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सिविल अपीलीय अधिकारिता
सिविल याचिका संख्या 5733/2021
(विशेष अवकाश याचिका (सिविल) संख्या 13017/2018 से उत्पन्न)
राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर - अपीलकर्ता (एस)
बनाम
आकाशदीप मोरिया और अन्य - प्रतिवादी (एस)
निर्णय
क
े . एम. जोसेफ, जे.
JUDGMENT
1. अनुमति दी गई।
2. आक्षेपित निर्णय द्वारा उच्च न्यायालय ने प्रथम प्रतिवादी द्वारा अपीलकर्ता क े उस निर्णय क े विरुद्ध फाइल की गई रिट याचिका मंजूर कर ली है, जिसक े द्वारा उसने पाया कि प्रथम प्रतिवादी सिविल न्यायाधीशों क े संवर्ग में नियुक्त किए जाने क े योग्य नहीं था।
3. अपीलकर्ता ने दिनांक 25/11/2013 की एक अधिसूचना जारी की, जिसक े तहत सिविल जज (कनिष्ठ खंड) क े पद भरने क े लिए आवेदन आमंत्रित किए गए। प्रतिवादी ने उसी क े अनुसरण में आवेदन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी आपराधिक मामले में उम्मीदवार की भागीदारी क े बारे में संक े त देने क े लिए आवेदन में कोई आवश्यकता नहीं थी। हालांकि, जब मामले को सत्यापन क े लिए लिया गया, तो प्रतिवादी ने क ु छ आपराधिक मामलों में अपने शामिल होने क े संबंध में स्वेच्छा से जानकारियां दी। हम मामलों क े विवरण पर ध्यान दे सकते हैं जो कि इस प्रकार हैंः प्राथमिकी नं/पुलिस धारा पुलिस जांच न्यायालय का निर्णय स्टेशन 81/ 25.06.99 341, 323, 147, 148, 149, 504, 324 भा.दं.सं. चालान दिनांक 26.07.1999 समझौते क े आधार पर 05.02.2011 को बरी किया गया। 75/ 03.05.11 420, 406, 120-बी भा.दं.सं. एफ. आर. संख्या 78/29.05.[1] एफ. आर. 01.10.2011 को स्वीकार किया गया 106/ 06.06.11 452, 323, 34 भा.दं.सं. एफ. आर. संख्या 120/ 30.06.11 एफ. आर. को 18.10.2011 को स्वीकार किया गया 98/ 30.05.12 341, 323, 324, 34 भा.दं.सं. दिनांक 27.06.2012 का चालान समझौते क े आधार पर 16.07.2012 को बरी किया गया।
4. दिनांक 06.07.2015 को, मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त उच्च न्यायाधीश की समिति ने प्रथम प्रतिवादी सहित 12 उम्मीदवारों क े मामले पर विचार करने क े लिए प्रथम प्रतिवादी क े मामले की सिफारिश न करने का संकल्प किया। मुख्य न्यायाधीश ने 12 उम्मीदवारों से संबंधित मामले को वापस समिति क े पास भेज दिया। दिनांक 29.07.2015 को समिति ने फिर से पहले प्रतिवादी क े मामले की सिफारिश नहीं की। फ ु ल कोर्ट ने दिनांक 08.08.2015 को समिति से मामले की फिर से जांच करने का अनुरोध करने का संकल्प लिया। एक बार फिर, दिनांक 26.08.2015 को, समिति ने प्रथम प्रतिवादी क े पूर्ववृत्त ध्यान देते हुए प्रथम प्रतिवादी क े मामले की सिफारिश न करने का संकल्प लिया। इसे फ ु ल कोर्ट ने भी स्वीकार कर लिया।
5. इसक े बाद, पहले प्रतिवादी द्वारा रिट याचिका संख्या 13192/2015 दायर की गई, जिसमें निम्नलिखित आदेश हुआः "यह अपीलकर्ता क े विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत किया जाता है कि माननीय उच्चतम न्यायालय क े अवतार सिंह अन्य भारत सरकार और अन्य क े मामले में (2016) 8 एससीसी 471 में दिए गए निर्णय को ध्यान में रखते हुए, याची इस याचिका में दावा की गई राहत का हकदार है।" उपर्युक्त निर्णय पर विचार करने क े बाद, वर्तमान रिट याचिकाकर्ता का निपटान, आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से दो सप्ताह क े भीतर, राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर क े रजिस्ट्रार क े समक्ष अवतार सिंह क े मामले (ऊपर) में पारित निर्णय की प्रति क े साथ अभ्यावेदन दाखिल करने क े लिए याची को स्वतंत्रता क े साथ किया जाता है । इस तरह का प्रतिनिधित्व दाखिल करने पर, यह उम्मीद की जाती है कि अवतार सिंह (ऊपर) क े मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किए गए न्यायनिर्णयन और प्रतिनिधित्व में वर्णित तथ्यों क े आलोक में, प्रतिनिधित्व प्राप्त होने की तारीख से एक महीने क े भीतर गुण-दोष क े आधार पर उक्त प्रतिनिधित्व का फ ै सला किया जाएगा।"
6. इसक े परिणामस्वरूप मामले पर पुनः विचार करने क े लिए अपीलकर्ता की निचली न्यायपालिका समिति की बैठक हुई और निम्नलिखित निर्णय लिया गयाः “माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय क े दिनांक 08.03.2017 क े आदेश क े अनुपालन में डी. बी. सी. डब्ल्यू. पी. संख्या 13192/2015, आकाश दीप मोरिया बनाम राजस्थान उच्च न्यायालय में पारित आदेश क े अनुसार, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अवतार सिंह क े मामले में किए गए न्यायनिर्णयन क े आलोक में श्री आकाश दीप मोरिया क े प्रतिनिधित्व पर विचार किया गया था।” अवतार सिंह क े मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अन्य बातों क े साथ-साथ निम्नलिखित रूप में यह अभिनिर्धारित किया गया हैः “यदि जघन्य/गंभीर प्रक ृ ति क े अपराध क े नैतिक अधमता वाले मामले में तकनीकी आधार पर दोषमुक्ति पहले ही दर्ज की जा चुकी है और यह क्लीन दोषमुक्ति का मामला नहीं है या संदेह का उचित लाभ नहीं दिया गया है, तो नियोक्ता पूर्ववृत्त क े बारे में सभी उपलब्ध प्रासंगिक तथ्यों पर विचार कर सकता है और कर्मचारी को जारी रखने क े बारे में उचित निर्णय ले सकता है।” समिति ने पाया कि वर्ष 1999-2012 क े दौरान श्री आकाश दीप मोरिया क े खिलाफ चार अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं, जिनका विवरण इस प्रकार हैः
1. प्राथमिकी आर. संख्या 81/1999 में श्री आकाश दीप मोरिया और अन्य क े विरुद्ध भारतीय दंड भा.दं.सं. की धारा 341,323,148,149,504 और 324 क े अधीन अपराधों क े लिए आरोप पत्र दायर किया गया था जिसमें श्री मोरिया क े विरुद्ध आरोप पीड़ित क े हाथ पर तलवार से प्रहार करने क े लिए है। समझौते क े आधार पर श्री मोरिया को भारतीय दंड भा.दं.सं. की धारा 341,323,324 और 504 क े तहत आरोपों से बरी कर दिया गया और शेष अपराधों क े लिए उन्हें सबूतों क े अभाव में बरी कर दिया गया।
2. भा.दं.सं. की धारा 420,406 और 120 बी क े तहत प्राथमिकी संख्या 75/2011 में पुलिस ने एफआर प्रस्तुत किया जिसे इस आधार पर स्वीकार कर लिया गया कि पक्षों ने मामले से समझौता किया है और शिकायतकर्ता आगे नहीं बढ़ना चाहता।
3. भा.दं.सं. की धारा 452,323,34 क े तहत प्राथमिकी संख्या 106/2011 में पुलिस ने इस निष्कर्ष क े साथ समझौते क े आधार पर एफआर प्रस्तुत किया कि क े वल भा.दं.सं. की खंड 504 क े तहत अपराध ही बनाया गया है जो असंज्ञेय है। अदालत ने एफआर को इस आधार पर स्वीकार किया कि पक्षों ने मामले से समझौता किया है और शिकायतकर्ता आगे नहीं बढ़ना चाहता।
4. प्राथमिकी आर संख्या 98/2012 में श्री मोरिया और अन्य क े खिलाफ भारतीय दंड भा.दं.सं. की धारा 323,341,324 और 34 क े तहत अपराधों क े लिए आरोप पत्र दायर किया गया था, जिसमें श्री मोरिया क े खिलाफ आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक पीड़ित क े सिर पर गंडासी का प्रहार किया था। श्री मोरिया को समझौते क े आधार पर भारतीय दंड भा.दं.सं. की धारा 323,341 क े अधीन अपराध क े लिए बरी कर दिया गया था और साक्ष्य क े अभाव में भारतीय दंड भा.दं.सं. की धारा 324 क े अधीन अपराध क े लिए बरी कर दिया गया था। अवतार सिंह क े मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय क े निर्णय क े अनुसार यदि गंभीर प्रक ृ ति क े मामले में दोषमुक्ति दर्ज की जाती है, तो नियोक्ता पूर्ववर्ती क प्रासंगिक तथ्यों पर विचार कर सकता है। इस मामले में श्री मोरिया क े खिलाफ एक क े बाद एक चार आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। उपरोक्त सभी मामलों में अपराध गंभीर प्रक ृ ति क े थे और बरी किए जाने की घटनाएं साफ नहीं थीं। उनकी उम्मीदवारी पर विचार करते समय अन्य उम्मीदवारों क े साथ उनकी तुलना करना प्रासंगिक नहीं है। इसलिए, सभी प्रासंगिक पहलुओं ध्यान दें देते हुए समिति का विचार है कि श्री मोरिया सिविल जज क ै डर क े पद पर नियुक्ति क े योग्य नहीं हैं और उनका प्रतिनिधित्व अस्वीकार किया जा सकता है। श्री आकाश दीप मोरिया क े प्रतिनिधित्व को अस्वीकार करने का संकल्प लिया।
7. इसक े बाद, दिनांक 05.05.2017 को, अपीलकर्ता क े रजिस्ट्रार जनरल द्वारा प्रतिवादी को संबोधित किया गया था, जिसमें संक े त दिया गया था कि प्रतिवादी सिविल न्यायाधीश क ै डर क े पद पर नियुक्ति का हकदार नहीं था और प्रतिनिधित्व अस्वीकार कर दिया गया था।इसक े परिणामस्वरूप रिट याचिका दायर की गई।
8. प्रतिवादी द्वारा फाइल की गई रिट याचिका को उच्च न्यायालय द्वारा अनुज्ञात किया गया है। उच्च न्यायालय द्वारा मामलों को देखने क े बाद यह मत व्यक्त किया किः “ रिकॉर्ड में मौजूद सभी तथ्यों और दस्तावेजी सबूतों को ध्यान में रखते हुए इसमें कोई संदेह नहीं है कि चार मामलों में से दो मामलों में पक्षकारों क े बीच समझौता हुआ क्योंकि अपराध सरल प्रक ृ ति क े थे, क ृ षि भूमि पर पानी की आपूर्ति क े विवाद क े लिए, जिसमें अंततः पक्षों और याचिकाकर्ता क े बीच समझौता हुआ और आरोपी पक्ष की शिकायत पर दर्ज क्रॉस प्राथमिकी में से एक मामले में शिकायतकर्ता को भी बरी कर दिया गया। बेशक, याचिकाकर्ता क े खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है जब उसक े द्वारा प्रश्नगत पद पर भर्ती क े लिए ऑनलाइन आवेदन पत्र प्रस्तुत किया गया था। अवतार सिंह (पूर्वोक्त) क े मामले में, माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि चरित्र और पूर्ववृत्त क े सत्यापन का पूरा विचार यह है कि पद क े लिए उपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति की जानी चाहिए और उम्मीदवार क े पास ऐसी ृ ति का पूर्ववृत्त नहीं होना चाहिए जो उसे पद क े लिए अनुपयुक्त ठहराए। उम्मीदवारों की योग्यता का पता लगाने क े लिए पूर्ववृत्त का सत्यापन आवश्यक है। इस मामले में सूचना छिपाने का कोई आरोप नहीं है। इसक े अलावा, यह एक ऐसा मामला है जिसमें याचिकाकर्ता ने स्पष्ट रूप से समझाया है कि चार मामलों में से दो मामले जांच क े बाद झूठे पाए गए थे, इसलिए, एफआर प्रस्तुत किया गया था और उन्हें अदालत द्वारा स्वीकार किया गया था। दो अन्य मामलों में अपराध साधारण चोटों क े थे, जिनमें पक्षकारों क े बीच समझौता हुआ क्योंकि वे अपराध दंड प्रक्रिया संहिता क े अनुसार शमनीय थे, इसलिए याचिकाकर्ता और अन्य व्यक्तियों को न्यायालय द्वारा बरी कर दिया गया। समिति क े पूर्वोक्त निर्णय का अवलोकन करने पर यह विचार किया गया कि याचिकाकर्ता क े खिलाफ दर्ज सभी चार आपराधिक मामलों पर विचार किया गया था और समिति ने यह राय व्यक्त की कि सभी मामलों में अपराध गंभीर प्रक ृ ति क े थे और बरी कर दिया गया था, इसलिए, उम्मीदवारी को देखते हुए, अन्य उम्मीदवारों क े साथ तुलना प्रासंगिक नहीं है क्योंकि सभी प्रासंगिक पहलुओं ध्यान दें में रखते हुए, समिति ने कहा कि श्री मोर्य सिविल जज क ै डर क े पद पर नियुक्ति क े योग्य नहीं हैं और उनका प्रतिनिधित्व खारिज किए जाने योग्य है। हमारी विनम्र राय में समिति माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अवतार सिंह क े मामले में दिए गए फ ै सले की भावना क े अनुसार याचिकाकर्ता क े मामले पर विचार करने में विफल रही है क्योंकि समिति क े अनुसार सभी मामलों में अपराध ृ ति क े थे और बरी होने की घटनाएं साफ नहीं थीं, लेकिन यह निष्कर्ष दस्तावेजी साक्ष्य से स्पष्ट है कि जांच क े बाद दो मामलों में चार मामलों में से पुलिस द्वारा एफआर प्रस्तुत किया गया था, जिसे सक्षम अदालत द्वारा स्वीकार किया गया है और आगे यह विवाद में नहीं है कि पुलिस स्टेशन में आरोप-पत्र संख्या 81 में, याचिकाकर्ता और अन्य व्यक्तियों क े खिलाफ खंड 341,323,148,504 और 324 क े तहत अपराध क े लिए और उसी घटना में आरोप-पत्र संख्या 80 में दर्ज किए गए थे। चौथे मामले में, जो प्राथमिकी संख्या 98 पर दर्ज किया गया है, याचिकाकर्ता और उसक े भाई क े खिलाफ भा.दं.सं. की धारा 323, 341, 324 और 34 क े लिए आरोप-पत्र दायर किया गया था। मजिस्ट्रेट द्वारा सभी अपराधों का शमन किया जा सकता था और इसलिए, पड़ोसियों क े बीच समझौता किया गया था, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था। तथ्यों की उपरोक्त स्थिति को ध्यान में रखते हुए, यह नहीं कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता गंभीर प्रक ृ ति क े मामले में शामिल था, जैसा कि समिति द्वारा देखा गया था। अवतार सिंह (उपर्युक्त) क े मामले में दिए गए निर्णय क े अनुसार हालांकि नियोक्ता को पूर्ववृत्त पर विचार करते समय उम्मीदवार की उपयुक्तता का आंकलन करने का विवेकाधिकार दिया गया है, लेकिन साथ ही नियोक्ता पर यह दायित्व भी डाला गया है कि वह प्रतियोगी परीक्षा में सफल हुए उम्मीदवार क े भविष्य को क ु चले नहीं और उसक े प्रदर्शन क े आधार पर योग्यता प्राप्त करे। बेशक, याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति से संबंधित है, जो समाज का कमजोर खंड है, जिसक े खिलाफ दो झूठे मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें जांच क े बाद पुलिस ने राय दी कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी और उसक े खिलाफ दर्ज अन्य दो मामलों में साधारण चोटों क े अपराध क े लिए पक्षकारों क े बीच समझौता हुआ था और निचली निचली अदालत ने समझौते क े आधार पर उसे बरी कर दिया था, इसलिए, उनकी राय है कि समिति का निर्णय अवतार सिंह (ऊपर) क े मामले में निर्णय की भावना क े अनुरूप नहीं है।"
9. इसक े बाद, न्यायालय ने यह दृष्टिकोण अपनाया कि यह एक महत्वपूर्ण खंड है कि अनुसूचित जाति श्रेणी से संबंधित पहला प्रतिवादी, जो समाज का एक कमजोर वर्ग है, प्रतियोगी परीक्षा में उपस्थित हुआ और प्रदर्शन क े आधार पर उसमें सफल हुआ और नियुक्ति क े लिए अनुशंसित किया गया। लेकिन आवेदन जमा करने से पहले उनक े खिलाफ क ु छ मामले दर्ज होने क े कारण, नियुक्ति से इनकार कर दिया गया है। यह आगे पाया गया है कि इस तरह क े मामलों में, यदि नियुक्तियों से आकस्मिक रूप से इनकार किया जाएगा, तो कोई भी न्यायिक प्रणाली पर भरोसा नहीं करेगा। इसलिए, यह नियोक्ता का कर्तव्य है कि वह उम्मीदवार की उपयुक्तता का निष्पक्ष रूप से आंकलन करने क े लिए अपने दिमाग का उपयोग करे। नियोक्ता का भारतीय दंड भा.दं.सं. की खंड 323 और 324 क े तहत अपराधों को अन्य जघन्य अपराधों क े समान समझना और नियुक्ति से इनकार करना यह यह कल्पना से परे है और असंवैधानिक भी पाया गया। तदनुसार, याचिका को अनुमति दी गई।
10. अपीलकर्ता की ओर विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री मीनाक्षी अरोड़ा और पहले प्रतिवादी की ओर से पेश होने विद्वान अधिवक्ता करण सिंह भाटी को सुना गया ।
11. अपीलकर्ता की ओर से विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री मीनाक्षी अरोड़ा ने इंगित किया है कि उच्च न्यायालय का आदेश गलत है, क्योंकि इसमें नियोक्ता की इस मामले में प्रासंगिक इनपुट को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने की शक्ति शामिल है। उन्होंने प्रश्नगत मामलों की ओर हमारा ध्यान आक ृ ष्ट किया। उन्होंने हमें याद दिलाया कि न्यायालय न्यायिक पद पर नियुक्ति क े मामले पर विचार कर रहा है। अपराधों को हल्क े में नहीं लिया जा सकता। चार एफआईआर दर्ज किए गए थे, जिनमें पहला प्रतिवादी शामिल था। ऐसा नहीं है कि पहले प्रतिवादी को सम्मानपूर्वक बरी कर दिया गया। सबूतों क े अभाव में बरी किए जाने को क्लीन दोषमुक्ति क े रूप में वर्णित नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, पहली प्राथमिकी में मामला सुलझ गया और गवाह मुकर गए। अंतिम एफआईआर भी एक ऐसा मामला है जहां आरोप पत्र दायर किया गया था। इन मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 323 और 324 क े तहत अपराध शामिल थे, जैसा कि जांच एजेंसी द्वारा आरोप लगाया गया था और फिर से एक समझौते से दोषमुक्ति दिया गया था और यह अदालत द्वारा साक्ष्य की सराहना करने और यह अभिनिर्धारित करने क े परिणामस्वरूप नहीं था कि पहले प्रतिवादी क े खिलाफ कोई सबूत नहीं है। उन्होंने वास्तव में, अवतार सिंह बनाम भारत संघ और अन्य क े विनिश्चय की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कियाः "30. नियोक्ता को इस बात का विवेकाधिकार दिया गया है कि वह गलती को माफ कर दे या उसे समाप्त कर दे। वैसे भी, एक बार नियोक्ता क े पास उस समय निर्णय लेने की शक्ति होती है। इस तरह क े मामले में, यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी सेवा क े लिए किसी व्यक्ति की उपयुक्तता का निर्धारण करते समय दमन या झूठी जानकारी क े प्रभाव सहित सभी तथ्यों और उपस्थित परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है। यदि मामले में नियोक्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि दमन महत्वहीन है और यदि तथ्यों का खुलासा किया गया होता तो भी किसी पदधारी की फिटनेस पर प्रतिक ू ल प्रभाव नहीं पड़ता, दर्ज किए जाने वाले कारणों से, उसक े पास चूक को माफ करने की शक्ति है। तथापि, ऐसा करते समय नियोक्ता को पद और कर्तव्यों की प्रक ृ ति पर उचित विचार करते हुए विवेकपूर्ण रूप से कार्य करना होगा। उच्च अधिकारियों/उच्च पदों क े लिए मानक बहुत ऊ ं चा होना चाहिए और थोड़ी सी भी गलत जानकारी या दमन किसी व्यक्ति को पद क े लिए अनुपयुक्त बना सकता है। हालांकि प्रत्येक पद क े लिए एक ही मानक लागू नहीं किया जा सकता है। अंतिम आपराधिक मामलों में, यह देखा जाना चाहिए कि जो क ु छ दबाया गया है वह तात्विक तथ्य है और इससे पदधारी नियुक्ति क े लिए अयोग्य हो जाता है। एक नियोक्ता को विभिन्न पहलुओं पर विचार करने क े बाद इस तरह की सेवाओं को नियुक्त नहीं करने या समाप्त करने क े लिए नियुक्त नहीं करने क े लिए उचित होगा। यहां तक कि अगर प्रकटीकरण सच्चाई से किया गया है तो नियोक्ता को फिटनेस पर विचार करने का अधिकार है और ऐसा करते समय दोषी ठहराए जाने और मामले की पृष्ठभूमि क े तथ्यों, अपराध की प्रक ृ ति आदि पर विचार किया जाना चाहिए। भले ही बरी कर दिया गया हो, नियोक्ता अपराध की प्रक ृ ति पर विचार कर सकता है, चाहे दोषमुक्ति सम्मानजनक है या तकनीकी कारणों से संदेह का लाभ देता है और किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करने से इनकार कर सकता है जो अयोग्य है। यदि नियोक्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि आपराधिक मामले में दोषसिद्धि या दोषमुक्ति का आधार रोजगार क े लिए योग्यता को प्रभावित नहीं करेगा तो पदधारी को नियुक्त किया जा सकता है या सेवा में जारी रखा जा सकता है। (जोर दिया गया)
12. उन्होंने आगे बताया कि यह निश्चित रूप से अपीलकर्ता का निर्णय ऐसा नहीं था जिसमें उच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप किया जाना चाहिए था। 13 दूसरी तरफ,पहले प्रतिवादी क े विद्वान अधिवक्ता कर्ण सिंह भाटी ने बताया कि पहला प्रतिवादी अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित है। उन्हें इन सभी मामलों में झूठा फ ं साया गया। उन्होंने इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला कि कम उम्र में, लोगों को गलतियां करने का खतरा अधिक हो सकता है। ऐसे मामलों में न्यायालय का दृष्टिकोण अधिक उदार होना चाहिए। जब तक अपराध गंभीर नहीं हैं, जो वर्तमान मामले में है, मामले क े तथ्यों में, आक्षेपित निर्णय का क े वल समर्थन किया जाना है. इस संबंध में उन्होंने क ु छ निर्णयों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया।
14. उन्होंने मोहम्मद इमरान बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य मामले में दिए गए फ ै सले की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया, उन्होंने कहा कि उक्त निर्णय में एक न्यायिक पद पर नियुक्ति भी शामिल थी और फिर भी, उन्होंने तर्क दिया कि तथ्यों को ध्यान में रखने क े बाद, इस न्यायालय ने कथित मामले में याचिकाकर्ता को नियुक्त न करने क े फ ै सले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। यह तर्क दिया गया कि कथित मामले का सिद्धांत इस मामले क े तथ्यों में भी सभी चारों पर भी लागू होगा। उन्होंने आगे हमारा ध्यान पुलिस आयुक्त और अन्य बनाम संदीप क ु मार गलीज वाले मामले में दिए गए निर्णय की ओर दिलाया। उसमें न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित कियाः "8. हम दिल्ली उच्च न्यायालय से सम्मानपूर्वक सहमत हैं कि उनकी उम्मीदवारी को रद्द करना अवैध था, लेकिन हम इस मामले में अपनी राय देना चाहते हैं। जब घटना हुई तो प्रतिवादी की उम्र लगभग 20 वर्ष होनी चाहिए। उस उम्र में युवा लोग अक्सर अविवेकपूर्ण कार्य कर देते हैं, और इस तरह क े अविवेक को अक्सर माफ किया जा सकता है। आखिर युवा ही तो होंगे, उनसे बुजुर्गों की तरह परिपक्व व्यवहार करने की उम्मीद नहीं की जाती है। इसलिए, हमारा दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि युवा लोगों द्वारा की गई छोटी-छोटी गलतियों को माफ किया जाए, न कि उन्हें शेष जीवन क े लिए अपराधी करार दिया जाए।.......
12. यह सच है कि आवेदन प्रपत्र में प्रतिवादी ने यह उल्लेख नहीं किया कि वह भारतीय दंड भा.दं.सं. की धारा 325/34 क े तहत एक आपराधिक मामले में शामिल था। किसी भी स्थिति में, यह हत्या, डक ै ती या बलात्कार जैसा गंभीर अपराध नहीं था, इसलिए इस मामले में अधिक उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।”
15. उन्होंने तर्क दिया कि जहां तक पहले प्रतिवादी क े खिलाफ दर्ज पहली प्राथमिकी का संबंध है, यह विवाद अनिवार्य रूप से एक संपत्ति विवाद था। दूसरी प्राथमिकी जो भा.दं.सं. की धारा 420,406 क े तहत अपराधों से संबंधित है, क े बारे में वह बताएंगे कि यह अनिवार्य रूप से एक सिविल मामला था और इसे सिर्फ एक आपराधिक रंग दिया गया है। उक्त मामला विचारण क े लिए भी नहीं गया था। दूसरी ओर, जांच प्राधिकारी को प्राथमिकी की सामग्री में मेरिट नहीं मिली, जो अंतिम रिपोर्ट दर्ज करने में समाप्त हुई। तीसरी प्राथमिकी का भी यही हाल है, जो आरोप पत्र दाखिल करने में समाप्त नहीं हुई और इसक े विपरीत, मामले में तुरंत अंतिम रिपोर्ट दायर की गई। अंतिम रिपोर्ट को निर्विरोध स्वीकार कर लिया गया और मामला समाप्त हो गया। अंतिम मामले में भी, भा.दं.सं. की खंड 323 क े तहत अपराध शामिल था, जिसे किसी भी तरह से समाज क े कमजोर वर्ग से संबंधित एक पात्र उम्मीदवार को समाप्त करने को न्यायोचित ठहराने वाला गंभीर अपराध नहीं कहा जा सकता है। इन मामलों में, वह उस उदार भावना को प्रस्तुत करते, जिसने इस न्यायालय को प्रेरित किया, जैसा कि संदीप क ु मार (ऊपर) में मामले का फ ै सला किया, इस न्यायालय का भी मार्गदर्शन करना जारी रखना चाहिए।
16. सुश्री मीनाक्षी अरोड़ा, विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने हमारे संज्ञान में लाया कि मोहम्मद इमरान (उपर्युक्त) में रिपोर्ट किए गए इस न्यायालय क े निर्णय को नोट किया गया है और बाद क े एक निर्णय द्वारा इसकी सराहना की गई है, जो अभिजीत सिंह पवार क े मामले में रिपोर्ट किया गया है। सुश्री मीनाक्षी अरोड़ा ने हमारा ध्यान पैराग्राफ 15 की ओर दिलायाः "15. श्री दवे, विद्वान एमिकस क्यूरी द्वारा मोहम्मद वाले मामले में इस न्यायालय क े निर्णय इमरान बनाम महाराष्ट्र राज्य (सिविल अपील संख्या 10571/2018) का आधार लिया है, जो कि बिल्क ु ल सही नहीं है और उक्त निर्णय प्रतिवादी को किसी भी तरह की मदद नहीं करता है। कथित निर्णय क े पैरा 5 में, इस न्यायालय ने पाया कि उसमें अपीलकर्ता क े खिलाफ एकमात्र आरोप यह था कि वह एक ऑटो रिक्शा में यात्रा कर रहा था, जो उस ऑटो रिक्शा का अनुसरण कर रहा था, जिसमें मुख्य अभियुक्त, जिसे भा.दं.सं. की धारा 376 क े तहत आरोपित किया गया था, प्रश्नगत अभियोक्त्री क े साथ यात्रा कर रहा था और यह कि सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया था, क्योंकि अभियोक्त्री ने आरोप का समर्थन नहीं किया था। मो. इमरान बनाम महाराष्ट्र राज्य (सिविल अपील संख्या 10571/2018) में पारित निर्णय में इस प्रकार व्यक्तिगत तथ्यों पर ध्यान दिया और किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा सकता कि वह इस न्यायालय द्वारा पुलिस कमिश्नर बनाम मेहर सिंह (2013) 7 एससीसी 685, मध्य प्रदेश राज्य बनाम भारत संघ, (2013) 7 एससीसी 685, मध्य प्रदेश राज्य बनाम भारत संघ, (2013) 7 एससीसी 685, परवेज खान (2015) 2 एससीसी 591 और संघ राज्य क्षेत्र, चंडीगढ़ प्रशासन वी. प्रदीप क ु मार (2018) 1 एससीसी 797 में दिए गए निर्णयों की लाइन से अलग हो गया है।
17. इसमें कोई संदेह नहीं है कि पहले प्रतिवादी क े विद्वान अधिवक्ता ने इंगित किया कि उक्त मामले में, प्रतिवादी क े खिलाफ आपराधिक मामला लंबित था जब उसने आवेदन किया था। इस तरह विचाराधीनता मामलों का खुलासा करने वाले एक शपथ पत्र क े बाद समझौता किया गया था।
18. जैसा कि हमने अपने आख्यान से देखा है, यह ऐसा मामला नहीं है जहां एक उम्मीदवार क े रूप में पहले प्रतिवादी ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों क तथ्यों को दबा दिया क्योंकि आवेदन में इस तरह क े विवरण का खुलासा करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।दूसरी ओर, यह अपीलकर्ता क े स्वयं क े एक मामले को दिखाने पर है जहां सत्यापन क े समय सामग्री को उजागर किया गया था. इसलिए, हम यह मानते हुए शुरुआत कर सकते हैं कि यह एक ऐसा मामला नहीं है जिसमें एक े रूप में पहले प्रतिवादी द्वारा सामग्री का कोई दमन शामिल है। हम इस पहलू पर उन सिद्धांतों को परिप्रेक्ष्य में रखने क े लिए ध्यान देते हैं जो इस न्यायालय द्वारा अवतार सिंह (उपर्युक्त) में पैराग्राफ 38.4, 38.4.1, 38.4.[2] और 38.4.[3] में दिए गए निर्णय में प्रतिपादित किए गए हैं- “38.4. यदि किसी आपराधिक मामले में संलिप्तता का दमन या गलत सूचना है, जहां आवेदन/सत्यापन फार्म भरने से पहले दोषसिद्धि या दोषमुक्ति पहले ही दर्ज की जा चुकी है और ऐसा तथ्य बाद में नियोक्ता क े संज्ञान में आता है, तो मामले क े लिए उपयुक्त निम्नलिखित उपायों में से किसी को भी अपनाया जा सकता हैः
38. 4.[1] ऐसे मामूली मामले में जिसमें दोषसिद्धि दर्ज की गई हो, जैसे कम उम्र में नारे लगाना या किसी छोटे अपराध क े लिए, जिसक े बारे में खुलासा होने पर कोई व्यक्ति प्रश्नगत पद क े लिए अयोग्य नहीं हो जाता, नियोक्ता अपने विवेक से इस तरह क े तथ्य को दबाने या झूठी जानकारी को अनदेखा कर सकता है।
38. 4.2. ऐसे मामले में जहां दोषसिद्धि दर्ज की गई है जो तुच्छ प्रक ृ ति का नहीं है, नियोक्ता कर्मचारी की उम्मीदवारी रद्द कर सकता है या उसकी सेवाओं को समाप्त कर सकता है।
38. 4.[3] यदि दोषमुक्ति जघन्य/गंभीर प्रक ृ ति क े अपराध या नैतिक अधमता वाले मामले में तकनीकी आधार पर पहले ही दर्ज की जा चुकी है और यह क्लीन दोषमुक्ति का मामला नहीं है या संदेह का उचित लाभ नहीं दिया गया है, तो नियोक्ता पूर्ववृत्त क े बारे में सभी उपलब्ध प्रासंगिक तथ्यों पर विचार कर सकता है और कर्मचारी को जारी रखने क े बारे में उचित निर्णय ले सकता है।
19. इसलिए, हम इस आधार पर आगे बढ़ सकते हैं कि पैरा 38.[4] में क्या अभिनिर्धारित किया गया है। वास्तव में उन मामलों को लागू करने क े लिए है जिनमें किसी आपराधिक मामले में शामिल होने की गलत जानकारी या दमन शामिल है, जहां आवेदन/सत्यापन दाखिल करने से पहले दोषसिद्धि या दोषमुक्ति पहले ही दर्ज की जा चुकी है और इस तरह का तथ्य बाद में नियोक्ता क े संज्ञान में आया है। ऐसी स्थिति में पैरा 38.4.1, 38.4.[2] और 38.4.[3] लागू होगा।
20. हमने नोटिस किया है कि रिट याचिका संख्या 13192/2015 में उच्च न्यायालय क े निर्देश क े बाद अपीलकर्ता की समिति द्वारा लिए गए निर्णय में, पैरा 38.4.[3] का एक संदर्भ है। वास्तव में, पैराग्राफ 38.[5] वास्तव में एक ऐसे मामले में प्रासंगिक होगा जहां किसी उम्मीदवार द्वारा किसी आपराधिक मामले क े शामिल होने से संबंधित कोई दमन या गलत जानकारी नहीं है। "38.[5] ऐसे मामले में जहां कर्मचारी ने किसी समाप्त आपराधिक मामले की घोषणा सच्चाई से की है, नियोक्ता को अभी भी पूर्ववृत्त पर विचार करने का अधिकार है, और उसे उम्मीदवार को नियुक्त करने क े लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।” इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस मामले में खुलासा करने का कोई अवसर नहीं था, लेकिन यह एक ऐसा मामला है जहां पहले प्रतिवादी ने सत्यापन क े दौरान जानकारी का खुलासा किया था। हम पैराग्राफ 38.10 पर भी ध्यान दे सकते हैंः “38.10 दमन या झूठी जानकारी क े निर्धारण क े लिए सत्यापन/सत्यापन फॉर्म विशिष्ट होना चाहिए, न कि अस्पष्ट। क े वल ऐसी जानकारी का खुलासा किया जाना चाहिए जिसका विशेष रूप से उल्लेख किया जाना आवश्यक है। यदि जानकारी मांगी नहीं गई है, लेकिन संबंधित है, तो फिटनेस क े सवाल का जवाब देते समय वस्तुनिष्ठ तरीक े से उस पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, ऐसे मामलों में किसी तथ्य को दबाने या गलत जानकारी प्रस्तुत करने क े आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है, जिसकी मांग भी नहीं की गई थी।”
21. हम पहले ही यह बता चुक े हैं कि पैराग्राफ 30 में क्या निर्धारित किया गया है। अतः, हमारे विचार से यह ऐसा मामला होगा जिसमें पैरा 30 क े साथ पठित पैरा 38.[5] को लागू करना अंतर्वलित होगा।
22. हम इस प्रकार क े मामले में दांव पर लगे पद की प्रक ृ ति क े बारे में अनभिज्ञ नहीं हो सकते। पदानुक्रम क े किसी भी स्तर पर एक न्यायिक अधिकारी क े पद में सबसे कठोर मानकों को लागू करना शामिल है। न्यायिक पद पर आसीन व्यक्ति राज्य क े सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक का निर्वहन करता है। उच्चतम नैतिक आधार पर कार्य करने वाले न्यायाधीश न्याय प्रदान करने की प्रणाली में जनता का विश्वास पैदा करने में एक लंबा रास्ता तय करते हैं। वास्तव में, यहां तक कि विज्ञापन में भी े चरित्र होने की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है। पात्र को सक्षम प्राधिकारी द्वारा चरित्र क े क े वल प्रमाणन तक सीमित नहीं समझा जा सकता। उच्च न्यायालय न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति में शामिल है और यह संविधान की योजना क े तहत उचित है। यद्यपि नियुक्ति का आदेश राज्य द्वारा जारी किया जाता है, न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति में उच्च न्यायालय की भागीदारी अनिवार्य रूप से संवैधानिक योजना में उसकी स्थिति से होती है। उच्च न्यायालय इस पद पर आसीन होने क े लिए सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्तियों की सिफारिश करने क े लिए आबद्ध है। एक सिविल न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का पद इस तथ्य क े बावजूद सर्वोच्च महत्व का है कि न्यायपालिका की पिरामिड संरचना में, सिविल न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट सबसे निचले पायदान पर है। हम यह इसलिए कहते हैं कि देश में संस्थित सभी मुकदमों में सबसे अधिक मुकदमेबाजी निचले स्तर पर होती है। बहुत सारे मामले आखिरकार उच्चतम न्यायालय तक नहीं पहुंच पाते हैं। यह सिविल न्यायाधीश (जूनियर डिवीजन)/मजिस्ट्रेट द्वारा से है कि आम आदमी का सबसे बड़ा इंटरफ े स है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायिक अधिकारी की विश्वसनीयता और पृष्ठभूमि क आम आदमी की धारणा महत्वपूर्ण है। हमने क े वल मामले क े तथ्यों पर आगे विचार करने क े लिए इन पहलुओं पर प्रकाश डाला है। दूसरे शब्दों में, सम्मानजनक दोषमुक्ति की अनुपस्थिति में, आपराधिक मामलों में एक अधिकारी की कथित संलिप्तता प्रणाली में जनता क े विश्वास को कम कर सकती है।
23. दर्ज की गई दो प्राथमिकियों में अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई। दो एफआईआर में, हमने देखा कि मामले में आगे प्रगति हुई और जांच अधिकारियों ने आरोपपत्र दायर किया। हालांकि, यह सच है कि पहले प्रतिवादी को उनमें बरी कर दिया गया। निश्चित रूप से दोषमुक्ति इस आधार पर नहीं है कि पहले प्रतिवादी क े खिलाफ कोई सबूत नहीं था। हम साक्ष्य का अभाव क े आधार पर बरी किए जाने को सम्मानजनक या बरी किए जाने क े रूप में वर्णित करने में असमर्थ हैं।
24. हम देख सकते हैं कि अंतिम प्राथमिकी प्राथमिकी संख्या 98/2012 है। उच्च न्यायालय क े पहले क े फ ै सले में, हम उस त्रुटि पर ध्यान देते हैं जो स्पष्ट रूप से की गई थी, जिसमें भा.दं.सं. की धारा 324 को प्राथमिकी में शामिल किया गया था, जो ऐसा नहीं है। जब यह निर्णय आया जो अंततः उच्च न्यायालय क े निर्देश क े अनुसरण में लिया गया था, तो यह नोट किया जाता है कि प्रतिवादी क े खिलाफ धारा 324 क े तहत आरोप पत्र दायर किया गया था, यह सही प्रतीत होता है । प्रतिवादी क े विरुद्घ आरोप पत्र में स्पष्ट रूप से भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 341, 324 और 34 क े तहत एक मामला बनाने की कोशिश की गई थी। हम आगे नोटिस करते हैं कि पहले प्रतिवादी क े खिलाफ आरोप पीड़ित क े सिर पर गंडासा मारने का था। पहला मामला, जो प्राथमिकी नं. 81/99 है, जिसमें भा.दं.सं. की धारा 341, 323, 148, 149, 504 और 324 क े तहत अपराधों से संबंधित पहले प्रतिवादी क े खिलाफ आरोप पत्र भी दायर किया गया था। उसमें, आरोप जो उच्च न्यायालय द्वारा नोट किया गया था, वह यह था कि पहले प्रतिवादी ने पीड़ित क े हाथ पर तलवार से प्रहार किया था।
25. भारतीय दंड भा.दं.सं. की खंड 324 अजमानतीय अपराध है। इस प्रकार, दो मामलों में, जांच प्राधिकारी द्वारा भा.दं.सं. की धारा 324 क े लिए भी उनक े खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था। हाल क े एक फ ै सले में, इस न्यायालय को नियोक्ता की नियुक्ति से इनकार करने की शक्ति पर विचार करने का अवसर मिला। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह मामला पुलिस सेवा से संबंधित है। क ु छ दिशा-निर्देश जारी किए गए थे और इस मामले पर एक समिति द्वारा विचार किया जाना था। पुलिस आयुक्त बनाम राज क ु मार क े मामले में, हम विशेष रूप से पैराग्राफ 29 और 30 पर ध्यान दे सकते हैंः “29. लोक सेवा:-किसी भी अन्य सार्वजनिक सेवा की तरह, यह पहले से ही माना जाता है कि राज्य नियोक्ता क े पास अपनी सेवा में प्रवेश देने क े लिए समानान्तर विकल्प का एक तत्व है। सिद्धांतों क े आधार पर मानदंड आवश्यक पहलुओं जैसे योग्यता, अनुभव, आयु, किसी उम्मीदवार क े लिए अनुमत प्रयासों की संख्या आदि को नियंत्रित करते हैं। ये मोटे तौर पर सार्वजनिक सेवा में प्रवेश करने क े इच्छ ु क प्रत्येक उम्मीदवार या आवेदक क े लिए आवश्यक पात्रता शर्तों का गठन करते हैं। संविधान क े तहत न्यायिक समीक्षा की अनुमति यह सुनिश्चित करने क े लिए है कि वे मानक निष्पक्ष और तर्क संगत हैं और बिना किसी भेदभाव क े निष्पक्ष रूप से लागू होते हैं। हालांकि, उपयुक्तता पूरी तरह से अलग है- सार्वजनिक नियोक्ता की स्वायत्तता या विकल्प, सबसे अधिक है, जब तक कि निर्णय लेने की प्रक्रिया न तो अवैध है, न ही अनुचित है, और न ही सद्भावना की कमी है।
30. उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण, जो उम्मीदवारों की युवावस्था और आयु क े बारे में उसकी टिप्पणियों से स्पष्ट है, ऐसे व्यवहार की सामान्य स्वीकार्यता का संक े त देता प्रतीत होता है जिसमें मामूली अपराध या दुर्व्यवहार शामिल है। आक्षेपित आदेश एक व्यापक दृष्टिकोण का संक े त देता है कि युवाओं की उम्र और ग्रामीण परिवेश को देखते हुए इस तरह क े अपराध को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। इस न्यायालय की राय है कि इस तरह क े सामान्यीकरण, जिससे अपराधी क े आचरण को माफ किया जाता है, को न्यायिक फ ै सले में शामिल नहीं किया जाना चाहिए और इससे बचा जाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में क ु छ प्रकार क े अपराध, जैसे महिलाओं क े साथ छेड़छाड़, या अतिचार और पिटाई, हमला, चोट पहुंचाना या गंभीर चोट पहुंचाना (हथियारों क े उपयोग क े साथ या उसक े बिना), पीड़ितों क े लिए भी जाति या पदानुक्रम आधारित व्यवहार का संक े त हो सकता है। प्रत्येक मामले की जांच संबंधित सार्वजनिक नियोक्ता द्वारा अपने नामित अधिकारियों द्वारा की जानी है, विशेष रूप से पुलिस बल क े लिए भर्ती क े मामले में, जो व्यवस्था बनाए रखने और अराजकता से निपटने क े लिए एक कर्तव्य क े अधीन हैं, क्योंकि लोगों का विश्वास पैदा आदेश की उनकी योग्यता समाज की सुरक्षा क े लिए एक सुरक्षा कवच है।
26. जहां तक संदीप क ु मार (ऊपर) में पहले प्रतिवादी क े विद्वान अधिवक्ता द्वारा संदर्भित निर्णय का संबंध है, हम देखते हैं कि यह भारतीय दंड संहिता की धारा 325 क े साथ पठित खंड 34 क े तहत एक मामला था। यह घटना, इस न्यायालय द्वारा नोट की गई, कथित मामले में, उस समय हुई जब उम्मीदवार की उम्र 20 वर्ष थी ।
27. जैसा कि हमने पहले ही देखा है, पहला प्रतिवादी प्रत्यक्षतः लगभग 30 साल का था जब प्राथमिकी नंबर 98/12 से संबंधित घटना कथित रूप से हुई थी। इस संदर्भ में यह ध्यान देने की जरूरत नहीं है कि इस पद क े लिए विज्ञापन अगले ही वर्ष जारी कर दिया गया था यानी वर्ष 2013 में|
28. हम पिछली घटना की तारीख, उसकी आयु और विज्ञापन जारी करने क े समय और उसी क े आधार पर पहले प्रतिवादी द्वारा किए गए आवेदन क े बीच तालमेल को देखते हैं।
29. हमने यह भी देखा है कि जहां तक मोहम्मद इमरान (उपर्युक्त) क े निर्णय का संबंध है, अभिजीत सिंह पवार (उपर्युक्त) में रिपोर्ट किए गए इस न्यायालय क े बाद क े निर्णय द्वारा उक्त निर्णय की सराहना की गई है। हम पहली और आखिरी एफआईआर में मामले की प्रक ृ ति को पहले ही नोट कर चुक े हैं।
30. इसलिए, हम यह सोचेंगे कि उम्र को ध्यान में रखते हुए, उन अपराधों की प्रक ृ ति जिनमें पहले प्रतिवादी को जोड़ा गया था और दो प्राथमिकी, जिनमें मामला प्राथमिकी क े स्तर से चार्जशीट क े स्तर तक किस तरीक े से आगे बढ़ा और समाप्त हो गया। पर्याप्त रूप से एक समझौते क े आधार पर बरी होना और जहां गवाह मुकर गए और उस पद की प्रक ृ ति जिसक े लिए पहला प्रतिवादी एक उम्मीदवार था, मामले को उच्च न्यायालय द्वारा अलग तरीक े से देखा जाना चाहिए था। यहां एक बार फिर हमें इस पहलू पर ध्यान देना चाहिए कि न्यायिक समीक्षा में न्यायालय अपने आप में निर्णय से संबंधित नहीं है। यह चिंता की बात है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया दोषपूर्ण नहीं है। परिस्थितियां, जहां न्यायालय निर्णय क े गुण-दोष में हस्तक्षेप करेगा, इतनी अच्छी तरह से स्थापित हैं कि किसी भी पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं है। हम संभवतः यह नहीं मान सकते कि अवतार सिंह में निर्णय को ध्यान में रखने क े बाद अपीलकर्ता द्वारा अपनी समिति द्वारा से लिया गया निर्णय, हालांकि इसमें क े वल पैराग्राफ 38.1.[4] का ही उल्लेख किया गया है किंतु प्रतिपादित सिद्घांतों क े अनुरुप था, में उच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप किया जाना चाहिए था। दूसरे शब्दों में, हम सोचते है कि इस मामले क े तथ्यों में, अपीलकर्ता क े निर्णय में हस्तक्षेप आवश्यक नहीं थी।
31. उपर्युक्त चर्चा का परिणामस्वरुप अपील मंजूर की जानी चाहिए।
32. हम अपील को स्वीकार करते हैं। आक्षेपित निर्णय को रद्द किया जाता है।
33. खर्च क े बारे में कोई आदेश नहीं किया जाता है। जे. [क े. एम. जोसेफ] जे. [पामीदिघंटम श्री नरसिम्हा] नई दिल्ली 16 सितंबर, 2021 यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास'क े जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है। अस्वीकरण: यह निर्णय पक्षकार को उसकी भाषा में समझाने क े सीमित उपयोग क े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से भी अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।