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आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार
आपराधिक अपील सं. 605/2022
(एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 7003/2021 से उत्पन्न)
जहीर हक अपीलकर्ता(ओं)
बनाम
राजस्थान राज्य प्रतिवादी(ओं)
आदेश
अनुमति दी गई।
JUDGMENT
(1) आक्षेपित आदेश द्वारा, अपीलकर्ता को जिसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 439 क े तहत चाही गई जमानत से वंचित किया गया है । अपीलकर्ता को दिनांक 08.05.2014 को थाना प्रतापनगर, जोधपुर की धारा 10, 13, 15, 16, 17, 18, 18 ए, 18 बी, 19, 20, 23 और 38 गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (संक्षेप में '1967 का अधिनियम') क े तहत दंडनीय अपराधों क े लिए एफआईआर 113/2014 क े संबंध में गिरफ्तार किया गया था। (2) 17.09.2014 को अपीलार्थी क े विरुद्ध आरोप पत्र दायर किया गया। अपीलार्थी क े विरुद्ध दिनांक 29.01.2018 को आरोप विरचित किया गया है। यह विवादित नहीं है कि अपीलकर्ता लगभग 8 वर्षों से हिरासत में है। जहां तक मामले क े चरण का संबंध है, क े वल 6 गवाहों की परीक्षा पूरी हुई है और सातवें गवाह का परीक्षण किया जा रहा है। सुश्री प्रगति नीकरा, राज्य की ओर से विद्वान अधिवक्ता, इस तथ्य पर विवाद नहीं करती हैं कि मामले में क ु ल 109 गवाह हैं। ऐसे में यह पाया जा सकता है कि अपीलकर्ता जो कि एक अंडरट्रायल क ै दी है, पहले ही क ै द की लंबी अवधि से गुजर चुका है। (3) इस कोर्ट ने मामले में 29.09.2021 को नोटिस जारी किया। इसक े बाद मामला 26.11.2021 को आया, जिसमें अपीलकर्ता की शिकायत थी कि अभियोजन पक्ष द्वारा उद्धृत 180 गवाहों में से एक भी गवाह पूरा नहीं होने का सबूत नोट किया गया था; राज्य क े अधिवक्ता को निर्देश प्राप्त करने क े लिए कहा गया था और न्यायालय क े समक्ष यह भी प्रस्तुत करने क े लिए कहा गया था कि नियत समय क े भीतर मुकदमे का निष्कर्ष निकाला जा सकता है। (4) इसक े बाद इस न्यायालय ने 03.12.2021 को निम्नलिखित आदेश पारित किया: “याचिकाकर्ता पिछले 7 वर्षों से हिरासत में है। राज्य क े विद्वान अधिवक्ता का कहना है कि अभियोजन क े लिए क ु ल 109 गवाह हैं। यह सामान्य मामला है कि पहले गवाह की भी गवाही अभी तक पूरी तरह से दर्ज नहीं की गई है। इन परिस्थितियों में, हम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, नंबर 3, जोधपुर शहर से एक रिपोर्ट मांगना उचित समझते हैं कि इस मामले में सुनवाई कितने समय क े भीतर पूरी की जा सकती है। तदनुसार, हम निर्देश देते हैं कि अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, नंबर 3, जोधपुर शहर, जल्द से जल्द उस समय क े बारे में एक रिपोर्ट भेजेंगे जिसमें मुकदमे का निष्कर्ष निकाला जा सकता हो। आज से तीन सप्ताह की अवधि क े भीतर रिपोर्ट भेजी जानी है। मामले को 10 जनवरी, 2022 को सूचीबद्ध करें।” उक्त आदेश क े अनुसरण में, संबंधित न्यायाधीश द्वारा एक रिपोर्ट दायर की गई थी जिसमें यह संक े त दिया गया था कि वर्तमान मामले क े निपटान में कम से कम 2 से 3 साल लगने की काफी संभावना है। उक्त प्रतिवेदन दिनांक 20.12.2021 का है। (5) इसक े बाद, इस मामले को फिर से 19.01.2022 को उठाया गया। उक्त तिथि को, निम्नलिखित आदेश पारित किया गया था: "पक्षों क े विद्वान अधिवक्ता को सुनने क े बाद, हमारा विचार है कि न्याय क े हित में यह आवश्यक है कि राज्य हमारे सामने अन्य अभियुक्तों की स्थिति उनक े खिलाफ आरोपों क े साथ हो और याचिकाकर्ता और अन्य अभियुक्तों क े बीच अंतर, यदि कोई हो, क े संबंध में एक हलफनामा पेश करें। हलफनामे में उन गवाहों की सुरक्षा क े लिए किसी भी उपाय की आवश्यकता क े बारे में भी संक े त दिया जाए, जो मुकदमे में गवाही देंगे। हलफनामा 24.01.2022 को या उससे पहले फाइल किया जाए। याचिकाकर्ता उस हलफनामे क े जवाब में हलफनामा दायर करने क े लिए स्वतंत्र होगा, जिसे हमने राज्य को दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले को 25.01.2022 को सूचीबद्ध करें।" (6) आगे भी, दिनांक 04.02.2022 को पारित निम्नलिखित आदेश: "आक्षेपित आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 क े प्रावधानों क े तहत जमानत क े लिए आवेदन को खारिज कर दिया है। हमने याचिकाकर्ता क े विद्वान अधिवक्ता और प्रतिवादी राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता को भी सुना है। याचिकाकर्ता 08.05.2014 से हिरासत में है, यानी लगभग 8 साल से। मुकदमे क े शीघ्र निपटान की संभावना क े रूप में इस न्यायालय द्वारा पारित एक आदेश क े आधार पर, रिपोर्ट इंगित करती है कि मामले में हर संभव प्रयास करने क े बाद भी तथा गवाहों, अभियुक्तों, अधिवक्ताओं की संख्या, उनक े द्वारा जिरह तथा न्यायालय में लंबित प्रकरणों की संख्या को देखते हुए प्रकरण क े निस्तारण में कम से कम 2-3 वर्ष की सम्भावना है। इस न्यायालय क े समक्ष राज्य द्वारा दायर हलफनामे में इस न्यायालय द्वारा पारित आदेश क े अनुपालन क े माध्यम से प्रतिवादी को उन गवाहों की सुरक्षा क े लिए किसी भी उपाय की आवश्यकता क े बारे में इंगित करने क े लिए कहा गया है, जो मुकदमे में गवाही देंगे, यह कहा गया है कि परीक्षण क े दौरान क ु ल 110 गवाहों क े बयान होंगे, जिनमें से अभियोजन पक्ष क े तीन गवाहों क े बयान पहले ही दर्ज किए जा चुक े हैं। यह आगे कहा गया है कि संबंधित अधिकारी ने उन निजी गवाहों से संपर्क किया था जिनमें से तीन गवाहों ने विचारण क े दौरान अभियुक्तों क े खिलाफ गवाही देने क े लिए अपने जीवन को खतरे की आशंका जताई है। याचिकाकर्ता क े विद्वान अधिवक्ता यह इंगित करते है कि इस तरह की आशंका पिछले आठ वर्षों क े दौरान नहीं उठाई गई है और यह बात तुच्छ है और याचिकाकर्ता से कोई खतरा नहीं है। यह इस बात को दोहराने क े अलावा है कि े खिलाफ कोई सामग्री नहीं है जबकि राज्य क अपनी ओर से दोहराते है कि यह एक ऐसा मामला है जहां बहुत गंभीर अपराध का आरोप लगाया गया है और यह ऐसा मामला नहीं है जहां याचिकाकर्ता को जमानत दी जा सकती है। वह आगे बताती है कि परीक्षण प्रगति पर है और राज्य भी मामले क े शीघ्र निपटान क े लिए प्रभावी कदम उठा रहा है। हमारा विचार है कि इस मामले क े तथ्यों में, जब याचिकाकर्ता पहले ही लगभग 8 साल हिरासत में बिता चुका है, पारित करने क े लिए उचित आदेश होगा कि पहले उन तीन गवाहों की परीक्षा का निर्देश दिया जाए जिन्होंने अभियुक्तों से अपने जीवन को खतरे क े बारे में चिंता जताई है और उनक े साक्ष्य जोड़े जाने क े बाद मामले को इस न्यायालय का ध्यान आकर्षित करना चाहिए। हालांकि, इन गवाहों को प्राथमिकता क े आधार पर जांचा जाना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में हम निम्नलिखित आदेश पारित करते हैं: यह निर्देशित किया जाता है कि प्रतिवादी राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि इन गवाहों की प्राथमिकता क े आधार पर परीक्षा की जाए और किसी भी रुप में आज से अधिकतम दो महीने की अवधि क े भीतर परीक्षा पूरी हो जाए। इस मामले को आगे विचार क े लिए 11.04.2022 को सूचीबद्ध करें। राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विचाराधीन गवाहों क े बयान दिनांक 08.04.2022 को या उससे पहले अनुवाद क े साथ इस अदालत क े समक्ष रखे जाएंगे।” आज दिनांक 04.02.2022 क े आदेश में उल्लिखित गवाहों क े बयान न्यायालय क े समक्ष रखे गए हैं। (7) अपीलकर्ता क े विद्वान अधिवक्ता यह इंगित करते कि देवेंद्र पटेल नाम क े गवाह को पक्षद्रोही घोषित किया गया है। यह अपीलकर्ता क द्वारा इंगित किया गया है कि जहां तक अभियोजन पक्ष की ओर से अन्य दो गवाहों - हेमंत और पप्पुराम की परीक्षा का संबंध है, उक्त गवाहों क े बयान में ऐसा क ु छ भी नहीं है जो अपीलकर्ता को फ ं साता हो। यह पहलू, राज्य क े विद्वान अधिवक्ता द्वारा विवादित नहीं है। राज्य क े विद्वान अधिवक्ता ने यह इंगित किया है कि अपीलकर्ता क े खिलाफ स्थापित मामले की प्रक ृ ति में और सबूत होंगे जो सामने आ सकते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है । (8) इस संबंध में, अपीलकर्ता क े खिलाफ मामले का आधार काफी हद तक इस तथ्य से प्रतीत होता है कि वह एक अभियुक्त क े संपर्क में पाया गया था और जिसे बातचीत से अच्छा बनाने की कोशिश की गई है, जिसमें अपीलकर्ता पर 31 मौकों पर उस आरोपी क े साथ शामिल होने का आरोप लगाया गया है, जो एक सह-ग्रामीण है। प्रतिवादी क े अनुसार, उक्त आरोपी इंडियन मुजाहिद्दीन क े स्लीपर सेल मॉड्यूल का प्रमुख है। (9) हम भारत संघ बनाम क े.ए. नजीब (2021) (3) एससीसी 713 में रिपोर्ट किए गए इस न्यायालय क े फ ै सले को ध्यान में रखते हैं। इसमें, निम्नलिखित टिप्पणियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है: "12. यहां तक कि आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1987 या नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस एक्ट, 1985 ("एनडीपीएस अधिनियम") जैसे विशेष कानूनों क े मामले में भी जमानत देने क े लिए क ु छ कठोर शर्तें हैं, इस न्यायालय ने परमजीत सिंह बनाम राज्य (दिल्ली की एनसीटी) [परमजीत सिंह बनाम राज्य (दिल्ली की एनसीटी), (1999) 9 एससीसी 252: 1999 एससीसी (सीआरआई) 1156], बब्बा बनाम महाराष्ट्र राज्य [बब्बा वी। महाराष्ट्र राज्य, (2005) 11 एससीसी 569: (2006) 2 एससीसी (सीआरआई) 118] और उमरमिया बनाम गुजरात राज्य [उमरमिया बनाम गुजरात राज्य, (2017) 2 एससीसी 731: (2017) 2 एससीसी (सीआरआई) ) 114]अभियुक्तों को जमानत पर छोड़ दिया जब वे लंबे समय तक जेल में रहे और मुकदमे क े जल्दी पूरा होने की बहुत कम संभावना थी। इस तरह क े विशेष अधिनियमों में जमानत क े लिए कठोर शर्तों की संवैधानिकता, निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने क े लिए त्वरित परीक्षणों की कसौटी पर प्राथमिक रूप से उचित है।
19. एक अन्य कारण जो हमें प्रतिवादी को जमानत पर बढ़ाने क े लिए सहमत करता है, वह यह है कि यूएपीए की धारा 43-डी (5) एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 की तुलना में कम कठोर है। एनडीपीएस अधिनियम क े विपरीत जहां सक्षम अदालत को यह संतुष्ट करने की आवश्यकता है कि अभियुक्त प्रथम दृष्टया दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए उसक े द्वारा दूसरा अपराध करने की संभावना नहीं है; यूएपीए क े तहत ऐसी कोई पूर्व शर्त नहीं है। इसक े बजाय, यूएपीए की धारा 43-डी(5) जमानत से इनकार करने क े लिए अपराध की गंभीरता, सबूतों क े साथ छेड़छाड़ की संभावना, गवाहों को प्रभावित करने या आरोपी क े फरार होने की संभावना आदि जैसे अच्छी तरह से तय विचारों क े अलावा यह स्थिति सक्षम अदालत को क े वल एक और संभावित आधार ही प्रदान करती है। (10) इसमें कोई संदेह नहीं है कि उक्त मामले में, जैसा कि राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता द्वारा बताया गया है, विचारण न्यायालय, जमानत देने वाले उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक आदेश क े अनुसार कार्यवाही कर रहा था, लेकिन, इस मामले में, सत्य इसक े विपरीत है कि वह आदेश जमानत क े लिए आवेदन को खारिज करने वाला है। तथ्य यह है कि अपीलकर्ता लगभग 8 वर्षों की अवधि क े लिए विचाराधीन क ै दी क े रूप में पहले से ही हिरासत में है। अपीलकर्ता, यह ध्यान दिया जा सकता है, उन पर अपराधों का आरोप लगाया गया है, जिनमें से क ु छ 10 साल की न्यूनतम सजा क े साथ दंडनीय हैं और सजा को आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। अपीलकर्ता क े विद्वान अधिवक्ता ने यह भी बताया कि सह अभियुक्तों में से एक श्री आदिल अंसारी को इस न्यायालय द्वारा 30.09.2020 को जमानत पर रिहा कर दिया गया है। निस्संदेह, इस संबंध में, हम राज्य की इस दलील को ध्यान में रखते हैं कि उक्त अभियुक्तों की भूमिका अलग है। (11) 1967 क े अधिनियम की धारा 43 डी(5) की स्थिति को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस एक्ट, 1985 में निहित प्रावधानों की तुलना में कम कठोर समझा गया है, जैसा कि हमने पहले ही देखा है। हमें लगता है कि अपीलकर्ता क े खिलाफ मामले की प्रक ृ ति में, जो साक्ष्य सामने आ चुकी है और इससे बढ़कर, कारावास की लंबी अवधि जिसे अपीलकर्ता पहले ही काट चुका है, को देखते हुए अब समय आ गया है जब अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा किया जाए। हम इस तथ्य को ध्यान में रखते हैं कि अभियोजन पक्ष 109 गवाहों की जांच करना चाहता है, जिनमें से क े वल 6 गवाहों की अब तक पूरी तरह से जांच की गई है। तदनुसार, हम अपील स्वीकार करते हैं । विवादित आदेश को रद्द करते हैं और निर्देश देते हैं कि अपीलकर्ता को ऐसी शर्तों क े अधीन जमानत पर रिहा किया जाएगा जो विचारण न्यायालय द्वारा तय की जाएगी। कहने की आवश्यकता नहीं है, इस आदेश में जो टिप्पणियां की गई हैं, वे जमानत क े लिए आवेदन का निर्णय करने क े उद्देश्य से हैं और न्यायालय, निस्संदेह, साक्ष्य क े आधार पर और कानून क े अनुसार मुकदमे में अपीलकर्ता क े संबंध में निर्णय करेगा। [क े.एम. जोसेफ] [हृषिक े श रॉय] नयी दिल्ली; 11 अप्रैल, 2022 मद संख्या 32 कोर्ट संख्या 10 खंड II कार्यवाही क े रिकॉर्ड अपील क े लिए विशेष अनुमति (अपील) क े लिए याचिका (याचिकाएं) संख्या 7003/2021 (एसबीसीआरएमबीए संख्या 14646/2020 में दिनांक 24-03-2021 क े आक्षेपित अंतिम निर्णय और आदेश से उत्पन्न, जोधपुर में राजस्थान क े उच्च न्यायालय द्वारा पारित) जहीर हक याचिकाकर्ता(ओं) बनाम राजस्थान राज्य प्रतिवादी(ओं) (आईए नंबर 116433/2021-दाह किए गए फ ै सले क े सी/सी से छ ू ट और आईए नंबर 116431/2021-ओ.टी. फाइल करने से छ ू ट क े साथ) दिनांक: 11-04-2022 इस याचिका को आज सुनवाई क े लिए बुलाया गया था। कोरम: माननीय श्रीमान् न्यायमूर्ति क े.एम. यूसुफ माननीय श्रीमान् न्यायमूर्ति हृषिक े श रॉय े लिए मो. इरशाद हनीफ, एओआर श्री मुजाहिद अहमद, अभिभाषक। श्री रिजवान अहमद, एड. श्री दानिश शेर खान, अभिभाषक। श्री ए.आर. सिद्दीकी, अभिभाषक। श्री मोहित क ु मार, एड. प्रतिवादी क े लिए सुश्री प्रगति नीखरा, एओआर अधिवक्ता की सुनवाई क े बाद अदालत ने निम्नलिखित किया आदेश अनुमति दी गई। हस्ताक्षरित रिपोर्ट करने योग्य आदेश क े संदर्भ में अपील की अनुमति है। लंबित आवेदनों का निस्तारण किया जाता है। (निधि आहूजा) (रेणु कपूर) एआर-सह-पीएस शाखा अधिकारी [हस्ताक्षरित रिपोर्ट योग्य आदेश फ़ाइल पर रखा गया है।] (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.