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भारत का उच्चतम न्यायालय
सिविलअपीलीय क्षेत्राधिकार
सिविल अपील संख्या 2899/2021
झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड - अपीलकर्ता
बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य - प्रतिवादी
निर्णय
आर. सुभाष रेड्डी, जे.
JUDGMENT
1. इस सिविल अपील में अपीलकर्ता द्वारा डी. बी. विशेष अपील रिट संख्या- 1854/2017 में दायर अंतर न्यायालय अपील को राजस्थान उच्च न्यायालय, पीठ जयपुर द्वारा खारिज करने वाले निर्णय और आदेश दिनांकित 11.12.2017 को चुनौती दी गई है, जिसमें रिट याचिका संख्या-11657/2017 में विद्वत एकल न्यायाधीश क े आदेश की पुष्टि की गई है। रिट याचिका में, दूसरे प्रत्यर्थी, अर्थात् राजस्थान सूक्ष्म और लघु उद्योग सुविधा परिषद, जयपुर (संक्षेप में, 'परिषद') द्वारा दिनांक 06.08.2012 को पारित आदेश पर सवाल उठाया गया।
2. यहां अपीलकर्ता, जो की पूर्ववर्ती झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड उत्तराधिकारी क ं पनी है, ने तीसरे प्रतिवादी मैसर्स अनामिका क ं डक्टर्स लिमिटेड, जयपुर,क े साथ एसीएसआर जेब्रा क ं डक्टरों की आपूर्ति क े लिए एक अनुबंध किया था। प्रत्यर्थी संख्या 3 ने एक लघु उद्योग होने का दावा करते हुए राजस्थान सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद से संपर्क किया, जिसमें बिल की मूल राशि क े रूप में 74,74,041 रुपये और ब्याज क े रूप में 91,59,705.02 रुपये की राशि का दावा किया। इस आधार पर कि अपीलकर्ता ने पहले क े नोटिसों का जवाब नहीं दिया है, परिषद ने अपीलकर्ता को 06.08.2012 को परिषद क े समक्ष पेश होने क े लिए सम्मन दिनांकित 18.07.2012 जारी किया। क े वल इस आधार पर कि अपीलकर्ता 06.08.2012 को उपस्थित नहीं हुआ है, परिषद द्वारा आदेश दिनांकित 06.08.2012 पारित किया गया था, जिसमें अपीलकर्ता को आदेश की तारीख से तीस दिनों की अवधि क े भीतर तीसरे प्रत्यर्थी को दावे क े अनुसार भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।
3. उक्त आदेश को सिविल रिट याचिका संख्या 11657/2017 क े रूप में उच्च न्यायालय क े समक्ष चुनौती दी गई थी, जिसे विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा खारिज कर दिया गया था। साथ ही अपीलकर्ता द्वारा दायर एक अंतर-न्यायालय अपील को भी खारिज कर दिया गया इसलिए, यह अपील दायर की गई।
4. हमने अपीलार्थी की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता श्री अनूप क ु मार, दूसरे प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी और तीसरे प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता श्री क ै लाश वासदेव को सुना। पक्षों क े वकीलों को सुनने क े बाद हमने आक्षेपित आदेश और रिकॉर्ड पर रखी गई अन्य सामग्री का अवलोकन किया है.
5. अपीलकर्ता क े विद्वान अधिवक्ता द्वारा मुख्य रूप से प्रतिवाद किया गया है की, क्योंकि तीसरे प्रतिवादी द्वारा की गई आपूर्ति पर क ु छ विवाद थे, इसलिए देय बिल राशि का तुरंत भुगतान नहीं किया गया था। यह कथन किया गया है कि क े वल इस आधार पर कि अपीलकर्ता ने सुलह की कार्यवाही में जवाब नहीं दिया है, परिषद द्वारा उचित अवसर दिए बिना सीधे आदेश पारित किया गया था। रिट याचिका में आक्षेपित आदेश सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (संक्षेप में 'एमएसएमईडी अधिनियम') की धारा 18,और मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996, क े प्रावधानों की अवहेलना करते हुए पारित किया गया था। यह निवेदन किया गया कि 06.08.2012 को परिषद द्वारा पारित आदेश क े बाद भी, अपीलकर्ता ने रिकॉर्ड का निरीक्षण करने क े बाद, तीसरे प्रतिवादी को देय राशि 63,43,488/- का भुगतान किया है। ऐसी राशि का भुगतान तीसरे प्रतिवादी को रिकॉर्ड का निरीक्षण करने क े बाद किया गया, जिसने बिना किसी विरोध क े वह राशि प्राप्त की थी। उसक े बाद तीन साल की अवधि क े बाद, तीसरे प्रत्यर्थी ने सिविल न्यायाधीश, रांची क े समक्ष 2016 का निष्पादन मामला संख्या-69 दायर किया है, जो अंततः संधार्य नहीं होने क े आधार पर खारिज हो गया। जब उक्त आदेश को रिट याचिका क े माध्यम से चुनौती दी गई थी, तो उक्त रिट याचिका को बाद में प्रत्याहरण क े आधार पर खारिज कर दिया गया था। यह निवेदन किया जाता है कि जब एमएसएमईडी अधिनियम की धारा 18 (3) क े तहत सुलह विफल हो जाती है, तो परिषद को मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू करनी होती है। सुलह की विफलता पर, परिषद या तो स्वयं विवाद को मध्यस्थता क े लिए लेगी या ऐसी मध्यस्थता क े लिए वैकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं प्रदान करने वाली किसी संस्था या क ें द्र को संदर्भित करेगी,और मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े प्रावधान विवाद पर इस तरह लागू होंगे, मानो मध्यस्थता,मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 7 की उप-धारा (1) क े तहत संदर्भित मध्यस्थता समझौते क े अनुसरण में हो। यह निवेदन किया जाता है कि इस मामले में प्रक्रिया का पालन किए बिना, रिट याचिका में आक्षेपित आदेश सीधे अपीलकर्ता को मध्यस्थता की कार्यवाही में भाग लेने का कोई अवसर दिए बिना पारित किया गया था। यह निवेदन किया गया कि क्योंकि कथित आदेश मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े अनिवार्य प्रावधानों की पूरी तरह से अवहेलना करते हुए पारित किया गया था, यह आदेश एक शून्य है और मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े प्रावधानों क े तहत एक पंचाट क े रूप में नहीं माना जा सकता है। यह आगे निवेदन किया गया है कि संविदा की शर्तों क े अनुसार कोई भी विवाद रांची में सिविल न्यायालयों क े अधिकार क्षेत्र क े अधीन था और तीसरे प्रतिवादी ने इस तरह की शर्तों पर सहमति व्यक्त करने क े बाद भी राजस्थान राज्य में परिषद से संपर्क किया था। इस प्रकार यह निवेदन किया जाता है कि परिषद द्वारा पारित आदेश अधिकार क्षेत्र क े इतर और समझौते क े नियमों और शर्तों क े विपरीत है।
6. दूसरे प्रत्यर्थी अर्थात् राजस्थान सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद की ओर से विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी ने निवेदन किया है कि उच्च न्यायालय द्वारा पारित आक्षेपित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। यह निवेदन किया गया है कि 06.08.2012 को परिषद द्वारा पारित पंचाट क े खिलाफ, अपीलकर्ता निर्धारित समय क े भीतर मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 34 (3) क े तहत सक्षम मंच क े समक्ष इसे चुनौती दे सकता था। यह निवेदन किया गया कि सक्षम मंच क े समक्ष पंचाट पर सवाल उठाने में विफल रहने क े कारण, अपीलकर्ता ने रिट याचिका क े माध्यम से परिषद क े आदेश पर सवाल उठाने का एक विलंबित प्रयास किया है, जिसे विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा उचित रूप से खारिज कर दिया गया था और उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ द्वारा इसकी पुष्टि कर दी गई। यह निवेदन किया जाता है कि चूंकि अपीलकर्ता ने परिषद द्वारा जारी किए गए विभिन्न नोटिसों/सम्मनों का जवाब नहीं दिया है, इसलिए परिषद ने स्वयं इस विवाद को उठाया है और पंचाट पारित किया है। श्री क ै लाश वासदेव तीसरे प्रतिवादी क े विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने निवेदन किया है कि यद्यपि आपूर्ति अनुबंध की शर्तों क े अनुसार की गई थी, अपीलकर्ता ने भुगतान में देरी की है जिसक े कारण तीसरे प्रतिवादी को परिषद से संपर्क करना पड़ा। हालांकि परिषद द्वारा कई नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन अपीलकर्ता ने इसका जवाब नहीं दिया है और अंत में 18 जुलाई 2012 को परिषद ने सम्मन जारी करक े 06.08.2012 को पंचाट इस आधार पर पारित किया कि अपीलकर्ता तीसरे प्रतिवादी को देय राशियों क े भुगतान में देरी का दोषी है। यह निवेदन किया जाता है कि पंचाट क े बाद अपीलकर्ता को एक नोटिस जारी किया गया था,पंचाट का अनुपालन करने क े बजाय, क े वल 63,43,488/- रुपये की राशि का भुगतान किया गया था। इसक े बाद चूंकि अधिनिर्णीत राशि का भुगतान नहीं किया गया था, इसलिए तीसरे प्रत्यर्थी ने रांची में सिविल अदालत क े समक्ष निष्पादन का मामला दायर किया है, उसी पर अपीलकर्ता द्वारा रिट याचिका क े माध्यम से सवाल किया उठाया गया था, जिसे बाद में प्रत्याहरण क े आधार पर खारिज कर दिया गया था। यह निवेदन किया जाता है कि रांची क े सिविल न्यायाधीश ने निष्पादन क े मामले को इस आधार पर खारिज कर दिया है कि यह क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र की कमी क े कारण संधार्य नहीं था, क्योंकि पंचाट 06.08.2012 को जयपुर में पारित किया गया था। यह निवेदन किया जाता है कि लगभग 9 महीने क े अंतराल क े बाद अपीलकर्ता द्वारा 2016 को सी. डब्ल्यू. पी. संख्या 6885 दाखिल की गई थी। यह निवेदन किया जाता है कि एमएसएमईडी अधिनियम लघु और मध्यम उद्यमों क े लिए एक लाभकारी विधान है। हालांकि उचित अवसर दिया गया था, अपीलकर्ता ने परिषद क े समक्ष इसका जवाब नहीं दिया है और उच्च न्यायालय द्वारा पारित आक्षेपित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। यह निवेदन किया जाता है कि जब पंचाट परिषद द्वारा पारित किया जाता है तो यह निर्दिष्ट अवधि क े भीतर मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 क े तहत चुनौती देने क े लिए खुला होता है और पंचाट पर सवाल उठाने में विफल रहने पर उच्च न्यायालय क े समक्ष रिट याचिका दायर करक े विलंबित प्रयास किया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने राजक ु मार शिवहरे बनाम सहायक निदेशक, प्रवर्तन निदेशालय और अन्य वाले मामले में इस न्यायालय क े निर्णय पर अपनी प्रविष्टियों क े समर्थन में भरोसा जताया है और आगे निवेदन किया कि अपीलकर्ता ने 63,43,488/- रुपये की राशि का भुगतान करक े पंचाट का आंशिक रूप से अनुपालन किया है, इस प्रकार इस समय इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।
7. रिट याचिका में अपीलकर्ता ने एमएसएमईडी अधिनियम क े तहत बनी 'परिषद'- दूसरे प्रतिवादी क े 06.08.2012 क े आदेश/पंचाट को चुनौती दी है। तीसरे प्रतिवादी ने एमएसएमईडी अधिनियम क े तहत ब्याज सहित विलंबित बिल राशि क े भुगतान क े लिए अपीलकर्ता क े खिलाफ निर्देश मांगने क े लिए परिषद से संपर्क किया।सुलह की कार्यवाही शुरू करते हुए आवेदन दाखिल करने क े तुरंत बाद, परिषद ने नोटिस जारी किए हैं और चूंकि अपीलकर्ता उपस्थित नहीं हुआ, अपीलकर्ता को 06.08.2012 को पेश होने क े लिए 18.07.2012 को सम्मन जारी किया गया है। परिषद द्वारा दिनांक 18.07.2012 को जारी सम्मन का प्रासंगिक भाग निम्नानुसार हैः "अतः अब आपको नोटिस दिया जाता है की व्यक्तिगत रूप से या प्राधिक ृ त प्रतिनिधि द्वारा 6 अगस्त, 2012 को अपराह्न 3.30 बजे पर या ऐसे दिन को, जो परिषद द्वारा दावे/विवाद क े समर्थन में प्रस्तुत करने क े लिए निर्धारित किया जाए परिषद क े समक्ष उपस्थित हों और आपको निर्देश दिया जाता है कि उस दिन आप अपने बचाव क े समर्थन में उन सभी दस्तावेजों को प्रस्तुत करें जिन पर आप भरोसा करना चाहते हैं। ध्यान दें कि उपरोक्त अवधि क े भीतर आपकी प्रतिक्रिया में चूक होने पर, विवाद समाप्त हो जाएगा अन्यथा विवाद की सुनवाई की जाएगी और विवाद क े निपटारे क े दृष्टिकोण से इसका समाधान किया जाएगा और यदि समाधान नहीं होता है तो परिषद या तो स्वयं विवाद क े अंतिम निपटारे क े लिए मध्यस्थ क े रूप में कार्य करेगी या अधिनियम क े अनुसार इस तरह क े निपटारे क े लिए किसी संस्थान को संदर्भित करेगी.”
8. क े वल इस आधार पर कि सम्मन प्राप्त होने क े बाद भी अपीलकर्ता उपस्थित नहीं हुआ है, परिषद ने 06.08.2012 को आदेश/पंचाट पारित किया है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमईडी) अधिनियम की धारा 18 (3) क े अनुसार, यदि सुलह सफल नहीं होती है, तो उक्त कार्यवाही समाप्त हो जाती है और उसक े बाद परिषद को अपने दम पर विवाद को मध्यस्थता क े लिए लेने या किसी अन्य संस्थान को संदर्भित करने का अधिकार है। उक्त धारा स्वयं यह स्पष्ट करती है कि जब मध्यस्थता शुरू की जाती है तो मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े सभी प्रावधान लागू होंगे, मानो मध्यस्थता कथित अधिनियम की खंड 7 की उप- खंड (1) क े तहत संदर्भित मध्यस्थता समझौते क े अनुसरण में थी। एमएसएमईडी अधिनियम की धारा 18 इस प्रकार हैः "18.सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद का संदर्भ- - (1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात क े होते हुए भी, किसी विवाद का कोई पक्षकार, खंड 17 क े अधीन देय किसी रकम क े संबंध में, सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद् को संदर्भित कर सक े गा। (2) उपधारा (1) क े अधीन संदर्भित होने पर, परिषद या तो स्वयं मामले में सुलह करेगी या सुलह करने क े लिए वैकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं प्रदान करने वाली किसी संस्था या क े न्द्र को संदर्भित कर उनकी सहायता मांगेगी,और मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (1996 का 26) की धारा 65 से 81 क े उपबंध ऐसे विवाद पर इस प्रकार लागू होंगे मानो सुलह उस अधिनियम क े भाग 3 क े अधीन आरंभ की गई थी। (3) जहां उप-खंड (2) क े तहत शुरू किया गया सुलह सफल नहीं होता है और पक्षकारों क े बीच किसी भी समझौते क े बिना समाप्त हो जाता है, वहां परिषद या तो स्वयं विवाद को मध्यस्थता क े लिए लेगी या ऐसे मध्यस्थता क े लिए वैकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं प्रदान करने वाली किसी संस्था या क ें द्र को संदर्भित करेगी,और मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (1996 का 26) क े प्रावधान तब विवाद पर इस तरह लागू होंगे मानो मध्यस्थता उस अधिनियम की खंड 7 की उप-खंड (1) में निर्दिष्ट मध्यस्थता समझौते क े अनुसरण में थी। (4) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात क े होते हुए भी, सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद या वैकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं प्रदान करने वाले क े न्द्र को अपनी अधिकार क्षेत्र क े भीतर अवस्थित आपूर्तिकर्ता और भारत में कहीं भी अवस्थित क्र े ता क े बीच विवाद में इस खंड क े अधीन मध्यस्थ या सुलहकर्ता क े रूप में कार्य करने का क्षेत्राधिकार होगा। (5) इस खंड क े अधीन किए गए प्रत्येक संदर्भ का विनिश्चय निम्नलिखित संदर्भ देने की तारीख से नब्बे दिन की अवधि क े भीतर किया जाएगा।"
9. एमएसएमईडी अधिनियम क े खंड 18 (2) और 18 (3) क े पठन से यह स्पष्ट है कि परिषद सुलह करने क े लिए बाध्य है जिसक े लिए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की खंड 65 से 81 क े प्रावधान लागू होंगे, जैसे कि सुलह उक्त अधिनियम क े भाग 3 क े तहत शुरू की गई थी। खंड 18 (3) क े तहत, जब सुलह विफल हो जाती है और समाप्त हो जाती है, तो पक्षकारों क े बीच विवाद को मध्यस्थता द्वारा हल किया जा सकता है।परिषद को या तो स्वयं मध्यस्थता करने या उक्त खंड में निर्दिष्ट किसी संस्था से मध्यस्थता कार्यवाहियों को निर्दिष्ट करने की शक्ति प्राप्त है। परिषद मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े प्रासंगिक प्रावधानों, विशेष रूप से धारा 20,23,24,25 क े तहत प्रक्रिया का पालन करने क े बाद पंचाट पारित करने क े लिए स्वतंत्र है।
10. सुलह और मध्यस्थता क े बीच बुनियादी अंतर है। सुलह में सुलहकर्ता पक्षकारों को निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीक े से सौहार्दपूर्ण समाधान पर पहुंचने में सहायता करता है। मध्यस्थता में, मध्यस्थता अधिकरण/मध्यस्थ पक्षकारों क े बीच विवादों की मध्यस्थता करता है।दावे को मध्यस्थ क े समक्ष, यदि आवश्यक हो, साक्ष्य प्रस्तुत करक े साबित करना होगा, भले ही सिविल प्रक्रिया संहिता या भारतीय साक्ष्य अधिनियम क े नियम लागू न हों। जब तक अन्यथा सहमति न हो, मौखिक सुनवाई की जानी है।
11. यदि अपीलकर्ता ने सुलह क े चरण में अपना जवाब प्रस्तुत नहीं किया था, और उपस्थित होने में विफल रहा था, तो सुविधा परिषद, उत्तम पथ क े अनुसरण में सुलह की विफलता को दर्ज कर सकती थी और विवाद का निर्णय करने क े लिए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े प्रासंगिक प्रावधानों क े अनुसार विवाद का फ ै सला करने और पंचाट बनाने क े लिए मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू कर सकती थी। सुलह और मध्यस्थता की कार्यवाही को एक साथ नहीं रखा जा सकता है।
12. इस मामले में क े वल इस आधार पर कि अपीलार्थी सुलह की कार्यवाही में उपस्थित नहीं हुआ था, उपस्थिति की पहली तारीख, अर्थात्, 06.08.2012 को, एक आदेश पारित किया गया था जिसमें अपीलकर्ता और/या उसक े पूर्ववर्ती/झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड को मूल दावे की ओर 78,74,041/- रुपए और ब्याज की ओर 91,59,705/- रुपए का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। जैसा कि आक्षेपित कार्यवाही क े रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि सुविधा परिषद ने े प्रासंगिक प्रावधानों क े अनुसार मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू नहीं की।
13. दिनांक 06.08.2012 का आदेश शून्य है,और न क े वल एमएसएमईडी अधिनियम क े विपरीत है, बल्कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े विभिन्न अनिवार्य प्रावधानों क े विपरीत है। दिनांक 06.08.2012 का आदेश पूरी तरह से अवैध है। कानून की नजर में कोई मध्यस्थता पंचाट नहीं बना है। यह सच है कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की योजना क े तहत एक मध्यस्थता पंचाट पर क े वल मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की खंड 34 क े तहत आवेदन क े माध्यम से ही सवाल उठाया जा सकता है। साथ ही, जब कोई आदेश मध्यस्थता का सहारा लिए बिना पारित किया जाता है,और मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े प्रावधानों की पूरी तरह से अवहेलना करते हुए, तो उक्त अधिनियम की धारा 34 लागू नहीं होगी। इस अपील को क े वल इस आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि अपीलकर्ता ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 क े तहत वैध उपाय का लाभ नहीं उठाया है। तीसरे प्रतिवादी की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता का यह निवेदन कि रिट याचिका दाखिल करने में देरी हुई भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है। 06. 08. 2012 क े आदेश क े बाद, अपीलकर्ता ने रिकॉर्ड क े सत्यापन क े बाद 22.01.2013 को 64,43,488/- रुपये का भुगतान किया है और उक्त राशि तीसरे प्रतिवादी ने बिना किसी विरोध क े प्राप्त की। इसक े तीन साल बाद इसने सिविल जज, रांची क े समक्ष 2016 क े निष्पादन मामला संख्या 69 में आदेश को निष्पादित करने का प्रयास किया, जो अंततः 31 जनवरी, 2017 क े आदेश द्वारा क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र क े अभाव में बर्खास्तगी में समाप्त हो गया। इसक े बाद राजस्थान उच्च न्यायालय क े समक्ष दिनांक 06.08.2012 क े आदेश को चुनौती देते हुए 2017 की एस. बी. सिविल रिट याचिका संख्या 11657 दायर की गई। मामले क े उस दृष्टिकोण में यह नहीं कहा जा सकता है कि उच्च न्यायालय में जाने में अपीलकर्ता की ओर से असामान्य विलंब हुआ था। चूंकि तीसरे प्रत्यर्थी ने पहले ही अपीलकर्ता द्वारा भुगतान की गई 63,43,488/- रुपये की राशि बिना किसी विरोध और आपत्ति क े प्राप्त कर ली है, यह नहीं कहा जा सकता है कि अपीलकर्ता ने दिनांक 06.08.2012 क े आदेश पर सवाल उठाने का अपना अधिकार खो दिया है। हालांकि प्रतिवादी क े लिए पेश होने वाले विद्वान अधिवक्ता ने अपने मामले का समर्थन करने क े लिए क ु छ निर्णयों का सहारा लिया है, लेकिन 06.08.2012 का आदेश एमएसएमईडी अधिनियम की धारा 18 (3) और मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 क े अनिवार्य प्रावधानों क े विपरीत पारित किया गया था, हमारा मानना है कि इस तरह क े निर्णयों से उनक े मामले को कोई सहायता नहीं मिलेगी।
14. उपरोक्त कारणों से, यह सिविल अपील स्वीकार की जाती है, आक्षेपित निर्णय और आदेश को रद्द किया जाता है। नतीजतन, दूसरे प्रत्यर्थी द्वारा पारित दिनांक 06.08.2012 का आदेश/पंचाट रद्द कर दिया जाता है। तथापि, यह दूसरे प्रतिवादी-परिषद क े लिए विकल्प खुला है की मध्यस्थता पक्षकारों क े बीच विवाद क े समाधान क े लिए या तो स्वयं विवाद में मध्यस्थता कर सकती है या उसे वैकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं प्रदान करने वाली किसी संस्था या क ें द्र को दोनों पक्षों क े मध्य विवाद क े हल क े लिए संदर्भित कर सकती है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ऐसी मध्यस्थता क े लिए, परिषद कोई भी पंचाट पारित करने से पहले े प्रावधानों का पालन करेगी। चूंकि हमने तीसरे प्रत्यर्थी द्वारा किए गए दावे क े गुण-दोषों पर विचार नहीं किया है, इसलिए मध्यस्थ न्यायाधिकरण गुण-दोषों क े आधार पर मामले का निर्णय करने की लिए स्वतंत्र है। (इंदिरा बनर्जी ) (आर सुभाष रेड्डी) नई दिल्ली 15 दिसंबर, 2021. (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.