Kamla Devi v. Rajasthan State

Supreme Court of India · 11 Mar 2022 · 2022 INSC 299
M. R. Shah; B. R. Gavai
Criminal Appeal No 342 of 2022
2022 INSC 299
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court set aside the High Court's bail orders in a murder case, holding that bail must be granted only after proper consideration of the seriousness of the offence and prima facie evidence.

Full Text
Translation output
भारत का सर्वो च्च न्यायालय
आपराधि क अपीलीय क्षेत्राधि कार
आपराधि क अपील संख्या 342/2022
कमला देर्वोी ….. अपीलकता" (ओं)
बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य ....प्रत्यथ/(ओं)
साथ
आपराधि क अपील संख्या 343/2022
कमला देर्वोी ….. अपीलकता" (ओं)
बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य .... प्रत्यथ/ (ओं)
निनर्ण"य
नागरत्ना जे.
ये अपील अपीलकता", जो मृतक सोहन सिंसह की पत्नी हैं, ने राजस्थान उच्च
न्यायालय, जो पुर द्वारा पारिरत 9 सिसतंबर, 2019 और 17 अक्टूबर, 2019 क

आदेशों को चुनौती देते हुए दायर की हैं। एस.बी.निKनिमनल निर्वोनिर्वो जमानत आर्वोेदन
संख्या 10473/2019 और 11546/2019 में Kमशः दो अभिभयुक्तों, अथा"त्
निकशोर सिंसह उर्फ
" निकशन सिंसह, जो निक आपराधि क अपील संख्या 342/2022 में
प्रत्यथ/ हैं, और कालू सिंसह, जो निक आपराधि क अपील संख्या 343/2022 में
प्रत्यथ/ हैं, को जमानत दी गई है, सिजनक
े संबं में एर्फआईआर संख्या 229/2019
पुलिलस स्टेशन भीम, सिजला राजसमंद, राजस्थान में दज" हुई।
JUDGMENT

2. संक्षेप में तथ्य यह है निक अपीलकता" मृतक की पत्नी है, सिजसने 14 मई, 2019 को मृतक की गुमशुदगी की रिरपोट" दज" कराई थी, सिजसमें कहा गया था निक मृतक सोहन सिंसह, उम्र 48 र्वोर्ष", 13 मई 2019 को सर्वोाई सिंसह क े निर्वोर्वोाह समारोह में 2022 INSC 299 शानिमल होने क े लिलए अपने घर से निनकला था और अगली सुबह 2.00 बजे तक उसक े लौटने की उम्मीद थी। जब मृतक घर नहीं लौटा, तो अपीलकता" ने यह मान लिलया निक र्वोह सर्वोाई सिंसह क े घर पर रह सकता है। हालांनिक, जब उसने अगली सुबह पूछताछ की, तो सर्वोाई सिंसह ने उसे बताया निक मृतक निपछली रात ही शादी समारोह से निनकल गया था। अपीलकता" ने गुमशुदगी की रिरपोट" में आगे कहा निक उसे संदेह है निक प्रत्यथ/यों ने अपनी मां तेजी देर्वोी क े साथ निमलकर निकसी तरह से उसक े पधित को नुकसान पहुंचाया होगा।

3. यह निक प्रथम सूचना रिरपोट" संख्या 229/2019 निदनांनिकत 15 मई, 2019 मृतक क े पुत्र क े कहने पर दज" कराई गई थी, सिजसमें कहा गया निक मृतक अपने भतीजे सर्वोाई सिंसह क े निर्वोर्वोाह समारोह में शानिमल होकर अपने घर लौट रहा था। मृतक को अंधितम बार तीन अभिभयुक्तों, अथा"त् निकशोर सिंसह उर्फ " निकशन सिंसह, कालू सिंसह, जो निक यहाँ प्रत्यथ/ हैं और तेजी देर्वोी, जो निक प्रत्यथ/ अभिभयुक्त की माँ हैं, क े घर क े बाहर देखा गया था। राहगीरों ने मृतक क े पुत्र (प्राथ/) को बताया था निक उन्होंने मृतक की मौत की रात आरोपी व्यनिक्तयों को मृतक से झगड़ते देखा था। नाथ सिंसह ने भिशकायतकता" को सूधिचत निकया था निक उसने अभिभयुक्तों को उनक े घर क े बाहर मृतक क े साथ झगड़ते और बाद में मृतक को अपने घर में घसीटते हुए देखा था, सिजसमें उसक े साथ मारपीट की गई और उसकी हत्या कर दी गई। आरोपी ने मृतक क े शर्वो को घसीट कर पास क े क ु एं में र्फ ें क निदया।

4. 15 मई, 2019 को आयोसिजत पोस्टमॉट"म परीक्षा की रिरपोट" में दज" निकया गया निक मृतक की मृत्यु "एस्फिस्र्फस्फिक्सया और भिशरापरक जमार्वो क े कारर्ण कार्डिhयोपल्मोनरी अरेस्ट"क े परिरर्णामस्र्वोरूप हुई थी। रिरपोट" में आगे कहा गया है निक मृतक अपनी मृत्यु क े बाद hूब गया था और ऐसा लगता है निक मृतक की गद"न की हड्डी टूट गई है। मृत्यु क े कारर्ण क े रूप में अंधितम रिरपोट" आरधिक्षत थी, सिजसे र्फोरेंसिसक निर्वोज्ञान प्रयोगशाला की रिरपोट" क े आ ार पर अंधितम रूप निदया जाना था।

5. पुलिलस द्वारा निदनांक 9 जुलाई, 2019 को तीन अभिभयुक्तों क े निर्वोरूद्ध भारतीय दंh संनिहता, 1860 (संक्षेप में, "आईपीसी") की ारा 302, 201 एर्वों 34 क े तहत आरोप पत्र सिजला न्याया ीश, राजसमंद, राजस्थान क े न्यायालय क े समक्ष प्रस्तुत निकया गया। चाज"शीट में दज" निकया गया है निक घटना की रात, मृतक ने लगभग 2.00 बजे तेजी देर्वोी का दरर्वोाजा खटखटाया था। उसने अपने बेटों कालू सिंसह और निकशन सिंसह (प्रत्यथ/ आरोपीगर्ण) को इस बारे में सूधिचत निकया। प्रत्यथ/ अभिभयुक्त जो अपने घर की छत पर थे, नीचे क ू द गए और मृतक पर हत्या करने क े इरादे से लानिpयों से हमला निकया। मृतक क े मारे जाने क े बाद तीनों आरोनिपयों ने मृतक क े शर्वो को घसीट कर पास क े एक क ें क निदया । मामला अधितरिरक्त सत्र न्याया ीश, राजसमंद, राजस्थान की अदालत में निर्वोचारर्ण क े लिलए सुपुद" निकया गया।

6. प्रत्यथ/ अभिभयुक्तों को प्राथनिमकी संख्या 229/2019 क े संबं में 23 मई, 2019 को निगरफ्तार निकया गया और उन्हें न्याधियक निहरासत में भेज निदया गया। उच्च न्यायालय द्वारा आक्षेनिपत निनर्ण"यों द्वारा जमानत निदए जाने से पहले र्वोे लगभग चार महीने की अर्वोधि क े लिलए न्याधियक निहरासत में रहे।

7. प्रत्यथ/यों ने अधितरिरक्त सत्र न्याया ीश, राजसमंद, राजस्थान की अदालत क े समक्ष दंh प्रनिKया संनिहता, 1973 की ारा 439 (संक्षेप में, "द.प्र.सं.") क े तहत जमानत क े लिलए अलग-अलग आर्वोेदन प्रस्तुत निकये। आपराधि क अपील संख्या 342/2022 में अभिभयुक्त निकशन सिंसह द्वारा संदर्भिभत जमानत आर्वोेदन कभिथत अपरा ों की गंभीरता और अभिभयुक्तों क े अपरा क े संबं में रिरकॉh" पर मौजूद प्रथम दृष्टया साक्ष्य को ध्यान में रखते हुए निदनांक 09 जुलाई, 2019 क े एक आदेश द्वारा खारिरज कर निदया गया। इसक े बाद, आपराधि क अपील संख्या 343/2022 में अभिभयुक्त कालू सिंसह द्वारा दायर जमानत याधिचका को भी 05 सिसतंबर, 2019 क े एक आदेश द्वारा खारिरज कर निदया गया था।

8. प्रत्यथ/यों ने उच्च न्यायालय क े समक्ष अलग-अलग जमानत याधिचकाएं दायर कीं और निदनांक 9 सिसतंबर, 2019 और 17 अक्टूबर, 2019 क े आक्षेनिपत आदेशों द्वारा, उच्च न्यायालय ने उन्हें 2019 की प्राथनिमकी संख्या 229 से उत्पन्न मामले में जमानत पर छोड़ निदया है। प्रत्यथ/ अभिभयुक्त को जमानत निदए जाने से व्यभिथत होकर, मृतक की अपीलकता" पत्नी ने इस न्यायालय क े समक्ष यह अपील की है।

9. हमने आपराधि क अपील संख्या 342/2022 में अपीलकता" की ओर से उपस्फिस्थत निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता श्री एच.hी. थानर्वोी और दूसरे प्रत्यथ/ क े निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता श्री. मेहुल एम. गुप्ता को सुना और रिरकॉh" पर मौजूद सामग्री का अर्वोलोकन निकया।

10. अपीलकता" क े निर्वोद्वान र्वोकील ने कथन निकया निक उच्च न्यायालय ने निर्वोर्वोेकपूर्ण" तरीक े से अभिभयुक्तों को जमानत देने क े लिलए अपनी निर्वोर्वोेका ीन शनिक्त का उधिचत उपयोग नहीं निकया है। यह निक उच्च न्यायालय, आक्षेनिपत आदेशों में प्रत्यथ/ अभिभयुक्तों क े निर्वोरुद्ध आरोनिपत अपरा ों की गंभीरता पर और सिजस K ू र तरीक े से अपरा निकया गया और मृतक क े शरीर को हत्या क े हभिथयार क े साथ एक क ें क कर छ ु पाने का प्रयास निकया गया, इन बातों पर निर्वोचार करने में निर्वोर्फल रहा।

11. यह आग्रह निकया गया था निक परीक्षर्ण अभी शुरू हुआ है और तेरह गर्वोाहों की जांच की जानी बाकी है; इसलिलए, यह सुनिनधि•त करने क े लिलए अभिभयुक्तों को निहरासत में रहना अनिनर्वोाय" है निक र्वोे र्फरार न हों या सबूतों क े साथ छेड़छाड़ न करें या मृतक और/या गर्वोाहों क े परिरर्वोार को मकी न दें, इससे भी अधि क, क्योंनिक आरोपी ने पहले मृतक क े शरीर को, हत्या में प्रयुक्त लानिpयों क े साथ, एक क ें क कर, सबूत निमटाने का प्रयास निकया था।

12. उच्च न्यायालय द्वारा जमानत निदए जाने क े बाद, आरोपी निकशन सिंसह ने अपीलकता" को क े स नंबर 299/2019 क े संबं में आपराधि क मुकदमा चलाने क े गंभीर परिरर्णाम भुगतने की मकी दी थी निक इस संबं में सीआरपीसी की ारा 107 और 116(3) क े तहत एक भिशकायत भी दज" की गई है।

13. अपीलकता" क े निर्वोद्वान र्वोकील क े अनुसार, उच्च न्यायालय ने प्रत्यथ/ अभिभयुक्त को जमानत देने क े लिलए कारर्ण नहीं बताए हैं और निबना निकसी तक " क े आ ार पर एक निKस्फि€टक आदेश द्वारा जमानत दी गई है, इस तथ्य क े बार्वोजूद निक अभिभयुक्त, कभिथत अपरा ों क े लिलए दोर्षी पाए जाने पर, आजीर्वोन कारार्वोास की सजा दी जा सकती है।

14. अपीलकता" क े निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने अपनी दलीलों को पुष्ट करने क े लिलए इस न्यायालय क े निनम्नलिललिखत निनर्ण"यों पर निर्वोश्वास निकया: i) कल्यार्ण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन उर्फ " प€पू यादर्वो और अन्य- [(2004) 7 SCC 528]में, इस न्यायालय ने माना निक हालांनिक यह स्थानिपत है निक जमानत अज/ पर निर्वोचार करने र्वोाली अदालत सबूतों की निर्वोस्तृत जांच और मामले की खूनिबयों पर निर्वोस्तृत चचा" आर्वोश्यक नहीं है, न्यायालय को प्रथम दृष्टया ज़मानत देने क े औधिचत्य क े कारर्णों को इंनिगत करने की आर्वोश्यकता है। ii) ऐश मोहम्मद बनाम भिशर्वो राज सिंसह @ लल्ला बहू और अन्य- [(2012) 9 SCC 446] का संदभ" निदया गया था, यह तक " देने क े लिलए निक जमानत की मांग करने र्वोाले अभिभयुक्त द्वारा निहरासत की अर्वोधि, जमानत क े लिलए आर्वोेदन का निनर्ण"य करते समय निर्वोचार निकया जाने र्वोाला एक प्रासंनिगक कारक था। यह निक मौजूदा मामले में, अभिभयुक्तों को जमानत पर रिरहा होने से बमुस्फिश्कल चार महीने पहले निहरासत में रखा गया था और इसलिलए, अभिभयुक्तों को जमानत देने का आदेश कानून की नजर में मान्य नहीं है।

15. पूर्वो क्त मामले में, इस न्यायालय ने कहा निक एक अदालत को जमानत देने से पहले उन कारकों पर निर्वोचार करना चानिहए, सिजनमें सामासिजक सरोकार भी शानिमल है, जो जमानत देने को न्यायोधिचत pहराते हैं । (i) सीबीआई बनाम अमरमभिर्ण नित्रपाpी क े माध्यम से राज्य में - [(2005) 8 एससीसी 21],इस न्यायालय ने माना निक एक अभिभयुक्त को जमानत देने र्वोाली अदालत को अपना मस्फिस्तष्क लगाना चानिहए और रिरकॉh" में योग्यता और सबूत पर जाना चानिहए और निन ा"रिरत करना चानिहए निक क्या अभिभयुक्त क े लिखलार्फ एक प्रथम दृष्टया मामला स्थानिपत निकया गया है। यह माना गया निक अपरा की गंभीरता और महत्र्वो भी एक प्रासंनिगक निर्वोचार है। इस तरह की निट€पभिर्णयों क े आ ार पर, इस न्यायालय ने उच्च न्यायालय क े एक आदेश को रद्द कर निदया, सिजसमें अभिभयुक्त को जमानत दी गई थी, सिजसमें अभिभयोजन पक्ष द्वारा रखी गई सामग्री पर कोई ध्यान नहीं निदया गया था, सिजसने संक े त निदया निक अभिभयुक्तों ने हर महत्र्वोपूर्ण" समय पर, जांच क े दौरान हस्तक्षेप करने, गर्वोाहों क े साथ छेड़छाड़ करने, सबूत गढ़ने, hराने या जांच अधि कारिरयों क े रास्ते में बा ा उत्पन्न करने और मामले को पटरी से उतारने की कोभिशश की थी।

16. उपरोक्त संदभ" में, श्री एच.hी. थानर्वोी, अपीलकता" क े र्वोकील ने तक " निदया निक यह अत्यधि क संभार्वोना थी निक अभिभयुक्तों को, यनिद उनक े जमानत बांh को रद्द करने पर निहरासत में नहीं भेजा जाता है, तो जांच में हस्तक्षेप करने की संभार्वोना है, र्फरार हो सकते हैं या यहां तक निक अपीलकता" और मुखनिबर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह भी आग्रह निकया गया निक प्रत्यथ/ अभिभयुक्तों को जमानत देना कानून क े स्थानिपत सिसद्धांतों और इस न्यायालय क े निनर्ण"यों क े निर्वोपरीत था। मृतक की अपीलकता" पत्नी की ओर से यह निनर्वोेदन निकया गया था निक आक्षेनिपत आदेशों को अपास्त करते हुए इन अपीलों को स्र्वोीकार निकया जार्वोे।

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17. इसक े निर्वोपरीत, श्री मेहुल एम. गुप्ता, आपराधि क अपील संख्या 342/2022 में प्रत्यथ/ अभिभयुक्त क े निर्वोद्वान र्वोकील ने तक " निदये निक आक्षेनिपत आदेश इस न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप क े लिलए आर्वोश्यक निकसी भी दुब"लता से ग्रस्त नहीं हैं। अपीलकता" और उसक े बेटे, मुखनिबर ने आरोपी को झूpा र्फ ं साने क े लिलए घटनाओं का एक असत्य संस्करर्ण सुनाया है।

18. मृतक की निदनांक 15 मई, 2019 की पोस्टमॉट"म रिरपोट" की सामग्री का उल्लेख करते हुए, यह तक " निदया गया निक मृतक की मृत्यु अचानक कार्डिhयो पल्मोनरी अरेस्ट से पीनिड़त होने क े कारर्ण हुई थी और इसलिलए, मृतक की मौत क े लिलए अभिभयुक्तों द्वारा निकए गए हमले को सिजम्मेदार नहीं pहराया जा सकता है। यह भी कहा गया निक चूंनिक मृत्यु क े कारर्ण क े बारे में अंधितम रिरपोट" आरधिक्षत थी और र्फोरेंसिसक प्रयोगशाला की रिरपोट" क े आ ार पर इसे अंधितम रूप निदया जाना था, इसलिलए यह निनष्कर्ष" निनकालना जल्दबाजी होगी निक आरोपीगर्ण की मृतक की मौत में कोई भूनिमका थी।

19. यह आरोप निक आरोपी निकशन सिंसह ने जमानत पर रिरहा होने क े बाद अपीलकता" को मकी दी थी, का भी खंhन निकया गया है। इस संबं में यह कथन निकया गया है निक इस तरह क े आरोप और अपीलकता" द्वारा इस तरह क े आरोप क े संबं में दज" की गई भिशकायत क े र्वोल आरोपी को झूpा र्फ ं साने का प्रयास मात्र है।

20. इसक े बाद यह आग्रह निकया गया निक प्रारंभिभक चरर्ण में उच्च न्यायालय को मामले की योग्यता और रिरकॉh" पर साक्ष्य क े रूप में एक निर्वोस्तृत चचा" करने की आर्वोश्यकता नहीं है। इस तरह की कर्वोायद, अगर उच्च न्यायालय द्वारा जमानत अज/ पर र्फ ै सला करते समय की जाती है, तो इससे निनष्पक्ष सुनर्वोाई पर प्रधितक ू ल प्रभार्वो पड़ेगा। आरोनिपयों का कोई आपराधि क इधितहास नहीं है और र्वोे मामले की जांच में सहयोग कर रहे हैं। इसलिलए, अभिभयुक्तों को जमानत देने क े आक्षेनिपत आदेश में इस न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप की आर्वोश्यकता नहीं है।

21. श्री एच.hी. थानर्वोी, अपीलकता" क े निर्वोद्वान र्वोकील क े इस तक " को ध्यान में रखते हुए, निक उच्च न्यायालय क े निर्वोर्वोानिदत आदेश सिजसक े द्वारा प्रत्यथ/ अभिभयुक्तों को जमानत दी गई थी, निकसी भी तक " से रनिहत हैं और ऐसे आदेश आकस्फिस्मक और गूढ़ हैं, हम यहां उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत निदनांक 9 सिसतंबर, 2019 और 17 अक्टूबर, 2019 क े निर्वोर्वोानिदत आदेशों क े उन अंशों को निनकालते हैं, जो जमानत देने क े लिलए उच्च न्यायालय क े "तक " "को दज" करते हैं: आक्षेनिपत आदेश निदनांक 09 सिसतम्बर, 2019 "मामले क े तथ्यों और परिरस्फिस्थधितयों की समग्रता क े संबं में, मामले की योग्यता पर कोई राय व्यक्त निकए निबना, मैं ारा 439 Cr.P.C क े तहत आरोपी याधिचकाकता" को जमानत देना उधिचत और सही समझता हूं। तदनुसार, ारा 439 Cr.P.C. क े तहत दायर इस जमानत याधिचका को स्र्वोीकार निकया जाता है और यह निनद“श निदया जाता है निक याधिचकाकता" निकशोर सिंसह @ निकशन सिंसह पुत्र श्री hूंगर सिंसह रार्वोत को पुलिलस स्टेशन-भीम, सिजला-राजसमंद की प्राथनिमकी संख्या 229/2019 क े संबं में जमानत पर रिरहा निकया जाए। बशत“ निक र्वोह 50,000 रुपये की राभिश में एक व्यनिक्तगत मुचलका निनष्पानिदत करता है / दो ध्र्वोनिन और सॉल्र्वोेंट ज़मानत क े साथ रु. 25,000/ प्रत्येक निर्वोद्वान निर्वोचारर्ण न्यायालय की संतुनिष्ट क े लिलए उस कोट" क े समक्ष सुनर्वोाई की प्रत्येक धितभिथ पर उसकी उपस्फिस्थधित क े लिलए और जब भी परीक्षर्ण पूरा होने तक ऐसा करने क े लिलए कहा जाए।" आक्षेनिपत आदेश निदनांक 17 अक्टूबर, 2019 "मामले क े तथ्यों और परिरस्फिस्थधितयों की समग्रता क े संबं में, मामले की योग्यता पर कोई राय व्यक्त निकए निबना, मैं ारा 439 Cr.P.C क े तहत आरोपी याधिचकाकता" को जमानत देना उधिचत और सही समझता हूं। तदनुसार, ारा 439 Cr.P.C. क े तहत दायर इस जमानत याधिचका को स्र्वोीकार निकया जाता है और यह निनद“श निदया जाता है निक याधिचकाकता" कालू सिंसह पुत्र hूंगर सिंसह रार्वोत को पुलिलस स्टेशन भीम, सिजला राजसमंद की प्राथनिमकी संख्या 229/2019 क े संबं में जमानत पर रिरहा निकया जाए। बशत“ निक र्वोह 50,000 रुपये की राभिश में एक व्यनिक्तगत मुचलका निनष्पानिदत करता है 25,000 रुपये की दो pोस और सॉल्र्वोेंट ज़मानत क े साथ/प्रत्येक निर्वोचारर्ण न्यायालय की संतुनिष्ट क े लिलए सुनर्वोाई की प्रत्येक तारीख पर उस अदालत क े समक्ष अपनी उपस्फिस्थधित क े लिलए और जब भी परीक्षर्ण पूरा होने तक ऐसा करने क े लिलए कहा जाए।"

22. इस अदालत ने कई मौकों पर एक जमानत अज/ का र्फ ै सला करते समय एक अदालत द्वारा निर्वोचार निकए जाने र्वोाले कारकों पर चचा" की है। जमानत देने का र्फ ै सला करते समय सिजन प्राथनिमक बातों को ध्यान में रखा जाना चानिहए र्वोे हैं: (i) अपरा की गंभीरता; (ii) अभिभयुक्त क े न्याय से भागने की संभार्वोना; (iii) अभिभयोजन पक्ष क े गर्वोाहों पर अभिभयुक्त की रिरहाई का प्रभार्वो; (iv) अभिभयुक्त द्वारा साक्ष्य क े साथ छेड़छाड़ की संभार्वोना हालांनिक ऐसी सूची संपूर्ण" नहीं है। यह कहा जा सकता है निक यनिद कोई न्यायालय जमानत आर्वोेदन पर निनर्ण"य लेने में ऐसे कारकों को ध्यान में रखता है, तो यह निनष्कर्ष" निनकाला जा सकता है निक यह निनर्ण"य उसक े निर्वोर्वोेक क े निर्वोर्वोेकपूर्ण" प्रयोग का परिरर्णाम है, गुधिhकांत नरसिसम्हुलु और अन्य द्वारा बनाम लोक अभिभयोजक, आंध्र प्रदेश का उच्च न्यायालय [(1978) 1 एससीसी 240]; प्रह्लाद सिंसह भाटी बनाम निदल्ली की एनसीटी और अन्य। - [(2001) 4 एससीसी 280; अनिनल क ु मार यादर्वो बनाम राज्य (एनसीटी ऑर्फ निदल्ली) [(2018) 12 एससीसी 129].

23. इस न्यायालय ने यह भी र्फ ै सला निदया है निक यांनित्रक तरीक े से निबना कारर्ण दज" निकए जमानत देने का आदेश, मस्फिस्तष्क क े गैर-अनुप्रयोग क े पाप से पीनिड़त होगा, इसे अर्वोै बना देगा, राम गोनिर्वोन्द उपाध्याय बनाम सुदश"न सिंसह [(2002) 3 एससीसी 598; कल्यार्ण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन (सुप्रा); प्रशांत क ु मार सरकार बनाम आशीर्ष चटज/ - [(2010) 14 एससीसी 496]; रमेश भर्वोन राpौड़ बनाम र्वोोशनभाई हीराभाई मकर्वोाना (कोली) र्वो अन्य। - [(2021) 6 एससीसी 230; बृजमभिर्ण देर्वोी बनाम प€पू क ु मार और अन्य। - निKनिमनल अपील नंबर 1663 ऑर्फ 2021 [2021 एससीसी ऑनलाइन एससी 1280].

24. मनोज क ु मार खोखर बनाम राजस्थान राज्य और अन्य, 2022 की आपराधि क अपील संख्या 36 [2022 एससीसी ऑनलाइन एससी 30] और जयबुनिनशा बनाम मेहरबान और अन्य में इसी खंhपीp क े हालिलया र्फ ै सलों का भी संदभ" लिलया जा सकता है। 2022 की आपराधि क अपील 77 [2022 एससीसी ऑनलाइन एससी 58], सिजसमें क े स कानून की निर्वोस्तृत चचा" में संलग्न होने पर उपरोक्त का हर्वोाला निदया गया और निर्वोधि र्वोत रूप से यह स्र्वोीकार करने क े बाद निक व्यनिक्त की स्र्वोतंत्रता एक अमूल्य अधि कार है, हमने माना है निक एक अभिभयुक्त को जमानत देने का आदेश, यनिद एक आकस्फिस्मक तरीक े से पारिरत निकया गया है, तो उसक े तक " जो जमानत देने को मान्य करेगा, भारत क े संनिर्वो ान क े अनुच्छेद 136 क े तहत अधि कार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए इस न्यायालय द्वारा रद्द निकए जाने क े लिलए उत्तरदायी है।

25. लैनिटन कहार्वोत "सेसेंट राशन लेनिगस सेसेट इ€सा लेक्स"का अथ" है "कारर्ण कानून की आत्मा है, और जब निकसी निर्वोशेर्ष कानून का कारर्ण समाप्त हो जाता है, तो कानून भी समाप्त हो जाता है,"भी उपयुक्त है।

26. हमने उपरोक्त निर्वोर्वोानिदत आदेश क े प्रासंनिगक अंशों को निनकाला है। शुरुआत में, हम देखते हैं निक निनकाले गए निहस्से जमानत देते समय उच्च न्यायालय क े "तक " "का निहस्सा बनने र्वोाले निहस्से हैं। जैसा निक पूर्वो क्त निनर्ण"यों से पता चलता है, न्यायालय क े लिलए जमानत देते समय निर्वोस्तृत कारर्ण देना आर्वोश्यक नहीं है, निर्वोशेर्ष रूप से तब जब मामला प्रारंभिभक चरर्ण में हो और अभिभयुक्तों द्वारा निकए गए अपरा ों क े आरोपों को इस तरह स्पष्ट नहीं निकया गया हो। यह आभास देने क े लिलए निर्वोस्तृत निर्वोर्वोरर्ण दज" नहीं निकया जा सकता है निक यह मामला ऐसा है सिजसक े परिरर्णामस्र्वोरूप जमानत देने क े लिलए एक आर्वोेदन पर एक आदेश पारिरत करते समय दोर्षसिसधिद्ध या, इसक े निर्वोपरीत, बरी हो जाएगी। हालाँनिक, जमानत अज/ पर निनर्ण"य लेने र्वोाला न्यायालय अपने निनर्ण"य को मामले क े भौधितक पहलुओं जैसे अभिभयुक्तों क े लिखलार्फ लगाए गए आरोपों से पूरी तरह से अलग नहीं कर सकता है; सजा की गंभीरता यनिद आरोप उधिचत संदेह से परे सानिबत होते हैं सिजसक े परिरर्णामस्र्वोरूप दोर्षसिसधिद्ध होती है; अभिभयुक्तों द्वारा प्रभानिर्वोत निकए जा रहे गर्वोाहों की उधिचत आशंका; सबूतों से छेड़छाड़; अभिभयोजन पक्ष क े मामले में तुच्छता; अभिभयुक्तों क े आपराधि क पूर्वो"र्वोृत्त; और आरोपी क े लिखलार्फ आरोप क े समथ"न में न्यायालय की प्रथम दृष्टया संतुनिष्ट।

27. उपरोक्त चचा" क े मद्देनजर, अब हम र्वोत"मान मामले क े तथ्यों पर निर्वोचार करेंगे। उत्तरदाताओं क े आरोपों क े साथ-साथ बार में उpाए गए निर्वोर्वोादों को ऊपर र्वोर्भिर्णत निकया गया है। इस पर निर्वोचार करने पर, मामले क े निनम्नलिललिखत पहलू सामने आएंगे: a) यहां अपीलकता" क े पधित सोहन सिंसह की हत्या क े संबं में आरोपी प्रत्यथ/ क े लिखलार्फ भा.द.सं. की ारा 302, 201 और 34 क े तहत आरोप हैं। अभिभयुक्तों क े निर्वोरुद्ध आरोनिपत अपरा गंभीर प्रक ृ धित क े हैं। b) अभिभयुक्तों क े लिखलार्फ आरोप यह है निक उन्होंने मृतक पर हत्या का अपरा निकया और मृतक क े शर्वो को गुप्त रूप से निpकाने लगाने का प्रयास निकया और लानिpयां सिजससे हमला निकया गया, उसी को पास क े एक क ें क कर, तानिक अपरा को छ ु पाया जा सक े । c) अपीलकता" का यह भी मामला है निक आरोपी निकशन सिंसह की जमानत पर रिरहाई क े बाद, उसने अपीलकता" को एर्फ.आई.आर. संख्या 299/2019 क े संबं में आपराधि क मुकदमे को आगे बढ़ाने क े लिलए गंभीर परिरर्णाम भुगतने की मकी दी थी। इस संबं में निकशन सिंसह क े लिखलार्फ भिशकायत भी दज" कराई गई थी। इस प्रकार, यनिद जमानत पर है, तो अभिभयुक्त द्वारा गर्वोाहों को मकाने या अन्यथा प्रभानिर्वोत करने की संभार्वोना से इंकार नहीं निकया जा सकता है। d) इस आशय क े अभिभयुक्तों की ओर से निदए गए तक " क े संबं में निक मृतक की मृत्यु अचानक कार्डिhयो पल्मोनरी अरेस्ट से पीनिड़त होने क े कारर्ण हुई थी और इसलिलए, मृतक की मृत्यु को आरोपी द्वारा निकए गए हमले क े लिलए सिजम्मेदार नहीं pहराया जा सकता है, हम देखते हैं, मामले क े गुर्ण-दोर्ष पर कोई राय व्यक्त नहीं करते हुए, निक पोस्टमॉट"म रिरपोट" जब पूरी तरह से निर्वोचार की जाती है, तो इस तथ्य का संक े त निमलता है निक मृतक की हत्या की गई थी। यद्यनिप मृत्यु का कारर्ण "एस्फिस्र्फस्फिक्सया और भिशरापरक जमार्वो क े कारर्ण कार्डिhयो पल्मोनरी अरेस्ट"क े रूप में दज" निकया गया है, लेनिकन मृतक की गले की हड्डी फ्र ै क्चर हो गई थी। इसलिलए, हम यह मानने क े इच्छ ु क नहीं हैं निक अभिभयोजन पक्ष ने अभिभयुक्तों क े अपरा क े रूप में प्रथम दृष्टया मामला स्थानिपत नहीं निकया है। इसलिलए, हम प्रथम दृष्टया यह नहीं मानते हैं निक अभिभयुक्तों को र्फ ं साने क े उद्देश्य से प्राथनिमकी दज" की गई थी। e) अधितरिरक्त सत्र न्याया ीश, राजसमंद, राजस्थान क े समक्ष सी.आर.पी.सी. की ारा 439 क े तहत प्रत्यथ/-आरोपी द्वारा दायर जमानत आर्वोेदन कभिथत अपरा ों की गंभीरता को देखते हुए खारिरज कर निदए गए थे। f) राजस्थान क े उच्च न्यायालय ने निदनांक 9 सिसतंबर, 2019 और 17 अक्टूबर, 2019 क े निर्वोर्वोानिदत आदेशों में जमानत देने क े संदभ" में मामले क े पूर्वो क्त पहलुओं पर निर्वोचार नहीं निकया है।

28. उपरोक्त र्वोर्भिर्णत कानून क े आलोक में र्वोत"मान मामले क े उपरोक्त तथ्यों पर निर्वोचार करने क े बाद, उनक े लिखलार्फ आरोपों की गंभीरता को देखते हुए हमें नहीं लगता निक यह मामला प्रधितर्वोानिदयों को जमानत देने क े लिलए एक उपयुक्त मामला है,

29. जैसा निक गुरचरर्ण सिंसह बनाम राज्य (निदल्ली प्रशासन) [1978 सीआरआईएलजे 129] में उल्लेख निकया गया है, जब एक अभिभयुक्त को जमानत दी गई है, तो राज्य ऐसी जमानत देने क े बाद नई परिरस्फिस्थधितयां उत्पन्न होने पर उच्च न्यायालय का दरर्वोाजा खटखटा सकता है। सी.आर.पी.सी. की ारा 439 (2) क े तहत जमानत रद्द करने की मांग की। हालाँनिक, यनिद ज़मानत निदए जाने क े बाद से कोई नई परिरस्फिस्थधित उत्पन्न नहीं हुई है, तो राज्य इस आ ार पर ज़मानत देने क े आदेश क े लिखलार्फ अपील कर सकता है निक यह निर्वोक ृ त या अर्वोै है या भौधितक पहलुओं की अनदेखी करक े निकया गया है जो आरोपी क े लिखलार्फ एक प्रथम दृष्टया मामला स्थानिपत करता है। आ•य"जनक रूप से, राजस्थान राज्य ने यहां निदए गए आदेशों क े लिखलार्फ कोई अपील दायर नहीं की है। जबनिक हम इस तथ्य से अर्वोगत हैं निक जमानत देने पर निर्वोचार करने र्वोाले न्यायालय को मामले की योग्यता पर निर्वोस्तृत चचा" में शानिमल नहीं होना चानिहए, हमारा मानना है निक उच्च न्यायालय ने निर्वोर्वोानिदत आदेश पारिरत करते समय मामले का एकल भौधितक पहलू एक भी ध्यान में नहीं रखा है। उच्च न्यायालय ने बहुत ही गूढ़ और आकस्फिस्मक आदेश पारिरत करते हुए अभिभयुक्तों को जमानत दे दी है, जो निक बहुत ही pोस तक " है। हम पाते हैं निक प्रत्यथ/ अभिभयुक्तों द्वारा दायर जमानत क े आर्वोेदनों को अनुमधित देकर उच्च न्यायालय सही नहीं था। इसलिलए 9 सिसतंबर, 2019 और 17 अक्टूबर, 2019 क े निर्वोर्वोानिदत आदेश को रद्द निकया जाता है। अपीलें स्र्वोीकार की जाती है।

30. प्रत्यथ/गर्ण जमानत पर हैं। उनक े जमानत बांh रद्द निकए जाते हैं और उन्हें आज से दो सप्ताह की अर्वोधि क े भीतर संबंधि त जेल अधि कारिरयों क े समक्ष आत्मसमप"र्ण करने का निनद“श निदया जाता है। (एम.आर. शाह) (बी.र्वोी. नागरत्ना) नयी निदल्ली; 11 माच", 2022 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.