Full Text
े सर्वोच्च न्यायालय में
आपराधिक अपीलीय अधिकार क्षेत्र
दाण्डिक अपीलीय संख्या 1164/2021
(एसएलपी (सीआरएल) संख्या 4512/2019 से उत्पन्न)
जियो वर्गीज - अपीलकर्ता
बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य - प्रतिवादी
निर्णय
क
ृ ष्णा मुरारी, जे.
JUDGMENT
1. अनुमति अनुदत्त की गई।
2. राजस्थान उच्च न्यायालय, खण्ड पीठ जयपुर (जिसे इसमें इसक े बाद 'उच्च न्यायालय' क े रूप में संदर्भित किया गया है) द्वारा दिनांक 30.04.2019 को पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश, जिसक े द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 162/2018 दिनांकित 02.05.2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 306 क े तहत अभियोजन का सामना कर रहे सेंट जेवियर्स स्क ू ल, नेवता, जयपुर क े आरोपी शारीरिक प्रशिक्षण शिक्षक, निवासी सोडाला, जयपुर शहर (दक्षिण) द्वारा उक्त आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग करने वाली द.प्र.सं. की धारा 482 क े तहत प्रस्तुत याचिका को खारिज कर दिया गया।
3. अपीलकर्ता को वर्ष 2016 में सेंट जेवियर्स स्क ू ल, नेवटा में शारीरिक प्रशिक्षण शिक्षक क े रूप में नियुक्त किया गया था। वह पहली से पांचवीं कक्षा तक क े छात्रों को शारीरिक प्रशिक्षण दे रहे थे।वह स्क ू ल क े छात्रों द्वारा समग्र अनुशासन बनाए रखने क े लिए अनुशासन समिति क े सदस्य भी थे।
4. संस्थान की कक्षा 9 क े एक छात्र ने दुर्भाग्यवश दिनांक 26.04.2018 को सुबह लगभग 4:00 बजे आत्महत्या कर ली। मृत छात्र की मां ने आत्महत्या क े लगभग 7 दिनों क े बाद 2 मई, 2018 को संबंधित पुलिस स्टेशन में भा.दं.सं. की धारा 306 क े तहत प्राथमिकी दर्ज कराई और आरोप लगाया कि अपीलकर्ता द्वारा मानसिक उत्पीड़न क े कारण उनक े बेटे ने आत्महत्या कर ली।
5. शिकायतकर्ता-प्रत्यर्थी नं.[2] द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट में प्रकट विस्तृत तथ्य ये थेः दिनांक 26 अप्रैल, 2018 को 14 वर्ष की आयु क े उसक े बेटे नितांत राज लता को उसकी दादी ने सुबह 4 बजे कमरे में पंखे से लटका हुआ पाया। उसे तुरंत नीचे उतार कर संतोक बा दुर्लभजी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।अस्पताल प्रशासन ने तुरंत संबंधित पुलिस स्टेशन को सूचित किया व उसी दिन मृतक क े शव को पुलिस को सौंप दिया गया और पोस्टमॉर्टम किया गया। प्राथमिकी में आगे कहा गया है कि दिनांक 19.04.2018 को, नितांत राज (मृतक) ने उसे सूचित किया कि उक्त दिन उसक े पीटीआई (शारीरिक प्रशिक्षण शिक्षक) जियो सर ने सभी की उपस्थिति में उसका उत्पीड़न और अपमान किया था, जिसक े कारण वह गहरे मानसिक दबाव में था। हालांकि, शिकायतकर्ता ने अपने बेटे को राजी किया और उसे सोमवार को स्क ू ल भेज दिया। इसक े बाद, दिनांक 25 अप्रैल, 2018 को जब बच्चा स्क ू ल में था, तो स्क ू ल से सुबह लगभग 9:00 बजे एक टेलीफोन कॉल प्राप्त हुआ जिसमें अभिभावकों को अगले दिन यानि 26 अप्रैल, 2018 को स्क ू ल आने क े लिए कहा गया। जब नितांत 25 अप्रैल, 2018 को स्क ू ल से लौटा तो वह बहुत दबाव में था और पूछताछ करने पर उसने बताया कि आज फिर जियो पीटीआई सर ने उसे परेशान किया और उसका बहुत अपमान किया है। इस पर उसने बच्चे को समझाया कि हम कल स्क ू ल जाएंगे और चर्चा करेंगे क्योंकि स्क ू ल से एक फोन आया था। इसक े बाद बच्चा और भी ज्यादा दबाव और तनाव में था। वह सोने क े लिए अपने कमरे में गया और सुबह लगभग 04:00 बजे पंखे से लटका हुआ पाया गया। यह भी कहा गया है कि 30 अप्रैल, 2018 को सुबह 11 बजे सहायक उप निरीक्षक श्री कल्लू खान घर आए और उसक े कमरे की तलाशी ली, जहां दो पन्नों का एक आत्महत्या लेख, पर्दा, जिसका इस्तेमाल फांसी लगाने क े लिए किया गया था, अन्य वस्तुएं जैसे की खाली कॉपी, जिसमें से दो पन्ने फाड़े गये थे और एक नोटबुक बरामद की गयी।
6. श्री अभिषेक गुप्ता, अपीलकर्ता क े विद्वान अधिवक्ता, डॉ. मनीष सिंघवी, राज्य-प्रत्यर्थी नं. 1 क े विद्वान अधिवक्ता और श्री आदित्य क ु मार चौधरी, राज्य- प्रत्यर्थी नं. 2 क े विद्वान अधिवक्ता को सुना। हमने पक्षकारों क े विद्वान अधिवक्ता की सहायता से आक्षेपित निर्णय और मामले क े रिकॉर्ड को भी देखा है।
7. श्री अभिषेक गुप्ता, अपीलकर्ता क े विद्वान अधिवक्ता ने पुरजोर तर्क दिये कि प्रथम सूचना रिपोर्ट क े सामान्य पठन पर, किसी भी कल्पना से, यह नहीं कहा जा सकता है कि भा.दं.सं. की धारा 306 क े तहत परिभाषित अपराध क े गठन क े लिए आवश्यक घटक साबित नहीं होते हैं और शिकायत कथित अपराध क े किए जाने का खुलासा नहीं करती है ।
8. आगे यह भी कहा गया कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अपीलकर्ता ने किसी भी तरह से मृतक द्वारा आत्महत्या करने क े लिए उकसाया नहीं क्योंकि ऐसी कोई भी सामग्री रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है और यदि इसे जारी रखने की अनुमति दी जाती है तो वर्तमान कार्यवाही कानून की प्रक्रिया क े दुरुपयोग क े अलावा क ु छ नहीं होगी।
9. श्री अभिषेक गुप्ता द्वारा हमें उस सुसाइड नोट क े बारे में भी बताया जो संलग्नक पी-2 क े रूप में दाखिल किया गया है। इसक े अवलोकन से पता चलता है कि यह तीन पृष्ठों का एक लेख है जिसमें प्रत्येक अलग-अलग पृष्ठ पर निम्नलिखित लिखा हैः "पृष्ठ 01 - "माई ऑल थिंग्स टू माई डियर ब्रो क ै रन इवन माई लव बाई बडी एंड सॉरी" "पृष्ठ 02- "नीडेड जस्टिस" "पृष्ठ 03- "थैंक्स जियो (पीटीआई) ऑफ माई स्क ू ल”
10. राजस्थान राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी का कहना है कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है और इसमें विशेष रूप से अपीलकर्ता का नाम लेते हुए एक आत्महत्या लेख है। उन्होंने आगे कहा कि अपीलकर्ता ने दिनांक 19.04.2018 से 24.04.2018 तक मृतक को परेशान किया और अंततः अपीलकर्ता की शिकायत पर जब दिनांक 25.04.2018 को प्रिंसिपल द्वारा मृतक को कक्षाओं में बंकिंग क े लिए बुलाया गया और अभिभावकों को भी दिनांक 26.04.2018 को स्क ू ल आने क े लिए कहा गया, तो मृतक ने 25.04.2018-26.04.2018 की दरम्यानी रात को आत्महत्या कर ली । उत्पीड़न और आत्महत्या में निकट संबंध है और इस प्रकार, अपीलकर्ता क े खिलाफ कथित संज्ञेय अपराध क े लिए प्रथमदृष्टया मामला बनता है और उच्च न्यायालय ने प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करने से इंकार कर दिया है।
11. श्री आदित्य क ु मार चौधरी, विद्वान अधिवक्ता, प्रतिवादी नं. 2- 'शिकायतकर्ता' की ओर से उपस्थित होकर कथन करते हैं कि आक्षेपित प्रथम सूचना रिपोर्ट स्पष्ट रूप से यह बताती है कि अपीलकर्ता क े अपमान, उत्पीड़न क े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कार्यों ने मृतक लड़क े को आत्महत्या करने क े लिए प्रेरित किया। उन्होंने आगे प्रस्तुत किया कि अपीलकर्ता क े कारण मेन्स रिया का प्रश्न इस स्तर पर स्थापित नहीं किया जा सकता है जब जांच अभी पूरी नहीं हुई है।
12. हमने पक्षकारों की ओर से पेश होने वाले विद्वान अधिवक्ताओं क े प्रतिद्वंद्वी दलीलों पर विचार किया है और पूरे रिकॉर्ड का अवलोकन किया है।
13. हमारे देश में, जबकि आत्महत्या अपने आप में अपराध नहीं है क्योंकि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति विधि की पहुंच से परे है किंतु आत्महत्या का प्रयास भा.दं.सं. की खंड 309 क े अधीन अपराध माना जाता है। किसी को आत्महत्या क े लिए दुष्प्रेरण भी भारतीय दंड भा.दं.सं. की खंड 306 क े तहत अपराध है। भा.दं.सं. की खंड 306 को उपवर्णित करना सुसंगत होगा जो इस प्रकार हैः
306. आत्महत्या क े लिए दुष्प्रेरण: यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है, तो जो कोई ऐसी आत्महत्या करने क े लिए उकसाता है, वह दोनों में से किसी भांति क े कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकती है, दंडित किया जाएगा और जुर्माने का भी भागी होगा।
14. यद्यपि, भा.दं.सं. 'आत्महत्या' शब्द को परिभाषित नहीं करता है किंतु आत्महत्या का साधारण शब्दकोश अर्थ 'आत्म-हत्या' है। यह शब्द एक आधुनिक लैटिन शब्द 'सुसिडियम', से लिया गया है, जिसमे 'सुई' का अर्थ है 'खुद की' और 'सीडियम' का अर्थ है 'हत्या'। इस प्रकार, आत्महत्या शब्द का अर्थ 'आत्म-हत्या' का कार्य है। दूसरे शब्दों में, मृत्यु का कार्य स्वयं मृतक द्वारा किया जाना चाहिए, भले ही उसक े द्वारा आत्महत्या करने क े उद्देश्य को प्राप्त करने क े लिए अपनाए गए साधन क ु छ भी हों।
15. भा.दं.सं. की खंड 306 आत्महत्या क े दुष्प्रेरण को एक आपराधिक अपराध बनाती है और इसक े लिए दंड विहित करती है। भा.दं.सं. क े खंड 107 में दुष्प्रेरण को परिभाषित किया गया है, जो इस प्रकार हैः “107 वस्तु का दुष्प्रेरण -एक व्यक्ति किसी दुष्प्रेरण को करने क े लिए उकसाता है, जो - पहला- किसी को भी ऐसा करने क े लिए उकसाता है। दूसरा- उस कार्य को करने क े लिए किसी भी षडयंत्र में एक या अधिक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों क े साथ शामिल होता है, यदि उस षडयंत्र क े अनुसरण में और उस कार्य को करने क े लिए कोई कार्य या अवैध चूक होती है। तीसरा - जानबूझकर, किसी भी कार्य या अवैध चूक द्वारा, उस कार्य को करने में सहायता करता है। व्याख्या 1. कोई व्यक्ति जो जानबूझकर गलत बयानी करक े या जानबूझकर किसी तात्विक तथ्य को छिपाकर, जिसका वह खुलासा करने क े लिए बाध्य है, स्वेच्छा से किसी कार्य को कराता है या प्राप्त करता है, या करने का प्रयास करता है, ऐसा कहा जाता है कि वह कार्य करने क े लिए उकसाता है। व्याख्या 2. जो कोई भी किसी कार्य क े किए जाने से पहले या उसक े समय में, उस कार्य क े किए जाने को सुकर बनाने क े लिए क ु छ भी करता है, और इस प्रकार उसक े किए जाने को सुकर बनाता है, वह उस कार्य को करने में सहायता करने वाला कहा जाता है।
16. 'उकसाना' शब्द का सामान्य शब्दकोश का अर्थ है किसी को क ु छ करने क े लिए भड़काना या प्रेरित करना। इस न्यायालय ने रमेश क ु मार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2001), 9 एससीसी 618 क े मामले में 'उकसाना' शब्द को निम्नानुसार परिभाषित किया हैः उकसाने का मतलब है उकसाना, आगे बढ़ना, उकसाना, उकसाना या कोई काम करने क े लिए प्रोत्साहित करना।
17. न्यायालय द्वारा भा.दं.सं. की धारा 107 और भा.दं.सं. की धारा 306 क े साथ इसक े सह-संबंध की व्याप्ति और परिधि पर बार-बार चर्चा की गई है। एस. एस. चीना बनाम विजय क ु मार महाजन (2010) 12 एससीसी 190 और अन्य वाले मामले में यह मत व्यक्त किया गयाः "उकसाने में किसी व्यक्ति को दुष्प्रेरण किसी कार्य को करने में किसी व्यक्ति की जानबूझकर मदद करने की मानसिक प्रक्रिया शामिल है। आत्महत्या करने क े लिए उकसाने या सहायता करने क े लिए अभियुक्त की ओर से सकारात्मक कार्य किए बिना, दोषसिद्धि को कायम नहीं रखा जा सकता है। विधायिका की मंशा और उच्चतम न्यायालय द्वारा तय किए गए मामलों क े अनुपात से स्पष्ट है कि भा.दं.सं. की खंड 306 क े तहत किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने क े क्रम में अपराध कारित करने का स्पष्ट मेन्स रिया होना चाहिए। इसक े लिए एक सक्रिय कार्य या प्रत्यक्ष कार्य की भी आवश्यकता होती है जिसक े कारण मृतक ने कोई विकल्प न देखकर आत्महत्या कर ली और उस कार्य का इरादा मृतक को ऐसी स्थिति में धक े लना होना चाहिए कि उसने आत्महत्या कर ली।"
18. भा.दं.सं. की धारा 107 क े भा.दं.सं. की धारा 306 क े साथ सह-संबंध पर विचार करते हुए अर्नब मनोरंजन गोस्वामी बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य, (2021) 2 एससीसी 427 क े मामले में इस न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने हाल ही में सुनाए गए निर्णय में निम्नलिखित मत व्यक्त किया हैः "47. उपर्युक्त निर्णय एक ऐसी स्थिति में आया था जहां उच्च न्यायालय ने 14 (2014) 4 एस. सी. सी. 453 भाग 1 33 सी. आर. पी. सी. की खंड 482 क े अधीन प्राथमिकी आर. को अभिखंडित करने क े लिए याचिका ग्रहण करने से इनकार कर दिया था। बहरहाल, अदालत ने जांच एजेंसी को जांच विचाराधीनता रहने क े दौरान आरोपी को गिरफ्तार नहीं करने का निर्देश दिया।इस न्यायालय ने इसे अननुज्ञेय अभिनिर्धारित किया था। दूसरी ओर, इस न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि उच्च न्यायालय उचित समझता है, तो उसे कानून द्वारा अभिखंडित करने क े मापदंडों और आत्म संयम को ध्यान में रखते हुए, जांच को रद्द करने का अधिकार क्षेत्र है और वह उचित अंतरिम आदेश पारित कर सकता है जैसा कि कानून में उपयुक्त माना गया है। अतः, स्पष्ट रूप से, वर्तमान मामले में उच्च न्यायालय ने यह अभिखंडित करने क े लिए कि क्या उस अधिकार क्षेत्र क े प्रयोग में मानदंड विधिवत स्थापित किए गए हैं और यदि हां तो क्या अंतरिम जमानत की मंजूरी क े लिए कोई मामला बनाया गया है, एक याचिका पर प्रथमदृष्टया जांच करने से इंकार करक े स्वयं को गलत निर्देशित किया है। हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (भजनलाल) मामले में इस न्यायालय क े फ ै सले क े बाद से लगातार दोहराए जा रहे स्थापित सिद्धांतों में एक ऐसी स्थिति शामिल है जहां प्राथमिकी या शिकायत में किए गए आरोप, भले ही उन्हें उनक े वास्तविक मूल्य पर लिया गया हो और उन्हें पूरी तरह से स्वीकार किया गया हो, प्रथमदृष्टया किसी अपराध का गठन नहीं करते हैं या आरोपियों क े खिलाफ मामला नहीं बनाते हैं। इस कानूनी स्थिति को हाल ही में इस न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने कमल शिवाजी पोकरनेकर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में एक निर्णय में दोहराया था।
48. 56 पृष्ठों से अधिक क े उच्च न्यायालय क े आक्षेपित निर्णय का आश्चर्यजनक पहलू सबसे बुनियादी मुद्दे का प्रथमदृष्टया भी किसी मूल्यांकन की अनुपस्थिति में है।दूसरे शब्दों में, उच्च न्यायालय 15 1992 क े सप्लीमेंट 1 एस. सी. सी. 335 16 (2019) 14 एस. सी. सी. 350 भाग 1 34 मौलिक मुद्दे पर अपना मस्तिष्क प्रयुक्त करने में विफल रहा, जिस पर संविधान क े अनुच्छेद 226 या दंड प्रक्रिया संहिता की खंड 482 क े तहत अभिखंडित करने क े लिए याचिका पर विचार करते समय विचार करने की आवश्यकता थी। उच्च न्यायालय ने 9 नवंबर 2020 क े अपने फ ै सले में इसक े बजाय एक महीने बाद सुनवाई क े लिए खड़े होने क े लिए याचिका को रद्द करने की अनुमति दे दी और इसलिए अंतरिम जमानत क े लिए अपीलकर्ता की प्रार्थना को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और उसे सीआरपीसी की खंड 439 क े तहत उपचार क े लिए छोड़ दिया। इस बीच, स्वतंत्रता का नुकसान हुआ है। उच्च न्यायालय प्रथमदृष्टया मूल्यांकन करने में विफल रहा है कि क्या प्राथमिकी में लगाए गए आरोप, जैसा कि वे हैं, मामले को भा.दं.सं. की खंड 306 क े साथ पठित खंड 34 क े दायरे में लाते हैं, इस न्यायालय से अब कार्य करने क े लिए कहा जाता है.”
19. एम. अर्जुनन बनाम राज्य (2019) 3 एससीसी 315 क े मामले में, जिसका प्रतिनिधित्व इसक े पुलिस निरीक्षक द्वारा किया गया था, इस न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने भा.दं.सं. की खंड 306 क े अवयवों को निम्नलिखित शब्दों में स्पष्ट किया हैः भारतीय दंड संहिता की खंड 306 क े तहत अपराध क े आवश्यक तत्व इस प्रकार हैंः(i) उकसाना (ii)अभियुक्त का इरादा मृतक को आत्महत्या करने क े लिए सहायता करना, उकसाना या दुष्प्रेरित करना। तथापि, अभियुक्त का कार्य गाली - गलौज की भाषा का प्रयोग करक े मृतक का दुष्प्रेरण करना अपने आप में आत्महत्या क े लिए उकसाना नहीं होगा। इस बात का सबूत होना चाहिए कि इस तरह क े कार्य से आरोपी का इरादा मृतक को आत्महत्या करने क े लिए उकसाना था। जब तक आत्महत्या करने क े लिए उकसाने/उकसाने क े घटकों का समाधान नहीं हो जाता है, आरोपी को भारतीय दंड संहिता की खंड 306 क े तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
20. इस स्तर पर, हम उदे सिंह और अन्य बनाम हरियाणा राज्य (2019) 17 एससीसी 301 क े मामले में इस न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ क े हाल क े एक अन्य निर्णय का भी उल्लेख कर सकते हैं, जिसमें भा.दं.सं. की खंड 306 क े तहत अपराध क े आवश्यक तत्वों को निम्नलिखित शब्दों में स्पष्ट किया गया हैः "16. आत्महत्या क े अभिकथित दुष्प्रेरण क े मामलों में, आत्महत्या करने क े दुष्प्रेरण क े प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कार्य का सबूत अवश्य होना चाहिए।यह शायद ही विवादित हो कि आत्महत्या क े कारण का प्रश्न, विशेष रूप से आत्महत्या क े लिए उकसाने क े अपराध क े संदर्भ में, एक जटिल प्रश्न बना हुआ है, जिसमें मानव दुष्प्रेरण और प्रतिक्रियाओं/प्रतिक्रियाओं क े बहुआयामी और जटिल गुण शामिल हैं।आत्महत्या क े लिए उकसाने क े दुष्प्रेरण क े मामले में, न्यायालय आत्महत्या क े े कार्य क े ठोस और विश्वसनीय सबूत की तलाश करेगा।आत्महत्या क े मामले में, किसी अन्य व्यक्ति द्वारा मृतक क े उत्पीड़न क े क े वल अभिकथन ही पर्याप्त नहीं होगा जब तक कि अभियुक्त की ओर से ऐसी कार्रवाई न की जाए जो व्यक्ति को आत्महत्या करने क े लिए विवश करती हो और ऐसी आपत्तिजनक कार्रवाई घटना क े समय क े निकट होनी चाहिए। किसी व्यक्ति ने किसी अन्य व्यक्ति द्वारा आत्महत्या करने क े लिए उकसाया है या नहीं, इसे क े वल प्रत्येक मामले क े तथ्यों और परिस्थितियों से एकत्र किया जा सकता है।
16.1. यह पता लगाने क े प्रयोजन क े लिए कि क्या किसी व्यक्ति ने किसी अन्य व्यक्ति द्वारा आत्महत्या क े लिए दुष्प्रेरित किया है, यह विचार किया जाएगा कि क्या अभियुक्त आत्महत्या क े कार्य क े लिए उकसाने का दोषी है। जैसा कि ऊपर उल्लिखित निर्णयों में इस न्यायालय द्वारा स्पष्ट और दोहराया गया है, उकसाने का अर्थ है उकसाना, आगे बढ़ना, उकसाना, उकसाना या कोई कार्य करने क े लिए प्रोत्साहित करना। यदि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति अति संवेदनशील था और अभियुक्त की कार्रवाई से अन्यथा सामान्य रूप से यह आशा नहीं कि वह इसी तरह की परिस्थिति वाले व्यक्ति को आत्महत्या करने क े लिए प्रेरित करे तो अभियुक्त को आत्महत्या क े लिए उकसाने का दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं होगा। दूसरी ओर, यदि अभियुक्त अपने क ृ त्यों और अपने निरंतर आचरण से ऐसी स्थिति पैदा करता है जिसक े कारण मृतक को आत्महत्या करने क े अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं दिखता है, तो मामला भा.दं.सं. की खंड 306 क े चार कोनों क े भीतर आ सकता है। यदि अभियुक्त पीड़ित क े आत्म-सम्मान और आत्म-सम्मान को धूमिल करने में सक्रिय भूमिका निभाता है, जो अंततः पीड़ित को आत्महत्या करने क े लिए आकर्षित करता है, तो अभियुक्त को आत्महत्या क े लिए दुष्प्रेरण का दोषी ठहराया जा सकता है। ऐसे मामलों में अभियुक्त की ओर से मेन्स रिया क े प्रश्न की जांच अभियुक्त क े वास्तविक कार्यों और कार्यों क े संदर्भ में की जाएगी और यदि कार्य क े वल इस प्रकार क े हैं जहां अभियुक्त का इरादा दुष्प्रेरण या क्रोध क े स्नैप शो से अधिक क ु छ नहीं है, तो एक विशेष मामला आत्महत्या क े लिए उकसाने क े अपराध से कम हो सकता है। तथापि, यदि अभियुक्त शब्दों या कर्मों द्वारा तब तक मृतक को परेशान करता रहा या चिढ़ाता रहा जब तक कि मृतक ने प्रतिक्रिया नहीं दी या उसे उकसाया गया, तो एक विशेष मामला आत्महत्या क े लिए दुष्प्रेरण का हो सकता है। मानव व्यवहार क े नाजुक विश्लेषण का मामला होने क े कारण, अभियुक्त और मृतक क े कार्यों और मनोदशा पर प्रभाव डालने वाले सभी आसपास क े कारकों ध्यान में रखते हुए प्रत्येक मामले की जांच अपने स्वयं क े तथ्यों पर किए जाने की आवश्यकता है।"
21. हम नारायण मल्हारी थोराट बनाम विनायक देवराव भगत और अन्य (2019) 13 एससीसी 598 वाले मामले में इस न्यायालय क े दो न्यायाधीशों की पीठ क े निर्णय का भी संदर्भ ले सकते हैं, जिसमें उच्च न्यायालय द्वारा खंड 482 क े अधीन प्रथम इत्तिला रिपोर्ट को अभिखंडित करने क े निर्णय को अपास्त किया गया था। कथित मामले में, भा.दं.सं. की खंड 306 क े तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसमें कहा गया था कि बेटा और बहू एक जिला परिषद स्क ू ल में शिक्षक थे, जहां आरोपी शिक्षक भी बहू क े मोबाइल पर फोन करता था और उसे परेशान करता था। सूचनाकर्ता क े बेटे द्वारा आरोपी को समझाने और कॉल बंद करने की कोशिशों क े बावजूद, आरोपी ने अपनी गतिविधि जारी रखी। दिनांक 09.02.2015 को, सूचनाकर्ता क े बेटे और आरोपी क े बीच एक मौखिक बहस हुई और दिनांक 12.02.2015 को उसने आत्महत्या कर ली, जिसमें उसने एक नोट छोड़ दिया कि आरोपी द्वारा उसका पारिवारिक जीवन बर्बाद कर दिया गया है, जिसे माफ नहीं किया जाना चाहिए और उसे फांसी दी जानी चाहिए। दं.प्र.सं. 482 क े तहत, प्राथमिकी को चुनौती देते हुए आरोपी द्वारा एक याचिका दायर की गई थी, जिसे उच्च न्यायालय द्वारा अनुमति दी गई थी और उसक े बाद, इस न्यायालय क े समक्ष चुनौती दी गई थी.इस न्यायालय द्वारा अपील को अनुज्ञात किया गया और निम्नलिखित टिप्पणियां कीः "अब हम वर्तमान मामले क े तथ्यों पर विचार करते हैं। यह निश्चित आरोप है कि प्रथम प्रतिवादी पीड़िता की पत्नी को उसक े मोबाइल पर कॉल करता रहता था और उसे परेशान करता रहता था, जिसकी पुष्टि जांच क े दौरान पीड़िता की मां और पत्नी क े बयानों से होती है। रिकॉर्ड से पता चलता है कि आत्महत्या से 3-4 दिन पहले पीड़ित और पहले प्रतिवादी क े बीच झगड़ा हुआ था। इन तथ्यों क े आलोक में, इस तथ्य क े साथ कि सुसाइड नोट में पहले प्रतिवादी क े खिलाफ निश्चित आरोप लगाए गए थे, उच्च न्यायालय का यह प्रश्न पूछना उचित नहीं था कि क्या पहले प्रतिवादी का आत्महत्या करने में सहायता करने या उकसाने या उसे कम करने का अपेक्षित इरादा था। इस मोड़ पर जब जांच पूरी होनी बाकी थी और आरोप पत्र, यदि कोई हो, दायर किया जाना बाकी था, उच्च न्यायालय को इस पहलू पर नहीं जाना चाहिए था कि प्रतिवादी की ओर से अपेक्षित मानसिक तत्व या इरादा था या नहीं।" इस न्यायालय की उपर्युक्त टिप्पणियों में, यह स्पष्ट संक े त है कि प्राथमिकी में एक विशिष्ट प्रकथन था कि प्रतिवादी ने पीड़ित क े पति/पत्नी को लगातार परेशान किया था और पीड़ित द्वारा आपत्ति किए जाने क े बावजूद अपने आचरण में सुधार नहीं किया था.इस प्रकार, वास्तव में उसने आत्महत्या करने में सक्रिय रूप से मदद की थी।
22. भा. दं. सं. की धारा 306 क े तहत कथित तौर पर आत्महत्या क े लिए उकसाने क े लिए आवश्यक है कि आत्महत्या क े अपराध क े लिए उकसाने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष क ृ त्य का आरोप होना चाहिए और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा मृतक को परेशान करने का आरोप पर्याप्त नहीं होगा अपने आप में, जब तक कि अभियुक्त की ओर से ऐसे कार्यों क े आरोप न हों जो आत्महत्या करने क े लिए मजबूर करते हों। इसक े अलावा, यदि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अति संवेदनशील है और अभियुक्त पर लगाए गए आरोपों से आमतौर पर समान रूप से स्थित व्यक्ति को आत्महत्या करने का चरम कदम उठाने क े लिए प्रेरित करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, तो अभियुक्त को आत्महत्या क े लिए उकसाने का दोषी ठहराना असुरक्षित होगा। इस प्रकार, प्रत्येक मामले की उसक े अपने तथ्यों और परिस्थितियों पर और आसपास की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जांच करने की आवश्यकता है, जिसका अभियुक्त की कथित कार्रवाई और मृतक क े मानस पर प्रभाव पड़ सकता है।
23. उपरोक्त चर्चा की पृष्ठभूमि में, अब हम यह परीक्षण करने क े लिए वर्तमान मामले क े तथ्यों को विज्ञापित कर सकते हैं कि क्या भा.दं.सं की धारा 306 क े तहत अपराध की सामग्री, यहां तक कि जांच जारी रखने क े लिए प्रथम दृष्टया भी मौजूद है?
24. प्राथमिकी में कहा गया है कि पीड़ित लड़का गहरे मानसिक दबाव में था क्योंकि यहां अपीलकर्ता ने सभी की उपस्थिति में उसका उत्पीड़न और अपमान किया था और वह दिनांक 25.04.2018 को स्क ू ल जाने को तैयार नहीं था लेकिन शिकायतकर्ता द्वारा उसे स्क ू ल जाने क े लिए मना लिया गया था। जब वह स्क ू ल से लौटा, तो वह फिर से बहुत दबाव में था और पूछताछ करने पर बताया कि आज फिर से जियो, पीटीआई सर (अपीलकर्ता) द्वारा उसे परेशान और अपमानित किया गया। लड़क े को बताया गया कि अगले दिन उसक े माता-पिता को स्क ू ल बुलाया गया है और इससे वह और अधिक दबाव और तनाव में आ गया था।
25. प्रथम सूचना रिपोर्ट में और पुलिस द्वारा दर्ज किए गए शिकायतकर्ता क े बयान में भी, अपीलकर्ता द्वारा पीड़ित को परेशान करने और अपमानित करने क े लिए कोई कारण नहीं बताया गया है और न ही अपीलकर्ता की ओर से किसी भी कार्रवाई क े संबंध में कोई विवरण है जिसक े द्वारा मृत लड़क े को परेशान और अपमानित किया गया हो सकता है।
26. अपीलकर्ता ने उच्च न्यायालय क े समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की खंड 482 क े तहत अपनी याचिका में विस्तृत तथ्य और परिस्थितियां प्रस्तुत की हैं, जो दुर्भाग्य से उच्च न्यायालय निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उनका पूर्णतया विश्लेषण करने में विफल रहा। याचिका में कहा गया था कि एक पीटीआई शिक्षक क े रूप में वह पहली से पांचवीं कक्षा तक क े छात्रों को शारीरिक प्रशिक्षण दे रहे थे और अनुशासन समिति क े सदस्य होने क े नाते उन्हें स्क ू ल में अनुशासन बनाए रखने का कर्तव्य भी सौंपा गया था, जिसमें छात्रों पर नजर रखना और निगरानी रखना शामिल था कि वे बिना अनुमति क े स्क ू ल परिसर में घूम रहे हैं। यह भी कहा गया कि पीड़ित, कक्षा 9 का छात्र, आमतौर पर अपनी कक्षाओं को बंक करता था और अपीलकर्ता और अन्य स्क ू ल कर्मचारियों द्वारा कई बार चेतावनी दी गई थी। दिनांक 19.04.2018 को, उसे अपीलकर्ता द्वारा कक्षाओं से बंक मारते हुए और बिना किसी कारण या अनुमति क े स्क ू ल परिसर में घूमते हुए पकड़ा गया और उसे चेतावनी दी गई । दिनांक 25 अप्रैल, 2018 को उसे कक्षाओं में बंकिंग करते हुए पकड़ा गया और फिर से अपीलकर्ता ने उसे चेतावनी जारी की और लगातार कक्षाओं में बंकिंग क े कारण स्क ू ल क े प्रधानाचार्य को इसकी जानकारी दी, जिन्होंने लड़क े क े माता-पिता को स्क ू ल आने क े लिए सूचित किया।
27. शिक्षकों का यह परम कर्तव्य है कि वे विद्यार्थियों में अनुशासन का संचार करें। यह कोई असामान्य बात नहीं है कि शिक्षक किसी छात्र को पढ़ाई में ध्यान नहीं देने या ठीक से काम नहीं करने या कक्षाओं में गड़बड़ी करने या स्क ू ल न आने क े लिए फटकार लगाते हैं। किसी स्क ू ल क े शिक्षक या अन्य प्राधिकारियों द्वारा किसी छात्र को उसकी अनुशासनहीनता क े लिए फटकार लगाने क े लिए अपनाए गए अनुशासनात्मक उपाय, हमारी सुविचारित राय में, किसी छात्र को आत्महत्या क े लिए उकसाने क े समान नहीं होंगे, जब तक कि बिना किसी उचित कारण या कारण क े उत्पीड़न और अपमान क े बार-बार विशिष्ट आरोप न लगाए जाएं। किसी छात्र को उसक े व्यवहार या अनुशासनहीनता क े लिए एक शिक्षक द्वारा फटकार लगाना, जो किसी छात्र में मानव क े अच्छे गुणों को विकसित करने क े लिए नैतिक दायित्वों क े तहत है, निश्चित रूप से किसी छात्र द्वारा आत्महत्या करने क े लिए उकसाने या जानबूझकर सहायता करने क े बराबर नहीं होगा।
28. "छड़ी छोड़ो और बच्चे को बिगाड़ो" एक पुरानी कहावत वर्तमान समय में अपनी प्रासंगिकता खो सकती है और बच्चे को शारीरिक दंड को कानून द्वारा मान्यता नहीं दी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक शिक्षक या स्क ू ल क े अधिकारियों को छात्र क े किसी भी अनुशासनहीनता क े कार्य क े प्रति अपनी आंखें बंद कर लेनी चाहिए। बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की खंड 24 (ई) क े तहत यह एक शिक्षक का नैतिक कर्तव्य है कि वह अभिभावकों क े साथ नियमित रूप से बैठक करे और उपस्थिति, सीखने की योग्यता, सीखने में हुई प्रगति और बच्चे क े बारे में किसी भी अन्य कार्य या प्रासंगिक जानकारी क े बारे में उन्हें अवगत कराए।
29. इस प्रकार, अपीलकर्ता ने मृत लड़क े को नियमित रूप से कक्षाओं में बंक करते हुए पाया, पहले उसे फटकार लगाई, लेकिन बार-बार किए गए कार्यों क े कारण, प्रिंसिपल क े संज्ञान में इस तथ्य को लाया, जिसने स्क ू ल आने क े लिए माता-पिता को टेलीफोन पर बुलाया । न तो प्रथम सूचना रिपोर्ट में या शिकायतकर्ता क े बयान में अपीलकर्ता क े किसी और प्रत्यक्ष कार्य को जिम्मेदार ठहराया गया है, न ही कथित सुसाइड नोट में इस संबंध में क ु छ भी कहा गया है। कथित सुसाइड नोट में जहां तक अपीलकर्ता का संबंध है, 'थैंक्स जियो (पीटीआई) ऑफ माय स्क ू ल' लिखा हुआ है। इस प्रकार, यहां तक कि सुसाइड नोट में भी अपीलकर्ता की ओर से किसी भी कार्य या उकसावे को उसे उस अपराध से जोड़ने क े लिए जिम्मेदार नहीं ठहराता है जिसक े लिए उस पर आरोप लगाया जा रहा है।
30. यदि, एक छात्र को अनुशासनहीनता क े कार्य क े लिए एक शिक्षक द्वारा फटकार लगाई जाती है और अनुशासनहीनता क े निरंतर कार्य को संस्थान क े प्रधानाचार्य क े संज्ञान में लाया जाता है, जिसने स्क ू ल क े अनुशासन और एक बच्चे को सही करने क े उद्देश्य से छात्र क े माता-पिता को अवगत कराया, कोई भी छात्र जो बहुत भावुक या भावुक होकर आत्महत्या करता है, क्या उक्त शिक्षक को इसक े लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है और भा.दं.सं. की धारा 306 क े तहत आत्महत्या क े े अपराध क े लिए मुकदमा चलाया जा सकता है।
31. उपर्युक्त प्रश्न का हमारा उत्तर 'नहीं' है।
32. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता एक शिक्षक का पद धारण करता है और अपने नैतिक या कानूनी कर्तव्य क े निर्वहन में किए गए किसी भी कार्य को बिना किसी परिस्थिति क े दूर से भी इंगित करता है कि उसकी ओर से आत्महत्या क े लिए उकसाने का कोई इरादा था। उसक े अपने शिष्य क े लिए कोई भी कार्य जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रकार, प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों से उकसाने का तत्व स्पष्ट रूप से गायब है। अभिकथन से गायब होने वाले तत्व क े अभाव में, भा.दं.सं की धारा 306 क े तहत अपराध क े आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं।
33. उच्च न्यायालय ने सीआरपीसी की धारा 482 क े तहत याचिका को यांत्रिक रूप से इस आधार पर खारिज करते हुए इन सभी तथ्यों की स्पष्ट रूप से अनदेखी की है कि प्राथमिकी एक संज्ञेय अपराध क े किए जाने का खुलासा करती है।
34. दंड प्रक्रिया संहिता की खंड 482 क े अधीन न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का क्षेत्र और परिधि या भारत क े संविधान क े अनुच्छेद 226 क े अधीन असाधारण शक्ति अब न्यायिक घोषणाओं की श्रृंखला द्वारा अच्छी तरह से परिभाषित है। निःसंदेह, प्रत्येक उच्च न्यायालय को न्यायोचित रूप से कार्य करने अर्थात् वास्तविक और सारवान न्याय करने या न्यायालय की प्रक्रिया क े दुरुपयोग को रोकने की अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है। शक्तियां अपने आप में बहुत व्यापक होने क े कारण न्यायालयों पर एक गंभीर कर्तव्य अधिरोपित करती हैं, जिसक े प्रयोग में अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है। न्यायालय को यह सुनिश्चित करने क े लिए सावधान रहना चाहिए कि इस शक्ति क े प्रयोग में उसका निर्णय ठोस सिद्धांतों पर आधारित हो। न्यायालय में निहित शक्ति का प्रयोग वैध अभियोजन को दबाने क े लिए नहीं किया जाना चाहिए। निसंदेह, प्रत्येक उच्च न्यायालय क े पास कार्य करने की अंतर्निहित शक्ति होती है, अर्थात, वास्तविक और पर्याप्त न्याय करने क े लिए, या न्यायालय की प्रक्रिया क े दुरुपयोग को रोकने क े लिए। हालांकि, निहित शक्ति या असाधारण शक्ति उच्च न्यायालय को प्रदान की जाती है, उक्त न्यायालय को कार्यवाही को रद्द करने का अधिकार देता है, अगर यह निष्कर्ष निकलता है कि कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति देना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, या न्याय क े उद्देश्य क े लिए कार्यवाही को रद्द करने की आवश्यकता है।
35. कर्नाटक राज्य बनाम एल. मुनीस्वामी और अन्य (1977) 2 एससीसी 699 क े मामले में इस न्यायालय द्वारा निम्नलिखित टिप्पणियां की गई ं जो इस स्तर पर नोट करना प्रासंगिक हो सकता है: "सीआरपीसी की खंड 482 क े तहत क ु छ शक्तियां उच्च न्यायालय को किसी कार्यवाही को रद्द करने का अधिकार देती हैं, जब यह निष्कर्ष निकलता है कि कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा या न्याय क े उद्देश्यों क े लिए यह आवश्यक है कि कार्यवाही रद्द की जानी चाहिएउच्च न्यायालयों को हितकारी सार्वजनिक उद्देश्यों को प्राप्त करने क े लिए सिविल और आपराधिक दोनों मामलों में अंतर्निहित शक्ति प्रदान की गई है।न्यायालय की कार्यवाही को उत्पीड़न या उत्पीड़न क े हथियार में तब्दील होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।न्यायालय ने इस मामले में पाया कि न्याय क े लक्ष्य मात्र कानून क े सिरों से अधिक हैं, हालांकि न्याय को विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों क े अनुसार प्रशासित किया जाना चाहिए। "
36. माधवराव जिवाजीराव सिंधिया और अन्य बनाम संभाजीराव चन्द्रोजी राव आंग्रे और अन्य (1988) 1 एस. सी. सी. 692 वाले मामले में, इस न्यायालय ने पैरा 7 में निम्नलिखित रूप में मत व्यक्त कियाः "7. कानूनी स्थिति अच्छी तरह से स्थापित है कि जब प्रारंभिक चरण में किसी अभियोजन को खारिज करने क े लिए कहा जाता है, तो न्यायालय द्वारा लागू किया जाने वाला परीक्षण यह है कि क्या किए गए अविवादित आरोप प्रथमदृष्टया अपराध को साबित करते हैं। अदालत क े लिए यह भी है कि वह किसी विशेष मामले में दिखाई देने वाली किसी विशेष विशेषता पर विचार करे कि क्या अभियोजन को जारी रखने की अनुमति देना समीचीन और न्याय क े हित में है।यह इस आधार पर है कि अदालत का उपयोग किसी भी अप्रत्यक्ष उद्देश्य क े लिए नहीं किया जा सकता है और जहां अदालत की राय में अंतिम दोषसिद्धि की संभावना कम है और इसलिए आपराधिक अभियोजन को जारी रखने की अनुमति देकर कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं किया जा सकता है, तो अदालत किसी मामले क े विशेष तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कार्यवाही को रद्द भी कर सकती है, भले ही यह प्रारंभिक चरण में हो।"
37. हरियाणा राज्य और अन्य बनाम भजन लाल और अन्य (1992) सप्लीमेंट (1) एससीसी 335 वाले मामले में, इस न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि कोई सटीक, स्पष्ट रूप से परिभाषित और अपरिवर्तनीय मार्गदर्शक सिद्धांत या कठोर सूत्र अधिकथित अन्यना और उन मामलों की एक विस्तृत सूची विनिर्दिष्ट अन्यना संभव नहीं हो सकता है, जहां ऐसी शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए।हालाँकि, दृष्टांत क े माध्यम से, न्यायालय ने निम्नलिखित श्रेणियों क े मामले निर्धारित किए जिनमें ऐसी शक्ति का प्रयोग या तो न्यायालय की प्रक्रिया क े दुरुपयोग को रोकने क े लिए या अन्यथा न्याय क े उद्देश्यों को सुरक्षित करने क े लिए किया जा सकता है। “(1) जहां प्रथम सूचना रिपोर्ट या शिकायत में लगाए गए आरोप, भले ही वे उनक े फ े स वैल्यू पर लिए गए हों और अपने समग्रता में स्वीकार किए गए हों, प्रथमदृष्टया किसी अपराध का गठन नहीं करते हैं या आरोपी क े खिलाफ मामला नहीं बनाते हैं। (2) जहां एफ. आई. आर. क े साथ प्रथम सूचना रिपोर्ट में अभिकथन और अन्य सामग्री, यदि कोई हो, संहिता की खंड 155 (2) क े कार्यक्षेत्र क े भीतर मजिस्ट्रेट क े आदेश क े सिवाय संहिता की खंड 156 (1) क े अधीन पुलिस अधिकारियों द्वारा अन्वेषण को न्यायोचित ठहराते हुए संज्ञेय अपराध का प्रकटन नहीं करती है। (3) जहां प्रथम इत्तिला रिपोर्ट या प्राथमिकी में किए गए अविवादित अभिकथन और उसक े समर्थन में एकत्र किए गए साक्ष्य किसी अपराध क े किए जाने का प्रकटन नहीं करते हैं और अभियुक्त क े विरुद्ध मामला नहीं बनाते हैं। (4) जहां प्राथमिकी में आरोप एक संज्ञेय अपराध का गठन नहीं करते हैं, लेकिन क े वल एक गैर-संज्ञेय अपराध का गठन करते हैं, पुलिस अधिकारी द्वारा मजिस्ट्रेट क े आदेश क े बिना किसी भी जांच की अनुमति नहीं है, जैसा कि संहिता की धारा 155 (2) क े तहत विचार किया गया है। (5) जहां एफआईआर या शिकायत में लगाए गए आरोप इतने बेतुक े और स्वाभाविक रूप से असंभव हैं, जिसक े आधार पर कोई भी विवेकपूर्ण व्यक्ति कभी भी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता है कि अभियुक्त क े खिलाफ कार्यवाही करने क े लिए पर्याप्त आधार है। (6) जहां संहिता या संबंधित अधिनियम (जिसक े तहत एक आपराधिक कार्यवाही शुरू की जाती है) क े किसी भी प्रावधान में संस्था और कार्यवाही की निरंतरता और/या जहां संहिता में एक विशिष्ट प्रावधान है, क े किसी भी प्रावधान में एक स्पष्ट कानूनी रोक लगाई गई है या संबंधित अधिनियम, पीड़ित पक्ष की शिकायत क े लिए प्रभावी निवारण प्रदान करता है। (7) जहां कोई दांडिक कार्यवाही स्पष्ट रूप से दुर्भावना क े साथ की जाती है और/या जहां कार्यवाही अभियुक्त से प्रतिशोध लेने और निजी और व्यक्तिगत वैमनस्य क े कारण उसक े प्रति द्वेष रखने क े उद्देश्य से दुर्भावनापूर्ण रूप से संस्थित की जाती है।"
38. मैसर्स जंडू फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड और अन्य बनाम मोहम्मद शराफ ु ल हक और अन्य (2005) 1 एससीसी 122 क े मामले में इस न्यायालय ने निम्नलिखित मत व्यक्त कियाः "किसी भी कार्रवाई की अनुमति देना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा जिसक े परिणामस्वरूप अन्याय होगा और न्याय क े प्रचार को रोका जा सक े गा।शक्तियों का प्रयोग करते हुए न्यायालय द्वारा किसी भी कार्यवाही को रद्द करना न्यायसंगत होगा, यदि वह पाता है कि इसकी शुरूआत/जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है या इन कार्यवाहियों को रद्द करना न्याय क े उद्देश्यों की पूर्ति करेगा। जब शिकायत द्वारा कोई अपराध प्रकट नहीं किया जाता है तो न्यायालय तथ्य क े प्रश्न की जांच कर सकता है।जब किसी शिकायत को खारिज करने की मांग की जाती है, तो यह आकलन करने क े लिए सामग्री की जांच करने की अनुमति है कि शिकायतकर्ता ने क्या आरोप लगाए हैं और क्या कोई अपराध बनता है, भले ही आरोपों को पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया हो।"
39. जहाँ तक सुसाइड नोट का सवाल है, हमारी सूक्ष्म जाँच क े बावजूद, हम क े वल इतना ही कह सकते हैं कि सुसाइड नोट बयानबाजी का दस्तावेज़ है, जिसे एक अपरिपक्व दिमाग ने लिखा है। इसक े पठन से यह भी पता चलता है कि मृतक का अति संवेदनशील स्वभाव भी उसे ऐसा असाधारण कदम उठाने क े लिए प्रेरित करता है, जैसा कि आरोपी द्वारा, जो उसका शिक्षक था, कथित फटकार, अन्यथा सामान्य रूप से इसी तरह क े परिस्थितिजन्य छात्र को आत्महत्या करने क े लिए प्रेरित नहीं करती थी।
40. रिकॉर्ड पर किसी भी सामग्री की अनुपस्थिति में, यहां तक कि प्रथम दृष्टया, शिकायतकर्ता क े प्राथमिकी या बयान में, इस तरह क े किसी भी कार्य या इरादे को इंगित करते हुए कि वह अपने छात्र की आत्महत्या क े बारे में इरादा रखता था, यह सोचना भी हास्यास्पद तर्क होगा कि अपीलकर्ता का ऐसी परिस्थितियों में मृतक को रखने का कोई इरादा था कि उसक े पास आत्महत्या करने क े अलावा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था।
41. किसी विशिष्ट अभिकथन और निश्चित प्रक ृ ति की सामग्री की अनुपस्थिति में में, जो काल्पनिक या अनुमानतः नहीं है, अपीलार्थी-अभियुक्त को विचारण का सामना करने क े लिए कहना न्याय का उपहास होगा। एक आपराधिक मुकदमा वास्तव में एक सुखद अनुभव नहीं है और अपीलकर्ता, जो एक शिक्षक है, निश्चित रूप से बहुत अधिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त होगा, अगर उसे असंगत प्रक ृ ति क े हास्यास्पद तर्क आरोपों पर अभियोजन का सामना करना पड़ता है।
42. उपर्युक्त वर्णित मामले क े तथ्यात्मक पहलुओं और इस न्यायालय क े निर्णयों की एक श्रृंखला द्वारा प्रतिपादित कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, हमारा विचार है कि उच्च न्यायालय द्वारा अपनी निहित अधिकार क्षेत्र क े प्रयोग में प्रथम सूचना रिपोर्ट को अभिखंडित करने क े लिए दंड प्रक्रिया संहिता की खंड 482 क े अधीन आवेदन को खारिज करना न्यायोचित नहीं था।
43. हम शिकायतकर्ता क े दर्द और पीड़ा से अवगत हैं जो मृत लड़क े की मां है। यह भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक युवा जीवन को इस तरह से खो दिया गया है, लेकिन हमारी सहानुभूति और शिकायतकर्ता की पीड़ा को कानूनी उपचार में नहीं बदला जा सकता, आपराधिक अभियोजन तो दूर की बात है।
44. उपरोक्त तथ्यों और चर्चाओं को ध्यान में रखते हुए, दिनांक 30 अप्रैल, 2019 को उच्च न्यायालय क े आक्षेपित निर्णय को बरकरार नहीं रखा जा सकता है और इसे इसक े द्वारा रद्द कर दिया जाता है। जयपुर शहर (दक्षिण) क े सोडाला पुलिस स्टेशन में 2018 की क े स नंबर 162 क े रूप में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कर दिया जाता है।
45. तदनुसार, अपील मंजूर की जाती है।.........................जे. (एस. अब्दुल नजीर).........................जे. (क ृ ष्ण मुरारी) नई दिल्ली; 05 अक्टूबर, 2021 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language is made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purpose, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.