UCO Bank v. Krishna Kumar Bhardwaj

Supreme Court of India · 18 Feb 2022
Ajay Rastogi; Abhay S. Oka
Civil Appeal No 1458 of 2022 (Diary No. 13615 of 2021)
administrative appeal_allowed Significant

AI Summary

The court allowed the appeal, setting aside disciplinary punishment due to vague charges and lack of evidence, emphasizing the necessity of clear charges and limited judicial review in disciplinary matters.

Full Text
Translation output
अप्रति वेद्य
भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपीलीय अति कारिर ा
सिसविवल अपील सं 1458 वर्ष 2022
(विव.अ.या. (सिसविवल) सं. 13615 वर्ष 2021) से उद्भू
महाप्रबं क (संचालन 1) /
अपीलीय प्राति कारी, यूको बैंक एवं अन्य .... अपीलार्थी5 (गण)
बनाम

ृ ष्ण क
ु मार भारद्वाज .... प्रति वादी (गण)
विनणय
न्यायमूर्ति रस् ोगी
JUDGMENT

1. अनुमति प्रदान की गयी। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

2. व मान अपील इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पारिर 19 फरवरी, 2021 विदनांविक विनणय और आदेश क े खिखलाफ की गयी है सिजसमें 15 मई, 1993 विदनांविक आरोप पत्र क े अनुसरण में प्रति वादी पर अति रोविप दण्ड एवं अनुशासनात्मक कायवाही को अपास् कर विदया गया।

3. प्रति वादी ने पदासीन प्रबं क क े रूप में काम कर े हुए और ाहरपुर, भबीसा, मुजफ्फरनगर में ैना रह े हुए, अपने क व्यों क े विनवहन में घोर अविनयविम ाएं कीं और कथिर्थी कदाचार क े खिलए, उसे यूको बैंक अति कारी कमचारी (आचरण) विवविनयम, 1976 (ए श्मि[मनपश्चा "विवविनयम 1976" क े रूप में संदर्भिभ ) क े विवविनयमन 6 क े ह 15 मई, 1993 विदनांविक आरोपों/कर्थीनों क े सार्थी आरोप पत्र ामील की गयी। 15 मई, 1993 को प्रति वादी को ामील आरोप विनम्नानुसार पुनप्रस् ु विकये जा े हैं: "प्र ान कायालय 10, बीटीएम सरानी, ब्रेबोन रोड, कलकत्ता 700001 यूको बैंक फोनः कायालय 246365, फ ै क्स-0522-245432 ग्रामः"एजीएम यूको" एसटीडी कोडः 0522 आंचखिलक कायालय 23, Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विव ान सभा माग, लखनऊ 226 001 (उ.प्र.) आरोपों क े विबन्दु श्री क े क े भारद्वाज, पीएफएम सं. 23213, ाहरपुर भबीसा शाखा प्रबं क क े रूप में काय कर े हुए कई काय और लोप में खिलप्त र्थीे, सिजसक े खिलए उन्हें विनम्नव ् आरोविप विकया गया हैः 1) उन्होंने उतिच परिरचय प्राप्त विकए विबना और आव[यक औपचारिरक ाओं को पूरा विकए विबना 24.12.91 को दो एसबी खा ा सं. 3646 और 3647 खोला र्थीा। इस प्रकार वह पूरी ईमानदारी, विनष्ठा, सजग ा और समपण क े सार्थी अपने क व्यों का विनवहन करने में विवफल रहे। यह यूको बैंक अति कारी कमचारी (आचरण) विवविनयम, 1976 क े विवविनयमन (3) का उल्लंघन र्थीा। 2) मेरठ में करेंसी चेस्ट शाखा में बैंक की नकदी की बड़ी राथिश जमा कर े समय, उन्होंने बैंक क े मैनुअल ऑफ इंस्ट्रक्शंस (क ै श) में विन ारिर प्रविrया का पालन नहीं विकया और इस रह क े नकद प्रेर्षण क े खिलए शाखा द्वारा पूव आचरण से भी विवर हुए। इस प्रकार वह पूरी ईमानदारी, विनष्ठा, सजग ा और Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA समपण क े सार्थी अपने क व्यों का विनवहन करने में विवफल रहे। यह यूको बैंक अति कारी कमचारी (आचरण) विवविनयम, 1976 क े विवविनयमन (3) का उल्लंघन र्थीा।

3) उतिच परिरचय प्राप्त विकए विबना दो खा े खोलकर, उसमें भारी लेनदेन की अनुमति देकर, झूठे प्रमाण पत्र जारी करक े उन्होंने बेईमान व्यविuयों को सरकार की माफी योजनाएँ क े ह सिजनक े वे हकदार नहीं र्थीे, आर्भिर्थीक लाभ प्राप्त करने की सुविव ा प्रदान की। इस प्रकार, वह पूरी ईमानदारी, विनष्ठा, सजग ा और समपण क े सार्थी अपने क व्यों का विनवहन करने में विवफल रहे। यह यूको बैंक अति कारी कमचारी (आचरण) विवविनयम, 1976 क े विवविनयमन (3) का उल्लंघन र्थीा।

4) श्री भारद्वाज बैंक क े विनयमों क े अनुसार, छ ु ट्टी की उतिच मंजूरी क े विबना कई महीनों की अवति क े खिलए अपने क व्यों से अनुपश्मिस्र्थी रहे। इस प्रकार वह पूरी ईमानदारी, विनष्ठा, सजग ा और समपण क े सार्थी अपने क व्यों का विनवहन करने में विवफल रहे। यह यूको बैंक अति कारी कमचारी (आचरण) विवविनयम, 1976 क े विवविनयमन (3) का उल्लंघन र्थीा। हस् ाक्षर/- आंचखिलक प्रबं क (अनुशासनात्मक प्राति कारी) " Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 10, बीटीएम सरानी, ब्रेबोन रोड, कलकत्ता 700001 यूको बैंक फोनः कायालय 246365, फ ै क्स-0522-245432 ग्रामः"एजीएम यूको" एसटीडी कोडः 0522 आंचखिलक कायालय 23, विव ान सभा माग, लखनऊ 226 001 (उ.प्र.) आरोपों का विववरण श्री क े क े भारद्वाज (पीएफएम सं. 23213) पहले ाहरपुर भबीसा शाखा क े प्रबं क क े रूप में ैना र्थीे। उu शाखा क े प्रबं क क े रूप में अपने कायकाल क े दौरान, वे कई क ृ त्यों और विवलोप में खिलप्त रहे। ऐसे क ृ त्यों का विववरण नीचे विदया गया हैः 1) ाहरपुर भबीसा शाखा क े प्रबं क क े रूप में काम कर े हुए, उन्होंने श्री अशोक क ु मार शमा और श्री नरेंद्र गोयल क े नाम पर विबना उतिच परिरचय क े 24.12.91 को दो एसबी खा े सं. 3646 और 3647 खोले, जैसा विक संबंति खा ा खोलने क े फाम में कहा गया है। हालांविक, खा ा ारकों क े नाम अशोक शमा और नरेंद्र क ु मार Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गोयल क े रूप में खिलखे गए र्थीे। इन दो खा ों को खोलने क े खिलए, श्री भारद्वाज ने अज्ञा कारणों से दोनों खा ों क े खिलए एक से अति क फाम सेट खिलया । इन खा ों को जाविहर ौर पर विकसी श्री यामीन और विकसी श्री अक्षय कु मार द्वारा परिरचय कराया गया सिजनक े हस् ाक्षर सत्याविप नहीं र्थीे। श्री भारद्वाज ने खा े खोलने से पहले व्यविuयों की पहचान क े बारे में विववेकपूण पूछ ाछ नहीं की ।खा ों को खोला गया और खा ों क े माध्यम से बड़े लेनदेन की अनुमति दी गई। बाद में, यह प ा चला विक खा ा ारकों क े नाम काल्पविनक र्थीे। 14. 1. 92 को, नरेंद्र क ु मार गोयल क े रूप में बैंक क े कमचारिरयों को ज्ञा दो खा ा ारकों में से एक ने शाखा पर कॉल विकया प्रबं क क े बारे में पूछा और दावा विकया विक बैंक की मेरठ करेंसी चेस्ट में जमा करने क े खिलए प्रबं क द्वारा उनक े द्वारा विदए गए 15 लाख रुपये,जमा नहीं विकए गए हैं। 2) 24.12.91 को मेरठ में करेंसी चेस्ट में रु. 24 लाख की नकदी जमा कर े समय, और 1.192 को रु. 20 लाख की नकदी जमा कर े समय, श्री भारद्वाज ने बैंक क े मैनुअल ऑफ इंस्ट्रक्शंस (क ै श) में विन ारिर प्रविrया का पालन नहीं विकया और एक क्लक/चपरासी और कां ला शाखा क े सशस्त्र गाड क े माध्यम से नकदी भेजने क े खिलए शाखा द्वारा अपनाई जाने वाली प्रर्थीा से भी विवर हुए। उपरोu पैरा 1 में उसिल्लखिख दो खा ों से संबंति लेनदेन,खा ा ारकों से नकद प्राप्त करने से लेकर मेरठ में करेंसी चेस्ट में नकदी जमा करने क व्यविuग रूप से श्री भारद्वाज द्वारा विकया गया।

3) आयकर विवभाग ने श्री पवन वीर सिंसह, श्रीम ी सरजी कौर और श्रीम ी ज्योति सचदेवा क े पक्ष में ीन प्रमाणपत्रों की फोटो प्रति यां संलग्न कर े हुए ाहरपुर भबीसा शाखा को एक पत्र भेजा र्थीा, जो श्री क े क े भारद्वाज, प्रबं क क े हस् ाक्षर क े ह Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जारी विकए गए र्थीे। प्रमाणपत्रों में खा ों को एनआरई खा ा कहा गया र्थीा जो सही नहीं र्थीे, क्योंविक शाखा में ऐसे एनआरई खा े नहीं र्थीे। जांच विनदेशालय, नई विदल्ली ने आईटी अति विनयम, की ारा 132 क े ह यूको बैंक, हरपुर भबीसा शाखा क े सार्थी rमशः श्री अशोक कु मार शमा और श्री नरेंद्र गोयल क े नाम पर एसबी खा ा नंबर 3646 और 3647 की खोज की । यह पाया गया श्री नरेंद्र क ु मार गोयल क े खा े में रु. 95,500/और श्री अशोक क ु मार शमा क े खा े में रु. 3,17,000/ शेर्ष नराथिश र्थीी। इन खा ों में रु. 4,12,500/की क ु ल राथिश बाद में पंचनामा विदनांक 8.4.1992 क े द्वारा जब् कर ली गई। बैंक क े बहीखा ा से प ा चल ा है विक श्री नरेंद्र गोयल ने 24 विदसंबर, 1991 को रु 21,00,000/- जमा विकए र्थीे और श्री अशोक क ु मार शमा ने 4.1. 92 को रु 7,00,000/- और 24.12.91 को रु. 20,00,000/ जमा विकए र्थीे। विवथिभन्न व्यविuयों क े पक्ष में डीडी जारी करक े इन खा ों से न विनकाला गया र्थीा। जांच विनदेशालय द्वारा एक जांच क े दौरान, यह पाया गया विक तिडमांड ड्राफ्ट उन व्यविuयों क े नाम पर जारी विकए गए र्थीे जो विदल्ली क े विनवासी र्थीे और इन ड्राफ्ट को कथिर्थी रूप से गैर-विनवासी (बाहरी) खा ों से बनाए जाने का दावा विकया गया र्थीा। सिजन व्यविuयों ने इन ड्राफ्ट को प्राप्त विकया र्थीा, उन्होंने 31.3.1992 क लागू होने वाली एमनेस्टी स्कीम क े ह छ ू ट का दावा विकया र्थीा, सिजसक े ह गैर विनवासी बाहरी खा ों से प्राप्त विकसी भी ड्राफ्ट/उपहार में आयकर से छ ू ट र्थीी। सव त्तम प्रयासों क े बावजूद, जांच विनदेशालय उन व्यविuयों का प ा नहीं लगा सका सिजनक े नाम ये खा े र्थीे। बैंक क े रिरकॉड में उपलब् प े पर उन्हें भेजे गए पत्र Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इस विटप्पणी क े सार्थी वापस आए विक उन व्यविuयों का अश्मिस् त्व नहीं र्थीा। सार्थी ही व्यविuयों की वास् विवक ा क े बारे में खा ा खोलने क े प्रपत्रों से कु छ भी प ा नहीं चल ा। इसखिलए, आयकर विवभाग, इस विनष्कर्ष पर पहुंचा विक शाखा प्रबं क श्री क े क े भारद्वाज द्वारा काल्पविनक नामों में खा े खोले गए र्थीे और इसखिलए जमा विकया गया न शाखा प्रबं क का अघोविर्ष न र्थीा। दनुसार, आयकर अति कारिरयों द्वारा आईटी अति विनयम की ारा 132 (एस) सपविठ विनयम 112 ए क े ह नोविटस जारी विकया गया र्थीा। नोविटस का जवाब उनक े द्वारा सं ोर्षजनक नहीं पाया गया और सहायक आयकर आयुu ने दनुसार अघोविर्ष आय का अनुमान रु. 48,20,000/ लगाया। आय पर गणना की गई कर की राथिश रु. 26,70,800/और कर पर देय ब्याज रु. 2,97,731/र्थीा। इसखिलए, देय ा को सं ुष्ट करने क े खिलए आव[यक क ु ल राथिश रु. 29,68,531/ आयी। सहायक आयुu ने दनुसार जब् राथिश 4,12,500/- को रोक े रखने क े आदेश जारी विकए क्योंविक कर देय ा बहु अति क र्थीी। श्री क े क े भारद्वाज दो एसबी खा ों को अविनयविम रूप से काल्पविनक नामों में खोलने, बड़े लेनदेन की अनुमति देने और खा ों और उसक े सभी परिरणामों क े बारे में प्रमाण पत्र जारी करने क े खिलए सिजम्मेदार र्थीे।

4. श्री क े. क े. भारद्वाज 9.1.92 से कई महीनों क बैंक क े विनयमों क े अनुसार, छ ु ट्टी की उतिच मंजूरी क े विबना क व्यों से अनुपश्मिस्र्थी रहे। हस् ाक्षर/ Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जोनल मैनेजर (अनुशासनात्मक प्राति कारी) "

4. विवविनयम 1976 की योजना क े ह विन ारिर प्रविrया क े ह जांच विकए जाने क े बाद, जांच अति कारी ने अं ः आरोप सं. 1,[2] और 3 क े खिलए प्रति वादी को दोर्षी ठहराया और आरोप सं. 4 साविब नहीं हुआ। अनुशासनात्मक प्राति कारी ने सुनवाई क े अवसर क े बाद और प्राक ृ ति क न्याय क े सिसद्धां ों क े अनुपालन क े बाद, 30 सिस ंबर, 1995 को अपनी रिरपोट में जांच अति कारी द्वारा दज विकये गये विनष्कर्षŒ की पुविष्ट की, प्रति वादी अपरा ी को दोर्षी ठहराया और 12 अगस्, 1996 विदनांविक आदेश द्वारा दण्ड अति रोविप विकया।

5. 12 अगस्, 1996 विदनांविक अनुशासनात्मक प्राति कारी क े आदेश का उद्धरण विनम्नानुसार हैः 5 "अब, यूको बैंक अति कारी कमचारी (अनुशासन एवं अपील) विवविनयमन 1976 द्वारा प्रदत्त शविuयों क े प्रयोग में, मैं ए द्द्वारा उu विवविनयमन क े विवविनयमन 4 क े संदभ में श्री क े क े भारद्वाज को विनम्नखिलखिख दंड दे ा हूंः

1. आरोप सं. 1 -साविब हुआ: व मान समय में सबसे विनचले चरण में कमी।

2. आरोप सं. 2 - साविब हुआ: व मान समय में सबसे विनचले चरण में कमी अर्थीा मूल वे न को घटाकर रु. 2100/- (पुराने स्क े ल में) विकया जाए। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

3. आरोप संख्या 3 - साविब हुआ: यविद आयकर विवभाग द्वारा बैंक क े खिखलाफ कोई दावा विकया जा ा है ो यह श्री भारद्वाज क े सेवाविनवृत्त लाभों, यर्थीा ग्राह्य, से वसूला जा सक ा है।

4. आरोप सं. 4: साविब नहीं हुआ "

6. अपील को प्रार्थीविमक ा विदए जाने पर, अपीलीय प्राति कारी ने आरोप संख्या 1,[2] और 3 क े संदभ में अपरा को बरकरार रख े हुए 14 नवंबर, 1998 क े एक आदेश द्वारा सजा को संशोति विकया।प्रासंविगक भाग विनम्नानुसार हैः आरोप सं. 1...... साविब........ श्री भारद्वाज का मूल वे न रु. 3660/to से 13 स् र घटाकर रु. 2100 (पुराना स्क े ल, संशोति रु. 4250/) कर विदया जाय और सीएएफआईबी पास करने क े खिलए अनुमन्य, यविद कोई, वे न वृतिद्ध 12. 8. 96 से 2 वर्ष की अवति क े खिलए घटा दी जाए। घटोत्तरी की अवति क े दौरान उनक े वे न में वृतिद्ध होगी और इस अवति की समाविप्त पर, घटोत्तरी का प्रभाव भविवष्य वे नवृतिद्ध को टालना होगा। आरोप सं.2....... दैव...... - दैव- आरोप सं.3....... दैव...... - दैव- आरोप सं.4.......सिसद्ध नहीं हुआ...... -दोर्षमुu- सभी दंडादेशों का समव 5 प्रभाव होगा Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

7. जुमाना अति रोविप करने वाले 14 नवंबर, 1998 विदनांविक आदेश को इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े विवद्वान एकल न्याया ीश क े समक्ष संविव ान क े अनुच्छेद 226/227 क े ह एक रिरट यातिचका क े माध्यम से प्रति वादी द्वारा चुनौ ी दी गई।

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8. विवद्वान एकल न्याया ीश और खंड पीठ ने भी इस आ ार पर काय विकया जैसे विक 14 नवंबर, 1998 क े अपने आदेश द्वारा अपीलीय प्राति कारी ने क े वल आरोप सं. 1 क े संदभ में प्रति वादी को दोर्षी ठहराया और यही कारण है विक सजा को संशोति विकया गया र्थीा और आरोप सं. 2 और 3 क े खिलए, प्रति वादी कमचारी को बरी कर विदया गया।

9. स्वीक ृ थ्य यह है विक आरोप सं. 1,[2] और 3 क े संदभ में दोर्ष पाये जाने जो विक जाँच अति कारी द्वारा साविब की गई र्थीी जैसा विक जांच की रिरपोट में इंविग विकया गया र्थीा, अनुशासनात्मक प्राति करण द्वारा और अपीलीय प्राति कारी द्वारा भी एक थ्य क े रूप में पुविष्ट की गई र्थीी। अपीलीय प्राति कारी ने आरोप सं. 1,[2] और 3 क े संदभ में दोर्ष बरकरार रख े हुए एक उदार दृविष्टकोण अपनाया और 14 नवंबर, 1998 क े अपने आदेश क े ह सजा को संशोति विकया। उच्च न्यायालय ने आगे कायवाही की र्थीी और यह दज विकया विक आरोप सं. 1 पूरी रह से अस्पष्ट र्थीा और सही विववरण पूरी रह से गायब र्थीे और यह ारिर करने क े बाद विक आरोप सं. 1 विवविनर्दिदष्ट और स्पष्ट नहीं र्थीा प्रति वादी को जवाब देने से वंतिच विकया गया, अनुशासनात्मक कायवाही और 19 फरवरी, 2021 विदनांविक फ ै सले और आदेश द्वारा अति रोविप दंड क े आदेश को अपास् कर विदया गया, सिजसे हमारे समक्ष की गयी अपील में चुनौ ी दी गयी है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

10. अपीलार्थी5 क े विवद्वान अति वuा का कर्थीन है विक विवद्वान एकल न्याया ीश और उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने इस ारणा पर कायवाही की है विक अपीलीय प्राति कारी ने न क े वल सजा को संशोति विकया है, बश्मिल्क प्रति वादी कमचारी को आरोप सं. 2 और 3 से दोर्षमुu कर विदया है जो थ्यात्मक रूप से गल है और रिरकॉड स्पष्ट रूप से प्रकट कर ा है विक आरोप सं. 1,[2] और 3 जो जांच अति कारी द्वारा, विवविनयम 1976 की योजना क े संदभ में जांच करने क े बाद साविब विकए गए र्थीे, की पुविष्ट अनुशासनात्मक/अपीलीय प्राति कारी द्वारा की गई र्थीी और इस प्रकार, वह आ ार सिजस पर खंड पीठ ने आक्षेविप आदेश पारिर विकया है पोर्षणीय नहीं है।

11. विवद्वान अति वuा ने आगे कहा है विक खंड पीठ क े आक्षेविप आदेश में जो प्राविप्तयां दज की गई हैं विक आरोप सं. 1 अस्पष्ट र्थीा और थ्यग विववरणों का खुलासा नहीं विकया गया और यही कारण है विक जवाब प्रस् ु करने में दोर्षी कमचारी क े प्रति पूवाग्रह बर ा गया है और जांच अति कारी क े समक्ष अपना बचाव प्रस् ु करना भी इस कारण से रिरकॉड से पुष्ट नहीं है विक आरोप सं. 1 का लेख विवथिशष्ट और स्पष्ट है और दोर्षी कमचारी ने सभी चरणों में जांच क े दौरान भाग खिलया और यह प्रति वादी का क यह कभी नहीं र्थीा विक आरोप सं. 1 अस्पष्ट र्थीा या इसमें भौति क विववरणों का अभाव र्थीा या उसे प्रस् ु विकए जा रहे विववरणों क े अभाव में, सुनवाई क े उतिच अवसर से वंतिच विकया गया है या प्राक े सिसद्धां ों का उल्लंघन विकया गया है। इन परिरश्मिस्र्थीति यों में, उच्च न्यायालय क े आक्षेविप आदेश में इस न्यायालय द्वारा हस् क्षेप विकया जाना उतिच है।

12. दूसरी ओर, प्रति वादी की ओर से प्रस् ु विवद्वान अति वuा ने थ्यात्मक आ ारों को विववाविद नहीं विकया है सिजन्हें आरोप सं. 1,[2] और 3 क े संदभ में जांच Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति कारी द्वारा साविब विकया गया और अनुशासनात्मक/अपीलीय प्राति कारी द्वारा पुविष्ट की गई, लेविकन आगे कहा है विक जांच क े रिरकॉड से भी, वह प्राविप्तयां जो अनुशासनात्मक/अपीलीय प्राति कारी द्वारा दज की गई है और सिजनकी सभी चरणों में पुविष्ट की गई है, सिजनक े आ ार पर दण्ड विदया गया है इन परिरश्मिस्र्थीति यों में, यविद जाँच क े रिरकॉड परीतिक्ष की जाएं ो रिरकॉड की सामग्री द्वारा समर्भिर्थी नहीं है और परिरणामस्वरूप उसे दी गई सजा को उच्च न्यायालय द्वारा ठीक ही अपास् कर विदया गया है।

13. माना जा ा है विक उच्च न्यायालय ने इस आ ार पर कायवाही की है विक आरोप सं. 1 साविब हो गया है और प्रति वादी दोर्षी को आरोप सं. 2 और 3 क े संदभ में दोर्षमुu कर विदया गया है जो वास् व में गल है और रिरकॉड की सामग्री द्वारा समर्भिर्थी नहीं है। इस न्यायालय क े पास उपलब् विवकल्प या ो मामले को उच्च न्यायालय में वापस भेजना है ाविक जांच क े रिरकॉड का परीक्षण विकया जा सक े और मामले को विवति क े अनुसार नए सिसरे से अथिभविन ारिर विकया जा सक े या मेरिरट क े आ ार पर विनणय खिलया जा सक े ।

14. इस स् र पर प्रति वादी क े विवद्वान अति वuा, यह स्वीकार कर े हैं विक अनुशासनात्मक जांच वर्ष 1993 की है और यह मामला यविद उच्च न्यायालय को वापस भेज विदया जा ा है ो उसे बहु पूवाग्रह हो सक ा है और मामले को मेरिरट क े आ ार पर अथिभविन ारिर करने का विवनम्र अनुरो विकया, क्योंविक इस विवलंविब अवस्र्थीा में मामले को वापस भेजना कमचारी क े विह में नहीं हो सक ा है।

15. हमने पक्षकारों क े विवद्वान अति वuाओं को मेरिरट क े आ ार पर सुना और उनकी सहाय ा से रिरकॉड पर उपलब् सामग्री का परिरशीलन विकया। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

16. जांच क े रिरकॉड से, यह स्पष्ट रूप से प्रकट हो ा है विक जांच अति कारी, े अनुसार जांच करने क े बाद आरोप सं. 1,[2] और 3 साविब माना और अनुशासनात्मक और सार्थी ही अपीलीय प्राति कारी ने ीनों आरोपों क े दोर्ष क े विनष्कर्ष की पुविष्ट की है। उसी समय, जांच अति कारी द्वारा दज दोर्ष क े विनष्कर्ष का अनुमोदन कर े हुए अनुशासनात्मक प्राति करण द्वारा सजा दी गई र्थीी, लेविकन अपीलीय प्राति कारी ने दोर्ष क े विनष्कर्ष का अनुमोदन कर े हुए, एक उदार दृविष्टकोण अपनाया और 14 नवंबर 1998 विदनांविक आदेश द्वारा सजा को संशोति विकया।

17. जहां क अनुशासनात्मक जांच क े मामलों में न्यातियक समीक्षा की गुंजाइश का सवाल है, यह स्र्थीाविप है विक संविव ान क े अनुच्छेद 226 या 227 क े ह न्यातियक समीक्षा की अपनी शविu का प्रयोग कर े हुए संवै ाविनक अदाल ें अपीलीय प्राति कारी की भूविमका नहीं ग्रहण, अति कार क्षेत्र कानून की त्रुविटयों या प्रविrयात्मक त्रुविटयों सिजनसे स्पष्ट अन्याय या प्राक े सिसद्धां ों का उल्लंघन हो ा हो से बं ा हो ा है। सार्थी ही, न्यातियक समीक्षा की शविu एक अपीलीय प्राति कारी क े रूप में मेरिरट पर मामले क े न्यायविनणयन क े अनुरूप नहीं है।

18. उच्च न्यायालय क े समक्ष भी प्रति वादी दोर्षी का यह क कभी नहीं र्थीा विक े अनुसार विवभागीय जांच नहीं की गई या विवविनयम, 1976 क े विकसी प्राव ान का उल्लंघन विकया गया र्थीा या सुनवाई का उतिच अवसर उसे जांच क े दौरान नहीं विदया गया र्थीा या प्राक े सिसद्धां ों का उल्लंघन हुआ र्थीा। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA

19. हमने विवद्वान अति वuा की सहाय ा से जांच क े रिरकॉड को देखा और, हमारे विवचार में, जांच अति कारी द्वारा आरोप सं. 1,[2] और 3 क े बारे में प्राप्त विनष्कर्ष रिरकॉड सामग्री क े द्वारा अनुसमर्भिर्थी हैं और जांच क े रिरकॉड पर पुनर्दिवचार करने क े बाद, अनुशासनात्मक/अपीलीय प्राति कारी द्वारा पुविष्ट की गई है। प्रति वादी दोर्षी क े अपरा को बरकरार रख े हुए, अपीलीय प्राति कारी ने एक उदार दृविष्टकोण अपनाया और 14 नवंबर, 1998 विदनांविक आदेश द्वारा सजा को संशोति विकया।

20. जहां क आरोप सं. 1 क े संदभ में उच्च न्यायालय द्वारा दज विनष्कर्ष विक वह अस्पष्ट है, सिजससे उत्तर प्रस् ु करने में प्रति वादी दोर्षी को वंतिच विकया गया, का प्रश्न है, यह थ्यात्मक रूप से गल है। आरोप सं. 1 का लेख स्पष्ट और विवथिशष्ट है और इसे समझ कर अपनी प्रति विrया प्रस् ु करने में दोर्षी को कोई अस्पष्ट ा नहीं होनी चाविहए। यहां क विक प्रति वादी का यह क कभी नहीं र्थीा विक आरोप सं.[1] अस्पष्ट होने क े कारण, वह जांच क े दौरान भाग लेने क े खिलए जवाब प्रस् ु करने में असमर्थी रहा।

21. हमारे विवचार में, सिजस आ ार पर उच्च न्यायालय ने आरोप सं. 1 क े संदभ में भी कायवाही की है, वह अश्मिस्र्थीर है और अपास् विकये जाने योग्य है।

22. परिरणामस्वरूप, अपील सफल हो ी है और अनुमति दी जा ी है। 19 फरवरी, 2021 विदनांविक खंड पीठ क े विनणय को द्नुरूप अपास् विकया जा ा है। कोई लाग नहीं।

23. लंविब आवेदन, यविद कोई हो, विनस् ारिर विकये जा े हैं। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA............................ न्यायमूर्ति अजय रस् ोगी............................ (न्यायमूर्ति अभय एस. ओका) नई विदल्ली 18 फरवरी, 2022 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA