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भार क
े सव च्च न्यायालय में
दीवानी अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील संख्या 4448 वर्ष! 2021
(एसएलपी (सी) संख्या 29868 वर्ष! 2018 से उत्पन्न)
श्री सौरव जैन और एक अन्य ... अपीलार्थी4गण
बनाम
मैसस! एबीपी ति8जाइन और एक अन्य ... प्रत्यर्थी4गण
निनण!य
माननीय न्यायमूर्ति 8ॉ नंजय वाई चंद्रचूड़
JUDGMENT
1. यह अपील दीवानी प्रनिCया संनिह ा 1908 ("सीपीसी") की ारा 96 क े ह पहली अपील[1] में उच्च न्यायालय, इलाहाबाद क े 22 फरवरी 2018 क े एक निनण!य से उत्पन्न हो ी है। 18 अक्टूबर 2011 को, अपर जिजला और सत्र न्याया ीश, मुरादाबाद ने प्रर्थीम प्रत्यर्थी4 द्वारा संस्थिQर्थी वाद[2] को खारिरज कर निदया। उच्च
1. प्रर्थीम अपील संख्या 411/2011.
2. मूल वाद संख्या 602/2008. mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायालय ने प्रर्थीम प्रत्यर्थी4 द्वारा दायर अपील को अनुमति प्रदान की और निवचारण न्यायालय क े निनण!य को यह अभिभनिन ा!रिर कर े हुए उलट निदया निक निववानिद भूनिम क े संबं में मुरादाबाद निवकास प्राति करण ("एम8ीए") द्वारा की गई नीलामी अक ृ और शून्य है। अपीलक ा! एक नीलामी C े ा है जिजसने एम8ीए से वादग्रQ भूनिम खरीदी र्थीी। एम8ीए को इन काय!वानिहयों में दूसरे प्रत्यर्थी4 क े रूप में पक्षकार बनाया गया है। अपीलक ा! और दूसरे प्रत्यर्थी4 दोनों को भूनिम पर पहली प्रत्यर्थी4 क े कब्जे में हQ क्षेप करने से रोक निदया गया है। थ्य
2. पहले प्रत्यर्थी4 ने दीवानी न्याया ीश (सीनिनयर ति8वीजन), मुरादाबाद क े न्यायालय में एक वाद संस्थिQर्थी निकया, जिजसमें दावा निकया गया निक वह गाटा संख्या 200/1 की भूनिम का एक 'हQ ां रणीय मालिलक और क ृ र्षक' है, जो मुरादाबाद जिजले में ग्राम सोनकपुर में स्थिQर्थी 1295.04 वग! या 0.1300 हेक्टेयर है। एम8ीए को पहले प्रति वादी क े रूप में जबनिक अपीलक ा! को दूसरे प्रति वादी क े रूप में वाद में पक्षकार बनाया गया र्थीा। वादपत्र में प्रकर्थीनों को इस चरण में प्रकभिर्थी निकए जाना आवश्यक है। ज़ानिहद हुसैन नाम क े एक व्यनिd क े पास मुरादाबाद में 6960.84 वग! मीटर की खाली भूनिम पर Qवत्व र्थीा।उसक े लिखलाफ सक्षम प्राति कारी, शहरी भूनिम सीमा, मुरादाबाद क े न्यायालय में सीलिंलग वाद सं. 437/5325 (शीर्ष!क राज्य बनाम जानिहद हुसैन) संस्थिQर्थी की गयी र्थीी, जिजसमें गाटा संख्या 200 की 1295.04 वग! मीटर भूनिम शानिमल र्थीी। 16 माच! 1988 क े एक आदेश द्वारा, भूनिम क े अन्य खण्ड़ों क े मध्य, गाटा संख्या 200 में शानिमल भूनिम को शहरी भूनिम (अति कत्तम सीमा और निवनिनयमन) अति निनयम 1976 ("यूएलसीआरए") क े ह सक्षम प्राति कारी द्वारा "अति शेर्ष" घोनिर्ष निकया गया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA र्थीा। सक्षम प्राति कारी क े आदेश क े अनुसरण में, गाटा संख्या 200 में भूनिम का कब्जा कभिर्थी रूप से उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा एम8ीए को सौंप निदया गया र्थीा। इस बीच, ज़ानिहद हुसैन ने 16 माच! 1988 क े आदेश क े लिखलाफ जिजला न्याया ीश, मुरादाबाद क े समक्ष राजQव अपील[3] दायर की। 6 जनवरी 1993 क े एक आदेश द्वारा, जिजला न्याया ीश ने अपील को अनुमति दी और एक संशोति माQटर प्लान क े आ ार पर सक्षम प्राति कारी को निफर से निवचार क े लिलए काय!वाही को प्रति प्रेनिर्ष कर निदया।
3. वादी का मामला यह है निक ज़ानिहद हुसैन की गाटा संख्या 200 की 0.32 एकड़ भूनिम का पूव! मालिलक और कब्जेदार र्थीा। उपरोd जो में से, भूनिम अति ग्रहण अति निनयम, 1894 क े प्राव ानों क े ह 30 जनवरी 1986 को एम8ीए द्वारा 0.05 एकड़ (0.0200 हेक्टेयर या 200 वग! मीटर क े बराबर) भूनिम का अति ग्रहण निकया गया र्थीा। अति ग्रहण क े बाद, गाटा संख्या 200 को दो भूखं8ों में निवभाजिज निकया गया र्थीाः गाटा संख्या 200/1 में 0.1300 हेक्टेयर (1300 वग! मीटर)। गाटा संख्या 200/2 में 0.2000 हेक्टेयर (200 वग! मीटर)। जानिहद हुसैन को गाटा संख्या 200/1 का मालिलक ब ाया गया है, जबनिक एम8ीए गाटा संख्या 200/2 का मालिलक बन गया है। मुकदमे में वादी का मामला यह है निक सीलिंलग मामले को सक्षम प्राति कारी को प्रति प्रेनिर्ष कर निदए जाने क े बाद और इसक े लम्बन क े दौरान, ज़ानिहद हुसैन ने 5 मई 1993 को निनय प्राति करण, शहरी भूनिम अति कत्तम सीमा, मुरादाबाद क े काया!लय से पहले प्रत्यर्थी4 को गाटा संख्या 200/1 में स्थिQर्थी भूनिम बेचने की अनुमति प्राप्त की।
3. राजQव अपील संख्या 23/1988. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पहले प्रत्यर्थी4 ने दावा निकया निक 22 जून 1993 को एक पंजीक ृ निबCी निवलेख द्वारा जानिहद हुसैन से गाटा संख्या 200/1 की 1295.04 वग! मीटर भूनिम खरीदी। सक्षम प्राति कारी क े समक्ष सीलिंलग मामले क े लस्थिम्ब रहने क े दौरान, यूएलसीआरए को 1999 क े अति निनयम 15 ("निनरसन अति निनयम") द्वारा निनरजिस कर निदया गया। सक्षम प्राति कारी (शहरी भूनिम सीमा), मुरादाबाद ने निनरसन अति निनयम की ारा 4 क े मद्देनजर वाद संख्या 437/5325 को खारिरज कर े हुए 15 जून 2001 को एक आदेश पारिर निकया जिजसमें कहा गया है निक निकसी न्यायालय, अति करण, या प्राति करण क े समक्ष लंनिब काय!वाही समाप्त हो जाएगी।
4. इस रीक े से, यह अभिभकभिर्थी निकया गया र्थीा निक गाटा संख्या 200/1 क े 1295.04 वग! मीटर भूनिम पर अति कत्तम सीमा को हटा निदया गया र्थीा। वादी- पहले प्रत्यर्थी4 ने 1295.04 वग! मीटर क े पूरे क्षेत्र का मालिलक होने का दावा निकया, जबनिक एम8ीए 200 वग! मीटर भूनिम क े संबं में गाटा संख्या 200/2 पर Qवानिमत्व अति कारों का हकदार र्थीा।
5. एम8ीए ने गाटा संख्या 200 में 600 वग! मीटर भूनिम की नीलामी और निबCी क े लिलए 31 अगQ 2008 को एक नोनिटस प्रकाभिश निकया। पहले प्रत्यर्थी4 ने नीलामी क े लिखलाफ 2 जिस ंबर 2008 और 4 जिस ंबर 2008 को अभ्यावेदन प्रQ ु करने का दावा निकया है। पहले प्रत्यर्थी4 ने नीलामी को चुनौ ी दे े हुए उत्तर प्रदेश राज्य और एम8ीए क े लिखलाफ उच्च न्यायालय क े समक्ष एक रिरट यातिचका दायर की। 11 जिस ंबर 2008 क े एक आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने दीवानी मुकदमे में राह पाने क े लिलए पहले प्रत्यर्थी4 को Qव ंत्र ा दे े हुए यातिचका को निनQ ारिर निकया। नीलामी की निबCी को 12 जिस ंबर 2008 को अपीलार्थी4 क े पक्ष में अनुमोनिद निकया गया र्थीा और 20 माच! 2009 को एम8ीए और Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपीलक ा! क े बीच 65,75,000 रूपये प्रति फल पर निवCय निवलेख निनष्पानिद निकया गया र्थीा।
6. पहले प्रत्यर्थी4 ने इस आ ार पर मुकदमे में नीलामी की काय!वाही को चुनौ ी दी निक एम8ीए क े पास नीलामी की गई भूनिम क े क े वल 200 वग! मीटर (यानी गाटा संख्या 200/2) की भूनिम पर हक र्थीा और इस प्रकार 400 वग! मीटर की शेर्ष भूनिम की निबCी 22 जून 1993 को पहले प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में ज़ानिहद हुसैन द्वारा निनष्पानिद निबCी निवलेख क े मद्देनजर अक ृ और शून्य र्थीी। मुकदमे में, जैसा निक मूल रूप से संस्थिQर्थी निकया गया र्थीा, मांगी गई राह ें निनम्न र्थीींः (i) यह उद्घोर्षणा निक एम8ीए द्वारा 400 वग! मीटर की भूनिम की नीलामी अवै और शून्य है; (ii) अपीलक ा! क े पक्ष में वादग्रQ भूनिम को हQ ां रिर करने और पहले प्रत्यर्थी4 को बेकब्जा करने से एम8ीए को प्रति बंति करने क े लिलए एक Qर्थीायी निनर्षे ाज्ञा। वादपत्र में यर्थीा उजिzलिख वादग्रQ भूनिम क े निववरण इस प्रकार र्थीेः "वादग्रQ भूनिम का निववरण ग्राम सोनकपुर, शहर और जिजला मुरादाबाद में स्थिQर्थी पूव!व 4 एकीक ृ गाटा संख्या 200 का एक निहQसा गाटा संख्या 200/1 की 400 वग! मीटर भूनिम।” वादपत्र को यह माँगने क े लिलए संशोति निकया गया र्थीाः (i) यह उद्घोर्षणा निक एम8ीए द्वारा 660.32 वग! मीटर भूनिम की नीलामी अवै और शून्य र्थीी; (ii) यह उद्घोर्षणा निक पहला प्रत्यर्थी4 अनुसूची क में वादग्रQ भूनिम सनिह अनुसूची (ख) में निवQ ृ वादग्रQ भूनिम का अनन्य मालिलक और कानिबज है; और Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iii) प्रर्थीम प्रत्यर्थी4 को बेकब्जा करने से Qर्थीायी व्यादेश।
7. श्री साई जिसति} 8ेवलपस! को मुकदमे क े ीसरे प्रति वादी क े रूप में पक्षकार बनाया गया र्थीा। संशोति वादपत्र में यह दलील है निक ज़ानिहद हुसैन द्वारा पहले े पक्ष में पहले भूनिम हQ ां रिर निकया, बाद में 5 मई 1993 को सक्षम प्राति कारी, मुरादाबाद की अनुमति प्राप्त की र्थीी।संशोति वादपत्र की अनुसूची (क) और अनुसूची (ख) नीचे दी गई हैंः "वादग्रQ भूनिम की अनुसूची 'क' ग्राम सोनकपुर, शहर और जिजला मुरादाबाद में स्थिQर्थी पूव!व 4 एकीक 200 का एक निहQसा गाटा संख्या 200/1 की 660.32 वग! मीटर भूनिम जो वण!माला BCDE द्वारा संलग्न नक्शा नजरी में निदखायी गयी है। उपरोd गाटा की सीमाएँ निनम्नानुसार हैं -पूव!ः पुलिलस चौकी पति„मः 12 मीटर चौड़ी सड़क। उत्तरः कांठ रो8। दतिक्षणः वाभिणस्थिज्यक प्लॉट संख्या 7 (वादी की संपलित्त)। वादग्रQ भूनिम की अनुसूची 'ख' ग्राम सोनाकपुर, शहर और जिजला मुरादाबाद में स्थिQर्थी पूव!व 4 एकीक 200 का एक निहQसा गाटा संख्या 200/1 की 1295.04 वग! मीटर भूनिम जो अक्षर ABCDEF से संलग्न नक्शा नजरी में निदखाया गया है। उपरोd गाटा की सीमाएँ निनम्नानुसार हैं-पूव!ः पुलिलस चौकी और उसक े बाद हाजी कयूम का भूखण्ड़पति„मः 12 मीटर चौड़ी सड़क। उत्तरः कांठ रो8। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दतिक्षणः प्राण सिंसह का भूखं8 और भूनिम।"
8. एम8ीए ने एक लिललिख कर्थीन दालिखल निकया जिजसमें कहा गया र्थीा निकः (i) गाटा सं. 200/1 में वादग्रQ भूनिम का कब्जा राज्य सरकार द्वारा भूनिम को अति शेर्ष घोनिर्ष निकए जाने क े बाद लिलया गया र्थीा और नायब हसीलदार, सदर, मुरादाबाद व कलेक्टर, मुरादाबाद द्वारा 31 जुलाई 1992 को एम8ीए को हQ ां रिर निकया गया र्थीा। एम8ीए का ब से गाटा संख्या 200/1 में वादग्रQ भूनिम पर कब्जा है जब क निक इसे नीलामी क े माध्यम से बेचा नहीं गया र्थीा; (ii) 660.32 वग! मीटर का पंजीक ृ निबCी निवलेख 20 माच! 2009 को निनष्पानिद निकया गया र्थीा; (iii) जानिहद हुसैन क े लिखलाफ सीलिंलग की काय!वाही समाप्त हो गई र्थीी और इस प्रकार, वह निनरसन अति निनयम क े ह लाभ प्राप्त करने का हकदार नहीं है; (iv) सक्षम प्राति कारी, शहरी अति कत्तम सीमा, मुरादाबाद द्वारा गाटा संख्या 200/1 की वादग्रQ भूनिम क े हQ ां रण क े लिलए जानिहद हुसैन को कोई अनुमति नहीं दी गई र्थीी; (v) एम8ीए द्वारा 31 जुलाई 1992 को कब्जा लेने क े बाद जानिहद हुसैन और पहले प्रत्यर्थी4 क े बीच निनष्पानिद निबCी निवलेख अमान्य है; और (vi) उत्तर प्रदेश राज्य और सीलिंलग प्राति करण आवश्यक पक्षकार र्थीे, लेनिकन उन्हें मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया गया र्थीा।
9. अपीलक ा! (निवचारण न्यायालय क े समक्ष प्रति वादी संख्या 2) ने एक लिललिख कर्थीन दालिखल निकया जिजसमें कहा गया र्थीा निकः Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) यूएलसीआरए की ारा 10(3) क े ह पूरी वादग्रQ भूनिम राज्य सरकार में निननिह र्थीी; (ii) प्रर्थीम प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में ज़ानिहद हुसैन द्वारा निदनांक 22 जून 1993 की निबCी निवलेख शून्य र्थीा क्योंनिक वह कोई संव्यवहार नहीं कर सक ा र्थीा जब भूनिम सक्षम प्राति कारी, शहरी भूनिम अति कत्तम सीमा द्वारा अति निनण!य क े अ ीन र्थीी; (iii) भूनिम को 31 जुलाई 1992 को एम8ीए को हQ ां रिर करने का आरोप लगाया गया र्थीा और 22 जून 1993 को पहले प्रत्यर्थी4-वादी को कभिर्थी रूप से निनष्पानिद कोई भी निबCी निवलेख C े ा को कोई हक प्रदान नहीं करेगा; (iv) सक्षम प्राति कारी क े आदेश क े निवरु} जिजला न्याया ीश क े समक्ष राजQव अपील का निनQ ारण एम8ीए को पक्षकार बनाये निबना नहीं निकया जा सक ा र्थीा; (v) चूंनिक निनरसन अति निनयम क े प्रव !न से पहले (सक्षम प्राति कारी, शहरी भूनिम अति कत्तम सीमा क े 31 जुलाई 1992 क े संचार क े अनुसार) एम8ीए का भूनिम पर कब्जा र्थीा, इसलिलए निनरसन का कोई परिरणाम नहीं होगा और (vi) वादी-पहले प्रति वादी का एम8ीए द्वारा 660.32 वग! मीटर की भूनिम की नीलामी से कोई सरोकार नहीं र्थीा, जिजसक े लिलए नीलामी में 65.75 लाख रुपये का भुग ान निकया गया र्थीा।
10. मुकदमें में निनम्नलिललिख निववाद्यक य निकए गए र्थीेः "1. क्या वादी वादग्रQ भूनिमयों का मालिलक और कब्जेदार है?
2. क्या प्रति वादी संख्या 1 द्वारा 12.9.2008 को प्रति वादी संख्या 2 क े पक्ष में शुरू की गई नीलामी की काय!वाही 660.32 वग! मीटर की निववानिद हद क अवै और शून्य है? Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
3. क्या वाद का कम मूल्यांकन निकया गया है?
4. क्या न्यायालय-शुल्क घाटा का भुग ान निकया गया है?
5. क्या आवश्यक पक्षकारों क े क ु संयोजन क े कारण वादी का मुकदमा खराब है?
6. क्या इस न्यायालय क े पास इस वाद को सुनने क े लिलए कोई क्षेत्राति कार नहीं है?
7. क्या वादी क े पक्ष में कोई वाद हे ूक उत्पन्न हुआ है?
8. अनु ोर्ष।"
11. 18 अd ू बर, 2011 क े अपने निनण!य द्वारा, निवचारण न्यायालय ने अभिभनिन ा!रिर निकया निक उसक े पास घोर्षणात्मक और व्यादेशात्मक अनु ोर्ष देने की अति कारिर ा है और इसलिलए यह वाद पोर्षणीय र्थीा। निवचारण न्यायालय ने यह कह े हुए मुकदमा खारिरज कर निदया निक एम8ीए भूनिम का वै मालिलक र्थीा और 12 जिस ंबर 2008 को आयोजिज नीलामी वै र्थीी। निवचारण न्याया ीश ने निनम्नलिललिख निनष्कर्ष! निदएः (i) ज़ानिहद हुसैन, जिजला मुरादाबाद क े ग्राम सोनकपुर में स्थिQर्थी 1295.04 वग! मीटर क े गाटा नंबर 200 क े पूव! मालिलक र्थीे; (ii) यूएलसीआरए क े ह सीलिंलग प्रकरण संख्या 437/5325 में सक्षम प्राति कारी द्वारा पारिर 16 माच! 1988 क े एक आदेश द्वारा, 6960.84 वग! मीटर भूनिम में से क ु ल 2,000 वग! मीटर भूनिम को ारण रखने योग्य घोनिर्ष निकया गया र्थीा, जबनिक शेर्ष 4960.84 वग! मीटर को अति शेर्ष घोनिर्ष निकया गया र्थीा; (iii) गाटा संख्या 200 में 1295.04 वग! मीटर की भूनिम को 'अति रिरd खाली भूनिम' पाया गया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (iv) ग्राम सोनकपुर में गाटा सं. 200 में से 1295.04 वग! मीटर का कब्ज़ा नायब हसीलदार शहरी भूनिम अति कत्तम सीमा, मुरादाबाद द्वारा जिजला कलेक्टर की ओर से 31 जुलाई 1992 को एम8ीए क े नायब हसीलदार को सौंप निदया गया र्थीा। जब जिजला न्याया ीश, मुरादाबाद क े समक्ष 16 माच! 1988 क े आदेश क े लिखलाफ अपील दायर की गई, ो यह थ्य निक वादग्रQ भूनिम का कब्जा एम8ीए को सौंप निदया गया र्थीा, अदाल क े ध्यान में नहीं लाया गया र्थीा। निकसी भी घटना में, संशोति माQटर प्लान को ध्यान में रखने क े लिलए मामले को सक्षम प्राति कारी को भेज निदया गया र्थीा। इस बीच, जिजला न्याया ीश क े आदेश से पहले, गाटा संख्या 200 क े 1295.04 वग! मीटर का कब्जा 31 जुलाई 1992 को एम8ीए को सौंप निदया गया र्थीा, जिजसक े अनुसरण में यह गाटा संख्या 200 में पूव d भूनिम का निवति क Qवामी र्थीा; (v) ज़ानिहद हुसैन, जिजस पर आरोप है निक उसने पहले प्रत्यर्थी4-वादी को जमीन बेची र्थीी, न्यायालय क े समक्ष नहीं आया र्थीा और न ही 22 जून 1993 को निनष्पानिद मूल निबCी निवलेख न्यायालय में दालिखल निकया गया र्थीा। निबCी निवलेख की क े वल एक प्रमाभिण प्रति दालिखल की गई र्थीी; (vi) एम8ीए, जिजसे 31 जुलाई 1992 को भूनिम सौंपी गई र्थीी, जिजला न्याया ीश क े समक्ष राजQव अपील का पक्षकार नहीं र्थीा और न ही सक्षम प्राति कारी ने 15 जून 2001 क े अपने आदेश में सीलिंलग मामले में काय!वाही को समाप्त कर े हुए निनद•श निदया र्थीा निक जानिहद हुसैन को 'कब्जा' बहाल निकया जाना चानिहए; (vii) कब्जे को पहले ही 31 जुलाई 1992 को एम8ीए को हQ ां रिर कर निदया गया र्थीा और अति ग्रहण निनरसन अति निनयम द्वारा प्रभानिव नहीं होगा क्योंनिक भूनिम यूएलसीआरए की ारा 10(3) क े ह निननिह र्थीी और राज्य सरकार द्वारा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA निवति व अति क ृ व्यनिd द्वारा कब्जा कर लिलया गया र्थीा (निनरसन अति निनयम की ारा 3(1)(क)); (viii) पहले प्रत्यर्थी4 क े अनुसार, ज़ानिहद हुसैन ने 5 मई 1993 को गाटा संख्या 200/1 की 1295.04 वग! मीटर भूनिम को बेचने की अनुमति प्राप्त की र्थीी।पूरी काय!वाही मनगढ़ं प्र ी हो ी है क्योंनिक ज़ानिहद हुसैन अब गाटा संख्या 200/1 क े 1295.04 वग! मीटर क े मालिलक नहीं र्थीे। गाटा संख्या 200 का कब्जा 31 जुलाई 1992 को एम8ीए को हQ ां रिर कर निदया गया र्थीा। इसक े अलावा, 5 मई 1993 को ज़ानिहद हुसैन को भूनिम बेचने क े लिलए जो अनुमति दी गई र्थीी, वह उस भूनिम क े संबं में नहीं र्थीी जिजसे अति शेर्ष घोनिर्ष निकया गया र्थीा, बस्थिल्क क े वल 2000 वग! मीटर की उसकी Qवयं की भूनिम क े संबं में र्थीी, जिजसमें गाटा संख्या 200/1 में की भूनिम शानिमल नहीं र्थीी; और (ix) चूंनिक वादग्रQ भूनिम क े संबं में यूएलसीआरए की ारा 8(4) क े ह एक आदेश पहले ही पारिर निकया जा चुका र्थीा, इसलिलए जानिहद हुसैन को भूनिम को हQ ां रिर करने का कोई अति कार नहीं र्थीा (रिर ेश ति वारी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य[4] में इस न्यायालय द्वारा प्रति पानिद निवति क े अनुसार)।
12. उच्च न्यायालय ने 22 फरवरी 2018 क े अपने निनण!य द्वारा निवचारण न्यायालय की निनण!य और ति8Cी को उलट निदया। उच्च न्यायालय की ति8वीजन बेंच ने अपील की अनुमति दे े हुए कहा निकः (i) सक्षम प्राति कारी क े निदनांक 16 माच! 1988 क े आदेश क े निवरु}, जिजला न्याया ीश, मुरादाबाद ने 6 जनवरी 1993 को अपील को अनुमति प्रदान की
4. 2011 (84) एएलआर 292 (एससी) Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और सक्षम प्राति कारी को संशोति माQटर प्लान को ध्यान में रख े हुए मामले को नए जिसरे से य करने का निनद•श निदया गया; (ii) इस बीच, 27 जिस ंबर 1988 को यूएलसीएलआरए की ारा 10(1) क े ह राज्य में अति शेर्ष भूनिम निननिह करने क े लिलए एक अति सूचना जारी की गई र्थीी, जिजसमें गाटा संख्या 200 की 1295.04 वग! मीटर भूनिम शानिमल र्थीी। (iii) अभिभलेख पर इसक े संबं में कोई सामग्री नहीं र्थीी निक क्या कोई आगे काय!वाही की गई र्थीी; (iv) यह Qपष्ट नहीं र्थीा निक सक्षम प्राति कारी द्वारा यूएलसीआरए क े ह भूनिम मालिलक से कब्जा कब लिलया गया र्थीा; (v) 31 जुलाई 1992 का पत्र, जो सक्षम प्राति कारी, शहरी भूनिम अति कत्तम सीमा, मुरादाबाद को संबोति है, इसमें कहा गया है निक नायब हसीलदार, शहरी भूनिम अति कत्तम सीमा द्वारा कब्जा सौंप निदया गया र्थीा, एम8ीए क े वल एक "कागजी कब्जा" निदखाने क े लिलए है न निक यूएलसीआरए[6] की ारा 10(5)5 या 10(6) क े ह "वाQ निवक भौति क कब्जे" क े लिलए है। "वाQ निवक कब्जा" लेने क े लिलए, एक पंचनामा बनाकर कब्जा लिलया जाना चानिहए र्थीा; (vi) चूंनिक 6 माच!, 1988 क े आदेश क े निवरु} अपील को 6 जनवरी, 1993 को मामले को सक्षम प्राति कारी को प्रति प्रेनिर्ष करने की अनुमति दी गई र्थीी, इसलिलए
6. "10(6). यनिद कोई व्यनिd उप ारा (5) क े अ ीन निकए गए आदेश का पालन करने से इनकार कर ा है या उसका पालन करने में असफल रह ा है, ो सक्षम प्राति कारी खाली भूनिम पर कब्जा कर सक ा है या उसे संबंति राज्य सरकार या ऐसे राज्य सरकार द्वारा निवति व प्राति क ृ निकसी व्यनिd को दे सक ा है और उस प्रयोजन क े लिलए ऐसी शनिd का उपयोग कर सक ा है जो आवश्यक हो।"
5. "10 (5). जहां कोई खाली भूनिम उप- ारा (3) क े ह राज्य सरकार में निननिह है, सक्षम प्राति कारी, लिललिख रूप में नोनिटस द्वारा, निकसी भी व्यनिd को, जो उसक े कब्जे में हो सक ा है, राज्य सरकार या राज्य सरकार द्वारा इस संबं में निवति व अति क ृ निकसी भी व्यनिd को नोनिटस ामील होने क े ीस निदनों क े भी र आत्मसमप!ण करने या कब्जा परिरदत्त करने का आदेश दे सक ा है।" Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA भूनिम को अति शेर्ष घोनिर्ष करने वाला आदेश अस्थिQ त्व में नहीं रहेगा। इस प्रकार, राज्य में हक क े वै रूप से निननिह होने या इसे कब्जे में लेने का कोई प्रश्न ही नहीं उठ ा। बाद की काय!वाही अक ृ और शून्य हो जाएगी और भूनिम जानिहद हुसैन की रहेगी; (vii) 27 जिस ंबर 1988 को ारा 10(1) क े ह एक अति सूचना जारी करने क े बाद, यूएलसीआरए की ारा 10(3) क े ह कोई अन्य अति सूचना प्रकाभिश नहीं की गई र्थीी। इसलिलए, भूनिम क े आभासी भौति क कब्जे और इसक े राज्य सरकार में निननिह होने का मुद्दा उत्पन्न नहीं होगा।अन्यर्थीा भी, निनरसन अति निनयम क े वल उन काय!वानिहयों को बचा ा है जहां ारा 10(5) (शांति पूण! या Qवैस्थि•–क) या ारा 10(6) (जबरन कब्जे) क े ह वाQ निवक कब्जा लिलया गया है और यह आभासी कब्जे पर लागू नहीं हो ा है; (viii) एम8ीए द्वारा दालिखल लिललिख कर्थीन में, 31 जुलाई 1992 क े कब्जे क े पत्र क े अलावा वाQ निवक कब्जा लेने का कोई संदभ! नहीं र्थीा, जो क े वल एक कागज संव्यवहार र्थीा।यहां क निक यह पत्र एम8ीए को कब्जा हQ ां रिर करने का ज्ञापन नहीं है; (ix) निनरसन अति निनयम क े प्रव !न पर भौति क रूप से कब्जा लेने और एम8ीए को कब्जा सौंपने क े अभाव में, गाटा संख्या 200 में शानिमल 1295.04 वग! मीटर भूनिम जानिहद हुसैन की संपलित्त बनी रही; और (x) यह थ्य निक ारा 10(5) क े ह कब्जे क े लिलए काय!वाही नहीं की गई र्थीी, 15 जून 2001 क े सक्षम प्राति कारी क े आदेश में संदर्भिभ निकया गया र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दलीलें
13. अपीलक ा! की ओर से पेश निवद्वान अति वdा श्री वेंनिक ा सुब्रमण्यम टीआर ने प्रQ ु निकया निक उच्च न्यायालय का निनण!य निनम्नलिललिख कारणों से त्रुनिटपूण! हैः (i) वाद चलाने क े लिलए दीवानी न्यायालय का क्षेत्राति कार वर्जिज र्थीा क्योंनिक वाद-पत्र क े निनष्पक्ष पाठन से यह Qपष्ट हो जाएगा निक वाद का उद्देश्य यूएलसीआरए क े ह राज्य सरकार या सक्षम प्राति कारी को पक्षकार बनाये निबना यूएलसीआरए क े ह काय!वाही की वै ा को चुनौ ी देना र्थीा; (ii) 1993 में जानिहद हुसैन से पहले प्रत्यर्थी4 द्वारा भूनिम की खरीद, यूएलसीआरए की ारा 5(3) और ारा 27 क े प्राव ानों से प्रभानिव है; (iii) पहले प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में निबCी निवलेख शून्य र्थीा और इसलिलए पहले प्रत्यर्थी4 द्वारा संस्थिQर्थी वाद का आ ार शून्य हो जा ा है; (iv) वाQ व में, 31 जुलाई 1992 को कब्जा लिलया गया और एम8ीए को सौंप निदया गया; और (v) मुकदमें में मूल दावे को बाद में एक संशो न द्वारा भूनिम क े एक बड़े क्षेत्र पर दलील देने क े लिलए निवQ ारिर निकया गया र्थीा।
14. दूसरी ओर, पहले प्रत्यर्थी4 की ओर से पेश निवद्वान वरिरष्ठ अति वdा श्री मनोज Qवरूप ने कहा निकः (i) मूल रूप से 1986 में, भूनिम अति ग्रहण अति निनयम 1894 क े ह गाटा सं. 200 की 200 वग! मीटर क े क्षेत्र का अति ग्रहण हुआ। परिरणामQवरूप, भूनिम क े शेर्ष निहQसे को गाटा संख्या 200/1 में 1295.04 और गाटा संख्या 200/2 में 200 वग! मीटर में निवभाजिज निकया गया र्थीा; Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (ii) यद्यनिप सक्षम प्राति कारी द्वारा 1988 में जिजला न्याया ीश क े आदेश निदनांनिक 6 जनवरी 1993 द्वारा एक आदेश पारिर निकया गया र्थीा, इस मामले को संशोति माQटर प्लान क े आ ार पर मामले पर पुनर्विवचार क े लिलए सक्षम प्राति कारी को वापस भेज निदया गया र्थीा, और निनरसन अति निनयम क े अति निनयमन से पहले निकसी भी आगे की काय!वाही क े संबं में कोई सबू नहीं है; (iii) वाद की निवरचना उतिच र्थीी क्योंनिक वाद हे ुक उस निवज्ञापन क े कारण उत्पन्न हुआ र्थीा जो एम8ीए द्वारा 660 वग! मीटर भूनिम की नीलामी क े लिलए 31 अगQ 2008 को जारी निकया गया र्थीा, जिजसमें गाटा संख्या 200/1 में वादग्रQ भूनिम का एक निहQसा शानिमल र्थीा।दूसरे शब्दों में वाद का सीलिंलग की काय!वाही से कोई लेना-देना नहीं र्थीा; (iv) अपीलार्थी4 क े मामले का आ ार 31 जुलाई 1992 का कब्जा पत्र है जो एक अं र-निवभागीय संप्रेर्षण की प्रक ृ ति में है। Qव ंत्र गवाहों क े सार्थी पंचनामा क े अभाव में, यह मानना संभव नहीं है निक वाQ निवक भौति क कब्जा लिलया गया र्थीा; (v) भले ही 31 जुलाई 1992 क े कब्जे क े साक्ष्य वाले दQ ावेज को वै माना जा ा है, बाद में 1993 में जिजला न्याया ीश द्वारा एक प्रति प्रेर्षण निकया गया र्थीा जिजसक े परिरणामQवरूप निनरसन की ारीख से पहले राज्य में कु – निननिह नहीं होगा; और (vi) 27 जिस ंबर 1988 को ारा 10(1) क े ह एक अति सूचना जारी करने क े बाद, निनरसन अति निनयम लागू होने से पहले कब्जा लेने क े लिलए कोई और कदम उठाए जाने का कोई सबू नहीं है। निवश्लेर्षण Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
15. अब निवरो ी कž पर निवचार निकया जाएगा।
16. शुरुआ में, यह ध्यान निदया जाना चानिहए निक पहला प्रत्यर्थी4 22 जून 1993 को एक पंजीक ृ निबCी निवलेख क े आ ार पर हक का दावा कर ा है, जिजसक े ह जानिहद हुसैन ने कभिर्थी रूप से गाटा सं. 200/1 में 1295.04 वग! मीटर क े क्षेत्र को 5 लाख रुपये क े प्रति फल पर हQ ां रिर निकया। निबCी निवलेख 29 माच! 1993 को यूएलसीआरए की ारा 27 क े ह संपलित्त की निबCी क े लिलए मांगी गई अनुमति को संदर्भिभ कर ा है, जो कभिर्थी रूप से 5 मई 1993 क े एक आदेश द्वारा दी गई र्थीी।
17. जानिहद हुसैन द्वारा निनय प्राति करण, शहरी भूनिम अति कत्तम सीमा, मुरादाबाद क े काया!लय क े समक्ष दालिखल की गई घोर्षणा भूनिम की क ु ल सीमा 1295.04 वग! मीटर क े रूप में संदर्भिभ कर ी है। हालांनिक, जिजन जमीनों क े संबं में अनुमति मांगी गई र्थीी, उनक े सव•क्षण संख्या (या गाटा संख्या) का कोई संदभ! नहीं है। इसक े अलावा, आदेश निदनांनिक 5 मई 1993, जो कभिर्थी रूप से पहले प्रत्यर्थी4 को भूनिम की निबCी की अनुमति दे ा है, उzेख कर ा है निक 29 माच! 1993 को सोनाकपुर में स्थिQर्थी गाटा संख्या 200 क े 1295.04 वग! मीटर की भूनिम को अं रण क े लिलए उद्घोर्षणा की गयी र्थीी। हालांनिक, उस भूनिम क े अं रण की अनुमति नहीं दी गई र्थीी क्योंनिक इससे संबंति एक लंनिब मुकदमा र्थीा। आदेश में आगे कहा गया है निक 30 माच! 1993 को जानिहद हुसैन द्वारा एक अन्य आवेदन निदया गया र्थीा।जांच करने क े बाद, यह पाया गया निक "जानिहद हुसैन की 2000 वग! मीटर की संपलित्त से अब 1295.04 वग! मीटर की भूनिम को अं रिर करने क े लिलए अनुमति मांगी गई र्थीी। " इसक े आ ार पर, सक्षम प्राति कारी ने 5 मई 1993 क े अपने आदेश द्वारा 2000 वग! मीटर की भूनिम से 1295.05 वग! मीटर की भूनिम क े हQ ां रण की अनुमति दी।इस प्रकार 5 मई Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 1993 क े आदेश से संक े निमल ा है निक सक्षम प्राति कारी ने Qपष्ट रूप से गाटा संख्या 200/1 में स्थिQर्थी भूनिम क े हQ ां रण की अनुमति से इनकार कर निदया र्थीा क्योंनिक एक लंनिब मुकदमा र्थीा और क े वल जानिहद हुसैन क े Qवानिमत्व वाली 2000 वग! मीटर भूनिम में से 1295.05 वग! मीटर भूनिम क े लिलए अनुमति प्रदान की गयी र्थीी, जो सीलिंलग की काय!वाही का निवर्षय नहीं र्थीी।
18. यूएलसीआरए की ारा 5(3) निनम्नलिललिख शब्दों में हैः "निकसी भी राज्य में, जिजस पर यह अति निनयम पहली बार लागू हो ा है और निकसी भी राज्य में जो संनिव ान क े अनु•–ेद 252 क े खं8 (1) क े ह इस अति निनयम को अपना ा है, इस अति निनयम क े प्रारंभ होने से ठीक पहले अति कत्तम सीमा से अति क खाली भूनिम रखने वाला कोई भी व्यनिd ऐसी निकसी भी भूनिम या उसक े निहQसे को निबCी, बं क, उपहार, पट्टे या अन्यर्थीा निकसी माध्यम से ब क Qर्थीानां रिर नहीं करेगा जब क निक उसने ारा 6 क े ह एक बयान प्रQ ु नहीं निकया है और उसक े पास अति रिरd खाली भूनिम क े बारे में अति सूचना ारा 10 की उप- ारा (1) क े ह प्रकाभिश की गई है और इस प्राव ान क े उzंघन में निकए गए ऐसे निकसी भी हQ ां रण को अक ृ और शून्य माना जाएगा।" ारा 27 (1) आगे प्राव ान कर ी हैः “(1) त्समय प्रवृत्त निकसी अन्य निवति में निकसी बा क े हो े हुए भी, किंक ु ारा 5 की उप ारा (3) और ारा 10 की उप ारा (4) क े उपबं ों क े अ ीन रह े हुए, कोई व्यनिd निवCय, बं क, उपहार, दस वर्ष! से अति क की अवति क े लिलए पट्टा या अन्यर्थीा निकसी माध्यम से, कोई शहरी या शहरीकरण भूनिम का कोई भवन (चाहे इस अति निनयम क े प्रारंभ क े पूव! या प„ा ् निनर्विम निकया गया हो) या ऐसे प्रव !न से या उस ारीख से, जिजस पर भवन का निनमा!ण निकया गया है, जो भी प„ा व 4 हो, से दस वर्ष! की अवति क े लिलए Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ऐसे भवन क े निकसी भाग मात्र का अं रण नहीं करेगा, जिसवाय सक्षम प्राति कारी की पूव! लिललिख अनुमति क े ।”
19. ारा 5 (3) में कहा गया है निक अति निनयम क े प्रारंभ होने से पहले अति कत्तम सीमा से अति क भूनिम रखने वाला व्यनिd ब क भूनिम का अं रण नहीं करेगा जब क निक (क) भूनिम Qवामी ने ारा 67 क े ह एक बयान प्रQ ु नहीं निकया है और (ख) सक्षम प्राति कारी ने ारा 10(1)8 क े ह अति रिरd भूनिम से संबंति अति सूचना प्रकाभिश की है। प्रर्थीम प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में जानिहद हुसैन द्वारा कभिर्थी अं रण ारा 5 की उप ारा (3) में निननिह निनर्षे क े निवपरी है। यूएलसीआरए की ारा 8(4) क े ह 16 माच! 1988 क े प्रारंभिभक आदेश क े अनुसार, 27 जिस ंबर 1988 को यूएलसीआरए की ारा 10(1) क े ह एक अति सूचना प्रकाभिश की गई र्थीी। हालाँनिक, जब जिजला न्याया ीश द्वारा आदेश को अपाQ कर निदया गया र्थीा और मामले को सक्षम प्राति कारी को वापस भेज 7"6. (1) इस अति निनयम क े प्रारंभ होने पर अति क म सीमा से अति क खाली भूनिम रखने वाला प्रत्येक व्यनिd, ऐसी अवति क े भी र, जो निन ा!रिर की जाए, अति कारिर ा रखने वाले सक्षम प्राति कारी क े समक्ष एक बयान दालिखल करेगा, जिजसमें उसक े द्वारा ारिर (उसक े अति कार, शीर्ष!क या उसमें निह सनिह ), उसक े पास (उसक े अति कार, शीर्ष!क या ब्याज की प्रक ृ ति सनिह ) Qर्थीान, सीमा, मूल्य और ऐसी अन्य निवशेर्ष ाएं, जो सभी खाली भूनिम और निकसी अन्य भूनिम क े बारे में निन ा!रिर की जा सक ी हैं, जिजस पर भवन है, चाहे उसमें निनवास हो या न हो, का उzेख होगा और उसमें अति कत्तम सीमा क े भी र खाली भूनिम को निनर्विदष्ट करना होगा जिजसे वह बनाए रखना चाह ा है [..] (2) [...] (क) [...] (ख) ऐसे निकसी राज्य में, जो संनिव ान क े अनु•–ेद 252 क े अ ीन इस अति निनयम को अंगीकार कर ा है, कोई भी व्यनिd इस अति निनयम क े प्रारंभ पर, अति क म सीमा से अति क खाली भूनिम रख ा है, ब, उप ारा (1) में अं र्विवष्ट निकसी बा क े हो े हुए भी, वह ऐसे व्यनिd पर, जो उसे उप- ारा (1) में संदर्भिभ बयान दालिखल करने की अपेक्षा कर ा है, ऐसी अवति क े भी र, जो सूचना में निवनिनर्विदष्ट की जाए, नोनिटस दे सक े गा।" 8"10. (1) संबंति व्यनिd पर ारा 9 क े ह बयान की ानिमल क े बाद जैसे ही हो सक ा है, सक्षम प्राति कारी अति कत्तम सीमा से अति क ऐसे व्यनिd द्वारा ारिर खाली भूनिम क े निववरण दे े हुए एक अति सूचना देगा और जिजसमें कहा जाएगा निक-(i) ऐसी खाली भूनिम का अति ग्रहण संबंति राज्य सरकार द्वारा निकया जाना है और (ii) ऐसी खाली भूनिम में निह ब} सभी व्यनिdयों क े दावे व्यनिdग रूप से या उनक े एजेंटों द्वारा ऐसी भूनिम में उनक े निह ों की प्रक ृ ति का निववरण दे े हुए, संबंति राज्य क े आति कारिरक राजपत्र में और ऐसे अन्य रीक े से जो निन ा!रिर निकया जा सक ा है, आम जन ा की जानकारी क े लिलए प्रकाभिश निकया जाएगा।" Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA निदया गया र्थीा, ारा 8(4) क े ह कोई और आदेश पारिर नहीं निकया गया र्थीा और परिरणामQवरूप, ारा 10(1) क े ह कोई अति सूचना प्रकाभिश नहीं की गई र्थीी। इस प्रकार, प्रासंनिगक समय में, जो निक 6 जनवरी 1993 क े आदेश, जब मामले को सक्षम प्राति कारी को भेज गया और 22 जून 1993 को जब निबCी निवलेख निनष्पानिद निकया गया र्थीा, क े बीच र्थीा ब यूएलसीआरए की ारा 10(1) क े ह कोई अति सूचना नहीं र्थीी। इस प्रकार, ारा 5(3) क े ह एक वै अं रण क े लिलए दोनों अपेक्षाओं को पूरा नहीं निकया गया र्थीा। ारा 5(3) क े प्राव ानों क े उzंघन में कोई भी Qर्थीानां रण अक ृ और शून्य होगा।पहले प्रत्यर्थी4 द्वारा संस्थिQर्थी वाद जानिहद हुसैन द्वारा अं रण क े आ ार पर हक क े उसक े कभिर्थी दावे पर संस्थिQर्थी निकया गया र्थीा और मात्र इस आ ार पर निवफल होने योग्य र्थीा।
20. निवचारण न्यायालय क े निनण!य में इस थ्य का एक निवभिशष्ट निनष्कर्ष! है निक 5 मई 1993 को जानिहद हुसैन को 1295.04 वग! मीटर भूनिम क े हQ ां रण क े लिलए जो अनुमति जारी की गई र्थीी, वह 29 माच! 1993 क े पहले क े आदेश क े संशो न में र्थीी। अनुमति 2000 वग! मीटर भूनिम क े संबं में र्थीी जिजसे जानिहद हुसैन द्वारा बरकरार रखा गया र्थीा। उच्च न्यायालय ने इस थ्य क े निनष्कर्ष! को निबल्क ु ल भी संदर्भिभ नहीं निकया है और न ही इस निनष्कर्ष! को हटाने क े लिलए कोई ठोस आ ार पाया है। इसक े अलावा, यह Qपष्ट है, निक सक्षम प्राति कारी क े आदेश निदनांक 16 माच! 1988 को जिजला न्याया ीश द्वारा 6 जनवरी 1993 को अपील में अपाQ निकया गया र्थीा और संशोति माQटर प्लान क े मद्देनजर अति रिरd भूनिम को नए जिसरे से अति निनण[4] करने क े लिलए मामला प्रति प्रेनिर्ष निकया गया र्थीा। ऐसी अवQर्थीा में, जब मामला प्रति प्रेनिर्ष निकया गया र्थीा, ो जानिहद हुसैन ारा 5 (3) क े प्राव ानों में निननिह Qपष्ट वज!न क े संबं में वादग्रQ संपलित्त को हQ ां रिर नहीं निकया जा सक ा र्थीा। भूनिम का कोई भी अं रण निवति क रूप से नहीं निकया Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जा सक ा र्थीा और प्राव ान क े उzंघन में ऐसा कोई भी अं रण अक ृ और शून्य होगा।
21. उपरोd निनष्कर्षž क े अलावा जो मुकदमे क े आ ार को नकार े हैं, अपीलक ा!-प्रति वादी ने यूएलसीआरए क े ह क्षेत्राति कार पर रोक को देख े हुए, व !मान मुकदमे पर निवचार करने क े लिलए निवचारण न्यायालय क े अति कार क्षेत्र पर भी आपलित्त ज ाई है। अपीलक ा! ने कहा है निक पहले प्रत्यर्थी4 ने यूएलसीआरए क े ह या ो उत्तर प्रदेश राज्य या सक्षम प्राति कारी को पक्षकार बनाये निबना, यूएलसीआरए क े ह काय!वाही क े पूरे निवQ ार को निववानिद बनाया। शुरुआ में, हम ध्यान दे े हैं निक मुकदमे में निवचारण न्यायालय क े अति कार क्षेत्र की कमी का आ ार प्रर्थीम Q र क े न्यायालय क े समक्ष काय!वाही में उठाया गया र्थीा। निवचारण न्यायालय ने अपीलक ा!-प्रति वादी द्वारा इसक े क्षेत्राति कार क े प्रयोग पर उठाई गई आपलित्त को खारिरज कर निदया, जिजसमें कहा गया र्थीा निक नीलामी निबCी क े लिखलाफ घोर्षणात्मक अनु ोर्ष और निनर्षे ाज्ञा क े लिलए मुकदमे पर निवचार नहीं निकया जा सक ा है। उच्च न्यायालय क े समक्ष पहले प्रत्यर्थी4 द्वारा दायर निवचारण न्यायालय क े निनण!य क े लिखलाफ अपील में, अपीलक ा! ने इसक े क्षेत्राति कार क े प्रयोग पर निवचारण न्यायालय क े इस निनष्कर्ष! क े लिखलाफ प्रत्याक्षेप दालिखल नहीं निकया। अपीलक ा! ने इस न्यायालय क े समक्ष आग्रह निकया है निक दीवानी न्यायालय क े अति कार क्षेत्र को यूएलसीआरए क े प्राव ानों क े ह निववतिक्ष रूप से बाहर रखा गया है। सीपीसी क े आदेश XLI निनयम 22 पर अपीलक ा! द्वारा यह क ! देने क े लिलए अवलम्ब लिलया गया है निक जिजस पक्षकार क े पक्ष में दीवानी अदाल ने मुकदमे में ति8Cी दी है, वह अपील में प्रत्याक्षेप दालिखल निकए निबना निनष्कर्षž क े लिखलाफ क ! दे सक ा है।
22. आदेश XLI निनयम 22(1) निनम्नलिललिख शब्दों में हैः Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA “(1) कोई भी प्रत्यर्थी4, यद्यनिप उसने ति8Cी क े निकसी भाग क े निवरू} अपील न की हो, न क े वल ति8Cी का समर्थीन! कर सक े गा [बस्थिल्क यह कर्थीन भी कर सक े गा निकसी अ ीनQर्थी न्यायालय में उसक े निवरू} निकसी निववाद्यक की बाब निनणय! उसक े पक्ष में होना चानिहए र्थीा और ति8Cी क े निवरू} कोई ऐसा प्रत्याक्षेप भी कर सक े गा] जो वह अपील द्वारा कर सक ा र्थीा परन् ु यह ब जब निक उसने ऐसा आक्षेप अपील न्यायालय में उस ारीख से एक मास क े भी र जिजसको उस पर या उसक े प्ली8र पर अपील की सुनवाई क े लिलए निनय निदन की सूचना की ामील हुई र्थीी, या ऐसे अति रिरd समय क े भी र जिजसे अनुज्ञा करना अपील न्यायालय ठीक समझे, दालिखल कर निदया हो। [Qपष्टीकरण- कोई प्रत्यर्थी4 जो निनणय! में उस न्यायालय क े निकसी ऐसे निनष्कर्ष! से व्यभिर्थी है, जिजस पर ति8Cी आ ारिर है जिजसक े निवरू} अपील की गई है इस निनयम क े अ ीन प्रत्याक्षेप, जहां क निक वह ति8Cी उस निनष्कर्ष! पर आ ारिर है, इस बा क े हो े हुए भी दालिखल कर सक े गा निक न्यायालय क े निकसी अन्य निनष्कर्ष! पर जो उस वाद क े निवनिन„य क े लिलए पया!प्त है निवनिन„य क े कारण वह ति8Cी पूण !: या भाग: उस प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में है।]" आदेश XLI निनयम 22 सीपीसी को 1 फरवरी 1977 से प्रभावी सीपीसी संशो न (1976 का अति निनयम 104) द्वारा संशोति निकया गया र्थीा। संशो न पूव! और संशो न क े बाद क े प्राव ान का पाठ नीचे पुनः प्रQ ु निकया गया हैः इसक े संशो न से पहले, आदेश XLI निनयम 1976 क े अति निनयम 104 द्वारा यर्थीा संशोति आदेश XLI निनयम 22
22. सुनवाई में प्रत्यर्थी4 ति8Cी क े निवरू} ऐसे आक्षेप कर सक े गा मानो उसने पृर्थीक अपील की हो- (1) कोई भी प्रत्यर्थी4, यद्यनिप उसने ति8Cी क े निकसी भाग क े निवरू} अपील न की हो,
22. सुनवाई में प्रत्यर्थी4 ति8Cी क े निवरू} ऐसे आक्षेप कर सक े गा मानो उसने पृर्थीक अपील की हो- (1) कोई भी प्रत्यर्थी4, यद्यनिप उसने ति8Cी क े निकसी भाग क े निवरू} अपील न की हो, न Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न क े वल अ ीनQर्थी न्यायालय में उसक े निवरू} निनण[4] निकसी भी आ ार पर ति8Cी का समर्थीन! कर सक े गा, बस्थिल्क ति8Cी क े निवरू} कोई ऐसा प्रत्याक्षेप भी कर सक े गा जो वह अपील द्वारा कर सक ा र्थीा परन् ु यह ब जब निक उसने ऐसा आक्षेप अपील न्यायालय में उस ारीख से एक मास क े भी र जिजसको उस पर या उसक े प्ली8र पर अपील की सुनवाई क े लिलए निनय निदन की सूचना की ामील हुई र्थीी, या ऐसे अति रिरd समय क े भी र जिजसे अनुज्ञा करना अपील न्यायालय ठीक समझे, दालिखल कर निदया हो। क े वल ति8Cी का समर्थीन! कर सक े गा [बस्थिल्क यह कर्थीन भी कर सक े गा निकसी अ ीनQर्थी न्यायालय में उसक े निवरू} निकसी निववाद्यक की बाब निनणय! उसक े पक्ष में होना चानिहए र्थीा और ति8Cी क े निवरू} कोई ऐसा प्रत्याक्षेप भी कर सक े गा] जो वह अपील द्वारा कर सक ा र्थीा परन् ु यह ब जब निक उसने ऐसा आक्षेप अपील न्यायालय में उस ारीख से एक मास क े भी र जिजसको उस पर या उसक े प्ली8र पर अपील की सुनवाई क े लिलए निनय निदन की सूचना की ामील हुई र्थीी, या ऐसे अति रिरd समय क े भी र जिजसे अनुज्ञा करना अपील न्यायालय ठीक समझे, दालिखल कर निदया हो। [Qपष्टीकरण- कोई प्रत्यर्थी4 जो निनणय! में उस न्यायालय क े निकसी ऐसे निनष्कर्ष! से व्यभिर्थी है, जिजस पर ति8Cी आ ारिर है जिजसक े निवरू} अपील की गई है इस निनयम क े अ ीन प्रत्याक्षेप, जहां क निक वह ति8Cी उस निनष्कर्ष! पर आ ारिर है, इस बा क े हो े हुए भी दालिखल कर सक े गा निक न्यायालय क े निकसी अन्य निनष्कर्ष! पर जो उस वाद क े निवनिन„य क े लिलए पया!प्त है निवनिन„य क े कारण वह ति8Cी पूण !: या भाग: उस प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में है।] (प्रभाव वर्ति ) Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
23. बनारसी और अन्य बनाम राम फल[9] में संशो न क े प्रभाव पर निवचार निकया गया र्थीा, जहां इस न्यायालय ने माना निक 1976 क े संशो न क े बाद, प्रत्यर्थी4 निनचली अदाल क े 'निनष्कर्षž' क े लिखलाफ प्रत्याक्षेप दालिखल कर सक ा र्थीा, जबनिक पहले प्रत्याक्षेप क े वल भी दालिखल निकया जा सक ा र्थीा जब निनचली अदाल का फ ै सला आंभिशक रूप से प्रत्यर्थी4 क े लिखलाफ र्थीा। न्यायमूर्ति आर.सी. लाहोटी ( त्कालीन मुख्य न्याया ीश क े रूप में), ने दो न्याया ीशों की पीठ क े लिलए बोल े हुए संप्रेतिक्ष निकयाः "10-. [...] ीन स्थिQर्थीति यां हो सक ी हैंः (i) आक्षेनिप ति8Cी आंभिशक रूप से अपीलक ा! क े पक्ष में और आंभिशक रूप से प्रति वादी क े पक्ष में है। (ii) ति8Cी पूरी रह से प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में है, हालांनिक प्रत्यर्थी4 क े लिखलाफ एक वाद-निबन्दु य निकया गया है। (iii) ति8Cी पूरी रह से प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में है और सभी निववाद्यकों का उत्तर भी े पक्ष में निदया गया है, लेनिकन निनण!य में कोई निनष्कर्ष! है जो प्रत्यर्थी4 क े लिखलाफ जा ा है।
11. (i) प्रकार क े मामले में प्रत्यर्थी4 क े लिलए अपील दायर करना या ति8Cी क े उस भाग क े लिखलाफ प्रत्याक्षेप लेना आवश्यक र्थीा जो उसक े लिखलाफ है यनिद वह इससे – ु टकारा पाने का प्रयास कर ा है हालांनिक ति8Cी का वह भाग जो उसक े पक्ष में है वह निबना निकसी प्रत्याक्षेप क े समर्थी!न का हकदार है।कानून संशो न क े बाद भी बना हुआ है। (ii) और (iii) प्रकार क े मामलों में सीपीसी क े पूव!-संशो न ने प्रत्यर्थी4 को कोई प्रत्याक्षेप लेने का अति कार नहीं निदया और न ही अनुमति दी क्योंनिक वह ति8Cी से पीनिड़ व्यनिd नहीं र्थीा। संशोति सीपीसी क े ह, Qपष्टीकरण क े आलोक में पढ़ें, हालांनिक अभी भी प्रत्यर्थी4 क े
9. (2003) 9 एससीसी 606 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लिलए यह आवश्यक नहीं है निक वह उसक े निवपरी निकसी निनष्कर्ष! को चुनौ ी देने क े लिलए कोई प्रत्याक्षेप ले, क्योंनिक ति8Cी पूरी रह से उसक े पक्ष में है और वह निबना प्रत्याक्षेप क े ति8Cी का समर्थी!न कर सक ा है; उप-निनयम (1) क े पाठ्य में निकए गए संशो न, सपनिठ नया अं ःQर्थीानिप Qपष्टीकरण, उसे निकसी वादनिबन्दु का जवाब दे े समय या निकसी वादनिबन्दु से संव्यवहार करने क े दौरान उसक े लिखलाफ दज! निकए गए निनष्कर्ष! पर प्रत्याक्षेप लेने का अति कार दे ा है। इस रह क े प्रत्याक्षेप करने क े लाभ उप-निनयम (4) द्वारा निदए गये हैं। मूल अपील को वापस लेने या चूक क े लिलए खारिरज होने क े बावजूद, प्रत्यर्थी4 द्वारा निकसी निनष्कर्ष! पर लिलया गया प्रत्याक्षेप अभी भी गुणावगुण क े आ ार पर अति निनण[4] करने क े लिलए उपलब् होगा, जो अनु ोर्ष, गैर- संशोति सीपीसी क े ह प्रत्यर्थी4 को उपलब् नहीं र्थीे। संशो न पूव! युग में, मूल अपील को वापस लेने या चूक क े रूप में खारिरज होने ने प्रत्यर्थी4 को े लिखलाफ दज! निकसी भी निनष्कर्ष! की शु} ा या अन्यर्थीा पर सवाल उठाने क े लिलए अक्षम कर निदया।"
24. सीपीसी क े आदेश XLI निनयम 22(2) में कहा गया है निक "प्रत्याक्षेप" एक ज्ञापन क े रूप में दालिखल निकया जाएगा और निनयम 1 क े प्राव ान, जहां क वे अपील क े ज्ञापन क े रूप और अं व!Q ु से संबंति हैं, वहां लागू होंगे।" एस नजीर अहमद बनाम Qटेट बैंक ऑफ मैसूर10 में, इस अदाल ने आदेश XLI निनयम 22 सीपीसी क े ह की गई आपलित्तयों क े रूप पर निवQ ार से ब ाया। नजीर अहमद (उपरोd) में, प्रत्यर्थी4 ने एक सास्थिम्यक बं क क े प्रव !न क े लिलए मुकदमा दायर निकया र्थीा। वाद का फ ै सला कर े हुए, निवचारण न्यायालय ने अपीलक ा!- प्रति वादी क े क ! को खारिरज कर निदया और कहा निक वाद सीपीसी क े आदेश II निनयम 2 द्वारा वर्जिज नहीं र्थीा। हालांनिक, न्यायालय ने परिरसीमा क े आ ार पर
10. (2007) 11 एससीसी 75 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA वाद को खारिरज कर निदया।उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रत्यर्थी4 द्वारा दायर अपील पर, उच्च न्यायालय ने संप्रेतिक्ष निकया निक यद्यनिप सीपीसी क े आदेश II निनयम 2 द्वारा वाद वर्जिज र्थीा, अपीलक ा! ने प्रत्याक्षेप का ज्ञापन दालिखल करक े निवचारण े इस निनष्कर्ष! को चुनौ ी नहीं दी र्थीी।।इस प्रकार, उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थी4 को अपीलक ा! क े लिखलाफ एक ति8Cी प्रदान की।जब उच्च न्यायालय क े इस निनष्कर्ष! को इस न्यायालय क े समक्ष चुनौ ी दी गयी, ो न्यायमूर्ति पी.क े. बालसुब्रमण्यम ने कहा निक आदेश XLI निनयम 22 का सहारा ले े समय, प्रत्याक्षेप का एक ज्ञापन दालिखल करना क े वल ब आवश्यक है, जब प्रत्यर्थी4 निकसी अनु ोर्ष का दावा कर ा है जिजसे निवचारण न्यायालय द्वारा खारिरज कर निदया गया र्थीा या निवचारण न्यायालय द्वारा प्रदान निकए गए अनु ोर्ष क े अलावा एक अति रिरd अनु ोर्ष चाह ा है। न्यायालय ने कहा निक जब अपीलक ा! क े वल निनचली अदाल क े 'निनष्कर्ष!' को चुनौ ी दे ा है, ो आपलित्त क े ज्ञापन को दालिखल करने की आवश्यक ा नहीं हैः "7. हमारे निवचार में, उच्च न्यायालय यह मानने में Qपष्ट रूप से त्रुनिटपूण! र्थीा निक अपीलक ा! ने संनिह ा क े आदेश 41 निनयम 22 क े संदभ! में प्रत्याक्षेप का ज्ञापन दालिखल नहीं निकया है, इसलिलए निवचारण न्यायालय क े निनष्कर्ष! को चुनौ ी नहीं दे सक ा है वह मुकदमा संनिह ा क े आदेश 2 निनयम 2 द्वारा वर्जिज नहीं र्थीा। अपील में प्रत्यर्थी4 उसक े लिखलाफ निवचारण न्यायालय द्वारा निदए गए निकसी भी निनष्कर्ष! को चुनौ ी देकर भी निवचारण न्यायालय क े ति8Cी का समर्थी!न करने का हकदार है। निवचारण न्यायालय द्वारा पारिर ति8Cी का समर्थी!न करने क े लिलए, अपील में निकसी प्रत्यर्थी4 क े लिलए यह आवश्यक नहीं है निक वह उसक े लिखलाफ निवचारण न्यायालय द्वारा निदए गए एक निवशेर्ष निनष्कर्ष! को चुनौ ी दे े हुए प्रत्याक्षेप का एक ज्ञापन दालिखल करे, जब अंति म ति8Cी Qवयं उसक े पक्ष में हो। प्रत्याक्षेपों क े निकसी ज्ञापन की आवश्यक ा क े वल भी हो ी है जब प्रत्यर्थी4 निकसी अनु ोर्ष का दावा कर ा है जो निवचारण न्यायालय द्वारा उसक े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लिखलाफ र्थीी और इसक े अलावा ब जब वह पहले से ही चुनौ ी क े अ ीन ति8Cी द्वारा निदया गया हो। इसलिलए हमें अपीलक ा! क े निवद्वान अति वdा क े कž को Qवीकार करने में कोई संकोच नहीं है निक उच्च न्यायालय इस आ ार पर काय!वाही करने में त्रुनिटपूण! र्थीा निक अपीलक ा! ने प्रत्याक्षेपों का ज्ञापन दालिखल नहीं निकया है, ो वह निवचारण न्यायालय द्वारा प्रदान निकए गए आदेश 2 निनयम 2 क े रोक पर निनष्कर्ष! की शु} ा को चुनौ ी देने का हकदार नहीं र्थीा।"
25. आदेश XLI निनयम 22 सीपीसी और उपरोd प्राति कारों क े संशोति प्राव ानों से यह Qपष्ट है निक दो परिरव !न हैं जो 1976 क े संशो न द्वारा लाए गए र्थीे।पहला, निनचली अदाल क े 'निनष्कर्षž' क े लिखलाफ आपलित्तयों को शानिमल करने क े लिलए एक प्रत्याक्षेप दालिखल करने क े दायरे को काफी बढ़ाया गया र्थीा; दूसरा, प्रत्याक्षेप करने क े निवभिभन्न रूपों को मान्य ा दी गई र्थीी। संशो न में निनष्कर्षž और ति8निCयों को चुनौ ी देने क े लिलए प्रत्याक्षेप क े निवभिभन्न रूप प्रQ ु निकए गए र्थीे क्योंनिक संशो न वाक्यांश "बस्थिल्क यह कर्थीन भी कर सक े गा निक निकसी अ ीनQर्थी न्यायालय में उसक े निवरू} निकसी निववाद्यक की बाब निनणय! उसक े पक्ष में होना चानिहए र्थीा" को अ}!निवराम द्वारा वाक्यांश "ति8Cी पर कोई आपलित्त भी ले सक ा है" से अलग कर ा है। इसलिलए वाक्य क े दो भागों को अलग-अलग रूप से पढ़ा जाना चानिहए।क े वल जब ति8Cी क े एक भाग को प्रत्यर्थी4 द्वारा चुनौ ी दी गयी है, ो प्रत्याक्षेप का एक ज्ञापन दायर निकया जाना चानिहए।अन्यर्थीा, अपीलीय े समक्ष निबना निकसी प्रत्याक्षेप क े, प्रर्थीम बार क े न्यायालय क े प्रति क ू ल निनष्कर्ष! को चुनौ ी देना पया!प्त है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
26. संनिव ान क े अनु•–ेद 136 क े ह इस न्यायालय क े समक्ष काय!वाही क े लिलए आदेश XLI निनयम 22 सीपीसी में जिस}ां की प्रयोज्य ा को संनिव ान पीठ ने रमनभाई आशाभाई पटेल बनाम 8ाभी अजिज क ु मार फ ु लसिंसजी11 क े निनण!य में निवचार निकया र्थीा। न्यायमूर्ति जे. आर. मु ोल्कर ने वभिशष्ठ नारायण शमा! बनाम देव चन्द्र12 क े मामले में ीन न्याया ीशों की न्यायपीठ क े निनण!य को अभिभखंति8 कर निदया जिजसमें प्रत्यर्थी4 क े उस क ! को नामंजूर कर निदया र्थीा निक कोई पक्षकार निनण!य का समर्थी!न कर े हुए अपने निवरु} 'निनष्कर्षž' पर दलील उठा सक ा र्थीा। यह माना गया निक सीपीसी क े आदेश XLI निनयम 22 की प्रयोज्य ा अनु•–ेद 136 क े ह अपील पर नहीं है। रमनभाई आशाभाई पटेल (उपरोd) में, इस न्यायालय ने कहा निक सीपीसी क े आदेश XLI निनयम 22 क े प्राव ान सव च्च न्यायालय पर लागू नहीं हो े हैं और सव च्च न्यायालय क े निनयम निकसी अनुरूप उपबन् का प्राव ान नहीं कर े हैं। हालांनिक, यह माना गया र्थीा निक इस कमी को सीपीसी से पूरा निकया जाना चानिहएः "18. [...] इसक े अलावा हम सोच े हैं निक इसक े समक्ष अपील पर निवचार कर े समय इस न्यायालय क े पास उस निनण!य से उत्पन्न होने वाले सभी किंबदुओं पर निनण!य लेने की शनिd है जिजसक े लिखलाफ अपील की गई है और यहां क निक जिसनिवल प्रनिCया संनिह ा क े आदेश [4] निनयम 22 जैसे व्यd प्राव ान क े अभाव में यह सुनवाई में अपनाई जाने वाली उतिच प्रनिCया को ैयार कर सक ी है। जिसनिवल प्रनिCया संनिह ा जैसी सामान्य निवति क े प्राव ानों को लागू करने और उन प्राव ानों को अपनाना, जो उपयु!d हो, से बेह र कोई और रीका नहीं हो सक ा है।हम इस थ्य को नजरअंदाज नहीं कर सक े हैं निक आम ौर पर जिजस पक्षकार क े पक्ष में अपील में निनण!य निदया गया है, उसे अपील करने क े लिलए निवशेर्ष अनुमति नहीं दी जाएगी।इसलिलए न्याय क े निह क े
11. एआईआर 1965 एससी 669.
12. (1955) 1 एससीआर 509. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लिलए यह आवश्यक है निक इस न्यायालय को उपयुd मामलों में ऐसी स्थिQर्थीति में रखे गए पक्षकार को अपने पक्ष में निनण!य का समर्थी!न करने की अनुमति देनी चानिहए, भले ही उस निनण!य में नकारा गया हो।[…]” इस पर निवQ ार कर े हुए, जमशेद होमु!सजी वाति8या बनाम मुंबई पोट!13 में इस न्यायालय की दो न्याया ीशों की न्यायपीठ (न्यायमूर्ति आरसी लाहोटी ने Qवयं और न्यायमूर्ति बृजेश क ु मार की ओर से बोल े हुए) संप्रेतिक्ष निकयाः "35. निवद्वान अपर सॉलिलजिसटर जनरल द्वारा इस न्यायालय क े संज्ञान में कु – निनण!य लाए गए र्थीे, जिजसमें इस न्यायालय ने आदेश 41 निनयम 22 सीपीसी का संदभ! निदया है और प्रत्यर्थी4 को अपील क े ह उसक े लिखलाफ दज! निनष्कर्ष! या वाद निबन्दु को चुनौ ी दे े हुए ति8Cी या निनण!य का समर्थी!न करने की अनुमति दी है, हालांनिक आदेश, निनण!य या ति8Cी अन् में उसक े पक्ष में र्थीा। उदाहरण क े लिलए, रमनभाई आशाभाई पटेल [रमनभाई आशाभाई पटेल बनाम 8ाभी अजिज क ु मार फ ु लसिंसहजी, एआईआर 1965 एससी 669], उत्तर रेलवे कॉप. C े ति8ट सोसाइटी लिलनिमटे8 [उत्तर रेलवे कॉप. C े ति8ट सोसाइटी लिलनिमटे8 बनाम औद्योनिगक न्यायाति करण, एआईआर 1967 एससी 1182] और भार कला भं8ार (प्राइवेट) लिलनिमटे8 [भार कला भं8ार (प्राइवेट) लिलनिमटे8 बनाम नगरपालिलका सनिमति, मनगांव, एआईआर 1966 एससी 249] देखें, निवद्वान अपर सॉलिलजिसटर जनरल सही हैं। लेनिकन हम Qपष्ट करना चाहेंगे निक ऐसा इसलिलए नहीं निकया गया है क्योंनिक सीपीसी का आदेश 41 निनयम 22, संनिव ान क े ह दायर अपीलों पर लागू हो ा है; बस्थिल्क यह उच्च र अति कारिर ा क े न्यायालयों पर लागू न्याय क े एक मूलभू जिस}ां क े कारण है।एक व्यनिd जो पूरी रह से निनचली अदाल या न्यायाति करण क े समक्ष सफल हो गया है, वह क े वल एक प्रति क ू ल निनष्कर्ष! से या निकसी एक वाद निबन्दु पर प्रति क ू ल निनण!य क े प्रभाव से खुद को मुd करने क े लिलए अपील दायर
13. (2004) 3 एससीसी 214 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA नहीं कर सक ा है क्योंनिक वह 'पीनिड़ व्यनिd' क े अर्थी! क े ह आने वाला व्यनिd नहीं होगा। सामान्य जिस}ां क े रूप में, निकसी अपील या पुनरीक्षण में जिजस पक्षकार क े पास उसक े पक्ष में एक आदेश है, वह यह निदखाने का हकदार है निक भले ही आदेश उसक े पक्ष में य निकए गए आ ार पर अपाQ निकए जाने योग्य र्थीा, निफर भी अ ीनQर्थी न्यायालय में उसक े लिखलाफ य निकए गए निकसी अन्य आ ार पर निनष्कर्ष! को पलट े हुए आदेश बरकरार रह सक ा है। निवति की यह स्थिQर्थीति जिसनिवल प्रनिCया संनिह ा क े आदेश 41 निनयम 22 क े सहारे क े निबना सामान्य जिस}ां ों पर समर्भिर्थी है। नालकर्थी सैनुद्दीन बनाम कु रिरकदन सुलेमान [(2002) 6 एससीसी 1] और बनारसी बनाम राम फाल [(2003) 9 एससीसी 606] में इस न्यायालय क े हालिलया निनण!य का संदभ! हो सक ा है। इस न्यायालय को पूण! क्षेत्राति कार का न्यायालय होने क े ना े, एक बार मामला अपील में आने क े बाद कोई भी ति8Cी पारिर करने और कोई भी आदेश देने की शनिd होगी जिजसे मामले क े थ्यों और प्रयोज्य निवति पर पारिर निकया या निदया जाना चानिहए। इस न्यायालय द्वारा इस रह की शनिd का प्रयोग अपने क्षेत्राति कार क े आ ार पर निकया जा ा है, न निक आदेश 41 निनयम 33 सीपीसी का सहारा लेकर, हालांनिक क ु – मामलों में अवलोकन इस आशय क े लिलए उपलब् हैं निक यह न्यायालय आदेश 41 निनयम 33 सीपीसी से निनगम्य जिस}ां ों पर काय! कर सक ा है। यह जोड़ा जा सक ा है निक इस न्यायालय को इस रह क े ति8Cी को पारिर करने या ऐसा आदेश देने का अति कार है जो उसक े समक्ष लंनिब निकसी भी हे ुक या मामले में पूण! न्याय करने क े लिलए आवश्यक है।इस न्यायालय को संनिव ान क े अनु•–ेद 142 द्वारा ऐसी अति कारिर ा प्रदान की गई है और इस न्यायालय को जिसनिवल प्रनिCया संनिह ा क े निकसी प्राव ान या उसमें से निकसी भी जिस}ां को निनकालने की आवश्यक ा नहीं है। हालांनिक, निफर भी, व्यापक क्षेत्राति कार उपलब् होने क े बावजूद, यह न्यायालय आम ौर पर कोई आदेश, निनद•श या ति8Cी नहीं करेगा जो पक्षकार को अपील करने की स्थिQर्थीति में उससे अति क नुकसानदेह स्थिQर्थीति में रखे, जो निक यह अपील नहीं की गई हो ी ो हो ी।" Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
27. उपरोd प्राति कारों क े अवलोकन पर, यह Qपष्ट है निक सीपीसी क े आदेश XLI निनयम 22 में निन ा!रिर जिस}ां संनिव ान क े ह यातिचकाओं पर लागू निकया जा सक ा है क्योंनिक इस न्यायालय को संनिव ान क े अनु•–ेद 142 क े ह न्याय करने क े लिलए व्यापक शनिdयां हैं।चूंनिक सीपीसी क े आदेश XLI निनयम 22 में जिस}ां 'पीनिड़ पक्षकार' क े अलावा अन्य पक्षकार को उसक े लिखलाफ निकए गए निकसी प्रति क ू ल निनष्कर्ष! को उठाने का प्राव ान करक े न्याय क े उद्देश्य को आगे बढ़ा ा है, यह न्यायालय आदेश XLI निनयम 22 सीपीसी का सहारा ले सक ी है और निनष्कर्षž पर आपलित्तयों को अनुमति प्रदान कर सक ी है।
28. उपरोd से, यह Qर्थीानिप निकया गया है निक यह आवश्यक नहीं है निक निनचली अदाल क े प्रति क ू ल निनष्कर्षž क े लिलए चुनौ ी को प्रत्याक्षेप क े रूप में बनाया जाना चानिहए। व !मान मामले में, हम ध्यान दे े हैं निक अपीलक ा! ने इस आ ार पर मुकदमा चलाने क े लिलए निवचारण न्यायालय क े क्षेत्राति कार पर आपलित्त ज ाई र्थीी निक निनर्षे ाज्ञा और घोर्षणात्मक अनु ोर्ष नहीं निदया जा सक ा र्थीा। हालांनिक निवचारण न्यायालय ने अपीलक ा! क े पक्ष में एक ति8Cी पारिर की र्थीी, लेनिकन उसने क्षेत्राति कार क े प्रश्न पर अपीलक ा! क े लिखलाफ निनण!य निदया र्थीा।इस निनष्कर्ष! को अपीलक ा! ने उच्च न्यायालय क े समक्ष प्रत्याक्षेप क े रूप में चुनौ ी नहीं दी र्थीी। उच्च न्यायालय क े निनण!य में यह उzेख नहीं है निक अपीलक ा! या एम8ीए द्वारा क्षेत्राति कार क े अभाव की दलील दी गई र्थीी। इस न्यायालय से पहले, अपीलक ा! ने जवाबी हलफनामा दायर नहीं निकया है, उसने उच्च न्यायालय क े समक्ष दायर निकया र्थीा।इस प्रकार, हमारे सामने अभिभलेख से जो निनष्कर्ष! निनकल ा है, वह यह है निक क्षेत्राति कार का आ ार क े वल अपीलक ा! Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA द्वारा निवचारण न्यायालय क े समक्ष उठाया गया र्थीा, न निक उच्च न्यायालय क े समक्ष। वाQ व में, इस न्यायालय को एक ऐसी यातिचका पर निनण!य देना होगा, जो हमारे सामने चुनौ ी में उच्च न्यायालय क े निनण!य का निहQसा नहीं र्थीा।
29. अनु•–ेद 136 क े ह एक निवशेर्ष अनुमति यातिचका में इस न्यायालय क े समक्ष उठाए जा रहे नए आ ारों क े संबं में, हम ध्यान दे े हैं निक सव च्च न्यायालय निनयमावली 2013 क े आदेश 21 निनयम 3(ग) क े ह, एसएलपी को अदाल क े समक्ष उन दलीलों क ही सीनिम रखा जाना चानिहए, जिजनक े आदेश को चुनौ ी दी गई है। हालांनिक, अदाल की अनुमति से, सुनवाई क े समय अति रिरd आ ार उठाये जा सक े हैं।
30. भार कला भं8ार (प्रा.) लिलनिमटे8 बनाम नगरपालिलका सनिमति 14 में, यह न्यायालय एक दीवानी अपील पर निवचार कर रहा र्थीा, जहां वाद में या उच्च े समक्ष अपील क े आ ार में कोई क ! उठाया नहीं गया र्थीा और पहली बार इस न्यायालय क े समक्ष उठाया गया र्थीा। यद्यनिप न्यायालय ने उzेख निकया निक अपील क े दायरे को पक्षकारों क े कहने पर बढ़ाया नहीं जा सक ा है, यनिद कोई दलील व्यापक महत्व का सवाल उठा ी है, ो इस न्यायालय द्वारा उस पर निवचार निकया जा सक ा है। इसी रह क े मामले, वसं क ु मार रा ानिकशन वोरा बनाम बम्बई बंदरगाह, न्यासी बो8!15 में इस न्यायालय ने उzेख निकया निक निवति क े निवशु} प्रश्न जो निकसी मामले में क्षेत्राति कार की मूल क जा े हैं, पहली बार संनिव ान क े ह अपील में उठाए जा सक े हैं।
14. एआईआर 1966 एससी 249
15. (1991) 1 एससीसी 761 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
31. चंनिद्रका निमजिसर बनाम भैया लाल16 में, यह न्यायालय वादग्रQ संपलित्त पर पक्षकारों क े कब्जे क े संबं में एक निवशेर्ष अनुमति यातिचका पर सुनवाई कर रहा र्थीा जो उ.प्र. जमींदारी उन्मूलन और भूनिम सु ार अति निनयम (1951 का अति निनयम 1) का निवर्षय र्थीा। इसको अति निनण[4] कर े हुए निक क्या मुकदमा परिरसीमा द्वारा वर्जिज र्थीा, न्यायमूर्ति 8ीजी पालेकर ने दो न्याया ीशों की पीठ क े लिलए बोल े हुए कहा निक दीवानी अदाल क े पास मुकदमे पर निवचार करने का क्षेत्राति कार नहीं र्थीा। यद्यनिप क्षेत्राति कार पर रोक की दलील अ ीनQर्थी न्यायालय में नहीं उठाई गई र्थीी, न्यायालय ने कहा निकः "6. यह इस आदेश से है निक व !मान अपील निवशेर्ष अनुमति द्वारा दायर की गई है।यह ध्यान निदया जाना चानिहए निक कब्जे क े लिलए दीवानी अदाल में मुकदमा दायर निकया गया र्थीा और परिरसीमा अति निनयम वह अति निनयम होगा जो इस रह क े मुकदमे पर शाजिस होगा।यह मामला नहीं है निक 1951 का यूपी अति निनयम 1, दीवानी न्यायालय में मुकदमा दायर करने को अति क ृ कर ा है और परिरसीमा अति निनयम द्वारा निवनिह सीमा को अति रोनिह करक े कब्जे का अनु ोर्ष देने क े लिलए परिरसीमा की अवति निन ा!रिर कर ा है। इसलिलए, यह पूरी रह से क ! योग्य र्थीा निक यनिद वाद दीवानी न्यायालय द्वारा निवचार योग्य है ो परिरसीमा की अवति को परिरसीमा अति निनयम क े प्राव ानों द्वारा शाजिस निकया जाना चानिहए और निकसी अन्य द्वारा नहीं।उस मामले में वानिदयों क े पक्ष में कब्जे क े लिलए एक ति8Cी पारिर करने क े अलावा कोई निवकल्प नहीं हो ा। लेनिकन पूरे मामले का दुभा!ग्यपूण! निहQसा यह है निक दीवानी न्यायालय क े पास मुकदमे पर निवचार करने क े लिलए कोई क्षेत्राति कार नहीं र्थीा। यह सच है निक क्षेत्राति कार क े संबं में इस रह क े क ! को निवचारण न्यायालय में प्रति वादी द्वारा नहीं उठाया गया र्थीा, लेनिकन जहां न्यायालय क े क्षेत्राति कार में Qवाभानिवक रूप से कमी है, निकसी भी Q र पर और यहां क निक निनष्पादन की काय!वाही में भी इस आ ार पर दलील उठायी जा सक ी है निक ति8Cी शून्य र्थीी और यह श्री योगेश्वर प्रसाद
16. (1973) 2 एससीसी 474 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA द्वारा Qवीकार निकया गया है। यनिद कोई 1951 क े उ.प्र. अति निनयम 1 की ारा 209 और 331 को एक सार्थी पढ़ ा है, ो यह प ा चल ा है निक हमारे समक्ष जैसे मामलों को परिरसीमा अवति क े भी र निवशेर्षकर अति निनयम क े ह बनाए गए निनयमों क े ह निवनिह, अति निनयम क े ह सृजिज निवशेर्ष न्यायालय में दायर निकया जाना चानिहए और सा ारण रह क े दीवानी न्यायालय का क्षेत्राति कार पूरी रह वर्जिज है।"
32. मोQट रेव. पी.एम.ए. मेट्रोपॉलिलटन बनाम मोरन मार मारर्थीोमा17 में भी, इस न्यायालय की ीन न्याया ीशों की पीठ ने सीपीसी की ारा 9 क े ह मुकदमे की पोर्षणीय ा को संबं में आपलित्त पर निवचार निकया, हालांनिक इस दलील को अ ीनQर्थी न्यायालय क े समक्ष नहीं उठाया गया र्थीा। न्यायालय ने संप्रेतिक्ष निकया निक क्षेत्राति कार पर रोक या कमी की दलील पर निकसी भी Q र पर निवचार निकया जा सक ा है, क्योंनिक क्षेत्राति कार क े निबना पारिर कोई आदेश या ति8Cी निवति में कोई अस्थिQ त्व नहीं रख ा है।
33. संनिव ान क े अ ीन दांति8क काय!वानिहयों में भी निवति की इस स्थिQर्थीति को लगा ार लागू निकया गया है। मसल ी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य18 में, उच्च न्यायालय द्वारा कई आरोपी व्यनिdयों की मौ की सजा की पुनिष्ट को इस अदाल क े सामने चुनौ ी दी गयी र्थीी।मुख्य न्याया ीश गजेन्द्रगढ़कर ने इस न्यायालय की चार न्याया ीशों की पीठ क े लिलए बोल े हुए कहा निकः “11. हम श्री साहनी क े इस क ! को Qवीकार करने क े लिलए ैयार नहीं हैं निक भले ही यह किंबदु अपीलक ा!ओं द्वारा उच्च न्यायालय क े समक्ष नहीं उठाया गया र्थीा, निफर भी वे हमें इस थ्य क े संबं में उस किंबदु पर निवचार करने क े लिलए
17. 1995 सप्लीमेंट (4) एससीसी 286
18. एआईआर 1965 एससी 202 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कहने क े हकदार हैं निक 10 व्यनिdयों को फांसी देने का आदेश निदया गया है। यह माना जा सक ा है निक यनिद थ्य का कोई किंबदु जो Qपष्ट रूप से अभिभलेख पर उत्पन्न हो ा है, या निवति का कोई किंबदु जो सुसंग और ास्थित्वक है और निबना निकसी अन्य सबू क े क ! निदया जा सक ा है, निवचारण न्यायालय क े समक्ष क ! निदया गया र्थीा और इसक े द्वारा खारिरज कर निदया गया र्थीा, उच्च े समक्ष इसे दोहराया नहीं गया र्थीा, यह एक उतिच मामले में अपीलक ा!ओं को संनिव ान क े ह अपील में इस किंबदु पर निवचार करने क े लिलए इस न्यायालय से कहने क े लिलए अनुम हो सक ा है; आलिखरकार इस प्रक ृ ति की आपराति क काय!वाही में जहां अपीलक ा!ओं पर मौ की सजा सुनाई जा ी है, क े वल इस आ ार पर थ्य व निवति की सुसंग और ास्थित्वक दलीलों पर निवचार करने से इनकार करना उतिच नहीं हो सक ा है निक उन्हे उच्च न्यायालय क े समक्ष उठाया नहीं गया र्थीा। यनिद यह निदखाया जा ा है निक वाQ व में उच्च न्यायालय क े समक्ष दलीलों दी गयी र्थीी और इसक े द्वारा निवचार नहीं निकया गया र्थीा, ो निनति„ रूप से, पक्षकार अति कार Qवरूप इस न्यायालय से उन दलीलों पर निनण!य प्राप्त करने का हकदार है। लेनिकन अन्यर्थीा भी अनु•–ेद 136 क े ह अपीलों में इस रह की दलीलों को उठाए जाने पर रोक लगाने क े लिलए कोई कठोर निनयम नहीं बनाया जा सक ा है।"
34. निवति की स्थिQर्थीति क े आ ार पर, हम अपीलक ा! को हमारे समक्ष क्षेत्राति कार का आ ार उठाने की अनुमति देने क े लिलए इसे न्यायोतिच पा े हैं।आ ार को उठाने की अनुमति देने क े लिलए अति रिरd सबू प्रQ ु करने की आवश्यक ा नहीं होगी क्योंनिक यह कानून का शु} प्रश्न है और मामले क े मूल पर प्रहार कर ा है।अब हम इस क ! क े गुणावगुण की ओर जाएँगे।
35. वाद क े अभिभकर्थीन दर्भिश कर े हैं निक पहले प्रत्यर्थी4 का मामला यह र्थीाः Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (i) ज़ानिहद हुसैन ने 22 जून 1993 को पहले प्रत्यर्थी4 क े पक्ष में भूनिम हQ ां रिर करने से पहले 5 मई 1993 को सक्षम प्राति कारी की अनुमति प्राप्त की र्थीी; (ii) यूएलसीआरए क े ह सीलिंलग काय!वाही क े परिरणामQवरूप सक्षम प्राति कारी क े एक आदेश निदनांक 16 माच! 1988 द्वारा 1295.04 वग! मीटर को अति शेर्ष घोनिर्ष निकया गया र्थीा, लेनिकन सक्षम प्राति कारी क े आदेश को 6 जनवरी 1993 को अपील में अपाQ कर निदया गया र्थीा और काय!वाही को वापस कर निदया गया र्थीा; (iii) निनरसन अति निनयम क े परिरणामQवरूप, यूएलसीआरए क े ह काय!वाही समाप्त हो गई; और (iv) पहला प्रत्यर्थी4 गाटा संख्या 200/1 क े 1295.04 वग! मीटर का मालिलक बना रहा, जबनिक एम8ीए गाटा संख्या 200/2 में क े वल 200 वग! मीटर भूनिम का मालिलक र्थीा। दूसरे शब्दों में, जिजस आ ार पर पहले प्रत्यर्थी4 ने एम8ीए द्वारा आयोजिज नीलामी की वै ा और निनर्षे ाज्ञा क े संबं में घोर्षणा की मांग की र्थीी, वह यूएलसीआरए क े ह काय!वाही का उपशमन र्थीा। इस रह क े मुकदमे की पोर्षणीय ा को शहरी भूनिम (अति कत्तम सीमा और निवनिनयमन) अति निनयम, 1976 क े ह सक्षम प्राति कारी, कलकत्ता बनाम 8ेनिव[8] मं ोर्ष19 में, इस न्यायालय क े दो निवद्वान न्याया ीशों क े एक निनण!य में निवचार निकया गया है। 8ेनिव[8] मोंटोश में, न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की खं8पीठ ने निवचार निकया निक क्या अति निनयम से उत्पन्न मामलों क े संबं में यूएलसीआरए द्वारा दीवानी े क्षेत्राति कार को अभिभव्यdः या निववतिक्ष रूप से बाहर रखा गया र्थीा।
19. (2020) 12 एससीसी 542 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA खं8पीठ ने ुलाभाई बनाम म.प्र. राज्य20 क े संनिव ान पीठ क े फ ै सले में प्रति पानिद परीक्षणों का उzेख निकया और अव ारिर निकयाः "45. त्कालीन निवद्वान मुख्य न्याया ीश निहदाय ुzाह ने अपनी अनिद्व ीय शैली में खं8पीठ क े लिलए बोल े हुए, उपरोd प्रश्न की जांच क े लिलए परीक्षण निन ा!रिर निकए।ये परीक्षण निनम्नानुसार हैंः( ुलाभाई वाद [ ुलाभाई बनाम म.प्र. राज्य, एआईआर 1969 एससी 78], एआईआर पृष्ठ 89-90, प्रQ र 32) "(1) जहां कानून निवशेर्ष न्यायाति करणों क े आदेशों को अंति म रूप दे ा है, ो दीवानी न्यायालयों क े क्षेत्राति कार को बाहर रखा जाना चानिहए यनिद दीवानी अदाल ें आम ौर पर एक मुकदमे में क्या करेंगी, इसक े लिलए पया!प्त उपाय हैं।हालांनिक इस रह क े प्राव ान उन मामलों को बाहर नहीं कर े हैं जहां निवशेर्ष अति निनयम क े प्राव ानों का अनुपालन नहीं निकया गया है या वै ानिनक न्यायाति करण ने न्यातियक प्रनिCया क े मूल जिस}ां ों क े अनुरूप काम नहीं निकया है। (2) जहां न्यायालय क े क्षेत्राति कार का अभिभव्यd वज!न है वहां उपबंति उपचार की पया!प्त ा का प ा लगाने क े लिलए निवभिशष्ट अति निनयम की योजना का परीक्षण सुसंग हो सक े गा किंक ु जिसनिवल े क्षेत्राति कार को बनाए रखने क े लिलए निनणा!यक नहीं है। जहां Qपष्ट रूप से बाहर नहीं रखा गया है, अनु ोर्ष का परीक्षण और निवशेर्ष अति निनयम की योजना का प ा लगाने क े लिलए अर्थीा!न्वयन(मं व्य) आवश्यक हो जा ा है और जांच का परिरणाम निनणा!यक हो सक ा है। बाद क े मामले में यह देखना आवश्यक है निक क्या क़ानून एक निवशेर्ष अति कार या दातियत्व बना ा है और अति कार या दातियत्व क े निन ा!रण क े लिलए प्राव ान कर ा है और आगे कह ा है निक उd अति कार और देय ा क े बारे में सभी प्रश्न इस प्रकार गनिठ
20. एआईआर 1969 एससी 78 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA न्यायाति करणों द्वारा निन ा!रिर निकए जाएंगे और क्या सामान्य रूप से जिसनिवल अदाल ों में कार!वाई से जुड़े अनु ोर्ष उd क़ानून द्वारा निवनिह हैं या नहीं। (3) निवशेर्ष अति निनयम क े अति कारा ी होने की चुनौ ी को उस अति निनयम क े ह गनिठ न्यायाति करणों क े समक्ष नहीं लाया जा सक ा है। यहां क निक उच्च न्यायालय भी न्यायाति करणों क े निनण!य में पुनरीक्षण या संदभ! होने पर, उस प्रश्न में नहीं जा सक ा है। (4) जब निकसी प्राव ान को पहले ही असंवै ानिनक घोनिर्ष निकया जा ा है या निकसी प्राव ान की संवै ानिनक ा को चुनौ ी निदया जाना है, ो एक मुकदमा करने का निवकल्प खुला हो ा है। उत्प्रेर्षण लेख में रिरफ ं 8 क े लिलए एक निनद•श हो सक ा है यनिद दावा Qपष्ट रूप से परिरसीमा अति निनयम द्वारा निन ा!रिर समय क े भी र है, लेनिकन यह मुकदमे को प्रति Qर्थीानिप करने क े लिलए एक अनिनवाय! उपाय नहीं है। ((5) एक वाद वहाँ उत्पन्न हो ा है, जहां निवभिशष्ट अति निनयम में संवै ानिनक सीमाओं से अति क या अवै रूप से एकत्र निकए गए कर की वापसी क े लिलए कोई ंत्र नहीं है। (6) अपनी संवै ानिनक ा क े अलावा मूल्यांकन की शु} ा क े प्रश्न अति कारिरयों क े लिलए हैं और एक दीवानी वाद ब उत्पन्न नहीं हो ा है यनिद अति कारिरयों क े आदेशों को अंति म घोनिर्ष निकया जा ा है या निवशेर्ष अति निनयम में Qपष्ट निनर्षे है। दोनों ही मामलों में, निवशेर्ष अति निनयम की योजना की जांच की जानी चानिहए क्योंनिक यह एक सुसंग जांच है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (7) दीवानी न्यायालय की अति कारिर ा क े अपवज!न का अनुमान ब क आसानी से नहीं लगाया जा सक ा जब क निक ऊपर निन ा!रिर श ± लागू न हों।" [...]
47. इस मुद्दे की जांच करने क े बाद, हम Qपष्ट रूप से इस निवचार पर हैं निक व !मान मामला ुलाभाई [ ुलाभाई बनाम म.प्र. राज्य, एआईआर 1969 एससी 78] क े प्रQ र 32 क े अं ग! आ ा है और उसमें निन ा!रिर परीक्षण को सं ुष्ट कर ा है।इसलिलए दीवानी न्यायालय क े क्षेत्राति कार को निवचारा ीन दीवानी वाद क े निवचारण क े लिलए निननिह ार्थी! द्वारा बाहर रखा जाना है। यह हम निनम्नलिललिख कारणों से कह े हैंः
47.1. पहला, प्रश्नग अति निनयम अपीलीय प्राति कारी द्वारा पारिर आदेशों को अंति म रूप दे ा है [ ारा 33 (3) देखें]।
47.2. दूसरा, अति निनयम अपीलों की प्रक ृ ति में पया!प्त उपचार का उपबं कर ा है, जैसे निक अति करण को प्रर्थीम अपील और उच्च न्यायालय को दूसरी अपील [ ारा 12(4), 13 और 33(1) देखें]।
47.3. ीसरा, अति निनयम अपने आप में एक पूण! संनिह ा है और अन्य निवति यों पर अध्यारोही शनिdयां प्रदान कर ा है ( ारा 42 देखें)।
47.4. चौर्थीा, अति निनयम ारा 30 और 40 क े अ ीन आने वाले मामलों क े संबं में दीवानी न्यायालय की अति कारिर ा को Qपष्ट रूप से अपवर्जिज कर ा है [ ारा 30 (5) और ारा 40 को देखें]।
48. पूव d पांच कारणों क े आलोक में- निन„यपूव!क, अति निनयम क े ह उत्पन्न होने वाले सभी मुद्दों क े संबं में दीवानी न्यायालय क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क्षेत्राति कार को निववतिक्ष रूप से बाहर रखा गया है, जिजससे ुलाभाई [ ुलाभाई बनाम म.प्र. राज्य, एआईआर 1969 एससी 78] क े प्रQ र 32 क े खं8 (1) में निन ा!रिर सभी श ž को पूरा निकया जा सक े ।" इस प्रकार, न्यायालय ने निनम्नानुसार निनष्कर्ष! को संक्षेप में प्रQ ु निकयाः “47.1. पहला, प्रश्नग अति निनयम अपीलीय प्राति कारी द्वारा पारिर आदेशों को अंति म रूप दे ा है [ ारा 33 (3) देखें]।
47.2. दूसरा, अति निनयम अपीलों की प्रक ृ ति में पया!प्त उपचार का उपबं कर ा है, जैसे निक अति करण को प्रर्थीम अपील और उच्च न्यायालय को दूसरी अपील [ ारा 12(4), 13 और 33(1) देखें]।
47.3. ीसरा, अति निनयम अपने आप में एक पूण! संनिह ा है और अन्य निवति यों पर अध्यारोही शनिdयां प्रदान कर ा है ( ारा 42 देखें)।
47.4. चौर्थीा, अति निनयम ारा 30 और 40 क े अ ीन आने वाले मामलों क े संबं में दीवानी न्यायालय की अति कारिर ा को Qपष्ट रूप से अपवर्जिज कर ा है [ ारा 30 (5) और ारा 40 को देखें]।”
36. एम8ीए द्वारा नीलामी नोनिटस को चुनौ ी देने की आड़ में, मुकदमें का वाQ निवक उद्देश्य संपलित्त की निबCी क े लिलए 5 मई 1993 को प्राप्त एक कभिर्थी अनुमति, जानिहद हुसैन द्वारा निनष्पानिद अं रण क े निवलेख और यूएलसीआरए क े ह काय!वाही क े उन्मूलन क े आ ार पर पहले प्रत्यर्थी4 क े हक की पुनिष्ट करना र्थीा। उच्च न्यायालय ने माना है निक 31 जुलाई 1992 को जिजस दQ ावेज क े आ ार पर एम8ीए को कब्जा हQ ां रिर निकया गया र्थीा, वह वाQ निवक भौति क Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कब्जे का सबू नहीं दे ा है, बस्थिल्क क े वल एक कागजी संव्यवहार है। उच्च न्यायालय ने माना निक भूनिम क े मालिलक से सक्षम प्राति कारी द्वारा वाQ निवक और भौति क कब्जे में लिलया गया र्थीा या नहीं, इस पर कोई सामग्री नहीं है और यह माना गया निक इसक े अभाव में, जानिहद हुसैन से खरीददार क े रूप में प्रर्थीम प्रत्यर्थी4 का वै हक जारी रहेगा। उच्च न्यायालय ने इन निनष्कर्षž को इस थ्य क े बावजूद दज! निकया है निक सोच -समझकर प्रारूपण की प्रनिCया द्वारा, पहले प्रत्यर्थी4 ने यूएलसीआरए क े ह काय!वाही क े संबं में (वाद की पोर्षणीय ा पर रोक को दूर करने क े लिलए) कोई राह नहीं मांगी और राज्य या सक्षम प्राति कारी को पक्षकार नहीं बनाया जो चुनौ ी का जवाब देने की स्थिQर्थीति में रहे होगें।
37. उच्च न्यायालय और निवचारण न्यायालय दोनों ही यूएलसीआरए से संबंति मामलों से उत्पन्न वाद का निवचारण करने क े लिलए दीवानी न्यायालय की अति कारिर ा से संबंति मुद्दे का सही मूल्यांकन करने में निवफल रहे हैं। पहले प्रत्यर्थी4 ने वादपत्र को कलात्मक रूप से इस रह से प्रारूनिप करने का प्रयास निकया है जिजससे यह प्रकट हो सक े निक मुद्दा क े वल एम8ीए द्वारा जारी नीलामी नोनिटस से संबंति है।इस न्यायालय ने समय-समय पर इस प्रक ृ ति क े मसौदा ैयार करने क े लिखलाफ चे ावनी दी है जो कार!वाई क े वाQ निवक कारण से ध्यान भंग करना चाह ा है। टी. अरिरवदन्दम बनाम टीवी सत्यपाल21 में, न्यायमूर्ति वीआर क ृ ष्णा अय्यर ने दो न्याया ीशों की पीठ क े लिलए बोल े हुए कहाः “5. हमें अदाल की प्रनिCया का बार-बार घोर दुरूपयोग करने और निबना प– ावे का सहारा लेने क े लिलए यातिचकाक ा! की किंनदा करने में जरा भी संकोच नहीं है।उच्च न्यायालय क े फ ै सले में पाए गए थ्यों क े कर्थीन से, यह पूरी रह से Qपष्ट है निक अब प्रर्थीम मुंजिसफ न्यायालय, बैंगलोर क े समक्ष लंनिब मुकदमा, वाद-पत्र प्राप्त करने में कानून की दया का एक गंभीर दुरुपयोग है।
21. (1977) 4 एससीसी 467. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA निवद्वान मुंजिसफ को यह याद रखना चानिहए निक यनिद वादपत्र क े अर्थी!पूण! पाठन पर ना निक औपचारिरक पाठन पर यह Qपष्ट रूप से सं ापकारी और गुणहीन(निबना मेरिरट का) है, वाद लाने क े Qपष्ट अति कार को प्रदर्भिश न करने क े अर्थी! में है, ो उसे आदेश 7, निनयम 11 सीपीसी क े ह अपनी शनिd का प्रयोग करना चानिहए, यह देखने क े लिलए ध्यान दे े हुए निक उसमें उजिzलिख आ ार पूरा हो गया है। और, यनिद च ुराईपूण! प्रारूपण ने वाद हे ूक का भ्रम पैदा निकया है, ो सीपीसी क े आदेश 10 क े ह सत्य ा की जाँच कर े हुए पक्षकार का परीक्षण करक े पहली सुनवाई में ही इसे समाप्त कर देना चानिहए। एक निCयाशील न्याया ीश गैर-जिजम्मेदार कानून क े मुकदमों का जवाब हो ा है।निवचारण न्यायालय पहली सुनवाई में पक्षकार का परीक्षण करने पर अनिनवाय! रूप से जोर देगी ानिक फज[4] मुकदमेबाजी को शुरूआ ी चरण में ही खत्म निकया जा सक े । [...]" े इस अभ्युनिd का ब से मदनुरी श्री राम चंद्र मूर्ति बनाम सैयद जाला22, सोपन सुखदेव सेबल बनाम अजिसटेंट चैरिरटी कनिमश्नर23 और हाल ही में हममें से एक (न्यायमूर्ति एम. आर. शाह) द्वारा राघवेंद्र शरण सिंसह बनाम राम प्रसन्ना सिंसह (मृ ) द्वारा निवति क प्रति निनति 24 में और क े नरा बैंक बनाम पी. सेलर्थील और अन्य25 में लगा ार पालन निकया गया है। इसलिलए पहले प्रत्यर्थी4 द्वारा संस्थिQर्थी मुकदमे पर निवचार करने क े लिलए दीवानी न्यायालय क े क्षेत्राति कार को वर्जिज कर निदया गया र्थीा।
22. (2017) 13 एससीसी 174.
23. (2004) 3 एससीसी 137.
24. एआईआर 2019 एससी 1430.
25. (2020) 13 एससीसी 143 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
38. उच्च न्यायालय ने निवचारण न्यायालय क े लिखलाफ अपील को इस आ ार पर अनुमति दी निक जिजला न्याया ीश द्वारा अपील की अनुमति देने और यूएलसीआरए की ारा 8(4) क े ह सक्षम प्राति कारी द्वारा पारिर 16 माच! 1988 क े आदेश को अपाQ करने क े बाद, यूएलसीआरए की ारा 8(4) क े ह आदेश क े अनुसरण में आगे की सभी काय!वानिहयाँ- राज्य द्वारा कब्जा लेने सनिह - शून्य और अक ृ हो जाएंगी। ब खं8पीठ ने माना निक ब अन्यर्थीा भी, वादग्रQ भूनिम का क े वल 'कागजी कब्जा' लिलया गया र्थीा और 'वाQ निवक कब्जा' नहीं लिलया गया र्थीा और इस प्रकार इन परिरस्थिQर्थीति यों में ज़ानिहद हुसैन क े पास वादग्रQ भूनिम का हक और कब्जा दोनों होगा। उच्च न्यायालय क े निनष्कर्ष! परिरणाम नहीं दे े हैं क्योंनिक भले ही ज़ानिहद हुसैन क े पास अं रण क े समय वादग्रQ भूनिम का हक और कब्जा र्थीा, ो पहले प्रत्यर्थी4 को कभिर्थी अं रण शून्य और अक ृ है। उच्च न्यायालय को इस आ ार पर मुकदमा खारिरज करने को बरकरार रखना चानिहए र्थीा।एक वादी को अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ ा है और प्रत्यर्थी4-वादी क े पास कानून में कोई वै हक या निह नहीं र्थीा जिजसक े आ ार पर मुकदमा संस्थिQर्थी निकया जा सक ा र्थीा।जब कभिर्थी अं रण अमान्य र्थीा ो प्रत्यर्थी4-वादी क े पास अपीलक ा! क े पक्ष में एम8ीए द्वारा नीलामी को चुनौ ी देने क े लिलए कोई वाद-हे ुक नहीं र्थीा।
39. हम इस निनष्कर्ष! पर पहुंचे हैं निक पहले प्रत्यर्थी4 द्वारा संस्थिQर्थी मुकदमे को खारिरज निकया जाना र्थीा।लेनिकन निनम्नलिललिख कारणों से, निवचारण न्याया ीश का मुकदमे को खारिरज करने का निनण!य सही र्थीा। (i) प्रर्थीम प्रत्यर्थी4 को जानिहद हुसैन द्वारा वाद भूनिम का कभिर्थी अं रण निनरसन अति निनयम अति निनयनिम निकए जाने से पहले र्थीा।यूएलसीआरए की ारा 5(3) क े ह निन ा!रिर दोहरी श ž को अं रण से पहले पूरा नहीं निकया गया र्थीा क्योंनिक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ारा 6 क े ह कर्थीन प्रQ ु नहीं निकया गया र्थीा और सक्षम प्राति कारी ने यूएलसीआरए की ारा 10(1) क े ह एक अति सूचना जारी नहीं की र्थीी (जो उस समय लागू र्थीी)। इसलिलए, भले ही ज़ानिहद हुसैन क े पास वादग्रQ भूनिम का Qवत्व र्थीा, पहले प्रत्यर्थी4 को अं रण यूएलसीआरए की ारा 5(3) क े ह शून्य और अवै र्थीा; (ii) जब ज़ानिहद हुसैन ने वादग्रQ भूनिम क े अं रण की अनुमति मांग े हुए एक घोर्षणा दायर की र्थीी, ो यूएलसीआरए की ारा 27 क े ह अनुमति नहीं दी गई र्थीी क्योंनिक उd भूनिम क े संबं में एक मुकदमा लंनिब र्थीा। इसक े बाद उन्होंने एक और आवेदन दायर निकया जिजसमें उसक े द्वारा ारिर 2000 वग! मीटर भूनिम में से 1295 वग! मीटर भूनिम क े अं रण की अनुमति मांगी गई र्थीी। 5 मई 1993 को सक्षम प्राति कारी क े काया!लय द्वारा यूएलसीआरए की ारा 27 क े ह जो अनुमति दी गई र्थीी, वह उसक े द्वारा ारिर संपलित्त से भूनिम क े अं रण क े लिलए र्थीी न निक वादग्रQ भूनिम क े लिलए र्थीी; (iii) वादी-पहले प्रत्यर्थी4 ने नीलामी की वै ा को चुनौ ी देने क े लिलए कलात्मक रूप से वादपत्र ैयार निकया है और निनर्षे ाज्ञा और उद्घोर्षणा की मांग की है, जबनिक मुकदमें का वाद-हे ुक भूनिम की सीलिंलग की काय!वाही से उत्पन्न हो ा है; (iv) यूएलसीआरए निववतिक्ष रूप से सीलिंलग की काय!वाही से उत्पन्न मामलों पर दीवानी न्यायालय क े क्षेत्राति कार को बाहर कर ा है; और (v) यद्यनिप अपीलक ा! ने आदेश XLI निनयम 22 सीपीसी क े ह उच्च न्यायालय क े समक्ष क्षेत्राति कार क े मुद्दे पर निवचारण न्यायालय क े निनष्कर्ष! को या ो प्रत्याक्षेप का ज्ञापन दालिखल करक े या अन्यर्थीा निकसी और रीक े से चुनौ ी नहीं Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA दी र्थीी, लेनिकन उसे इस न्यायालय क े समक्ष क ! उठाने से नहीं रोका गया है। यह न्यायालय संनिव ान क े ह अपनी निवQ ृ अति कारिर ा सपनिठ अनु•–ेद 142 क े अ ीन पूण! न्याय करने की अपनी शनिd क े मद्देनजर, पहली बार उठाए गए नए आ ारों पर निवचार कर सक ा है यनिद इसमें कानून का प्रश्न शानिमल है जिजसमें अति रिरd साक्ष्य प्रQ ु की आवश्यक ा नहीं है, निवशेर्ष रूप से न्यायालय की अति कारिर ा से संबंति मामलों में, जो मामले की जड़ (मूल) क जा े हैं।
40. दनुसार हम अपील को अनुमति प्रदान कर े हैं और 22 फरवरी 2018 क े उच्च न्यायालय क े आक्षेनिप निनण!य को अपाQ कर े हैं। पहले प्रत्यर्थी4 द्वारा संस्थिQर्थी वाद खारिरज हो जाएंगे। पहला प्रत्यर्थी4 अपीलक ा! को पचास हजार रुपये की लाग का भुग ान करेगा।..................................................… [न्यायमूर्ति 8ॉ नंजय वाई चंद्रचूड़] …............................................… [न्यायमूर्ति एम.आर. शाह] नई निदzी; Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 5 अगQ 2021. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA