Full Text
े सर्वो च्च न्यायालय में
दीर्वोानी अपीलीय क्षेत्राधि कार
दीर्वोानी अपील सं. ......र्वोर्ष 2021
(विर्वोशेर्ष अनुमधित याधि%का (दीर्वोानी) संख्या...................र्वोर्ष 2021 से उद्भूत)
(विर्वोशेर्ष अनुमधित याधि%का (दीर्वोानी) डी. संख्या 1855 र्वोर्ष 2020 से उद्भूत)
विर्वोश्वबं ु ... अपीलार्थी1
बनाम
श्री क
ृ ष्ण और एक अन्य। ... प्रत्यर्थी1गण
विनणय
न्यायमूर्तित उदय उमेश ललिलत
JUDGMENT
1. विर्वोलंब माफ विकया गया।
2. अनुमधित प्रदत्त की गयी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 2021 INSC 570
3. इन अपीलों में विनम्न को %ुनौती दी गईः (i) ) एफएएफओ (आदेश से प्रर्थीम अपील) सं. 2473 र्वोर्ष 2005 में उच्च न्यायालय[1] द्वारा पारिरत 21.04.2006 क े विनणय और आदेश; और (i) i) ) 2005 क े उक्त एफएएफओ सं. 2473 में दालिSल सीएमआरए (दीर्वोानी प्रकीण रिरकॉल प्रार्थीना-पत्र) सं. 107616/2009 में उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत 18.10.2019 का आदेश।
4. र्वोाद क े प्रत्यर्थी1 संख्या 2 ने सिसविर्वोल जज (जूविनयर धिडर्वोीजन), मैनपुरी, उत्तर प्रदेश की अदालत में एक मुकदमा दायर विकया, सिजसमें ब्याज सवि]त अन्य बातों क े सार्थी न की र्वोसूली क े लिलए मुकदमा दायर विकया गया र्थीा विक र्वोाद में प्रधितर्वोादी यानी प्रत्यर्थी1 संख्या 1 उसक े द्वारा विदए गए 2,400/- रुपये र्वोापस करने में विर्वोफल र]ा र्थीा, जो उसने ग्राम पं%ायत मैनपुरी ग्रामीण, त]सील और सिजला मैनपुरी में नगला रते में स्थिaर्थीत गाटा संख्या 1616/0.93 एकड़ की संपलित्त की विबक्री क े लिलए भागतः विर्वोक्रय प्रधितफल क े रूप में विदया र्थीा। विदनांक 25.05.1993 को मुकदमा दायर विकया गया र्थीा और जैसा विक पंजीक ृ त डाक द्वारा प्रत्यर्थी1 संख्या 1 को भेजा गया समन 'लेने से मना करने' क े डाक समर्थीन क े सार्थी र्वोापस प्राप्त ]ुआ र्थीा, विर्वो%ारण न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश विदनांक 19.02.1997 विनम्न र्थीाः- "र्वोाद पुकारा गया।र्वोादी की ओर से उसक े अधि र्वोक्ता ]ासिजर ]ैं। प्रधितर्वोादी की ओर से कोई भी उपस्थिaर्थीत न]ीं ]ुआ। प्रधितर्वोादी को भेजा गया पंजीक ृ त नोविटस, इनकार की विटप्पणी क े सार्थी प्राप्त ]ुआ र्थीा।नोविटस को पयाप्त माना जाता ]ै।प्रधितर्वोादी की ओर से कोई भी उपस्थिaर्थीत न]ीं ]ै, प्रधितर्वोादी को तदनुसार एकपक्षीय रूप से आगे बढ़ाया जा र]ा ]ै। एकपक्षीय कायर्वोा]ी क े लिलए विदनांक 01.04.1997 को पेश ]ो।"
1. उच्च न्यायालय, इला]ाबाद Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds इसक े बाद मामले को क ु छ तारीSों पर aर्थीविगत कर विदया गया और अंत में 16.09.1997 को 9% ब्याज क े सार्थी 2,400/-रू. की नराशिश प्रत्यर्थी1 संख्या 2 क े पक्ष में एकपक्षीय धिडक्री पारिरत की गई।
5. विदनांक 16.09.1997 की धिडक्री क े विनष्पादन की मांग करते ]ुए प्रत्यर्थी1 संख्या 2 द्वारा दायर आर्वोेदन में, 0.93 एकड़ की संपलित्त जो विर्वोक्रय क े करार की विर्वोर्षय र्वोaतु र्थीी, को विदनांक 29.05.1999 की क ु कp नोविटस द्वारा क ु क करने की मांग की गई र्थीी। बाद में, संपलित्त को अमीन द्वारा दालिSल एक रिरपोट क े आ ार पर विदनांक 04.12.1999 क े आदेश द्वारा क ु क विकया गया र्थीा। रिरपोट से पता %लता ]ै विक %ूंविक विनण1तऋणी यानी प्रत्यर्थी1 संख्या 1 को तलाशी पर न]ीं पाया जा सका, प्रत्यर्थी1 संख्या 1 क े विनर्वोास aर्थीान पर मुनादी करायी गयी।
6. 29.01.2000 को विर्वो%ारण न्यायालय द्वारा विनम्नलिललिSत आदेश पारिरत विकया गया र्थीाः- "मुकदमा आज प्रaतुत ]ुआ।र्वोाद पुकारा गया।धिडक्री ारी अपने अधि र्वोक्ता क े सार्थी उपस्थिaर्थीत ]ै।संपलित्त की क ु कp की रिरपोट दज की जाती ]ै।धिडक्री ारी 15 विदनों क े भीतर आदेश XXI विनयम 66 क े त]त नोविटस क े लिलए कायर्वोा]ी करेगा।"
7. विदनांक 04.04.2000 को आदेशिशका तामीलकता द्वारा विनम्नलिललिSत प्रभार्वो का एक रिरपोट दालिSल विकया गया र्थीाः "आज 02.04.2000 को मैं नगला रते सिजला मैनपुरी आया और श्री क ृ ष्ण को तलाशा और उसे एक नोविटस विदया और इसकी प्राविप्त को नोविटस की प्रधित पर ]aताक्षर करक े उनक े द्वारा विर्वोधि र्वोत aर्वोीकार विकया गया ]ै।" Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
8. उपरोक्त परिरस्थिaर्थीधितयों में, विनष्पादन अदालत ने 06.12.2000 को संपलित्त की विबक्री का र्वोारंट जारी विकया, सिजसक े त]त संपलित्त को 16.12.2000 को नीलाम करने का विनदtश विदया गया र्थीा और र्वोारंट को 23.12.2000 को या उससे प]ले विर्वोधि र्वोत विनष्पाविदत विकया जाना र्थीा। तदनुसार, 16.12.2000 को संपलित्त को नीलामी क े लिलए रSा गया र्थीा सिजसमें र्वोतमान अपीलकता ने 1,25,000/-रू. की बोली क े सार्थी सबसे अधि क की बोली लगायी। विन ारिरत प्रविक्रया क े अनुसार, अपीलकता द्वारा राशिश का 1/4 र्वोां वि]aसा जमा विकया गया र्थीा।
9. विदनांक 19.12.2000 को प्रत्यर्थी1 संख्या 1, प]ली बार अदालत में पेश ]ुआ और सिसविर्वोल प्रविक्रया संवि]ता (संक्षेप में 'संवि]ता') क े आदेश IX विनयम 13 क े त]त एक आर्वोेदन दायर विकया, सिजसमें प्रार्थीना की गई विक एकपक्षीय धिडक्री विदनांक 16.09.1997 को अपाaत विकया जाए। आर्वोेदन में य] अशिभकर्थीन विकया गया र्थीाः "... आर्वोेदक ने र्वोादी क े पक्ष में विर्वोक्रय क े लिलए एक करार को विनष्पाविदत विकया और आर्वोेदक आज तक इसे विनष्पाविदत करने क े लिलए ]मेशा तैयार र्थीा। आर्वोेदक क े पास पैसे न]ीं ]ैं। य] विक र्वोादी ने अदालत को गुमरा] करक े 16.09.1997 को अपने पक्ष में एकपक्षीय विनणय पारिरत कराया और माननीय न्यायालय क े समक्ष एक विनष्पादन याधि%का दायर की। य] विक इस विनष्पादन अदालत से कोई समन या नोविटस जारी न]ीं विकया गया। य] विक र्वोादी ने विनष्पादन की कायर्वोा]ी को सिसविर्वोल जज (सीविनयर धिडर्वोीजन) मैनपुरी की अदालत में aर्थीानांतरिरत कराया, जो र्वो]ां लंविबत ]ै, सिजससे आर्वोेदक को अपूरणीय क्षधित का सामना करना पड़ र]ा ]ै और आर्वोेदक ने जानबूझकर %ूक न]ीं की ]ै और आर्वोेदक को मुकदमे की सार्थी ]ी सार्थी विनष्पादन की कायर्वोा]ी क े बारे में भी कोई जानकारी न]ीं ]ै। एकपक्षीय विनणय क े कारण आर्वोेदक को अपूरणीय क्षधित और ]ाविन का सामना करना पड़ र]ा ]ै। न्याय क े वि]त में, Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds विदनांक 16.09.1997 क े विनणय और धिडक्री को अपाaत विकया जाना %ावि]ए। आर्वोेविदक को र्वोादी क े पधित द्वारा 16.12.2000 को दी गई जानकारी से मुकदमे और विनष्पादन की कायर्वोा]ी का ज्ञान प्राप्त ]ुआ, इसलिलए य] आर्वोेदन समय पर ]ै।"
10. उपरोक्त आर्वोेदन 05.07.2005 को अपर सिजला न्याया ीश, मैनपुरी द्वारा विनम्नलिललिSत विटप्पशिणयों क े सार्थी Sारिरज कर विदया गया र्थीाः- “य] भी नोट विकया जाता ]ै विक एकपक्षीय विनणय और धिडक्री पारिरत करने क े बाद प्रत्यर्थी1 ने विनष्पादन कायर्वोा]ी शुरू की जो 04/1998 क े रूप में पंजीक ृ त र्थीी। इस विनष्पादन कायर्वोा]ी में आर्वोेदक पर सम्मन की तामील पयाप्त रूप से की गई र्थीी। इसक े बार्वोजूद आर्वोेदक ने 19.12.2000 को ब]ाली का आर्वोेदन दायर विकया। विदनांक 02.04.2000 को विनष्पादन कायर्वोा]ी क े ज्ञान से, र्वोतमान आर्वोेदन विनष्पादन कायर्वोा]ी क े लस्थिम्बत र]ने क े बारे में ज्ञान से 8 म]ीने से अधि क समय क े बाद दायर विकया गया, सिजससे य] पता %लता ]ै विक इसका विर्वोशिशष्ट ज्ञान ]ोने क े बार्वोजूद, उन्]ोंने परिरसीमा की अर्वोधि क े बाद य] आर्वोेदन दायर विकया ]ै और आर्वोेदन में जो कारण विदSाया गया ]ै, र्वो] पूरी तर] से गलत, तुच्छ और विनरा ार ]ै। य] विक विदनांक 04.04.2000 क े आदेशिशका तामीलकता की रिरपोट से इनकार करने क े लिलए कोई सबूत पेश न]ीं विकया गया ]ै सिजसमें उसने क]ा र्थीा विक विदनांक 02.04.2000 को आर्वोेदक को विर्वोधि र्वोत रूप से समन विदया गया र्थीा और न ]ी उक्त रिरपोट में ]ेरफ े र विकया जाना ]ै।"
11. प्रत्यर्थी1 संख्या 1 ने व्यशिर्थीत ]ोकर, 05.07.2005 क े आदेश को %ुनौती देते ]ुए उच्च न्यायालय में एफएएफओ 2473/2005 दायर विकया।उक्त एफएएफओ क े लस्थिम्बत र]ने क े दौरान, विनष्पादन संख्या 4/1998 में संबंधि त अदालत द्वारा पारिरत 10.01.2006 क े आदेश क े आ ार पर 30.03.2006 को अपीलकता क े पक्ष में विर्वोक्रय प्रमाण पत्र जारी विकया गया र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
12. 21.04.2006 को एफएएफओ संख्या 2473/2005 को उच्च न्यायालय ने विनम्नलिललिSत विटप्पशिणयों क े सार्थी अनुमधित दीः- "र्वोतमान मामले में, अपीलकता सतक न]ीं प्रतीत ]ोता ]ै जैसा विक उसे ]ोना %ावि]ए र्थीा, विफर भी समग्र आ%रण से उसे एक गैर-सिजम्मेदार मुकदमेबाज क े रूप में दोर्षी न]ीं ठ]राया जा सकता ]ै।इसक े अलार्वोा, अपीलकता की अनुपस्थिaर्थीधित क े कारण र्वोादी प्रधितर्वोादी को ]ोने र्वोाली असुविर्वो ा की भरपाई उधि%त लागत लगाकर की जा सकती ]ै। न्याय वि]त में और मामले की विर्वोशेर्ष परिरस्थिaर्थीधितयों में, मैं आक्षेविपत विनणय और धिडक्री को अपाaत करता ]ूँ। इस अपील क े फलaर्वोरूप 1000/- रुपये की लागत क े सार्थी अनुमधित दी जाती ]ै। विर्वो%ारण न्यायालय को विनदtश विदया जाता ]ै विक र्वो] पक्षकारों को अर्वोसर प्रदान करने क े बाद र्वोाद को गुणार्वोगुण क े आ ार पर विनण1त करे।"
13. इसक े बाद, प्रत्यर्थी1 संख्या 2 ने सीएमआरए संख्या 107616/2009 को इस आ ार पर र्वोापस ब]ाल करने की मांग की विक प्रत्यर्थी1 संख्या 1 को विदनांक 17.02.1997 से कायर्वोा]ी की पूरी जानकारी र्थीी और उसने आशयपूर्वोक र्वो जानबूझकर मामले में पेश ]ोने और प्रधितर्वोाद करने से पर]ेज विकया र्थीा। ]ालाँविक 18.10.2019 क े अपने आदेश द्वारा उच्च न्यायालय ने आर्वोेदन को Sारिरज कर विदया गया र्थीा, य] देSते ]ुए विक उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत विदनांक 21.04.2006 क े आदेश क े बाद, र्वोाद को पत्रार्वोली पर पुनः ब]ाल कर विदया गया र्थीा और र्वोाद-विबन्दु प]ले से ]ी विर्वोरधि%त र्थीे।
14. विदनांक 21.04.2006 और 18.10.2019 क े ये दो आदेश र्वोतमान में %ुनौती क े अ ीन ]ैं।
15. इस न्यायालय द्वारा पारिरत 20.02.2020 क े आदेश द्वारा र्वोतमान अपील में नोविटस जारी करते ]ुए, आगे की कायर्वोा]ी पर रोक लगा दी गई। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
16. ]मने अपीलकता की ओर से विर्वोद्वान र्वोरिरष्ठ अधि र्वोक्ता श्री गोपाल शंकरनारायणन और प्रत्यर्थी1 संख्या 1 की ओर से विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता श्री प्रदीप क ु मार यादर्वो को सुना।
17. र्वोरिरष्ठ विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता श्री शंकरनारायणन द्वारा क]ा गया विक प्रत्यर्थी1 संख्या 1 को ]मेशा कायर्वोा]ी क े बारे में पता र्थीा और उसने जानबूझकर मामले में पेश ]ोने और प्रधितर्वोाद करने से पर]ेज विकया र्थीा; संवि]ता क े आदेश IX विनयम 13 क े त]त प्रार्थीना-पत्र में उसक े रुS से पता %लता ]ै विक र्वो] मूल र्वोादी क े पक्ष में विर्वोक्रय विर्वोलेS विनष्पाविदत करने क े लिलए तैयार र्थीे और उसक े पास भागतः प्रधितफल क े रूप में उसक े द्वारा प्राप्त राशिश को %ुकाने क े लिलए कोई पैसा न]ीं र्थीा। य] क]ा गया र्थीा विक एक नीलामी क्र े ता क े रूप में अपीलकता ने सभी कानूनी अपेक्षाओं का अनुपालन विकया र्थीा और उसक े पक्ष में विर्वोक्रय प्रमाण-पत्र भी जारी विकया गया र्थीा।
18. दूसरी ओर, विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता श्री प्रदीप क ु मार यादर्वो ने क]ा विक उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आदेशों में विकसी भी ]aतक्षेप की आर्वोश्यकता न]ीं ]ै और य] विक मुकदमे की फाइल को पुनःaर्थीाविपत कर विदया गया ]ै, मामले को तार्किकक विनष्कर्ष पर ले जाने की अनुमधित दी जानी %ावि]ए।
19. पंजीक ृ त डाक द्वारा जारी विकए गए सम्मन को इनकार करने क े डाक समर्थीन क े सार्थी र्वोापस प्राप्त विकया गया र्थीा, जैसा विक 19.02.1997 क े आदेश से aपष्ट ]ोगा।संवि]ता क े आदेश V विनयम 9 क े उप-विनयम (5) में क]ा गया ]ै विक यविद प्रधितर्वोादी या उसक े अशिभकता ने सम्मन र्वोाले डाक लेS को लेने से इनकार कर विदया र्थीा, तो सम्मन जारी करने र्वोाली अदालत य] घोर्षणा करेगी विक सम्मन विर्वोधि र्वोत रूप से प्रधितर्वोादी को तामील ]ो गया र्थीा। इस प्रकार 19.02.1997 का Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds आदेश पूरी तर] से कानूनी अपेक्षाओं क े अनुरूप र्थीा। र्थीोड़ा अलग संदभ में,सीसी अलार्वोी ]ाजी बनाम पलापेट्टी मो]म्मद और एक अन्य[2] में इस न्यायालय क े तीन न्याया ीशों की एक Sंडपीठ ने सामान्य Sंड अधि विनयम, 1897 की ारा 27 क े प्रभार्वो पर विर्वो%ार करते ]ुए विनम्नलिललिSत विटप्पशिणयां कीः- "14. ारा 27 इस उप ारणा को जन्म देती ]ै विक नोविटस की तामील तब प्रभार्वोी ]ो गई ]ै जब इसे पंजीक ृ त डाक द्वारा स]ी पते पर भेजा जाता ]ै। उक्त उप ारणा क े मद्देनजर, जब य] क]ा गया ]ै विक सम्मविनत व्यविक्त(ड्रॉअर) क े पते पर पंजीक ृ त डाक द्वारा एक नोविटस भेजा गया ]ै, तो परिरर्वोाद में आगे प्रकर्थीन करना अनार्वोश्यक ]ै नोविटस विबना तामील ]ुए लौटने क े बार्वोजूद, य] तामील ]ुई मानी जाती ]ै या पार्वोती (सिजसे भेजा गया ]ै) को नोविटस का ज्ञान ]ोना माना जाता ]ै। जब तक पार्वोती (सिजसे भेजा गया) द्वारा इसक े विर्वोपरीत साविबत न]ीं विकया जाता ]ै, तब तक नोविटस की तामील को उस समय पर प्रभार्वोी माना जाता ]ै सिजस समय पत्र कारोबार क े सामान्य अनुक्रम में परिरदत्त विकया गया ]ोगा। य] न्यायालय प]ले ]ी य] अशिभविन ारिरत कर %ुका ]ै विक जब पंजीक ृ त डाक द्वारा कोई नोविटस भेजा जाता ]ै और उसे "इनकार" या "घर में मौजूद न]ीं" या "घर में तालाबंद" या "दुकान बंद" या "पार्वोती सिजले में न]ीं" क े डाक पृष्ठांकन क े सार्थी लौटा विदया जाता ]ै, तो सम्यक तामील की उप ारणा की जानी %ावि]ए।[जगदीश सिंस] बनाम नत्र्थीू सिंस]3: मध्य प्रदेश राज्य बनाम ]ीरालाल और अन्य[4] और र्वोी. राजा क ु मारी बनाम पी. सुब्बारामा नायडू और एक अन्य[5] द्वारा]......."
2. एआईआर 2007 एससी (सप्लीमेंट) 1705
3. एआईआर 1992 एससी 1604
4. (1996) 7 एससीसी 523
5. (2004) 8 एससी 774 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds
20. एकपक्षीय धिडक्री क े पारिरत ]ोने क े बाद भी, 04.04.2000 को आदेशिशका तामीलकता द्वारा दालिSल रिरपोट से aपष्ट रूप से पता %लता ]ै विक प्रत्यर्थी1 संख्या 1 को नोविटस तामील की गयी र्थीी सिजसे नोविटस की प्रधित पर ]aताक्षर करक े उसक े द्वारा विर्वोधि र्वोत aर्वोीकार विकया गया र्थीा। इस तर] की जानकारी क े बार्वोजूद, प्रत्यर्थी1 संख्या 1 ने विदसंबर, 2000 में संपलित्त को नीलाम ]ोने विदया। नीलामी क े बाद ]ी, उसने संवि]ता क े आदेश IX विनयम 13 क े त]त प्रार्थीना पत्र दायर विकया। इसलिलए उच्च न्यायालय ने 21.04.2006 क े अपने आदेश में स]ी ]ी विन ारिरत विकया विक प्रत्यर्थी1 संख्या 1 सतक न]ीं र्थीा। विफर भी, उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थी1 संख्या 1 क े पक्ष में रा]त प्रदान की।
21. उपरोक्त विर्वोशेर्षताओं और इस तथ्य क े आलोक में, विक नीलामी करने की अनुमधित दी गई र्थीी, प्रत्यर्थी1 संख्या 1 को प्रार्थीना की गयी विकसी भी रा]त का दार्वोा करने से र्वोंधि%त कर विदया गया र्थीा। इसक े अलार्वोा, नीलामी में कायर्वोा]ी पूरी ]ोने क े बाद, अपीलकता क े पक्ष में विर्वोक्रय प्रमाण पत्र भी जारी कर विदया गया र्थीा।
22. इसलिलए, ]म इन अपीलों की अनुमधित देते ]ैं, उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत 21.04.2006 और 18.10.2019 क े आदेशों को अपाaत करते ]ैं और संवि]ता क े आदेश IX विनयम 13 क े त]त प्रत्यर्थी1 संख्या 1 द्वारा दालिSल प्रार्थीना-पत्र को Sारिरज करते ]ैं। लागत क े लिलए कोई आदेश न]ीं ]ोगा। ………….........................… [न्यायमूर्तित उदय उमेश ललिलत] Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds ………...........................… [न्यायमूर्तित एस. रर्वोींद्र भट] नई विदल्ली; 29 सिसतंबर, 2021 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds