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आपराधि क अपीलीय अधि कार क्षेत्र
दाण्डि क अपीलीय संख्या 649/2022
(एसएलपी (सीआरएल) संख्या 7893/2021 से उत्पन्न)
सुश्री र्वोाई अपीलकता0
बनाम
राजस्थान राज्य र्वो अन्य प्रत्यथ9
निनर्ण0य
एन. र्वोी. रमन्ना, सीजेआई.
JUDGMENT
1. अनुमधित दी गई ।
2. र्वोत0मान अपील राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर पीठ द्वारा निदनांक 20.09.2021 को एस. बी. आपराधि क निर्वोनिर्वो जमानत आर्वोेदन संख्या 14458 में पारिरत अंधितम फ ै सले और आदेश क े खिKलाफ दायर की गई है, जिजसमें उच्च न्यायालय ने प्रत्यथ[9] संख्या 2 आरोपी को निनयनिमत जमानत प्रदान की थी।
3. अपीलाथ9-अभिभयोक्त्री क े अधि र्वोक्ता ने तक 0 निदये निक उच्च न्यायालय ने प्रत्यथ[9] नं. 2 को जमानत निबना निकसी तक 0 क े यांनित्रक तरीक े से आदेश देकर त्रुनिS की है। अधि र्वोक्ता ने तक 0 निदया निक उच्च न्यायालय ने अपने समक्ष मामले क े तथ्यों पर, निर्वोशेष रूप से, प्रत्यथ[9] नं.[2] अभिभयुक्त द्वारा निकए गए कभिथत अपरा ों की गंभीरता पर निर्वोचार नहीं निकया। इसक े अधितरिरक्त, उच्च न्यायालय ने यह नहीं माना निक प्रत्यथ[9] नं. 2 अभिभयुक्त एक गंभीर अपरा ी है और उसक े निर्वोरुद्ध लगभग बीस आपराधि क मामले लंनिबत हैं ।ऐसी परिरण्डिस्थधितयों में, इस न्यायालय को संनिर्वो ान क े अनुच्छेद 136 क े तहत अपनी अधि कार क्षेत्र का प्रयोग करना चानिहए और प्रत्यथ[9] नं. 2 - अभिभयुक्त को दी गई जमानत को रद्द कर देना चानिहए । 2022 INSC 431
4. प्रत्यथ[9] नं. 1-राज्य क े निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने अपीलकता0 क े तकb का समथ0न निकया और कथन निकया निक आक्षेनिपत आदेश एक गुप्त आदेश है जिजसे रद्द निकया जा सकता है । उन्होंने कथन निकया निक प्रत्यथ[9] संख्या 2-आरोपी क े खिKलाफ प्रथमदृष्टया एक मजबूत मामला बनता है, जिजसने लगभग तीन से चार र्वोषb तक अपनी नाबाखिलग भतीजी क े साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न का जघन्य अपरा निकया है। इसक े अलार्वोा, प्रत्यथ[9] नं.2-आरोपी एक क ु ख्यात अपरा ी है, जिजसक े खिKलाफ बीस आपराधि क मामले दज0 हैं, जिजनमें से क ु छ में उसे पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है। उसक े खिKलाफ दज0 मामलों की सूची में हत्या, हत्या क े प्रयास, क ै ती आनिद से संबंधि त मामले शानिमल हैं। इसखिलए उच्च न्यायालय द्वारा प्रत्यथ[9] संख्या 2 आरोपी को प्रदत जमानत आदेश को Kारिरज निकया जाना चानिहए।
5. इसक े निर्वोपरीत, प्रत्यथ[9] नं. 2 क े निर्वोद्वान अधि र्वोक्ता तक 0 देते हैं निक उच्च न्यायालय ने प्रत्यथ[9] नं. 2 अभिभयुक्त और राज्य को सुनने क े बाद जमानत मंजूर करने का आक्षेनिपत आदेश पारिरत निकया । इस न्यायालय क े समक्ष कोई नई सामग्री अभिभलेK पर नहीं रKी गई है, जिजसमें इस न्यायालय से आक्षेनिपत आदेश में हस्तक्षेप करने की अपेक्षा की गई है । इसक े अधितरिरक्त, यह निर्वोधि की एक निनधिkत ण्डिस्थधित है निक अपीलीय न्यायालय को अभिभयुक्त को जमानत मंजूर करने र्वोाले आदेश में हस्तक्षेप करने की गुंजाइश कम करनी चानिहए।
6. पक्षकारों क े निर्वोद्वान अधि र्वोक्तागर्ण को सुना।
7. जमानत की मंजूरी से संबंधि त पक्षकारों द्वारा निकये गए कथनों का उल्लेK करने से पहले, प्रत्यथ[9] नं. 2 अभिभयुक्त क े निर्वोरुद्ध लगाए गए अभिभकथनों का संधिक्षप्त निर्वोर्वोरर्ण उपलब् कराना आर्वोश्यक है। र्वोत0मान मामले में निदनांक 29.06.2021 क े आरोप-पत्र क े अनुसार, यह कहा गया है निक अपीलकता0-अभिभयोक्त्री ने निदनांक 30.05.2021 को एक प्राथनिमकी दज0 करायी, जिजसमें कहा गया था निक निदनांक 16-17.05.2021 को प्रत्यथ[9] संख्या 2 आरोपी, उसक े चाचा उसक े घर आए थे। लगभग आ ी रात को 1 बजे प्रत्यथ[9] नं. 2 आरोपी ने उसे अपने कमरे में बुलाया और दो अर्वोसरों पर जबरन उसका बलात्कार निकया। हालांनिक, शुरू में, उसने निकसी को यह नहीं बताया क्योंनिक र्वोह र गई थी, लेनिकन उसक े क ु छ रिरश्तेदारों ने उसक े अजीब व्यर्वोहार को देKा। जब उन्होंने उससे पूछा निक र्वोह दुKी क्यों है, तो उसने अपने परिरर्वोार को पूरी घSना बताई। इस घSना से पहले भी, प्रत्यथ[9] नं. 2 अभिभयुक्त ने उसक े साथ दुव्य0र्वोहार निकया था । 2014 में उन्होंने उसे गलत तरीक े से छ ु आ था। 2015 में उसने उसक े साथ बलात्कार करने की कोभिशश की थी। र्वोह उसक े साथ चैS करने की कोभिशश करता था और अश्लील भाषा का इस्तेमाल करता था और निर्वोभिभन्न अर्वोसरों पर उसक े साथ शारीरिरक संबं बनाने का प्रयास करता था। उसने कभी भी निकसी को इन घSनाओं क े बारे में नहीं बताया क्योंनिक उसने उसे मकी दी थी। इन आरोपों की पृष्ठभूनिम में उच्च न्यायालय द्वारा प्रत्यथ[9] नं. 2 अभिभयुक्त को जमानत देने र्वोाले आक्षेनिपत आदेश की उपयुक्तता पर निर्वोचार निकया जाना चानिहए ।
8. इस न्यायालय ने अनेक निनर्ण0यों में उन बातों को रेKांनिकत निकया है जिजनक े आ ार पर जमानत मंजूर करते समय दं प्रनिtया संनिहता की Kं 439 क े अ ीन निर्वोर्वोेकाधि कार का प्रयोग निकया जाना है। गुरचरर्ण सिंसह बनाम राज्य (निदल्ली प्रशासन) (1978) 1 एस. सी. सी. 118 में इस न्यायालय ने उन निर्वोभिभन्न मापदं ों क े बारे में अभिभनिन ा0रिरत निकया है जिजन पर जमानत मंजूर करते समय निर्वोचार निकया जाना चानिहए। इस न्यायालय ने निनम्नखिलखिKत रूप में अभिभनिन ा0रिरत निकयाः "24 …..निफर भी, उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय को नई संनिहता की दं प्रनिtया संनिहता की Kं 439 (1) क े अ ीन जमानत मंजूर करने क े प्रश्न पर निर्वोचार करने में अपने न्याधियक निर्वोर्वोेकाधि कार का प्रयोग करना होगा। जमानत मंजूर करने में जिजन अभिभभार्वोी बातों का हमने पहले उल्लेK निकया था और जो नई संनिहता की Kं 437 (1) और Kं 439 (1) दोनों क े मामले में समान हैं, र्वोे उन परिरण्डिस्थधितयों की प्रक ृ धित और गंभीरता हैं, जिजनमें अपरा निकया गया है, पीनि{ड़त और गर्वोाहों क े संदभ0 में अभिभयुक्त की ण्डिस्थधित, न्याय से भागने की संभार्वोना, अपने जीर्वोन को Kतरे में ालने क े अपरा को दोहराने की संभार्वोना, मामले में गर्वोाहों साथ-साथ उसक े अन्र्वोेषर्ण क े साथ छेड़छाड़ करने क े और अन्य प्रासंनिगक कारर्णों को ध्यान में रKते हुए है, जिजन्हें व्यापक रूप से नहीं बताया जा सकता है।"
9. उपयु0क्त कारक एक निर्वोस्तृत सूची नहीं बनाते। जमानत की मंजूरी क े खिलए निर्वोभिभन्न कारकों पर निर्वोचार करने की आर्वोश्यकता है जो अंततः न्यायालय क े समक्ष मामले क े निर्वोभिशष्ट तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों पर निनभ0र करता है। इसका कोई स्S्रेS जैक े S फॉमू0ला नहीं है जिजसे कभी भी निन ा0रिरत निकया जा सक े निक संबंधि त कारक क्या हो सकते हैं। तथानिप, कधितपय महत्र्वोपूर्ण0 कारक, जिजन पर सदैर्वो निर्वोचार निकया जाता है, उनमें अन्य बातों क े साथ-साथ अभिभयुक्त की प्रथमदृष्टया संखिलप्तता, आरोप की प्रक ृ धित और गंभीरता, दं की गंभीरता और अभिभयुक्त का चरिरत्र, ण्डिस्थधित और ण्डिस्थधित से सण्डिम्मखिलत है। (उत्तरप्रदेश राज्य बनाम अमरमभिर्ण नित्रपाठी, (2005) 8 एससीसी 21)
10. जमानत मंजूर करने क े चरर्ण में न्यायालय को मामले में साक्ष्य का निर्वोस्तृत निर्वोश्लेषर्ण करने की आर्वोश्यकता नहीं है। इस तरह का काय0 परीक्षर्ण क े चरर्ण में ही निकया जा सकता है।
11. एक बार जमानत मंजूर निकए जाने क े बाद, अपील न्यायालय आमतौर पर उसी में हस्तक्षेप करने की संभार्वोना कम होती है, क्योंनिक यह निकसी व्यनिक्त की स्र्वोतंत्रता से संबंधि त है। निबहार लीगल सपोS0 सोसाइSी बनाम भारत क े मुख्य न्याया ीश, (1986) 4 एस. सी. सी. 767 में इस न्याया ीश की संनिर्वो ान पीठ ने निनम्नखिलखिKत मत व्यक्त निकयाः "3 इसी कारर्ण से सर्वो च्च न्यायालय ने आत्म-अनुशासन क े मामले क े रूप में ऐसे मामलों में अपने निर्वोर्वोेकाधि कार का प्रयोग करते हुए माग0दर्शिशत करने क े खिलए क ु छ मानदं निर्वोकजिसत निकए हैं जहां जमानत या अनिग्रम जमानत मंजूर करने या उससे इंकार करने र्वोाले आदेशों क े निर्वोरुद्ध निर्वोशेष अनुमधित याधिचका दायर की जाती है...... हम इस न्यायालय की पीठ द्वारा अधि कभिथत इस नीधित को दोहराते हैं और अभिभनिन ा0रिरत करते हैं निक इस न्यायालय को असा ारर्ण मामलों को छोड़कर, जमानत या अनिग्रम जमानत मंजूर करने या देने से इंकार करने र्वोाले आदेशों में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करना चानिहए क्योंनिक ये ऐसे मामले हैं जिजनमें उच्च न्यायालय को सामान्यतः अंधितम मध्यस्थ होना चानिहए।(जोर निदया गया)"
12. उपयु0क्त जिसद्धांत का इस न्यायालय द्वारा लगातार अनुसरर्ण निकया गया है। प्रशांत क ु मार सरकार बनाम आशीष चSज[9], (2010) 14 एससीसी 496 में इस न्यायालय ने निनम्नखिलखिKत रूप में अभिभनिन ा0रिरत निकयाः "9. हमारा निर्वोचार है निक आक्षेनिपत आदेश स्पष्ट रूप से निSकाऊ नहीं है। यह परम्परा है निक यह न्यायालय, सामान्यतः, अभिभयुक्त को जमानत मंजूर करने या नामंजूर करने क े उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश में हस्तक्षेप नहीं करता है तथानिप, उच्च न्यायालय क े खिलए भी यह समान रूप से आर्वोश्यक है निक र्वोह इस मुद्दे पर इस न्यायालय क े अनेक निनर्ण0यों में अधि कभिथत आ ारभूत जिसद्धांतों का निर्वोर्वोेकपूर्ण0, सार्वो ानीपूर्वो0क और कड़ाई से अनुपालन करते हुए अपने निर्वोर्वोेकाधि कार का प्रयोग करे। यह अच्छी तरह से स्थानिपत है निक अन्य परिरण्डिस्थधितयों क े बीच, जमानत क े खिलए आर्वोेदन पर निर्वोचार करते समय ध्यान निदए जाने र्वोाले कारक हैंः (i) क्या यह निर्वोश्वास करने का कोई प्रथमदृष्टया या युनिक्तयुक्त आ ार है निक अभिभयुक्त ने अपरा निकया है (ii) अभिभयोग की प्रक ृ धित और गंभीरता (iii) दोषजिसधिद्ध की दशा में दं की गंभीरता (iv) अभिभयुक्त क े फरार होने या भागने का Kतरा, यनिद उसे जमानत पर छोड़ निदया जाता है (v) अभिभयुक्त का चरिरत्र, व्यर्वोहार, सा न, ण्डिस्थधित और ण्डिस्थधित (vi) अपरा क े दोहराए जाने की संभार्वोना (vii) गर्वोाहों को प्रभानिर्वोत निकए जाने की युनिक्तयुक्त आशंका और (viii) निनस्संदेह, जमानत मंजूर करक े न्याय को निर्वोफल निकए जाने का Kतरा।
10. यह स्पष्ट है निक यनिद उच्च न्यायालय इन सुसंगत बातों पर ध्यान नहीं देता है और यांनित्रक रूप से जमानत मंजूर करता है, तो उक्त आदेश न्याधियक मण्डिस्तष्क क े प्रयोग न करने की बुराई से प्रभानिर्वोत होगा, जो इसे अर्वोै बनाता है......।"
13. मनिहपाल बनाम राजेश क ु मार, (2020) 2 एससीसी 118 में इस न्यायालय ने प्रशांत क ु मार सरकार (पूर्वो क्त) में अभिभनिन ा0रिरत का अनुसरर्ण निकया और निनम्नखिलखिKत रूप में अभिभनिन ा0रिरत निकयाः "17. जहां जमानत क े खिलए निकसी आर्वोेदन पर निर्वोचार करने र्वोाला न्यायालय सुसंगत कारकों पर निर्वोचार करने में असफल रहता है, र्वोहां अपील न्यायालय जमानत मंजूर करने र्वोाले आदेश को न्यायोधिचत रूप से अपास्त कर सकता है। अतः अपील न्यायालय से यह निर्वोचार करने की अपेक्षा की जाती है निक क्या जमानत मंजूर करने र्वोाला आदेश बुधिद्ध क े प्रयोग न निकए जाने से ग्रस्त है या अभिभलेK पर साक्ष्य क े प्रथमदृष्टया दृनिष्टकोर्ण से प्रकS नहीं होता है। इस प्रकार, इस न्यायालय क े खिलए यह आंकलन करना आर्वोश्यक है निक क्या, साक्ष्य अभिभलेK क े आ ार पर, यह निर्वोश्वास करने क े खिलए निक अभिभयुक्त ने अपरा निकया था, अपरा की गंभीरता और दं की गंभीरता को भी ध्यान में रKते हुए प्रथमदृष्टया या उधिचत आ ार मौजूद था।"
14. हाल ही में, जगजीत सिंसह और अन्य र्वोी. आशीष निमश्रा @मोनू और अन्य में इस न्यायालय की तीन न्याया ीशों की पीठ ने 2022 दाण्डि क अपीलीय सं 632 में उन कारकों को दोहराया है जिजन पर न्यायालय को दं प्रनिtया संनिहता की Kं 439 क े अ ीन जमानत मंजूर करते समय निर्वोचार करना चानिहए और साथ ही उन परिरण्डिस्थधितयों पर प्रकाश ाला है, जहां यह न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है, जब उपयु0क्त Kं क े अ ीन अपेक्षाओं का उल्लंघन करते हुए जमानत मंजूर की गई है। इस न्यायालय ने निनम्नखिलखिKत मत व्यक्त निकयाः “28 हम आरंभ में ही यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं निक दं प्रनिtया संनिहता की Kं 439 क े अ ीन जमानत मंजूर करने की शनिक्त व्यापक आयामों में से एक है। उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय, जैसा भी मामला हो, को जमानत क े खिलए निकसी आर्वोेदन पर निर्वोनिनkय करते समय पया0प्त निर्वोर्वोेकाधि कार निदया जाता है। लेनिकन, जैसा निक इस न्यायालय द्वारा कई अर्वोसरों पर अभिभनिन ा0रिरत निकया गया है, यह निर्वोर्वोेकाधि कार अनिनयंनित्रत नहीं है। इसक े निर्वोपरीत, सत्र न्यायालय क े उच्च न्यायालय को अच्छी तरह से स्थानिपत जिसद्धांतों का पालन करते हुए न्याधियक मण्डिस्तष्क क े आर्वोेदन क े बाद जमानत दी जानी चानिहए, न निक रहस्यमय या यांनित्रक तरीक े से।”
15. यह उल्लेKनीय है निक इस मामले में जो निर्वोचार निकया जा रहा है र्वोह इस बात से संबंधि त है निक क्या उच्च न्यायालय ने जमानत मंजूर करने में दं प्रनिtया संनिहता की Kं 439 क े अ ीन निर्वोर्वोेका ीन शनिक्त का समुधिचत रूप से प्रयोग निकया है। ऐसा निन ा0रर्ण यह निर्वोनिनkय करने से भिभन्न है निक क्या जमानत की मंजूरी क े पkात् परिरण्डिस्थधितयों ने उसे रद्द करना आर्वोश्यक बना निदया है।पहली ण्डिस्थधित न्यायालय से यह निर्वोश्लेषर्ण करने की अपेक्षा करती है निक क्या जमानत मंजूर करने र्वोाला आदेश अर्वोै, निर्वोक ृ त, अनुधिचत या मनमाना था। दूसरी ओर, जमानत क े रद्दकरर्ण क े खिलए एक आर्वोेदन इस बात को देKता है निक क्या रद्द करने की आर्वोश्यकता र्वोाली पय0र्वोेक्षर्ण परिरण्डिस्थधितयां पैदा हुई हैं। नीरू यादर्वो बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2014) 16 एससीसी 508 में इस न्यायालय ने निनम्नखिलखिKत रूप में अभिभनिन ा0रिरत निकया हैः "12. हमने जमानत मंजूर करते समय ध्यान में रKने क े खिलए क ु छ जिसद्धांतों का उल्लेK निकया है, जैसा निक इस न्यायालय द्वारा समय-समय पर निन ा0रिरत निकया गया है। यह निर्वोधि में सुस्थानिपत है निक जमानत मंजूर निकए जाने क े पkात् उसका रद्दकरर्ण, क्योंनिक अभिभयुक्त ने स्र्वोयं दुव्य0र्वोहार निकया है या ऐसे रद्दकरर्ण की अपेक्षा करने र्वोाली क ु छ पय0र्वोेक्षर्ण परिरण्डिस्थधितयों में, जमानत मंजूर करने र्वोाले आदेश से निबल्क ु ल भिभन्न धि ब्बे में है जो अन्यायपूर्ण0, अर्वोै और निर्वोक ृ त है।यनिद निकसी मामले में, जमानत क े खिलए आर्वोेदन पर निर्वोचार करते समय जिजन सुसंगत कारकों पर निर्वोचार निकया जाना चानिहए था, उन ध्यान दें नहीं निदया गया है या जमानत असंगत निर्वोचारों पर आ ारिरत है, तो निनर्विर्वोर्वोाद रूप से र्वोरिरष्ठ न्यायालय जमानत की इस तरह की मंजूरी क े आदेश को अपास्त कर सकता है। इस तरह का मामला एक अलग श्रेर्णी का है और एक अलग क्षेत्र में है। दूसरी प्रक ृ धित क े निकसी मामले पर निर्वोचार करते समय, न्यायालय अभिभयुक्त द्वारा शतb क े उल्लंघन या बाद में हुई पय0र्वोेक्षर्ण परिरण्डिस्थधितयों पर ध्यान नहीं देता है। इसक े निर्वोपरीत, यह न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश की औधिचत्य और शुद्धता की जांच करता है।”
16. र्वोत0मान मामले में, यह अर्वो ारिरत करना आर्वोश्यक है निक क्या उच्च न्यायालय ने प्रत्यथ[9] नं. 2-अभिभयुक्त को जमानत मंजूर करते समय इस न्यायालय द्वारा अधि कभिथत निर्वोभिभन्न मापदं ों का पालन करते हुए दं प्रनिtया संनिहता की Kं 439 क े अ ीन अपने निर्वोर्वोेकाधि कार का उधिचत प्रयोग निकया है। उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेनिपत आदेश क े क े र्वोल अर्वोलोकन से यह पता नहीं चलता है निक न्यायालय ने जमानत की मंजूरी क े खिलए निकसी भी प्रासंनिगक कारक पर निर्वोचार निकया है। इस समय आक्षेनिपत आदेश को उद्धृत करना प्रासंनिगक होगा- "1. याधिचकाकता0 को भा.दं.सं. की Kं 354,354 बी, 354 ी, 376 (2) एफ, 376 (2) एन, 450,506,509 और पॉक्सो एक्S की ारा 9 एन/10, 5 एल/6, 5 (एन)/6 और 18 क े तहत अपरा क े खिलए सीकर जिजले क े उद्योग नगर थाने में दज0 प्राथनिमकी संख्या 319/2021 क े संबं में निगरफ्तार निकया गया है।
2. याधिचकाकता0 क े निर्वोद्वत अधि र्वोक्ता कथन करते हैं निक याधिचकाकता0 को इस मामले में झूठा फ ं साया गया है।र्वोह 30 मई 2021 से सलाKों क े पीछे हैं। याधिचकाकता0 क े खिKलाफ आरोप- पत्र दायर निकया गया है। याची क े निर्वोद्वत अधि र्वोक्ता आगे कथन करते हैं निक निर्वोचारर्ण क े दौरान, निर्वोद्वत निर्वोचारर्ण न्यायालय द्वारा अभिभयोक्त्री का बयान दज0 निकया गया था, जिजसमें अभिभयोक्त्री ने अपने बयान में सु ार निकया है। मुकदमे की समानिप्त में लंबा समय लग सकता है।
3. भिशकायतकता0 क े निर्वोद्वत अधि र्वोक्ता ने जमानत आर्वोेदन का निर्वोरो निकया है और प्रस्तुत निकया है निक याधिचकाकता0 एक आदतन अपरा ी है और उसक े खिKलाफ पासा में मामला दज0 निकया गया है।
4. निर्वोद्वत लोक अभिभयोजक ने जमानत आर्वोेदन का निर्वोरो निकया है।
5. याधिचकाकता0 क े अधि र्वोक्ता द्वारा पेश निकए गए तकb पर निर्वोचार करते हुए और मामले क े तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों को ध्यान में रKते हुए और मामले क े गुर्ण-दोष पर कोई राय व्यक्त निकए निबना, यह अदालत याधिचकाकता0 को जमानत पर रिरहा करना उधिचत समझती है।
6. तदनुसार, दं प्रनिtया संनिहता की Kं 439 क े अ ीन जमानत आर्वोेदन की अनुज्ञा दी जाती है और यह आदेश निदया जाता है निक अभिभयुक्त-याची ओमप्रकाश जीर्वोनराम @ओमा थेहाS पुत्र बोदुराम को जमानत पर रिरहा निकया जाएगा बशत‘ र्वोह सुनर्वोाई की सभी धितभिथयों पर और जब ऐसा करने क े खिलए कहा जाए तो संबंधि त न्यायालय क े समक्ष उपण्डिस्थत होने क े खिलए निर्वोद्वत निर्वोचारर्ण न्याया ीश की संतुनिष्ट क े खिलए 25,000/- रुपए की दो प्रधितभूधितयों क े साथ 50,000/- रुपए की राभिश का एक व्यनिक्तगत मुचलका प्रस्तुत करता है।"
17. सामान्य अर्वोलोकन क े अलार्वोा निक मामले क े तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों को ध्यान में रKा गया है, मामले क े र्वोास्तनिर्वोक तथ्यों की कहीं भी जानकारी नहीं दी गई है। ऐसा प्रतीत होता है निक उन कारकों का कोई संदभ0 नहीं है जिजनक े कारर्ण अंततः उच्च न्यायालय ने जमानत मंजूर की।र्वोास्तर्वो में, आक्षेनिपत आदेश से कोई तक 0 स्पष्ट नहीं है ।
18. तक 0 न्याधियक प्रर्णाली का जीर्वोन रक्त है। प्रत्येक आदेश को तक 0 संगत होना चानिहए, यह हमारी प्रर्णाली क े मूलभूत जिसद्धांतों में से एक है। एक अकारर्ण आदेश मनमानी क े दुष्चt से ग्रस्त होता है। पूरन बनाम रामनिबलास, (2001) 6 एससीसी 338 में इस न्यायालय ने निनम्नखिलखिKत रूप में अभिभनिन ा0रिरत निकयाः "8....... कारर्ण बताना गुर्ण-दोष पर चचा0 करने से भिभन्न है। जमानत मंजूर करने क े चरर्ण में साक्ष्यों की निर्वोस्तृत जांच और मामले क े गुर्णों क े निर्वोस्तृत प्रलेKन का काय0 नहीं निकया जाना है। अधितरिरक्त सत्र न्याया ीश ने निदनांक 11-9-2000 क े आदेश में साक्ष्य क े गुर्ण-दोष पर चचा0 की, जिजसकी निंनदा की गई थी। इसका यह अथ0 नहीं था निक जमानत मंजूर करते समय प्रथमदृष्टया यह निनष्कष0 निनकालने क े खिलए निक जमानत क्यों दी जा रही थी, क ु छ कारर्णों का उल्लेK करने की आर्वोश्यकता नहीं थी।(जोर निदया गया)"
19. कल्यार्ण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन, (2004) 7 एससीसी 528 में इस न्यायालय ने जमानत से संबंधि त मामले में तक 0 क े महत्र्वो को इंनिगत निकया और निनम्नखिलखिKत रूप में अभिभनिन ा0रिरत निकयाः "11. जमानत मंजूर करने या इनकार करने क े संबं में निर्वोधि बहुत अच्छी तरह से स्थानिपत है। जमानत मंजूर करने र्वोाले न्यायालय को अपने निर्वोर्वोेकाधि कार का प्रयोग न्यायोधिचत तरीक े से करना चानिहए न निक अनुtम क े रूप में। हालांनिक जमानत मंजूर करने क े चरर्ण में साक्ष्यों की निर्वोस्तृत जांच और मामले की योग्यता क े निर्वोस्तृत प्रलेKन की आर्वोश्यकता नहीं है । ऐसे आदेशों में यह बताने की आर्वोश्यकता है निक जमानत क्यों दी जा रही थी, निर्वोशेषतौर पर जहां प्रथमदृष्टया अभिभयुक्त पर गंभीर अपरा करने का आरोप लगाया गया है। इस तरह क े कारर्णों से रनिहत कोई भी आदेश मण्डिस्तष्क का उपयोग न करने से प्रभानिर्वोत होगा। (जोर निदया गया)"
20. बृजनंदन जायसर्वोाल बनाम मुन्ना, (2009) 1 एस. सी. सी. 678 में, जिजसमें गंभीर अपरा में जमानत मंजूर करने की चुनौती से संबंधि त था, इस न्यायालय ने र्वोही ण्डिस्थधित दोहराई है जो कल्यार्ण चंद्र सरकार(उपयु0क्त) में व्यक्त की गई थी।इस न्यायालय ने निनम्नखिलखिKत अभिभनिन ा0रिरत निकया हैः "12............. हालाँनिक, हम आदेश से पाते हैं निक निर्वोद्वान न्याया ीश द्वारा जमानत प्रदान करने में कोई कारर्ण नहीं निदये गए थेऔर ऐसा लगता है निबना मामले क े पक्ष और निर्वोपक्ष पर निर्वोचार करते हुए यंत्रर्वोत् रूप से प्रदान निकया गया । जमानत देते समय, निर्वोशेष रूप से हत्या जैसे गंभीर मामलों में, अनुदान को न्यायोधिचत ठहराने क े क ु छ कारर्ण आर्वोश्यक हैं।(जोर निदया गया)"
21. उपयु0क्त से यह स्पष्ट है निक इस न्यायालय ने गंभीर अपरा ों र्वोाले मामलों पर निर्वोशेष जोर देने क े साथ लगातार तक 0 संगत जमानत आदेशों की आर्वोश्यकता को बरकरार रKा है।र्वोत0मान मामले में, प्रत्यथ[9] नं. 2 आरोपी पर उन्नीस साल की अपनी युर्वोा भतीजी क े खिKलाफ बलात्कार का गंभीर अपरा करने का आरोप लगाया गया है। तथ्य यह है निक प्रत्यथ[9] नं. 2-अभिभयुक्त एक आदतन अपरा ी है और उसक े खिKलाफ दज0 लगभग बीस मामलों का आक्षेनिपत आदेश में उल्लेK भी नहीं निकया गया है । इसक े अलार्वोा, उच्च न्यायालय उस प्रभार्वो पर निर्वोचार करने में निर्वोफल रहा है जो प्रत्यथ[9] नं. 2- अभिभयुक्त का परिरर्वोार क े एक बड़े सदस्य क े रूप में अभिभयोक्त्री पर पड़ सकता है । कारार्वोास की अर्वोधि, जो क े र्वोल तीन महीने की है, इतनी बड़ी नहीं है निक इस प्रक ृ धित क े अपरा में जमानत मंजूर करने क े खिलए न्यायालय पर दबार्वो ाले।
22. उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेनिपत आदेश रहस्यपूर्ण0 है और इसमें मण्डिस्तष्क क े निकसी अनुप्रयोग का संक े त नहीं निदया गया है। हाल ही में जमानत मंजूर करने या देने से इंकार करने क े खिलए ऐसे आदेश पारिरत करने की प्रर्वोृखित्त रही है, जहां न्यायालय सामान्य रूप से यह मत व्यक्त करते हैं निक तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों पर निर्वोचार निकया गया है। ऐसा कोई निर्वोभिशष्ट कारर्ण नहीं बताया गया है जिजससे न्यायालय द्वारा आदेश पारिरत निकया जा सक े ।
23. इस न्यायालय क े निर्वोभिभन्न निनर्ण0यों क े बार्वोजूद ऐसी ण्डिस्थधित बनी हुई है जिजसमें इस न्यायालय ने ऐसी प्रथा का अनुमोदन नहीं निकया है। मनिहपाल (पूर्वो क्त) क े मामले में इस न्यायालय ने निनम्नखिलखिKत मत व्यक्त निकयाः "25. क े र्वोल""अभिभलेK का अर्वोलोकन करने""और""मामले क े तथ्यों और परिरण्डिस्थधितयों पर""अभिभलेK का अभिभलेKन करना तक 0 संगत न्याधियक आदेश क े प्रयोजन को पूरा नहीं करता है।"यह Kुले न्याया ीश का एक बुनिनयादी आ ार है, जिजसक े खिलए हमारी न्याया ीभिशक प्रर्णाली प्रधितबद्ध है, निक जिजन कारकों ने न्याया ीशा क े निदमाग में अस्र्वोीक ृ धित या जमानत की मंजूरी को प्रभानिर्वोत निकया है, र्वोे पारिरत आदेश में दज0 निकए जाते हैं। Kुला न्याया ीश इस ारर्णा पर आ ारिरत है निक न्याया ीश न क े र्वोल निकया जाना चानिहए, बण्डिल्क इसे स्पष्ट रूप से और निनस्संदेह रूप से निकया जाना चानिहए।तार्विकक निनर्ण0य देने क े खिलए न्याया ीशों का कत0व्य इस प्रधितबद्धता क े क ें द्र में है। जमानत मंजूर करने क े प्रश्न आपराधि क अभिभयोजन से गुजरने र्वोाले व्यनिक्तयों की स्र्वोतंत्रता क े साथ-साथ यह सुनिनधिkत करने में आपराधि क न्याया ीश प्रर्णाली क े निहतों से संबंधि त हैं निक अपरा करने र्वोालों को न्याया ीश में बा ा ालने का अर्वोसर न निदया जाए। न्याया ीश यह बताने क े खिलए बाध्य हैं निक र्वोे निकस आ ार पर निकसी निनष्कष0 पर पहुंचे हैं। (जोर निदया गया)"
24. उपरोक्त को ध्यान में रKते हुए, उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेनिपत आदेश को रद्द निकया जाता है। तदनुसार दाण्डि क अपीलीय की अनुमत की जाती है। जमानत बां रद्द कर निदए जाते हैं। प्रत्यथ[9] संख्या 2 आरोपी को इस आदेश की प्रानिप्त क े एक सप्ताह क े भीतर आत्मसमप0र्ण करने का निनद‘श निदया जाता है, ऐसा न करने पर संबंधि त पुखिलस अधि कारी उसे निहरासत में ले लेंगे। (एन. र्वोी. रमन्ना) (क ृ ष्र्ण मुरारी) नई निदल्ली 19 अप्रैल, 2022 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.