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भारत का सर्वोच्च न्यायालय
सिविल अपीलीय क्षेत्राधिकार
2021 की सिविल अपील संख्या 6205
राजस्थान राज्य और अन्य ..........अपीलार्थी (गण)
बनाम
सुरजी देवी .........प्रत्यर्थी
निर्णय
एम. आर. शाह, न्यायाधीश
JUDGMENT
1. राजस्थान उच्च न्यायालय,जोधपुर द्वारा दिनांक 01.03.2019 को डी.बी. विशेष अपील रिट संख्या 1045/2018 में पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश, जिसक े द्वारा उच्च न्यायालय ने उक्त अपील को खारिज कर दिया है और विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा दिनांक 17.01.2017 पारित उस आदेश की पुष्टि की है जिसक े द्वारा विद्वान एकल न्यायाधीश ने प्रत्यर्थी क े दिवंगत पति की सेवा से बर्खास्तगी क े आदेश दिनांक 16.12.1996 को रद्द कर दिया था। इससे व्यथित और असंतुष्ट होकर राजस्थान राज्य और अन्य ने वर्तमान अपील दायर की है।
2. वर्तमान अपील से जुड़े तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं:- 2.[1] प्रत्यर्थी क े स्वर्गीय पति श्री रामेश्वर लाल ग्राम सेवक क े पद पर कार्यरत थे। उन्हें जानबूझकर ड्यूटी पर अनुपस्थित रहने और ऑडिट पूरा नहीं करने क े आधार पर दिनांक 08.01.1996 क े आदेश द्वारा सेवा से निलंबित कर दिया गया था। पंचायत समिति नोखा की प्रशासनिक समिति ने दिनांक 26.02.1996 की अपनी बैठक में उन्हें सेवा से हटाने का निर्णय लिया। इसक े बाद 14 मार्च 1996 को दैनिक समाचार पत्र में एक सार्वजनिक सूचना प्रकाशित की गई, जिसक े तहत रामेश्वर लाल को 15 दिनों की अवधि क े भीतर स्पष्टीकरण क े साथ कार्यभार ग्रहण करने का निर्देश दिया गया। 15 दिन बीत जाने क े बाद भी रामेश्वर लाल ड्यूटी पर नहीं आए। इसक े बाद उक्त रामेश्वर लाल- प्रत्यर्थी क े दिवंगत पति को राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 (इसक े बाद अधिनियम 1994 क े रूप में संदर्भित) की धारा 91 (3) और राजस्थान सेवा नियम, 1951 क े नियम 86 क े प्रावधानों को लागू करते हुए दिनांक 16.12.1996 क े आदेश द्वारा सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रत्यर्थी क े दिवंगत पति ने अधिनियम 1994 की धारा 91(4) क े तहत जारी किए गए बर्खास्तगी क े आदेश क े खिलाफ जिला स्थापना समिति, जिला परिषद, बीकानेर क े समक्ष एक अपील दायर की। कथित अपील विचाराधीन रहने क े दौरान कर्मचारी-रामेश्वर लाल का 18 सितम्बर, 2009 को निधन हो गया। उसक े बाद प्रत्यर्थी ने उच्च न्यायालय क े समक्ष एक सिविल रिट याचिका 11405/2011 की एकल पीठ क े समक्ष दिनांक 16.12.1996 क े बर्खास्तगी/समाप्ति क े आदेश को चुनौती दी गई थी। 17.01.2017 दिनांकित निर्णय और आदेश द्वारा, विद्वान एकल न्यायाधीश ने कथित रिट याचिका को अनुमति दी और 16.12.1996 दिनांकित बर्खास्तगी क े आदेश को रद्द कर दिया और अपीलार्थियों को यह निर्देश दिया कि प्रत्यर्थी क े पति को 16.12.1996 को सेवानिवृत्त मानते हुए, प्रत्यर्थी को सभी अनुवर्ती लाभ दिये जाएँ। विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय और आदेश की खण्ड पीठ क े आक्षेपित निर्णय और आदेश द्वारा पुष्टि की गई है। इसलिए वर्तमान अपील दायर की गई है।
3. हमने संबंधित पक्षों की ओर से पेश होने वाले विद्वान अधिवक्ता को विस्तार से सुना है।
4. जो तथ्य सामने आए हैं वे यह हैं कि प्रत्यर्थी क े स्वर्गीय पति को दिनांक 16.12.1996 क े आदेश द्वारा सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। उसने एक अपील प्रस्तुत की, जो अपील अधिकारी क े समक्ष लंबित थी। अपील विचाराधीन रहने क े दौरान, प्रत्यर्थी क े दिवंगत पति-कर्मचारी की वर्ष 2009 में मृत्यु हो गई। यदि प्रत्यर्थी क े स्वर्गीय पति को सेवा से बर्खास्त नहीं किया गया होता तो वह वर्ष 1999 में सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त कर लेता। कर्मचारी (प्रत्यर्थी क े दिवंगत पति) की मृत्यु क े बाद प्रत्यर्थी ने अपील को आगे नहीं बढ़ाया, शायद उसे उसक े पति द्वारा अपील दायर करने/या अपील लंबित क े होने की जानकारी न हो। उसक े बाद प्रत्यर्थी (कर्मचारी की विधवा) ने वर्ष 2012 में उच्च न्यायालय क े समक्ष एक रिट याचिका दायर की। इस प्रकार, जब प्रत्यर्थी ने उच्च न्यायालय क े समक्ष एक रिट याचिका प्रस्तुत की, तब तक कर्मचारी की बर्खास्तगी की तारीख से 15 वर्ष बीत चुक े थे और यहां तक कि उस तारीख से अर्थात् वर्ष 1999 से लगभग 13 वर्ष बीत चुक े थे, जिस तारीख को कर्मचारी सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त कर लेता। उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, विद्वान एकल न्यायाधीश को क े वल विलंब क े आधार पर दिनांक 16.12.1996 को पारित बर्खास्तगी क े आदेश को चुनौती देते हुए वर्ष 2012 में रिट याचिका पर विचार नहीं करना चाहिए था। इस स्तर पर, यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि इस तथ्य क े बावजूद कि विद्वत एकल न्यायाधीश क े समक्ष रिट याचिका में प्रत्यर्थी द्वारा विशेष रूप से अपने पति द्वारा प्रस्तुत अपील का निर्णय करने क े लिए प्राधिकारी को निर्देश देने की प्रार्थना की गई थी, उपरोक्त प्रार्थना और लंबित अपील क े बावजूद, विद्वत एकल न्यायाधीश ने मामले क े गुणावगुण पर विचार किया और बर्खास्तगी क े आदेश दिनांकित 16.12.1996 को रद्द कर दिया।
5. प्रत्यर्थी की ओर से कहा गया है कि 16.12.1996 को बर्खास्तगी आत्यन्तिक रूप से अवैध थी और नैसर्गिक न्याय क े सिद्धांतों क े खिलाफ थी, एक बार जब हम यह अभिनिर्धारित कर लेते हैं कि रिट याचिका विलंब या किसी कमी क े कारण बाधितहो गई थी, उसक े बाद इसक े गुणागुण पर विचार करने की आवश्यकता नहीं थी। जैसा कि इसमें ऊपर अवलोकन किया गया है, विद्वत एकल न्यायाधीश ने वर्ष 1996 में पारित बर्खास्तगी क े आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार कर क े त्रुटि की है, क्योंकि वो विलंब और कमी से ग्रसित थी औरविशेष रूप से इसलिए भी कि यदि बर्खास्तगी का आदेश पारित नहीं किया गया होता तो भी मृतक कर्मचारी वर्ष 1999 में सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त करक े सेवानिवृत्त हो गया होता।
6. उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए और ऊपर बताए गए कारणों से, वर्तमान अपील को स्वीक ृ ति प्रदान की जाती है। उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ द्वारा दिनांक 01.03.2019 को पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश और विद्वत एकल न्यायाधीश द्वारा दिनांक 17.01.2017 को पारित निर्णय और आदेश को इसक े द्वारा रद्द किया जाता है। मामले क े तथ्यों और परिस्थितियों में, लागत क े विषय में कोई आदेश नहीं किया जाता है.....… न्यायाधीश (एम आर शाह.....… न्यायाधीश (ए एस बोपन्ना ) नई दिल्ली। 07 अक्टूबर, 2021. यह अनुवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल 'सुवास'क े जरिए अनुवादक की सहायता से किया गया है। अस्वीकरण: यह निर्णय वादी क े प्रतिबंधित उपयोग क े लिए उसकी भाषा में समझाने क े लिए स्थानीय भाषा में अनुवादित किया गया है और किसी अन्य उद्देश्य क े लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। सभी व्यावहारिक और आधिकारिक उद्देश्यों क े लिए, निर्णय का अंग्रेजी संस्करण प्रामाणिक होगा और निष्पादन और कार्यान्वयन क े उद्देश्य से अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।