Full Text
भार ीय सव च्च न्यायालय क
े समक्ष
सिसविवल अपीलीय क्षेत्राति कार
सिसविवल अपील सं. 901/2022
(एस एल पी (सी) सं. 9927/2020 से उत्पन्न)
न्यू ओखला औद्योवि.क विवकास प्राति करण (नोएडा) अपीलार्थी3 (.ण)
बनाम
यूनुस और अन्य प्रत्यर्थी3 (.ण)
क
े सार्थी
सिसविवल अपील सं. 905/2022
(एस.एल.पी (सी) संख्या - 9931/2020 से उत्पन्न)
सिसविवल अपील सं. 904/2022
(एस.एल.पी (सी) संख्या - 9928/2020 से उत्पन्न) vLohdj.k
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
सिसविवल अपील सं. 903/2022
(एस.एल.पी (सी) संख्या - 9929/2020 से उत्पन्न)
सिसविवल अपील सं. 906/2022
(एस.एल.पी (सी) संख्या - 9932/2020 से उत्पन्न)
सिसविवल अपील सं. 902/2022
(एस.एल.पी (सी) संख्या - 9930/2020 से उत्पन्न)
विन ण= य
माननीय न्यायमूर्ति क
े .एम. जोसेफ,
JUDGMENT
1. अनुमति प्रदान की.ई।
2. मामलों क े इस समूह में, यह सवाल उठ ा है विक क्या विवति क सेवा प्राति करण अति विनयम, 1987 की ारा 20 (सिजसे ए स्मिNमनपश्चा ् " अति विनयम 1987" कहा.या है) क े अ ीन लोक अदाल द्वारा पारिर अति विनण=य भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 की ारा 28 क (सिजसे ए स्मिNमनपश्चा ् "अति विनयम" कहा.या है) क े अ ीन अनुध्या प्रति कर क े पुनर्निन ा=रण का आ ार बना सक ा है। आक्षेविप विनण=य द्वारा, उच्च न्यायालय का यह दृविYकोण है विक लोक अदाल द्वारा पारिर अति विनण=य वाN व में vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अति विनयम की ारा 28 ए क े ह शवि[ क े प्रयो. करने का उदाहरण बन सक ा है।
3. अपीलक ा= द्वारा चिं] न विकए.ए विनयोसिज औद्योवि.क विवकास क े लिलए हसील दादरी (सिजला.ासिजयाबाद में स्मिNर्थीति ) में स्मिNर्थी.ांवों क े संबं में 21.03.1983 को अति विनयम की ारा 4 (1) क े ह एक अति सू]ना जारी की.ई। भूविम अति ग्रहण अति कारी क े अति विनण=य से, जो 28.11.1984 को पारिर विकया.या र्थीा, अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी यहां प्रत्यर्थिर्थीयों से संबंति भूविम क े लिलए प्रति बीघा 24,033 रुपये की दर से मुआवजा य विकया.या र्थीा। प्रत्यर्थिर्थीयों ने अति विनयम की ारा 18 क े ह वृतिc की माँ. नहीं की। एक फ ेह मोहम्मद ने 28.11.1984 क े अति विनण=य क े लिखलाफ संदभ= मां.ने क े लिलए एक आवेदन दायर विकया।उ[ संदभ= लोक अदाल को विदया.या र्थीा। उ[ संदभ= को 6/02 की संख्या प्रदान की.इ=। लोक अदाल ने 12.03.2016 को एक अति विनण=य पारिर विकया। हम उ[ अति विनण=य की श g को विन ा=रिर कर सक े हैंः "आज, मामला लोक अदाल क े समक्ष रखा.या है। दावेदार फ़ ेह मोहम्मद s/o उम्मेद खान अपने विवद्व अति व[ा श्री सिज ेंद्र मार्थीुर क े सार्थी और प्रत्यर्थिर्थीयों की ओर से विवद्व डी.जी.सी सिसविवल न्यायालय में मौजूद हैं। इस एल.ए.आर मामले की क े स फाइल पहले ही अन्य एल.ए.आर मामलों की फाइलों क े सार्थी क्लब/समेविक की जा ]ुकी है, अर्थीा= ् एलएआर नंबर 07/2002 जवाल हुसैन बनाम यूपी राज्य और अन्य, एलएआर नंबर 08/2022 सलीमुद्दीन बनाम यूपी राज्य और अन्य और एलएआर नंबर 9/2002 क े मोहक्कम सिंसह बनाम यूपी राज्य और अन्य, को संबंति न्यायालय द्वारा 268.2010 को पारिर विकया.या र्थीा और एलएआर नंबर 6/2002 की फाइल को अग्रणी मामला बनाया.या र्थीा। सुनवाई क े दाैरान, दोनों पक्षों ने सामूविहक रूप से आवेदन पत्र संख्या - 59Ga[2] क े सार्थी विनN ारण/समझौ ा अनुबं और माननीय उच्च न्यायालय क े आदेश की vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk फोटोकॉपी सभी क्लबड एल.ए.आर को लोक अदाल क े समक्ष प्रN ु करने क े लिलए आवेदन दायर विकया हैइसक े अलावा, प्रत्यर्थिर्थीयों की ओर से पेश सिजला शासकीय अति व[ा सिसविवल ने संबंति पाट[3] राज्य सरकार और नोएडा विवकास प्राति करण क े पत्रों (पेपर नंबर 61Ga[2] और 62Ga[2]) की फोटोकॉपी दायर की है, सिजसक े ह विवद्व सिजला शासकीय अति व[ा सिसविवल को प्राति करण और राज्य सरकार की ओर से मामले में समझौ ा/विनN ारण करने क े लिलए अति क ृ विकया.या है। सुना और क े स फाइल का अवलोकन विकया। उपलब् रिरकॉड= से यह NपY है विक व =मान संदभ= विदनांक 28.11.1984 और माननीय उच्च न्यायालय क े लिखलाफ दायर विकया.या है, जबविक सभी अपीलों को एक सार्थी क्लब/समेविक कर े हुए, उनका विनN ारण विकया.या है, सिजससे संबंति अति कारिरयों को 297.50 प्रति व.=.ज की दर से मुआवजा विन ा=रिर करने का विनद|श विदया.या है। उ[ आदेश क े आ ार पर, दोनों पक्षों ने Nवेच्छा से विनपटान /समझौ ा अनुबं पत्र संख्या - 60Ka[1] को विनष्पाविद, हN ाक्षरिर और सत्याविप विकया है और न्यायालय क े समक्ष प्रN ु विकया है। ऐसी स्मिNर्थीति में, विनपटान/समझौ ा अनुबं पत्र संख्या - 60Ka[1] क े आ ार पर विनम्नलिललिख आदेश पारिर करक े मामले को य करना उति] और उपयु[ है जो तिडक्री का विहNसा बने.ाः- आदेशआदेश पक्षकारों क े द्वारा दालिखल विनN ारण/समझौ ा अनुबं संख्या -60Ka[1] क े आ ार पर त्वरिर संदभ= संख्या आदेश 6/2002 को विनण[3] विकया जा ा है। विनN ारण/समझौ ा अनुबं तिडक्री का एक विहNसा हो.ा और मामले की परिरस्मिNर्थीति यों में, प्रत्येक पक्ष अपनी ला. वहन करे.ा।इस विनण=य की प्रत्येक प्रति LAR नंबर 7/2002, LAR नंबर 8/2002 और LAR नंबर 9/2002 की फाइल में रखी जाए.ी।
4. जैसा विक NपY है, मुआवजा 20 रुपये प्रति व.=.ज क े Nर्थीान पर 297 रुपये प्रति व.=.ज य विकया.या र्थीा जो भूविम अति ग्रहण अति कारी द्वारा उनक े अति विनण=य विदनांक 28.11.1984 द्वारा य विकया.या र्थीा। इसक े कारण प्रत्यर्थिर्थीयों ने अति विनयम की ारा 28 ए क े ह आश्रय की मां. कर े हुए vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अति रिर[ सिजला मसिजNट्रेट क े समक्ष आवेदन दायर विकए। अपर सिजला मसिजNट्रेट ने इस आ ार पर आवेदनों को खारिरज कर विदया विक लोक अदाल द्वारा पारिर 12.03.2016 का अति विनण=य समझौ ा क े आ ार पर र्थीा। इसक े कारण प्रत्यर्थिर्थीयों द्वारा उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट याति]काएं दायर की.ई ं । यह उ[ रिरट याति]काओं में है विक उच्च न्यायालय द्वारा आक्षेविप विनण=यों को यह कह े हुए पारिर विकया.या है विक लोक अदाल क े अति विनण=य को सिसविवल न्यायालय का तिडक्री माना जाए.ा और फलNवरूप, प्रति वादी अति विनयम की ारा 28 ए को ला.ू करने क े हकदार हों.े।
5. हमने अपीलक ा= क े लिलए विवद्व अति व[ा श्री अविनल कौशिशक को सुना है। हमने प्रत्यर्थिर्थीयों की ओर से वरिरष्ठ विवद्व अति व[ा श्री ध्रुव मेह ा और श्री वीक े शुक्ला को भी सुना है।
6. अपीलार्थी3 क े विवद्व अति व[ा ब ा े हैं विक ारा 28 क ला.ू करने क े लिलए उपलब् नहीं है जब अति विनयम क े संदभ= में न्यायालय द्वारा कोई विन ा=रण नहीं विकया जा ा है। उन्होंने हमें यह प्रति वाद करने क े लिलए अति विनयम में 'न्यायालय' शब्द की परिरभाषा का उल्लेख विकया विक ारा 28 क यह ब ा ी है विक वह ऐसे न्यायालय द्वारा पारिर एक अति विनण=य होना ]ाविहए।लोक अदाल ों ने अपने क = में कहा विक 1987 अति विनयम की ारा 19 क े ह.विठ विकया है। उनका कोई सहायक या न्यातियक काय= नहीं है। 1987 अति विनयम का उद्देश्य अन्य बा ों क े सार्थी सार्थी विववाद क े समझौ े क े बारे में है। ारा 19 क े ह लोक अदाल का काय= अविनवाय= रूप से समझौ ा कराना है।लोक vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अदाल का एक अति विनण=य, दूसरे शब्दों में, क े वल पक्षकारों क े बी] एक समझौ ा क े बारे में विन ा=रण कर ा है।इसलिलए, इसे अति विनयम क े ह एक न्यायालय द्वारा एक अति विनण=य क े रूप में नहीं माना जा सक ा है। उन्होंने आ.े कहा विक 1987 अति विनयम की ारा 21 में अशिभ.ृही अव ाराणा का उस उद्देश्य क सीविम विकया जाना ]ाविहए सिजसक े लिलए अव ारण को बनाया.या र्थीा।दूसरे शब्दों में, अति विनण=य को प्रव =नीय ा क े सार्थी बंद करने क े लिलए एक विव ायी उपकरण क े रूप में माने.ये प्राव ान की सराहना की जानी ]ाविहए जैसे विक यह एक तिडक्री र्थीी।दूसरे शब्दों पर अपनी श g में, लोक अदाल द्वारा पारिर एक अति विनण=य अति विनयम की ारा 28 ए क े ह एक तिडक्री नहीं है। उन्होंने पंजाब राज्य और अन्य बनाम जलोर सिंसह और अन्य[1], भार सरकार बनाम वेदां लिलविमटेड और अन्य[2] और अत्तर सिंसह और एक अन्य बनाम भार संघ और एक अन्य[3] में उनक े कg क े समर्थी=न में उ[ विनण=यों पर अवलंब लिलया।
7. उन्होंने आ.े ब ाया विक उच्च न्यायालयों में इस विवषय पर न्यातियक राय शिभन्न- शिभन्न है। उन्होंने उमादेवी राजक ु मार ज्यूरे और अन्य बनाम सिजला कलेक्टर और अन्य[4] 4 में रिरपोट= विकए.ए विनण=य में बॉम्बे क े उच्च न्यायालय द्वारा उठाए.ए दृविYकोण की हमारी Nवीक ृ ति क े लिलए सराहना की। उन्होंने कहा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk विक उच्च न्यायालयों द्वारा लिलया.या दृविYकोण जो इसक े विवपरी है, आैर उसक े द्वारा कानून में सही स्मिNर्थीति का प्रति विनति त्व नहीं कर ा है।
8. उन्होंने मेरिरट पर भी उनका एक क = है।वह ब ा े हैं विक उच्च न्यायालय ने प्रर्थीम अपील संख्या 1100/04, मं.ू और अन्य बनाम यूपी राज्य क े रूप में 297 रूपये प्रति व.=.ज की दर से मुआवजा विदया।हालाँविक, यह उनका क = है विक जबविक मं.ू का मामला वष= 1991 की अति सू]ना से उत्पन्न हुआ र्थीा, ारा 4 क े ह जारी पहले की अति सू]ना से उत्पन्न मामलों को एक सामान्य समूह क े रूप में टै. करक े सुना.या र्थीा।वह ब ा े हैं विक अपीलक ा= द्वारा पुन=विव]ार याति]का पहले ही दायर की जा ]ुकी है।वह आ.े कह े हैं विक वष= 1982 में, मुआवजा 20 रुपये प्रति व.=.ज य विकया.या र्थीा।मुआवजे की इस.णना को उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा र्थीा और इससे अति क क्या है, उच्च न्यायालय क े इस दृविYकोण को इस न्यायालय द्वारा उसी क े लिखलाफ दायर विवशेष अनुमति याति]का को खारिरज करक े अनुमोविद विकया.या र्थीा।हालांविक, सिजन थ्यों का उति] रीक े से अवलोकन नहीं विकया.या र्थीा, उनक े आ ार पर यह अति विनण=य लोक अदाल द्वारा पारिर विकया.या र्थीा।
9. इसक े विवपरी, प्रत्यर्थिर्थीयों क े लिलए विवद्व वरिरष्ठ अति व[ा ने यह ब ाया पहले Nर्थीान पर यह विक लोक अदाल द्वारा पुरNकार क े एक खंडन से प ा ]ल ा है विक अपीलक ा= की ओर से एक स्मिNर्थीर दर से बाहर विनकलने क े लिलए यह पूरी रह से अनुति] हो.ा, जो वाN व में, उच्च न्यायालय क े एक विनण=य पर आ ारिर र्थीा (जाविहर ौर पर मं.ू और अन्य में विनण=य)। यह श्री ध्रुव मेह ा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk द्वारा आ.े ब ाया.या है, विवद्व वरिरष्ठ अति व[ा ने ब ाया है विक विवति क अव ारणा को पूरा महत्व विदया जाना ]ाविहए।अक्सर उcृ ]े ावनी यह है विक न्यायालयों को अपनी कल्पना को विवति क अव ारणा को उसक े ार्निकक अं क खीं]ने की संभावना से विव]लिल नहीं होने देना ]ाविहए।दूसरे शब्दों में, यह श्री ध्रुव मेह ा का क = है विक इस थ्य को देख े हुए विक लोक अदाल द्वारा पारिर एक अति विनण=य को एक तिडक्री क े रूप में माना जा ा है, यह बहु कम मायने रख ा है विक अति विनण=य का कारण उस प्रविक्रया क े अनुरूप नहीं है जो आम ौर पर अति विनयम की ारा 18 क े ह एक संदभ= में क े ह आ ा है। अव ारणा का पूरा खेल होना ]ाविहए।इस प्रकार, दीवानी न्यायालय की तिडक्री होने क े कारण, लोक अदाल का अति विनण=य समान रूप से परिरस्मिNर्थीति जन्य व्यवि[यों को ारा 28 क क े लाभ का दावा करने क े लिलए दृढ़ नींव प्रदान करे.ा। इस संबं में, वह इंवि. करे.ा विक न्यायालय को समान ा क े भव्य आदेश से अनशिभज्ञ नहीं होना ]ाविहए ाविक वह विकस उत्कृ Y लक्ष्य को प्राप्त कर सक े, यह है विक विव ातियका ने ारा 28 क प्रर्थीम Nर्थीान पर रखा है।दूसरे शब्दों में, उन व्यवि[यों को उति] मुआवजा उपलब् कराने क े उपरो[ उद्देश्य को ध्यान में रख े हुए, जो अपनी अज्ञान ा से एक बड़े विहNसे में, विनरक्षर ा,.रीबी और विपछड़ेपन को पोविष कर े है, इस अति विनयम क े ह उनक े लिलए विदये.ये उप]ार का वह अनुसरण नहीं कर े है आैर उनको समान परिरस्मिNर्थीति यों वालें व्यवि[यों की रह मुअावजे को बढ़ाने क े लिलए पारिर विकए.ये अति विनण=य क े आ ार पर एक अवसर का राN ा प्रदान विकया.या है। वह vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk ब ा े हैं विक कोई विववाद नहीं है विक प्रत्यर्थी3 ऐसे व्यवि[ हैं सिजनकी भूविम उसी अति सू]ना क े ह अति ग्रविह की.ई है जैसा विक फ ेह मोहम्मद की भूविम की.ई र्थीी।वह आ.े इस बा पर प्रकाश डाला विक ारा 21 में कहा.या है विक लोक अदाल का उ[ अति विनण=य अन्य बा ों क े सार्थी -सार्थी विकसी अन्य े आदेश क े रूप में माना जा ा है 'जैसा भी मामला हो' ।यह क = प्र ी हो ा है विक ारा 21 अति विनयम की ारा 18 क े ह न्यायालय क े आदेश क े रूप में लोक अदाल क े अति विनण=य को अपने दायरे में लेने क े लिलए पया=प्त है। दूसरे शब्दों में, लोक अदाल का अति विनण=य भूविम अति ग्रहण अति कारी द्वारा विदए.ए मुआवजे को बढ़ाने वाले न्यायालय का एक आदेश बन जाए.ा।वह अं ः विकसी भी दर पर प्रति वाद करे.ा, विक इस न्यायालय को उत्तरदा ाओं क े लिखलाफ रखने क े लिलए इच्छ ु क होना ]ाविहए, जबविक यह न्यायालय कानून की घोषणा कर सक ा है, यह अभी भी संविव ान क े अनुच्छेद 136 क े ह अपीलक ा= क े पक्ष में विववेका ीन क्षेत्राति कार का उपयो. नहीं कर सक ा है।इस संबं में, उन्होंने एलआरएस बनाम सलाविबन मोहम्मद[5] द्वारा ाहेरा खा ून (डी) में रिरपोट= विकए.ए इस न्यायालय क े विनण=य का समर्थी=न विकया।
10. श्री वी. क े. शुक्ला, विवद्व वरिरष्ठ अति व[ा क े द्वारा समान एवं अविनवाय= दलीले प्रN ु की.इ=।वह, विवशेष रूप से, उन थ्यों को उजा.र करे.ा सिजनक े कारण लोक अदाल द्वारा अति विनण=य पारिर विकया.या र्थीा, अर्थीा= ्,
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अपीलक ा= द्वारा यह Nवीकार विकया.या र्थीा विक उच्च न्यायालय क े विनण=य क े आ ार पर मुआवजा 297 रुपये प्रति व.=.ज य विकया जा सक ा है जो प्र]लिल र्थीा। यह थ्य, वह ब ा े हैं, इस न्यायालय द्वारा अनदेखी नहीं की जा सक ी है।वह यह भी प्रN ु करे.ा विक लोक अदाल द्वारा पारिर अति विनण=य अति विनयम की ारा 28 क क े ह एक आवेदन की आवश्यक ा को पूरा करे.ा। उन्होंने आ.े लोक अदाल की शवि[यों पर ध्यान आकर्निष विकया। विवश्लेषण
11. हम 1987 अति विनयम की योजना का उल्लेख कर सक े हैं, ारा 2 (ए) 'मामले' को परिरभाविष कर ी हैः (क) "वाद" क े अं.= न्यायालय क े समक्ष वाद या कोई काय=वाही सस्मिम्मलिल है ारा 2 (एएए) 'न्यायालय' को परिरभाविष कर ी हैः (ककक) 'न्यायालय' से ात्पय= कोइ= सिसविवल, विक्रविमनल या राजNव न्यायालय आैर काेइ न्यायाति करण या कोइ विवति द्वारा Nर्थीाविप एेसा प्राति करण सविह जो उस त्कालिलक समय न्यातियक या अर्द्घ= न्यातियक काय का विनवा=हन कर सक े । ारा 2 (डी) लोक अदाल को अध्याय VI क े ह आयोसिज लोक अदाल क े रूप में परिरभाविष कर ी है।
12. अध्याय 6 में ारा 19 से 22 शाविमल हैं। ारा 19 (1) ऐसे अं राल और Nर्थीानों पर आयोसिज की जा रही लोक अदाल ों पर विव]ार कर ी है और ऐसे क्षेत्राति कार का प्रयो. करने क े लिलए और ऐसे क्षेत्रों क े लिलए जो उसमें उसिल्ललिख vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk प्रासंवि.क विनकायों द्वारा उपयु[ समझे जा े हैं। ारा 19 (2) महत्वपूण= है क्योंविक इसमें लोक अदाल की संर]ना का उपबं हैयह इस प्रकार हैः (2) विकसी क्षेत्र क े लिलए आयोसिज प्रत्येक लोक अदाल में ऐसी संख्या शाविमल हो.ीः (क) सेवार या सेवाविनवृत्त न्यातियक अति कारी और (ख) राज्य प्राति करण या सिजला प्राति करण या उच्च म न्यायालय विवति क सेवा सविमति या उच्च न्यायालय विवति क सेवा सविमति या क्षेत्र क े अन्य व्यवि[ यर्थीास्मिNर्थीति, ालुक विवति क सेवा सविमति द्वारा ऐसी लोक अदाल ों का आयोजन कर ी है। उप- ारा (3) खंड (ख) में उसिल्ललिख व्यवि[यों क े अनुभव और योग्य ा से विनN ारण क े लिलए जा ी है। उप- ारा (5) विफर से प्रासंवि.क है क्योंविक यह लोक अदाल क े अति कार क्षेत्र को इंवि. कर ा हैः (5) लोक अदाल को विनम्नलिललिख क े संबं में विववाद क े लिलए पक्षकारों क े बी] समझौ ा या समझौ ा करने का अव ारण करने और पहुं]ने की अति कारिर ा हो.ी: (i) पहले लंविब कोई मामला या (ii) कोई मामला जो विकसी न्यायालय की अति कारिर ा क े भी र आ ा है और उसक े समक्ष नहीं लाया जा ा है, सिजसक े लिलए लोक न्यायालय का आयोजन विकया जा ा है। बश | विक लोक अदाल क े पास विकसी ऐसे मामले या मामले क े संबं में कोई अति कार क्षेत्र नहीं हो.ा जो विकसी ऐसे अपरा से संबंति है जो विकसी कानून क े ह शमनीय नहीं है।
13. ारा 20 को ारा 19 (5) और ारा 21 क े सार्थी पढ़ा जाना ]ाविहए। ारा 20 इस प्रकार हैः ारा 20 लोक अदाल ों द्वारा मामलों का संज्ञान (1) जहां ारा 19-(i) की उप ारा (5) क े खंड (i) में विनर्निदY विकसी भी मामले में (i) (क) इसक े पक्षकार सहम हैं या vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk (ख) उसमें से एक पक्षकार मामले को लोक न्यायालय में विनN ारण क े लिलए विनर्निदY करने क े लिलए न्यायालय में आवेदन कर ा है और यविद ऐसा न्यायालय प्रर्थीमदृYया इस बा से सं ुY है विक ऐसे विनN ारण की संभावना है या (ii) यविद न्यायालय सं ुY है विक मामला लोक न्यायालय द्वारा संज्ञान लिलया जाना समुति] है, न्यायालय मामले को लोक न्यायालय को विनर्निदY करे.ाः बश | विक पक्षकारों को सुनवाई का उति] अवसर देने क े अलावा ऐसी न्यायालय द्वारा खंड (i) या खंड (ii) क े उप-खंड (बी) क े ह कोई भी मामला लोक न्यायालय में नहीं भेजा जाए.ा। (2) त्समय प्रवृत्त विकसी अन्य विवति में अं र्निवY विकसी बा क े हो े हुए भी, ारा 19 की उप ारा (1) क े अ ीन लोक अदाल का आयोजन करने वाला प्राति करण या सविमति ारा 19 की उप ारा (5) क े खंड (ii) में विनर्निदY विकसी विवषय क े पक्षकारों में से विकसी एक पक्षकार से आवेदन प्राप्त होने पर, विक ऐसे मामले का अव ारण लोक अदाल द्वारा विकया जाना आवश्यक है, अव ारण क े लिलए ऐसे मामले को लोक अदाल को विनर्निदY करें परं ु यह विक विकसी अन्य पक्षकार को सुनवाई का युवि[यु[ अवसर विदए जाने क े सिसवाय कोई मामला लोक अदाल को विनर्निदY नहीं विकया जाए.ा (3) जहां विकसी मामले को उप ारा (1) क े अ ीन लोक अदाल में विनर्निदY विकया जा ा है या जहां उप ारा (2) क े अ ीन उसे विनद|श विकया.या है वहां लोक अदाल मामले का विनN ारण करने क े लिलए आ.े बढ़े.ी और पक्षकारों क े बी] समझौ ा या समा ान करे.ी। (4) प्रत्येक लोक अदाल, इस अति विनयम क े ह इसक े समक्ष विकसी भी संदभ= का विन ा=रण कर े समय, पक्षकारों क े मध्य समझौ ा या विनN ारण करने क े लिलए अत्यं अशिभयान क े सार्थी काय= करे.ी और न्याय, साम्य, विनष्पक्ष काय= करना और अन्य कानूनी सिसcां ों द्वारा विनद|शिश हो.ी। (5) जहां लोक न्यायालय द्वारा इस आ ार पर कोई अति विनण=य नहीं विदया जा ा है विक पक्षकारों क े बी] कोई समझौ ा या विनN ारण नहीं हो सक ा है, वहां मामले का अशिभलेख उसक े द्वारा न्यायालय को वापस कर विदया जाए.ा, जहां से विनद|श विवति क े अनुसार विनN रण क े लिलए उप ारा (1) क े ह प्राप्त हुआ है। (6) जहां लोक न्यायालय द्वारा इस आ ार पर कोई अति विनण=य नहीं विदया जा ा है विक उप ारा (2) में विनर्निदY विकसी मामले में पक्षकारों क े बी] कोई समझौ ा या vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk विनN ारण नहीं हो सक ा है, वहां लोक न्यायालय पक्षकारों को विकसी न्यायालय में उप]ार लेने की सलाह दे.ी। (7) जहां मामले का अशिभलेख उप ारा (5) क े अ ीन न्यायालय को वापस कर विदया जा ा है, वहां ऐसी न्यायालय उप ारा (1) क े अ ीन ऐसे विनद|श पर काय=वाही करने क े लिलए आ.े बढ़े.ी। "
14. ारा 21 लोक अदाल द्वारा अंति म विनण=य का प्राव ान कर ी है और यह इस प्रकार हैः ारा 21. लोक अदाल क े अति विनण=य (1) लोक न्यायालय का प्रत्येक अति विनण=य विकसी सिसविवल न्यायालय का तिडक्री समझा जाए.ा या जैसी भी स्मिNर्थीति हो, विकसी अन्य न्यायालय का आदेश समझा जाए.ा और जहां ारा 20 की उप ारा (1) क े अ ीन विनर्निदY विकसी मामले में लोक न्यायालय द्वारा समझौ ा या विनN ारण विकया.या है वहां ऐसे मामले में संदत्त न्यायालय फीस का भु. ान न्यायालय फीस अति विनयम, 1870 (1870 का 7) क े अ ीन उपबंति रीति से विकया जाए.ा (2) लोक न्यायालय द्वारा विकया.या प्रत्येक अति विनण=य अंति म और विववाद क े लिलए सभी पक्षों क े लिलए बाध्यकारी हो.ा, और कोई अपील अति विनण=य क े लिखलाफ विकसी भी न्यायालय में झूठी नहीं हो.ी।
15. श्री वी. एस. शुक्ला ने 1987 क े अति विनयम की ारा 22 को भी इंवि. विकया सिजसक े ह लोक अदाल ों को दीवानी न्यायालय में विनविह शवि[ है जैसा विक उसमें उल्लेख विकया.या है। ारा 22: ारा 22. लोक अदाल या Nर्थीायी लोक अदाल की शवि[याँ (1) लोक अदाल या Nर्थीायी लोक अदाल ट को, इस अति विनयम क े अ ीन कोई अव ारण करने क े प्रयोजन क े लिलए, वही शवि[यां हों.ी जो सिसविवल प्रविक्रया संविह ा, 1908 (1908 का 5) क े अ ीन सिसविवल न्यायालय में वाद का विव]ारण कर े समय विनम्नलिललिख विवषयों क े संबं में विनविह हो ी हैं, अर्थीा= ्: - (क) विकसी साक्षी को समन करना र्थीा हासिजर कराना और शपर्थी पर उसकी परीक्षा करना; vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk (ख) विकसी दN ावेज का प्रकटीकरण और पेश विकया जाना; (.) शपर्थी-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना; (घ) विकसी न्यायालय या काया=लय से विकसी लोक अशिभलेख या दN ावेज अर्थीवा ऐसे अशिभलेख या दN ावेज की प्रति की अध्यपेक्षा करना; और (ङ) ऐसे अन्य विवषय जो विवविह विकए जाएं । (2) उप ारा (1) में अं र्निवY शवि[यों की व्यापक ा पर प्रति क ू ल प्रभाव डाले विबना, प्रत्येक [लोक अदाल या Nर्थीायी लोक अदाल ] को अपने समक्ष आने वाले विकसी विववाद क े अव ारण क े लिलए अपनी Nवयं की प्रविक्रया विवविनर्निदY करने की अपेतिक्ष शवि[यां हों.ी । (3)[लोक अदाल या Nर्थीायी लोक अदाल ] क े समक्ष सभी काय=वाविहयां भार ीय दंड संविह ा (1860 का 45) की ारा 193, ारा 219 और ारा 228 क े अर्थी= में न्यातियक काय=वाविहयां समझी जाएं.ी और प्रत्येक 3[लोक अदाल या Nर्थीायी लोक अदाल ] दंड प्रविक्रया संविह ा, 1973 (1974 का 2) की ारा 195 और अध्याय 26 क े प्रयोजन क े लिलए सिसविवल न्यायालय समझी जाए.ी।
16. यह ध्यान रखना मनोंरजंक हो.ा विक अध्याय VI (A) 2002 क े अति विनयम 37 द्वारा 11.06.2002 से जोड़ा.या र्थीा।इसक े आ ार पर, क ु छ साव=जविनक उपयोवि. ा सेवाओं क े संबं में Nर्थीायी लोक अदाल ों पर विव]ार विकया.या है। क े वल यह कहना पया=प्त है विक लोक अदाल से शिभन्न, ारा 22C उप- ारा (8) इस बा की व्याख्या कर ी है विक जब पक्ष विकसी समझौ े पर पहुं]ने में विवफल रह े हैं, ो Nर्थीायी लोक अदाल क =व्य से बाध्य हो ी है, विववाद का विनण=य करने क े लिलए यविद विववाद विकसी अपरा से संबंति नहीं है। अति विनयम की योजना vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
17. अति विनयम भूविम क े अति ग्रहण और उसक े ह प्रदान विकए जाने वाले मुआवजे का प्राव ान कर ा है। काय=वाही ारा 4 क े ह एक अति सू]ना द्वारा शुरू की जा ी है। मुआवजा उ[ अति सू]ना की ारीख क े संदभ= में विन ा=रिर विकया जा ा है। प्रविक्रयाओं से.ुजरने क े बाद, एक अति विनण=य पारिर विकया जा ा है।जबविक ारा 18 में भूविम अति ग्रहण अति कारी द्वारा दी.ई राशिश से असं ुY व्यवि[ क े सार्थी अति कार का प्राव ान है,सिजसमें वह राशिश में वृतिर्द्घ की माँ. कर ा है ो उस पर ारा 28 क उन स्मिNर्थीति यों पर विव]ार कर ा है जहां विकसी व्यवि[ ने ारा 18 क े ह अति कार का लाभ नहीं उठाया है, लेविकन विकसी अन्य व्यवि[ ने प्राव ानों का उपयो. विकया है। ारा 28 क में अशिभप्राप्त अन्य श £ यविद उपलब् है ो ऐसा व्यवि[ सिजसने अन्य बा ों क े सार्थी ारा 18 क े अ ीन आवेदन प्रN ु नहीं विकया है ो वह प्रति कर क े पुर्निन ा=रण का दावा करने का हकदार है ारा 28A पर ध्यान विदया जा सक ा हैः 28 क- न्यायालय क े पुरNकार क े आ ार पर मुआवजे की राशिश का पुनः विन ा=रण।-(1) जहां इस भा. क े ह एक पुरNकार में, न्यायालय आवेदक को ारा 11 क े ह कलेक्टर द्वारा दी.ई राशिश से अति क मुआवजे की विकसी भी राशिश की अनुमति दे ी है, ारा 4, उप- ारा (1) क े ह एक ही अति सू]ना द्वारा कवर की.ई अन्य सभी भूविम में रुति] रखने वाले व्यवि[ और जो कलेक्टर क े अति विनण=य से भी व्यशिर्थी हैं, इस बा क े बावजूद विक उन्होंने ारा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk 18 क े ह कलेक्टर को एक आवेदन नहीं विकया र्थीा, न्यायालय क े पुरNकार की ारीख से ीन महीने क े भी र कलेक्टर को लिललिख आवेदन करक े आवश्यक है विक उन्हें देय मुआवजे की राशिश न्यायालय द्वारा विदए.ए मुआवजे की राशिश क े आ ार पर विफर से विन ा=रिर की जा सक ी हैः बश | विक ीन महीने की अवति की.णना में, सिजसक े भी र कलेक्टर को एक आवेदन इस उप- ारा क े ह विकया जाए.ा, सिजस विदन अति विनण=य का उच्चारण विकया.या र्थीा और अति विनण=य की एक प्रति प्राप्त करने क े लिलए उपेतिक्ष हो, अपवर्जिज कर विदया जाए.ा। (2). कलक्टर, उप ार (1) क े अ ीन आवेदन क े प्राप्त होने पर, सभी विह बर्द्घ व्यवि[यों को सू]ना देने और उन्हें सुनवाइ= का युवि[यु[ अवसर देने क े पश्चा, जाँ] करे.ा और आवेदको को संदेय प्रति कर की रकम अव ारिर कर े हुए अति विनण=य क े र.ा (3) कोई एेसा व्यवि[, सिजसने उप ारा (2) क े अ ीन अति विनण=य Nवीकार नहीं विकया है, कलक्टर से लिललिख आवेदन करक े यह अपेक्षा कर सक े.ा विक उस मामले को न्यायालय क े अव ारण क े लिलए कलक्टर द्वारा विनद|शिश विकया जाए और ारा 18 से ारा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk 28 क े उपबं, जहां क हो सक े, एेसे विनद|श को वेसे ही हों.े जैसे वे ारा 18 क े अ ीन विकसी विनद|श को ला.ू हेा े है। अति विनयम क े ह परिरभाविष 'न्यायालय' इस प्रकार हैः (घ) "न्यायालय" पद से आरस्मिम्भक अति कारिर ा का एक प्र ान सिसविवल न्यायालय अशिभप्रे है जब क विक समुति] सरकार ने इस अति विनयम क े अ ीन न्यायालय क े क ृ त्य करने क े लिलए विकसी विवविनर्निदY Nर्थीानीय सीमाओं क े भी र एक विवशेष न्यातियक अति कारी विनयु[ नहीं विकया है (सिजसे वह करने क े लिलए ए द्वारा सश[ है) उच्च न्यायालयों क े दृविYकोण में परिरव =न
18. वासुदेव बनाम आयु[ और सति]व सरकार, राजNव विवभा. और अन्य[6] में, कना=टक उच्च न्यायालय क े एकल न्याया ीश ने यह दृविYकोण विदया विक ना.रिरक प्रविक्रया संविह ा की ारा 89 द्वारा विनद|शिश विकया.या र्थीा और यह थ्य विक लोक अदाल क े पुरNकार को दीवानी न्यायालय का एक तिडक्री माना जोय.ा। विवद्व विक एकल न्याया ीश ने ारा 28 ए को पेश करने क े इरादे पर भी विव]ार विकया और यह विव]ार विकया विक प्राव ान समान ा खंड क े अनुरूप है।न्यायालय ने यह दृविYकोण विदया विक लोक अदाल द्वारा सहमति से पारिर पुरNकार ारा 28 ए क े ह आ ा है। 6 ILR 2007 KAR 4533 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
19. हालांविक, ]नाबसप्पा और अन्य बनाम विवशेष भूविम अति ग्रहण अति कारी7 में रिरपोट= विकए.ए विनण=य में उसी न्यायालय क े एक अन्य विवद्व एकल न्याया ीश ने यह विव]ार विकया विक अति विनयम की ारा 28A (3) को ला.ू करने क े लिलए, ारा 28A (2) क े ह एक अति विनण=य होना ]ाविहए। उन्होंने आ.े यह म व्य[ विकया विक अति विनयम क े भा. 3 क े अ ीन न्यायालय द्वारा पारिर विकसी अति विनण=य का अस्मिN त्व ारा 28 क क े अ ीन आवेदन करने क े लिलए पूव=व 3 श = र्थीी। लोक अदाल द्वारा पारिर अति विनण=य सहमति से पाया.या ।नामदेव बनाम महाराY्र राज्य[8] 2014 एससी ऑनलाइन बॉम्बे 4091 क े विनण=य में, 03.11.2014 को बॉम्बे उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने क े वल अव ारिर विकया विक लोक अदाल द्वारा पारिर अति विनण=य में तिडक्री की शवि[ है और ारा 28 ए क े ह एक आवेदन क े द्वाराा एेसे अति विनण=य की Nर्थीापना की जा सक ी है। यह आ.े कहा.या है विक इस दृविYकोण की पुविY उच्च न्यायालय ने विवशिभन्न मामलों में की है।
20. क े रल उच्च न्यायालय क े एक विवद्व एकल न्याया ीश ने र्थीैंकम्मा मैथ्यू बनाम क े रल राज्य और अन्य[9] में रिरपोट= विकए.ए विनण=य में 1987 अति विनयम क े प्राव ानों पर अति क विवN ार से विव]ार विकया।विवद्व एकल न्याया ीश 1987 अति विनयम की ारा 21 क े ह अव ारण वाले प्राव ान क े दायरे और प्रभाव 7 ILR 2011 KAR 4276 8 (2014) SCC OnLine Bom 4091 9 (2017) 2 KLT 1023 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk से विनद|शिश र्थीा।उन्होंने क े एन.ोविंवदन क ु ट्टी मेनन बनाम सीडी शाजी10 में इस े विनण=य का उल्लेख विकया।
21. मुख्य रूप से अति विनण=य एक सिसविवल न्यायालय की एक मानी.इ= तिडक्री होने क े आ ार पर, उन्होंने पाया विक ारा 28A उन सभी मामलों में ला.ू हो ी है जहां एक अति विनण=य में न्यायालय आवेदक को कलेक्टर द्वारा विदए.ए पुरNकार से अति क मुआवजे की अनुमति दे ा है और इस न्यायालय क े कर्थीन क े मद्देनजर सिसविवल न्यायालय द्वारा पारिर एक तिडक्री और लोक अदाल क े पुरNकार क े बी] कोई अं र नहीं है।हालांविक, हाल क े एक फ ै सले में, उमादेवी राजक ु मार ज्यूरे और अन्य बनाम सिजला कलेक्टर और अन्य11 में, बॉम्बे उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने इस मामले पर बहु विवN ार से विव]ार करने का अवसर विदया है। उ[ मामले में अति विनयम की ारा 18 क े ह एक संदभ= में एक लोक अदाल द्वारा एक अति विनण=य विदया.या र्थीा। उ[ अति विनण=य क े आ ार पर ारा 28 ए क े ह आवेदन दायर विकया.या र्थीा। खण्ड पीठ ने दोनों अति विनयमों का काफी विवN ार से उल्लेख विकया। न्यायालय ने पाया विक लोक अदाल ों का उद्देश्य एक समझौ ा कराना र्थीा और इसमें कोई सहायक या न्यातियक काय= नहीं र्थीे।हम विनम्नलिललिख विटप्पशिणयों का उल्लेख करने क े लिलए इसे उपयु[ पा े हैंः
15. यह सब इंवि. कर ा है विक लोक अदाल द्वारा विववाद क े विन ा=रण क े परिरणामNवरूप विववाद क े पक्षकारों क े लिलए विवशेष रूप से परिरणाम हो े हैं।सन्दर्थिभ
11 (2021) 4 AIR Bom R 626 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk न्यायालय या एेसा न्यायालय सिजसक े लोक अदाल का.ठन विकया जा ा है, वह उसकी कोइ= भूविमका नहीं है क्योंविंक एेसे विन ा=रण का संब है।वाN व में, एल.एस.ए अति विनयम की ारा 19 (5) क े खंड (ii) क े ह एक संदभ= क े मामले में, यह लोक अदाल का आयोजन करने वाला प्राति करण या सविमति है, जो Nवयं लोक अदाल क े वाद को या मामले को संदर्थिभ कर ी है।न्यायालय, सिजसक े लिलए ऐसी लोक अदाल का.ठन विकया जा ा है, संदभ= क े N र पर भी चिं]ति नहीं है।लोक न्यायालय द्वारा विदए.ए अति विनण=य को उसे अपने तिडक्री का विहNसा बनाने क े लिलए उस न्यायालय में वापस जाने की आवश्यक ा नहीं है।यह अति विनण=य Nवयं पक्षकारों क े मध्य अंति म और बाध्यकारी (और अपील योग्य नहीं) है।यह एक सिसविवल न्यायालय का एक तिडक्री माना जा ा है और इस रह से विनष्पादन योग्य है।लोक अदाल द्वारा पारिर एक पुरNकार को उस न्यायालय क े एक डीम्ड तिडक्री क े रूप में मानने क े लिलए वN ुआें की इस योजना में कु छ भी नहीं है सिजसने लोक न्यायालय का संदभ= विदया र्थीा या सिजसक े लिलए लोक न्यायालय का.ठन विकया.या र्थीा।एल.ए े संदभ= में, और विवशेष रूप से ारा 28 क क े प्रयोजनों क े लिलए, "दीवानी न्यायालय की तिडक्री" की कल्पना को न क े वल लोक न्यायालय को संदर्थिभ करने वाले न्यायालय क े एक तिडक्री क बढ़ाया जाना हो.ा या सिजसक े लिलए ऐसी लोक न्यायालय का आयोजन विकया जा ा है,लोक न्यायालय को संदर्थिभ करने वाले न्यायालय क े एक तिडक्री क बढ़ाया जाना हो.ा या सिजसक े लिलए ऐसी लोक न्यायालय का आयोजन विकया जा ा है, लेविकन ऐसी न्यायालय ने इसे ला े भा. III क े ह पारिर विकया है, ाविक ीसरे पक्ष क े लिलए परिरणाम हो सक े ।यह सुझाव देने क े लिलए क ु छ भी नहीं है विक यविद अति विनण=य भूविम अति ग्रहण क े मामले में मुआवजा विववाद में है, ो विकसी भी ीसरे पक्ष को एलए अति विनयम की ारा 28 क क े ह अपने मुआवजे क े पुनः विन ा=रण क े लिलए आवेदन करने का हकदार होना ]ाविहए। सिसcां क े रूप में, यह कहना संभव नहीं है विक घटना (यानी लोक अदाल द्वारा अति विनण=य पारिर करने क े बाद अपने Nवयं क े मुआवजे क े पुनः विन ा=रण क े लिलए आवेदन करने क े लिलए विकसी ीसरे पक्ष का हक) अविनवाय= रूप से एक कोरोलरी या परिरणाम क े रूप में इस रह क े अति विनण=य प्राप्त हो.ा। xxx xxx xxx
20. यविद यह परिरणाम, अर्थीा= ्, लोक न्यायालय क े अति विनण=य को भा. III क े ह संदभ= न्यायालय क े एक अति विनण=य क े रूप में माना जा ा है, ो एक अपरिरहाय= अनुक्रम क े रूप में पालन नहीं कर ा है, ऐसे परिरणाम पर आने क े लिलए एलएसए अति विनयम की ारा 21 में विनविह कानूनी कल्पना को वाN व में दो अन्य vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अव ारणाआें को मानने क े लिलए बढ़ाया जाना हो.ा, अर्थीा= ्, लोक न्यायालय क े अति विनण=य को माना जाना ]ाविहए (i) 'न्यायालय की एक तिडक्री सिजसने मामले को लोक न्यायालय को संदर्थिभ विकया है', और (ii) 'भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 क े ह पारिर एक तिडक्री।'वह, हमें डर है, सदन क े. बोरमल क े मामले (उपरो[) में उच्च म न्यायालय द्वारा ब ाए.ए कानून क े ह अभेद्य है। यह कानूनी कर्थीा साविहत्य का क ृ वित्रम विवN ार हो.ा न विक मूल वै ाविनक कर्थीा साविहत्य का आवश्यक आ ार यह मूल कर्थीा साविहत्य को अपने वै ाविनक उद्देश्य से परे विवN ारिर करे.ा। "
22. न्यायालय ने सिंस.रकोंडा सुरेखा बनाम जीवी शमा= और अन्य12 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय क े फ ै सले को इस आ ार पर विवभेद विकया विक यह इस आ ार पर शिभन्न र्थीा विक, उ[ मामले में, संदभ= न्यायालय ने लोक अदाल क े समक्ष पक्षकारों क े बी] समझौ ा होने क े आ ार पर एक पुरNकार पारिर विकया र्थीा और इसलिलए, यह अति विनयम क े ह संदभ= न्यायालय द्वारा विकए.ए एक पुरNकार का मामला र्थीा।
23. इसलिलए, सिंस.रकोंडा सुरेखा उपरो[ में रिरपोट= विकए.ए आंध्र प्रदेश उच्च े विनण=य पर ध्यान देना उति] है।उ[ मामले में, हम देख े हैं विक अति विनयम की ारा 18 क े ह एक संदभ= र्थीा। उप-न्यायालय,.ुडूर ने 31.07.1995 क े अपने फ ै सले से बाजार मूल्य में वृतिc की और सभी वै ाविनक लाभों को छोड़कर उस भूविम क े प्रति एकड़ 60,000 रुपये की दर से बाजार मूल्य य विकया। श्रीहरिरकोटा में एक लोक अदाल आयोसिज की.ई र्थीी सिजसमें उपरो[ दरों पर विन ा=रिर बाजार मूल्य की सिसफारिरश की.ई र्थीी लेविकन वै ाविनक लाभों से इनकार विकया.या र्थीा।यह आ.े कहा.या है विक vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk 31.07.1995 को लोक अदाल द्वारा अनुशंसिस दरों को बढ़ा े हुए तिडक्री पारिर की.ई र्थीी। त्पश्चा यह है विक याति]काक ा= द्वारा ारा 28A क े ह आवेदन दायर विकए.ए र्थीे। न्यायालय ने अति विनयम,1987 की ारा 19 (5), 21 और 22 का उल्लेख विकया और पाया विक प्रत्यर्थी3 लोक अदाल क े समक्ष विनN रण या समझौ ा करने क े लिलए विवति का सहारा लेकर ारा 28 ए क े लाभ का दावा करने पर याति]काक ा= क े विवति क अति कार को नहीं हरा सक े र्थीे। सिजसक े बल पर तिडक्री पारिर की.ई र्थीी।यह आ.े पाया.या विक न्यायालय ने क े वल एक समझौ े क े बल पर इस रह का पुरNकार विदया र्थीा, जो विकसी भी रह से स्मिNर्थीति को नहीं बदले.ा।
24. र्थीॉमस जॉब बनाम र्थीॉमस13 में, क े रल उच्च न्यायालय क े एक विवद्व एकल न्याया ीश ने यह दृविYकोण विदया विक अव रणा की विकसी भी व्याख्या द्वारा, यह नहीं माना जा सक ा है विक ारा 21 में बनाए.ए कानूनी कर्थीा क े बावजूद लोक अदाल द्वारा पारिर एक पुरNकार को एक दीवानी न्यायालय द्वारा पारिर समझौ ा तिडक्री क े रूप में माना जा सक ा है।यह पाया.या है विक एक लोक अदाल एक अदाल नहीं है लोक अदाल क े वल एक समझौ े को प्रमाशिण कर ी है।यह पाया.या है विक सिसविवल न्यायालय पुरNकार की श g को अल. नहीं कर सक ा है या पार्निटयों क े बी] एक पुरNकार क े लिलए सहम समय का विवN ार नहीं कर सक ा है। 13 2003 (3) KLT 936 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
25. प्राव ानों को विन ा=रिर करने और विनण=यों को संदर्थिभ करने क े बाद, हम संबंति कg पर विव]ार कर सक े हैं जो न्यायालय क े समक्ष उठाए जा े हैं। विनष्कष=
26. 1987 क े अति विनयम की अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी जैसा विक अति विनयम की प्रN ावना से देखा जा सक ा है, लोक अदाल ों का सं.ठन भी है।विकसी भी संदेह की छाया से परे यह NपY है विक ारा 20 क े ह लोक अदाल का अति कार क्षेत्र एक मामले में पक्षों क े बी] विववादों क े विनN ारण की सुविव ा क े लिलए है।इसकी कोई सहायक भूविमका नहीं है।यह एक वाद को य नहीं कर सक ा है। यह सब जो कर सक ा है वह वाN विवक विनN ारण या समझौ ा करना है। ारा 20 की उप- ारा (4) महत्वपूण= है क्योंविक कानून देने वाले ने लोक अदाल क े लिलए मा.=दश=क सिसcां विन ा=रिर विकए हैं।ये सिसcां न्याय, समान ा, विनष्पक्ष खेल और अन्य कानूनी सिसcां हैं।इस प्राव ान का महत्व ब बड़ा हो ा है जब न्यायालय अति विनयम की ारा 28 ए की योजना को ध्यान में रख ा है।
27. अति विनयम की ारा 28 क की योजना अपने शुरुआ ी शब्दों से विबना ऋ ु विट क े NपY है। ारा 28 क यह ब ा ी है वह भा. III क े अ ीन पारिर विकसी अति विनण=य क े अ ीन प्रति कर का पुन=विन ा=रण है ो वह भा. III क े ह ारा 23 में आ ा है ारा 23 उन मामलों पर विव]ार कर ी है सिजन्हें ध्यान में रखा जाना है। ारा 4 (1) क े ह अति सू]ना की ारीख को बाजार मूल्य सविह vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk विवशिभन्न पहलुओं को इंवि. विकया.या है।हम इस बा पर जोर देना ]ाह े हैं विक ारा 23 क े त्व '1987 अति विनयम' की ारा 19 (4) में विन ा=रिर मा.=दश=क सिसcां ों क े अनुरूप नहीं हैं, जो लोक अदाल का मा.=दश=न करने क े लिलए हैं। जब न्यायालय ारा 18 क े ह मामले से विनपट ी है, ो दूसरे शब्दों में, यह सबू ों पर.ौर करने और कानूनी सिसcां ों को ला.ू करने वाले सबू ों क े आ ार पर विनष्कषg पर पहुं]ने क े लिलए बाध्य है, जो मुआवजे पर पहुं]े हैं। जबविक यह स] हो सक ा है विक 1987 अति विनयम की ारा 19 (4) में 'अन्य कानूनी सिसcां ों' का संदभ= है, लोक अदाल भी न्याय, साम्या और विनष्पक्ष भा.ीदारी क े सिसcां ों क े आलोक में मां. सक ी है।व्य[ प्राव ानों क े आ ार पर लोक अदाल क े वल उन मामलों क े संबं में विनN ारण और समझौ ा करने का एक सहायक है जो इसे संदर्थिभ विकया जा ा है।इसकी कोई सहायक भूविमका नहीं है (देखें पंजाब राज्य और अन्य वी जलोर सिंसह एंड अन्य (उपरो[))। भार संघ बनाम अनं ो (मृ ) और अन्य14 में, इस न्यायालय ने अन्य बा ों क े सार्थी विनम्नानुसार अव ारिर विकयाः
7. ारा 20 की उप ारा (3) में प्रयु[ विवविनर्निदY भाषा यह NपY कर ी है विक लोक अदाल पक्षकारों क े बी] समझौ ा या समझौ ा क े माध्यम से विकसी मामले का विनN ारण कर सक ी है। ारा 20 की उप ारा (3) और (5) में दो महत्वपूण= पद "समझौ ा" और "विनN ारण" हैं। पूव= अशिभव्यवि[ का अर्थी= है आपसी रिरयाय ों द्वारा म भेदों का विनपटारा।यह मां.ों क े पारNपरिरक संशो न द्वारा परNपर विवरो ी या विवरो ी दावों क े समायोजन द्वारा विकया.या एक समझौ ा है।डे ला ले टम्स= क े अनुसार, "समझौ ा दो या दो से अति क पक्षों का आपसी वादा है जो विववाद में हैं।"बौविवयर क े अनुसार यह "दो या अति क व्यवि[यों क े बी] एक करार है, जो विकसी विवति वाद से ब]ने क े लिलए अपने म भेदों को सौहाद=पूण= ढं. से ऐसे विनबं नों पर 14 (2007) 10 SC 748 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk सुलझा ले े हैं, सिजन पर वे सहम हो सक े हैं" "समझौ ा" शब्द से प्रत्येक पक्ष में आवास क े क ु छ त्व अशिभप्रे हैंसम्पूण= आत्मसमप=ण का वण=न करना उपयु[ नहीं है।[देखें रे एनएफयू डेवलपमेंट ट्रNट लिलविमटेड [1973] 1 ऑल ईआर 135 (सीए]डी)]।एक समझौ ा हमेशा विद्वपक्षीय हो ा है और इसका म लब आपसी समायोजन हो ा है।"समझौ ा" पारNपरिरक सहमति से विवति क काय=वाविहयों की समाविप्त हैव =मान मामले में समझौ ा या विनN ारण शाविमल नहीं र्थीा और लोक अदाल द्वारा विनपटाया नहीं जा सक ा र्थीा।यविद कोई समझौ ा या विनN ारण नहीं हो सक ा है या नहीं हो सक ा है, ो लोक अदाल द्वारा कोई आदेश पारिर नहीं विकया जा सक ा है।इसलिलए, लोक अदाल ों क े आदेश क े विवलय का सवाल ही नहीं उठ ा। "
28. प्रत्यर्थिर्थीयों क े लिलए विवद्व वरिरष्ठ अति व[ा श्री ध्रुव मेह ा द्वारा एक क = विदया.या र्थीा, विक लोक अदाल ने अपीलक ा= क े रुख को प्रकट विकया है और यह नोएडा, नोएडा की सहमति क े आ ार पर सहमति व्य[ की जा रही है।इस संबं में, उन्होंने पीटी र्थीॉमस बनाम र्थीॉमस जॉब15 में इस न्यायालय क े विनण=य पर हमारा ध्यान आकर्निष विकया।
29. हम इस क = में कोई योग्य ा नहीं देख े हैं।इस न्यायालय द्वारा जो विन ा=रिर विकया.या है, वह इस संबं में पूव [ विनण=य में देखा जा सक ा हैः शैलेन्द्र नारायण भांजा देव बनाम उड़ीसा राज्य, एआईआर 1956 उच्च म न्यायालय 346, (संविव ान पीठ) में विनम्नानुसार आयोसिज विकया.याः सहमति या तिडफ़ॉल्ट रूप से एक विनण=य एक विनण=य क े रूप में पार्निटयों क े बी] एक विववं न क े रूप में प्रभावी है, सिजसक े ह न्यायालय एक ]ुनाव वाले मामले पर अपने विदमा. का उपयो. कर ी है। (1895) 1 Ch. 37 & amp 1929 AC 482, इन-'री साउर्थी अमेरिरकन एंड मैस्मिक्सकन क ं पनी, एक्स. पाट= बैंक ऑफ इंग्लैंड', (1895) 1 सीए] 37 (सी) में, यह माना.या है विक सहमति या तिडफ़ॉल्ट रूप से एक विनण=य पार्निटयों क े बी] एक विनण=य क े रूप में प्रभावी है, सिजसक े ह न्यायालय vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk एक ]ुनाव वाले मामले पर अपने विदमा. का उपयो. कर ा है।वॉन विवलिलयम्स क े फ ै सले का समर्थी=न कर े हुए, जे लॉड= हश|ल ने पृष्ठ 50 पर कहाः सच्चाई यह है विक सहमति से एक विनण=य का उद्देश्य पक्षकारों क े बी] मुकदमेबाजी पर रोक ल.ाना है, सिज ना विक एक विनण=य है जो मामले क े अं क लड़ने क े बाद े विनण=य से हो ा है। और मुझे ल. ा है विक यह बहु शरार ी हो.ा यविद कोई इस रह क े विनण=यों की उति] और ार्निकक व्याख्या नहीं दे ा, और उन सवालों की अनुमति दे ा, जो वाN व में बाद की कार=वाई में विफर से लड़े जाने क े लिलए कार=वाई में शाविमल र्थीे। ' इसी रह क े प्रभाव 'विंक] बनाम वालवोट', 1929 एसी 482 पृष्ठ 493 (डी) में न्यातियक सविमति की विनम्नलिललिख विटप्पशिणयां हैं- - सबसे पहले, न्यायमूर्ति को यह NपY हैं विक विवव ंन की इस दलील क े संबं में यह अपीलक ा= क े लिलए कोई फायदा नहीं है विक परिरवाद कार=वाई में आदेश जो इसे बढ़ाने क े लिलए कहा जा ा है, एक सहमति आदेश र्थीा।इस रह क े उद्देश्य क े लिलए सहमति क े आदेश, आपसी समझौ े द्वारा विनव=हन नहीं विकया जा ा है, और अपरिरवर्ति रह ा है, न्यायालय क े एक आदेश क े रूप में उ ना ही प्रभावी है सिज ना विक सहमति से अन्यर्थीा विकया.या है और अपील पर छ ु ट्टी नहीं दी.ई है। ' इस न्यायालय ने जो विन ा=रिर विकया है वह यह है विक जब सहमति की तिडक्री हो ी है, ो सहमति तिडक्री क े पक्षकारों को इसक े प्रभाव से दूर करने से इसकी श g से अNवीक ृ कर विदया जाए.ा।उ[ प्रN ाव क े सार्थी कोई झ.ड़ा नहीं हो सक ा है।हालांविक यह अव ारिर करना एक अल. बा है विक थ्य यह है विक एसे पक्षकार एेसी सहमति वाली तिडक्री को एक दूशरे क े विवरूर्द्घ विववस्मिन् कर विदया जा ा है विफर भी मुआवजे क े पुनर्निन ा=रण क े लिलए आ ार बना सक े है जो एक अति विनण=य क े एेसे पक्षकार नहीं है जो पक्षकारों क े मध्य समझौ े से उत्पन्न हुए है। दूसरे शब्दों में, जब ारा 28A यह प्रदान कर ी है विक विनNसंदेह उन लो.ों क े लिलए एक लाभ है सिजन्होंने अति विनयम की ारा 18 क े ह अपने vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अति कार का लाभ नहीं उठाया है, ो एक लाभकारी दृविYकोण लिलया जा सक ा है, न्यायालय विवति का आदेश देने वाले पर अपनी आँखें बंद नहीं कर सक ा है।
30. विव ातियका की इच्छा को प्रभावी बनाने क े लिलए अंति म विवश्लेषण में न्यायालय का क्षेत्र और क =व्य है।अन्य सिसcां ों क े सार्थी विवति यों की व्याख्या क े महत्वपूण= विनयम पर ]]ा= की.ई, क्योंविक यह वाN व में इस न्यायालय की संवै ांविनक पीठ द्वारा विन ा=रिर विकया जा सक ा है। भार और एक अन्य बनाम हंसोली देवी और अन्य16 और जो अति विनयम की ारा 28 क क े ह भी उत्पन्न हुए। उन प्रश्नों में से एक जो NपY रूप से उत्पन्न हुए र्थीे विक क्या अति विनयम की ारा 18 क े ह समय से परे दायर एक आवेदन को खारिरज करना विकसी व्यवि[ को ारा 28 ए ला.ू करने का अति कार दे.ा।
9. इससे पहले विक हम यह जां] शुरू करें विक ारा 28-ए की सही व्याख्या क्या हो.ी, हम विकसी क़ानून की व्याख्या क े कु छ बुविनयादी सिसcां ों को ध्यान में रखना उति] समझ े हैं।ससेक्स पीयरेज मामले में विंटडल, सीजे द्वारा कहा.या विनयम [(1844) 11 Cl & amp Fin 85:8 ER 1034] अभी भी प्रया. में है।उपरो[ विनयम का प्रभाव यह हैः(ईआर पी. 1057) यविद क़ानून क े शब्द अपने आप में सटीक और NपY हैं, ो उन शब्दों को उनक े प्राक ृ ति क और सामान्य अर्थीg में उजा.र करने से अति क आवश्यक कु छ नहीं हो सक ा है। एेसे मामले में शब्द Nवयं ही विवति बनाने वाले क े उद्देश्य को अच्छी रह से ब ा े है यह एक क़ानून क े विनमा=ण का एक आ ारभू सिसcां है विक जब क़ानून की भाषा साफ-सुर्थीरी और NपY है, ो न्यायालय को विवति में प्रयु[ शब्दों को प्रभाव देना vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk ]ाविहए और यह एक काल्पविनक विनमा=ण को अपनाने क े लिलए न्यायालयों क े लिलए इस आ ार पर उपलब हीं हो.ा विक वह इस रह का विनमा=ण अति विनयम की कशिर्थी वN ु और नीति क े अनुरूप हों।विकक = नेस बनाम जॉन हडसन एंड क ं पनी लिलविमटेड [(1955) 2 ऑल ईआर 345:1955 एसी 696: (1955) 2 डब्ल्यूएलआर 1135] लॉड= रीड ने ब ाया विक "अNपY" का अर्थी= क्या है और यह अव ारिर विकया.या विकः (सभी ईआर पी. 366 सी-डी) एक प्राव ान क े वल इसलिलए अNपY नहीं है क्योंविक इसमें एक शब्द है जो विवशिभन्न संदभg में अल.-अल. अर्थीg में सक्षम है।विकसी भी लंबाई का एक वाक्य कहीं भी खोजना मुस्मिश्कल हो.ा सिजसमें ऐसा शब्द नहीं है।मेरे विनण=य में, एक प्राव ान क े वल भी अNपY है जब इसमें कोई शब्द या वाक्यांश हो जो उस विवशेष संदभ= में एक से अति क अर्थी= रखने में सक्षम हो। " इसकी सत्य ा पर कोई संदेह नहीं है विक अ.र क़ानून की भाषा क े सामान्य अर्थी= को देखेने पर, यह विवसं.ति यों, अन्याय और.ैरबराबरी की ओर जा ा है, ो न्यायालय उस उद्देश्य पर.ौर कर सक ी है सिजसक े लिलए क़ानून लाया.या है और एक अर्थी= देने की कोशिशश करे.ा, जो क़ानून क े उद्देश्य का पालन करे.ा।प ंजलिल शास्त्री, अति¸नी क ु मार घोष बनाम अरविंबद घोष [AIR 1952 SC 369:1953 SCR 1] क े मामले में सीजे ने माना र्थीा विक विकसी क़ानून में शब्दों को अल. करने क े लिलए विनमा=ण का एक अच्छा सिसcां नहीं है, क्योंविक यह अनुति] अति शेष है, यविद वे क़ानून क े चिं] न क े भी र परिरस्मिNर्थीति यों में उपयु[ बदलाव कर सक े हैं। क्यूबेक रेलवे, लाइट हीट एंड पावर क ं पनी लिलविमटेड बनाम वांद्री [AIR 1920 PC 181] में यह देखा.या र्थीा विक विव ातियका को अपने शब्दों को बबा=द करने या व्यर्थी= में कु छ भी कहने क े लिलए नहीं माना जा ा है और एक विनमा=ण जो विव ातियका को अति रेक का श्रेय दे ा है, उसे अविनवाय= कारणों को छोड़कर Nवीकार नहीं विकया जाए.ा। इसी रह, विकसी क़ानून में शब्दों को जोड़ने की अनुमति नहीं है जो ब क नहीं है जब क विक एक शास्मिब्दक विनमा=ण को क़ानून का एक विहNसा विदए जाने पर अर्थी=हीन हो जा ा है।लेविकन इससे पहले विक अति विनयम में विकसी ]ूक को ठीक करने क े लिलए कोई शब्द पढ़ा जाए, यह विनतिश्च रूप से कहना संभव होना ]ाविहए विक ये शब्द ड्राफ्ट्समैन द्वारा डाले.ए हों.े और विव ातियका द्वारा अनुमोविद विकए.ए हों.े, एक कानून में विबल क े पारिर होने से पहले ]ूक पर उनका ध्यान आकर्निष विकया.या र्थीा। ।कई बार, विव ातियका की मंशा NपY पाई जा ी है, लेविकन क़ानून में क ु छ शब्दों को पेश करने में ड्राफ्ट्समैन की अक ु शल ा भाषा की NपY अक्षम ा में हो ी है और ऐसी स्मिNर्थीति में, vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk े लिलए अति शेष शब्द को अNवीकार करना Nवीकाय= हो सक ा है, ाविक क़ानून को प्रभावी बनाया जा सक े । उपरो[ सिसcां को ध्यान में रख े हुए, दो विवद्वान न्याया ीशों की पीठ द्वारा हमें संदर्थिभ प्रश्नों क े उत्तर देने क े लिलए आइए अब अति विनयम की ारा 28-ए क े प्राव ानों की जां] करें, इसकी सत्य ा पर कोई संदेह नहीं है विक अति विनयम की ारा 28-ए का उद्देश्य एक संदभ= बनाने का अति कार प्रदान करना र्थीा, (का.ज फटा) सिजसने ारा 18 क े ह पहले एक संदभ= नहीं बनाया जा सक ा है और इसलिलए, आम ौर पर जब कोई व्यवि[ ारा 18 क े ह एक संदभ= बना ा है, लेविकन इसे देरी क े आ ार पर खारिरज कर विदया.या र्थीा, उसे भूविम अति ग्रहण अति विनयम की ारा 28-ए का अति कार नहीं विमले.ा जब कोई अन्य व्यवि[ संदभ= दे ा है और संदभ= का उत्तर विदया जा ा है।लेविकन संसद ने ारा 28-ए को एक लाभकारी प्राव ान क े रूप में अति विनयविम विकया है, यह बहु अन्याय का कारण हो.ा यविद अति विनयम की ारा 28-ए में " ारा 18 क े ह कलेक्टर को आवेदन नहीं विकया र्थीा " अशिभव्यवि[ को शास्मिब्दक व्याख्या दी जा ी है। पूव [ अशिभव्यवि[ का अर्थी= हो.ा विक यविद भूNवामी ने ारा 18 क े ह संदभ= क े लिलए एक आवेदन विकया है और उस संदभ= का संज्ञान लिलया.या है और उत्तर विदया.या है। दूसरे शब्दों में, एक भूNवामी क े लिलए एक संदभ= बनाने और इसका उत्तर प्राप्त करने की अनुमति नहीं हो सक ी है और विफर बाद में एक और आवेदन करें जब विकसी अन्य व्यवि[ को संदभ= का उत्तर विमल ा है और एक उच्च राशिश प्राप्त कर ा है।वाN व में प्रदीप क ु मारी मामले में [(1995) 2 एससीसी 736] ीन विवद्व न्याया ीशों ने सं ुY होने क े लिलए श g की.णना कर े हुए, उसक े बाद ारा 28-ए क े ह एक आवेदन को Nर्थीानां रिर विकया जा सक ा है, ने NपY रूप से कहा र्थीा (एससीसी पी। 743, पैरा 10) "आवेदन करने वाले व्यवि[ ने ारा 18 क े ह कलेक्टर को आवेदन नहीं विकया।""आवेदन नहीं विकया", जैसा विक इस न्यायालय द्वारा देखा.या है, का अर्थी= हो.ा, एक प्रभावी आवेदन नहीं विकया जो संदभ= बनाकर संज्ञान लिलया.या र्थीा और संदभ= का उत्तर विदया.या र्थीा।जब ारा 18 क े ह एक आवेदन को सीमा क े आ ार संज्ञान नहीं लिलया जा ा है, ो विकसी भी संदभ= में फलदायी नहीं है, ो यह एक प्रभावी आवेदन क े लिलए नहीं हो.ा और परिरणामNवरूप विकसी अन्य संदभ= से विनकलने वाले ऐसे आवेदक क े अति कारों को एक आवेदन को Nर्थीानां रिर करने क े लिलए उत्तर विदया जाना है को ारा 28-ए क े ह इनकार नहीं विकया जा सक ा है।हम दनुसार प्रश्न 1 (ए) का उत्तर दे े हैं विक देरी क े आ ार पर ारा 18 क े ह संदभ= मां.ने वाले आवेदन को खारिरज करना भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 की ारा 28-ए क े अर्थी= क े भी र एक आवेदन दायर नहीं करने क े बराबर हो.ा। ' vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
31. हम सो]ें.े विक, इसलिलए, सहमति तिडक्री से उत्पन्न होने वाली या लोक अदाल द्वारा पारिर एक पुरNकार से उत्पन्न होने वाली याति]का, सिजसे शायद सहमति क े विनण=य की ुलना भी की जा सक ी है, मुआवजे क े पुनर्निव रण का आ ार नहीं हो सक ी है। ारा 28 ए वाN व में एक सिसविवल न्यायालय द्वारा विनण=य पर जोर दे ी है जैसा विक ारा 2 (एल) में परिरभाविष है।दूसरे शब्दों में, अति विनयम की ारा 28 क को ला.ू करने क े लिलए जो एकमात्र आ ार बनाया.या है, वह न्यायालय द्वारा एक अति विनण=य है जैसा विक अति विनयम में परिरभाविष विकया.या है। विवव ंन की दलील, जो आम ौर पर, लोक अदाल द्वारा पारिर सहमति तिडक्री या पुरNकार से उत्पन्न हो ी है, सिजसमें पहले से ही देखा.या है, न्यायालय द्वारा विकसी भी विनण=य को शाविमल नहीं कर ा है, शायद ही पया=प्त हो.ा।इस न्यायालय द्वारा संदर्थिभ विववं न सहमति तिडक्री क े लिलए पक्षकारों क े बी] ला.ू हो ा है।
32. यह हमें अ.ले प्रश्न पर ला ा है, अर्थीा=, अति विनयम, 1987 की ारा 21 का विनविह ार्थी= सिजसक े ह लोक अदाल क े पुरNकार को एक तिडक्री क े रूप में माना जाना है।उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थिर्थीयों क े विववाद को आक्षेविप रखने क े लिलए ारा 21 पर विनण=य लिलया है। क = इस प्रकार हैः लोक अदाल द्वारा पारिर एक पुरNकार 1987 अति विनयम की ारा 21 क े ह एक दीवानी न्यायालय क े एक तिडक्री क े रूप में लिलया जाना है। ारा 28 क क े लिलए जो आवश्यक है वह दीवानी न्यायालय द्वारा मुआवजे का पुनर्निव रण है।इसलिलए, लोक अदाल का पुरNकार, इस रह क े क = क े सार्थी, vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk े ह विव]ार विकए.ए विनण=य क े सार्थी सस्मिम्मलिल विकया जाना है।
33. क ु ट्टी मेनन बनाम सीडी शाजी17 में, यह न्यायालय इस प्रश्न से संबंति र्थीा विक क्या 1987 अति विनयम की ारा 21 क े ह, जब कोई मामला परक्रम्य लिलख अति विनयम की ारा 138 क े ह एक आपराति क मामले में लोक अदाल को भेजा जा ा है और मामला सुलझा लिलया जा ा है और एक पुरNकार पारिर विकया जा ा है, ]ाहे इसे दीवानी न्यायालय की तिडक्री क े रूप में माना जा सक ा है और, इस प्रकार, यह विनष्पादन योग्य है। न्यायालय ने यह अव ारिर विकयाः ‘’23. अति विनयम क े उद्देश्यों और कारणों क े विववरण में साक्ष्य क े रूप में एक वै ाविनक समर्थी=न न क े वल विनयविम अदाल ों में काम क े बकाया क े बोझ को कम करे.ा, बस्मिल्क.रीबों और जरूर मंदों क े दरवाजे क न्याय ले जाए.ा और न्याय को ेज और कम ख]3ला बनाए.ा।व =मान मामले में, विन]ली अदाल ों ने यह मानने में ऋ ु विट विकया विक क े वल मामला एक र्थीा सिजसे एक सिसविवल न्यायालय द्वारा संदर्थिभ विकया.या र्थीा, ो यह एक तिडक्री हो सक ी है और यविद मामला एक आपराति क न्यायालय द्वारा संदर्थिभ विकया.या र्थीा, ो यह क े वल आपराति क न्यायालय का एक आदेश हो.ा और अति विनयम की ारा 21 क े ह एक तिडक्री नहीं हे। अति विनयम एक दीवानी न्यायालय और एक आपराति क न्यायालय द्वारा विकए.ए संदभ= क े बी] ऐसा कोई अं र नहीं कर ा है।एनआई अति विनयम की ारा 138 क े ह एक आपराति क न्यायालय द्वारा संदर्थिभ एक मामले में पार्निटयों क े बी] आए समझौ े क े आ ार पर एक अति विनण=य पारिर करने क े लिलए लोक न्यायालय की शवि[ पर कोई प्रति बं नहीं है, और विनN ारण प्राव ान क े आ ार पर इसे होना ]ाविहए विक एक सिसविवल कोट= द्वारा विनष्पादन में सक्षम तिडक्री क े रूप में माना जा ा है।इस संबं में, सुभाष नरसप्पा मं.रुल [(2009) 3 माह एलजे 857] और वलारम ी ऑयल vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk इंडNट्रीज [एआईआर 2009 मैड 180] में लिलया.या दृविYकोण इस विववाद का समर्थी=न कर ा है और हम इसे पूरी रह से Nवीकार कर े हैं। "
34. इसक े बाद न्यायालय इस प्रकार विनष्कष= विनकाल ा हैः
26. उपरो[ ]]ा= से, विनम्नलिललिख प्रN ाव सामने आ े हैंः (1) अति विनयम की ारा 21 की अNपY भाषा को ध्यान में रख े हुए, लोक े प्रत्येक पुरNकार को सिसविवल न्यायालय का तिडक्री माना जाए.ा और इस रह यह उस न्यायालय द्वारा विनष्पादन योग्य है।17 (2012) 2 एससीसी 51 28 सीए सं. 901/2022 (@एसएलपी (सी) सं. 9927/2020 आविद) (2) अति विनयम दीवानी न्यायालय और दांतिडक न्यायालय द्वारा विकए.ए विनद|श क े बी] ऐसा कोई अं र नहीं कर ा है (3) लोक अदाल की विवशिभन्न अदाल ों (दीवानी और आपराति क दोनों), न्यायाति करणों, पारिरवारिरक न्यायालय, विकराया विनयंत्रण अदाल, उपभो[ा विनवारण मं], मोटर दुघ=टनाएं दावा न्यायाति करण और समान प्रक ृ ति क े अन्य मं]ों द्वारा विनर्निदY मामलों क े संबं में पक्षों क े बी] हुए समझौ े क े आ ार पर एक पुरNकार पारिर करने की शवि[ पर कोई प्रति बं नहीं है। (4) यविद विकसी मामले को दांतिडक न्यायालय द्वारा परक्राम्य लिलख अति विनयम, 1881 की ारा 138 क े अ ीन विनर्निदY विकया जा ा है और विनN ारण उपबं ों क े आ ार पर, लोक न्यायालय द्वारा समझौ े क े आ ार पर पारिर अति विनण=य को दीवानी न्यायालय द्वारा विनष्पादन क े लिलए सक्षम तिडक्री माना जा ा है
35. इस सिसcां क े सार्थी कोई झ.ड़ा नहीं हो सक ा है विक अव ारण क े उद्देश्य की ठीक से सराहना की जा रही है, यहां क विक विन.ोशिशएबल इंNट्रूमेंट्स एक्ट की ारा 138 क े ह एक मामले में, जब एक संदभ= का पालन विकया जा ा है, ो 1987 अति विनयम क े ह एक अति विनण=य पारिर vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk विकया जा ा है ो यह अति विनण=य को तिडक्री क े रूप में ला.ू करने क े उद्देश्य से एक तिडक्री क े रूप में मानने क े उद्देश्य क े अनुरूप है।
36. जब विव ातियका द्वारा एक कानूनी कर्थीा को विनयोसिज विकया जा ा है, ो इसकी व्याख्या करना और इसका अर्थी= देना न्यायालय का क =व्य बन जा ा है।अपने अर्थी= को महत्व ा देने में, न्यायालय इस विव ायी उपकरण क े उद्देश्य का प ा ल.ाने क े लिलए बाध्य है।कानूनी कल्पना को उसक े ार्निकक अं क ले जाने क े मामले में, प्रति वादी क े विवद्वान वरिरष्ठ वकील द्वारा क = क े रूप में न्यायालय विनNसंदेह अपने विववेक को ]कमा देने की अनुमति नहीं दे सक ा है। लेविकन यह ारण करने क े समान नहीं है विक न्यायालय अति विनयम की वN ु और विवशेष रूप से, प्रश्न में कल्पना को नहीं देखे.ा।इस संबं में, हम कना=टक राज्य बनाम विमलनाडु राज्य और अन्य 18 में इस न्यायालय क े विनण=य पर ध्यान दे े हैंः
75. इस संदभ= में, हम महत्वपूण= रूप से जीपी सिंसह द्वारा 14 वें संNकरण क े वै ाविनक व्याख्या क े सिसcां ों का उल्लेख कर सक े हैं। विवद्व लेखक ने इस प्रकार व्य[ विकया हैः"विवति क अव ारण सृसिज करने वाले उपबं की व्याख्या कर े हुए, न्यायालय को यह प ा ल.ाना है विक अव ारण विकस प्रयोजन क े लिलए सृसिज की.ई है [त्रावणकोर-को]ीन बनाम शनमुघा विवलास काशेनट फ ै क्ट्री, एआईआर 1953 एससी 333 बम्बई राज्य बनाम पांडुरं. विवनायक, एआईआर 1953 एससी 244:1953 विक्र. एल. जे. 1094], और इसका प ा ल.ाने क े पश्चा ् न्यायालय को उन सभी थ्यों और परिरणामों का अनुमान ल.ाना करना है जो अव ारणा को प्रभावी बनाने क े लिलए आकस्मिNमक या अपरिरहाय= उपसिसर्द्घा ं हैं। [ईNट एंड डवेलिंलग्स क ं पनी लिलविमटेड vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk बनाम विफन्सबरी बरो काउंसिसल, 1952 एसी 109: (1951) 2 ऑल ईआर 587 (ए]एल); सीआईटी बनाम ेजा सिंसह, एआईआर 1959 एससी 352] लेविकन इस प्रकार कल्पना को उस प्रयोजन से आ.े नहीं बढ़ाया जाना है सिजसक े लिलए इसे बनाया.या है। [सीआईटी बनाम शक ुं ला, एआईआर 1966 एससी 719; मं]ेरी पुर्थीुसेरी अहमद बनाम कु शिर्थीरावत्तम एNटेट रिरसीवर, (1996) 6 एससीसी 185: एआईआर 1997 एससी 208] इसे एक अन्य उप ारणा अर्थी= को विवN ारिर नहीं विकया जा सक ा है। [सी. आई. टी. बनाम मून विमल्स लिल., ए. आई. आर. 1966 एस. सी. 870] ऊपर वर्थिण सिसcां "सुNर्थीाविप " हैं [पतिश्चम बं.ाल राज्य बनाम सदन क े. बोरमल, (2004) 6 एस. सी. सी. 59:2004 एस. सी. सी. (अपरा ) 1739: ए. आई. आर. 2004 एस. सी. 3666] विवति को काय=शील बनाने क े लिलए विवति क अव ारणा की भी संकीण= व्याख्या की जा सक ी है[नंदविकशोर.णेश जोशी बनाम कविमश्नर, न.र विन.म कल्याण और डोंविबवली, (2004) 11 एससीसी 417: एआईआर 2005 एससी 34]
76. अनी ा हाड़ा बनाम.ॉडफादर ट्रैवल्स एंड टूस= [अनी ा हाड़ा बनाम.ॉडफादर ट्रैवल्स एंड टूस=, (2012) 5 एससीसी 661: (2012) 3 एससीसी (सीआईवी) 350: (2012) 3 एससीसी (विक्रम) 241] में, ीन न्याया ीशों की पीठ ने इस प्रकार विनण=य सुनायाः (एससीसी पृष्ठ 681, पैरा 37-38) “37 विमलनाडू राज्य बनाम अरूरण शु.स= लिलविमटेड में [Nटेट ऑफ टीएनवी अरुण शु.स= लिल., (1997) 1 एससीसी 326] संविव ान पीठ ने एक क़ानून में आ ारभू प्राव ान पर विव]ारण क े बाद फ ै सला सुनाया विक कानूनी अव ारणा बनाने वाले क़ानून में प्राव ान की भूविमका अच्छी रह से य है। खान क े मुख्य विनरीक्षक बनाम करम ]ंद र्थीापर [खान क े मुख्य विनरीक्षक बनाम करम ]ंद र्थीापर, एआईआर 1961 एससी 838: (1961) 2 विक्र एलजे 1], जेक े कॉटन Nपॉट और डब्ल्यूवीजी विमल्स लिलविमटेड बनाम भार संघ [जेक े कॉटन Nपॉट। और डब्ल्यूवीजी विमल्स लिलविमटेड बनाम भार संघ, 1987 सप्लीमेंट एससीसी 350:1988 एससीसी (कर) 26], एम वेणु.ोपाल बनाम एलआईसी [एम। वेणु.ोपाल बनाम एलआईसी, (1994) 2 एससीसी 323:1994 एससीसी (एल एंड एस) 664] और हरीश टंडन बनाम एडीएम, इलाहाबाद [हरीश टंडन बनाम एडीएम, इलाहाबाद (1995) 1 एससीसी 537] और यह माना.या र्थीा विक जब कोई क़ानून यह कह े हुए एक कानूनी अ ारणा बना ा है विक क ु छ ऐसा माना जाए.ा जो वाN व में विकया.या है और सच्चाई नहीं की.ई है, ो vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk न्यायालय को यह जां]ना और प ा ल.ाना है विक विकस उद्देश्य क े लिलए और विकन व्यवि[यों क े बी] ऐसा वै ाविनक अव ारणा का सहारा लेना है और उसक े बाद, अदाल ों को इस रह क े वै ाविनक अव ारणा को पूरा प्रभाव देना है और इसे अपने ार्निकक विनष्कष= पर ले जाना है।
38. पूव [ घोषणाओं से, सिजस सिसcां को समाप्त विकया जा सक ा है, वह यह है विक यह प ा ल.ाना न्यायालय का बाध्य क =व्य है विक कानूनी अव ारणा विकस उद्देश्य क े लिलए बनाई.ई है।न्यायालय का यह भी क =व्य है विक वह सभी वाN विवक परिरणामों और उदाहरणों क े सार्थी अव ारणा की कल्पना करे जब क विक ऐसा करने से विनविषc न हो।इसक े अलावा, 'समझा' शब्द क े उपयो. को इसक े संदभ= में पढ़ा जाना ]ाविहए और आ.े, पूण= ार्निकक उद्देश्य और अर्थी= को समझना हो.ा।ऐसा इसलिलए है क्योंविक आ ुविनक विव ान में "समझा.या" शब्द का प्रयो. कई प्रयोजनों क े लिलए विकया.या हैविव ातियका क े उद्देश्य को ध्यान में रखा जाना ]ाविहए। "
37. सिजन सिसcां ों को विन ा=रिर विकया.या है, उनक े प्रकाश में, हमारा विनम्नलिललिख दृविYकोण हैं। 1987 अति विनयम क े ह लोक अदाल द्वारा पारिर एक पुरNकार एक.ैर- सहायक प्रविक्रया की परिरणति है।पक्षकारों को लोक अदाल क े सदNयों द्वारा पारNपरिरक रूप से सहमति से समझौ े पर पहुं]ने क े लिलए भी राजी विकया जा ा है।पुरNकार श g को विन ा=रिर कर ा है। ारा 21 में विनविह प्राव ान सिजनक े द्वारा अति विनण=य को माना जा ा है विक यविद यह एक तिडक्री र्थीी, ो क े वल इसका उद्देश्य अति विनण=य को प्रव =नीय कराना है। ारा 21 क े प्राव ानों क े मद्देनजर, सिजसक े द्वारा इसे एक तिडक्री क े रूप में माना जाना है, सिजसे ]ुनौ ी नहीं दी जा सक ी है, विनNसंदेह, इसे विनविषc करने वाले व्य[ प्राव ानों क े मद्देनजर अपील क े माध्यम से, जब क विक इसे अन्य उपयु[ काय=वाही में vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk अपाN नहीं विकया जा ा है ो यह ला.ू करने योग्य हो जा ा है।विवति बनाने वाले का उद्देश्य क े वल इसे ला.ू करने की प्रविक्रया प्रदान करना है जैसे विक यह एक तिडक्री र्थीी।इस प्रकार, अति विनण=य को एक तिडक्री क े रूप में माना जाने वाला विवति क अव ारणा आ.े नहीं बढ़ाया जा सक ा है।
38. श्री ध्रुव मेह ा का आ.े क = यह है विक लोक अदाल क े अति विनण=य क े अलावा एक तिडक्री क े रूप में माना जा रहा है, यह भी न्यायालय क े एक आदेश क े रूप में माना जा सक ा है, जैसा भी मामला हो।इस संबं में, हमने पहले ही 1987 अति विनयम की योजना पर ध्यान विदया है। हमने 'वाद' शब्द और 'न्यायालय' शब्द की परिरभाषा पर विव]ार विकया है।हमने ारा 19 (5) और ारा 20 (1) क े प्राव ानों पर भी ध्यान विदया है।इन प्राव ानों का षड्यंत्र विनम्नलिललिख परिरणाम दे.ा। ारा 19 (2) क े ह.विठ लोक न्यायालय में विकसी भी न्यायालय क े समक्ष लंविब विकसी भी मामले क े संबं में विववाविद पक्षकारों क े बी] विनN ारण या समझौ ा करने क े लिलए क्षेत्राति कार हो.ा, सिजसक े लिलए लोक न्यायालय का आयोजन विकया जा ा है।इस संदभ= में 'कोट=' शब्द का अर्थी= ारा 2 (एएए), एक ना.रिरक, आपराति क या राजNव न्यायालय में परिरभाविष न्यायालय से हो.ा। 'न्यायालय' शब्द में विकसी भी न्यायाति करण या विकसी भी कानून क े ह.विठ विकसी भी प्राति करण को शाविमल विकया.या है जो न्यातियक या यहां क विक अ = -न्यातियक कायg का अभ्यास करने क े लिलए है।इस प्रकार, 1987 अति विनयम में ारा 19(5) क े संदभ= में 'न्ययालय' शब्द 1987 अति विनयम की vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk ारा 2(एएए) में संदर्थिभ विनकायों को शाविमल कर ा है। लोक अदाल ों द्वारा संज्ञान लेने का रीका ारा 20(1) क े सार्थी पविठ ारा 19(5) में विदया.या है। ारा 2 (एए) में परिरभाविष न्यायालय मामले को लोक अदाल में संदर्थिभ कर सक ा है।इस रह की न्यायालय, जैसा विक पहले से ही देखा.या है, सिसविवल, आपराति क या राजNव न्यायालय हो सक ी है।यह एक न्यायाति करण या प्राति करण भी हो सक ा है। जब लोक अदाल क े आयोजन क े परिरणामNवरूप एक अति विनण=य क े रूप में सफल ा प्राप्त हो ी है, ो शब्द, जैसा भी मामला हो, ारा 21 में यह भविवष्यवाणी कर ा है विक यह विकसी सिसविवल कोट= क े तिडक्री क े बजाय विकसी अन्य अदाल का आदेश हो सक ा है। अपीलार्थी3 क े विवद्व अति व[ा ब ा े हैं विक यविद कोई आपराति क न्यायालय विन.ोशिशएबल इंNट्रूमेंट्स एक्ट की ारा 138 क े ह विकसी मामले को लोक अदाल में भेज ा है और लोक अदाल एक अति विनण=य पारिर कर ी है ो इस रह क े अति विनण=य को न्यायालय क े आदेश क े रूप में माना जाए.ा। हालाँविक, इस संबं में, हमने क ु ट्टी मेनन (उपरो[) में रिरपोट= विकए.ए इस न्यायालय क े विनण=य पर ध्यान विदया है। यहां क विक जब आपराति क न्यायालय इस मामले को विनष्पादन योग्य बनाने क े लिलए विन.ोशिशएबल इंNट्रूमेंट्स एक्ट की ारा 138 क े ह संदर्थिभ कर ा है, ो इस न्यायालय ने यह विव]ार विकया है विक इसे एक तिडक्री क े रूप में माना जाए.ा।
39. यविद कोई राजNव न्यायालय या अति करण, जो विनNसंदेह, 1987 अति विनयम की ारा 2 (एएए) क े अं.= आ ा है ो वह ारा 20 (1) क े vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk ह लोक अदाल को एक मामले को संदर्थिभ कर ा है और एक अति विनण=य पारिर विकया जा ा है ो यह न्यायालय/ न्यायाति करण का आदेश बन सक ा है।दूसरे शब्दों में, यविद मामला अं ः विनयविम आ ार पर समाप्त हो जा ा है, अर्थीा=, लोक अदाल क े संदभ= क े विबना, यह एक आदेश हो.ा सिजसे पारिर विकया जाए.ा।
40. हालांविक, वरिरष्ठ अति व[ा श्री ध्रुव मेह ा क े अनुसार, क = यह प्र ी हो ा है विक इस विव ायी उपकरण क े आ ार पर, लोक अदाल को विनष्पाविद करने वाली ारा 18 क े ह संदभ= न्यायालय द्वारा इन मामलों में पारिर लोक अदाल क े अति विनण=य को अति विनयम की ारा 28 क क े ह न्यायालय द्वारा पारिर आदेश क े रूप में पारिर जाना ]ाविहए। अब हम ारा 28 क क े ह आवश्यक ा पर विव]ार करने क े बाद इस प्रश्न का उत्तर दें.े।
41. ारा 28 क, विनNसंदेह, संसद द्वारा वष= 1984 में उन भूविम मालिलकों या भूविम में रुति] रखने वाले व्यवि[यों को उनक े कारण उति] राशिश का दावा करने क े लिलए सांत्वना देने क े लिलए पेश की.ई है, भले ही उन्होंने वृतिc की मां. करने वाले अति विनयम की ारा 18 क े ह आवेदन दायर करने क े लिलए छोड़ विदया हो। वाN व में, जोस एंटोविनयो क्र ू ज़ डॉस आर रोतिड्रग्स और एक अन्य बनाम भूविम अति ग्रहण कलेक्टर और एक अन्य19 में, इस न्यायालय ने ीन विवद्व न्याया ीशों की एक खंडपीठ में, यह माना है विक अति विनयम की ारा 28 ए को ला.ू करने क े लिलए ीन महीने की सीमा की अवति मूल न्यायालय द्वारा आदेश vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk पारिर करने की ारीख से शुरू हो.ी, न विक अपीलीय न्यायालय की ारीख से। भार संघ और एक अन्य बनाम हंसोली देवी और अन्य उपरो[ में, इस न्यायालय की संविव ान पीठ ने माना है विक ारा 28 ए क े ह अति कार उस व्यवि[ को भी उपलब् है, सिजसने ारा 18 क े ह असफल रूप से एक समय वर्जिज आवेदन दायर विकया है, थ्य यह है विक एक भूविम मालिलक को भूविम अति ग्रहण अति कारी द्वारा विवरो क े सार्थी या विबना विदए.ए मुआवजे को ारा 28 ए क े ह अपना अति कार नहीं छीना जाए.ा।
42. क्या न्यायालय कानून की सादी भाषा से बेखबर हो सक ा है?क्या हम विव ातियका की आवाज को नजरअंदाज कर सक े हैं जब यह NपY और अNपY हो?अति विनयम क े भा. 3 में ारा 28 क क े आंकड़े हैंशीष=क 'न्यायालय क े पुरNकार क े आ ार पर मुआवजे की राशिश का पुनः विन ा=रण' क े रूप में है।हमारे दृविYकोण से प्रारस्मिम्भक शब्दों में प्रति वादी क े कg क े प्रारस्मिम्भक आ ार का विनN ारण करना एक घा क झटका हैअति विनयम क े ह एक पुरNकार ारा 18 क े ह एक संदभ= क े सार्थी शुरू हो ा है।न्यायालय विवशेष रूप से उन मामलों को ध्यान में रख े हुए संदभ= को Nर्थीवि. करने क े लिलए आ.े बढ़ ा है सिजन्हें अति विनयम की ारा 23 क े ह माना जाना है।
43. ारा 24 उन मामलों की घोषणा कर ी है सिजन्हें मुआवजे क े विन ा=रण में उपेतिक्ष विकया जाना है। ारा 26 अति विनण=य क े रूप से संबंति है। ारा 26 (2) इस प्रकार हैः
26. अति विनण=य क े प्रकार vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA.......… (2) ऐसे प्रत्येक अति विनण=य को सिसविवल प्रविक्रया संविह ा, 1908 (1908 का 5) क े क्रमशः खंड (2) और खंड (9) क े अर्थीा=न्.= विनण=य देने वाली तिडक्री और ऐसे प्रत्येक अति विनण=य क े आ ारों का कर्थीन समझा जाए.ा
44. लोक अदाल द्वारा पारिर पुरNकार को भा. III क े ह पारिर अति विनण=य नहीं कहा जा सक ा है। यह लोक अदाल से पहले पक्षकारों क े बी] हुआ समझौ ा है जो लोक अदाल द्वारा पुरNकार में परिरण हो ा है। वाN व में, अति विनयम क े ह एक अति विनण=य आ ार या कारणों पर विव]ार कर ा है और इसलिलए, Nर्थी.न पर विव]ार विकया जा ा है और अति विनयम की ारा 26 (2) Nव-व्याख्यात्मक है।
45. अ.ला पहलू प्रति वाविदयों क े मामले क े लिलए और भी घा क है।यह न क े वल Nर्थी.न क े परिरणामNवरूप पारिर एक अति विनण=य होना ]ाविहए, बस्मिल्क इसे 'न्यायालय' द्वारा पारिर विकया जाना ]ाविहए, जो कलेक्टर द्वारा दी.ई राशिश से अति क मुआवजे की अनुमति दे ा है। 'न्यायालय' शब्द को अति विनयम में मूल अति कारिर ा क े प्र ान सिसविवल न्यायालय क े रूप में परिरभाविष विकया.या है जब क विक समुति] सरकार ने इस अति विनयम क े अ ीन न्यायालय क े न्यातियक क ृ त्य करने क े लिलए एक विवशेष न्यातियक अति कारी विनयु[ नहीं विकया है। हमने '1987 अति विनयम' की ारा 19 (2) में एक लोक न्यायालय की संर]ना पर ध्यान विदया है।न्यायालय लोक अदाल क े समान नहीं है।
46. लोक अदाल द्वारा अपने आप में अति क क ु छ क े विबना पारिर पुरNकार को एक तिडक्री होने क े लिलए आ ारभू अव ारणा क े द्वारा माना जाना है।यह vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk ऐसा मामला नहीं है जहां पार्निटयों क े बी] ना.रिरक प्रविक्रया संविह ा, 1908 क े आदेश XXIII क े ह एक समझौ ा हुआ है और न्यायालय समझौ े पर विव]ार करने और खुद को सं ुY करना है विक यह विवति पूण= है और यह ारा 21 क े आ ार पर क्षम ा को अव ारिर कर ा है।कु छ और क े विबना, लोक अदाल द्वारा पारिर पुरNकार एक तिडक्री बन जा ा है।मुआवजे की वृतिc विवशुc रूप से समझौ े क े आ ार पर विन ा=रिर की जा ी है जो अति विनयम में परिरभाविष 'न्यायालय' क े विकसी भी विनण=य क े परिरणामNवरूप नहीं है।
47. लोक अदाल द्वारा पारिर एक पुरNकार एक समझौ ा तिडक्री नहीं है।लोक अदाल द्वारा परिर अति विनण=य विबना विकसी आैर बढ़ोत्तरी क े अन्य बा ों क े सार्थी-सार्थी एक तिडक्री क े रूप में माना जाये.ा। पी.टी. र्थीोमस (उपरो[) में क े रला उच्च न्यायालय की विवद्व एकल पीठ क े दृविYकोण को हम Nवीकृ कर े है। एक पुरNकार जब क विक इसे उति] काय=वाही में सफल ापूव=क पूछ ाछ नहीं की जा ी है, अपरिरव =नीय और.ैर-विंहसक हो जा ा है।सिसविवल प्रविक्रया क े आदेश XXIII संविह ा क े ह आने वाले समझौ े क े मामले में, समझौ ा की श g पर अपने विववेक को ला.ू करना न्यायालय का क =व्य बन जा ा है।कु छ और क े विबना, पार्निटयों क े बी] मात्र समझौ े में न्यायालय का प्रभाव नहीं है।यह क े वल एक समझौ ा तिडक्री बन जा ा है जब संविह ा में प्रविक्रयाएं हो ी हैं। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
48. 1987 अति विनयम की ारा 19 क े ह पारिर एक पुरNकार समझौ ा का एक उत्पाद है।समझौ ा क े विबना, लोक अदाल अति कार क्षेत्र खो दे ी है। मामला न्यायविनण=यन क े लिलए न्यायालय में वापस जा ा है।समझौ ा करने क े लिलए और पार्निटयों की मंजूरी क े सार्थी लिलखने क े लिलए श g को कम विकया जा रहा है, यह एक अति विनण=य की सहारे में माना जा ा है जो विकसी और क े विबना तिड्रक्री में परिरवर्ति हो जा ा है।हम सो]ें.े विक 1987 अति विनयम की ारा 19 क े ह पारिर इस रह क े एक पुरNकार को अदाल क े एक पुरNकार क े बराबर माना जाना विव ायी इरादा नहीं हो सक ा है जो अति विनयम में परिरभाविष विकया.या है जैसा विक पहले से ही हमारे द्वारा नोट विकया.या है और अति विनयम क े ह बनाया.या है। ारा 28 क में न्यायालय क े एक पुरNकार को भी एक तिडक्री क े रूप में माना जा ा है।ऐसा पुरNकार विनष्पादन योग्य हो जा ा है।यह भी अपील योग्य है।अति विनयम क े भा. III में एक विनतिश्च योजना शाविमल है सिजसमें आवश्यक रूप से न्यायालय द्वारा विनण=य और मुआवजे पर पहुं]ना शाविमल है। यह वह है जो ारा 28 क को ला.ू करक े उसी अति सू]ना क े अ ीन दावे को दबाने वाले विकसी अन्य व्यवि[ क े लिलए आ ार बना सक ा है। हम इस प्रक ृ ति क े विकसी मामले में ारा 28 क क े अ ीन विदए.ए अति कार क े रूप में पुनर्निव रण क े आ ार क े रूप में 'अपविवत्र' समझौ े की संभावना से पूरी रह अनजान नहीं हो सक े। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk
49. इसलिलए, हम उमादेवी राजक ु मार ज्यूरे उपरो[ और वासुदेव उपरो[ में कना=टक उच्च न्यायालय क े विवद्व एकल न्याया ीश द्वारा उठाए.ए दृविYकोण को मंजूरी दें.े और मान े हैं विक लोक अदाल द्वारा 1987 अति विनयम की ारा (20) क े ह पारिर एक अति विनण=य ारा 28 क को ला.ू करने का आ ार नहीं हो सक ा है।
50. जहां क उत्तरदा ाओं का यह क = है विक 12.3.2016 क े पुरNकार को े सार्थी पढ़े.ए अति विनयम की ारा 18 क े भी र न्यायालय क े आदेश क े रूप में माना जा सक ा है, हम इस रह क े क = को Nवीकार नहीं कर सक े हैं।आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा 2003 में SCC ONLINE AP 21 उपरो[ में रिरपोट= विकए.ए मामले क े थ्यों क े विवपरी, सिजसे बॉम्बे हाईन्यायालय ने उमादेवी उपरो[ में इस Nकोर पर प्रति विष्ठ विकया है विक आंध्र प्रदेश से मामले में, संदभ= न्यायालय ने लोक अदाल क े समक्ष पक्षकारों क े बी] एक समझौ े क े आ ार पर एक पुरNकार पारिर विकया है, इस मामले में, 12.3.2016 का पुरNकार लोक अदाल द्वारा पारिर पुरNकार है। यह उच्च े विनण=य, उसक े समक्ष पक्षकारों क े मामले और विनण=य विदनांक 12.3.2016 की श g से NपY है।दूशरे शब्दों में, आक्षेविप आदेश क े ह LAR 6 (फ ेह मोहम्मद बनाम यूपी राज्य) में लोक अदाल को संदर्थिभ र्थीा जो विक अति रिर[ सिजला और सत्र न्याया ीश /FTC No. 2,.ौ म बौc न.र, यूपी है, इस प्रकार विदनांविक 12.03.2016 की काय=वाही सिजसे प्रत्यर्थिर्थीयों क े vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk द्वारा अवलंब लिलया जा ा है वह Nवयं में एक अति विनण=य है सिजसे 1987 अति विनयम की ारा 20 क े ह पारिर विकया.या र्थीा जो एक आदेश क े ह माना जा सक ा है।दूसरे शब्दों में, अति रिर[ सिजला एवं सत्र न्याया ीश लोक अदाल क े रूप में काय= कर रहे र्थीे।ऐसा ब भी है जब मं.ू राम में उच्च े विनण=य पर पक्षकारों द्वारा भरोसा विकया.या र्थीा और इसे अति विनण=य क े रूप में भी संदर्थिभ विकया.या है।वह अति विनयम क े भी र 'न्यायालय' क े रूप में मामले का विनN ारण नहीं करें.ें। इसे 1987 अति विनयम की ारा 20 और 21 क े भी र न्यायालय क े अति विनण=य क े रूप में भी नहीं माना जा सक ा है। 51.हमने अपीलक ा= क े मामले पर भी ध्यान विदया है विक मं.ू राम उपरो[ में उच्च न्यायालय का विनण=य, सिजसने दर को 297.50 रुपये प्रति व.=.ज पाया, ारा (4) क े ह अति सू]ना क े संबं में.ल र्थीा, जो हमारे समक्ष मामलों क े लिलए प्रासंवि.क है और यह विक एक समीक्षा याति]का भी दायर की.ई है और लंविब है।
52. सभी परिरस्मिNर्थीति यों और इस मामले क े थ्यों क े संबं में हम विनम्नलिललिख आदेश पारिर करना उति] समझ े हैंः vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk (1) अपील को अनुमति है। हम घोषणा कर े हैं विक अति विनयम की ारा 28 क क े अ ीन आवेदन लोक अदाल द्वारा 1987 अति विनयम की ारा 20 क े अ ीन पारिर अति विनण=य क े आ ार पर नहीं रखा जा सक ा है। आक्षेविप विनण=य अपाN विकए.ए हैं।संबंति ला. ों को पक्षकार Nवयं वहन करें। ………………………………….. न्यायमूर्ति [क े.एम. जोसेफ] ………………………………….. न्यायमूर्ति [पाविमविदघनटम श्री नरसिसम्हा] नई विदल्ली; 03 फरवरी, 2022. vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk