Rajasthan State v. Ashok Kumar Kashyap

Supreme Court of India · 13 Apr 2021 · 2021 INSC 252
D. Y. Chandrachud; M. R. Shah
Criminal Appeal No 407 of 2021 @ SLP (Crl) No 3194 of 2021
2021 INSC 252
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that at the stage of framing charges under the Prevention of Corruption Act, the court must only determine if a prima facie case exists and set aside the High Court's discharge order for impermissible reappraisal of evidence.

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Translation output
भारत क
े सर्वो च्च न्यायालय में
आपराधि क अपील अधि कार क्षेत्र
दाण्डि क अपीलीय सं संख्या 407/2021
(एस. एल. पी. (आपराधि क) संख्या 3194/2021) से उत्पन्न
ायरी सं 8524/2020
राजस्थान राज्य ….अपीलाथ6
बनाम
अशोक क
ु मार कश्यप ....प्रधितर्वोादी
निनर्ण?य
एम. आर. शाह, जे.
JUDGMENT

1. मामले क े तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों में और संबंधि त पक्षों क े निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता को सुनने क े बाद, निर्वोशेष अनुमधित याधिIका दाखिKल करने में हुई देरी को माफ निकया जाता है. 1 ए. अनुमधित अनुदत्त की जाती है ।

2. राजस्थान उच्च न्यायालय पीठ, जयपुर द्वारा एस. बी. आपराधि क संशो न संख्या 1270/2018 में निदनांक 12.09.2018 को पारिरत आक्षेनिपत निनर्ण?य और आदेश जिजसक े द्वारा उच्च न्यायालय ने अपने पुनरीक्षर्ण क्षेत्राधि कार का उपयोग करते हुए, निर्वोशेष न्यायालय, भ्रष्टाIार निनर्वोारर्ण अधि निनयम, भरतपुर क े द्वारा पारिरत आदेश निदनांक 22.06.2018 को रद्द कर निदया जिजसमें भ्रष्टाIार निनर्वोारर्ण अधि निनयम (संक्षेप में, 'पीसी अधि निनयम') की ारा 7 क े तहत अपरा क े खिलए प्रत्यथ6-आरोपी क े खिKलाफ आरोप तय निकए थे और इसक े परिरर्णामस्र्वोरूप, पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े तहत कथिथत अपरा क े आरोपी को बरी कर निदया । उक्त आदेश या निनर्ण?य से आहत र्वो असंतुष्ट होकर राज्य ने र्वोत?मान अपील को प्राथनिमकता दी है। 2021 INSC 252

3. मूल प्रधितर्वोादी एक पटर्वोारी क े रूप में सेर्वोारत था। मूल थिशकायतकता? जय निकशोर और अन्य ने निदनांक 31.08.2010 को भ्रष्टाIार निनरो क ब्यूरो, भरतपुर क े अधितरिरक्त पुखिलस अ ीक्षक क े समक्ष एक खिलखिKत रिरपोट? प्रस्तुत की जिजसमें कहा गया है निक अपने बेटे का अधि र्वोास प्रमार्ण पत्र और अन्य निपछड़ा र्वोग? प्रमार्ण पत्र जारी करने क े उद्देश्य से अथिभयुक्त-पटर्वोारी अशोक क ु मार कश्यप क े समक्ष पूर्ण? प्रमार्ण पत्रों क े साथ एक आर्वोेदन प्रस्तुत निकया था। उक्त आर्वोेदन पर अपनी रिरपोट? का समथ?न करने क े बदले में पटर्वोारी ने 2800/- रुपए की रिरश्वत की मांग की। जांI करने क े बाद जांI एजेंसी ने पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े खिलए आरोपी क े खिKलाफ आरोप पत्र दायर निकया। आरोप की निर्वोरIना क े समय निर्वोद्वान निर्वोशेष न्याया ीश ने अथिभयोजन पक्ष क े साथ-साथ बIार्वो पक्ष क े र्वोकील को सुनने क े बाद और रिरकॉ ? पर मौजूद सामग्री पर निर्वोIार करने क े बाद, जिजसमें थिशकायतकता? और अथिभयुक्त क े बीI रिरकॉ ? की गई बातIीत की प्रधितखिलनिप और रिरकॉ ? पर मौजूद अन्य सामग्री पर निर्वोIार करने और यह पता लगाने क े बाद निक प्रथमदृष्टया मामला बनता है और अथिभयुक्त क े बIार्वो पर इस Iरर्ण में निर्वोIार नहीं निकया जा सकता है, निदनांक 22.06.2018 क े आदेश द्वारा पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े खिलए आरोपी क े खिKलाफ आरोप तय निकए।

4. पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े तहत आरोपी क े खिKलाफ आरोप तय करने र्वोाले निर्वोद्वत निर्वोशेष न्याया ीश द्वारा पारिरत आदेश से व्यथिथत और असंतुष्ट महसूस करते हुए, आरोपी ने 2018 की आपराधि क संशो न संख्या 1270 दाखिKल करक े उच्च न्यायालय क े समक्ष संशो न आर्वोेदन को प्रस्तुत निकया। 4.[1] उच्च न्यायालय क े समक्ष, अथिभयुक्त की ओर से यह प्रधितर्वोाद निकया गया निक परिरर्वोादी और अथिभयुक्त क े बीI बातIीत को अथिभखिलखिKत करने र्वोाले प्रधितखिलनिप क े आ ार पर भी, पी. सी. अधि निनयम की ारा 7 क े अ ीन कोई मामला नहीं बनता है। यह कथन निकया गया निक प्रधितखिलनिप से यह पता Iलता है निक अथिभयुक्त ने र्वोास्तर्वो में र्वोास्तनिर्वोक निनर्वोास प्रमार्ण पत्र देने से इनकार कर निदया और निदनांक 29.08.2010 को फॉम? र्वोापस कर निदया जिजससे उसक े समक्ष कोई काम लंनिबत नहीं था। यह भी तक ? निदया गया निक पूरी प्रधितखिलनिप पढ़ने पर 2800/- रुपये की मांग का तथ्य सामने नहीं आता है। 4.[2] पुनरीक्षर्ण आर्वोेदन का निर्वोद्वान लोक अथिभयोजक द्वारा निर्वोरो निकया गया था। धिIत्रेश क ु मार Iोपड़ा बनाम राज्य (राष्ट्रीय राज ानी क्षेत्र निदल्ली सरकार), ए आई आर 2010 एस सी 1446 क े मामले में इस न्यायालय क े निनर्ण?य पर बहुत अधि क भरोसा निकया गया और यह प्रस्तुत निकया गया निक जैसा निक इस न्यायालय द्वारा अथिभनिन ा?रिरत निकया गया है निक आरोप की निर्वोरIना क े Iरर्ण में, न्यायालय से यह पता लगाने की दृनिष्ट से अथिभलेK पर सामग्री और दस्तार्वोेजों का मूल्यांकन करने की अपेक्षा की जाती है निक क्या उससे उभरने र्वोाले तथ्य, उनक े फ े स र्वोैल्यू पर खिलए गए हैं, कथिथत अपरा को गनिठत करने र्वोाले सभी अर्वोयर्वोों क े अण्डिस्तत्र्वो का Kुलासा करते हैं। यह प्रस्तुत निकया गया निक प्रधितखिलनिप से यह स्पष्ट है निक थिशकायतकता? से रिरश्वत की मांग की गई थी। 4.[3] आक्षेनिपत निनर्ण?य और आदेश द्वारा उच्च न्यायालय ने उक्त पुनरीक्षर्ण आर्वोेदन को अनुज्ञात निकया है और पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े अ ीन अपरा क े खिलए े निर्वोरुद्ध आरोप निर्वोरधिIत करते हुए निर्वोद्वत निर्वोशेष न्याया ीश द्वारा पारिरत आदेश को अथिभKंधि त और अपास्त कर निदया है और परिरर्णामतः पैराग्राफ 10 और 11 में निनम्नखिलखिKत रूप में निटप्पर्णी करक े अथिभयुक्त को अथिभकथिथत अपरा से उन्मोधिIत कर निदया हैः "10. र्वोत?मान मामले में, थिशकायतकता?, जब भ्रष्टाIार निर्वोरो ी निर्वोभाग गया था, ने स्र्वोयं उल्लेK निकया निक याधिIकाकता? ने रिरपोट? निकए निबना फॉम? लौटा निदया था। अथिभलेK पर उपलब् प्रधितखिलनिप से, यह स्पष्ट है निक बैंक फाइल से संबंधि त क ु छ पूर्वो? लेनदेन पक्षकारों क े बीI लंनिबत थे और मामला रु. 4850/- से संबंधि त था, जिजसमें से याIी क े अनुसार, रु.4000 /- बैंक को भुगतान निकया जाना था और उसने प्रधितखिलनिप में याधिIकाकता? द्वारा देय क ु ल राथिश क े बारे में बताया है। र्वोास्तनिर्वोक निनर्वोास प्रमार्ण पत्र बनाने की कोई निर्वोथिशष्ट मांग नहीं है, बण्डिल्क याधिIकाकता? ने प्रधितखिलनिप में उल्लेK निकया था निक Iूंनिक थिशकायतकता? और उसका बेटा आगरा (यूपी) में रह रहे हैं, इसखिलए र्वोास्तनिर्वोक निनर्वोास प्रमार्ण पत्र जारी नहीं निकया जा सकता है। इस मामले में कोई कार?र्वोाई नहीं की गई और यह मामला पांI साल से अधि क समय से भ्रष्टाIार निनरो क निर्वोभाग क े पास लंनिबत है। याधिIकाकता? द्वारा न की कोई निर्वोथिशष्ट मांग नहीं की गई है और प्रधितखिलनिप की तारीK पर उसक े समक्ष कोई मामला लंनिबत नहीं था।

11. इसे ध्यान में रKते हुए, यह प्रधितखिलनिप क े क े र्वोल पठन से स्पष्ट है निक भ्रष्टाIार निनर्वोारर्ण अधि निनयम की ारा 7 क े तहत याधिIकाकता? क े खिKलाफ अपरा नहीं बन सक े गा।

5. उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेनिपत निनर्ण?य और आदेश से व्यथिथत और असंतुष्ट महसूस करते हुए, अथिभयुक्तों को आरोपमुक्त करने और निर्वोद्वान निर्वोशेष न्याया ीश द्वारा आरोप तय करने क े आदेश को रद्द करने और अपास्त करने क े खिलए, अपने पुनरीक्षर्ण अधि कार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, राज्य ने र्वोत?मान अपील को प्राथनिमकता दी है।

6. राज्य की ओर से उपण्डिस्थत निर्वोद्वत अधि र्वोक्ता श्री निर्वोशाल मेघर्वोाल ने जोरदार रूप से प्रस्तुत निकया है निक मामले क े तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों में, उच्च न्यायालय ने आरोनिपत अपरा क े अथिभयुक्त को दोषमुक्त करने में गलती की है जब अथिभयुक्त क े निर्वोरुद्ध अथिभलेK पर पया?प्त सामग्री और साक्ष्य है और अथिभयुक्त क े निर्वोरुद्ध काय?र्वोाही करने क े खिलए पया?प्त आ ार उपलब् हैं। 6.[1] यह प्रस्तुत निकया जाता है निक उच्च न्यायालय इस बात को समझने में निर्वोफल रहा है निक आरोप की निर्वोरIना और/या उन्मोIन क े खिलए निकसी आर्वोेदन पर निर्वोIार करने क े स्तर पर, न्यायालय को यह निर्वोIार करना है निक क्या अथिभयुक्त क े निर्वोरुद्ध कोई प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं और उस स्तर पर न्यायालय से यह अपेक्षा की जाती है निक र्वोह क े र्वोल यह पता लगाने क े खिलए निक क्या उससे उद्भूत होने र्वोाले तथ्य, यनिद उनक े अंनिकत मूल्य पर खिलए जाएं, कथिथत अपरा गनिठत करने र्वोाले सभी घटकों क े अण्डिस्तत्र्वो का मूल्यांकन करे या नहीं। 6.[2] यह प्रस्तुत निकया जाता है निक र्वोत?मान मामले में उच्च न्यायालय ने गुर्णों क े आ ार पर प्रधितखिलनिप/साक्ष्य क े मूल्यांकन में गंभीर त्रुनिट की है जो उन्मोIन क े खिलए आर्वोेदन पर निर्वोIार करने क े Iरर्ण में अनुज्ञेय नहीं है। 6.[3] राज्य की ओर से उपण्डिस्थत निर्वोद्वत अधि र्वोक्ता द्वारा आगे यह प्रस्तुत निकया जाता है निक र्वोत?मान मामले में भी थिशकायतकता? और अथिभयुक्त क े बीI बातIीत को अथिभखिलखिKत करने र्वोाली प्रधितखिलनिप से अर्वोै परिरतोषर्ण की मांग का मामला बनाया गया है। यह प्रस्तुत निकया जाता है निक अथिभयुक्त को पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े तहत अपरा क े खिलए आरोनिपत निकया गया है और इसखिलए पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े तहत अपरा को आकर्षिषत करने क े खिलए एक प्रयास भी पया?प्त है। यह प्रस्तुत निकया जाता है निक इसखिलए उच्च न्यायालय ने उन्मोIन आर्वोेदन पर निर्वोIार करने क े Iरर्ण में गुर्ण-दोष क े आ ार पर साक्ष्य का मूल्यांकन करने में गलती की है, जो, इस प्रकार, अननुज्ञेय है और पुनरीक्षर्ण अधि कार क्षेत्र क े उपयोग क े दायरे से परे है। 6.[4] राज्य की ओर से पेश होने र्वोाले निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने पी. निर्वोजयन बनाम क े रल राज्य, (2010) 2 एससीसी 398, श्रीलेKा सेंधितल क ु मार बनाम उप पुखिलस, अ ीक्षक, सीबीआई, एसीबी Iेन्नई(2019) 7 एससीसी 82, असीम शरीफ बनाम राष्ट्रीय जांI एजेंसी (2019) 7 एससीसी 148 और कना?टक लोकायुक्त पुखिलस थाना बेंगलुरु बनाम एम.आर हीरेमठ, (2019) 7 एससीसी 515 क े मामलों में इस न्यायालय क े निनर्ण?यों पर काफी भरोसा निकया है।

7. प्रधितर्वोादी-अथिभयुक्त की ओर से पेश हुए निर्वोद्वत अधि र्वोक्ता ने पुरजोर रूप से तक ? निदये है निक मामले क े तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों में और जैसा निक थिशकायतकता? और अथिभयुक्त क े बीI बातIीत को रिरकॉ ? करने र्वोाली प्रधितखिलनिप से पता Iला है निक पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े खिलए अथिभयुक्त क े खिKलाफ कोई मामला नहीं बनता है । उच्च न्यायालय ने अथिभयुक्त क े खिKलाफ आरोप तय करने र्वोाले निर्वोद्वत निर्वोशेष न्याया ीश द्वारा पारिरत आदेश को रद्द करक े अथिभयुक्त को उधिIत रूप से बरी कर निदया है। निर्वोद्वत अधि र्वोक्ता द्वारा प्रत्यथ6-अथिभयुक्त क े खिलए यह तक ? निदया गया है निक, इस प्रकार, अथिभयुक्त ने थिशकायतकता? क े आगरा क े स्थायी निनर्वोासी होने क े बारे में जानने क े बाद निनर्वोास प्रमार्ण पत्र और जाधित प्रमार्ण पत्र जारी करने से इनकार कर निदया । यह तक ? निदया गया है निक र्वोास्तर्वो में थिशकायतकता? Iाहता था निक राजस्थान राज्य में अर्वोै रूप से एक फज[6] निनर्वोास प्रमार्ण पत्र और जाधित प्रमार्ण पत्र बनाया जाए, जबनिक र्वोह आगरा का स्थायी निनर्वोासी था । यह प्रस्तुत निकया गया निक र्वोास्तर्वो में प्रत्यथ6-अथिभयुक्त ने निदनांक 29.08.2010 को थिशकायतकता? क े अनुरो को अस्र्वोीकार करते हुए एक रिरपोट? दी और इसखिलए, अथिभयुक्त क े समक्ष क ु छ भी काय? लंनिबत नहीं था और थिशकायतकता? क े आर्वोेदन क े संबं में निनर्ण?य पहले ही खिलया जा Iुका था । 7.[1] यह कथन निकया गया है निक र्वोास्तर्वो में अथिभयोजन और यहां तक निक थिशकायतकता? क े मामले क े अनुसार भी ट्रेप निर्वोफल हो गया और अथिभयुक्त ने ट्रेप काय?र्वोानिहयों में रिरश्वत प्रधितग्रहर्ण करने से इनकार कर निदया। 7.[2] यह कथन निकया गया है निक बातIीत क े समय दो व्यनिक्त उपण्डिस्थत थे, (1) थिशकायतकता? जय निकशोर और (2) देर्वोी सिंसह। थिशकायतकता? क े साथ-साथ देर्वोी सिंसह क े साथ बातIीत का निमश्रर्ण था। यह प्रस्तुत निकया जाता है निक जहां तक थिशकायतकता? का संबं है, अथिभयुक्त ने स्पष्ट रूप से कोई भी रिरश्वत प्रधितग्रहर्ण करने से इनकार कर निदया। तथानिप, यह प्रस्तुत निकया जाता है निक अपीलकता? ने अपने बकाये क े संबं में देर्वोी सिंसह की बातIीत को निमलाने क े द्वारा न्यायालय को भ्रनिमत और गुमराह करने की कोथिशश की है जिजसमें बैंक को, 4850/- रुपये निदये जाने बकाया थे जिजसक े निर्वोरुद्ध उसने रु. 2000/- का भुगतान निकया है और रु. 2850 /- की शेष राथिश बैंक को देय थी. यह प्रस्तुत निकया जाता है निक जहां तक थिशकायतकता? का संबं है, न तो कोई स्र्वोीक ृ धित थी और न ही रिरश्वत की कोई मांग थी और इसखिलए अथिभलेK पर सामग्री/साक्ष्य क े आ ार पर पाया गया निक पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े तहत अपरा क े खिलए आरोपी क े खिKलाफ कोई मामला नहीं बनाया गया है, उच्च न्यायालय ने अथिभयुक्त को उधिIत रूप से बरी कर निदया है। 7.[3] अथिभयुक्त की ओर से उपण्डिस्थत निर्वोद्वत र्वोकील ने निदलार्वोर बालू क ु रर्णे बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2002) 2 एस. सी. सी. 135 क े निनर्ण?य पर बहुत अधि क भरोसा निकया है और प्रस्तुत निकया है निक इस न्यायालय द्वारा दं प्रनि‚या संनिहता की ारा 227 क े तहत शनिक्तयों का प्रयोग करते हुए और आरोप की निर्वोरIना क े प्रश्न पर निर्वोIार करते समय न्यायालय को यह पता लगाने क े सीनिमत प्रयोजन क े खिलए निक अथिभयुक्त क े निर्वोरुद्ध प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं और जहां न्यायालय क े समक्ष रKी गई सामग्री अथिभयुक्त क े निर्वोरुद्ध गंभीर संदेह प्रकट करती है, आरोप की निर्वोरIना और निर्वोIारर्ण की काय?र्वोाही में न्यायालय को पूरी तरह से न्यायोधिIत ठहराया जाएगा। तथानिप, क ु ल निमलाकर, यनिद दो मत समान रूप से संभर्वो हैं और न्याया ीश का यह समा ान हो जाता है निक उसक े समक्ष पेश निकए गए साक्ष्य से अथिभयुक्त क े निर्वोरुद्ध क ु छ संदेह तो पैदा होगा किंकतु गंभीर संदेह नहीं होगा तो र्वोह अथिभयुक्त को आरोप मुक्त करने क े खिलए पूरी तरह से न्यायोधिIत होगा। यह प्रस्तुत निकया जाता है निक र्वोत?मान मामले में इस निनष्कष? पर पहुंIने क े खिलए निक क्या पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े खिलए मामला बनाने क े खिलए कोई पया?प्त सामग्री/साक्ष्य है या नहीं, उच्च न्यायालय द्वारा रिरकॉ ? पर साक्ष्य का मूल्यांकन करना उधिIत था। 7.[4] थिशकायतकता? और अथिभयुक्त क े बीI बातIीत को अथिभखिलखिKत करने र्वोाली प्रधितखिलनिप पर निर्वोस्तार से ले जाने क े बाद संबंधि त पक्षों क े निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता द्वारा गुर्ण-दोष क े आ ार पर अन्य कई प्रस्तुधितयां की गई है। तथानिप, आरोप की निर्वोरIना क े स्तर पर और/या उन्मोIन आर्वोेदन पर निर्वोIार करते समय, हम आरोपों क े गुर्णागुर्ण और अथिभलेK पर साक्ष्य क े आ ार पर निर्वोस्तार से जाने का प्रस्तार्वो नहीं करते हैं क्योंनिक इसमें इसक े नीIे निदए गए कारर्ण इस स्तर पर अनुज्ञेय नहीं हैं.

8. हमने संबंधि त पक्षों क े निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता को सुना है। आक्षेनिपत निनर्ण?य और आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने अपनी पुनरीक्षर्ण अधि कार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े तहत अथिभयुक्त क े खिKलाफ आरोप तय करने र्वोाले निर्वोद्वत निर्वोशेष न्याया ीश द्वारा पारिरत आदेश को रद्द कर निदया है और परिरर्णामस्र्वोरूप कथिथत अपरा क े खिलए अथिभयुक्त को दोषमुक्त कर निदया है. अथिभयुक्त को उन्मोIन करते समय उच्च न्यायालय क े साथ क्या तुलना की गयी है, इसका उल्लेK आक्षेनिपत निनर्ण?य और आदेश क े पैराग्राफ 10 और 11 में निकया गया है, जो इसमें ऊपर पुनः प्रस्तुत निकए गए हैं।

9. उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेनिपत निनर्ण?य और आदेश की र्वोै ता पर निर्वोIार करते समय, इस निर्वोषय पर कानून और इस न्यायालय क े क ु छ निनर्ण?यों का उल्लेK करना आर्वोश्यक है।

9. 1 पी. निर्वोजयन (पूर्वो क्त) क े मामले में, इस न्यायालय को दं प्रनि‚या संनिहता की ारा 227 पर निर्वोIार करने का अर्वोसर निमला निक आरोप की निर्वोरIना क े समय और/या उन्मोIन आर्वोेदन पर निर्वोIार करते समय निकस बात पर निर्वोIार करने की आर्वोश्यकता है, उक्त निनर्ण?य में निर्वोस्तार से निर्वोIार निकया गया है।यह मत व्यक्त निकया गया है और अथिभनिन ा?रिरत निकया गया है निक ारा 227 क े प्र‚म पर न्याया ीश को क े र्वोल यह पता लगाने क े खिलए साक्ष्य को छानना है निक अथिभयुक्त क े निर्वोरुद्ध काय?र्वोाही आदेश क े खिलए पया?प्त आ ार है या नहीं।यह मत व्यक्त निकया गया है निक दूसरे शब्दों में, आ ारों की पया?प्तता पुखिलस द्वारा अथिभखिलखिKत साक्ष्य या न्यायालय क े समक्ष पेश निकए गए दस्तार्वोेजों की प्रक ृ धित को अपने दायरे में लेगी जो प्रकट करती है निक े निर्वोरुद्ध संनिदग् परिरण्डिस्थधितयां हैं जिजससे निक उसक े निर्वोरुद्ध आरोप निर्वोरधिIत निकया जा सक े ।आगे यह मत व्यक्त निकया गया है निक यनिद न्याया ीश इस निनष्कष? पर पहुंIता है निक काय?र्वोाही करने क े खिलए पया?प्त आ ार है तो र्वोह दं प्रनि‚या संनिहता की ारा 228 क े अ ीन आरोप निर्वोरधिIत करेगा, यनिद नहीं तो र्वोह अथिभयुक्त को उन्मोधिIत करेगा।आगे यह मत व्यक्त निकया गया है निक यह अर्वो ारिरत आदेश क े खिलए निक क्या अथिभयोजन पक्ष द्वारा निर्वोIारर्ण क े खिलए कोई मामला बनाया गया है, मामले क े पक्ष और निर्वोपक्ष में या साक्ष्य और संभाव्यताओं क े तौल और संतुलन में प्रर्वोेश करना े खिलए आर्वोश्यक नहीं है जो र्वोास्तर्वो में निर्वोIारर्ण शुरू होने क े बाद न्यायालय का काय? है।

9. 2 एम. आर. निहरेमथ (पूर्वो क्त) क े हाल क े निर्वोनिनश्चय में, हममें से एक (न्यायमूर्तित ी. र्वोाई. Iन्द्रIूड़) ने पीठ क े खिलए बोलते हुए पैराग्राफ 25 में निनम्नखिलखिKत मत व्यक्त निकया है:

25. उच्च न्यायालय को इस तथ्य का संज्ञान लेना Iानिहए था निक निनIली अदालत सीआरपीसी की ारा 239 क े प्रार्वो ानों क े तहत आरोप मुक्त करने क े आर्वोेदन पर निर्वोIार कर रही थी।इस अधि कार क्षेत्र क े प्रयोग को निनयंनित्रत करने र्वोाले मापदं ों की अथिभव्यनिक्त इस न्यायालय क े कई निनर्ण?यों में हुई है। यह निर्वोधि का एक निन ा?रिरत जिसद्धांत है निक उन्मोIन क े खिलए आर्वोेदन पर निर्वोIार आदेश क े Iरर्ण में न्यायालय को इस ारर्णा पर आगे बढ़ना Iानिहए निक अथिभयोजन द्वारा अथिभलेK पर लाई गई सामग्री सत्य है और यह निन ा?रिरत आदेश क े खिलए सामग्री का मूल्यांकन करना Iानिहए निक क्या सामग्री से उत्पन्न तथ्य, उसक े र्वोास्तनिर्वोक मूल्य पर, अपरा क े गठन क े खिलए आर्वोश्यक सामनिग्रयों क े अण्डिस्तत्र्वो का Kुलासा करते हैं।टी. एन. बनाम एन. सुरेश राजन [राज्य टी. एन. बनाम एन. सुरेश राजन, (2014) 11 एस. सी. सी. 709] र्वोाले मामले में, इस निर्वोषय पर पहले क े निर्वोनिनश्चयों का निर्वोज्ञापन करते हुए, इस न्यायालय ने यह अथिभनिन ा?रिरत निकया (एससीसी पीपी.721-22, पैरा 29) “29….इस स्तर पर, सामग्री का संभानिर्वोत मूल्य जाना है और न्यायालय से मामले में गहराई से जाने की अपेक्षा नहीं की जाती है और यह अथिभनिन ा?रिरत निकया जाता है निक सामग्री दोषजिसधिद्ध की अपेक्षा नहीं करेगी।हमारी राय में, इस पर निर्वोIार करने की आर्वोश्यकता है निक क्या यह उप ारर्णा करने क े खिलए कोई आ ार है निक अपरा निकया गया है और यह नहीं निक क्या अथिभयुक्त को दोषी ठहराने क े खिलए कोई आ ार बनाया गया है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो, यनिद न्यायालय यह सोIता है निक अथिभयुक्त ने अपने सम्भानिर्वोत मूल्य पर अथिभलेK पर सामग्री क े आ ार पर अपरा निकया है, तो र्वोह आरोप तय कर सकता है, हालांनिक दोषजिसधिद्ध क े खिलए, न्यायालय को इस निनष्कष? पर पहुंIना होगा निक अथिभयुक्त ने अपरा निकया है। कानून इस Iरर्ण में एक निमनी ट्रायल की अनुमधित नहीं देता है।

10. अब हम उपरोक्त जिसद्धांतों को र्वोत?मान मामले में यह पता लगाने क े खिलए लागू करेंगे निक क्या मामले क े तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों में, उच्च न्यायालय पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े खिलए आरोपी को बरी आदेश में उधिIत था?

11. उच्च न्यायालय द्वारा निदए गए तक ? और अथिभयुक्त को उन्मोIन करते समय उच्च े साथ तौले गए आ ारों पर निर्वोIार करने क े बाद, हमारी राय है निक उच्च न्यायालय ने पुनरीक्षर्ण अधि कार क्षेत्र क े प्रयोग में अपनी अधि कार क्षेत्र का अधित‚मर्ण निकया है और दं प्रनि‚या संनिहता की ारा 227/239 क े दायरे से परे काय? निकया है। अथिभयुक्त को दोषमुक्त करते समय, उच्च न्यायालय ने मामले क े गुर्ण-दोषों पर निर्वोIार निकया है और यह निर्वोIार निकया है निक अथिभलेK पर उपलब् सामग्री क े आ ार पर अथिभयुक्त को दोषजिसद्ध निकए जाने की संभार्वोना है या नहीं।उपयु?क्त क े खिलए, उच्च न्यायालय ने थिशकायतकता? और अथिभयुक्त क े बीI बातIीत की प्रधितखिलनिप पर निर्वोस्तार से निर्वोIार निकया है जो उन्मोIन आर्वोेदन पर निर्वोIार करने और/या आरोप की निर्वोरIना निबल्क ु ल भी अनुज्ञेय नहीं है । जैसा निक आरोप की निर्वोरIना क े Iरर्ण में निर्वोद्वत निर्वोशेष न्याया ीश द्वारा उधिIत रूप से मत व्यक्त निकया गया और अथिभनिन ा?रिरत निकया गया है, यह देKा जाना है निक क्या प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं और े बIार्वो पर निर्वोIार नहीं निकया जाना है.थिशकायतकता? और अथिभयुक्त क े बीI बातIीत की प्रधितखिलनिप सनिहत अथिभलेK पर सामग्री पर निर्वोIार करने क े बाद, निर्वोद्वत निर्वोशेष न्याया ीश ने यह पाया निक पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े तहत कथिथत अपरा का प्रथमदृष्टया मामला है, कथिथत अपरा क े खिलए अथिभयुक्त क े खिKलाफ आरोप तय निकया । उच्च न्यायालय ने प्रधितखिलनिप पर निर्वोस्तार से निर्वोIार करने क े अभ्यास को नकारते हुए और यह निर्वोIार करते हुए निक क्या अथिभलेK पर सामग्री क े आ ार पर अथिभयुक्त को पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े खिलए दोषी ठहराए जाने की संभार्वोना है या नहीं, र्वोस्तुतः गलती की। जैसा निक ऊपर कहा गया है, उच्च न्यायालय से यह निर्वोIार करने की अपेक्षा की गई थी निक क्या प्रथमदृष्टया मामला बनाया गया है या नहीं और क्या अथिभयुक्त पर आगे और मुकदमा Iलाने की आर्वोश्यकता है या नहीं। आरोप तय करने और/या धि स्Iाज? आर्वोेदन पर निर्वोIार करने क े Iरर्ण में, निमनी ट्रायल की अनुमधित नहीं है।इस स्तर पर, यह ध्यान निदया जाना Iानिहए निक पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े अनुसार, यहां तक निक एक प्रयास भी एक अपरा है । इसखिलए, उच्च न्यायालय ने धि स्Iाज? आर्वोेदन क े Iरर्ण में एक निमनी ट्रायल करने में गलती की है और/या उससे अधि क कर निदया है।

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12. हम मामले क े गुर्ण-दोष और/या प्रधितखिलनिप क े गुर्ण-दोष पर आगे नहीं बढ़ रहे हैं क्योंनिक इस पर निर्वोIारर्ण क े समय निर्वोIार निकया जाना आर्वोश्यक है। आरोप की निर्वोरIना क े Iरर्ण में और/या उन्मोIन आर्वोेदन क े Iरर्ण में गुर्ण-दोष क े आ ार पर प्रधितरक्षा पर निर्वोIार नहीं निकया जाना Iानिहए।

13. उपरोक्त को ध्यान में रKते हुए और ऊपर बताए गए कारर्णों से, पीसी अधि निनयम की ारा 7 क े तहत आरोपी को बरी करने क े खिलए उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेनिपत निनर्ण?य और आदेश कानून में निटकाऊ नहीं है और इसे रद्द और अपास्त निकया जाना Iानिहए और तदनुसार रद्द और अपास्त निकया जाता है और े तहत आरोपी क े खिKलाफ आरोप तय करने क े खिलए निर्वोद्वत निर्वोशेष न्याया ीश द्वारा पारिरत आदेश को निफर से बहाल निकया जाता है। अब े खिलए सक्षम अदालत द्वारा आरोपी क े खिKलाफ कानून और उसकी अपनी मेरिरट क े अनुसार मुकदमा Iलाया जाना है। ………………………..जे॰ [ ॉ नंजय र्वोाई Iंद्रIूड़] ………………………..जे॰ [एम. आर. शाह] नई निदल्ली 13 अप्रैल, 2021 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language is made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purpose, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.