. अति विनयम सं. 8 वर्ष& 2002 अर्थीा& ् किंकग LाL& तिचविकत्सा विवश्वविवद्यालय अति विनयम, उत्तर प्रदेश अति विनयम, 2002 क े अ ीन एक तिचविकत्सा विवश्वविवद्यालय है। विदनांक 15.03.2005 को उ.प्र. किंकग LॉL& यूविनवर्सिसटी ऑफ डेंटल साइंसेL, लखनऊ (इसक े बाद 'विवश्वविवद्यालय' क े रूप में संदर्भिभ ) द्वारा एक विवज्ञापन Lारी विकया गया, सिLसमें प्रोफ े सर, एसोसिसएट प्रोफ े सर, असिसस्टेंट प्रोफ े सर और लेक्चरर क े पद क े लिलए आवेदन आमंवित्र विकए गए। 3.[2] अपीलक ा& ने सहायक प्रोफ े सर क े पद पर विनयुविh क े लिलए आवेदन विकया, Lबविक प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने लेक्चरर (प्रवhा) क े पद पर विनयुविh क े लिलए आवेदन विकया। अपीलक ा& और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 दोनों पर एक ही चयन सविमति द्वारा विवचार विकया गया र्थीा र्थीा सहायक प्रोफ े सर क े पद पर अपीलक ा& की और प्रवhा क े पद पर प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की विनयुविh को मंLूरी दे े हुए चयन सविमति की सिसफारिरशों को काय&कारी परिरर्षद द्वारा अपनी बैठक में विदनांक 08.08.2005 को मंLूरी दे दी गयी। अपीलक ा& Lो गोरखपुर क े बीआरडी मेतिडकल कॉलेL में सहायक प्रोफ े सर क े रूप में काय&र र्थीा, उसने उत्तर प्रदेश राज्य से अनुमति प्राप्त करने क े बाद विदनांक 08.12.2005 को सहायक प्रोफ े सर क े पद को ग्रहण कर लिलया। 3.[3] विदनांक 08.08.2005 को प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने प्रवhा क े पद पर अपनी विनयुविh ग्रहण कर ली। ीन साल का अनुभव पूरा करने क े बाद 08.08.2007 को सहायक प्रोफ े सर क े पद पर प्रत्यर्थी4 संख्या 4 को पदोन्न विकया गया र्थीा। अपीलक ा& पर वरिरष्ठ ा का दावा कर े हुए Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा विवश्वविवद्यालय को प्रत्यावेदन विदए गए र्थीे। विवश्वविवद्यालय में विनयुविh और सहायक प्रोफ े सर क े रूप में वरिरष्ठ ा क े दावे क े संबं में विदनांक 13.02.2009 को प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा क ु लाति पति को एक प्रत्यावेदन विदया गया र्थीा। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने दावा विकया विक डब्ल्यू.एच.ओ. में सीविनयर रिरसच& फ ै लो क े रूप में विनयुविh क े समय उनक े अनुभव पर विवचार नहीं विकया गया र्थीा। कु लाति पति को विदए गए उनक े प्रत्यावेदन में मुख्य रूप से उनक े अनुभव क े आ ार पर अपीलक ा& पर वरिरष्ठ ा का दावा कर े हुए यह कहा गया विक सहायक प्रोफ े सर क े पद पर उसकी विनयुविh क े समय उसने अपेतिक्ष अनुभव भी पूरा कर लिलया है। 3.[4] क ु लाति पति ने 08.07.2009 विदनांविक अपने आदेश से प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा विदए गए प्रत्यावेदन को अस्वीकार कर विदया। कु लाति पति ने अपने आदेश में विवश्वविवद्यालय द्वारा भेLी गई रिरपोट& का उल्लेख विकया विक डब्ल्यूएचओ में सीविनयर रिरसच& फ े लो क े रूप में अपीलक ा& क े अनुभव को अनुभव क े रूप में नहीं विगना Lा सक ा है। उसक े दावे को खारिरL कर े हुए क े विदनांक 08.07.2009 क े आदेश से व्यथिर्थी होकर, प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने एक रिरट यातिचका दायर की Lो रिरट यातिचका संख्या 1350 (एसबी) वर्ष& 2009 है सिLसमें विनम्नलिललिख अनु ोर्षों क े लिलए प्रार्थी&ना की गई:- "i. रिरट यातिचका की अनुलग्नक संख्या 1 और 2 में विनविह विवपक्षी संख्या 1 द्वारा पारिर 08.07.2009 विदनांविक आक्षेविप आदेश और सहायक प्रोफ े सर क े रूप में विवरो ी पक्षकार संख्या 4 की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds 08.08.2005 विदनांविक आक्षेविप विनयुविh आदेश को रद्द करने क े लिलए उत्प्रेर्षण लेख Lारी करने क े लिलए। ii. विवरो ी पक्षकार संख्या 4 को सहायक प्रोफ े सर क े पद से वापस करने और विनयुविh की ति थिर्थी से उसे प्रवhा क े पद पर विनयुh करने क े लिलए विवरो ी पक्षकार संख्या 1 से 3 को आदेश दे े हुए परमादेश/प्रति र्षे लेख Lारी करने क े लिलए। iii. यातिचकाक ा& को सभी परिरणामी सेवा लाभों क े सार्थी विवरो ी पक्षकार संख्या 4 से वरिरष्ठ घोविर्ष करने क े लिलए पक्षकार संख्या 1 से 3 को आदेश दे े हुए परमादेश रिरट Lारी करने क े लिलए। iv. यातिचकाक ा& को सहायक प्रोफ े सर क े पद पर पदोन्न करने में थिशक्षण अनुभव क े रूप में सीविनयर रिरसच& फ ै लो की अवति की गणना करने क े लिलए विवरो ी पक्षकारों को आदेश दे े हुए परमादेश रिरट Lारी करने क े लिलए। v. कोई अन्य रिरट, आदेश या विनद{श, सिLसे माननीय न्यायालय मामले की परिरस्थिस्र्थीति यों में ठीक समझे, पारिर विकया Lाये। vi. रिरट यातिचका को लाग क े सार्थी अनुमति दें।” 3.[5] रिरट यातिचका में अपीलक ा& क े सार्थी-सार्थी विवश्वविवद्यालय, दोनों ने अपना Lवाबी हलफनामा दायर विकया है और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े दावे पर प्रति वाद विकया है। उच्च न्यायालय की खण्ड़पीठ ने 12.04.2018 विदनांविक अपने आक्षेविप आदेश से रिरट यातिचका को अनुमति प्रदान की। उच्च न्यायालय क े आदेश का वि•याशील भाग इस प्रकार है:- Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds " दनुसार रिरट यातिचका को अनुमति दी Lा ी है। कु लाति पति द्वारा पारिर 8.7.2009 विदनांविक आदेश को ए द्द्वारा रद्द विकया Lा ा है और संबंति विवश्वविवद्यालय को विनद{श विदया गया है विक वह विवरो ी पक्षकार संख्या 4 को उसकी योग्य ा क े अनुसार प्रारंभ से प्रवhा क े पद पर विनयुh हुआ माने। द्नुसार परिरणाम होगें। हालांविक, विवरो ी पक्षकार संख्या 4 से सहायक प्रोफ े सर क े पद पर उh प्रारंथिभक विनयुविh क े कारण उसे विकए गए भुग ानों की कोई वसूली नहीं की Lाएगी।" 3.[6] उच्च न्यायालय क े विनण&य से व्यथिर्थी अपीलक ा& इन अपीलों में आया है।
4. हमने अपीलक ा& क े विवद्वान वरिरष्ठ अति वhा सुश्री मीनाक्षी अरोड़ा को सुना। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े लिलए विवद्वान वरिरष्ठ अति वhा श्री एसआर सिंसह उपस्थिस्र्थी हुए, प्रत्यर्थी4 संख्या 3 क े लिलए विवद्वान अति वhा श्री विवष्णु शंकर Lैन उपस्थिस्र्थी हुए हैं।
5. अपीलक ा& क े विवद्वान अति वhा का क & है विक अपीलक ा& ने 19.07.2003 से 07.12.2005 क बीआरडी मेतिडकल कॉलेL में सहायक प्रोफ े सर क े रूप में विवश्वविवद्यालय में काम करना शुरू कर विदया र्थीा। यह कहा गया विक बीआरडी मेतिडकल कॉलेL, गोरखपुर, में अपनी प्रति विनयुविh से पहले, वह 01.09.1992 से प्रां ीय तिचविकत्सा सेवा क े सदस्य र्थीे और डेंटल सL&न क े रूप में एक दशक से अति क समय से काय& कर रहे र्थीे। यह कहा गया विक चयन सविमति ने अपीलक ा& क े सेवा अनुभव और काय& पर विवचार Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds करने क े बाद उसको सहायक प्रोफ े सर क े पद पर योग्य पाया और सहायक प्रोफ े सर क े रूप में सिसफारिरश की, सिLसे इस रह विनयुh विकया गया। यह कहा गया विक प्रत्यर्थी4 संख्या 4 सहायक प्रोफ े सर की योग्य ाओं को पूरा नहीं विकया क्योंविक आवेदन क े समय, उनक े पास क े वल एक वर्ष& का अनुभव र्थीा, इसलिलए उसने क े वल प्रवhा क े पद क े लिलए ठीक ही आवेदन विकया। यह कहा गया विक सहायक प्रोफ े सर क े रूप में अपीलक ा& की विनयुविh को प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा कभी चुनौ ी नहीं दी गई र्थीी और यह अपीलक ा& पर प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की वरिरष्ठ ा क े दावे क े संबं में है, उसने विवश्वविवद्यालय और क ु लाति पति दोनों को अपना प्रत्यावेदन प्रस् ु विकया। कु लाति पति को प्रत्यावेदन भी अपीलक ा& की विनयुविh क े ीन साल से अति क समय क े बाद प्रस् ु विकया गया र्थीा और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा प्रत्यावेदन क े वल ब प्रस् ु विकए गए र्थीे, Lब उन्हें वर्ष& 2007 में सहायक प्रोफ े सर क े रूप में पदोन्न विकया गया र्थीा। यह प्रस् ु विकया गया है विक उच्च न्यायालय ने े सर क े रूप में अपीलक ा& की विनयुविh को चुनौ ी देने पर विवचार करक े त्रुविट की, Lबविक विनयुविh को क े समक्ष या रिरट यातिचका द्वारा उतिच अवति क े भी र कभी चुनौ ी नहीं दी गई र्थीी, रिरट यातिचका को वर्ष& 2009 में दायर विकया गया र्थीा। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 को चार साल से अति क की अवति क े बाद अपीलक ा& की विनयुविh को चुनौ ी देने की अनुमति नहीं दी Lा सक ी है। यह प्रस् ु विकया गया विक अपीलक ा& शुरू से ही प्रत्यर्थी4 संख्या 4 से वरिरष्ठ र्थीा और अपीलक ा& की वरिरष्ठ ा क े बारे में प्रत्यर्थी4 संख्या 4 का दावा गल र्थीा और विववाद प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा क े वल स्वयं को अपीलक ा& से वरिरष्ठ होना का दावा करने क े उद्देश्य से Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds शुरू विकया गया र्थीा। अपीलक ा& ने सहायक प्रोफ े सर क े लिलए योग्य ा को पूरा विकया और विनयुविh की ति र्थीी से अपने पद पर काय& कर रहा है।
6. प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की ओर से उपस्थिस्र्थी विवद्वान वरिरष्ठ अति वhा श्री एसआर सिंसह ने कहा विक प्रां ीय तिचविकत्सा सेवा क े सदस्य क े रूप में अपीलक ा& का अनुभव सहायक प्रोफ े सर क े उद्देश्य से पूरी रह अप्रासंविगक र्थीा। अति क से अति क, अपीलक ा& का विदनांक 19.07.2003 से 07.12.2005 क बीआरडी मेतिडकल कॉलेL, गोरखपुर में दं तिचविकत्सा विवभाग में सहायक प्रोफ े सर क े रूप में अनुभव को ध्यान में रखा Lा सक ा है, Lो क े वल दो साल चार महीने और 19 विदन है, Lो ीन साल से कम र्थीा, इसलिलए उसने सहायक प्रोफ े सर क े लिलए पात्र ा को पूरा नहीं विकया। श्री एसआर सिंसह ने कहा विक अपीलक ा&, Lो े सर क े पद क े लिलए पात्र ा को पूरा नहीं कर ा र्थीा, सहायक प्रोफ े सर क े पद पर उनकी विनयुविh अवै र्थीी और शून्य है और उच्च न्यायालय का यह विनण&य सही है विक प्रत्यर्थी4 संख्या 4 पात्र नहीं है, सिLसे इस न्यायालय द्वारा विकसी भी हस् क्षेप की आवश्यक ा नहीं है।
7. हमने पक्षकारों क े विवद्वान अति वhा क े क† पर विवचार विकया है और अथिभलेखों का परिरशीलन विकया है।
8. 15.03.2005 विदनांविक विवज्ञापन द्वारा विवज्ञाविप सहायक प्रोफ े सर और प्रवhा क े पद क े लिलए योग्य ा, लखनऊ विवश्वविवद्यालय की पहली संविवति क े अनुसार अपेतिक्ष योग्य ा क े रूप में उल्लेख विकया गया र्थीा। अति विनयम, 2002 की ारा 42 में विवश्वविवद्यालय की प्रर्थीम संविवति का प्राव ान है। ारा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds में आगे प्राव ान विकया गया है विक Lब क प्रर्थीम संविवति इस प्रकार नहीं बनाई Lा ी है, लखनऊ विवश्वविवद्यालय की संविवति विनयुविh ति थिर्थी से ठीक पहले, Lहाँ क वे अति विनयम, 2002 क े प्राव ानों क े सार्थी असंग नहीं हैं, लागू होंगी, और ऐसे रूपां रों और संशो नों क े अ ीन लागू रहेंगे। लखनऊ विवश्वविवद्यालय की प्रासंविगक संविवति, Lो सहायक प्रोफ े सर क े पद क े लिलए योग्य ा का प्राव ान कर ी है, वह संविवति 11.[2] बी 2 है, Lो विनम्नलिललिख प्रभाव का है:- "11.[2] बी 2. सहायक प्रोफ े सर: संबंति विवर्षय में एमडीएस की तिडग्री प्राप्त करने क े बाद प्रवhा / चीफ रेसिLडेंट / सीविनयर रेसिLडेंट / विनदश&क / थिशक्षक या समकक्ष क े रूप में कम से कम ीन साल क े थिशक्षण अनुभव क े सार्थी संबंति विवर्षय में डेंटल काउंसिसल ऑफ इंतिडया द्वारा मान्य ा प्राप्त एमडीएस या समकक्ष तिडग्री। बश { विक यविद अपेतिक्ष थिशक्षण अनुभव वाले उपयुh अभ्यर्थी4 उपलब् नहीं हैं, ो चयन सविमति विनम्न श्रेणी अर्थीा& ् प्रवhा में विनयुविh क े लिलए उम्मीदवारों की सिसफारिरश कर सक ी है।"
9. इस थ्य पर कोई विववाद नहीं है विक 15.03.2005 क े विवज्ञापन क े अनुसरण में अपीलक ा& और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 दोनों ने •मशः सहायक प्रोफ े सर और प्रवhा क े पद क े लिलए आवेदन विकया र्थीा और चयन सविमति ने उनकी विनयुविh की सिसफारिरश की और काय&कारी परिरर्षद ने अपनी बैठक विदनांक 08.08.2005 में अपीलक ा& को सहायक प्रोफ े सर क े रूप में और Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds प्रत्यर्थी4 संख्या 4 को प्रवhा क े रूप में चयन सविमति की सिसफारिरश को मंLूरी प्रदान की।
10. विवश्वविवद्यालय ने अपने प्रति शपर्थीपत्र में उ.प्र. अति विनयम संख्या 8 वर्ष& 2002 की ारा 53 पर अवलम्ब लिलया और संदर्भिभ विकया है। अति विनयम, 2002 की ारा 53 इस प्रकार है:- “53- यविद कोई प्रश्न उठ ा है विक क्या विकसी व्यविh को विवति व चुना गया है या विनयुh विकया गया है या वह विवश्वविवद्यालय क े विकसी प्राति कारण या अन्य विनकाय का सदस्य होने का हकदार है (सिLसमें विकसी संविवति, अध्यादेश या विवविनयमन की वै ा क े बारे में कोई प्रश्न भी शाविमल है, Lो राज्य सरकार या क ु लाति पति द्वारा नहीं बनाया गया है या अनुमोविद नहीं है), इस अति विनयम या इसक े ह बनायी गयी संविवति यों या अध्यादेशों क े अनुरूप है, ो मामला क ु लाति पति को भेLा Lाएगा, और उस पर क ु लाति पति का विनण&य अंति म होगा: बश { विक इस ारा क े अ ीन कोई संदभ& नहीं विदया Lाएगा- (क) उस ारीख क े ीन महीने से अति क समय बाद Lब पहली बार प्रश्न उठाया Lा सक ा र्थीा, (ख) विवश्वविवद्यालय क े विकसी प्राति कारी या अति कारी या व्यथिर्थी व्यविh से थिभन्न विकसी व्यविh द्वारा: Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds बश { विक क ु लाति पति असा ारण परिरस्थिस्र्थीति यों में विनम्नव काय& कर सक ा है- (क) पूव&व 4 परं ुक में उसिल्ललिख अवति की समाविप्त क े पश्चा ् स्वंय क े संज्ञान पर काय& कर सक ा है या संदभ& पर विवचार कर सक ा है, (ख) Lहां विनर्दिदष्ट मामला विनवा&चन (चुनने) क े बारे में विकसी विववाद से संबंति है, और इस प्रकार चुने गए व्यविhयों की पात्र ा संदेह में है, वहां रोक (स्टे) का ऐसा आदेश पारिर कर सक ा है Lो वह उतिच और समीचीन समझ ा है।"
11. ारा 53 में यह प्राव ान है विक यविद कोई प्रश्न उठ ा है विक क्या विकसी व्यविh को विवति व चुना गया है या विनयुh विकया गया है, ो मामला क ु लाति पति को भेLा Lाएगा और उस पर कु लाति पति का विनण&य अंति म होगा। इस ारा में इस आशय का परं ुक भी है विक इस ारा में कोई संदभ& उस ारीख क े ीन महीने से अति क समय बाद नहीं विदया Lाएगा Lब पहली बार प्रश्न उठाया Lा सक ा र्थीा। हालांविक, दूसरे परन् ुक में क ु लाति पति उh अवति की समाविप्त क े बाद संदभ& पर विवचार कर सक ा है। विकसी प्राति करण या विनकाय क े सदस्य की विनयुविh क े संबं में, ीन महीने की अवति क े भी र विकसी प्रश्न पर विवचार करने का प्रयोज्य और उद्देश्य यह है विक क्या विकसी व्यविh को विवति व विनयुh विकया गया है। विवश्वविवद्यालय क े थिशक्षण संकाय क े सदस्य चाहे प्रवhा हो या सहायक प्रोफ े सर, उन्हें थिशक्षण काय& सौंपा Lा ा है, सिLसे शैक्षथिणक क ै लेंडर क े अनुसार प्रदान विकया Lाना है। यह Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विवश्वविवद्यालय क े विह में है विक थिशक्षकों की विनयुविh क े बारे में सभी संदेह ीन महीने की अवति क े भी र उठाए Lा े हैं ाविक विवश्वविवद्यालय में विववादों को समाप्त करक े क ु लाति पति द्वारा शीघ्र विनण&य लिलया Lा सक े ।
12. अथिभलेख पर लाए गए थ्यों से यह स्पष्ट है विक कु लाति पति को संदभ& प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा क े वल 13.02.2009 को विकया गया र्थीा, अर्थीा& े सर क े रूप में उसकी पदोन्नति क े बाद विकया गया र्थीा। क ु लाति पति ने अपने आदेश में प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े दावे क े सार पर ध्यान विदया है। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने डब्ल्यूएचओ में वरिरष्ठ रिरसच& फ ै लो क े अनुभव को शाविमल करने का दावा विकया है। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने सहायक प्रोफ े सर क े लिलए अपने अनुभव में डब्ल्यूएचओ में वरिरष्ठ रिरसच& फ ै लो क े रूप में अनुभव पर विवचार न करने की थिशकाय की है। कु लाति पति ने डब्ल्यूएचओ में वरिरष्ठ रिरसच& फ ै लो क े रूप में अपने अनुभव को शाविमल करने क े लिलए प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े दावे क े संबं में विवश्वविवद्यालय क े रुख पर ध्यान विदया और विनम्नलिललिख अवलोकन विकए:- "विवश्वविवद्यालय ने सूतिच विकया है विक डॉ. राव क े थिशक्षण अनुभव में वरिरष्ठ रिरसच& फ ै लो क े रूप में डब्ल्यूएचओ में उनकी सेवा क े अनुभव को सहायक प्रोफ े सर क े लिलए नहीं माना (Lोड़ा) गया क्योंविक उपविनयमों में ऐसी कोई योLना नहीं है। डॉ. राव द्वारा समय-समय पर भेLे गए आवेदनों का खारिरL कर विदया गया र्थीा। विवश्वविवद्यालय ने यह भी ब ाया है विक डॉ. अविम नागर और डॉ. Lीक े सिंसह क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds मामले से थिशकाय क ा& क े मामले की कोई समान ा नहीं है और डॉ. नागर का मामला अलग है। अं में, विवश्वविवद्यालय का यह कहना है विक डॉ. राव ने इसमें उसिल्ललिख थ्यों की सच्चाई को Lाने विबना और अनति क ृ रीक े से आवेदन प्रस् ु विकए हैं और चूंविक डॉ. राव क े उपरोh मामले में कोई बल नहीं है, इसलिलए कोई प्रभाव नहीं है और झूठे थ्यों पर आ ारिर है और भ्रम पैदा कर ा है इसलिलए थिशकाय को अस्वीकार करने का अनुरो विकया गया है।"
13. क ु लाति पति ने आगे देखा विक प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने मुख्य रूप से अपीलक ा& पर अपनी वरिरष्ठ ा स्र्थीाविप करने का अनुरो विकया है। आदेश क े अंति म प्रस् र में, क ु लपति ने विनम्नलिललिख अवलोकन विकए हैं:- "प्रत्यर्थी4 ने मुख्य रूप से प्रत्यर्थी4 डॉ. पूरन चंद क े विवरूद्ध अपनी वरिरष्ठ ा स्र्थीाविप करने का अनुरो विकया है और मुख्य रूप से कहा है विक भार सरकार और डब्ल्यूएचओ में वरिरष्ठ रिरसच& फ ै लो क े रूप में उनक े अनुभव को तिचविकत्सा विवश्वविवद्यालय द्वारा अनुभव क े रूप में नहीं विगना गया है। इस संबं में छत्रपति शाहू Lी महाराL तिचविकत्सा विवश्वविवद्यालय, लखनऊ क े क ु लपति द्वारा भेLी गई रिरपोट& में यह स्पष्ट विकया गया है विक लखनऊ विवश्वविवद्यालय क े प्रर्थीम उप-विवति यों की ारा 10.01 (क) में, सिLसे व &मान में तिचविकत्सा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विवश्वविवद्यालय में लागू विकया गया है, उसमें भी डब्ल्यूएचओ में वरिरष्ठ रिरसच& फ ै लो क े रूप में की गई सेवाओं पर विवचार करने का कोई प्राव ान नहीं है। विवश्वविवद्यालय द्वारा विदया गया कारण, विवति क े अनुसार है और व &मान आवेदन में बल ना होने से खारिरL कर विदया गया है।"
14. क ु लाति पति को प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की ओर से की गई थिशकाय की प्रति को प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा अथिभलेख पर नहीं लाया गया है, लेविकन क े आदेश क े परिरशीलन क े बाद, प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की मुख्य थिशकाय डब्ल्यूएचओ में वरिरष्ठ रिरसच& फ ै लो क े रूप में उसक े थिशक्षण अनुभव को सस्थिम्मलिल नहीं करने और अपीलक ा& पर वरिरष्ठ ा क े उनक े दावे क े लिलए र्थीी। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने इस अपील में एक Lवाबी हलफनामा दायर विकया है, सिLसक े प्रस् र 9 में, प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा विनम्नलिललिख अथिभकथिर्थी विकया गया है:- "9. उत्तरदा ा प्रत्यर्थी4 और डॉ. पूरन चंद क े बीच वरिरष्ठ ा क े संबं में, विवश्वविवद्यालय क े समक्ष उत्तरदा ा प्रत्यर्थी4 द्वारा एक प्रत्यावेदन प्रस् ु विकया गया र्थीा; लेविकन इस पर विवचार नहीं विकया गया और इस रह उत्तरदा ा प्रत्यर्थी4 ने राज्य विवश्वविवद्यालय अति विनयम, 1973 की ारा 68 क े अनुसार माननीय कु लपति से संपक & विकया।” Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
15. ऊपर विदए गए थ्यों और उनक े Lबाबी हलफनामे क े प्रस् र 9 में प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े अथिभकर्थीन से, यह स्पष्ट है विक प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने अपीलक ा& पर वरिरष्ठ ा क े बारे में कु लाति पति को अपना प्रत्यावदेन प्रस् ु विकया र्थीा और 08.08.2005 से सहायक प्रोफ े सर क े रूप में अपीलक ा& की विनयुविh को चुनौ ी नहीं दी गई र्थीी। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 चाह ा र्थीा विक डब्ल्यूएचओ में वरिरष्ठ रिरसच& फ ै लो क े रूप में उसक े अनुभव को भी शाविमल विकया Lाए, सिLसे स्वीकार नहीं विकया गया र्थीा। अति विनयम, 2002 की ारा 53 Lैसा विक ऊपर देखा गया है Lो यह प्राव ान कर ा है विक विवश्वविवद्यालय में विनयुविh क े संबं में कोई विववाद ीन महीने की अवति क े भी र उठाया Lाना है, प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ीन साल से अति क समय क े बाद अपीलक ा& की विनयुविh क े लिलए कोई चुनौ ी नहीं दे सक ा र्थीा। । कु लाति पति ने प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े प्रत्यावेदन पर विवचार विकया और गुणावगुण क े आ ार पर विनण&य लिलया, क्योंविक क ु लाति पति का विवचार र्थीा विक दावा अविनवाय& रूप से अपीलक ा& पर प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की वरिरष्ठ ा का है।
16. इस प्रकार, हमारा विवचार है विक सहायक प्रोफ े सर क े रूप में अपीलक ा& की विनयुविh, सिLसे 08.08.2005 को अनुमोविद विकया गया र्थीा, को अति विनयम, 2002 क े अनुसार प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा चुनौ ी या प्रश्नग नहीं विकया गया र्थीा। हालाँविक, प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा दायर रिरट यातिचका में, उसने सहायक प्रोफ े सर क े रूप में अपीलार्थी4 क े विदनांक 08.08.2005 क े विनयुविh आदेश को रद्द करने क े लिलए प्रार्थी&ना की है, लेविकन हमारा विवचार है विक सहायक प्रोफ े सर क े रूप में अपीलक ा& की विनयुविh को क े समक्ष चुनौ ी नहीं दी गई, उसे अपीलक ा& की Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विनयुविh को चुनौ ी देने की अनुमति नहीं दी Lा सक ी। विदनांक 08.08.2005 की विनयुविh को रिरट यातिचका में चार साल बाद चुनौ ी देने की अनुमति नहीं दी Lा सक ी है।
17. अपीलार्थी4 क े विवद्वान अति वhा की दलीलें सही हैं विक प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े सहायक प्रोफ े सर क े रूप में पदोन्न होने क े बाद उसने प्रत्यावेदन विदया और क े समक्ष अपीलक ा& पर वरिरष्ठ ा का दावा विकया। विवश्वविवद्यालय द्वारा दायर Lवाबी हलफनामे में, प्रत्यावेदन क े विववरण, Lो क ु लाति पति को प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा विदया गया र्थीा, का उल्लेख प्रस् र 2.[9] में भी विकया गया है, Lो विनम्नलिललिख प्रभाव क े हैं:- “2.[9] यह विक विदनांक 13.02.2009 को डॉ. सिL ेंद्र क ु मार राव ने क े Lीएमयू क े क ु लाति पति को विनम्नलिललिख प्रार्थी&ना क े सार्थी एक प्रत्यावेदन विदया:- (क) सहायक प्रोफ े सर क े रूप में विवभाग में मेरी वरिरष्ठ ा को देखा Lा सक ा है। (ख) डॉ. पूरन चंद की वरिरष्ठ ा को विनयमों क े अनुसार वापस लिलया Lा सक ा है। (ग) यविद डा. पूरन चंद की विनयुविh में थ्यों को थिछपाने की कोई सासिLश साविब हो Lा ी है ो संबंति व्यविh क े विवरुद्ध उतिच कार&वाई की Lानी चाविहए।" Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
18. प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की यह प्रार्थी&ना विक अपीलक ा& को प्रवhा क े पद पर वापस कर विदया Lाना चाविहए, इसे ग्रहण नहीं विकया Lा सक ा र्थीा। विदनांक 08.08.2005 को सहायक प्रोफ े सर क े रूप में विनयुh होने पर प्रवhा क े पद पर अपीलक ा& क े प्रत्याव &न का कोई सवाल ही नहीं है।
19. अब, हम उन विनण&यों का उल्लेख कर सक े हैं, सिLन पर प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की ओर से पेश विवद्वान अति वhा द्वारा अपनी दलीलों क े समर्थी&न में अवलम्ब लिलया गया है। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े विवद्वान अति वhा ने नागेंद्र चंद्र और अन्य बनाम झारखंड राज्य और अन्य (2008) 1 एससीसी 798 में इस न्यायालय क े विनण&य पर अवलम्ब लिलया है। उपरोh मामला कांस्टेबलों क े पद क े लिलए रिरविh पर विनयुविh से संबंति है। रिरविhयों को न ो रोLगार काया&लय क े माध्यम से विवज्ञाविप विकया गया र्थीा और न ही एक समाचार पत्र में, Lो विबहार पुलिलस विनयमावली क े विनयम 663 (घ) की आवश्यक ा र्थीी, बस्थिल्क क े वल नोविटस बोड& पर प्रदर्भिश विकया गया र्थीा। उh मामले क े अपीलक ा&ओं, सिLन्हें रिरविh क े विवज्ञापन क े विबना विनयुh विकया गया र्थीा, को सेवा से बखा&स् कर विदया गया र्थीा। रिरट यातिचका दायर की गई र्थीी, उसे भी खारिरL कर विदया गया र्थीा। उच्च न्यायालय क े आदेश को चुनौ ी दे े हुए, इस न्यायालय क े समक्ष अपील दायर की गई र्थीी। विनण&य क े प्रस् र 3 में दलीलें दी गयी, Lो विनम्नलिललिख प्रभाव की है:- "3. अपीलक ा&ओं की ओर से पेश विवद्वान अति वhा ने प्रस् ु विकया विक यद्यविप रिरविhयों को न ो रोLगार काया&लय क े माध्यम से विवज्ञाविप विकया गया र्थीा और न ही विकसी समाचार पत्र में, Lैसा विक विबहार पुलिलस विनयमावली क े विनयम Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds 663 (घ) क े ह आवश्यक र्थीा, लेविकन Lैसा विक नोविटस बोड& पर प्रदर्भिश विकया गया र्थीा, यह नहीं कहा Lा सक ा है विक उh विनयमावली का उल्लंघन र्थीा; इस रह अपीलक ा&ओं की सेवाओं को समाप्त नहीं विकया Lाना चाविहए र्थीा और ब Lब उन्होंने चौदह साल की अवति सेवा में Lारी रखी हो। दूसरी ओर, झारखंड राज्य की ओर से पेश विवद्वान अति वhा ने प्रस् ु विकया विक विनयुविhयाँ विनयम 663 (घ) क े उल्लंघन में होने से, अवै र्थीीं, सक्षम प्राति कारी अपीलक ा&ओं की सेवाओं को समाप्त करने में विबल्क ु ल न्यायसंग र्थीे।"
20. उh विनण&य क े प्रस् र 9 में, इस न्यायालय ने विनम्नलिललिख प्रति पाविद विकया:- "9. पूव&गामी चचा& क े मद्देनLर, हमारे पास यह मानने क े अलावा कोई विवकल्प नहीं है विक यविद भ 4 विनयमों क े उल्लंघन में विनयुविh की Lा ी है, ो वह संविव ान क े अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन होगा और शून्य होने से रद्द होने क े लिलए उत्तरदायी होगी। व &मान मामले में, चूंविक समाचार पत्रों में रिरविhयों का विवज्ञापन नहीं विकया गया र्थीा, इसलिलए की गई विनयुविhयां न क े वल विबहार पुलिलस विनयमावली क े विनयम 663 (घ) क े उल्लंघन में र्थीीं, बस्थिल्क संविव ान क े अनुच्छेद 14 और 16 का भी उल्लंघन विकया गया र्थीा, सिLसने विनयुविhयों को अवै कर विदया; इस रह सक्षम प्राति कारी उनकी सेवाओं Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds को समाप्त करने में विबल्क ु ल न्यायसंग र्थीे और आक्षेविप आदेश द्वारा उच्च न्यायालय इसे बरकरार रखकर विबल्कु ल न्यायसंग र्थीा।"
21. इस प्रस् ाव पर कोई विववाद नहीं हो सक ा है विक Lब विनयुविh भ 4 विनयमों क े उल्लंघन में की Lा ी है, ो वह रद्द होने क े लिलए उत्तरदायी होगीं। व &मान मामला ऐसा मामला नहीं है Lहां अपीलक ा& की विनयुविh को विकसी सक्षम प्राति कारी द्वारा रद्द विकया गया। अपीलक ा& को चयन सविमति की सिसफारिरश पर व काय&कारी परिरर्षद की सम्यक मंLूरी क े सार्थी विनयुh विकया गया र्थीा और उतिच विवज्ञापन क े बाद विनयुविh की गई र्थीी। इस प्रकार, उपरोh विनण&य अलग है और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की मदद नहीं कर ा है।
22. प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े विवद्वान अति वhा द्वारा अवलम्ब लिलया गया एक अन्य विनण&य, आंध्र प्रदेश सरकार और अन्य बनाम क े. ब्रह्मानंदम और अन्य, (2008) 5 एससीसी 241 का है, Lो एक ऐसा मामला र्थीा Lहां प्रबं न ने न ो स्क ू ल प्राति कारिरयों की पूव& अनुमति प्राप्त की और न ही दो समाचार पत्रों में रिरविh का विवज्ञापन विकया और विनयुविh कर दी। विनयुh व्यविhयों अर्थीा& ् माध्यविमक ग्रेड थिशक्षकों ने अपने वे न क े लिलए प्रत्यावेदन विदया, सिLसे सिLला थिशक्षा अति कारी ने अस्वीकार कर विदया। एक रिरट यातिचका दायर की गई, इस यातिचका को उनको Lारी रखने का विनद{श दे े हुए अनुमति दी गई र्थीी। राज्य द्वारा दायर अपील में, उच्च न्यायालय क े विनण&य को अपास् कर विदया गया। इस न्यायालय ने माना विक एक क़ानून क े अविनवाय& प्राव ानों क े उल्लंघन में की गई विनयुविhयां अवै होंगी और इस प्रकार, शून्य होगीं। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds उपरोh प्रस् ाव पर कोई विववाद नहीं हो सक ा है, लेविकन उपरोh मामला एक ऐसा मामला र्थीा Lहां थिशक्षकों की विनयुविh को न ो मंLूरी दी गई र्थीी और न ही वै ाविनक विनयमों क े अनुसार की गयी र्थीी, इसलिलए इस न्यायालय ने यह विवचार विकया विक वे राज्य से विकसी वे न क े हकदार नहीं हैं और स्कू ल प्राति कारी उनक े वे न का भुग ान करने क े लिलए दायी र्थीे।
23. प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े विवद्वान अति वhा द्वारा अवलम्ब लिलया गया एक अन्य विनण&य प्रमोद क ु मार बनाम उ.प्र. माध्यविमक थिशक्षा सेवा आयोग और अन्य (2008)7 एससीसी 153 का है, Lो एक थिशक्षक का ही मामला र्थीा, सिLसने बी. एड. तिडग्री एक ऐसी संस्र्थीा से प्राप्त की र्थीी, Lो मान्य ा प्राप्त नहीं र्थीा। उसे प्रबं न सविमति द्वारा विनयुh विकया गया र्थीा और अपने वे न क े लिलए एक रिरट यातिचका दायर की र्थीी, उसकी सेवाओं को समाप्त कर विदया गया र्थीा। उसने एक रिरट यातिचका दायर की, सिLसे खारिरL कर विदया गया, सिLसक े लिखलाफ की गयी अपील भी खारिरL कर दी गई। इस न्यायालय ने प्रस् र 21 में विनम्नलिललिख विटप्पथिणयाँ की:- "21. यह विववाद में नहीं है विक उh संस्र्थीा को विकसी विवश्वविवद्यालय द्वारा मान्य ा नहीं दी गई र्थीी। विकसी तिडग्री को भी मान्य ा दी Lा ी है यविद उसे विवश्वविवद्यालय अनुदान आयोग अति विनयम, 1956 या विकसी राज्य या संसदीय अति विनयम क े अ ीन गविठ विवश्वविवद्यालय द्वारा मंLूरी दी Lा ी है। कोई भी विवश्वविवद्यालय विनLी प्रबं न द्वारा विबना विकसी वै ाविनक अनुमोदन क े स्र्थीाविप नहीं विकया Lा सक ा।" Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
24. इस न्यायालय ने थिशक्षकों द्वारा दायर अपील को खारिरL कर विदया। उपरोh मामला भी अलग आ ार पर र्थीा और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की मदद नहीं कर ा है।
25. अपीलार्थी4 ने Lम्मू और कश्मीर राज्य बनाम आर.क े. Lालपुरी और अन्य, (2015)15 एससीसी 602 में इस न्यायालय क े विनण&य पर भी अवलम्ब लिलया है, Lहां छह साल क े बाद बखा&स् गी आदेश को चुनौ ी दे े हुए रिरट यातिचका दायर की गई र्थीी। रिरट यातिचका को विवद्वान एकल न्याया ीश द्वारा अनुमति दी गई र्थीी सिLसक े लिखलाफ राज्य द्वारा विकया गया एलपीए भी खारिरL कर विदया गया र्थीा। इस न्यायालय ने अपील की अनुज्ञा दी और अथिभविन ा&रिर विकया विक अनुच्छेद 226 क े अ ीन उच्च न्यायालय में पहुंचने में विवलंब उपरोh मामले में घा क र्थीा। प्रस् र 26 और 27 में विनम्नलिललिख प्रति पाविद विकया गया र्थीा:- "26. व &मान मामले में, कम&चारी को वर्ष& 1999 में सेवा से बखा&स् कर विदया गया र्थीा, लेविकन उसने विकसी भी विवभागीय उपाय का लाभ नहीं उठाने का फ ै सला विकया। वह पांच साल की अवति क े बाद उच्च न्यायालय क े दरवाLे खटखटाने क े लिलए अपनी नींद से Lागा। दावे की देरी बनी रही और इसे रिरट न्यायालय द्वारा पुनL4विव करने की अनुमति नहीं दी Lा सक ी र्थीी।
27. प्रत्यर्थी4 द्वारा विकया गया प्रति वेदन गुणावगुण क े आ ार पर विनस् ारिर विकए Lाने क े योग्य नहीं र्थीी, देरी व विवलम्ब क े सिसद्धां ने पहले ही मृत्यु की विनष्ठुर ा की रह उसक े दावे को Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds समाप्त कर विदया र्थीा Lो विकसी को भी नहीं बख्श ी है यहाँ क विक Lो इस विवचार को ारण कर ा है और इस रवैया का पोर्षण कर ा है विक वह मौ से बचने क े लिलए सो सक ा है और अं में "ईश्वर को न्यवाद" की घोर्षणा कर ा है।"
26. Lैसा विक ऊपर देखा गया है, अति विनयम Lो विवश्वविवद्यालय में सहायक प्रोफ े सरों और प्रवhाओं की विनयुविh को शासिस कर ा है, वह स्वयं विकसी विनयुविh पर सवाल उठाने क े लिलए एक ंत्र प्रदान कर ा है, अर्थीा&, क ु लाति पति को प्रत्यावेदन देकर वह भी ीन महीने की अवति क े भी र करने का प्राव ान प्रदान कर ा है। ीन साल से अति क समय क े बाद विनयुविh को चुनौ ी पर विवचार नहीं विकया Lा सक ा है क्योंविक हम पहले ही यह अव ारिर कर चुक े हैं विक क े समक्ष अपने प्रत्यावेदन में प्रत्यर्थी4 संख्या 4 ने सहायक प्रोफ े सर क े रूप में अपीलक ा& की विनयुविh को कभी चुनौ ी नहीं दी र्थीी और उसने वर्ष& 2007 में उसक े सहायक प्रोफ े सर क े रूप में पदोन्नति प्राप्त करने क े बाद क े वल अपीलक ा& पर वरिरष्ठ ा का दावा कर े हुए प्रत्यावेदन विदया र्थीा, उच्च न्यायालय को रिरट यातिचका में अपीलक ा& की विनयुविh क े लिलए चुनौ ी पर विवचार नहीं करना चाविहए र्थीा और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 क े दावे को अपीलक ा& पर वरिरष्ठ ा क े विवचारण क सीविम करना चाविहए र्थीा। Lब अति विनयम, 2002 क े अनुसार अपीलक ा& की विनयुविh को उतिच समय में चुनौ ी नहीं दी गई र्थीी, ो यह न्याय क े विह में नहीं है विक प्रत्यर्थी4 संख्या 4 को विनयुविh क े चार साल से Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अति क समय क े बाद पहली बार रिरट यातिचका में उच्च न्यायालय में ऐसी विनयुविh को चुनौ ी देने की अनुमति दी Lाए।
27. इस प्रकार, हमारा यह विवचार है विक उच्च न्यायालय ने सहायक प्रोफ े सर क े रूप में प्रत्यर्थी4 संख्या 4 की विनयुविh को रद्द करने, क ु लपति क े आदेश को रद्द करने क े सार्थी-सार्थी अपीलक ा& को प्रवhा क े रूप में विनयुh हुआ मानने का विनद{श देकर त्रुविट कारिर की। प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा विदए गए प्रत्यावेदन को खारिरL कर े हुए क े आदेश में कोई त्रुविट नहीं र्थीी, Lो प्रत्यावेदन अति विनयम संख्या 8 वर्ष& 2002 की ारा 53 क े लिलए संदर्भिभ र्थीा। उच्च न्यायालय ने आदेश को रद्द करने क े सार्थी-सार्थी ऊपर उसिल्ललिख विदशा-विनद{श Lारी करने में त्रुविट कारिर की।
28. पूव&गामी चचा&ओं क े मद्देनLर, हम अपील की अनुमति दे े हैं और उच्च न्यायालय क े विदनांक 12.4.2018 क े विनण&य को अपास् कर े हैं और प्रत्यर्थी4 संख्या 4 द्वारा दायर रिरट यातिचका को खारिरL कर े हैं। ………………………. (न्यायमूर्ति अशोक भूर्षण) ………………………. (न्यायमूर्ति आर. सुभार्ष रेड्डी) ……………….......… (न्यायमूर्ति एम.आर. शाह) नई विदल्ली, 29 Lनवरी 2021. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds