Full Text
भारतीय सव�च् न्यायाल
दां�डक अपील�य अ�धका�रता
दां�डक अपील संख्य- 1457/2021
मोहम्मद ज़ा�हद ...अपीलाथ�
बनाम
एनसीबी क
े माध्य से राज् ...प्रत्
�नणर्
एम.आर. शाह, न्ययमू�तर
JUDGMENT
1. दां�डक अपील संख्य 879/2002 म� �दल्ल उच् न्यायाल, नई �दल्ल द्वार पा�रत आ�े�पत �नणर् और आदेश �दनांक 31.03.2017 से व्य�थ और असंतुष् होकर, मूल अ�भयुक् ने वतर्मा अपील दायर क� है। उच् न्यायाल ने अपीलाथ�-मूल अ�भयुक्तद्वार दायर उक् अपील को खा�रज कर �दया था और माननीय �वचारण न्यायल द्वार पा�रत उस �नणर् और आदेश क� पुिष् क� थी, िजसम� अपीलाथ� को नारको�टक् ड्र एंड साइकोट्रो� सब्सट� एक्, 1985 (इसक े बाद एनडीपीएस अ�ध�नयम क े रू म� संद�भर्) क� धारा 29 सहप�ठत धारा 21 (सी) क े तहत अपराध क े �लए दोषी ठहराया गया था और उसे एन डी पी एस अ�ध�नयम क� धारा 31 (ii) क े प्रावधान� क मद्देनज़रउपरोक् अपराध क े �लए 1,50,000 रुपय क े जुमार्न क े साथ 15 साल क े सश् कारावास (आरआई) क� सजा सुनाई गई थी।
2. सं�ेप म� वतर्मा अपील से संबं�धत तथ् इस प्रक ह�:- 2.[1] यह �क अपीलाथ�-मूल अ�भयुक् पर 4 �कलो हेरोइन क� बरामदगी क े मामले म� एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 23 और 21 क े तहत अपराध क े �लए थाना कस्टम, अमृतसर, पंजाब म� दजर प्राथ�म संख्य 134/1999 क े संबंध म� मुक़दमा चलाया गया। उसे अमृतसर न्यायल ने 12 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई थी। �दल्ल से 750 ग्र हेरोइन क� बरामदगी क े �लए नई �दल्ल म� अपीलाथ�-मूल अ�भयुक् क े �खलाफ एक अन् प्राथ�म संख्य 43/1999 भी दजर क� गई थी। दूसरे मामले म� भी �नणर् और आदेश �दनांक 30.01.2002 द्वार, उसे एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 29 सहप�ठत धारा 21 (सी) क े �लए दोषी ठहराया गया था। �दल्ल क े माननीय �वचारण न्यायाल ने 10 वषर क े सश् कारावास क� सजा (न्यूनत सजा) द�, हालां�क, एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 31(ii) क े प्रावधा क े मद्देनज़र िजसम� �पछल� सजा क े बाद अपराध� क े �लए बढ़� हुई सजा का प्रावध है, और इस तथ् पर �वचार करते हुए �क पहले अपीलकतार को प्राथ�म संख्य 134/1999 से उत्पन एक मामले म� एनडीपीएस अ�ध�नयम क े �लए दोषी ठहराया गया था, इस �लए माननीय �वचारण न्यायाल ने न्यूनत 15 वषर सश् कारावास क� सजा सुनाई। �दल्ल क े माननीय �वचारण न्यायाल द्वार प्राथ�म सं. 43/1999 (बाद क े �वचारण) से उत्पन मुकद्दमे म� कोई �वशेष आदेश पा�रत नह�ं �कया गया था �क 15 वषर क े सश् कारावास क� सजा साथ- साथ या क्रमव चलेगी।
3. प्राथ�म संख्य 43/1999 (दूसरे/बाद क े मामले) से उत्पन एक मामले म� �दल्ल क े माननीय �वचारण न्यायाल द्वार पा�रत दोष�सद्� क े �नणर् और आदेश से व्य�थ और असंतुष् होने क े बाद, अपीलाथ�-मूल अ�भयुक् ने उच् न्यायाल क े सम� अपील दायर क�। उच् न्यायाल क े सम� मुख् रू से अपीलाथ�- अ�भयुक्त क ओर से यह �नवेदन �कया गया �क चूं�क अपीलाथ�- अ�भयुक् को एफआईआर संख्य 134/1999 से उत्पन एक मामले म� पहले ह� 12 साल क� सजा हो चुक� है, इस�लए उसे दो बार दं�डत नह�ं �कया जा सकता और एफआईआर संख्य 43/1999 से उत्पन मामले म� वह पहले ह� 6 साल और 2 मह�ने क� सजा काट चुका है, इस�लए एक उदार दृिष्टक अपनाया जा सकता है और दोन� मामल�/मुक़दम� म� द� गई सजाएं, अथार्त एफआईआर संख्य 134/1999 (अमृतसर क े स) से उत्पन और दूसर� एफआईआर संख्य 43/1999 (नई �दल्ल क े स) से उत्पन सजाएं साथ-साथ चलने का �नणर्य �दया जाए। आ�े�पत �नणर् और आदेश द्वार उच् न्यायाल ने उपरोक् को स्वीका नह�ं �कया है और अपील को खा�रज कर �दया है। अतः अ�भयुक्त ने वतर्म अपील दायर क� है।
4. अपीलाथ� क� ओर से उपिस्थ �वद्वा अ�धवक्त सुश् संगीता क ु मार ने अपने सं��प् �ल�खत �नवेदन म� कहा है �क अपीलाथ� एक �वदेशी नाग�रक है, जो लाहौर, पा�कस्ता का �नवासी है और �पछले लगभग 22 वष� से सलाख� क े पीछे है क्य�� उसे थाना, सीमा शुल्, पंजाब द्वार 1999 क� प्राथ�म संख्य 134 क े संबंध म� 15.06.1999 को �गरफ्ता �कया गया था और उस पर 4 �कलो हेरोइन क े आयात क े �लए एनडीपीएस अ�ध�नयम, 1985 क� धारा 21 और 23 क े तहत अपराध का आरोप लगाया गया था और अ�त�रक् सत न्यायाधी, अमृतसर, क े आदेश �दनां�कत 08.12.2000 द्वार दोषी ठहराया गया था। पूव�क् �नवेदन� पर प्र�तक प्रभ डाले �बना, अपीलाथ� क े �वद्वा अ�धवक्त ने �नवेदन �कया �क अपीलाथ� पर 17.09.1999 से 14.02.2002 तक मुक़दमा चल रहा था और दूसरे अपराध क े �लए उक् अव�ध पर �वचार नह�ं �कया गया है। यह �नवेदन �कया गया �क य�द सजाएं क्रम से चलन ह� और य�द उपरोक् अव�ध को भी ध्या म� रखा जाता है, तो अपीलाथ� क� सलाख� क े पीछे रहने को अव�ध को कम करना होगा। 4.[1] अपीलाथ� क े �वद्वा अ�धवक्त ने �नवेदन �कया �क अपीलाथ� क� आयु 30 वषर थी जब उसे दोषी ठहराया गया था और अब वह 52 वषर का है। जेल म� उसका आचरण अच्छ है और जेल अधी�क द्वार उसक े �खलाफ कोई प्र�तक �टप्पण नह�ं क� गई है। इस�लए, अपीलाथ� अब िजन दो सजाओं का सामना कर रहा है, उन्ह दंड प्र�क्रया सं�हता क� 427 क े तहत एक साथ चलाने का �नणर्य �दया जाए। 4.[2] यह �नवेदन �कया गया है �क अपीलाथ�-अ�भयुक् ने एफआईआर संख्य 134/1999 म� पहले ह� 12 वषर का सश् कारावास पूरा कर �लया है, और य�द अमृतसर म� दजर एफआईआर संख्य 134/1999 और नई �दल्ल म� दजर एफआईआर संख्य 43/1999 से उत्पन दोन� मामल� क� सजाओं को एक साथ चलाने का �नणर् नह�ं �दया जाता है और अपीलाथ�-अ�भयुक् को एक साथ सजा भुगतनी पड़ती है, तो उस िस्थ� म� अपीलाथ� को पूरे 27 साल का कारावास पूरा करना होगा। इस�लए यह �नवेदन है �क दोन� मामल� म� द� गई सजा को एक साथ चलाने का �नणर्य �दया जाए। 4.[3] यह �नवेदन �कया गया है �क इस प्रक एफआईआर संख्य 43/1999 से उत्पन मामले म�, �दल्ल न्यायल ने 15 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाते हुए कोई आदेश पा�रत नह�ं �कया �क दोन� मामल� म� सजा एक साथ चलेगी या नह�ं। इस�लए यह �नवेदन है �क अपीलाथ� को दंड प्र�क्रया सं�हत धारा 427 का लाभ �दया जाना चा�हए।
5. राज्-प्रत्य क� ओर से उपिस्थ �वद्वा अ�धवक् त सुश् आकां�ा कौल द्वार वतर्मा अपील का पुरजोर �वरोध �कया गया है। दंड प्र�क्रया सं�हता क� ध 427 पर अ�धक भरोसा जताया गया है। यह �नवेदन �कया गया �क वतर्मा मामले म� आरोपी को अलग-अलग अपराध� क े �लए दो अलग-अलग मुक़दम� का सामना करना पड़ा और एक ह� मामले से उत्पन नह�ं हुआ और इस�लए दोन� मामल� म� द� गई सजा अलग-अलग ह� चलेगी। 5.[1] यह कहा गया �क सामान् �नयम यह है �क अलग-अलग अपराध� म� दो अलग-अलग मुक़दम� म� �दए गए दंड अलग-अलग चल�गे जहां दो अलग-अलग मामले ह�; अलग-अलग �नणर्य द्वार अलग- अलग अपराध संख्य और मामल� का फ ै सला �कया गया है। यह �नवेदन �कया गया �क अपवाद वे मामले ह� जो दंड प्र�क्रया सं� क� धारा 427(1) और धारा 427(2) क े प्रावधा क े तहत आते ह� या जब न्यायल �नद�श दे �क सजा अलग-अलग चलेगी। 5.[2] यह �नवेदन �कया गया �क समवत� सजा का आदेश देने क े �लए दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क े तहत न्यायलय क प्र शिक् भी �ववेकाधीन है, ले�कन �ववेक का प्रय घ�टत अपराध क े स्वरूप उन तथ्य क� िस्थ� को ध्या म� रखते हुए �कया जाना चा�हए िजनम� प्र उठता है। 5.[3] यह �नवेदन �कया गया �क वतर्मा मामले म�, सजा देने वाल� अदालत ने सजा को एक साथ चलाने का �नद�श नह�ं �दया। यह �नवेदन �कया गया �क वतर्मा मामले म� अपीलकतार - आरोपी को दो अलग-अलग मामल� म� (एक ह� मामले से उत्पन नह�ं) दो अलग-अलग अपराध� क े �लए दो अलग-अलग मुक़दम� का सामना करना पड़ा और इस�लए अपीलकतार क� ओर से इस �नवेदन का कोई अथर नह�ं �क दोन� मामल� म� द� गई सज़ाएँ साथ-साथ चल�गी और इसे �दया भी नह�ं जा सकता। 5.[4] अपने उपरोक् �नवेदन क े समथर् म�, उन्ह�न इस न्यायल क े �नम्न�ल�ख �नणर्य पर भरोसा �कया है:- मोहम्म अख्त हुसैन उफ र इब्रा� अहमद भट्ट बनाम सीमा शुल् (रोकथाम) क े सहायक कलेक्ट, अहमदाबाद एवं एक अन् (1988) 4 एससीसी 183; रंजीत �संह बनाम क � द शा�सत प्रद चंडीगढ़ और एक अन् (1991) 4 एससीसी 304; वी.क े. बंसल बनाम ह�रयाणा राज् और एक अन् (2013) 7 एससीसी 211; नीरा यादव बनाम क � द्र जांच ब्यूर (2017) 8 एससीसी 757; �वक्क @ �वकास बनाम राज् (राष्ट् राजधानी �ेत �दल्ल) (2020) 11 एससीसी 540; गुरदेव �संह बनाम पंजाब राज् (2021) 6 एससीसी 558; शरद ह�र कोलम्ब बनाम. महाराष् राज् और अन्य (2018) 18 एससीसी 718 और राजपाल बनाम ओम प्रक व एक अन् (2019) 17 एससीसी 809। 5.[5] यह �नवेदन भी �कया गया �क वतर्मा मामले म� अपीलकतार- आरोपी आदतन अपराधी है। एफआईआर संख्य 134/1999 क े संबंध म�, उन्ह 4 �कलो हेरोइन रखने/बरामदगी क े �लए एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 23 और 21 क ठहराया गया था और वह�ं एफआईआर नंबर 43/1999 से जुड़े एक अन् मामले म� उसे 750 ग्र हेरोइन बरामदगी क करार �दया गया है। यह �नवेदन �कया गया �क इस�लए अपीलकतार-आरोपी प्राथर अनुसार �कसी भी प्रक क� नरमी का हकदार नह�ं है।
6. उपरोक्त �नवेदन करके इस न्यायलय के फैसल� पर भरोसा करत हुए, वतर्मा अपील को खा�रज करने क� प्राथर क� जाती है।
7. हमने संबं�धत प�कार� क� ओर से उपिस्थ �वद्वा अ�धवक्त को �वस्ता से सुना है।
8. इस न्यायाल क े सम� �वचार क े �लए जो सं��प् प्र उठाया गया है, वह यह है �क क्यादो अलग-अलग न्यायल द्वार दो अलग-अलग मुक़दम� म� एक ह� अ�भयुक्/व्यिक क े �खलाफ सुनाई गई सज़ाएँ एक साथ चलनी चा�हय� जैसा �क अपीलकतार क� ओर से �नवेदन �कया गया है या लगातार। 8.[1] सबसे पहले, यह ध्या देने क� आवश्यकत है �क वतर्मा मामले म�, अपीलकतार-आरोपी को दो अलग-अलग न्यायलय द्वार दो अलग-अलग मुक़दम� म� अलग-अलग मामल� क े संबंध म� अपराध� क े �लए दोषी ठहराया गया है। एक मामले म� उसे अमृतसर कोटर द्वार एनडीपीएस एक् क� धारा 23 और धारा 21 क े �लए 12 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई गई है और प्राथ�म संख्य 43/1999 से जुड़े एक अन् मामले म� �दल्ल न्यायल ने उसे एनडीपीएस एक् क� धारा 29 सहप�ठत धारा 21 (सी) क े �लए 15 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई है। एक मामले म� उसे 4 �कलो हेरोइन और दूसरे मामले म� 750 ग्र हेरोइन रखने का दोषी ठहराया गया है। यह भी ध्या देने क� आवश्यकत है �क दोन� मामल� म� एक क े बाद एक �नणर् �दए गए ह� और �दल्ल क� अदालत द्वार बाद क े फ ै सले और दोष�सद्� एवं सजा क े आदेश म�, माननीय �वचारण न्यायल (�दल्ल न्यायल) द्वार कोई �वशेष आदेश पा�रत नह�ं �कया गया है �क सजाएं साथ-साथ चल�गी। उपरोक् तथ्य को ध्या म� रखते हुए, वतर्मा अपील क े प्र पर �वचार �कया जाना आवश्य है। 8.[2] वतर्मा अपील क े मुद्द पर �वचार करते समय, दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 427 को संद�भर् करने क� आवश्यकत है, जो �नम्नानुसा है:-
427. ऐसे अपराधी को दंडादेश जो अन्य अपराध के �लए पहले से दण्डा�दष्ट - जब कारावास का दंडादेश पहले से ह� भोगने वाले व्यिक्त क पश्चात्व-दोष�सद्�ध पर कारावास या आजीवन कारावास का दंडादेश �दया जाता है तब जब तक न्यायालय यह �नद�श नदे �क पश्चात्वत दंडादेश ऐसे पूवर् दंडादेश के सा-साथ भोगा जाएगा, ऐसा कारावास या आजीवन कारावास उस कारावास क� समािप्त प, िजसक े �लए, वह पहले दंडादेश हुआ था, प्रारम्भ हो:परन्त, जहां उस व्यिक्त, िजसे प्र�तभू�त देने म� व्य�तक्रम करने पर 122 क े अधीन आदेश द्वारा कारावास का दंडादेश �दया गया है ऐसा दंडादेश भोगने क े दौरान ऐसे आदेश क े �दए जाने क े पूवर् �कए गए अपराध के �लए कारावास का दंडादेश �दया जाता है, वहां पश्चात्क�थत दंडादेश तुरंत प्रारम् जाएगा। (2) जब �कसी व्यिक्त, जो आजीवन कारावास का दंडादेश पहले से ह� भोग रहा है, पश्चात्वत� दोष�सद्�ध पर �कसी अव�ध के काराव या आजीवन कारावास का दंडादेश �दया जाता है तो पश्चात्वत दंडादेश पूवर् दंडादेश के सा-साथ भोगा जाएगा। अतः द.प.स. क� धारा 427 क े �नष्प� अध्यन, जब एक व्यिक्त जो पहले से ह� सजा काट रहा है उसे बाद म� कारावा या आजीवन कारावास क� सजा सुनाई जाती है तो ऐसा कारावास या आजीवन कारावास क� ऐसी सजा पहले सुनाई गई सजा क े पश्चा शुरु होगी | अथार्त दोन� दंडादेशो क� सजाए क्रमानुसार चलेग| हालां�क इसका एक अपवाद है क� जब तक न्यायलय यह �नद�श न दे �कपश्चात्व सजा पहले सुनाई गयी सज़ा क े साथ-साथ चलेगी| इसका एक अन्य अपवाद ह| द.प.स. क� धारा 427 क� उप – धारा (2) क े अनुसार जब कोई व्यिक् जो आजीवन कारावास का दंडादेश पहले से ह� भोग रहा है, पश्चात्वत� दोष�सद्�ध पर �कसी अव�ध के कारावास या आजी कारावास का दंडादेश �दया जाता है तो पश्चात्वत� दंडादेश पूव दंडादेश क े साथ-साथ भोगा जाएगा। इस�लए उपरोक्त दो मामलो म� क े वल पश्चात्व दंडादेश पहले द� गई सजा क साथ-साथ चलेगा| अन्यथा बादम� द� गयी सजा क्रमनुसार चलेगी और बाद म� सुनाई गयी सजा पूवर मे काट� गयी सजा क े बाद आरंभ होगी| 8.[3] क्य बाद क� सजा एक साथ चलनी चा�हए या क्रमानुस, इस संबंध म� इस न्यायलय क क ु छ �नणर्य को संद�भर् करने क� आवश्यकत है। 8.3.[1] मोहम्म अख्त हुसैन (उपरोक्) क े मामले म�, यह �टपण्णी करते हुए कहा गया �क य�द अपराध� से संबं�धत मामला समान नह�ं है या दो अपराध� क े तथ् काफ� �भन् ह� तो ऐसे म� बाद क� सजा क्रमानुस चलनी चा�हए। मोहम्म अख्त हुसैन क े मामले म�, इस न्यायाल ने कहा �क कानून द्वार सजा देने वाल� अदालत� क े �लए छोड़े गए �ववेक का व्याप �वस्ता क े वल अपराध क� गंभीरता तक सी�मत नह�ं होना चा�हए। कोई भी �ववेचन �निश्च रू से उ�चत सज़ा का �नधार्र नह�ं कर सकता है। उ�चत सजा पर पहुंचने म�, अदालत को कई कारक� पर �वचार करना चा�हए और कभी-कभी अस्वीका करना चा�हए। अदालत को कई �व�वध डेटा को 'पहचानना, �नयं�त् करना और अलग करना’ जानना चा�हए। तक र ्संग सजा सु�निश्च करने क े �लए यह एक संतुलनकार� कायर और ज�टल प्र�क है। �वशेष रू से क्रमानुस सजाओं म�, न्यायाल उस कारावास से आँख नह�ं मूँद सकता जो अ�भयुक् पहले से ह� भुगत रहा है। मोहम्म अख्त हुसैन एक ऐसा मामला है जो गोल् (क ं ट्र) एक्, 1968 क े तहत एक पा�कस्तान नाग�रक से जुड़ा है। 1982 क े सीसी नंबर 1674 म� मुख् महानगर दंडा�धकार�, अहमदाबाद क� अदालत द्वार पहले मामले म� 7 साल क� क ै द और 10 लाख रुपय क े जुमार्न क� सजा थी। अपील करने पर, उच् न्यायाल ने सजा क� पुिष् क� ले�कन जुमार्न घटाकर 5 लाख रुपय कर �दया। इसम� अपीलाथ� द्वार दायर �वशेष अनुम�त या�चका को इस न्यायाल ने खा�रज कर �दया और दोष�सद्� और सजा अं�तम हो गई। जब अपीलाथ� उक् मामले म� न्या�य �हरासत म� था, तब उसक� तस्कर ग�त�व�धय� क े संबंध म� आगे क� जांच क� गई थी। इससे कई लोग� क� �मल�भगत से सोने और चांद� क� तस्कर क े व्याप रैक े ट का पता चला। उसम� अपीलकतार पर 18 अन् लोग� क े साथ सीमा शुल् अ�ध�नयम, 1962 क� धारा 135 क े तहत �फर से मुकदमा चलाया गया था। उसम� अपीलकतार को दोषी ठहराया गया और 4 साल क े सश् कारावास और 2 लाख रुपय क े जुमार्न क� सजा और जुमार्न अदा न करने पर व्य�तक्रम बदले म� सजा सुनाई गई। इसक े बाद, राज् क े साथ-साथ उसम� अपीलकतार ने उच् न्यायाल का दरवाजा खटखटाया। उच् न्यायाल ने राज् क� अपील को स्वीका कर �लया और सजा को 4 साल से बढ़ाकर 7 साल कर �दया और इसे क्रमानुस कर �दया। प�रणामस्वर, उच् न्यायाल ने अपीलकतार क� अपील को खा�रज कर �दया। नतीजा यह हुआ �क उन्ह सभी 14 साल क े कारावास क� सजा काटनी पड़ी, िजसे उन्ह�न इस न्यायाल क े सम� चुनौती द� थी अंतत: इस न्यायल ने �वचारण न्यायल द्वार द� गई सजा को बहाल कर �दया और अपील क� अनुम�त देकर उच् न्यायाल द्वार बढ़ाई गई सजा को रद् कर �दया। 8.3.[2] पैराग्र 8 म� रंजीत �संह (उपरोक्) क े मामले म�, �नम्नानुसा �टपण्णी क� ग:- "8. दंड प्र�क्रया सं�हत धारा 427 क� उपधारा (1) म� उस िस्थ� का प्रावध है जब पहले से ह� कारावास क� सजा भुगत रहे व्यिक को बाद म� कारावास या आजीवन कारावास क� सजा सुनाई जाती है। दूसरे शब्द म�, दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क� उपधारा (1) एक ऐसे अपराधी से संबं�धत है, िजसे एक �निश्च अव�ध क े �लए सजा भुगतते हुए बाद म� एक �निश्च अव�ध क े �लए या आजीवन कारावास का दोषी ठहराया जाता है। ऐसी िस्थ� म�, पहल� सजा, एक �निश्च अव�ध क े �लए होने क े कारण, एक �निश्च तार�ख को समाप् हो जाती है, जो बाद क� दोष�सद्�धक े समय �ात होती है। उपधारा (1) म� कहा गया है �क ऐसी िस्थ� म�, पहल� सजा जो अपराधी काट रहा है, क� समािप् क� तार�ख �ात होने पर, आमतौर पर बाद क� सजा कारावास क� पहल� अव�ध क� समािप् पर शुर होगी जब तक �क अदालत बाद क� सजा को �पछल� सजा क े साथ- साथ चलने का �नद�श न दे। जा�हर है, उपधारा (1) क े तहत आने वाले मामल� म� जहां सजा एक �निश्च अव�ध क े �लए होती है, बाद क� सजा क्रमानुस हो सकती है जब तक �क एक साथ चलने का �नद�श न �दया जाए। दूसर� ओर, उपधारा (2) म� एक ऐसे अपराधी क े �लए प्रावध है जो "पहले से ह� आजीवन कारावास क� सजा भुगत रहा है" िजसे बाद क� दोष�सद्�ध प एक (�निश्च) अव�ध या आजीवन कारावास क� सजा सुनाई जाती है। �मठू बनाम पंजाब राज्, (1983) 2 एससीसी 277 क े बाद गोपाल �वनायक गोडसे [रंजीत �संह बनाम चंडीगढ़ क � द्र शा�सत प्, (1984) 1 एससीसी 31 म� इस न्यायाल क े फ ै सले क े बाद से यह अच्छ तरह से स्था�प है और मार राम [(1981) 1 एससीसी 107 म� दोहराया गया है �क आजीवन कारावास अपराधी क े शेष जीवन क े �लए एक सजा है जब तक �क शेष सजा को उपयुक् प्रा�धका द्वार बदल या माफ़ न कर �दया जाए। बाद म� दोष�सद्� पर न्यायाल द्वार सजा सुनाए जाने क े चरण म� ऐसा होने पर, आजीवन कारावास क� पूवर सजा को इस प्रक समझा जाना चा�हए और, इस�लए, बाद मे एक �निश्च अव�ध क े �लए कारावास या क्रमानुस आजीवन कारावास क� सजा का कोई सवाल ह� नह�ं हो सकता जो धारा 427 क� उपधारा (1) म� �नधार्�र सामान् �नयम है। जैसा �क श् गगर ने सह� तक र �दया, और श् ल�लत द्वार �ववा�दत नह�ं �कया गया, आजीवन कारावास क� पूवर सजा का अथर शेष जीवन जेल म� काटने क� सजा क े रू म� समझा जाना जब तक उपयुक् प्रा�धका द्वार प�रव�तर् या माफ़ नह�ं �कया जाता है और क े वल एक जीवन काल वाला व्यिक, एक अव�ध क े �लए कारावास या आजीवन कारावास क े बाद क� सजा पर सजा क े वल पहले क े आजीवन कारावास क� सजा पर लागू क� जा सकती है और �निश्च रू से इसम� नह�ं जोड़ी जा सकती है अपराधी क े जीवन काल का �वस्ता करना या उस मामले क े �लए कोई भी मानव शिक् से परे है। यह स्पष िस्थ� है जो धारा 427 क� उप धारा (2) म� बताई गई है क्य�� उसक� उपधारा (1) म� उिल्ल�ख सामान् �नयम यह है �क अदालत क े �नद�श क े �बना बाद क� सजा एक साथ नह�ं बिल् क्रमानुस चलेगी। एकमात िस्थ� िजसम� �पछल� सजा क े साथ-साथ बाद क� सजा को चलाने क े �लए अदालत क े �कसी �नद�श क� आवश्यकत नह�ं है, उपधारा (2) म� प्रद क� गई है िजसे उपधारा (1) पर आधा�रत �कसी भी संभा�वत �ववाद से बचने क े �लए बनाया गया है, य�द उस संबंध म� न्यायाल का कोई स्पष �नद�श नह�ं है। उपधारा (2) धारा 427 क� उपधारा (1) क े सामान् �नयम क े अपवाद क� िस्थ� म� है �क बाद क� दोष�सद्�ध क� सज पहल� सजा क� समािप् पर शुर होती है जब तक �क अदालत इसे एक साथ चलाने का �नद�श नह�ं देती। इस�लए धारा 427 क� उपधारा (1) और (2) का अथर और उद्देश और उपधारा (2) को लागू करने का उद्देश स्पष है।" 8.3.[3] वी क े बंसल (उपरोक्) क े मामले म�, पैरा 10 म� मोहम्म अख्त (उपरोक्) क े मामले म� इस न्यायाल क े फ ै सले पर भरोसा करने क े बाद �नम्नानुसा �टप्पण क� है:- "10. इस मामले म� सं�हता क� धारा 427(1) क े तहत न्यायाल को उपलब् शिक् क े स्वर से हमारा अ�धक सरोकार है, जो हमार� राय म� तीन िस्थ�तय को छोड़कर पालन �कए जाने वाले एक सामान् �नयम को �नधार्�र करता है: पहला धारा 427 क� उपधारा (1) क े प्रावध क े अंतगर् आता है; दूसरा उसक े उपधारा (2) क े अंतगर् आता है; और तीसरा जहां अदालत �नद�श देती है �क सजाएं साथ- साथ चल�गी। यह धारा 427 (1) से प्र होता है �क न्यायाल क े पास �नद�श जार� करने क� शिक् और �ववेक है, ले�कन न्यायाल को प्र शिक् क े स्वर म� �ववेकाधीन शिक् का प्रय न्या�य तजर पर �कया जाना चा�हए, न �क बुद्�धर�ह, उदासीन या रू�ढ़वाद ढंग से। न्यायलय द्वा इस तरह क े �ववेक का प्रय करने क े मामले म� �कसी भी तरह क े कठोर दृिष्टक को �नधार्�र करना मुिश्क है। धारा 427 (1) क े �चंतन क े भीतर �नद�श जार� करने या अस्वीका करने क े मामले म� न्यायाल क े पास कोई सट�क �नयम नह�ं है। �कसी �वशेष मामले म� �नद�श जार� �कया जाना चा�हए या नह�ं, यह �कये गए अपराध अथवा अपराध� क े स्वरुतथा उस तथ् क� पर�िस्थ� पर �नभर् करेगा िजसम� समवत� सज़ाएँ चलने का प्र उठता है।" 8.3.[4] नीरा यादव (उपरोक्) क े मामले म�, दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क� व्याख्/�वचार करते समय यह �टपण्णी क� ग और यह माना गया �क दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 एक ऐसे अपराधी को द� गई सजा से संबं�धत है िजसे पहले से ह� �कसी अन् अपराध क े �लए सजा सुनाई जा चुक� है और समवत� सजा का आदेश देने क े �लए धारा 427 क े तहत न्यायाल को प्र शिक् �ववेकाधीन है। यह भी कहा गया �क �वधा�यका क� नी�त यह है �क आम तौर पर सजा क्रमानुस द� जानी चा�हए। यह भी कहा गया �क क े वल उपयुक् मामल� म�, मामले क े तथ्य पर �वचार करते हुए, अदालत सजा को पहले क� सजा क े साथ समवत� कर सकती है। यह भी कहा गया �क सह्संगत का �नद�श देने क े �लए सजा देने वाल� अदालत द्वार प्रय �कया गया �ववेक ठोस �सद्धांत पर करना होगा, न �क सनक पर। �कसी �वशेष मामले म� �नद�श जार� �कया जाना चा�हए या नह�ं, यह अपराध क े स्वर या घ�टत अपराध� पर �नभर् करेगा। उक् �नणर् म� आगे यह कहा और माना गया है �क यह अच्छ तरह से स्था�प है �क जहां अलग-अलग मामले ह�, अलग-अलग अपराध संख्याए ह� और अलग-अलग �नणर्य द्वार मामल� का फ ै सला �कया गया है, दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क े तहत साथ-साथ सजा नह�ं द� जा सकती। यह भी कहा गया है �क हालां�क, सामान् �नयम यह है �क अगर सजा दो अलग-अलग मामल� से संबं�धत है, तो सजा समवत� नह�ं हो सकती, (हाँ) अदालत क े आदेश से बदला जा सकता है। 8.3.[5] शरद ह�र कोलाम्ब (उपरोक्) क े मामले म�, यह कहा और माना गया �क जब तक अदालत यह �नद�श नह�ं देती �क एक ह� मुकदमे म� एक जैसे दो या दो से अ�धक अपराध� क� सजा एक साथ चलनी चा�हए, तो सामान् �सद्धां यह है �क एक सजा दूसरे क� समािप् क े बाद शुर होगी। इसी तरह, ऐसे मामले म� जहां पहले से ह� सजा भुगत रहे व्यिक को बाद क े मुकदमे म� अपराध क े संबंध म� सजा सुनाई जाती है, तो सामान् �नयम यह है �क बाद म� द� गई सजा क्रमानुस चलती है जब तक �क दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क े तहत प्त �ववेक का प्रय करते हुए बाद म� कोई भी सज़ा देते समय अदालत द्वार कोई �व�शष् आदेश पा�रत नह�ं �कया जाता �क तथ्य और प�रिस्थ�तय को देखते हुए बाद क� सजा एक साथ चलनी चा�हए, तब तक दोन� मामल� म� द� गई सजा क्रमानुस चलेगी। 8.3.[6] गुलाम मोहम्म म�लक बनाम गुजरात राज् एवं एक अन्. (2018) 14 एससीसी 473 क े मामले म�, इस न्यायाल ने दो अपील� पर �वचार �कया। एक ह� अपीलाथ� क े संबंध म� एक गुजरात क े उच् न्यायाल क े �नणर् से और दूसरा बंबई क े उच् न्यायाल क े �नणर् से। दोन� मामल� म�, अपीलाथ� पर एनडीपीएस अ�ध�नयम, 1985 क� धारा 8 (सी), 20 (बी) और 29 क े तहत आरोप लगाए गए। जहां तक गुजरात म� दायर एनडीपीएस क े स नंबर 1/2002 क े रूप म� दज मामले का संबंध है, तो अपीलाथ� को दोषी करार देते हुए दस वषर क े सश् कारावास एवं एक लाख रुप का जुमार्न अदा करने का �नद�श �दया गया और जुमार्न अदा न करने क� िस्थ� म� और एक वषर क े सश् कारावास क� सज़ा सुनाई गई। उसम� अपीलाथ� ने उच् न्यायाल क े सम� उक् दोष�सद्� और सजा को चुनौती देते हुए एक अपील दायर क� िजसने उसक� अपील को खा�रज कर �दया। दरअसल, सजा बढ़ाने क� राज् क� अपील खा�रज कर द� गई। दूसरे मामले म�, अपीलाथ� पर एनडीपीएस, सत न्यायाल, ग्रे बॉम्ब क े �वशेष न्यायाधी द्वार 2002 क े �वशेष मामला संख्य 60 म� मुकदमा चलाया गया, िजसक े प�रणामस्वर एनडीपीएस\ अ�ध�नयम क� धारा 8(सी), 20(b)(ii) सहप�ठत धारा 31A क े तहत अपीलाथ� दोष�सद्ध हुआ और उसे मृत् दंडादेश सुनाया गया। मृत्य दंडादेश को उच् न्यायाल क े सम� पुिष् क े �लए भेजा गया था। उसम� अपीलाथ� ने उक् दोष�सद्� और सजा क े �वरुद बंबई उच् न्यायाल म� एक अपील भी दायर क� थी। उच् न्यायाल ने मृत्यु दंडादेश क� पुिष् न करक े राज् द्वार दायर पुिष्ट मामल संख्य 2/2008 को खा�रज कर �दया और अपीलाथ� क� अपील को खा�रज कर करते हुए मृत्युदंडादेश को तीस साल क े सश् कारावास और 3 लाख रुपय क े जुमार्न म� बदल �दया गया। मृत्युदंडादेश क े प�रवतर् से संबं�धत मामले पर इस न्यायाल क े सम� �वचार �कया गया था और उक् मामले क े तथ्य से संबं�धत एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 31 पर �वचार करने पर यह माना गया �क इसम� अपीलाथ� को अ�धकतम सजा द� जानी थी और उसक े बाद डेढ़ से गुना �कया गया। धारा 31 क े तहत �नधार्�र कारावास क� न्यूनत अव�ध 10 वषर है, इस �हसाब से, इसे डेढ़ गुना बढाने पर न्यूनत सजा 15 साल हो जाती है। अंततः, इस न्यायाल द्वार आदे�शत सजा 16 साल क े सश् कारावास क� थी। न्यायाल ने यह भी ध्या म� रखा �क उसम� अपीलाथ� 65 वषर का था और �व�भन् बीमा�रय� से जूझ रहा था। यह भी आदेश �दया गया �क सजा साथ-साथ चलेगी और जहां तक दोन� मामल� क े संबंध म� गुजरात म� �नचल� अदालत द्वार लगाया गया एक लाख रुपय का जुमार्न है, तो वह� रहेगा। जहां तक बंबई मामले म� 3 लाख रुपय क े जुमार्न क� बात है तो उसे 3 लाख रुपय से घटाकर 2 लाख रुपय कर �दया गया। तद्नुसा अपील� का �नपटान �कया गया।
9. इस प्रक इस न्यायाल क े पूव�क् �नणर्य से कानून क े जो �सद्धां सामने आते ह�, वे �नम्नप्रक ह�:- (i) य�द पहले से ह� कारावास क� सजा काट रहे �कसी व्यिक्त बाद म� कारावास क� सजा सुनाई जाती है, तो कारावास क� बाद क� अव�ध सामान् रू से उस कारावास क� समािप् पर शुर होगी, िजसक े �लए उसे पहले सजा सुनाई गई थी; (ii) आम तौर पर बाद क� सजा, पहले कारावास क� अव�ध क� समािप् पर शुर होगी जब तक �क अदालत बाद क� सजा को �पछल� सजा क े साथ-साथ चलाने का �नद�श न दे; (iii) सामान् �नयम यह है �क जहां अलग-अलग मामले, अलग-अलग अपराध संख्याएं होत ह� और मामले अलग- अलग �नणर्य द्वार तय �कए जाते ह�, तो दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 427 क े तहत साथ-साथ सजा नह�ं द� जा सकती; (iv) दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 (1) क े तहत अदालत क े पास यह �नद�श जार� करने का अ�धकार और �ववेक है �क बाद क� सभी सजाएं �पछल� सजा क े साथ-साथ चल�गी, हालां�क �ववेक का प्रय, अपराध या घ�टत अपराध� क े स्वरुप औतथ्य� क�िस्थ�त क आधार पर �ववेकपूणर ढंग से �कया जाना चा�हए। ले�कन अदालत द्वार �व�शष् �नद�श या आदेश होना चा�हए �क बाद क� सजा �पछल� सजा क े साथ-साथ चलेगी।
10. उपरोक् �नणर्य म� इस न्यायाल द्वार �नधार्�र कानून और वतर्मान मामल क े तथ्य से जुड़े ऊपर व�णर् कानून क े �सद्धांतको लागू करते हुए, अपीलाथ�-अ�भयुक् क े उस �नवेदन को �सरे से ख़ा�रज �कया जाता है �क उसे �मलने वाल� बाद क� सजा �पछल� सजा क े साथ चले। वतर्मा मामले म� अपीलकतार को दो अलग-अलग मामल� क े संबंध म� दोषी ठहराया गया है, अलग-अलग अपराध संख्याए ह� और अलग-अलग �नणर्य द्वार मामल� का फ ै सला �कया गया है। इस�लए, अपीलकतार दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 427 क े तहत साथ-साथ सजा क े �कसी भी लाभ का हकदार नह�ं है। उपरोक्त �टपण्णी क अनुसार, बाद क� सजा सुनाते समय अदालत द्वार जार� कोई �व�शष् आदेश या �नद�श नह�ं है �क बाद क� सजा �पछल� सजा क े साथ-साथ चले।
11. दंड प्र�क सं�हता क� धारा 427 (1) क े तहत उपरोक् �टपण्ण क े अनुसार दूसर� िस्थ� म� भी, न्यायाल क े पास यह �नद�श जार� करने क� शिक् और �ववेक है �क बाद क� सजा को �पछल� सजा क े साथ-साथ चलाया जाए। उस िस्थ� म� भी, �ववेक का प्रय अपराध क े स्वर या घ�टत अपराध� क े आधार पर �ववेक-सम्म ढंग से �कया जाना चा�हए। वतर्मा मामले म� अपीलकतार-अ�भयुक् को एनडीपीएस अ�ध�नयम क े तहत अपराध क े �लए दोषी ठहराया गया है। उसे 4 �कलो हेरोइन क� बरामदगी क े एक मामले म� दोषी ठहराया गया है और 12 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई गई है वह�ं एक अन् मामले म� 750 ग्र हेरोइन क� बरामदगी हुई है और एनडीपीएस एक् क� धारा 31(ii) को देखते हुए उसे 15 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई गई है। एनडीपीएस अ�ध�नयम क े �लए दोषी पाए जाने वाले आरोपी क े प्र कोई नरमी नह�ं �दखाई जानी चा�हए। जो व्यिक नशीले पदाथ� का कारोबार कर रहे ह�, कई कमज़ोर, �नद�ष युवा पी�ड़त� क� मौत का कारण बनने या प्र-घातक आघात पहुँचाने म� उनक� भू�मका होती है। ऐसे अ�भयुक् समाज पर हा�नकारक और घातक प्रभ डालते ह�। वे समाज क े �लए खतरा ह�। इस देश म� नशीले और मादक पदाथ� क� गुप् तस्कर क� इस तरह क� संग�ठत ग�त�व�धय� और ऐसे पदाथ� क� अवैध तस्कर का समग रू से समाज पर घातक प्रभ पड़ता है। इस�लए, एनडीपीएस अ�ध�नयम से जुड़े मामले म� सजा या दंड देते समय, समग रू से समाज क े �हत को ध्या म� रखना आवश्य है। इस�लए, दंड प्र�क सं�हता क� धारा 427 क े तहत �ववेका�धकार का प्रय करते हुए भी, �ववेक का प्रय उस आरोपी क े प� म� नह�ं होगा जो नशीले और मादक पदाथ� क� अवैध तस्कर म� �लप् पाया जाता है। उपरोक् �टपण्ण क े अनुसार, दंड प्र�क सं�हता क� धारा 427 क े तहत �पछल� सजा क े साथ-साथ बाद क� सजा को चलाने क े �लए �ववेक का प्रय करते हुए भी, �ववेकपूणर तर�क े से और अपराध/घ�टत अपराध� क े आधार पर �ववेक का प्रय �कया जाना है। इस�लए, एनडीपीएस अ�ध�नयम क े तहत अपराध� को देखते हुए, जो बहुत गंभीर ह� और बड़े पैमाने पर समाज क े �खलाफ ह�, ऐसे अ�भयुक् क े प� म� कोई �ववेक का प्रय नह�ं �कया जाएगा जो एनडीपीएस अ�ध�नयम क े तहत अपराध म� शा�मल ह�।
12. उपरोक् क े मद्देनज़ और उक्त उल्ले� कारण� से, अपीलकतार-अ�भयुक् क� ओर से एफआईआर संख्य 43/1999 से जुड़े मामले म� बाद क� सजा को एफआईआर संख्य 134/1999 से संबं�धत �पछल� सजा क े साथ-साथ चलाने क े �लए �नद��शत करने हेतु �नवेदन एतद्द्वा खा�रज �कये जाते ह�। उपरोक् क े मद्देनज़ और उक्त उल्ले� कारण� से, वतर्मा अपील �नष्ल हो जाती है और वह खा�रज �कए जाने योग् है और तदनुसार खा�रज क� जाती है। ……………….. न्यायमू�त [एम.आर. शाह] ……………….. न्यायमू�त [बी. वी. नागरथना] नई �दल्ल �दसम्बर07, 2021 अस्वीकर: देशी भाषा म� �नणर् का अनुवाद मुकद्द्मेब क े सी�मत प्रय हेतु �कया गया है ता�क वो अपनी भाषा म� इसे समझ सक े एवं यह �कसी अन् प्रयो हेतु प्रय नह�ं �कया जाएगा| समस् कायार्लय एवं व्यावहा�र प्रयोज हेतु �नणर् का अंग्रे स्वर ह� अ�भप्रमा� माना जाएगा और कायार्न्व तथा लागू �कए जाने हेतु उसे ह� वर�यता द� जाएगी|