Full Text
भार ीय सव च्च न्यायालय
सिसविवल अपीलीय अति कारिर ा
सिसविवल अपील संख्या 2049-2050 वर्ष" 2022
उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
अपीलक ा" (गण)
बनाम
रासि0 सिंसह ... प्रत्यर्थी6 (गण)
विनण"य
न्यायमूर्ति एम. आर. शाह
JUDGMENT
1. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा सेवा पीठ संख्या 5554 वर्ष" 2022 में पारिर उस आक्षेविप विनण"य और आदेश से व्यथिर्थी और असं ुष्ट उत्तर प्रदेश राज्य ने व "मान अपील की है, सि0सक े द्वारा उच्च न्यायालय ने उक्त रिरट यातिLका को खारिर0 कर विदया है और दावा यातिLका संख्या 2226 वर्ष" 2017 में उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा न्यायाति करण (ए श्मिQमनपश्चा 'न्यायाति करण' क े रूप में संदर्भिभ ) द्वारा पारिर आदेश को रद्द आदेश से इनकार कर विदया, सि0सक े द्वारा प्रति वादी कम"Lारी की दावा यातिLका को स्वीकार कर लिलया गया और दंड/शाश्मिस् लगाने वाले आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा पारिर आदेश को रद्द कर विदया गया र्थीा। mn~?kks"k.kk Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
2. यह विक प्रति वादी कम"Lारी बलिलया में एक 0ूविनयर इं0ीविनयर क े रूप में काम कर रहा र्थीा। विवभागीय काय"बल द्वारा 0ांL की गई, सि0समें यह पाया गया विक उसने विवत्तीय अविनयविम ाएं की र्थीीं, सि0ससे सरकार को नुकसान हुआ। प्रति वादी और अन्य क े लिखलाफ आनुशासविनक कार"वाई शुरू की गई। प्रति वादी को आरोप पत्र ामील विकया गया। यह विक उसक े बाद 0ांL अति कारी ने प्रति वादी कम"Lारी क े लिखलाफ अथिभकथिर्थी आरोपों को साविब मान लिलया और परिरणामस्वरूप कदाLार भी साविब मान लिलया। आनुशासविनक प्राति कारी ने 0ांL अति कारी द्वारा द0" विकए गए विनष्कर्षb से सहमति व्यक्त की और वे न से विनयमों क े अनुसार 22,48,964.42/- रुपये क े सरकारी नुकसान की वसूली का आदेश पारिर करने क े सार्थी ही अस्र्थीायी रूप से दो वे न वृतिf और वर्ष" 2017-18 क े लिलए दी गई विटप्पथिणयों को रोक ा विदया।
2. 1 प्रति वादी ने उक्त आदेश क े विवरुf राज्य सरकार क े समक्ष एक अभ्यावेदन दालिखल विकया, 0ो अस्वीकार कर विदया गया। यह विक उसक े बाद प्रति वादी ने आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा लगाए गए दंड क े आदेश को Lुनौ ी दे े हुए न्यायाति करण क े समक्ष दावा यातिLका संख्या 2226 वर्ष" 2017 दायर की। न्यायाति करण ने उक्त यातिLका को स्वीकार कर लिलया और मुख्य रूप से समान ा क े सिसfां क े आ ार पर स0ा को रद्द कर विदया और इस आ ार पर भी विक की गई 0ांL प्राक ृ ति क न्याय क े सिसfां ों का उल्लंघन र्थीी क्योंविक आरोप पत्र में उसिल्ललिख प्रासंविगक दस् ावे0 अपLारी अति कारी को प्रदान नहीं विकए गए र्थीे।
2. 2 न्यायाति करण द्वारा दंड को रद्द एवं अपास् करने क े आदेश से व्यथिर्थी और असं ुष्ट महसूस कर े हुए राज्य ने उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट यातिLका दायर की।आक्षेविप विनण"य और आदेश द्वारा उच्च न्यायालय ने उक्त रिरट यातिLका को खारिर0 कर विदया है और न्यायाति करण द्वारा पारिर आदेश में हस् क्षेप करने से इंकार कर विदया।उसक े बाद राज्य ने उच्च न्यायालय क े समक्ष पुनर्विवLार Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds आवेदन संख्या 138 वर्ष" 2021 दायर विकया। उच्च न्यायालय ने उक्त पुनर्विवLार यातिLका को भी खारिर0 कर विदया।
2. 3 उच्च न्यायालय द्वारा सेवा पीठ संख्या 5554 वर्ष" 2020 में पारिर 27.02.2020 विदनांविक आक्षेविप विनण"य और आदेश क े सार्थी-सार्थी पुनर्विवLार आवेदन को खारिर0 करने वाले आदेश से असं ुष्ट और व्यथिर्थी, राज्य ने व "मान अपीलें की है।
3. राज्य की ओर से पेश हुए विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री वी. क े. शुक्ला ने 0ोर देकर कहा है विक व "मान मामले में आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा प्रति वादी - अपLारी अति कारी को पूरा अवसर विदया गया र्थीा। यह कहा गया है विक प्रति वादी को 0ांL रिरपोट" ामील की गयी र्थीी और उसक े बाद आनुशासविनक न्यायाति करण द्वारा और उसको अवसर विदया गया र्थीा एवं 0ाँL अति कारी द्वारा द0" विनष्कर्षb क े विवरुf प्रति वादी कम"Lारी क े विवस् ृ अभ्यावेदन पर विवLार करने क े बाद आनुशासविनक प्राति कारी ने दंड अति रोविप विकया, सि0से न्यायाति करण द्वारा अपास् नहीं विकया 0ाना Lाविहए र्थीा।
3. 1 आगे यह कहा गया है विक यह मान े हुए विक 0ांL काय"वाविहयों को प्राक ृ ति क न्याय क े सिसfां ों क े उल्लंघन क े आ ार पर दूविर्ष विकया गया र्थीा, उस मामले में भी कानून क े स्र्थीाविप सिसfां क े अनुसार, मामले को 0ांL अति कारी और आनुशासविनक प्राति कारी को प्राक े Lरण से आगे की 0ांL क े लिलए भे0ा 0ाना Lाविहए र्थीा। हालांविक यह कहा गया है विक, 0ब यह रु. 22,48,964.42/- की सीमा क हाविन का मामला हो, वह भी, 0ूविनयर इं0ीविनयर द्वारा, प्रति वादी कम"Lारी को छोड़ने की अनुमति नहीं दी 0ा सक ी है।
3. 2 राज्य की ओर से उपश्मिस्र्थी विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री शुक्ला द्वारा आगे यह कहा गया है विक 0हाँ क अति करण और उच्च न्यायालय द्वारा विदया गया एक Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अन्य आ ार विक उसी घटना क े संबं में अन्य कम"Lारिरयों को दोर्षमुक्त विकया गया र्थीा और/या उनक े विवरुf कोई कार"वाई नहीं की गई र्थीी, का संबं है, यह क " विदया गया है विक पूव क्त आ ार पर, 0ांL रिरपोट" और आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा अति रोविप दंड क े आदेश को अपास् नहीं विकया 0ा सक ा है। यह कहा गया है विक यह संबंति कम"Lारी द्वारा विनभाई गई व्यविक्तग भूविमका पर विनभ"र कर ा है। यह कहा गया है विक अन्यर्थीा भी क े वल इसलिलए विक कथिर्थी कदाLार क े संबं में शाविमल क ु छ अन्य कम"Lारिरयों को दोर्षमुक्त विकया गया हो सक ा है और/ या उनक े लिखलाफ कोई कार"वाई नहीं की गई हो, विकसी कम"Lारी क े मामले में, 0ो कदाLार का दोर्षी पाया गया हो, पर लगाए गए दंड क े आदेश को अपास् करने का आ ार नहीं हो सक ा।
4. प्रति वादी की ओर से उपश्मिस्र्थी विवद्वान अति वक्ता श्री उत्कर्ष" श्रीवास् व ने अति करण और उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आदेश का समर्थी"न विकया है।
4. 1 यह क " विदया गया है विक इस थ्य पर विवLार कर े हुए विक उसी घटना क े संबं में शाविमल अन्य सभी अति कारी, अर्थीा" ् सहायक अथिभयं ा और काय"कारी अथिभयं ा को दोर्षमुक्त कर विदया गया र्थीा और इसलिलए समान ा क े सिसfां को लागू कर े हुए, अति करण और उच्च न्यायालय दोनों ने कथिर्थी कदाLार क े संबं में आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा लगाए गए दंंड क े आदेश को ठीक ही अपास् कर विदया सि0सक े लिलए अन्य कम"Lारिरयों को दोर्षमुक्त कर विदया गया र्थीा।
4. 2 आगे यह कहा गया है विक अन्यर्थीा भी, की गई 0ांL में प्राक े सिसfां ों का पूरी रह से उल्लंघन विकया गया र्थीा क्योंविक आरोप पत्र में उसिल्ललिख दस् ावे0 प्रति वादी-अपLारी अति कारी को विबल्क ु ल भी नहीं विदए गए र्थीे और इसलिलए पूरी विवभागीय 0ांL काय"वाविहयों को दूविर्ष कर विदया गया र्थीा। यह कहा गया विक इसलिलए न्यायाति करण ने आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा लगाए गए दंंड क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds आदेश को उतिL रूप से अपास् कर विदया है 0ो उच्च न्यायालय द्वारा उतिL ही हस् क्षेप नहीं विकया गया है।
5. हमने संबंति पक्षों क े विवद्वान अति वक्ता को विवस् ार से सुना।
6. प्रारंभ में, यह नोट विकया 0ाना आवQयक है विक 0ांL अति कारी ने प्रति वादी- अपLारी अति कारी को कथिर्थी कदाLार क े लिलए और 22,48,964.42/- रुपये की सीमा क मौविzक नुकसान पहुंLाने क े आरोप सि0से साविब माना। उसक े बाद, आनुशासविनक प्राति कारी ने प्रति वादी को 0ांL अति कारी द्वारा रिरकॉड" विकए गए विनष्कर्षb को देखने का अवसर देने क े बाद दंड विदया और उसक े बाद दंड अति रोविप विकया। न्यायाति करण ने मुख्य रूप से समान ा क े सिसfां को लागू करक े और यह देख े हुए विक घटना में शाविमल अन्य अति कारिरयों को बरी कर विदया गया र्थीा और/या उनक े लिखलाफ कोई कार"वाई नहीं की गई र्थीी, आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा लगाए गए दंड क े आदेश को रद्द कर विदया, इसलिलए, प्रति वादी क े लिखलाफ भी कोई कार"वाई की आवQयक ा नहीं र्थीी। न्यायाति करण ने यह भी पाया है विक अन्यर्थीा भी, 0ांL काय"वाही प्राक ृ ति क न्याय क े सिसfां ों का उल्लंघन कर रही र्थीी क्योंविक आरोप पत्र में उसिल्ललिख प्रासंविगक दस् ावे0 अपLारी अति कारी को विबल्क ु ल भी नहीं विदए गए र्थीे। न्यायाति करण द्वारा पारिर आदेश की उच्च न्यायालय द्वारा आक्षेविप विनण"य और आदेश द्वारा पुविष्ट की गई है।
7. अब, 0हां क समान ा क े सिसfां को इस आ ार पर लागू कर े हुए विक घटना में शाविमल अन्य अति कारिरयों को बरी कर विदया गया है और /या उनक े लिखलाफ कोई कार"वाई नहीं की गई है, आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा अति रोविप दंड क े आदेश को रद्द और अपास् करने का प्रश्न है, हमारा यह दृढ़ म है विक उपरोक्त आ ार पर, न्यायाति करण और उच्च न्यायालय द्वारा स0ा क े आदेश को Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds अपास् नहीं विकया 0ा सक ा र्थीा। सम ा क े सिसfां को उस समय लागू नहीं विकया 0ाना Lाविहए र्थीा 0ब 0ांL अति कारी और आनुशासविनक प्राति कारी ने अपLारी अति कारी क े लिखलाफ आरोप साविब कर विदए र्थीे। प्रत्येक अति कारी की भूविमका पर उनक े काया"लय क े क "व्यों क े आलोक में विवLार विकया 0ाना आवQयक है। अन्यर्थीा भी, क े वल इस कारण से विक घटना में शाविमल क ु छ अन्य अति कारी विनद र्ष हैं और/या अन्य अति कारिरयों क े लिखलाफ कोई कार"वाई नहीं की गई है, संबंति व्यविक्त-अपLारी अति कारी क े लिखलाफ आरोप विवभागीय 0ांL में साविब होने पर दंड क े आदेश को अपास् करने क े आदेश का आ ार नहीं हो सक ा है। ऐसे मामलों में नकारात्मक समान ा का कोई दावा नहीं विकया 0ा सक ा है। इसलिलए, न्यायाति करण और उच्च न्यायालय दोनों ने समान ा क े सिसfां को लागू करक े आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा लगाए गए दंड क े आदेश को रद्द और अपास् करक े एक गंभीर गल ी की है।
8. न्यायाति करण द्वारा पारिर आदेश से यह प्र ी हो ा है विक न्यायाति करण ने यह भी कहा विक 0ांL काय"वाही प्राक े लिखलाफ र्थीी क्योंविक आरोप पत्र में उसिल्ललिख दस् ावे0 अपLारी अति कारी को विबल्कु ल भी उपलब् नहीं कराए गए र्थीे। विवति क े सुस्र्थीाविप सिसfान् ों क े अनुसार ऐसे मामले में 0हां यह पाया 0ा ा है विक 0ांL ठीक से नहीं की गई है और/या यह प्राक ृ ति क न्याय क े सिसfां ों का उल्लंघन है, उस मामले में, अदाल कम"Lारी को बहाल नहीं कर सक ी है और मामले को 0ांL अति कारी/आनुशासविनक प्राति कारी क े पास भे0ा 0ाना Lाविहए ाविक प्राक े Lरण से 0ांL को आगे बढ़ाया 0ा सक े और आरोप पत्र में उसिल्ललिख आवQयक दस् ावे0ों को प्रस् ु करने क े बाद 0ांL आगे बढ़ाई 0ानी Lाविहए, 0ो व "मान मामले में अपLारी अति कारी को नहीं दी गई है।अध्यक्ष,भार ीय बीमा विनगम एवं अन्य बनाम ए. मसीलामथिण (2013) 6 एससीसी 530, क े मामले में सि0से उच्च न्यायालय क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds समक्ष अपीलार्थी6 की ओर से भी उद् ृ विकया गया र्थीा, पैराग्राफ 16 में विनम्नलिललिख विटप्पणी की गयी हैः “16. यह एक स्र्थीाविप विवति क श्मिस्र्थीति है, विक अदाल द्वारा स0ा क े आदेश को इस आ ार पर रद्द कर दे ी है विक 0ांL ठीक से नहीं की गई र्थीी, ो अदाल कम"Lारी को बहाल नहीं कर सक ी है। उसे संबंति मामले को आनुशासविनक प्राति कारी क े पास भे0ना Lाविहए ाविक वह उस बिंबदु से 0ांL कर सक े विक 0हाँ से वह दूविर्ष है, और उसे पूरा कर सक े । (देखें ईसीआईएल बनाम बी. करुणाकर [(1993) 4 एससीसी 727], विहरन मयी भट्टाLाय" बनाम एस. एम. बालिलका विवद्यालय [(2002) 10 एस. सी. सी. 293], यू. पी. स्टेट एसपी0ी. क ं. लिल. बनाम आर. एस. पांडे [(2005) 8 एस. सी. सी. 264] और भार संघ बनाम वाई.एस. सा ू [(2008)12 एस.सी.सी. 30]).”
9. उच्च न्यायालय द्वारा पारिर आक्षेविप विनण"य और आदेश से यह प्र ी हो ा है विक 0ब पूव क्त विनण"य को सेवा पीठ क े समक्ष रखा गया, उच्च न्यायालय ने इस आ ार पर उस पर विवLार नहीं विकया है विक उसी घटना क े संबं में शाविमल अन्य अति कारी को दोर्षमुक्त विकया गया हैं और/या उनक े लिखलाफ कोई कार"वाई नहीं की गई है। ए. मसीलामथिण (पूव क्त) क े मामले में अथिभकथिर्थी विवति को व "मान मामले क े थ्यों पर लागू कर े हुए, हमारी राय है विक न्यायाति करण क े सार्थी- सार्थी उच्च न्यायालय को इस मामले को उस स् र से आनुशासविनक प्राति कारी को 0ांL करने क े लिलए भे0ना Lाविहए र्थीा 0हां से यह दूविर्ष हो गया र्थीा। इसलिलए, उच्च न्यायालय द्वारा उस Lरण से आगे की काय"वाही की अनुमति नहीं देने क े लिलए पारिर आदेश 0हाँ से वह दूविर्ष हो गया र्थीा, अर्थीा" ्, आरोप पत्र 0ारी होने क े बाद से, यह पोर्षणीय नहीं है।
10. उपरोक्त LLा" और ऊपर ब ाए गए कारणों को ध्यान में रख े हुए, न्यायाति करण और उच्च न्यायालय द्वारा समान ा क े सिसfां को लागू करक े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds आनुशासविनक प्राति कारी द्वारा अति रोविप दंड क े आदेश को रद्द और अपास् करने का आदेश ए द्द्वारा रद्द एवं अपास् विकया 0ा ा है। हालांविक, Lूंविक 0ांL को दूविर्ष पाया गया है और इसमें प्राक े सिसfां ों का उल्लंघन विकया गया है क्योंविक यह आरोप लगाया गया है विक आरोप पत्र में उसिल्ललिख प्रासंविगक दस् ावे0 अपLारी अति कारी को नहीं विदए गए र्थीे, हम मामले को आनुशासविनक प्राति कारी को अपLारी अति कारी को सभी आवQयक दस् ावे0 उपलब् करा े हुए एवं प्राक े उतिL सिसfां ों का पालन कर े हुए, उस Lरण से एक नई 0ांL करने क े लिलए वापस भे0 े हैं, 0हां से यह दूविर्ष हो गयी र्थीी, यानी, आरोप पत्र 0ारी होने क े बाद से। उपयु"क्त काय" आ0 से छह महीने की अवति क े भी र पूरा विकया 0ाएगा। व "मान अपीलों को दनुसार पूव क्त सीमा क अनुज्ञा विकया 0ा ा है। हालांविक, मामले क े थ्यों और परिरश्मिस्र्थीति यों को ध्यान में रख े हुए, लाग क े बारे में कोई आदेश नहीं होगा। लंविब आवेदन, यविद कोई हो, भी विनस् ारिर विकए 0ा े हैं। ……………….......... [न्यायमूर्ति एम. आर. शाह] ……………………. [न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्न] नई विदल्ली 22 माL", 2022 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds