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भार का उच्च म न्यायालय
आपराति क अपीलीय क्षेत्राति कार
आपराति क अपील संख्या 592/2022
(एसएलपी (सीआरएल) संख्या 1806/2021 से उत्पन्न)
मफ लाल और अन्य अपीलक ा, (गण)
बनाम
राजस्थान राज्य प्रति वादी (गण)
निनण,य
निवक्रम नाथ, जे.
JUDGMENT
1. अनुमति दी गई।
2. यह अपील राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर पीठ द्वारा एकल पीठ आपराति क निवनिव (याति@का) संख्या 591/2020 में निदनांक 09.12.2020 को पारिर निनण,य और आदेश की सत्य ा पर सवाल उठा ी है, जिजसमें उच्च न्यायालय ने निदनांक 23.05.2005 को फ ु लेरा पुलिलस स्टेशन, जिजला जयपुर में दज, प्रथम सू@ना रिरपोट, संख्या 45 को रद्द करने क े लिलए दंड प्रनिक्रया संनिह ा, 1973 की ारा 482 क े ह प्रस् ु याति@का खारिरज कर दी थी।
3. इस अपील को उत्पन्न करने वाले प्रासंनिगक थ्य यह हैं निक प्रहलाद दान नामक व्यनिT ने एक लिललिख शिशकाय दी थी जिजसमें कहा गया था निक उसकी नाबालिलग बेटी का अपीलक ा, नं. 1 द्वारा निदनांक 22.05.2005 को लगभग 2:30 बजे दोपहर अपहरण कर लिलया गया था। कशिथ शिशकाय पर एफआईआर संख्या 45/2005 पुलिलस स्टेशन फ ु लेरा, जिजला जयपुर में भा.दं.सं. की ारा 363 और 366 क े ह दज, की गई थी। जां@ शुरू की गई, लेनिकन लाप ा लड़की का प ा नहीं @ल पाया। जब अपहरण की गई लड़की और आरोपी का प ा नहीं @ल सका, ब जां@ अति कारी ने, शिशकाय क ा, और 2022 INSC 350 अन्य लोगों क े बयान दज, करने क े बाद, उपरोT ाराओं क े ह अपीलक ा, नं. 1 क े लिखलाफ एक आरोप पत्र पेश निकया और न्यायालय से द.प्र.सं. की ारा 299 क े ह काय,वाही शुरू करने का अनुरो निकया।
4. जां@ अति कारी ने अपीलक ा, क े निप ा, अथा, ् बन्ना लाल क े लिखलाफ भी भार ीय दंड संनिह ा की ारा 363, 366 और 120 बी क े ह आरोप पत्र पेश निकया। कशिथ आरोप पत्र क े आ ार पर बन्ना लाल पर मुकदमा @लाया गया और उसे निनयनिम आपराति क मामला संख्या 23/2010 क े रुप में दज, निकया गया। अति रिरT जिजला और सत्र न्याया ीश, सांभर लेक, जिजला जयपुर अपने निनण,य और आदेश निदनांनिक 03.09.2011 क े माध्यम से इस निनष्कर्ष, पर पहुं@े निक शिशकाय क ा, की बेटी क े कशिथ अपहरण में आरोपी बन्ना लाल क े शानिमल होने क े लिखलाफ आरोप सानिब नहीं निकए जा सक े, बल्किbक उन्होंने स्वयं अपने बेटे और अपहृ की लाश क े लिलए प्रयास निकए थे। दनुसार, बन्ना लाल को सभी आरोपों से बरी कर निदया गया।
5. वर्ष, 2020 में अपीलक ा, ने अपहृ सीमा परेवा क े साथ राजस्थान उच्च न्यायालय में द.प्र.सं. की ारा 482 क े ह एक याति@का दायर की, जिजसे एकल पीठ आपराति क निवनिव याति@का संख्या 591/2020 क े रूप में दज, निकया गया था, जिजसमें एफआईआर संख्या 45/2005 और उससे उत्पन्न सभी काय,वानिहयों को रद्द करने का अनुरो निकया गया था। कशिथ याति@का में यह कहा गया निक अपीलाथd और अपहृ ा (क्रमशः अपीलाथd नं. 1 और 2) एक-दूसरे को अच्छी रह से जान े थे और उनक े बी@ प्रेम संबं भी थे, जो अपहृ क े निप ा को स्वीकाय, नहीं था। परिरल्किस्थति यों से निववश होकर दोनों वर्ष, 2005 में अपने परिरवारों से अलग हो गए और बाद में 25 निदसंबर 2006 को दोनों ने शादी कर ली। आगे यह भी कहा गया निक द.प्र.सं. की ारा 173(2) क े ह रिरपोट, पेश की गई थी और जां@ अति कारी द्वारा द.प्र.सं. की ारा 299 लागू करने का अनुरो निकया गया था । अपीलक ा, क े लिखलाफ यह मामला अभी भी निव@ारणन्यायालय क े समक्ष लंनिब है और आवश्यक काय,वाही की जा रही हैं। आगे यह भी कहा गया निक लगभग 15 साल बी @ुक े हैं, अपीलक ा, और अपहृ सुखी निववानिह जीवन जी रहे थे और उन्हें निदनांक 27.02.2014 को एक पुत्र भी हुआ है। आगे यह भी कहा गया है निक अपहृ को कभी भी प्र ानिड़ या अगवा नहीं निकया गया था, बल्किbक उसने अपने निप ा द्वारा निनर्मिम अनिप्रय और परेशान करने वाली परिरल्किस्थति यों क े कारण अपनी मजd से अपना पै ृक घर छोड़ निदया था। यह भी कहा गया है निक जब उसने अपनी इच्छा से अपना घर छोड़ा ब अपहृ ा 17 वर्ष, की थी और अपहृ का अपने परिरवार से अलग होने में अपीलाथd की कोई भूनिमका नहीं थी ।
6. उच्च न्यायालय ने यद्यनिप ऐसे सभी थ्यों को अशिभलिललिख निकया है, परं ु ऐसा प्र ी हो ा है न्यायालय इस बा से प्रभानिव हुआ है निक जब उसने अपना घर छोड़ा था ब अपहृ ा नाबालिलग थी और यह निक अपीलाथd अन्वेर्षण से ब@ गया था और कई वर्षn क निवति की प्रनिक्रया से दूर रहने में सफल रहा था। उच्च न्यायालय का मानना था निक अपीलक ा, ने वास् व में शिशकाय क ा, की नाबालिलग बेटी का अपहरण निकया था।
7. इस न्यायालय क े समक्ष अपहृ ा भी अपीलाथd संख्या 2 क े रूप में अशिभयुT क े साथ शानिमल है। एक बार निफर वही रुख अपनाया गया है, जो उच्च न्यायालय क े समक्ष लिलया गया था। दोनों अपीलक ा,ओं ने अलग-अलग हलफनामें दायर निकए हैं। अपीलाथd नं. 2 ने निवशेर्ष रूप से उच्च न्यायालय क े समक्ष वही कहा है, जो उसने इस न्यायालय क े समक्ष कहा था निक उसने अपनी इच्छा से अपने मा ा-निप ा का घर छोड़ निदया था। अपीलक ा, निदसंबर 2006 से शादीशुदा हैं और खुशी से रह रहे हैं। उन्हें 2014 में एक बेटा भी हुआ है, जो अब 8 साल का हो जाएगा। प्रकरण को पुनः परीक्षण क े लिलए लेने पर कोई साथ,क उद्देश्य पूरा नहीं होगा क्योंनिक यह निकसी भी अपीलक ा, क े लिलए अनुक ू ल नहीं होगा औरयह एक बेकार की कवायद होगी। भा.दं.सं. की ारा 363 क े अ ीन अपरा क े लिलए यह आवश्यक है निक निकसी मनिहला, जो अठारह वर्ष, से कम आयु की हो, कोप्रलोभन से या अगवा करक े ले जाया जाए। व,मान मामले में, अपहृ मनिहला ने स्पष्ट रूप से कहा था निक उसे न ो ले जाया गया था और न ही प्रलोभन निदया गया था और उसने अपनी इच्छा से अपना घर छोड़ निदया था। भा.दं.सं. की ारा 366 भी लागू होगी जब उसे निववाह क े लिलए जबरन निववश निकया गया हो, अपहरण निकया गया हो या प्रलोभन निदया गया हो। यह अपरा ब भी सानिब नहीं होगा जब अपीलक ा, नं.[2] ने स्पष्ट रूप से कहा है निक वह अपीलक ा, नं. 1 से प्यार कर ी थी और उसने अपने पै ृक घर में परेशान करने वाली परिरल्किस्थति यों क े कारण अपना घर छोड़ निदया क्योंनिक कशिथ संबं उसक े निप ा को स्वीकाय, नहीं था और यह निक उसने अपीलक ा, नं. 1 से निबना निकसी दबाव क े अपनी इच्छा से निववाह निकया ।
8. इस मामले क े समग्र थ्यों और परिरल्किस्थति यों को ध्यान में रख े हुए, प्रथम इलिsला रिरपोट, और उससे उत्पन्न सभी पारिरणानिमक काय,वानिहयों को अशिभखंतिड करक े न्याय का उद्देश्य सवtsम रूप से सुनिनतिu निकया जा सक ा है। दनुसार, अपील अनुम की जा ी है। राजस्थान उच्च न्यायालय क े निदनांक 09.12.2020 क े आक्षेनिप निनण,य और आदेश को रद्द निकया जा ा है और भार ीय दंड संनिह ा की ारा 363 और 366 क े ह फ ु लेरा, जिजला जयपुर क े पुलिलस थाने में निदनांक 23.05.2005 क े एफआईआर संख्या 45/2005 से उत्पन्न समस् काय,वाही और सभी पारिरणानिमक काय,वानिहयों को इसक े द्वारा रद्द कर निदया जा ा है। जे.[एस अब्दुल नजीर] जे.[निवक्रम नाथ] नई निदल्ली। 28 मा@,, 2022. (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.