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भार ीय सव च्च न्यायालय क
े समक्ष
सिसविवल अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील संख्या 4840/2021
से उत्पन्न
विवशेष अनुमति याति+का (सी) सं. 18198/2018
नीलिलमा श्रीवास् व अपीलार्थी4 (गण)
बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य प्रति वादी (गण)
विन ण; य
माननीय न्यायमूर्ति क
ृ ष्ण मुरारी vLohdj.k
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
अनुमति प्रदान की गर्इ;।
JUDGMENT
2. यह अपील र्इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ (बाद में 'उच्च न्यायालय' क े रूप में संदर्भिभ ) द्वारा पारिर विनण;य और आदेश का अपवाद है, जो राज्य-प्रति वादी द्वारा दायर विवशेष अपील की अनुमति दे ा है और विदनांक 15.05.2014 क े विनण;य और आदेश को अपास् कर ा है।
3. अपीलक ा; कानपुर विवश्वविवद्यालय से स्ना कोत्तर है और प्रयाग संगी सविमति, र्इलाहाबाद से संगी प्रभाकर और सीविनयर तिडप्लोमा का प्रमाण पत्र भी रख ा है।
23. 07. 1984 को, उन्हें अवकाश रिरविY पर सरकारी र्इंटर कॉलेज, महमूदाबाद, सिजला सी ापुर में सहायक संगी शिशक्षक क े रूप में विनयुY विकया गया र्थीा क्योंविक विनयविम पदाति कारी अवै विनक अवकाश पर +ले गए र्थीे। विनयुविY आदेश की श ` ने विनर्दिदष्ट विकया विक विनयुविY अस्र्थीायी र्थीी और स्र्थीायी पदाति कारी से सेवा में शाविमल होने क यह वैद्य र्थीी। अपीलार्थी4 की शैतिक्षक योग्य ा ने संबंति सेवा विनयमों की विन ा;रिर आवश्यक ाओं को पूरा विकया। विदनांविक 16.05.1986 क े पत्र द्वारा, विदनांक 23.07.1984 को विनयुविY आदेश की श ` को संशोति करक े यह प्रकाशिश विकया गया र्थीा विक विनयुविY ब क क े लिलए र्थीी जब क विक विनयविम कम;+ारी वापस नहीं आ जा े या 20.05.1986 क, जो भी पहले हो।
4. विनयुविY क े संदभ; में उY संशो न से दुखी होकर, अपीलक ा; ने विनयुविY की संशोति श ` को +ुनौ ी दे े हुए उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट याति+का संख्या 3316/1986 (एसएस) दायर की। 19. 05. 1986 को, कॉलेज क े प्रबं न ने अपीलक ा; को 20.05.1986 क े प्रभाव से सेवाओं क े विवस् ार क े सार्थी एक और आदेश जारी विकया। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
5. विवद्व एकल न्याया ीश ने 20.05.1986 क े आदेश क े द्वारा प्रत्यर्भिर्थीयों को नोविटस जारी कर े हुए विनयुविY आदेश की श ` को संशोति कर े हुए 16.05.1986 क े आदेश क े सं+ालन पर रोक लगा दी। यह आगे प्रस् ु विकया गया र्थीा विक अं रिरम आदेश स्र्थीायी पदाति कारी श्रीम ी सविiया खा ून की वापसी पर स्व ः ही समाप्त हो जाएगा। ।
6. ऐसा हुआ विक श्रीम ी सविiया खा ून विiर से सेवा में शाविमल नहीं हुई ं, परिरणामस्वरूप उनकी सेवाओं को 16.01.1988 क े आदेश क े अनुसार समाप्त कर विदया गया। यह विनर्दिववाद थ्य है विक प्रत्यर्भिर्थीयों ने कभी भी पद भरने क े लिलए कोई कदम नहीं उठाया और अपीलक ा; को 2020 क विबना विकसी रुकावट क े उY पद पर जारी रखा गया।
7. 17. 08. 2001 को, उत्तर प्रदेश राज्य ने यूपी माध्यविमक शिशक्षा विवभाग को प्रशिशतिक्ष स्ना क शिशक्षक विनयम, 2001 (संक्षेप में 'विनयविम ीकरण विनयम, 2001' क े रूप में जाना जा ा है) क े पद पर दर्थी; विनयुविYयों क े विनयविम ीकरण की घोषणा की।
02. 11. 2001 को, अपीलक ा; ने उY विनयमों क े अनुसार विनयविम ीकरण का अभ्यावेदन उY अति कारिरयों क े समक्ष प्रस् ु विकया। जब पया;प्त समय बी जाने क े बाद उनक े अभ्यावेदन में कोर्इ; काय;वार्इ; नहीं की ो उनक े द्वारा उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट याति+का संख्या 7890/2003 को दालिखल विकया। अपीलार्थी4 की र्इस रिरट याति+का को उनकी पूव; रिरट याति+का संख्या 3316/1986 क े सार्थी जोड विदया गया आैर उच्च न्यायालय की विवद्व एकल न्याया ीश क े सार्थी विनम्नलिललिख अवलोकन क े सार्थी सुना आैर विनस् ारण विकया गया र्थीा। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk "पक्षकारों क े विवद्व अति वYा को सुनने और अशिभलेख का अवलोकन करने क े बाद, यह स्पष्ट रूप से स्पष्ट है विक याति+काक ा; क े पास सरकारी र्इंटर कॉलेज, महमूदाबाद, सी ापुर में सहायक शिशक्षक संगी, एलटी ग्रेड क े रूप में काम करने का 21 से अति क वष` का अनुभव है।अशिभलेख पर उपस्थिस्र्थी दस् ावेजों क े अनुसार, उसक े पास र्इंटरमीतिडएट शिशक्षा अति विनयम में आवश्यक सभी शैक्षशिणक योग्य ा है। उसे छ ु ट्टी की व्यवस्र्थीा में विनयुY विकया गया हो सक ा है, लेविकन उसकी विनरं र सं ोषजनक सेवाओं क े आ ार पर, उसने अब पद ारण करने और संस्र्थीा में जारी रखने का अति कार प्राप्त कर लिलया है, और र्इस स् र पर, उसे कम;+ारी क े अनुपस्थिस्र्थी ी क े दौरान उक व्यवस्र्थीा क े ह एक विनयुविY क े रूप में मानना उति+ नहीं होगा। '
8. पूव Y विनण;य का आवश्यक भाग विनम्नानुसार हैः उपरोY क े मद्देनजर, रिरट याति+काओं की अनुमति है।परिरणाम का पालन करना होगा।याति+काक ा; को उसक े द्वारा जारी रखे गए पद पर बने रहने की अनुमति दी जाएगी।उसक े मामले को प्रासंविगक विनयविम ीकरण विनयमों क े ह विनयविम ीकरण क े लिलए माना जाएगा और विनण;य और आदेश की प्रमाशिण प्रति प्रस् ु करने की ारीख से ीन महीने क े भी र उति+ आदेश पारिर विकए जाएं। '
9. र्इस स् र पर यह ब ाना उति+ है विक अपीलक ा; द्वारा दायर दो रिरट याति+काओं में विदए गए पूव Y सामान्य विनण;य को अंति म रूप विदया गया क्योंविक र्इसे विकसी भी उच्च मं+ क े समक्ष +ुनौ ी नहीं दी गई र्थीी।
10. 29. 01. 2007 क े आदेश क े अनुसार, संयुY शिशक्षा विनदेशक ने याति+काक ा; (यहां अपीलक ा;) क े मामले पर विव+ार विकया और विवद्व एकल न्याया ीश क े i ै सले में विनविह विटप्पशिणयों क े बावजूद विनयविम ीकरण क े लिलए उसक े दावे को खारिरज कर विदया। विनयविम ीकरण क े लिलए उनक े दावे को मुख्य रूप से र्इस आ ार पर खारिरज कर विदया गया र्थीा विक +ूंविक उनकी प्रारंशिभक विनयुविY अवकाश रिरविY पर र्थीी, सिजसक े vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk लिलए 2001 क े विनयमों क े ह कोई प्राव ान नहीं र्थीा, जैसे विक उन्हें विनयविम ीकरण विनयम, 2001 द्वारा प्रदत्त लाभ का हकदार नहीं ठहराया जा सक ा है।
11. र्इस आदेश को अपीलक ा; द्वारा एक और रिरट याति+का संख्या- 8597/2010 दायर करक े विiर से +ुनौ ी दी गई र्थीी। पक्षकारों क े विवद्व अति वYा को सुनने क े बाद, विवद्व एकल न्याया ीश ने 15.05.2014 क े विनण;य और आदेश को विनम्नलिललिख कारणों से अनुमति दीः i - याति+काक ा; 23.07.1984 से काम कर रहा है और मुकदमेबाजी क े पहले दौर में, उच्च न्यायालय ने उसे पद ारण करने का हकदार ठहराया र्थीा।विदनांक 23.01.2006 का विनण;य अंति म हो गया र्थीा और र्इसे +ुनौ ी नहीं दी गई र्थीी। ii. - विनयविम ीकरण विनयम, 2001 याति+काक ा; पर लागू र्थीे।पहले क े i ै सले में याति+काक ा; को पद ारण करने का हकदार पाया गया र्थीा।विनयविम ीकरण विनयम, 2001 को लागू करने से प्रत्यर्भिर्थीयों का र्इनकार दनुसार गैरकानूनी र्थीा। iii. लंबे समय से +ल रहे मुकदमेबाजी को समाप्त करने की आवश्यक ा है और याति+काक ा; विनयविम ीकरण का हकदार है।
12. विवद्व एकल न्याया ीश ने रुद्र क ु मार सेन और अन्य बनाम भार संघ और अन्य 1 क े मामले में र्इस न्यायालय की संविव ान पीठ क े i ै सले में अवलंब रखा और विवशेष रूप से उY संविव ान पीठ क े i ै सले क े पैरा 20 में विकए गए अवलोकन अव ारिर विकया जो विनम्नलिललिख है - सेवा न्यायशास्त्र में, एक व्यविY जो विकसी विवशेष पद पर विनयुY होने क े लिलए अपेतिक्ष योग्य ा रख ा है और विiर उसे उति+ प्राति कारी क े अनुमोदन और परामश; क े सार्थी विनयुY विकया जा ा है और काiी लंबी अवति क े लिलए पद पर 1 (2000) 8 एससीसी 25 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk जारी रह ा है, ो ऐसी विनयुविY को 'कम;+ारिरयों की अनुपस्र्थीति में या भाग्यशाली या विवशुद्ध रूप से दर्थी;' नहीं ठहराया जा सक ा है।
13. विवद्व एकल न्याया ीश ने पाया विक अपीलक ा; 23.07.1984 से पढ़ा ा आ रहा है और पूव; क े i ै सले में, उच्च न्यायालय ने पहले ही उसकी विनयुविY को कम;+ारिरयों की अनुपस्थिस्र्थी में विनयुYी की व्यवस्र्थीा नहीं माना है और आगे उसे उस पद का अति कार है सिजसे विनयविम ीकरण विनयम, 2001 क े ह +ुनौ ी नहीं दी गई है जो ऐसे मामलों पर लागू हो े हैं और उY विनयमों का लाभ देने से र्इनकार करना संयुY विनदेशक द्वारा शविY का वै प्रयोग नहीं है और +ूंविक कोई विनयविम विनयुविY नहीं की गई है, र्इसलिलए वह पूरी रह से योग्य है और र्इस रह विनयुY होने क े लिलए योग्य है।
14. 31. 10. 2015 क े आदेश क े अनुसार, 15.05.2014 को विवद्व एकल न्याया ीश क े विनण;य क े संदभ; में, प्रति वादी ने अपीलक ा; की सेवाओं को विनयविम विकया और सार्थी ही एक खण्ड पीठ क े समक्ष एक विवशेष अपील भी दायर की।
15. विदनांक 07.05.2018 क े आदेश क े अनुसार, र्इस अपील में आक्षेविप खण्ड पीठ ने उत्तरदा ाओं द्वारा प्रस् ु की गई विवशेष अपील की अनुमति दी और विवद्व एकल न्याया ीश क े विनण;य को अपास् कर विदया।तिडवीजन बें+ का विव+ार र्थीा विक +ूंविक अपीलक ा; को 23.07.1984 को अवकाश रिरविY में विनयुY विकया गया र्थीा और उसकी सेवाएं 20.05.1986 को समाप्त हो गई ं और वह 6 उच्च द्वारा पारिर अं रिरम आदेश क े आ ार पर पद पर बनी रही। मुकदमेबाजी क े पहले दौर में न्यायालय और उसकी विनयुविY मुकदमेबाजी की विनयुविY है और र्इस प्रकार उसे र्इस पद को कानूनी रूप से अपने पक्ष में रखने का कोई अति कार नहीं है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
16. अपीलार्थी4 क े लिलए विवद्व अति वYा श्री विनलिखल गोयल अौर राज्य-प्रत्यर्थी4 क े लिलए विवद्व अति वYा श्री हरीश पांडे को सुना। हमने पक्षकारों क े विवद्व अति वYाआें क े द्वारा अशिभलेख पर उपस्थिस्र्थी आक्षेविप विनण;य को अव ारिर विकया है।
17. राज्य द्वारा दायर विवशेष अपील को उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने मुख्य रूप से र्इस क; पर अनुमति दी र्थीी विक याति+काक ा; (यहां अपीलक ा;) को अवकाश रिरविY क े लिखलाi अस्र्थीायी आ ार पर विनयोसिज विकया गया र्थीा और +ूंविक सेवा विनयमावली, 1983 ने अवकाश रिरविY पर विकसी भी विनयुविY की अनुमति नहीं दे ा र्थीा, र्इसलिलए याति+काक ा; (यहां अपीलक ा;) की विनयुविY 'स्टॉप-गैप प्रक ृ ति ' की अवै विनयुविY र्थीी। विनयविम ीकरण विनयम, 2001 का विवश्लेषण कर े हुए खण्ड पीठ ने पाया विक अवकाश रिरविY क े ह की गई विनयुविY को विनयविम करने का कोई प्राव ान नहीं र्थीा।
18. सति+व, कना;टक राज्य और अन्य बनाम उमादेवी और अन्य[2] क े मामले में र्इस न्यायालय द्वारा की गई विटप्पशिणयों पर अवलंब ले े हुए, सिजसमें यह माना गया र्थीा विक +ूंविक याति+काक ा; (यहां अपीलक ा;) की प्रारंशिभक विनयुविY विनयमों की अवहेलना की गर्इ; र्थीी और र्इस प्रकार यह अवै र्थीी और उसकी विनयुविY मुकदमेबाजी क े ह की विनयुविY र्थीी और वह 20.05.1986 को उच्च न्यायालय द्वारा पारिर एक अं रिरम आदेश क े बल पर जारी रही, वह विनयविम ीकरण की हकदार नहीं र्थीी।
19. उमादेवी (3) क े मामले में र्इस न्यायालय की संविव ान पीठ ने माना है विक एक अस्र्थीायी, संविवदात्मक, आकस्थिस्मक या दैविनक वे न भोगी कम;+ारी को ब क स्र्थीायी करने का कानूनी अति कार नहीं है जब क विक विनयुविY उY विनयुविY को 2 (2006) 4 एससीसी 1 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk विनयंवित्र करने वाले प्रासंविगक सेवा विनयमों की श ` क े अनुसार और संविव ान क े अनुच्छेद 14 और 16 क े पालन में नहीं की गई हो। हालाँविक र्इस न्यायालय ने रिरपोट; क े पैरा 53 में विनम्नानुसार विनरीक्षण करक े उपरोY क े लिलए एक अपवाद बनाया र्थीाः
53. एक पहलू को स्पष्ट करने की आवश्यक ा है। ऐसे मामले हो सक े हैं जहां अविनयविम विनयुविY (अवै विनयुविY नही) का उल्लेख विकया गया हो जैसे एसवी नारायणप्पा [(1967) 1 एससीआर 128: एआईआर 1967 एससी 1071], आरएन नानजुंदप्पा [(1972) 1 एससीसी 409: (1972) 2 एससीआर 799] और बीएन नागराजन [(1979) 4 एससीसी 507:1980 एससीसी (एल एंड एस) 4: (1979) 3 एससीआर 937] और उपरोY क े पैरा 15 में संदर्भिभ, विवति व स्वीक ृ रिरY पदों में विवति व योग्य व्यविYयों को बनाया जा सक ा है और लेविकन अदाल ों या न्यायाति करणों क े आदेशों क े हस् क्षेप क े विबना कम;+ारिरयों ने दस साल या उससे अति क समय क काम करना जारी रखा है र्इस रह क े कम;+ारिरयों की सेवाओं क े विनयविम ीकरण क े सवाल पर र्इस न्यायालय द्वारा उसिल्ललिख मामलों में और र्इस विनण;य क े आलोक में य विकए गए सिसद्धां ों क े आलोक में योग्य ा पर विव+ार विकया जा सक ा है। उस संदभ; में, भार संघ, राज्य सरकारों और उनक े कम;+ारिरयों को एक बार क े मानक क े रूप में विनयविम करने क े लिलए कदम उठाने +ाविहए, ऐसी अविनयविम रूप से विनयुY की गई सेवाएं, सिजन्होंने विवति व स्वीक ृ पदों पर दस साल या उससे अति क समय क काम विकया है, लेविकन अदाल ों या न्यायाति करणों क े आदेश क े कवर क े ह नहीं है और आगे यह सुविनतिˆ करना +ाविहए विक उन रिरY स्वीक ृ पदों को भरने क े लिलए विनयविम भर्ति यां की जायें, सिजन्हें भरने की आवश्यक ा है, ऐसे मामलों में जहां अस्र्थीायी कम;+ारी या दैविनक कम;+ारी अब काय;र हैं। र्इस ति शिर्थी से छह महीने क े भी र प्रवि‰या क े काया;न्वयन में ेजी आ जाना +ाविहए। हम यह भी स्पष्ट कर े हैं विक विनयविम ीकरण, यविद कोई पहले ही विकया जा +ुका है, लेविकन व;मान में विव+ारा ीन नहीं है, ो र्इस विनण;य क े आ ार को पुनः से खोलने की आवश्यक ा नहीं है, लेविकन आगे संवै ाविनक आवश्यक ा को दरविकनार नहीं विकया जाना +ाविहए और सिजन्हें संवै ाविनक योजना क े अनुसार विवति व विनयुY नहीं विकया गया है, उन्हें विनयविम या स्र्थीायी नहीं विकया जाना +ाविहए। ” vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
20. उमादेवी (3) क े वाद से सन्दर्भिभ उद्धृ पैराग्राi 53 में मामले में 'विनयविम ीकरण' क े लिलए सामान्य सिसद्धां ों क े अपवाद को उल्ललिख विकया गया है, सिजसे विनम्नलिललिख श ‹ पूरी करनी हो ी हैंः i. अवलंबी को विकसी न्यायाति करण या अति करण क े अं रिरम आदेश क े लाभ या संरक्षण क े विबना विवति व स्वीक ृ पद पर 10 वष; या उससे अति क समय क काम करना +ाविहए र्थीा। ii. ऐसे कम;+ारी की विनयुविY अवै नहीं होनी +ाविहए, भले ही अविनयविम हो।
21. उमादेवी (3) क े i ै सले में विन ा;रिर उपरोY परीक्षणों को लागू कर े हुए, 'विनयविम ीकरण' क े लिखलाi सामान्य सिसद्धां ों क े अपवाद को उल्लेलिख कर े हुए, उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने माना है विक +ूंविक अपीलक ा; की विनयुविY विनयमों की अवहेलना र्थीी और साव;जविनक प्रति स्प ा;त्मक +यन की प्रवि‰या से गुजरने क े विबना, क्योंविक यह अवै है और +ूंविक वह उच्च न्यायालय क े विवद्व एकल न्याया ीश द्वारा पारिर आदेश क े ह सेवा में बनी रही, र्इसलिलए उसकी विनयुविY मुकदमेबाजी क े ह है और र्इस प्रकार अपवाद उमादेवी (3) क े मामले द्वारा कवर नहीं विकया जा ा है।
22. उमादेवी (3) पैराग्राi 53 क े मामले में की गई विटप्पशिणयों का उल्लेख कर े हुए, ऊपर उद्धृ विकया गया है, र्इस न्यायालय ने कना;टक राज्य और अन्य बनाम एमएल क े सरी और अन्य 3 क े मामले में परीक्षण करने क े लिलए यह श ‹ रखी हैं विक विनयुविY को कब अवै माना जाएगा और जब र्इसे अविनयविम माना जाएगा। उY रिरपोट; से पैरा 7 विनकालना प्रासंविगक हो सक ा है, जो विनम्नानुसार हैः 3 (2010) 9 एससीसी 247 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk "उपरोY से यह स्पष्ट है विक उमादेवी में वर्भिण 'विनयविम ीकरण' क े लिखलाi सामान्य सिसद्धां ों का अपवाद है, यविद विनम्नलिललिख श ‹ पूरी हो ी हैंः (i) संबंति कम;+ारी को विकसी भी न्यायालय या विट•ब्यूनल क े अं रिरम लाभ या संरक्षण क े विबना विवति व स्वीक ृ पद पर 10 साल या उससे अति क समय क काम करना +ाविहए। दूसरे शब्दों में, राज्य सरकार या र्इसक े काय;कारी ंत्र क े द्वारा कम;+ारी को विनयोसिज करना +ाविहए और उसे स्वेच्छा से और लगा ार दस वष` से अति क समय क सेवा को जारी रखना +ाविहए। (ii) ऐसे कम;+ारी की विनयुविY अवै नहीं होनी +ाविहए, भले ही अविनयविम हो। जहां विनयुविYयां स्वीक ृ पदों क े विवरुद्ध नहीं की जा ी हैं या जारी नहीं रखी जा ी हैं या जहां विनयुY विकए गए व्यविYयों क े पास विन ा;रिर न्यून म योग्य ा नहीं है, विनयुविYयों को अवै माना जाएगा। लेविकन जहां विनयोसिज व्यविY क े पास विन ा;रिर योग्य ाएं र्थीीं और स्वीक ृ पदों क े ह काम कर रहे र्थीे, लेविकन साव;जविनक प्रति स्प 4 +यन की प्रवि‰या से गुजरने क े विबना उनका +यन विकया गया र्थीा, ऐसी विनयुविYयों को अविनयविम माना जा ा है। "
23. अपीलक ा; क े मामले में, यह विनर्दिववाद है विक उसे गर्ल्सस; स्क ू लों क े क्षेत्रीय विनरीक्षक द्वारा विनयुY विकया गया र्थीा, जो उत्तर प्रदेश अ ीनस्र्थी शैतिक्षक (प्रशिशतिक्ष स्ना क ग्रेड) सेवा विनयमावली, 1983 क े ह विन ा;रिर विनयुविY प्राति कारी है। समान रूप से विनर्दिववाद थ्य यह है विक उसे एक स्वीक ृ पद पर विनयुY विकया गया र्थीा और उसक े पास 1983, विनयमों क े ह सभी आवश्यक विन ा;रिर योग्य ाएं र्थीीं।
24. कना;टक और अन्य राज्य बनाम एमएल क े सरी और अन्य में विन ा;रिर परीक्षणों को लागू करने पर उपरोY अपीलक ा; की विनयुविY को क े वल अविनयविम और अवै नहीं माना जा सक ा है। अपीलार्थी4 की विनयुविY अवै होने की प्रक ृ ति क े संबं में उच्च न्यायालय की तिडवीजन बें+ द्वारा दज; विकये गये विनष्कष; पर र्इस प्रकार कायम रहने क े लिलए उत्तरदायी नहीं है।उसकी विनयुविY क े आ ार पर विनयविम ीकरण क े दावे vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk को अस्वीकार कर विदया गया है, जो विक आक्षेविप आदेश से अवै है।10 साल या उससे अति क समय क काम करने की अन्य श; भी पूरी रह से सं ुष्ट है क्योंविक उसक े विनयविम ीकरण क े विव+ार क े समय अपीलक ा; ने लगभग 23 साल की सेवा पूरी कर ली र्थीी।
25. एकमात्र प्रश्न सिजस पर अब विव+ार करने की आवश्यक ा है, वह यह है विक क्या उच्च न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेश क े ह उस पद पर उसकी विनरं र ा उसे उमादेवी (3) क े मामले में थ्यों क े मद्देनजर विनयविम ीकरण से वंति+ करेगी।
26. अपीलक ा; द्वारा उसकी विनयुविY क े संदभ; में संशो न को +ुनौ ी देने क े लिलए उच्च न्यायालय क े समक्ष दायर रिरट याति+का संख्या 3316/1986 (एसएस) को उच्च न्यायालय क े समक्ष र्इस रिरट याति+का की लंम्बन क े दौरान विदनांक 20.05.1986 क े आदेश क े ह रोक लगा दी गई र्थीी। उसने विनयविम ीकरण क े अपने दावे को खारिरज कर े हुए संयुY शिशक्षा विनदेशक द्वारा पारिर आदेश को +ुनौ ी दे े हुए रिरट याति+का संख्या- 7890/2003 को दायर करक े विiर से उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। दो लंविब रिरट याति+काओं को उच्च न्यायालय क े द्वारा जोड़ा विदया गया र्थीा और सिजनको 23.01.2006 क े सामान्य विनण;य और आदेश क े ह र्इस विनष्कष; क े सार्थी विनस् ारण विकया विक अपीलक ा; क े पास सभी अपेतिक्ष योग्य ा है और उसने 21 साल क काम विकया है और भले ही उन्हें अवकाश रिरविY क े ह विनयुY विकया गया है लेविकन उसकी सं ोषजनक सेवाओं क े आ ार पर, अब उन्होंनें पद ारण करने का और संस्र्थीा में सेवा जारी रखने का अति कार प्राप्त कर लिलया है और र्इस स् र पर, उसे एक स्टॉप-गैप व्यवस्र्थीा में एक विनयुविY क े रूप में मानना उति+ नहीं vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk होगा और दनुसार राज्य प्रत्यर्थी4 को विनद’शिश विकया जा ा है विक प्रासंविगक विनयविम ीकरण विनयमों क े ह विनयविम ीकरण क े लिलए विव+ार करे।
27. राज्य प्रत्यर्थी4 ने र्इस विनण;य क े विवरूद्घ विकसी भी उच्च iोरम में अपील नहीं की है सिजससे पक्षकरों क े मध्य परस्पर र्इस विनण;य ने अपने अंति म रूप को प्राप्त कर लिलया हैपूव Y विनण;य सिजसने अंति म रूप प्राप्त कर लिलया है, सिजसे अपीलक ा; क े विनयविम ीकरण क े अति कार को मजबू ी प्रदान कर विदया है। जब संयुY शिशक्षा विनदेशक द्वारा र्इसे अस्वीकार कर विदया गया र्थीा, ो र्इसे विiर से रिरट याति+का संख्या 8597/2010 दायर करक े +ुनौ ी दी गई र्थीी। विवद्व एकल न्याया ीश 15. 05. 2014 क े आदेश क े ह उY रिरट याति+का को यह कह े हुए अनुमति दी विक मुकदमेबाजी क े पहले दौर में, उच्च न्यायालय ने अव ारिर विकया र्थीा विक वह पद ारण करने का हकदार र्थीी और जब उY विनण;य अंति म और विनर्दिववाद हो गया ब विनयविम ीकरण विवविनयम, 2001 लागू हो गये र्थीे और उY विनयमों को लागू करने से र्इनकार करना गैरकानूनी र्थीा।
28. यह स्वीकाय; है विक जब अपीलक ा; द्वारा दायर पहले की दो रिरट याति+काओं में उच्च न्यायालय द्वारा 23.01.2006 का विनण;य पारिर विकया गया र्थीा, ो उमादेवी (3) क े थ्य भी अस्थिस् त्व में नहीं र्थीे क्योंविक उY विनण;य बाद में 10.04.2006 को प्रदान विकया गया र्थीा।
29. उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने उमादेवी (3) में र्इस न्यायालय क े आदेश को गल रीक े से समझा है संविव ान पीठ ने कहीं भी यह विनद’श नहीं विदया है विक सेवा मामले जो परस्पर विनण[4] हो गए हैं, उन्हें विiर से खोला जाना +ाविहए।र्इसक े विवपरी, उY विनण;य क े पैरा 54 में, संविव ान पीठ ने विनम्नानुसार स्पष्ट विकयाः vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk यह भी स्पष्ट विकया जा ा है विक वे विनण;य जो र्इस विनण;य में य विकए गए सिसद्धां क े विवपरी हैं, या सिजन विदशाओं में हम यहां आयोसिज विकए गए हैं, उनकी पूव;व 4 क े रूप में उनकी स्थिस्र्थीति से र्इनकार विकया जाएगा। "
30. उपरोY स्पष्टीकरण से यह विबर्ल्सक ु ल स्पष्ट हो जा ा है विक उमादेवी (3) क े विनण;य में य विकए गए सिसद्धां ों क े विवपरी +ल रहे पहले क े विनण;यों को पूव;व 4 क े रूप में नहीं माना जाएगा। र्इसका ात्पय; यह नहीं हो सक ा है विक उमादेवी (3) क े विनण;य से पहले विदए गए एक सक्षम न्यायालय क े विनण;य को अंति म रूप विदया गया है और पार्दिटयों क े बी+ बाध्यकारी अं र को लागू करने की आवश्यक ा नहीं है। र्इसक े अति रिरY सिसद्घान् ों को विवरूद्घ विनण;य दे े हुए, सिजसे पूव; क े विनण;यों में पारिर विकया र्थीा, पक्षकारों क े मध्य अतिं म विनण;यों को समाप्त करना आैर र्इसे बेकार करना उच्च iोरम क े आगामी विनण;य को प्रभाविव नहीं करेगा। सिसद्घान् ों क े विवरूद्घ विनण;य देना आैर विनण;यों को उर्ल्सटा करने क े मध्य एक अं र है विव+ारा ीन विनण;य को स्वयं ही +ुनौ ी विदया जाना +ाविहए और कानून द्वारा ज्ञा या मान्य ा प्राप्त रीक े से छ ु टकारा पाना होगा। र्इसक े अति रिरY सिसद्धां ों क े विवरूद्घ विनण;य को उत्तरव 4 विनण;यों क े द्वारा परिरवर्ति कर विदया गया है सिजसे पक्षों पर विनण;य क े बाध्यकारी प्रभाव को कम नहीं करेगा।
31. एक समरूप स्थिस्र्थीति में, सिसविवल अपील सं. 4443/2021 में र्इस न्यायालय ने सिसविवल अपील सं. 4444 और 4445/ 2021(क ु लपति आनंद क ृ विष विवश्वविवद्यालय बनाम कनुभाई नानुभाई वाघेला और अन्य) को 26.07.2021 को विनण[4] विकया, अपीलक ा; द्वारा उY मामले में विदए गए क; को खारिरज कर विदया विक र्इस न्यायालय का विनण;य गुजरा क ृ विष विवश्वविवद्यालय बनाम राठौड़ लभू बे+र और अन्य 4 में 4 (2001) 3 एससीसी 574 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk 18.01.2001 विदनांविक विनण;य को र्इस न्यायालय क े उमादेवी (3) क े लागू होने क े लागू नहीं होगा। यह पैराग्राi 11 में विनम्नानुसार आयोसिज विकया गया र्थीाः
11. हमने श्री पीएस पटवालिलया, विवश्वविवद्यालय क े वरिरष्ठ वकील और श्री नति+क े ा जोशी, प्रत्यर्थी4यों क े लिलए विवद्व अति वYा को सुना है।विवश्वविवद्यालय का मुख्य क; यह है विक सति+व, कना;टक राज्य और अन्य बनाम उमादेवी और अन्य 2 में र्इस न्यायालय क े बाद, प्रत्यर्थी4 विनयविम ीकरण क े हकदार नहीं हैं क्योंविक कोई स्वीक ृ पद उपलब् नहीं हैं।अपीलक ा; की ओर से की गई एक और दलील यह है विक गुजरा क ृ विष विवश्वविवद्यालय उपरोY में 18.01.2001 क े र्इस न्यायालय का विनण;य उमादेवी में र्इस न्यायालय क े विनण;य क े बाद जीविव नहीं है।र्इसमें कोई संदेह नहीं है विक उमादेवी क े मामले में, यह अव ारिर विकया गया है विक एक बार क े उपाय क े रूप में विनयविम ीकरण क े वल उन लोगों क े संबं में हो सक ा है सिजन्हें अविनयविम रूप से विनयुY विकया गया र्थीा और 10 साल या उससे अति क समय क विवति व स्वीक ृ पदों पर काम विकया र्थीा। हालाँविक, ात्कालिलक मामले में उत्तरदा ा गुजरा क उपरोY में र्इस न्यायालय क े विनण;य से आच्छाविद हैं।र्इस न्यायालय ने गुजरा राज्य की प्रस् ाविव योजना को मंजूरी दे दी और उन सभी दैविनक ग्रामीणों को विनयविम करने का विनद’श विदया जो योजना क े अनुसार +रण-वार पात्र र्थीे। योजना क े अनुसार विनयविम विकए जाने का अति कार ब क जारी रह ा है जब क विक सभी पात्र दैविनक-भत्ते वाले व्यविYयों को समायोसिज विकया जायेगा।र्इस न्यायालय द्वारा अपीलक ा; और गुजरा राज्य को योजना को +रणबद्ध रीक े से लागू करने की अनुमति देकर समायोजन क े लिलए अति रिरY पदों का सृजन विकया गया र्थीा।हम विवश्वविवद्यालय की ओर से विकए गए प्रस् ुति करण से प्रभाविव नहीं हैं विक उमादेवी क े मामले में र्इस न्यायालय क े i ै सले ने गुजरा क ृ विष विवश्वविवद्यालय उपरोY में विनण;य को रद्द कर विदया।गुजरा क (उपरोY) आन् रिरक भाग में र्इस न्यायालय का विनण;य अंति म हो गया है और विवश्वविवद्यालय क े लिलए बाध्यकारी है।यहां क विक उमादेवी क े मामले क े पैरा 54 क े अनुसार, कोई भी विनण;य जो उमादेवी में प्रस्र्थीाविप सिसद्धां ों क े विवपरी है, वे पूव;वर्ति को विनण;यों को दूविष कर देगा।उमा देवी क े मामले में पैरा 54 में यह vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अवलोकन गुजरा क ृ विष विवश्वविवद्यालय (सुप्रा) में र्इस न्यायालय क े विनद’शों का पालन करने क े लिलए अपने क;व्य से मुY नहीं है। "
32. उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ र्इस प्रकार से काय;वाही की जैसे वह विवद्व एकल े 23.01.2006 विदनांविक i ै सले क े विवरूद्घ अपील पर सुनवाई कर रही र्थीी जो पहले ही अपना अतिं म रूप प्राप्त कर +ुका र्थीा। रिरट याति+का संख्या 2597/ 2010 में विदये 15.05.2014 क े विदनांविक विनण;य क े विवरूद्घ र्इस अपील को े विनयमों क े ह दायर विकया गया हैयह न्यायालय का एक सुस्र्थीाविप सिसद्घान् है विक एक लेटस; पेटेंन्ट अपील जो एक रिरट याति+का क े अनु‰म में है काे सम्पातिश्व;क रूप से अपास् करने क े लिलए अपील दायर नहीं विकया जा सक ा है,
33. नरेश श्री र विमराजकर और अन्य बनाम महाराष्ट• राज्य और अन्य[5] में बहुम क े विनण;य द्वारा र्इस संबं में विनम्नानुसार कानून विन ा;रिर विकया गया हैः जब कोई न्याया ीश उसक े समक्ष न्यायविनण;यन क े लिलए लाये मामलों की सुनवार्इ; कर ा है, ो वह पहले उन सवालों का i ै सला कर ा है, वे थ्य सिजसमें पक्षकारों क े मध्य विववाद है और विiर उY थ्यों पर संबंति कानून लागू हो ा है।क्या न्याया ीश द्वारा अशिभलिललिख थ्य क े विनष्कष; सही हैं या गल, और क्या उसक े द्वारा विदये गये विवति का विनष्कष; विकसी दुब;ल ा से ग्रस् है, र्इस पर विव+ार विकया जा सक ा है और विनण;य लिलया जा सक ा है यविद े विनण;य से व्यशिर्थी पक्ष मामले को अपीलीय न्यायालय क े समक्ष उठा ा है। "
34. रूपा अशोक हुरा; बनाम अशोक हुरा; और अन्य[6] में, एक समान मुद्दे से विनपटने क े दौरान र्इस न्यायालय ने कहा विक र्इस न्यायालय क े विनण;य पर पुनर्दिव+ार जो अंति म रूप प्राप्त कर +ुका है, सामान्य रूप से स्वीकाय; नहीं है। र्इस न्यायालय द्वारा प्रदान 5 1967 ए.आर्इ;. आर. एससी 1 6 (1999) 2 एससीसी 103 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk विकए गए विवति क े प्रश्न पर विनण;य विनणा;यक र्थीा और र्इस प्रकार क े उत्तर व 4 मामलों में न्यायालय क े लिलए बाध्यकारी र्थीा। न्यायालय अपने विनण;य क े विवरूद्घ अपील को नहीं सुन सक ा है।
35. भार संघ और अन्य बनाम मेजर एसपी शमा; और अन्य[7] 7 में, र्इस न्यायालय की ीन-न्याया ीश पीठ ने विनम्नानुसार अव ारिर विकया हैः एक सक्षम न्यायालय द्वारा विदए गए विनण;य को संपातिश्व;क काय;वाही में र्इस कारण से +ुनौ ी नहीं दी जा सक ी है विक यविद ऐसा करने की अनुमति दी जा ी है ो "भ्रम और अराजक ा होगी और काय;वाही की अंति म ा का कोई अर्थी; नहीं रह जाएगा।"
36. र्इस प्रकार, यह बहु अच्छी रह से सुस्र्थीाविप है विक पक्षकारों क े लिलए े द्वारा विदये गये अंति म विनष्कष; पर पुनः विव+ारण करने की अनुमति नहीं है क्योंविक यह न क े वल न्यायालय की प्रवि‰या क े दुरुपयोग क े बराबर हो सक ा है, बस्थिर्ल्सक न्याय क े प्रशासन पर प्रति क ू ल प्रभाव डालेगा।
37. यह विनर्दिववाद है विक विदनांक 15.05.2014 क े विवद्व एकल न्याया ीश क े विनण;य क े अनुपालन में 31.10.2015 क े आदेश क े अनुसार उत्तरदा ाओं ने एलपीए में काय;वाही क े परिरणाम क े अ ीन अपीलक ा; की सेवाओं को विनयविम कर विदया और अपीलक ा; अब लगभग 33 वष` की विनरं र सेवा क े बाद सेवाविनवृलित्त की आयु प्राप्त कर लिलया है।
38. अं में, राज्य-प्रत्यर्थी4 क े विवद्व अति वYा द्वारा हमें र्इस आ ार पर मामले में हस् क्षेप नहीं करने क े लिलए राजी करने का एक कमजोर प्रयास विकया विक अपीलक ा; की सेवा को विदनांक 19.05.1986 क े पत्र क े द्वारा समाप्त कर विदया र्थीा, सिजसे कभी 7 (2014) 6 एससीसी 351 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk +ुनौ ी नहीं दी गई र्थीी क्योंविक उनकी सेवा को समाप्त कर विदया गया र्थीा।हम र्इस +रण में प्रति वादी क े लिलए विवद्व अति वYा द्वारा रद्द विकए गए प्रस् ाव को स्वीकार करने क े लिलए ैयार नहीं हैं, क्योंविक यह राज्य क े पास अवसर र्थीा विक दो रिरट याति+काओं में विवद्व एकल न्याया ीश क े आदेश एवं 23.01.2006 विदनांविक विनण;य क े ह र्इस विववाद को आगे बढ़ाया जाए। ।एक बार जब यह क; काय;वाही में विवद्व एकल न्याया ीश क े सामने कभी नहीं प्रस् ु विकया गया, सिजसे अंति म रूप विदया जा +ुका र्थीा, ो प्रति वादी को र्इस अपील में र्इस क; को उठाने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है।
39. मामले क े संपूण; थ्यों का विवश्लेषण करने और मामले पर विव+ार करने और कानूनी स्थिस्र्थीति का अवलोकन करने पर, हमारा विव+ार है विक उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ द्वारा पारिर आक्षेविप विनण;य कायम रखने क े लिलए उत्तरदायी नहीं है अ ः अपास् विकया जा ा है। दनुसार, अपील को अनुमति है। अपीलक ा; को सभी परिरणामी लाभों क े सार्थी विनयविम करने का हकदार माना जा ा है जो आज से ीन महीने की अवति क े भी र उसे बढ़ाया जा सक ा है।
40. थ्यों और परिरस्थिस्र्थीति यों में, हम, हालांविक, लाग क े रूप में कोई आदेश नहीं दे े हैं।.................................... (न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर).................................... (न्यायमूर्ति क ृ ष्ण मुरारी) vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk नई विदल्ली 17 अगस्, 2021 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk