Mohammad Zahid v. NCB

Delhi High Court · 07 Dec 2021
M. R. Shah; B. V. Nagarathna
Criminal Appeal No 1457 of 2021
criminal appeal_dismissed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that sentences in separate NDPS cases registered under different FIRs and tried by different courts run consecutively by default under Section 427 CrPC unless the court expressly orders otherwise, and dismissed the appellant's plea for concurrent sentences.

Full Text
Translation output
प्र�तवे
भारतीय सव�च् न्यायाल
दां�डक अपील�य अ�धका�रता
दां�डक अपील संख्य- 1457/2021
मोहम्मद ज़ा�हद ...अपीलाथ�
बनाम
एनसीबी क
े माध्य से राज् ...प्रत्
�नणर्
एम.आर. शाह, न्ययमू�तर
JUDGMENT

1. दां�डक अपील संख्य 879/2002 म� �दल्ल उच् न्यायाल, नई �दल्ल द्वार पा�रत आ�े�पत �नणर् और आदेश �दनांक 31.03.2017 से व्य�थ और असंतुष् होकर, मूल अ�भयुक् ने वतर्मा अपील दायर क� है। उच् न्यायाल ने अपीलाथ�-मूल अ�भयुक्तद्वार दायर उक् अपील को खा�रज कर �दया था और माननीय �वचारण न्यायल द्वार पा�रत उस �नणर् और आदेश क� पुिष् क� थी, िजसम� अपीलाथ� को नारको�टक् ड्र एंड साइकोट्रो� सब्सट� एक्, 1985 (इसक े बाद एनडीपीएस अ�ध�नयम क े रू म� संद�भर्) क� धारा 29 सहप�ठत धारा 21 (सी) क े तहत अपराध क े �लए दोषी ठहराया गया था और उसे एन डी पी एस अ�ध�नयम क� धारा 31 (ii) क े प्रावधान� क मद्देनज़रउपरोक् अपराध क े �लए 1,50,000 रुपय क े जुमार्न क े साथ 15 साल क े सश् कारावास (आरआई) क� सजा सुनाई गई थी।

2. सं�ेप म� वतर्मा अपील से संबं�धत तथ् इस प्रक ह�:- 2.[1] यह �क अपीलाथ�-मूल अ�भयुक् पर 4 �कलो हेरोइन क� बरामदगी क े मामले म� एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 23 और 21 क े तहत अपराध क े �लए थाना कस्टम, अमृतसर, पंजाब म� दजर प्राथ�म संख्य 134/1999 क े संबंध म� मुक़दमा चलाया गया। उसे अमृतसर न्यायल ने 12 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई थी। �दल्ल से 750 ग्र हेरोइन क� बरामदगी क े �लए नई �दल्ल म� अपीलाथ�-मूल अ�भयुक् क े �खलाफ एक अन् प्राथ�म संख्य 43/1999 भी दजर क� गई थी। दूसरे मामले म� भी �नणर् और आदेश �दनांक 30.01.2002 द्वार, उसे एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 29 सहप�ठत धारा 21 (सी) क े �लए दोषी ठहराया गया था। �दल्ल क े माननीय �वचारण न्यायाल ने 10 वषर क े सश् कारावास क� सजा (न्यूनत सजा) द�, हालां�क, एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 31(ii) क े प्रावधा क े मद्देनज़र िजसम� �पछल� सजा क े बाद अपराध� क े �लए बढ़� हुई सजा का प्रावध है, और इस तथ् पर �वचार करते हुए �क पहले अपीलकतार को प्राथ�म संख्य 134/1999 से उत्पन एक मामले म� एनडीपीएस अ�ध�नयम क े �लए दोषी ठहराया गया था, इस �लए माननीय �वचारण न्यायाल ने न्यूनत 15 वषर सश् कारावास क� सजा सुनाई। �दल्ल क े माननीय �वचारण न्यायाल द्वार प्राथ�म सं. 43/1999 (बाद क े �वचारण) से उत्पन मुकद्दमे म� कोई �वशेष आदेश पा�रत नह�ं �कया गया था �क 15 वषर क े सश् कारावास क� सजा साथ- साथ या क्रमव चलेगी।

3. प्राथ�म संख्य 43/1999 (दूसरे/बाद क े मामले) से उत्पन एक मामले म� �दल्ल क े माननीय �वचारण न्यायाल द्वार पा�रत दोष�सद्� क े �नणर् और आदेश से व्य�थ और असंतुष् होने क े बाद, अपीलाथ�-मूल अ�भयुक् ने उच् न्यायाल क े सम� अपील दायर क�। उच् न्यायाल क े सम� मुख् रू से अपीलाथ�- अ�भयुक्त क ओर से यह �नवेदन �कया गया �क चूं�क अपीलाथ�- अ�भयुक् को एफआईआर संख्य 134/1999 से उत्पन एक मामले म� पहले ह� 12 साल क� सजा हो चुक� है, इस�लए उसे दो बार दं�डत नह�ं �कया जा सकता और एफआईआर संख्य 43/1999 से उत्पन मामले म� वह पहले ह� 6 साल और 2 मह�ने क� सजा काट चुका है, इस�लए एक उदार दृिष्टक अपनाया जा सकता है और दोन� मामल�/मुक़दम� म� द� गई सजाएं, अथार्त एफआईआर संख्य 134/1999 (अमृतसर क े स) से उत्पन और दूसर� एफआईआर संख्य 43/1999 (नई �दल्ल क े स) से उत्पन सजाएं साथ-साथ चलने का �नणर्य �दया जाए। आ�े�पत �नणर् और आदेश द्वार उच् न्यायाल ने उपरोक् को स्वीका नह�ं �कया है और अपील को खा�रज कर �दया है। अतः अ�भयुक्त ने वतर्म अपील दायर क� है।

4. अपीलाथ� क� ओर से उपिस्थ �वद्वा अ�धवक्त सुश् संगीता क ु मार ने अपने सं��प् �ल�खत �नवेदन म� कहा है �क अपीलाथ� एक �वदेशी नाग�रक है, जो लाहौर, पा�कस्ता का �नवासी है और �पछले लगभग 22 वष� से सलाख� क े पीछे है क्य�� उसे थाना, सीमा शुल्, पंजाब द्वार 1999 क� प्राथ�म संख्य 134 क े संबंध म� 15.06.1999 को �गरफ्ता �कया गया था और उस पर 4 �कलो हेरोइन क े आयात क े �लए एनडीपीएस अ�ध�नयम, 1985 क� धारा 21 और 23 क े तहत अपराध का आरोप लगाया गया था और अ�त�रक् सत न्यायाधी, अमृतसर, क े आदेश �दनां�कत 08.12.2000 द्वार दोषी ठहराया गया था। पूव�क् �नवेदन� पर प्र�तक प्रभ डाले �बना, अपीलाथ� क े �वद्वा अ�धवक्त ने �नवेदन �कया �क अपीलाथ� पर 17.09.1999 से 14.02.2002 तक मुक़दमा चल रहा था और दूसरे अपराध क े �लए उक् अव�ध पर �वचार नह�ं �कया गया है। यह �नवेदन �कया गया �क य�द सजाएं क्रम से चलन ह� और य�द उपरोक् अव�ध को भी ध्या म� रखा जाता है, तो अपीलाथ� क� सलाख� क े पीछे रहने को अव�ध को कम करना होगा। 4.[1] अपीलाथ� क े �वद्वा अ�धवक्त ने �नवेदन �कया �क अपीलाथ� क� आयु 30 वषर थी जब उसे दोषी ठहराया गया था और अब वह 52 वषर का है। जेल म� उसका आचरण अच्छ है और जेल अधी�क द्वार उसक े �खलाफ कोई प्र�तक �टप्पण नह�ं क� गई है। इस�लए, अपीलाथ� अब िजन दो सजाओं का सामना कर रहा है, उन्ह दंड प्र�क्रया सं�हता क� 427 क े तहत एक साथ चलाने का �नणर्य �दया जाए। 4.[2] यह �नवेदन �कया गया है �क अपीलाथ�-अ�भयुक् ने एफआईआर संख्य 134/1999 म� पहले ह� 12 वषर का सश् कारावास पूरा कर �लया है, और य�द अमृतसर म� दजर एफआईआर संख्य 134/1999 और नई �दल्ल म� दजर एफआईआर संख्य 43/1999 से उत्पन दोन� मामल� क� सजाओं को एक साथ चलाने का �नणर् नह�ं �दया जाता है और अपीलाथ�-अ�भयुक् को एक साथ सजा भुगतनी पड़ती है, तो उस िस्थ� म� अपीलाथ� को पूरे 27 साल का कारावास पूरा करना होगा। इस�लए यह �नवेदन है �क दोन� मामल� म� द� गई सजा को एक साथ चलाने का �नणर्य �दया जाए। 4.[3] यह �नवेदन �कया गया है �क इस प्रक एफआईआर संख्य 43/1999 से उत्पन मामले म�, �दल्ल न्यायल ने 15 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाते हुए कोई आदेश पा�रत नह�ं �कया �क दोन� मामल� म� सजा एक साथ चलेगी या नह�ं। इस�लए यह �नवेदन है �क अपीलाथ� को दंड प्र�क्रया सं�हत धारा 427 का लाभ �दया जाना चा�हए।

5. राज्-प्रत्य क� ओर से उपिस्थ �वद्वा अ�धवक् त सुश् आकां�ा कौल द्वार वतर्मा अपील का पुरजोर �वरोध �कया गया है। दंड प्र�क्रया सं�हता क� ध 427 पर अ�धक भरोसा जताया गया है। यह �नवेदन �कया गया �क वतर्मा मामले म� आरोपी को अलग-अलग अपराध� क े �लए दो अलग-अलग मुक़दम� का सामना करना पड़ा और एक ह� मामले से उत्पन नह�ं हुआ और इस�लए दोन� मामल� म� द� गई सजा अलग-अलग ह� चलेगी। 5.[1] यह कहा गया �क सामान् �नयम यह है �क अलग-अलग अपराध� म� दो अलग-अलग मुक़दम� म� �दए गए दंड अलग-अलग चल�गे जहां दो अलग-अलग मामले ह�; अलग-अलग �नणर्य द्वार अलग- अलग अपराध संख्य और मामल� का फ ै सला �कया गया है। यह �नवेदन �कया गया �क अपवाद वे मामले ह� जो दंड प्र�क्रया सं� क� धारा 427(1) और धारा 427(2) क े प्रावधा क े तहत आते ह� या जब न्यायल �नद�श दे �क सजा अलग-अलग चलेगी। 5.[2] यह �नवेदन �कया गया �क समवत� सजा का आदेश देने क े �लए दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क े तहत न्यायलय क प्र शिक् भी �ववेकाधीन है, ले�कन �ववेक का प्रय घ�टत अपराध क े स्वरूप उन तथ्य क� िस्थ� को ध्या म� रखते हुए �कया जाना चा�हए िजनम� प्र उठता है। 5.[3] यह �नवेदन �कया गया �क वतर्मा मामले म�, सजा देने वाल� अदालत ने सजा को एक साथ चलाने का �नद�श नह�ं �दया। यह �नवेदन �कया गया �क वतर्मा मामले म� अपीलकतार - आरोपी को दो अलग-अलग मामल� म� (एक ह� मामले से उत्पन नह�ं) दो अलग-अलग अपराध� क े �लए दो अलग-अलग मुक़दम� का सामना करना पड़ा और इस�लए अपीलकतार क� ओर से इस �नवेदन का कोई अथर नह�ं �क दोन� मामल� म� द� गई सज़ाएँ साथ-साथ चल�गी और इसे �दया भी नह�ं जा सकता। 5.[4] अपने उपरोक् �नवेदन क े समथर् म�, उन्ह�न इस न्यायल क े �नम्न�ल�ख �नणर्य पर भरोसा �कया है:- मोहम्म अख्त हुसैन उफ र इब्रा� अहमद भट्ट बनाम सीमा शुल् (रोकथाम) क े सहायक कलेक्ट, अहमदाबाद एवं एक अन् (1988) 4 एससीसी 183; रंजीत �संह बनाम क � द शा�सत प्रद चंडीगढ़ और एक अन् (1991) 4 एससीसी 304; वी.क े. बंसल बनाम ह�रयाणा राज् और एक अन् (2013) 7 एससीसी 211; नीरा यादव बनाम क � द्र जांच ब्यूर (2017) 8 एससीसी 757; �वक्क @ �वकास बनाम राज् (राष्ट् राजधानी �ेत �दल्ल) (2020) 11 एससीसी 540; गुरदेव �संह बनाम पंजाब राज् (2021) 6 एससीसी 558; शरद ह�र कोलम्ब बनाम. महाराष् राज् और अन्य (2018) 18 एससीसी 718 और राजपाल बनाम ओम प्रक व एक अन् (2019) 17 एससीसी 809। 5.[5] यह �नवेदन भी �कया गया �क वतर्मा मामले म� अपीलकतार- आरोपी आदतन अपराधी है। एफआईआर संख्य 134/1999 क े संबंध म�, उन्ह 4 �कलो हेरोइन रखने/बरामदगी क े �लए एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 23 और 21 क ठहराया गया था और वह�ं एफआईआर नंबर 43/1999 से जुड़े एक अन् मामले म� उसे 750 ग्र हेरोइन बरामदगी क करार �दया गया है। यह �नवेदन �कया गया �क इस�लए अपीलकतार-आरोपी प्राथर अनुसार �कसी भी प्रक क� नरमी का हकदार नह�ं है।

6. उपरोक्त �नवेदन करके इस न्यायलय के फैसल� पर भरोसा करत हुए, वतर्मा अपील को खा�रज करने क� प्राथर क� जाती है।

7. हमने संबं�धत प�कार� क� ओर से उपिस्थ �वद्वा अ�धवक्त को �वस्ता से सुना है।

8. इस न्यायाल क े सम� �वचार क े �लए जो सं��प् प्र उठाया गया है, वह यह है �क क्यादो अलग-अलग न्यायल द्वार दो अलग-अलग मुक़दम� म� एक ह� अ�भयुक्/व्यिक क े �खलाफ सुनाई गई सज़ाएँ एक साथ चलनी चा�हय� जैसा �क अपीलकतार क� ओर से �नवेदन �कया गया है या लगातार। 8.[1] सबसे पहले, यह ध्या देने क� आवश्यकत है �क वतर्मा मामले म�, अपीलकतार-आरोपी को दो अलग-अलग न्यायलय द्वार दो अलग-अलग मुक़दम� म� अलग-अलग मामल� क े संबंध म� अपराध� क े �लए दोषी ठहराया गया है। एक मामले म� उसे अमृतसर कोटर द्वार एनडीपीएस एक् क� धारा 23 और धारा 21 क े �लए 12 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई गई है और प्राथ�म संख्य 43/1999 से जुड़े एक अन् मामले म� �दल्ल न्यायल ने उसे एनडीपीएस एक् क� धारा 29 सहप�ठत धारा 21 (सी) क े �लए 15 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई है। एक मामले म� उसे 4 �कलो हेरोइन और दूसरे मामले म� 750 ग्र हेरोइन रखने का दोषी ठहराया गया है। यह भी ध्या देने क� आवश्यकत है �क दोन� मामल� म� एक क े बाद एक �नणर् �दए गए ह� और �दल्ल क� अदालत द्वार बाद क े फ ै सले और दोष�सद्� एवं सजा क े आदेश म�, माननीय �वचारण न्यायल (�दल्ल न्यायल) द्वार कोई �वशेष आदेश पा�रत नह�ं �कया गया है �क सजाएं साथ-साथ चल�गी। उपरोक् तथ्य को ध्या म� रखते हुए, वतर्मा अपील क े प्र पर �वचार �कया जाना आवश्य है। 8.[2] वतर्मा अपील क े मुद्द पर �वचार करते समय, दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 427 को संद�भर् करने क� आवश्यकत है, जो �नम्नानुसा है:-

427. ऐसे अपराधी को दंडादेश जो अन्य अपराध के �लए पहले से दण्डा�दष्ट - जब कारावास का दंडादेश पहले से ह� भोगने वाले व्यिक्त क पश्चात्व-दोष�सद्�ध पर कारावास या आजीवन कारावास का दंडादेश �दया जाता है तब जब तक न्यायालय यह �नद�श नदे �क पश्चात्वत दंडादेश ऐसे पूवर् दंडादेश के सा-साथ भोगा जाएगा, ऐसा कारावास या आजीवन कारावास उस कारावास क� समािप्त प, िजसक े �लए, वह पहले दंडादेश हुआ था, प्रारम्भ हो:परन्त, जहां उस व्यिक्त, िजसे प्र�तभू�त देने म� व्य�तक्रम करने पर 122 क े अधीन आदेश द्वारा कारावास का दंडादेश �दया गया है ऐसा दंडादेश भोगने क े दौरान ऐसे आदेश क े �दए जाने क े पूवर् �कए गए अपराध के �लए कारावास का दंडादेश �दया जाता है, वहां पश्चात्क�थत दंडादेश तुरंत प्रारम् जाएगा। (2) जब �कसी व्यिक्त, जो आजीवन कारावास का दंडादेश पहले से ह� भोग रहा है, पश्चात्वत� दोष�सद्�ध पर �कसी अव�ध के काराव या आजीवन कारावास का दंडादेश �दया जाता है तो पश्चात्वत दंडादेश पूवर् दंडादेश के सा-साथ भोगा जाएगा। अतः द.प.स. क� धारा 427 क े �नष्प� अध्यन, जब एक व्यिक्त जो पहले से ह� सजा काट रहा है उसे बाद म� कारावा या आजीवन कारावास क� सजा सुनाई जाती है तो ऐसा कारावास या आजीवन कारावास क� ऐसी सजा पहले सुनाई गई सजा क े पश्चा शुरु होगी | अथार्त दोन� दंडादेशो क� सजाए क्रमानुसार चलेग| हालां�क इसका एक अपवाद है क� जब तक न्यायलय यह �नद�श न दे �कपश्चात्व सजा पहले सुनाई गयी सज़ा क े साथ-साथ चलेगी| इसका एक अन्य अपवाद ह| द.प.स. क� धारा 427 क� उप – धारा (2) क े अनुसार जब कोई व्यिक् जो आजीवन कारावास का दंडादेश पहले से ह� भोग रहा है, पश्चात्वत� दोष�सद्�ध पर �कसी अव�ध के कारावास या आजी कारावास का दंडादेश �दया जाता है तो पश्चात्वत� दंडादेश पूव दंडादेश क े साथ-साथ भोगा जाएगा। इस�लए उपरोक्त दो मामलो म� क े वल पश्चात्व दंडादेश पहले द� गई सजा क साथ-साथ चलेगा| अन्यथा बादम� द� गयी सजा क्रमनुसार चलेगी और बाद म� सुनाई गयी सजा पूवर मे काट� गयी सजा क े बाद आरंभ होगी| 8.[3] क्य बाद क� सजा एक साथ चलनी चा�हए या क्रमानुस, इस संबंध म� इस न्यायलय क क ु छ �नणर्य को संद�भर् करने क� आवश्यकत है। 8.3.[1] मोहम्म अख्त हुसैन (उपरोक्) क े मामले म�, यह �टपण्णी करते हुए कहा गया �क य�द अपराध� से संबं�धत मामला समान नह�ं है या दो अपराध� क े तथ् काफ� �भन् ह� तो ऐसे म� बाद क� सजा क्रमानुस चलनी चा�हए। मोहम्म अख्त हुसैन क े मामले म�, इस न्यायाल ने कहा �क कानून द्वार सजा देने वाल� अदालत� क े �लए छोड़े गए �ववेक का व्याप �वस्ता क े वल अपराध क� गंभीरता तक सी�मत नह�ं होना चा�हए। कोई भी �ववेचन �निश्च रू से उ�चत सज़ा का �नधार्र नह�ं कर सकता है। उ�चत सजा पर पहुंचने म�, अदालत को कई कारक� पर �वचार करना चा�हए और कभी-कभी अस्वीका करना चा�हए। अदालत को कई �व�वध डेटा को 'पहचानना, �नयं�त् करना और अलग करना’ जानना चा�हए। तक र ्संग सजा सु�निश्च करने क े �लए यह एक संतुलनकार� कायर और ज�टल प्र�क है। �वशेष रू से क्रमानुस सजाओं म�, न्यायाल उस कारावास से आँख नह�ं मूँद सकता जो अ�भयुक् पहले से ह� भुगत रहा है। मोहम्म अख्त हुसैन एक ऐसा मामला है जो गोल् (क ं ट्र) एक्, 1968 क े तहत एक पा�कस्तान नाग�रक से जुड़ा है। 1982 क े सीसी नंबर 1674 म� मुख् महानगर दंडा�धकार�, अहमदाबाद क� अदालत द्वार पहले मामले म� 7 साल क� क ै द और 10 लाख रुपय क े जुमार्न क� सजा थी। अपील करने पर, उच् न्यायाल ने सजा क� पुिष् क� ले�कन जुमार्न घटाकर 5 लाख रुपय कर �दया। इसम� अपीलाथ� द्वार दायर �वशेष अनुम�त या�चका को इस न्यायाल ने खा�रज कर �दया और दोष�सद्� और सजा अं�तम हो गई। जब अपीलाथ� उक् मामले म� न्या�य �हरासत म� था, तब उसक� तस्कर ग�त�व�धय� क े संबंध म� आगे क� जांच क� गई थी। इससे कई लोग� क� �मल�भगत से सोने और चांद� क� तस्कर क े व्याप रैक े ट का पता चला। उसम� अपीलकतार पर 18 अन् लोग� क े साथ सीमा शुल् अ�ध�नयम, 1962 क� धारा 135 क े तहत �फर से मुकदमा चलाया गया था। उसम� अपीलकतार को दोषी ठहराया गया और 4 साल क े सश् कारावास और 2 लाख रुपय क े जुमार्न क� सजा और जुमार्न अदा न करने पर व्य�तक्रम बदले म� सजा सुनाई गई। इसक े बाद, राज् क े साथ-साथ उसम� अपीलकतार ने उच् न्यायाल का दरवाजा खटखटाया। उच् न्यायाल ने राज् क� अपील को स्वीका कर �लया और सजा को 4 साल से बढ़ाकर 7 साल कर �दया और इसे क्रमानुस कर �दया। प�रणामस्वर, उच् न्यायाल ने अपीलकतार क� अपील को खा�रज कर �दया। नतीजा यह हुआ �क उन्ह सभी 14 साल क े कारावास क� सजा काटनी पड़ी, िजसे उन्ह�न इस न्यायाल क े सम� चुनौती द� थी अंतत: इस न्यायल ने �वचारण न्यायल द्वार द� गई सजा को बहाल कर �दया और अपील क� अनुम�त देकर उच् न्यायाल द्वार बढ़ाई गई सजा को रद् कर �दया। 8.3.[2] पैराग्र 8 म� रंजीत �संह (उपरोक्) क े मामले म�, �नम्नानुसा �टपण्णी क� ग:- "8. दंड प्र�क्रया सं�हत धारा 427 क� उपधारा (1) म� उस िस्थ� का प्रावध है जब पहले से ह� कारावास क� सजा भुगत रहे व्यिक को बाद म� कारावास या आजीवन कारावास क� सजा सुनाई जाती है। दूसरे शब्द म�, दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क� उपधारा (1) एक ऐसे अपराधी से संबं�धत है, िजसे एक �निश्च अव�ध क े �लए सजा भुगतते हुए बाद म� एक �निश्च अव�ध क े �लए या आजीवन कारावास का दोषी ठहराया जाता है। ऐसी िस्थ� म�, पहल� सजा, एक �निश्च अव�ध क े �लए होने क े कारण, एक �निश्च तार�ख को समाप् हो जाती है, जो बाद क� दोष�सद्�धक े समय �ात होती है। उपधारा (1) म� कहा गया है �क ऐसी िस्थ� म�, पहल� सजा जो अपराधी काट रहा है, क� समािप् क� तार�ख �ात होने पर, आमतौर पर बाद क� सजा कारावास क� पहल� अव�ध क� समािप् पर शुर होगी जब तक �क अदालत बाद क� सजा को �पछल� सजा क े साथ- साथ चलने का �नद�श न दे। जा�हर है, उपधारा (1) क े तहत आने वाले मामल� म� जहां सजा एक �निश्च अव�ध क े �लए होती है, बाद क� सजा क्रमानुस हो सकती है जब तक �क एक साथ चलने का �नद�श न �दया जाए। दूसर� ओर, उपधारा (2) म� एक ऐसे अपराधी क े �लए प्रावध है जो "पहले से ह� आजीवन कारावास क� सजा भुगत रहा है" िजसे बाद क� दोष�सद्�ध प एक (�निश्च) अव�ध या आजीवन कारावास क� सजा सुनाई जाती है। �मठू बनाम पंजाब राज्, (1983) 2 एससीसी 277 क े बाद गोपाल �वनायक गोडसे [रंजीत �संह बनाम चंडीगढ़ क � द्र शा�सत प्, (1984) 1 एससीसी 31 म� इस न्यायाल क े फ ै सले क े बाद से यह अच्छ तरह से स्था�प है और मार राम [(1981) 1 एससीसी 107 म� दोहराया गया है �क आजीवन कारावास अपराधी क े शेष जीवन क े �लए एक सजा है जब तक �क शेष सजा को उपयुक् प्रा�धका द्वार बदल या माफ़ न कर �दया जाए। बाद म� दोष�सद्� पर न्यायाल द्वार सजा सुनाए जाने क े चरण म� ऐसा होने पर, आजीवन कारावास क� पूवर सजा को इस प्रक समझा जाना चा�हए और, इस�लए, बाद मे एक �निश्च अव�ध क े �लए कारावास या क्रमानुस आजीवन कारावास क� सजा का कोई सवाल ह� नह�ं हो सकता जो धारा 427 क� उपधारा (1) म� �नधार्�र सामान् �नयम है। जैसा �क श् गगर ने सह� तक र �दया, और श् ल�लत द्वार �ववा�दत नह�ं �कया गया, आजीवन कारावास क� पूवर सजा का अथर शेष जीवन जेल म� काटने क� सजा क े रू म� समझा जाना जब तक उपयुक् प्रा�धका द्वार प�रव�तर् या माफ़ नह�ं �कया जाता है और क े वल एक जीवन काल वाला व्यिक, एक अव�ध क े �लए कारावास या आजीवन कारावास क े बाद क� सजा पर सजा क े वल पहले क े आजीवन कारावास क� सजा पर लागू क� जा सकती है और �निश्च रू से इसम� नह�ं जोड़ी जा सकती है अपराधी क े जीवन काल का �वस्ता करना या उस मामले क े �लए कोई भी मानव शिक् से परे है। यह स्पष िस्थ� है जो धारा 427 क� उप धारा (2) म� बताई गई है क्य�� उसक� उपधारा (1) म� उिल्ल�ख सामान् �नयम यह है �क अदालत क े �नद�श क े �बना बाद क� सजा एक साथ नह�ं बिल् क्रमानुस चलेगी। एकमात िस्थ� िजसम� �पछल� सजा क े साथ-साथ बाद क� सजा को चलाने क े �लए अदालत क े �कसी �नद�श क� आवश्यकत नह�ं है, उपधारा (2) म� प्रद क� गई है िजसे उपधारा (1) पर आधा�रत �कसी भी संभा�वत �ववाद से बचने क े �लए बनाया गया है, य�द उस संबंध म� न्यायाल का कोई स्पष �नद�श नह�ं है। उपधारा (2) धारा 427 क� उपधारा (1) क े सामान् �नयम क े अपवाद क� िस्थ� म� है �क बाद क� दोष�सद्�ध क� सज पहल� सजा क� समािप् पर शुर होती है जब तक �क अदालत इसे एक साथ चलाने का �नद�श नह�ं देती। इस�लए धारा 427 क� उपधारा (1) और (2) का अथर और उद्देश और उपधारा (2) को लागू करने का उद्देश स्पष है।" 8.3.[3] वी क े बंसल (उपरोक्) क े मामले म�, पैरा 10 म� मोहम्म अख्त (उपरोक्) क े मामले म� इस न्यायाल क े फ ै सले पर भरोसा करने क े बाद �नम्नानुसा �टप्पण क� है:- "10. इस मामले म� सं�हता क� धारा 427(1) क े तहत न्यायाल को उपलब् शिक् क े स्वर से हमारा अ�धक सरोकार है, जो हमार� राय म� तीन िस्थ�तय को छोड़कर पालन �कए जाने वाले एक सामान् �नयम को �नधार्�र करता है: पहला धारा 427 क� उपधारा (1) क े प्रावध क े अंतगर् आता है; दूसरा उसक े उपधारा (2) क े अंतगर् आता है; और तीसरा जहां अदालत �नद�श देती है �क सजाएं साथ- साथ चल�गी। यह धारा 427 (1) से प्र होता है �क न्यायाल क े पास �नद�श जार� करने क� शिक् और �ववेक है, ले�कन न्यायाल को प्र शिक् क े स्वर म� �ववेकाधीन शिक् का प्रय न्या�य तजर पर �कया जाना चा�हए, न �क बुद्�धर�ह, उदासीन या रू�ढ़वाद ढंग से। न्यायलय द्वा इस तरह क े �ववेक का प्रय करने क े मामले म� �कसी भी तरह क े कठोर दृिष्टक को �नधार्�र करना मुिश्क है। धारा 427 (1) क े �चंतन क े भीतर �नद�श जार� करने या अस्वीका करने क े मामले म� न्यायाल क े पास कोई सट�क �नयम नह�ं है। �कसी �वशेष मामले म� �नद�श जार� �कया जाना चा�हए या नह�ं, यह �कये गए अपराध अथवा अपराध� क े स्वरुतथा उस तथ् क� पर�िस्थ� पर �नभर् करेगा िजसम� समवत� सज़ाएँ चलने का प्र उठता है।" 8.3.[4] नीरा यादव (उपरोक्) क े मामले म�, दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क� व्याख्/�वचार करते समय यह �टपण्णी क� ग और यह माना गया �क दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 एक ऐसे अपराधी को द� गई सजा से संबं�धत है िजसे पहले से ह� �कसी अन् अपराध क े �लए सजा सुनाई जा चुक� है और समवत� सजा का आदेश देने क े �लए धारा 427 क े तहत न्यायाल को प्र शिक् �ववेकाधीन है। यह भी कहा गया �क �वधा�यका क� नी�त यह है �क आम तौर पर सजा क्रमानुस द� जानी चा�हए। यह भी कहा गया �क क े वल उपयुक् मामल� म�, मामले क े तथ्य पर �वचार करते हुए, अदालत सजा को पहले क� सजा क े साथ समवत� कर सकती है। यह भी कहा गया �क सह्संगत का �नद�श देने क े �लए सजा देने वाल� अदालत द्वार प्रय �कया गया �ववेक ठोस �सद्धांत पर करना होगा, न �क सनक पर। �कसी �वशेष मामले म� �नद�श जार� �कया जाना चा�हए या नह�ं, यह अपराध क े स्वर या घ�टत अपराध� पर �नभर् करेगा। उक् �नणर् म� आगे यह कहा और माना गया है �क यह अच्छ तरह से स्था�प है �क जहां अलग-अलग मामले ह�, अलग-अलग अपराध संख्याए ह� और अलग-अलग �नणर्य द्वार मामल� का फ ै सला �कया गया है, दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क े तहत साथ-साथ सजा नह�ं द� जा सकती। यह भी कहा गया है �क हालां�क, सामान् �नयम यह है �क अगर सजा दो अलग-अलग मामल� से संबं�धत है, तो सजा समवत� नह�ं हो सकती, (हाँ) अदालत क े आदेश से बदला जा सकता है। 8.3.[5] शरद ह�र कोलाम्ब (उपरोक्) क े मामले म�, यह कहा और माना गया �क जब तक अदालत यह �नद�श नह�ं देती �क एक ह� मुकदमे म� एक जैसे दो या दो से अ�धक अपराध� क� सजा एक साथ चलनी चा�हए, तो सामान् �सद्धां यह है �क एक सजा दूसरे क� समािप् क े बाद शुर होगी। इसी तरह, ऐसे मामले म� जहां पहले से ह� सजा भुगत रहे व्यिक को बाद क े मुकदमे म� अपराध क े संबंध म� सजा सुनाई जाती है, तो सामान् �नयम यह है �क बाद म� द� गई सजा क्रमानुस चलती है जब तक �क दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 क े तहत प्त �ववेक का प्रय करते हुए बाद म� कोई भी सज़ा देते समय अदालत द्वार कोई �व�शष् आदेश पा�रत नह�ं �कया जाता �क तथ्य और प�रिस्थ�तय को देखते हुए बाद क� सजा एक साथ चलनी चा�हए, तब तक दोन� मामल� म� द� गई सजा क्रमानुस चलेगी। 8.3.[6] गुलाम मोहम्म म�लक बनाम गुजरात राज् एवं एक अन्. (2018) 14 एससीसी 473 क े मामले म�, इस न्यायाल ने दो अपील� पर �वचार �कया। एक ह� अपीलाथ� क े संबंध म� एक गुजरात क े उच् न्यायाल क े �नणर् से और दूसरा बंबई क े उच् न्यायाल क े �नणर् से। दोन� मामल� म�, अपीलाथ� पर एनडीपीएस अ�ध�नयम, 1985 क� धारा 8 (सी), 20 (बी) और 29 क े तहत आरोप लगाए गए। जहां तक गुजरात म� दायर एनडीपीएस क े स नंबर 1/2002 क े रूप म� दज मामले का संबंध है, तो अपीलाथ� को दोषी करार देते हुए दस वषर क े सश् कारावास एवं एक लाख रुप का जुमार्न अदा करने का �नद�श �दया गया और जुमार्न अदा न करने क� िस्थ� म� और एक वषर क े सश् कारावास क� सज़ा सुनाई गई। उसम� अपीलाथ� ने उच् न्यायाल क े सम� उक् दोष�सद्� और सजा को चुनौती देते हुए एक अपील दायर क� िजसने उसक� अपील को खा�रज कर �दया। दरअसल, सजा बढ़ाने क� राज् क� अपील खा�रज कर द� गई। दूसरे मामले म�, अपीलाथ� पर एनडीपीएस, सत न्यायाल, ग्रे बॉम्ब क े �वशेष न्यायाधी द्वार 2002 क े �वशेष मामला संख्य 60 म� मुकदमा चलाया गया, िजसक े प�रणामस्वर एनडीपीएस\ अ�ध�नयम क� धारा 8(सी), 20(b)(ii) सहप�ठत धारा 31A क े तहत अपीलाथ� दोष�सद्ध हुआ और उसे मृत् दंडादेश सुनाया गया। मृत्य दंडादेश को उच् न्यायाल क े सम� पुिष् क े �लए भेजा गया था। उसम� अपीलाथ� ने उक् दोष�सद्� और सजा क े �वरुद बंबई उच् न्यायाल म� एक अपील भी दायर क� थी। उच् न्यायाल ने मृत्यु दंडादेश क� पुिष् न करक े राज् द्वार दायर पुिष्ट मामल संख्य 2/2008 को खा�रज कर �दया और अपीलाथ� क� अपील को खा�रज कर करते हुए मृत्युदंडादेश को तीस साल क े सश् कारावास और 3 लाख रुपय क े जुमार्न म� बदल �दया गया। मृत्युदंडादेश क े प�रवतर् से संबं�धत मामले पर इस न्यायाल क े सम� �वचार �कया गया था और उक् मामले क े तथ्य से संबं�धत एनडीपीएस अ�ध�नयम क� धारा 31 पर �वचार करने पर यह माना गया �क इसम� अपीलाथ� को अ�धकतम सजा द� जानी थी और उसक े बाद डेढ़ से गुना �कया गया। धारा 31 क े तहत �नधार्�र कारावास क� न्यूनत अव�ध 10 वषर है, इस �हसाब से, इसे डेढ़ गुना बढाने पर न्यूनत सजा 15 साल हो जाती है। अंततः, इस न्यायाल द्वार आदे�शत सजा 16 साल क े सश् कारावास क� थी। न्यायाल ने यह भी ध्या म� रखा �क उसम� अपीलाथ� 65 वषर का था और �व�भन् बीमा�रय� से जूझ रहा था। यह भी आदेश �दया गया �क सजा साथ-साथ चलेगी और जहां तक दोन� मामल� क े संबंध म� गुजरात म� �नचल� अदालत द्वार लगाया गया एक लाख रुपय का जुमार्न है, तो वह� रहेगा। जहां तक बंबई मामले म� 3 लाख रुपय क े जुमार्न क� बात है तो उसे 3 लाख रुपय से घटाकर 2 लाख रुपय कर �दया गया। तद्नुसा अपील� का �नपटान �कया गया।

9. इस प्रक इस न्यायाल क े पूव�क् �नणर्य से कानून क े जो �सद्धां सामने आते ह�, वे �नम्नप्रक ह�:- (i) य�द पहले से ह� कारावास क� सजा काट रहे �कसी व्यिक्त बाद म� कारावास क� सजा सुनाई जाती है, तो कारावास क� बाद क� अव�ध सामान् रू से उस कारावास क� समािप् पर शुर होगी, िजसक े �लए उसे पहले सजा सुनाई गई थी; (ii) आम तौर पर बाद क� सजा, पहले कारावास क� अव�ध क� समािप् पर शुर होगी जब तक �क अदालत बाद क� सजा को �पछल� सजा क े साथ-साथ चलाने का �नद�श न दे; (iii) सामान् �नयम यह है �क जहां अलग-अलग मामले, अलग-अलग अपराध संख्याएं होत ह� और मामले अलग- अलग �नणर्य द्वार तय �कए जाते ह�, तो दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 427 क े तहत साथ-साथ सजा नह�ं द� जा सकती; (iv) दंड प्र�क्रया सं क� धारा 427 (1) क े तहत अदालत क े पास यह �नद�श जार� करने का अ�धकार और �ववेक है �क बाद क� सभी सजाएं �पछल� सजा क े साथ-साथ चल�गी, हालां�क �ववेक का प्रय, अपराध या घ�टत अपराध� क े स्वरुप औतथ्य� क�िस्थ�त क आधार पर �ववेकपूणर ढंग से �कया जाना चा�हए। ले�कन अदालत द्वार �व�शष् �नद�श या आदेश होना चा�हए �क बाद क� सजा �पछल� सजा क े साथ-साथ चलेगी।

10. उपरोक् �नणर्य म� इस न्यायाल द्वार �नधार्�र कानून और वतर्मान मामल क े तथ्य से जुड़े ऊपर व�णर् कानून क े �सद्धांतको लागू करते हुए, अपीलाथ�-अ�भयुक् क े उस �नवेदन को �सरे से ख़ा�रज �कया जाता है �क उसे �मलने वाल� बाद क� सजा �पछल� सजा क े साथ चले। वतर्मा मामले म� अपीलकतार को दो अलग-अलग मामल� क े संबंध म� दोषी ठहराया गया है, अलग-अलग अपराध संख्याए ह� और अलग-अलग �नणर्य द्वार मामल� का फ ै सला �कया गया है। इस�लए, अपीलकतार दंड प्र�क् सं�हता क� धारा 427 क े तहत साथ-साथ सजा क े �कसी भी लाभ का हकदार नह�ं है। उपरोक्त �टपण्णी क अनुसार, बाद क� सजा सुनाते समय अदालत द्वार जार� कोई �व�शष् आदेश या �नद�श नह�ं है �क बाद क� सजा �पछल� सजा क े साथ-साथ चले।

11. दंड प्र�क सं�हता क� धारा 427 (1) क े तहत उपरोक् �टपण्ण क े अनुसार दूसर� िस्थ� म� भी, न्यायाल क े पास यह �नद�श जार� करने क� शिक् और �ववेक है �क बाद क� सजा को �पछल� सजा क े साथ-साथ चलाया जाए। उस िस्थ� म� भी, �ववेक का प्रय अपराध क े स्वर या घ�टत अपराध� क े आधार पर �ववेक-सम्म ढंग से �कया जाना चा�हए। वतर्मा मामले म� अपीलकतार-अ�भयुक् को एनडीपीएस अ�ध�नयम क े तहत अपराध क े �लए दोषी ठहराया गया है। उसे 4 �कलो हेरोइन क� बरामदगी क े एक मामले म� दोषी ठहराया गया है और 12 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई गई है वह�ं एक अन् मामले म� 750 ग्र हेरोइन क� बरामदगी हुई है और एनडीपीएस एक् क� धारा 31(ii) को देखते हुए उसे 15 साल क े सश् कारावास क� सजा सुनाई गई है। एनडीपीएस अ�ध�नयम क े �लए दोषी पाए जाने वाले आरोपी क े प्र कोई नरमी नह�ं �दखाई जानी चा�हए। जो व्यिक नशीले पदाथ� का कारोबार कर रहे ह�, कई कमज़ोर, �नद�ष युवा पी�ड़त� क� मौत का कारण बनने या प्र-घातक आघात पहुँचाने म� उनक� भू�मका होती है। ऐसे अ�भयुक् समाज पर हा�नकारक और घातक प्रभ डालते ह�। वे समाज क े �लए खतरा ह�। इस देश म� नशीले और मादक पदाथ� क� गुप् तस्कर क� इस तरह क� संग�ठत ग�त�व�धय� और ऐसे पदाथ� क� अवैध तस्कर का समग रू से समाज पर घातक प्रभ पड़ता है। इस�लए, एनडीपीएस अ�ध�नयम से जुड़े मामले म� सजा या दंड देते समय, समग रू से समाज क े �हत को ध्या म� रखना आवश्य है। इस�लए, दंड प्र�क सं�हता क� धारा 427 क े तहत �ववेका�धकार का प्रय करते हुए भी, �ववेक का प्रय उस आरोपी क े प� म� नह�ं होगा जो नशीले और मादक पदाथ� क� अवैध तस्कर म� �लप् पाया जाता है। उपरोक् �टपण्ण क े अनुसार, दंड प्र�क सं�हता क� धारा 427 क े तहत �पछल� सजा क े साथ-साथ बाद क� सजा को चलाने क े �लए �ववेक का प्रय करते हुए भी, �ववेकपूणर तर�क े से और अपराध/घ�टत अपराध� क े आधार पर �ववेक का प्रय �कया जाना है। इस�लए, एनडीपीएस अ�ध�नयम क े तहत अपराध� को देखते हुए, जो बहुत गंभीर ह� और बड़े पैमाने पर समाज क े �खलाफ ह�, ऐसे अ�भयुक् क े प� म� कोई �ववेक का प्रय नह�ं �कया जाएगा जो एनडीपीएस अ�ध�नयम क े तहत अपराध म� शा�मल ह�।

12. उपरोक् क े मद्देनज़ और उक्त उल्ले� कारण� से, अपीलकतार-अ�भयुक् क� ओर से एफआईआर संख्य 43/1999 से जुड़े मामले म� बाद क� सजा को एफआईआर संख्य 134/1999 से संबं�धत �पछल� सजा क े साथ-साथ चलाने क े �लए �नद��शत करने हेतु �नवेदन एतद्द्वा खा�रज �कये जाते ह�। उपरोक् क े मद्देनज़ और उक्त उल्ले� कारण� से, वतर्मा अपील �नष्ल हो जाती है और वह खा�रज �कए जाने योग् है और तदनुसार खा�रज क� जाती है। ……………….. न्यायमू�त [एम.आर. शाह] ……………….. न्यायमू�त [बी. वी. नागरथना] नई �दल्ल �दसम्बर07, 2021 अस्वीकर: देशी भाषा म� �नणर् का अनुवाद मुकद्द्मेब क े सी�मत प्रय हेतु �कया गया है ता�क वो अपनी भाषा म� इसे समझ सक े एवं यह �कसी अन् प्रयो हेतु प्रय नह�ं �कया जाएगा| समस् कायार्लय एवं व्यावहा�र प्रयोज हेतु �नणर् का अंग्रे स्वर ह� अ�भप्रमा� माना जाएगा और कायार्न्व तथा लागू �कए जाने हेतु उसे ह� वर�यता द� जाएगी|