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Delhi High Court · 10 Mar 2021
Indu Malhotra; Ajay Rastogi
Criminal Appeal No 296 of 2021
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court restored criminal proceedings under Sections 420, 406, and 34 IPC in a commercial dispute, holding that the High Court erred in quashing them under Section 482 CrPC where prima facie cognizable offenses were disclosed.

Full Text
Translation output
प्र�तवे
भारतीय सव�च्च न्यायाल
आपरा�धक अपील�य अ�धका�रता
आपरा�धक अपील संख्य - 296/2021
[�वशेष अनुम�त या�चका (आपरा�धक) सं.-6364/2019 से उत्पन]
प्री सराफ़ एवं अन् ...अपीलाथ�(गण)
बनाम
रा.रा.�े. �दल्ल� राज्य एवं अन ...प्रत्(गण)
�नणर्
न्य. रस्तोगी
JUDGMENT

1. अनुम�त प्रन क� गई |

2. अपीलकतारगण जो प्राथ�मकसंख्य 132/2017 �दनांक 28 अप्र, 2017 म� वास्त�व �शकायतकतार ह�, आपरा�धक �व�वध मामला संख्य 1718/2017 और 7009/2017 म� पा�रत उच् न्यायाल क े �दनांक 15 माचर, 2019 क े आदेश पर सवाल उठा रहे ह� िजसक े द्वारा माननीय एकल न्यायाधी ने दंड प्र�क सं�हता (इसक े बाद "दं.प.सं." क े रू म� संद�भर्) क� धारा 482 क े तहत अपने अ�धकार �ेत का प्रय करते हुए भा.दं.स. क� धारा 420, 406 और 34 क े तहत अपराध का सं�ान लेते हुए आदेश� को रद् कर �दया और द्�वतीयप्रत्यक े �खलाफ आपरा�धक कायर्वाह को इस आधार पर रद् कर �दया �क �शकायत/ प्राथ�म म� लगाए गए आरोप उक् धाराओं क े तहत अपराध नह�ं ह�। मामले क े सं��प् तथ्

3. जैसा �क क�थत तौर पर �शकायत से प�रल��त होता है, मामले का तथ्यात् क् यह है �क �वचाराधीन संप�� यानी 37, फ ् र� कॉलोनी (पूवर), नई �दल्ल द्�वतीयप्रत्य क े स्वा�मत म� है। उक् संप�� स्टे ब�क ऑफ प�टयाला क े पास �गरवी रखी गई थी और ब�क को देय क ु ल कानूनी देनदार� 18 करोड़ रुपय थी। यह �क उक् बकाया रा�श का भुगतान करने क े �लए द्�वतीय प्रत् ने दलाल अशोक क ु मार क े साथ सािज़श रची ता�क अपीलाथ�गण/ �शकायतकतार्ग को धोखा देकर ठगा जा सक े और सौदे क े �हस्स क े रू म� �शकायतकतारगण द्वार भुगतान क� गई रा�श और अ�धक गबन करने क े �लए, दूसरे प्रत् ने जान-बूझकर और झूठे तर�क े से अपीलकतार्ग/ �शकायतकतार्ग को यह कहते हुए उनसे �वश्वाघात �कया �क य�द द्�वतीयप्रत् द्वार सौदा पूरा नह�ं �कया गया तो द्�वतीयप्रत् �शकायतकतार को 25.50 करोड़ रुपय क� रा�श का भुगतान करेगी । पूरे प�रदृश को ध्या म� रखते हुए, 24 �दसंबर, 2011 को द्�वतीय प्रत्य और प्र अपीलाथ� क े बीच एक �बक् अनुबंध �नष्पा�द �कया गया। द्�वतीयप्रत्य�वचाराधीन संप�� म� से 1205.43 वगर गज को 63,28,50,750 रुपय क े क ु ल �बक् प्र�त पर बेचने क े �लए सहमत हुई । �नष्पाद क े समय, प्र अपीलकतार ने एचडीएफसी ब�क, न्य फ ् र� कॉलोनी, �दल्ल क े �दनांक 24 �दसंबर, 2011 क े चेक क े माध्य से 12.50 करोड़ रुपय क� रा�श का भुगतान �कया। उक्त �बक् अनुबंध क े खंड 3 क े अनुसार, द्�वतीयप्रत् को तीन आवश्यकताओ को पूरा करना था जो �क अ�नवायर थीं | प्र अपीलाथ�/ �शकायतकतार से कोई और रा�श प्रा करने से पहले द्�वतीय प्रत् द्वार उक् आवश्यकताओ को 24 माचर, 2012 तक पूरा �कया जाना था।

4. �शकायत म� आगे यह आरोप लगाया गया �क �बक् अनुबंध क े खंड 3 क े संदभर म� तीन आवश्यकताओ को द्�वतीय प्रत् द्वार पूरा नह�ं �कया गया और स्वीक त नक्शा प्रा करने म� देर� होने क े बाद भी, मांग पर प्र अपीलाथ� ने 23 मई, 2012 को चेक द्वार 5.40 करोड़ रुपय का भुगतान �कया और अपनी नेकनीयती �दखाने क े �लए द्�वतीय प्रत् ने 24 �दसंबर 2011 क े अनुबंध क े पालन क े �लए ज़मानत क े रूप म 25.50 करोड़ रुपय क े बाद क� तार�ख क े चेक स�पे। प्र अपीलकतार/�शकायतकतार से रा�श प्रा होने क े बाद, द्�वतीयप्रत् ने तुरंत स्टे ब�क ऑफ प�टयाला क� अपनी बकाया कानूनी देनदार� का भुगतान करक े ब�क से अनाप�� प्रमाण प्रा कर �लया ले�कन अनाप�� प्रमाण प्रािप क े तथ् को द्�वतीय प्रत् द्वार �शकायतकतार को जानबूझकर कभी नह�ं बताया गया। द्�वतीय प्रत्यथ� इस तथ् से पहल� बार उस समय पदार् उठाया जब �शकायतकतार को ज़मानत क े रू म� स�पे गए 25.50 करोड़ रुपय क े बाद क� तार�ख क े चेक अमान्य हो ग।

5. शुरू से ह� द्�वतीय प्रत्य �शकायतकतार्ग/अपीलाथ�गण को धोखा देने का इरादा इस तथ् से साफ़ हो जाता है �क द्�वतीय प्रत्य को 24 माचर, 2012 को या उससे पहले अ�नवायर आवश्यकत को पूरा करना था ले�कन पहल� दो आवश्यकताए क्रम 11 मई, 2012 और 2 जून, 2012 को पूर� क� ग� और तीसर� आवश्यकत अभी भी पूर� नह�ं हुई। इस स्त पर, क े वल प्र अपीलकतार/ �शकायतकतार को धोखा देने क े �लए, द्�वतीयप्रत् ने 30 जनवर�, 2013 को संवाद क े माध्य से �बक् अनुबंध को ग़ैर-कानूनी ढंग से समाप् कर �दया। प्र अपीलकतार ने मामले को �नपटाने क े �लए अपने स्त पर पूर� को�शश क� थी, ले�कन द्�वतीयप्रत् क� कायर-प्रणा �बक्र� अनुबंध के �नष्पा क े समय से ह� धोखा देने क� थी, इस�लए क ु छ भी नह�ं हुआ।

6. इस संबंध म�, साक े त न्यायाल, �दल्ल क े सम� द्�वतीय प्रत् द्वार �कए गए अपराध का सं�ान लेने क े �लए 23 �सतंबर, 2015 को दंड प्र�क सं�हता क� धारा 200 सहप�ठत धारा 190 क े तहत माननीय दंडा�धकार� क े सम� एक �नजी �शकायत दजर क� गई िजसम� संबं�धत पु�लस स्टेश को 15 नवंबर, 2016 क े आदेश क े ज़�रए दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 156 (3) क े तहत प्राथ�म दजर करने का �नद�श �दया गया था, िजसे द्�वतीयप्रत् द्वार आपरा�धक पुनर��ण (या�चका) दायर करक े चुनौती द� गई थी, ले�कन इसे अ�त.सत्र न. एवं �वशेष न्यायाधी (एनडीपीएस), द��ण पूवर, साक े त न्यायाल, नई �दल्ल क े �दनांक 26 अप्र, 2017 क े आदेश द्वारा खा�र कर �दया गया और उसक े बाद 28 अप्र, 2017 को दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 156 (3) क े तहत द्�वतीय प्रत् और दलाल श् अशोक क ु मार क े �खलाफ भारतीय दंड सं�हता क� धारा 420, 406 और 34 क े तहत प्राथ�म दजर क� गई।

7. जांच अ�धकार� ने जांच करक े भारतीय दंड सं�हता क� धारा 420, 406 और 34 क े तहत आरोप पत �दनां�कत 5 अक्टूब, 2018 दायर �कया। आरोप पत से पता चलता है �क प्रश् संप��, यानी 1205.43 वगर गज को उप- �वभािजत �कए जाने का आरोप है जब�क संप��, यानी प्लॉ नंबर 37 का माप 3930 वगर गज है और मास्ट प्ला �दल्ल, 2021 क े खंड 4.4.[3] (IV) क े अनुसार प्लॉ क े उप-�वभाजन को स्वीक �त �दए जाने क� अनुम�त नह�ं है। आरोप पत्से यह भी पता चलता है �क 24 �दसंबर, 2011 को �बक्र� अनुबंक े अनुसार �नष्पा�द वतर्मा लेनदेन से पहले, उसी कायर-प्रणाल� के तहद्�वतीयप्रत्यथ� पहले वषर 2007 म� स्-समान संप�� क े संदभर म� मैससर् शाइनस्टा �बल्डकॉ प्राइव �ल�मटेड से 18 करोड़ रुपय क� रा�श ज़ब् कर ल� थी | इससे यह भी पता चलता है �क द्�वतीयप्रत् ने न तो अपीलाथ�गण क े �लए साइट क े नक्शेको मंजूर� �दलवाई और न ह� उसक े दुभार्वनापूण इराद� क े कारण जान-बूझकर �वभािजत और सीमां�कत �ेत को। सं�दग् क े रू म� द्�वतीयप्रत् क े प�त क� भू�मका दंड प्र�क सं�हता क� धारा 173 (8) क े तहत लं�बत जांच क े अधीन है और य�द प्र�तक सामग् अ�भलेख पर आती है, तो बाद म� एस.सी. गोयल (द्�वतीयप्रत् क े प�त) क े �खलाफ पूरक आरोप पत दायर �कया जा सकता है।

8. द्�वतीय प्रत्य ने दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 482 क े तहत उच् न्यायाल क े सम� उसक े कहने पर दायर पुनर��ण या�चका म� 15 नवंबर, 2016 और 26 अप्र, 2017 क े आदेश� को चुनौती द�।

9. अ�भलेख से पता चलता है �क इस तथ् को उच् न्यायाल क े माननीय न्यायाधी क े सं�ान म� लाए जाने क े बाद �क आरोप पत दा�खल �कया जा चुका है, माननीय न्यायाधी ने लोक अ�भयोजक को आदेश �दनांक 9 अक्टूब, 2018 द्वार आरोप पत को अ�भलेख पर लाने का �नद�श �दया। लोक अ�भयोजक द्वार न्यायाल क े आदेश क े अनुपालन म� आरोप पत दा�खल करने क े बाद भी, उच् न्यायाल क े माननीय न्यायाधी ने तथ्य पर ध्या देते समय क े वल 24 �दसंबर, 2011 क े �बक्र� अनुबंध तथ 30 जनवर�, 2013 क े समािप्त नो�ट पर ध्या �दया और अ�भलेख पर मौजूद स्पष् तथ्य क� जांच �कए �बना, �शकायत म� और जाँच क े दौरान जो क ु छ भी हुआ वो �वचारण न्यायल क े सम� दायर आरोप-पत से प�रल��त हुआ और जो अ�भलेख का �हस्स था, उसी आधार पर अभी भी कायर्वाह� चल�और �टप्पण क� �क मामला अनुबंध क े साधारण उल्लंघ का है, जो �वशुद् रू से द�वानी �ववाद को जन् देता है और इसे फौजदार� अपराध म� प�रव�तर् नह�ं �कया जा सकता है, �वशेष रूप स जब मध्यस्थता कायर्वाह शुर हो चुक� हो, ऐसी �वशेष प�रिस्थ�तय म�, यह माना गया �क य�द इस तरह क े द�वानी �ववाद� को आपरा�धक कायर्वाह म� मुकद्मा चलाने क� अनुम�त द� जाती है, तो माननीय न्यायाधी क े अनुसार, यह न्यायाल क� प्र�क का सरासर दुरपयोग होगा। इसक े प�रणाम- स्वर, �दनांक 15 नवंबर, 2016 और 24 अप्र, 2017 को चुनौती देने वाल� सभी आपरा�धक कायर्वा�हय और आदेश� को रद् कर �दया और यह भी �टप्पण क� �क 15 माचर, 2019 क े आ�े�पत �नणर्य द्वारा मध्यस्थता क� कायर् म� क� गई �टप्प�णय� को गुणागुण क े आधार क� अ�भव्यिक्त नह�ं माना जाएग

10. हम अपीलाथ�गण क े �वद्वा व�रष् अ�धवक्त श् मुक ु ल रोहतगी, द्�वती प्रत् क े �वद्वा व�रष् अ�धवक्त श् पी. �चदम्बर और राज् क� अ�त�रक् सॉ�ल�सटर जनरल सुश् ऐश्वया भाट� को सुन चुक े ह�।

11. अपीलाथ�गण क े �वद्वा व�रष् अ�धवक्त श् मुक ु ल रोहतगी ने कहा �क 5 अक्टूब, 2018 को जांच अ�धकार� द्वार दायर आरोप-पत से पता चलता है �क द्�वतीय प्रत् द्वार भारतीय दंड सं�हता क� धारा 406, 420 और 34 क े तहत अपराध �कया गया है तथा उच् न्यायाल क े माननीय न्यायाधी क े �दनांक 9 अक्टूब, 2018 क े आदेश क े अनुसार आरोप पत क� प्र अ�भलेख पर प्रस्तुत गई, �फर भी आपरा�धक कायर्वाह को रद्द करते हुए माननी न्यायाधी द्वार आ�े�पत �नणर् म� आरोप-पत को संद�भर्त नह�ं �कया गया।

12. �वद्वा अ�धवक्त ने यह भी कहा �क दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 482 क े तहत उच् न्यायाल क� अंत�नर्�ह शिक् का प्रय एक अपवाद है। �शकायत/ प्राथ�म/आरोप-पत क� जांच शुर करने से पहले उच् न्यायाल द्वार बहुत सावधानी बरती जानी चा�हए ता�क यह तय �कया जा सक े �क क्य अ�भयोजन को शुरुआ म� ह� �वफल करने क े �लए �वरल� म� �वरलतम मामला बनता है| उच् न्यायाल से यह अपे�ा क� गई थी �क प्र दृष्ट �शकायत, आरोप-पत और उसक े समथर् म� जाँच अ�धकार� द्वारा दजर गवाह क े बयान पर इस �नष्कष पर पहुंचने क े �लए �वचार करे �क क्य न्यायलय उस सबूत पर अपराध का सं�ान ले सकता है और मुक़द्मे को आगे बढ़ा सकता है। य�द यह इस �नष्कष पर पहुंचता है �क कोई सं�ेय अपराध नह�ं बनता है, तो प्राथ�म/आरोप-पत् को रद् करने क े अलावा और कोई कारर्वा नह�ं क� जा सकती है। ले�कन क े वल अपवादात्म मामल� म�, जैसे �क दुभार्वन क े �वरल� म� �वरलतम मामल� म�, �नजी प्र�तश प्र�क को समाप् करने क े �लए कायर्वाह शुर करने का लाभ �शकायत करने म� �लया जाता है या प्राथ�म से स्वय �कसी सं�ेय अपराध का पता नह�ं चलता है।

13. �वद्वा अ�धवक्त का �नवेदन है �क उच् न्यायाल ने अ�भलेख पर मौजूद महत्वपूण तथ्य क� अनदेखी कर स्पष गलती क� है जो आदेश को संवेदनात्म रू से संवेदनशील बनाते ह� और आगे यह �नवेदन �कया �क माननीय अ�त�रक् सत न्यायाधी ने तथ्य क े सभी पहलुओं पर �वचार �कया था और उ�चत राय द� �क सं�ान लेने वाला आदेश त्रु�टपू नह�ं हो सकता ले�कन उच् न्यायाल ने अपने �नष्कष म� पूर� तरह से गलती क� है और अ�भलेख पर उपलब् स्पष तथ्य पर भी ध्या नह�ं �दया और इस आधार पर आगे बढ़ा �क ऐसे मामले म� जहां �बक्र� अनुब है और इसक े क�थत उल्लंघ क े कारण यह बाद म� समाप् हो गया है, तो ऐसे �ववाद द�वानी �ववाद ह� और �वशेष रूप स जहां मध्यसता क� कायर्वाह लं�बत हो, उनम� आपरा�धक कायर्वाह, न्यायाल क� प्र�क का दुरुपयो होगी, इन �वशेष प�रिस्थ�तय म�, माननीय न्यायाधी द्वार जो आधार बनाया गया है, वह कानून म� िस्थ नह�ं है और इस�लए आदेश को रद् �कया जाना चा�हए।

14. अपनी दल�ल� क े समथर् म�, �वद्वा अ�धवक्त ने इस न्यायालय द्वारा आर.पी. कपूर बनाम पंजाब राज्; ह�रयाणा राज् एवं अन् बनाम भजन लाल एवं अन्; �ट्र क े �मकल इंडस्ट बनाम राजेश अग्रव और अन्; एम कृ ष्ण बनाम �वजय �संह और अन्; जोसेफ़ साल्वरा ए बनाम गुजरात राज् और अन्; अरु भंडार� बनाम उ�र प्रद राज् और अन्; आनंद क ु मार मोहट्ट और अन् बनाम राज् (रा.रा.�े. �दल्ल), गृह �वभाग और अन् म� �दए गए �नणर्य पर भरोसा जताया है।

15. वह�ँ दूसर� ओर द्�वती प्रत्यथ� के �वद् वान व� अ�धवक्ताश् पी. �चदंबरम ने �नवेदन �कया �क �दनांक 24 �दसंबर, 2011 का �बक्र� अनुबंसंप�� क े स्वा�मत, स्टे ब�क ऑफ प�टयाला क े पास संप�� क े �गरवी होने और भुगतान क े बाद, ब�क से मूल कागजात और अनाप�� प्रम पत प्रा करने क े बाद संप�� को छ ु ड़ाने, उसक े बाद 24 �दसंबर, 2011 �बक्र� अनुबंध के �नयम� और शत� क अनुसार प�कार� द्वारा आगे क� प्र�क्रया को अंजाम जाने क े बारे म� सभी तथ्य� का खुलासा करता ह| जब अपीलकतार् �बक्र� अनुबंध के �नयम� और शत� के अनुपा म� अपने दा�यत्व को पूरा करने म� �वफल रह, तो �बक्र अनुबंध को 30 जनवर�, 2013 क े पत द्वारा समाप्त क �दया गया और इसने द्�वती प्रत्यथ� अनुबंध क� शत� क े तहत जमा क� गई बयाना रा�श को जब्त करने का अ�धकार �दया और यह पूर� तरह से एक द�वानी �ववाद था और मध्यस्थ क� शतर होने क े कारण, प्र अपीलकतार क े कहने पर मध्यस्थ क� कायर्वाह शुर क� गई और न्यायाल म� कायर्वाह क े लं�बत रहने क े दौरान भी, �वद्वा मध्यस ने 8 मई, 2020 को एक �नणर् पा�रत �कया है िजसे द्�वतीयप्रत्यद्वार मध्यस्थ और सुलह अ�ध�नयम, 1996 क� धारा 34 क े तहत चुनौती द� गई है, जो �दल्ल उच् न्यायाल म� लं�बत है।

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16. �वद्वा अ�धवक्त आगे �नवेदन करते ह� �क प�कार� ने �बक्रअनुबंध �कया है जो भारतीय दंड सं�हता क� धारा 420 क े तहत अपराध नह�ं है। न तो �शकायत जो शुर म� अपीलाथ�गण क े कहने पर दजर क� गई थी और न ह� �दनांक 5 अक्टूब, 2018 का आरोप पत, जो बाद म� दायर �कया गया था, हालां�क िजस पर उच् न्यायाल द्वार आ�े�पत फ ै सले म� �कसी तरह से ध्या नह�ं गया, म� भी कह�ं पर भी द्�वतीय प्रत्यथ� द्वारा प्रथम द.दं.सं. क� धारा 420, 406 व 34 क े तहत फौजदार� अपराध का मामला नह�ं बनता है और य�द प�कार� ने �बक् अनुबंध �कया है जो पूर� तरह से एक वा�णिज्य लेनदेन है, और अगर �बक् अनुबंध क� शत� का उल्लंघ हुआ है, तो प�रणामस्वरूप समझौता करने वा प� का बयाना रा�श जब् करना न्यायो�चत थ | यह क े वल एक द�वानी �ववाद है। चूं�क जब् क� गई रा�श को वापस करने क� मांग क� गई थी, िजसक े न करने पर आपरा�धक कायर्वाह का रंग देते हुए �हसाब चुकता करने क े �लए आपरा�धक �व�ध लगाने हेतु प्राथ�म दजर क� गई जो अस्वीकाय है और िजसे अ�भलेख पर पेश तथ्यात् क् द्वार सम�थर् आ�े�पत �नणर् म� उच् न्यायाल द्वार माना गया है।

17. �वद्वा अ�धवक्त ने आगे �नवेदन �कया �क वतर्मा मामला द�वानी �ववाद का है क्य�� द्�वती प्रत् द्वार बयाना रा�श जब् कर ल� गई थी जब प्र अपीलाथ� �दनांक 24 �दसंबर, 2011 क े �बक् अनुबंध क े �नयम� और शत� को पूरा करने और �नभाने क े �लए तैयार नह�ं था। और मध्यस्थ क� कायर्वाह शुर होने क े बाद, भारतीय दंड सं�हता क� धारा 420, 406 और 34 क े तहत आपरा�धक आरोप क े साथ प्रत् को परेशान करने क े �लए आपरा�धक कायर्वाह शुर क� गई थी और आगे �नवेदन �कया �क धारा 406 क े तहत कोई अपराध नह�ं बनता क्य�� बयाना रा�श का भुगतान अनुबंध क े अनुसार �कया गया था और अनुबंध म� कोई प्र�तब नह�ं था �क इस धन का उपयोग क ै से �कया जाना है, इस�लए कोई गबन नह�ं हुआ है।

18. �वद्वा अ�धवक्त ने आगे �नवेदन �कया �क अपीलाथ� �नद�ष नह�ं है और उसने इस तथ् को दबा �दया है �क उसे द्�वती प्रत् द्वार भेजा गया �दनांक 28 फरवर�, 2012 का पत प्रा नह�ं हुआ। इसक े �वपर�त, पयार्प दस्तावेज सा�य ह�, साथ ह� प्र अपीलकतार द्वार इस बात पर उसक� स्वीक ृ� भी है, जो यह दशारती है �क उसे उक् पत प्रा हुआ था। चूं�क उसने 28 �दसंबर, 2012 क े पत का जवाब नह�ं �दया, इस�लए यह समझा गया �क वह अनुबंध क े संदभर म� अपने दा�यत्व को �नभाने क े �लए तैयार नह�ं थी और प�रणामस्वर, द्�वती प्रत् 30 जनवर�, 2013 क े पत द्वार अनुबंध को समाप् करने क े अपने अ�धकार� क े दायरे म� थी |

19. �वद्वा अ�धवक् त ने आगे यह �सद् करने का प्रय �कया है �क अपीलाथ� द्वार अं�कत करार क े खण् 3 क� सभी तीन शत� को पूरा �कया गया था और जवाबी हलफनामे म� इसक े समथर् म� दस्तावेज सा�य अ�भलेख पर रखे गए ह�।

20. द्�वती प्रत् क े �वद्वा अ�धवक्ता ने इस न्यायाल क े �व�भन् �नणर्य पर भी भरोसा जताया है जो बु�नयाद� �सद्धांत को �नधार्�र करते ह�, िजसक े तहत दं.प.सं. क� धारा 482 क े तहत �न�हत शिक्तय का उच् न्यायाल द्वार प्रय �कया जाना है और िजनम� आपरा�धक कायर्वाह को यह �टप्पण करते हुए रद् कर �दया है �क जब द�वानी �ववाद हो, तो आपरा�धक कायर्वाह शुर करना न्यायाल क� प्र�क का दुरुपयो होगा और राजाभाई अब्दु रहमान मुंशी बनाम वासुदेव धनजीभाई मोद�; एलआर द्वार जी नारायणस्वाम रेड्ड (मृत) और एक अन्य बना कनार्ट सरकार और एक अन्; जी सागर सूर� और एक अन् बनाम उ.प. राज् और अन्; मुरार� लाल गुप्त बनाम गोपी �संह; इं�डयन ऑयल कॉप�रेशन बनाम एनईपीसी इं�डया �ल�मटेड और अन्; हरमनप्र �संह अहलुवा�लया और अन् बनाम पंजाब राज् और अन्; जोसेफ साल्वरा ए बनाम गुजरात राज् और अन्; चंद् रत्नास्वा बनाम क े.सी. पलानीसामी और अन्; वीईएसए होिल्डंग प्राइव �ल�मटेड और एक अन् बनाम क े रल राज् और अन्; क े सुब्ब राव और अन् बनाम तेलंगाना राज् द्वार स�चव, गृह �वभाग और अन् क े फ ै सल� पर भरोसा �कया।

21. �वद्वा अ�धवक्त ने अपने �ल�खत �नवेदन म� आगे कहा है �क उच् न्यायाल ने वास्त म� उस आरोप-पत का उल्ले नह�ं �कया है िजसका संदभर �दया गया है, यह न्यायाल य�द उ�चत समझे तो इन तथ्य और प�रिस्थ�तय म� मामले को नए �सरे से �वचार क े �लए उच् न्यायाल को वापस भेज सकता है| यह अन्यायपूण होगा य�द द्�वतीय प्रत् को इस आधार पर आपरा�धक अ�भयोजन का सामना करने क े �लए मजबूर �कया जाए �क उच् न्यायाल ने अ�भलेख पर उपलब् तथ्य पर ध्या नह�ं �दया ।

22. प्रस्तु�त समाप् होने क े बाद, दंड प्र�क सं�हता क� धारा 340 सहप�ठत धारा 195 क े तहत कायर्वाह शुर करने क े �लए द्�वती प्रत् क े कहने पर एक अंतरवत� आवेदन दायर �कया गया है। िजसम� यह आरोप लगाया गया है �क अपीलाथ�गण ने न क े वल दस्तावेज को छ ु पाया है बिल् गलत बयान �दया है और यह प्राथर क� गई है �क अपीलाथ�गण क े �खलाफ दं.प.सं. क� धारा 340 क े तहत कायर्वाह क� जाए।

23. यह �व�ध का सुस्था�प �सद्धां है �क दं.प.सं. क� धारा 482 क े तहत शिक्तय का प्रय करने क े �लए, �शकायत क� संपूणर्त म� �शकायत/प्राथ�म/आरोप-पत म� लगाए गए आरोप क े आधार पर जांच क� जानी चा�हए और उस स्त पर उच् न्यायाल मामले म� जाने या इसक� सत्यत क� जांच करने क े �लए बाध् नह�ं था। �शकायत/प्राथ�म/आरोप-पत म� जो क ु छ भी सामने आता है, उस पर �बना �कसी गंभीर जांच क े �वचार �कया जाएगा। �शकायत/प्राथ�म/आरोप-पत् और अ�भलेख पर अन् दस्तावेज सा�य, य�द कोई हो, पर पूवर दृष्टय अपराध प्र होना चा�हए।

24. जो प्र �वचार क े �लए उठाया जाता है, वह यह है �क �कन प�रिस्थ�तय और मामल� क� श्रे�ण म�, आपरा�धक कायर्वाह को सं�वधान क े अनुच्छे 226 क े तहत उच् न्यायाल क� असाधारण शिक्तय का प्रय करक े या अंत�नर्�ह शिक्तय क े प्रय करक े रद् �कया जा सकता है| इस न्यायाल और �व�भन् उच् न्यायालय क े सम� अक्स इस पर गंभीर रूप स बहस होती रह� है। हालां�क कई फ ै सल� म�, इस प्र का उ�र इस न्यायाल द्वार कई मौक� पर �दया जा चुका है, �फर भी यह अब भी �वचार क े �लए आता है और इस पर गंभीरता से बहस होती है।

25. इस पृष्ठभू� म�, दंड प्र�क सं�हता क� धारा 482 क े तहत उच् न्यायाल क े �न�हत अ�धकार �ेत क े दायरे क� जांच ह�रयाणा राज् और अन् बनाम भजन लाल और अन् (उपरोक्) म� इस न्यायाल क े फ ै सले म� क� गई है। प्रासं� पैराग्र का उल्ले यहां �कया गया है: - “102. अध्यायXIV क े तहत सं�हता क े �व�भन्न प्रासं�ग प्रावधा और अनुच्छेद 226 क े तहत असाधारण शिक्त के प्रयोग से संबं�धत बहुत सा �नणर्य� म� इस न्यायालय द्वारा प्र�तपा�दत क क े �सद्धांत या हमारे द्वार ा ऊपर सार म� प: प्रस्तुत क� गई सं�हता क� धा 482 क े तहत �न�हत शिक्तय� क� व्याख्या क� पृष्ठभू�, उदाहरण क े तौर पर हम मामल� क� �नम्न�ल�खत श्रे�णयां देते ह� िजनम� ऐसी शिक्त का प्रयो तो �कसी न्यायालय क� प्र�क्रया के दुरुपय रोकने अथवा अन्यथा न्याय का ल�य प्राप्त �लए �कया जा सकता है, हालां�क कोई सट�क, सुप�रभा�षत, पयार्प रूप से चैनलाइज्ड औगैर- लचीले �दशा-�नद�श या ठोस फामूर्ला �नधार्�र करना और असंख्य प्रकार के मामल� क� �वस् सूची देना सं भ व नह�ं हो सकता है, िजसम� ऐसी शिक्त का प्रयोग �कया जाना चा� (1) जहां प्रथम सूचना �रपोटर् या �शकायत लगाए गए आरोप, भले ह� उन्ह सह� मानकर संपूणर् रूप से स्वीकार �कया गया, से प्रथ दृष्टया कोई अपराध नह�ं बनता, आरोपी क े �खलाफ मामला नह�ं बनता है। (2) जहां प्राथ�मक� म� आरोप और प्राथ�मक� साथ संलग्न अन्य त, य�द हो, से सं�ेय अपराध का इन्केशाफ नह�ं होता ह, जो पु�लस अ�धका�रय� द्वारा सं�हता क� धारा 155(2) क े दायरे म� दंडा�धकार� क े आदेश क े अलावा सं�हता क� धारा 156(1) क े तहत जांच को न्यायो�चत ठहराए। (3) जहां प्राथ�मक� य ा �शकायत म� �कए ग अ�ववा�दत आरोप और उसक े समथर्न म� एकत �कए गए सबूत �कसी भी अपराध क े घ�टत होने का इन्केशाफ नह�ं करते ह� और आरोपी के �खलाफ मामला नह�ं बनता। (4) जहां, प्राथ�मक� म� आरोप सं�ेय अपराध ह�, बिल्क केवल असं�ेय अपराध ह, तो पु�लस अ�धकार� द्वारा मिजस्ट्र े ट के आ क े �बना �कसी भी जांच क� अनुम�त नह�ं है जैसा �क सं�हता क� धारा 155(2) क े तहत �वचार �कया गया है। (5) जहां प्राथ�मक� य ा �शकायत म� लगाए ग आरोप इतने बेतुक े और स्वाभा�वक रूप से असंभ ह� �क िजसक े आधार पर कोई भी बुद्�धमान व्यिक्त कभी भी इन्यायसंगत�नष्कषर्र नह�ं पहुंच सकता �क आरोपी क े �खलाफ कारर्वाई के �लए पयार्प्त आधार है। (6) जहां कारर्वाई प्रारंभ करने और जार� रखन े �लए सं�हता या संबं�धत अ�ध�नयम (िजसक े तहत आपरा�धक कायर्वाह� क� जाती ह) क े �कसी भी प्रावधान म� स्पष्ट कानूनी प्र�तबंध लगाया ग और/या जहां सं�हता या संबं�धत अ�ध�नयम म� कोई �व�शष्ट प्रावधान, जो पी�ड़त प� क� �शकायत का प्रभावी समाधान प्रदान करता (7) जहां आपरा�धक कायर्वाह� म� स्पष्ट रूप दुभार्वना हो औ/या जहां कायर्वाह� दुभार्वनापूणर् से आरोपी से प्र�तशोध लेने के �लए और जी और व्यिक्तगत रंिजश के कारण उसे प्रता करने क े उद्देश्य से शुरू क� गई "

26. इस न्यायाल ने दं.प.सं. क� धारा 482 क े तहत �न�हत शिक्तय का प्रय करते हुए उच् न्यायालय द्वार ध्या म� रखे जाने वाले �दशा�नद�श� को �नधार्�र करने म� व्याप रूपरेख और मापदंड� को स्पष �कया है। इस न्यायाल द्वार �नधार्�र पूव�क् �सद्धां उदाहरण ह� और संपूणर नह�ं ह�।` �फर भी, यह उन प�रिस्थ�तय और िस्थ� पर प्रक डालते ह� िजन्ह ध्या म� रखा जाना चा�हए जब उच् न्यायाल दं.प.सं. क� धारा 482 क े तहत अपनी अंत�नर्�ह शिक्तय का प्रय करता है।

27. इस न्यायाल द्वार हाल ह� म� अनर् मनोरंजन गोस्वाम बनाम महाराष् राज् और अन् म� इसे और स्पष �कया गया है, जहां भारतीय सं�वधान क े अनुच्छे 226 और दं.प.सं. क� धारा 482 क े तहत उच् न्यायाल क े अ�धकार �ेत का काफ� �वस्ता से �वश्लेष �कया गया है।

28. इस प्रक यह सुस्था�प है �क उच् न्यायाल क� अंत�नर्�ह शिक् का प्रय एक असाधारण शिक् है िजसे �शकायत/प्राथ�म/आरोप-पत क� जांच शुर करने से पहले यह तय करने क े �लए �क क्य मामला �वरल� म� से �वरलतम मामला है, अ�भयोजन को इसक� शुरुआ म� �वफल करने क े �लए बहुत सावधानी क े साथ प्रय �कया जाना चा�हए।

29. �वचाराधीन मामले म�, य�द हम उन �दशा-�नद�श� का �वश्लेष करने का प्रय करते ह� िजनका संदभर �दया गया है, तो क्य यह कहा जा सकता है �क �शकायत/ प्राथ�म/ आरोप पत म� आरोप द्�वतीय प्रत क े �खलाफ मामला नह�ं बनाते ह� या वे खुलासा करते ह� �क द्�वतीय प्रत क े �खलाफ आरो�पत अपराध क� सामग् या आरोप स्पष रू से बे त ुक े और स्वाभा�व रू से असंभव ह� ता�क कोई भी �ववेकपूणर व्यिक कभी भी इस �नष्कष पर न पहुंच सक े �क द्�वतीय प्रत क े �खलाफ कायर्वाह करने क े �लए पयार्प आधार है।

30. वतर्मा मामले म�, �शकायत/प्राथ�म/आरोप-पत, जैसा �क ऊपर देखा गया है, पूछे गए प्रश को �वश्वसनीयत प्रद करता है। यह तय है �क �कसी को इस कारण को महत् नह�ं देना चा�हए, या यह प्रस् करने का इरादा नह�ं करना चा�हए �क �शकायत म� आरोप� को पहल� नज़र म� स्वीका करना होगा और िजसक� सच्चा या झूठ क� जाँच इस स्त पर न्यायाल द्वार नह�ं क� जाएगी, जैसा �क ऊपर देखा गया है| �शकायत म� आरोप सह� थे या नह�ं, यह पर��ण क े चरण म� �दए गए सबूत� क े आधार पर तय �कया जाना है और नागपुर स्ट� एंड अलॉयज प्राइव �ल�मटेड बनाम पी राधाकृ ष् और अन् क े मामले म� इस कारण से संबं�धत �टप्प�णय पर ध्या �दया जाना चा�हए। पैरा 3 म�, इस न्यायाल ने �टप्पण क�:- “हमने �शकायत का ध्यानपूवर अध्यय �कया है। हमार� राय म� यह नह�ं कहा जा सकता है �क �शकायत म� �कसी अपराध क े का�रत होने का खुलासा नह�ं �कया गया है। क े वल इस�लए �क अपराध एक वा�णिज्य लेन-देन क े दौरान �कया गया था, यह मानने क े �लए पयार्प नह�ं होगा �क �शकायत पर मुकद्मा चलाए जाने क� आवश्यकत नह�ं है। �शकायत म� आरोप सह� थे या नह�ं, इसका फ ै सला �शकायत मामले म� सुनवाई क े दौरान पेश �कए जाने वाले सबूत� क े आधार पर �कया जाना था। यह �निश्च रू से ऐसा मामला नह�ं था िजसम� आपरा�धक मुकद्मे को सं��प्त �कया जाना चा�हए था। �शकायत को रद् करने क े प�रणामस्वर घोर अन्या हुआ है। इस�लए, हम मामले क े गुणागुण पर कोई राय व्यक �कए �बना, इस अपील क� अनुम�त देते ह� और उच् न्यायाल क े आ�े�पत आदेश को अपास्त करते हुए �शकायत को बहाल करते ह�। माननीय �वचारण दंडा�धकार� �शकायत पर कायर्वाह आगे बढ़ाएंगे और �व�ध अनुसार उसका शीघ्र से �नपटान कर�गे।"

31. यह ध्या �दया जाना चा�हए �क उच् न्यायाल द्वार �न�हत शिक् क े प्रय क े मामले म�, क े वल यह देखने क� आवश्यकत है �क क्य कायर्वाह जार� रखना न्यायाल क� प्र�क का सम्पूण दुरुपयो होगा। दंड प्र�क सं�हता म� जांच, आरोप तय करने और �वचारण क� �वस्तृ प्र�क शा�मल है और उस िस्थ� म� जब उच् न्यायाल कानून क� �ात प्र�क को रोकना चाहता है, तो उसे अपने �न�हत अ�धकार �ेत का प्रय करते हुए �शकायत/प्राथ�म/आरोप पत म� हस्त�े करने क े �लए बहुत सावधानी क े साथ उ�चत समझदार� का उपयोग करना चा�हए।

32. वतर्मा मामले म�, �शकायत/प्राथ�म/आरोप-पत को ध्या से पढ़ने पर, हमारे �वचार से, यह नह�ं कहा जा सकता है �क �शकायत �कसी अपराध क े होने का खुलासा नह�ं करती है। �शकायत/प्राथ�म/आरोप-पत म� आरोप� क े आधार पर भा.दं.सं. क� धारा 406 और 420 क े तहत अपराध� क े अवयव� को अनुपिस्थ नह�ं कहा जा सकता है। हम यह जोड़ना चाह�गे �क क्य �शकायत म� लगाए गए आरोप अन्यथ सह� ह� या नह�ं, इसका �नणर् �वचारण क े दौरान पेश �कए जाने वाले सा�य� क े आधार पर होना था | क े वल इस�लए �क अनुबंध क े उल्लंघ क े �लए एक उपाय उपलब् है या अपीलकतार्ओ क े कहने पर मध्यस्थ क� कायर्वाह शुर क� गई थी, यह न्यायाल को इस �नष्कष पर आने क े �लए प्रे� नह�ं करता है �क द�वानी उपचार ह� एकमात उपाय था और �कसी भी तरह से आपरा�धक कायर्वाह शुर करना, ऐसी कायर्वाह को रद् करने क े �लए अंत�नर्�ह शिक्तय का प्रय करने क े �लए न्यायाल क� प्र�क का दुरुपयो होगा।

33. हमने प�कार� क� दल�ल�, �शकायत/प्राथ�म/आरोप- पत और �नचले न्यायालय क े आदेश� का अध्यय �कया है और अ�भलेख पर मौजूद तथ्य को ध्या म� रखा है। प�कार� क े �वद्वा अ�धवक्त को सुनने क े बाद, हम संतुष् ह� �क �वचाराधीन मामले म� शा�मल मामला ऐसा मामला नह�ं है िजसम� आपरा�धक मुकद्दमे को टाला जाना चा�हए था। अपने अंत�नर्�ह अ�धकार �ेत का प्रय करते हुए आपरा�धक कायर्वाह को रद् करने म� उच् न्यायाल न्यायो�च नह�ं था। उच् न्यायाल ने मुख् रू से दो प�रिस्थ�तय पर ध्यान �दया है (i) �क यह अनुबंध क े क�थत उल्लंघ क े कारण �बक्र� अनुब को समाप् करने का मामला था और (ii) यह तथ् �क अपीलकतार्ओ क े कहने पर मध्यस्थ क� कायर्वाह शुर क� गई है। हमारे �वचार से, उच् न्यायाल द्वार देखी गई दोन� क�थत प�रिस्थ�तया कानून क� दृिष से िस्थ नह�ं ह�। वतर्मा �शकायत/प्राथ�म/आरोप-पत म� व�णर् तथ् वास्त म� वा�णिज्य लेनदेन को दशार्त ह�, ले�कन शायद ह� यह मानने का एक कारण है �क इस तरह क े लेनदेन से धोखाधड़ी का अपराध नह�ं होगा। वास्त म�, कई बार, वा�णिज्य लेनदेन क े दौरान धोखाधड़ी का अपराध �कया जाता है और भा.दं.सं. क� धारा 415, 418 और 420 क े तहत दृष्टा �नधार्�र �कए गए ह�। इस न्यायाल द्वार �ट्रस क े �मकल इंडस्ट बनाम राजेश अग्रव और अन् (सुप्) म� भी इसी तरह क� �टप्प�णया क� गई ह�: - “9. हम इस तक र क� सराहना करने म� असमथर ह� �क �ववाद� क े मध्यस्थ को संद�भर् करने क े �लए अनुबंध म� शा�मल प्रावध आपरा�धक अ�भयोजन क े �लए एक प्रभा �वकल् है जब �ववा�दत कायर एक अपराध हो| मध्यस्थ अनुबंध क े उल्लंघ से प्रभा� प� को राहत प्रद करने का एक उपाय है, ले�कन मध्यस �कसी भी कायर का पर��ण नह�ं कर सकता है, जो एक अपराध क े बराबर है, हालां�क वह� कायर् अनुबंध क े तहत �कसी भी कायर क े �नवर्ह से जुड़ा हो सकता है। इस�लए, उच् न्यायाल द्वार �शकायत को दहल�ज पर ह� खा�रज करने क े �लए वे अच्छ कारण नह�ं ह�। जांच एज�सी को आरोप� क े पूरे दायरे म� जाने और अपने �नष्कष पर पहुंचने क� स्वतंत् होनी चा�हए थी। ह�रयाणा राज् बनाम भजन लाल [1992 Supp (1) SCC 335] म� दशार् गए गम्भी मामल� म� ह� इस तरह क� जांच रोकना उ�चत होगा।”

34. जहां तक मध्यस्थता क� कायर्वाह� शुरू करने संबंध है, आपरा�धक कायर्वाह� के साथ कोई संबंध नह�ं है इसक े अलावा, उच्च न्यायालय न द्�वतीय प्रत क े �खलाफ दायर आरोप-पत्र पर भी ध्यान नह�ं �, जो इस �नष्कषर् पर पहुंचने के �लअ�भलेख पर था �क जैसा �क कहा गया है �क कोई भी फौजदार� अपराध प्रथम दृष् बन रहा है और वास्तव म� फौजदार� �वचारण क े दौरान इसक� सत्यता क� जांच क�जाए।

35. द्�वतीय प्रत्यथ� के �वद्वान व�रष्ठ अ�धवक् श्री. �चदंबरम द्वारासद्भा �दखाते और हम� अ�भलेख पर मौजूद प्रत्यु�र हलफनाम े के साथ संलग्न दस्ता सा�य �दखाते �नवेदन, �क यह मूल रूप से एक द�वानी �ववाद अथवा मध्यस्थता क� कारर्वाई उत्पन्न करने एक साधारण मामला था जो अनुबंध क� शत� का पालन न करने क े कारण हुए समािप् का प�रणाम था, भा.दं.सं. क� धारा 406, 420, 34 क े प्रावधान� को आक�षर्त नह करेगा | इसे इस कारण से इस समय सह� नह�ं ठहराया जा सकता है क्य��क द्�वतीय प्रत्यथ� क� ओर �वद्वान अ�धवक्ता द्वारा जसुझाव �दया गया है, वह �वचारण क े दौरान बचाव हो सकता है ले�कन उच्च न्यायालय के �ल �वचारण हेतु यह उपलब्ध नह�ं था�क वह इस पर न्या�यक सं�ान ले व दं.प.सं. क� धारा 482 क े अं त गर्त अपनी अंत�नर्�हत शिक्तय� के प्रयोग म� आपराकायर्वा�हय�को रद्द करे|

36. जहाँ तक द्�वतीय प्रत क े �वद्वान अ�धवक्त द्वारा आगे�नवेदन �कया गया है �क य�द उच्च न्यायाल आरोप-पत्र और अ�भलेख पर उपलब्ध अ तथ्य पर �वचार करने म� �वफल रहा है, तो मामले को पुन: �वचार क े �लए उच्च न्यायालय क �व�ध अनुसार वापस भेज �दया जाए। द्�वतीय प्रत क े �वद्वान अ�धवक्ता द्वा िजस बात पर ज़ोर �दया जा रहा है, उसम� क ु छ सार हो सकता है ले�कन इस कारण से �क हमारे सामने इस मामले पर सं��प्त रूप सबहस क� गई है, और प�कार� क े �वद्वान अ�धवक्ताओं ने हम� आपरा�धक कायर्वाह� क अ�भलेख से अवगत कराया है| अ�भलेख का अध्ययन करने के बा, हम संतुष्ट ह� � अपराध म� द्�वतीय प्रत्को जोड़ने क े �लए आपरा�धक कायर्वाह� केअ�भलेख से स्पष्रू से पयार्प् सामग्री उपलब्ध नतीजतन, हम इस समय मामले को वापस भेजना उ�चत नह�ं समझते ह�, क्य�क यह व्यथरहोगा; इसक े �वपर�त, इससे क े वल कायर्वाह� म� देर� होगी, और आपरा�धक मुकद्दम रुक जएगा, िजसे तेज़ी से आगे बढ़ाने क� आवश्यकता ह|

37. कायर्वाह� के समापन के सम, दं.प.सं. क� धारा 340 सहप�ठत धारा 195 क े तहत प्रथम अपीलकतार् के �खल आपरा�धक कायर्वाह� शुरू करने वाल द्�वतीय प्रत क े कहने पर अंतवर्त आवेदन दायर �कया गया है। हम पाते ह� �क ऐसे आवेदन परो� कारण� से दायर �कए जा रहे ह� िजनक� हम गंभीरता से �नंदा करते ह�। तद्नुसार उक् अंतवर्त आवेदन को खा�रज �कया जाता है।

38. नतीजतन, अपील �सद् होती है और तदनुसार अनुम�त प्रदान क जाती है। उच्च न्यायालय के �दनां 15 माचर, 2019 क े आ�े�पत �नणर्य कोअपास् �कया जाता है। हम �फर भी यह स्पष्ट करते ह� �क हमारे द्वारा �टप्पण क� गई है वह क े वल वतर्मान अपील के �नपटान के उद्देश्य से ह �वचारण न्यायल इस फ ै सले म� क� गई �टप्प�णय� से प्रभा�वत हुए �बना या हमा र� र को अ�भव्यिक्त के रूप �लए �बना शीघ्रत से �वचारण को आगे बढ़ा सकता है।

39. सभी लं�बत अंतरवत� आवेदन� का �नपटान �कया जाता है।.................न्य. (इंदु मल्होत)................न्य. (अजय रस्तोग) नई �दल्ल, 10 माचर, 2021 अस्वीकर: देशी भाषा म� �नणर्य का अनुवाद मुकद्द्मेबाज़ के सी�मत प्रयोग हेतु �कया है ता�क वो अपनी भाषा म� इसे समझ सक � एवं यह �कसी अन्य प्रयोजन हेतु प्रयोग �कया जाएगा| समस्त कायार्लयी एवं व्यावहा�रक प्रयोजन� हेतु �नणर्य कज़ी स्वरूप ह अ�भप्रमा�णत ना जाएगा और कायार्न्वयन तथा लागू �कए जाने हेतु उसे ह� वर�यता द जाएगी|