Full Text
भार क
े सव च्च न्यायालय में
दीवानी अपीलीय क्षेत्राति कार
दीवानी अपील संख्या- 2260/2022
(विवशेष अनुमति याति(का (सी) संख्या 26844 वष, 2016 से उत्पन्न)
अध्यक्ष सह प्रबं विनदेशक, फर्टि7लाइजर कॉप रेशन ऑफ इंति<या लिलविम7े< और
एक अन्य। ... अपीलार्थीC (गण)
बनाम
राजेश (ंद्र श्रीवास् व और अन्य। ... प्रत्यर्थीC (गण)
सह
दीवानी अपील संख्या 2275/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35008/2016)
दीवानी अपील सं. 2305/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35713/2016)
दीवानी अपील सं. 2306/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35737/2016)
दीवानी अपील सं. 2310/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35731/2016) mn~?kks"k.kk
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दीवानी अपील सं. 2357/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 797/2017)
दीवानी अपील सं. 2311/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35735/2016)
दीवानी अपील सं. 2313/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35732/2016)
दीवानी अपील सं. 2315/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35736/2016)
दीवानी अपील सं. 2318/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 952/2017)
दीवानी अपील सं. 2319/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 456/2017)
दीवानी अपील सं. 2320/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 435/2017)
दीवानी अपील सं. 2321/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 443/2017)
दीवानी अपील सं. 2322/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 434/2017)
दीवानी अपील सं. 2323/2022
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(@एसएलपी (सी) सं. 437/2017)
दीवानी अपील सं. 2324/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 438/2017)
दीवानी अपील सं. 2325/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 439/2017)
दीवानी अपील सं. 2326/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 446/2017)
दीवानी अपील सं. 2327/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 454/2017)
दीवानी अपील सं. 2328/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 444/2017)
दीवानी अपील सं. 2329/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 436/2017)
दीवानी अपील सं. 2330/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 445/2017)
दीवानी अपील सं. 2331/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 457/2017)
दीवानी अपील सं. 2332/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 452/2017)
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दीवानी अपील सं. 2333/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 442/2017)
दीवानी अपील सं. 2334/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 448/2017)
दीवानी अपील सं. 2335/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 462/2017)
दीवानी अपील सं. 2336/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 482/2017)
दीवानी अपील संख्या 2337/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 476/2017)
दीवानी अपील सं. 2338/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 447/2017)
दीवानी अपील सं. 2339/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 459/2017)
दीवानी अपील सं. 2340/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 460/2017)
दीवानी अपील सं. 2341/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 471/2017)
दीवानी अपील सं. 2342/2022
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(@एसएलपी (सी) सं. 450/2017)
दीवानी अपील सं. 2343/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 458/2017)
दीवानी अपील सं. 2344/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 466/2017)
दीवानी अपील सं. 2345/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 472/2017)
दीवानी अपील सं. 2346/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 477/2017)
दीवानी अपील सं. 2347/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 453/2017)
दीवानी अपील सं. 2348/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 461/2017)
दीवानी अपील सं. 2349/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 481/2017)
दीवानी अपील संख्या 2350/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 480/2017)
दीवानी अपील सं. 2351/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 464/2017)
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दीवानी अपील सं. 2352/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 474/2017)
दीवानी अपील सं. 2353/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 473/2017)
दीवानी अपील सं. 2354/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 479/2017)
दीवानी अपील सं. 2355/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 470/2017)
दीवानी अपील सं. 2356/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 475/2017)
दीवानी अपील सं. 2358-2359/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 22174-22175/2018)
दीवानी अपील सं. 2317/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35728/2016)
दीवानी अपील सं. 2262/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31207/2016)
दीवानी अपील सं. 2269/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31475/2016)
दीवानी अपील सं. 2268/2022
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(@एसएलपी (सी) सं. 31408/2016)
दीवानी अपील सं. 2264/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31264/2016)
दीवानी अपील सं. 2263/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31256/2016)
दीवानी अपील सं. 2267/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31374/2016)
दीवानी अपील संख्या 2265/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31319/2016)
दीवानी अपील सं. 2261/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31156/2016)
दीवानी अपील सं. 2266/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31354/2016)
दीवानी अपील सं. 2270/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 31987/2016)
दीवानी अपील सं. 2271/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 33083/2016)
दीवानी अपील सं. 2272/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 33085/2016)
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दीवानी अपील सं. 2273/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 33084/2016)
दीवानी अपील सं. 2274/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 33086/2016)
दीवानी अपील सं. 2276/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35015/2016)
दीवानी अपील सं. 2285/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35009/2016)
दीवानी अपील सं. 2286/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35021/2016)
दीवानी अपील सं. 2287/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35011/2016)
दीवानी अपील सं. 2288/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35010/2016)
दीवानी अपील सं. 2289/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35023/2016)
दीवानी अपील सं. 2290/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35022/2016)
दीवानी अपील सं. 2291/2022
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
(@एसएलपी (सी) सं. 35013/2016)
दीवानी अपील सं. 2284/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35047/2016)
दीवानी अपील सं. 2292/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35025/2016)
दीवानी अपील सं. 2280/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35031/2016)
दीवानी अपील सं. 2278/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35019/2016)
दीवानी अपील सं. 2293/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35048/2016)
दीवानी अपील सं. 2294/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35020/2016)
दीवानी अपील सं. 2277/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35017/2016)
दीवानी अपील संख्या. 2283/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35043/2016)
दीवानी अपील सं. 2295/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35032/2016)
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
दीवानी अपील सं. 2282/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35041/2016)
दीवानी अपील सं. 2279/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35029/2016)
दीवानी अपील सं. 2296/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35039/2016)
दीवानी अपील सं. 2297/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35034/2016)
दीवानी अपील सं. 2298/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35027/2016)
दीवानी अपील सं. 2299/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35037/2016)
दीवानी अपील संख्या 2300/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35038/2016)
दीवानी अपील सं. 2281/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35035/2016)
दीवानी अपील सं. 2301/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35033/2016)
दीवानी अपील सं. 2303/2022
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
(@एसएलपी (सी) सं. 35718/2016)
दीवानी अपील संख्या 2307/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35723/2016)
दीवानी अपील संख्या 2302/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35716/2016)
दीवानी अपील सं. 2308/2022
एसएलपी (सी) सं. 35719/2016
दीवानी अपील सं. 2309/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35721/2016)
दीवानी अपील सं. 2312/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35724/2016)
दीवानी अपील सं. 2304/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35727/2016)
दीवानी अपील सं. 2314/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35720/2016)
दीवानी अपील सं. 2316/2022
(@एसएलपी (सी) सं. 35725/2016)
विनण,य
न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यम
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
JUDGMENT
1. अपील क े इस बै( में विव(ार क े लिलए जो सामान्य प्रश्न उठ ा है, वह यह है विक क्या पूव,व C वादक्रम में इस न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेशों क े अनुसरण में श्रविमकों को विकया गया दर्थी, भुग ान, उपदान की गणना करने क े उद्देश्य से उपदान अति विनयम, 1972 (इसक े बाद 'अति विनयम' क े रूप में संदर्भिभ ) की ारा 2( ) क े ह मजदूरी पद क े अर्थी, क े ह 'मजदूरी' का विहस्सा हो सक ी है।
2. हमने पक्षकारों क े विवद्वान अति वक्ता को सुना है।
3. साव,जविनक क्षेत्र क े उपक्रमों क े कम,(ारिरयों क े वे नमान को विदनांक 01.01.1992 से संशोति विकया गया र्थीा। जब इस रह क े संशो न का लाभ फर्टि7लाइजर कॉप रेशन ऑफ इंति<या लिलविम7े< और हिंहदुस् ान फर्टि7लाइजर कॉप रेशन लिलविम7े< क े कम,(ारिरयों को उपलब् नहीं कराया गया, ो इसक े कम,(ारिरयों ने वष, 1996 में विवभिभन्न उच्च न्यायालयों में रिर[7] याति(काएं दायर की।
4. भार संघ क े आग्रह पर, विवभिभन्न उच्च न्यायालयों में लंविब रिर[7] याति(काओं की फाइल को इस न्यायालय में स्र्थीानां रिर कर विदया गया। 18.08.2000 क े एक अं रिरम आदेश द्वारा, इस न्यायालय ने एक अं रिरम उपाय क े रूप में (ार अलग- अलग श्रेभिणयों क े कम,(ारिरयों को क्रमशः 1500/ रू., 1000/रू., 750/रू. और 500/रू. क े दर्थी, मासिसक भुग ान का विनदlश विदया, जो इस न्यायालय में स्र्थीानां रिर की गई रिर[7] याति(काओं क े अंति म परिरणाम क े अ ीन र्थीा। 18.08.2000 का उक्त अं रिरम आदेश इस प्रकार हैः- "आवेदक भार संघ की ओर से विवद्वान सॉलिलसिस7र जनरल और प्रत्यर्भिर्थीयों की ओर से विवद्वान वरिरष्ठ अति वक्ता श्री सान्याल को सुनने क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पश्चा ्, विवशुद्ध रूप से एक दर्थी, उपाय क े रूप में और मुख्य मामले में पक्षकारों क े अति कारों और दावों पर प्रति क ू ल प्रभाव <ाले विबना, हम न्याय विह में 19.01.2000 विदनांविक अपने आदेश को विनम्नलिललिt आशय में संशोति करना उपयुक्त मान े हैंः (i) प्राति कारी दर्थी, उपाय और आंभिशक भुग ान क े रूप में प्रत्येक वग, क े विवभिभन्न श्रेभिणयों क े कम,(ारिरयों को शाविमल कर े हुए वग,-1 क े कम,(ारिरयों को 1,500/- रुपये, वग,-II क े कम,(ारिरयों को 1000/- रुपये, वग,- III क े कम,(ारिरयों को 750/- रूपये और वग,-IV क े कम,(ारिरयों को 500/- रुपये प्रति माह का भुग ान.... ति भिर्थी से करेगें। यह भुग ान लंविब मामलों में पक्षकारों क े अति कारों और दावों पर विबना प्रति क ू ल प्रभाव क े होगा। (ii) हम यह स्पष्ट कर े हैं विक यह आदेश ए(आरए क े माध्यम से जो भी भुग ान जारी विकया जा रहा है या अति कारिरयों द्वारा संबंति कम,(ारिरयों को जारी विकया गया र्थीा, उसे प्रभाविव नहीं करेगा। (iii) 19.04.2000 को हमारे द्वारा जारी विकए गए भुग ानों क े बारे में विनदlश, व,मान आदेश द्वारा संशोति हो जाएगा। (iv) इस आदेश क े अनुसार, 01.04.2000 से 31.07.2000 क की सभी बकाया राभिश आज से दस सप्ताह क े भी र भुग ान कर दी जाएगी और व,मान भुग ान जो उसने 01.08.2000 से प्रभावी विकया है, अगस्, 2000 क े महीने क े लिलए देय वे न क े सार्थी। व,मान भुग ान Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 01.08.2000 से अगस् 2000 क े महीने क े लिलए देय वे न क े सार्थी विकया जाना (ाविहए। (v) दनुसार भविवष्य क े भुग ानों को उन्हें देय सामान्य वे न क े सार्थी विनयविम रूप से महीने-दर-महीने विकया जाए। यह आदेश विवशुद्ध रूप से एक दर्थी, उपाय क े रूप में पारिर विकया जा ा है और यह इस न्यायालय क े अंति म विनण,य को प्रभाविव नहीं करेगा। व,मान मामले क े विवशेष थ्यों क े मद्देनजर, इस आदेश को विकसी भी मामले में एक विमसाल(पूव,-विनण,य) क े रूप में नहीं माना जाएगा। हम उच्च न्यायालय क े एकल न्याया ीश द्वारा पारिर आदेश की प्रक ृ ति क े बारे में कोई राय व्यक्त नहीं कर े हैं। यह प्रश्न, मुख्य मामले में आए विनण,य का पालन करेगा। व,मान आदेश क े मद्देनजर, अं रिरम आवेदनों का विनस् ारण विकया जा ा है।..."
5. वष, 2002 में, भार सरकार ने इन साव,जविनक क्षेत्र क े उपक्रमों की फर्टि7लाइजर इकाइयों को बंद करने का आदेश विदया और एक स्वैच्छि‚ƒक पृर्थीक्करण योजना (संक्षेप में "योजना") शुरू की। इन क ं पविनयों क े प्रबं न क े अनुसार, फर्टि7लाइजर विनगम क े 5712 कम,(ारिरयों में से 5675 ने योजना क े ह बाहर जाने का विवकल्प (ुना। इस विवकास क े कारण, इस न्यायालय में स्र्थीानां रिर की गयी रिर[7] याति(काएं अं ः 25.04.2003 क े अंति म आदेश द्वारा tारिरज कर दी गई ंर्थीीं। उक्त अंति म आदेश में, इस न्यायालय ने अभिभलिललिt विकया विक आर्भिर्थीक व्यवहाय, ा या विनयोक्ता की विवत्तीय क्षम ा एक महत्वपूण, कारक है सिजसे वे न ढाँ(ें को य कर े समय नजरअंदाज नहीं विकया जा सक ा है और अभिभलेt पर मौजूद सामविग्रयों से स्पष्ट रूप से प ा (ला है Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विक इन दोनों क ं पविनयों को कई वषŠ से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा र्थीा। इस न्यायालय द्वारा पारिर अंति म आदेश में यह भी दज, विकया गया र्थीा विक अं रिरम राह विवशुद्ध रूप से एक दर्थी, उपाय र्थीी। इस न्यायालय क े 25.04.2003 क े अंति म आदेश का प्रासंविगक भाग इस प्रकार हैः- "... इस न्यायालय द्वारा 19.04.2000 को पारिर आदेश में स्पष्ट रूप से दज, विकया गया र्थीा विक दोनों क े सभी कम,(ारिरयों को एक सीविम राह विवशुद्ध रूप से दर्थी, उपाय क े रूप में और सभी संबंति व्यविक्तयों क े अति कारों और दावों पर प्रति क ू ल प्रभाव <ाले विबना दी जा रही र्थीी। यह 18.08.2000 क े पश्चा ्व C आदेश में दोहराया गया र्थीा जहाँ यह कहा गया र्थीा विक यह आदेश विवशुद्ध रूप से दर्थी, उपाय क े रूप में पारिर विकया जा रहा है और न्यायालय क े अंति म विनण,य को प्रभाविव नहीं करेगा। याति(काक ा,ओं द्वारा दावा की गई मुख्य राह भार संघ और सति(व, साव,जविनक उद्यम विवभाग (प्रत्यर्थीC सं. 3 और 4) क े लिtलाफ है क्योंविक इन्होंने ही 19.07.1995 क े आक्षेविप ज्ञापन को जारी विकया है जो बीआईएफआर क े सार्थी पंजीक ृ बीमारू साव,जविनक उपक्रम क े कम,(ारिरयों क े वे नमान क े संशो न पर प्रति बं लगा ा है। वास् व में संशोति वे न क े भुग ान क े लिलए प्रत्यर्थीC सं. 3 और 4 की ओर से कोई समझौ ा या बंदोबस् नहीं विकया गया र्थीा क्योंविक वे ऐसा करने क े लिलए कभी सहम नहीं हुए र्थीे और इस न्यायालय द्वारा 19.04.2000 और 18.08.2000 को पारिर आदेशों में स्पष्ट रूप से दर्भिश विकया गया र्थीा विक वे दर्थी, उपाय क े रूप में पारिर विकए जा रहे र्थीे और मामले क े अंति म Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विनण,य को विकसी भी रह से प्रभाविव नहीं कर े र्थीे, यह मानना संभव नहीं है विक पूव, स् र पर कही भी कोई समझौ ा हुआ र्थीा सिजससे याति(काक ा, संशोति वे न पाने क े हकदार हो े।..."
6. रोजगार क े अं ः समाप्त हो जाने पर, कम,(ारिरयों ने अति विनयम क े ह विनयंत्रण प्राति करण क े समक्ष आवेदन दालिtल करना शुरू कर विदया। विनयंत्रण प्राति करण क े समक्ष अपने आवेदनों में, कम,(ारिरयों ने मजदूरी क े विहस्से क े रूप में इस न्यायालय क े अं रिरम आदेशों क े अनुसरण में विकए गए दर्थी, भुग ान को अपने वे न क े रूप में दशा,या।
7. विनयंत्रण प्राति कारी ने कम,(ारिरयों द्वारा व्यविक्तग रूप से दायर विकए गए आवेदनों में दर्थी, भुग ान को वे न क े रूप में मान े हुए आदेश पारिर करना शुरू कर विदया।
8. विनयंत्रण प्राति कारी द्वारा पारिर आदेशों में से एक श्री काशी प्रसाद वित्रपाठी नाम क े एक कम,(ारी क े संबं में र्थीा।
9. (ूंविक विनयंत्रण प्राति कारी क े आदेश अं रिरम आदेशों क े सार्थी-सार्थी इस न्यायालय द्वारा पारिर अंति म आदेशों क े विवपरी र्थीे, इसलिलए इन क े प्रबं न ने आदेश क े स्पष्टीकरण/संशो न क े लिलए इस न्यायालय क े समक्ष एक आवेदन विदया। लेविकन 01.05.2008 क े एक आदेश द्वारा, इस न्यायालय ने क े वल यह कह े हुए अं रिरम आवेदन को विनस् ारिर कर विदया विक जब अंति म आदेश पारिर कर विदया जा ा है, ो अं रिरम आदेश स्व ः समाप्त हो जा ा है। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
10. उक्त आदेश को अलग रीक े से समझ े हुए, अति विनयम क े ह अपीलीय प्राति कारी ने प्रबं न द्वारा दायर अपील को tारिरज कर विदया। इसलिलए, प्रबं न ने उच्च न्यायालय में रिर[7] याति(काएं दायर की।
11. जहां क श्री काशी प्रसाद वित्रपाठी क े मामले का संबं है, प्रबं न ने रिर[7] याति(का संख्या 798/2009 में एक रिर[7] याति(का दायर की, सिजसे प7ना उच्च न्यायालय की एक tं<पीठ क े एक फ ै सले क े आ ार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय क े विवद्वान एकल न्याया ीश द्वारा अनुमति दी गई र्थीी। श्री काशी प्रसाद वित्रपाठी ने विवद्वान एकल न्याया ीश क े आदेश को tं<पीठ क े समक्ष असफल रूप से (ुनौ ी दी।इसलिलए श्री काशी प्रसाद वित्रपाठी ने एसएलपी (सी) संख्या 972/2014 में एक विवशेष अनुमति याति(का दायर की। इस एसएलपी को इस न्यायालय द्वारा दीवानी अपील संख्या 4258/2015 में विदनांक 05.05.2015 क े आदेश द्वारा अनुमति दी गई र्थीी। दीवानी अपील संख्या 4258/2015 में श्री काशी प्रसाद वित्रपाठी क े मामले में इस न्यायालय का आदेश विदनांक 05.05.2015 इस प्रकार हैः- "अनुमति प्रदान की गयी। अपीलक ा, उच्च न्यायालय क े उस आदेश से व्यभिर्थी है, सिजसमें विनयंत्रक प्राति कारी और अपीलीय प्राति कारी द्वारा पूव, में की गई गणना पर ध्यान न दे े हुए संविव ान क े अनु‚ƒेद 227 क े ह अपनी शविक्त क े प्रयोग में उच्च न्यायाालय ने अपीलक ा, को देय ग्रे‚यु7ी क े भुग ान की गणना की है, जो हमारे विव(ार में, उच्च न्यायालय क े अति कार क्षेत्र में नहीं है। मामले क े थ्यों और परिरच्छिस्र्थीति यों, अभिभलेt पर मौजूद साक्ष्य और विवरो ी विवति क कŠ को ध्यान में रt े हुए, हमारा विव(ार है विक उच्च न्यायालय Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को उपदान क े भुग ान और ब्याज क े सार्थी दर्थी, भुग ान की गणना में हस् क्षेप नहीं करना (ाविहए र्थीा। इसलिलए अपीलक ा, इस अपील में सफल होगा। दनुसार, अपील को अनुमति दी जा ी है। यह उल्लेt करने की आवश्यक ा नहीं है विक प्रत्यर्थीC सं. 2 द्वारा उठाया गया प्रश्न अनुत्तरिर है।"
12. प्रबं न ने पुनर्टिव(ार क े लिलए याति(का दायर की। इसे 13.08.2015 को tारिरज कर विदया गया र्थीा। उप(ारात्मक याति(का भी 03.03.2016 को tारिरज कर दी गई र्थीी।
13. इस न्यायालय द्वारा सिसविवल अपील संख्या 4258/2015 में 05.05.2015 को पारिर आदेश क े बाद, श्री काशी प्रसाद वित्रपाठी क े मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अन्य कम,(ारिरयों क े संबं में दायर सभी रिर[7] याति(काओं को tारिरज कर विदया। इसलिलए अन्य कम,(ारिरयों क े मामले में इस रह क े आदेशों को (ुनौ ी दे े हुए, उव,रक विनगम क े प्रबं न ने 98 अपीलें दायर की हैं। हिंहदुस् ान उव,रक विनगम ने एक ऐसी अपील दायर की है जो कलकत्ता उच्च न्यायालय क े समान विनण,य से उत्पन्न हुई है।
14. इसलिलए, विव(ार क े लिलए जो संतिक्षप्त प्रश्न उठ ा है, वह यह है विक क्या 18.08.2000 को इस न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेशों क े अनुसरण में प्रबं न द्वारा विकया गया दर्थी, मासिसक भुग ान, अति विनयम की ारा 2( ) क े ह उक्त पद क े दायरे क े ह मजदूरी क े रूप में माना जा सक ा है, विवशेष ौर पर श्री काशी प्रसाद वित्रपाठी क े मामले में इस न्यायालय द्वारा पारिर आदेश क े आलोक में। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
15. हमने श्री काशी प्रसाद वित्रपाठी क े मामले में दीवानी अपील संख्या 4258/2015 में 05.05.2015 को इस न्यायालय द्वारा पारिर आदेश को पहले ही उद्धृ विकया है। उक्त आदेश इस प्रश्न पर विव(ार नहीं कर ा है। उक्त आदेश इस आ ार पर है विक उपदान की राभिश की गणना पूरी रह से संविवति क े ह अति कारिरयों क े अति कारक्षेत्र क े भी र है और उच्च न्यायालय इसमें हस् क्षेप करने क े लिलए सक्षम नहीं है। इसलिलए काशी प्रसाद वित्रपाठी क े मामले में पारिर आदेश इस आशय का कोई कानून प्रति पाविद करने वाला नहीं माना जा सक ा विक दर्थी, भुग ान वे न का विहस्सा होगा। इसलिलए प्रत्यर्थीCगण वास् व में काशी प्रसाद वित्रपाठी क े मामले में पारिर आदेश का लाभ क े वल इस आ ार पर नहीं उठा सक े हैं विक विवति का यह प्रश्न, प्रबं न द्वारा सिसविवल अपील में उठाया गया र्थीा और उसक े बाद पुनर्टिव(ार और उप(ारात्मक याति(का में उठाया गया र्थीा।कई बार, यह न्यायालय विवति क े प्रश्नों पर विव(ार करने से इनकार कर दे ा है, जब उच्च न्यायालय द्वारा अपने पक्ष में विदए गए आदेश से लैस एकल व्यविक्त राज्य क े विवरूद्ध tड़ा हो ा है। जब भी राज्य या राज्य क े अंग व्यविक्तग वाविदयों को विदए गए ƒो7े लाभों को (ुनौ ी देने वाली अपीलों क े सार्थी आ े हैं, ो यह न्यायालय आनुपाति क ा क े परीक्षण को यह देtने क े लिलए लागू कर ा है विक क्या संबंति व्यविक्त को विदए गए लाभों की मात्रा, दूरदराज क े उस सामान्य व्यविक्त की कीम पर, विवति क े प्रश्न की परीक्षा को सही ठहरा ी है। ऐसे मामलों में विवति क े प्रश्न पर विव(ार विकए जाने से इस न्यायालय क े इनकार को एक विवशेष रीक े से उस प्रश्न क े उत्तर देने क े रूप में नहीं माना जा सक ा है। इसलिलए काशी प्रसाद वित्रपाठी क े मामले में इस न्यायालय द्वारा विदए गए आदेश से इ र, हम इस बै( में उत्पन्न विवति क े प्रश्न पर विव(ार करने क े लिलए बाध्य हैं। Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
16. अति विनयम की ारा 2 ( ) मजदूरी को विनम्नानुसार परिरभाविष कर ी हैः- "2. परिरभाषाएँ- इस अति विनयम में, जब क विक संदभ, से अन्यर्थीा अपेतिक्ष न हो,- Xxx xxx xxx ( ) "मजदूरी" से वे सब उपलच्छिब् यां अभिभप्रे हैं जो विकसी कम,(ारी द्वारा अपने विनयोजन क े विनबन् नों और श Š क े अनुसार क,व्यारूढ़ होने अर्थीवा ƒ ु ट्टी पर होने की दशा में अर्जिज की जा ी हैं र्थीा जो उसे नकद संदत्त की जा ी हैं अर्थीवा संदेय हैं र्थीा इसक े अन् ग, महंगाई भत्ता है विकन् ु इसक े अन् ग, कोई बोनस, कमीशन, गृह-विकराया भत्ता, अति काल मजदूरी और कोई अन्य भत्ता नहीं है।"
17. इस पद की परिरभाषा 3 भागों में है, पहला भाग पद क े अर्थी, को इंविग कर ा है, दूसरा भाग यह दशा, ा है विक उसमें क्या शाविमल है और ीसरा भाग यह दशा, ा है विक उसमें क्या शाविमल नहीं है। परिरभाषा क े पहले भाग में इस बा पर जोर विदया गया है विक कम,(ारी द्वारा "विनयोजन क े अनुसार" क्या अर्जिज विकया जा ा है।
18. इस बा पर ध्यान विदए विबना विक जो अर्जिज विकया गया र्थीा उसका भुग ान विकया गया है या संदेय है, इसे परिरभाषा में शाविमल विकया गया है, बश l विक यह उसक े विनयोजन क े अनुसार हो।
19. उपरोक्त परिरभाषा को ध्यान में रt े हुए, यविद हम ऐति हासिसक थ्यों पर वापस जा े हैं, ो यह स्पष्ट होगा विक कम,(ारिरयों ने वष, 1996 में वे नमान क े संशो न क े Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लाभ क े लिलए विवभिभन्न उच्च न्यायालयों क े समक्ष सबसे पहले वादक्रम शुरू विकया, इस आ ार पर विक अन्य साव,जविनक उपक्रमों क े कम,(ारिरयों को सरकारी कम,(ारिरयों क े बराबर संशो न लाभ विदया गया है। इस प्रकार यह स्पष्ट होगा विक पहले क े वादक्रम में जो दावा विकया गया र्थीा वह वह नहीं र्थीा जो विनयोजन क े अनुसार देय र्थीा। इसलिलए यह न्यायालय 18.08.2000 क े अपने अं रिरम आदेश में ही स्पष्ट र्थीा विक इस आदेश क े ह विदए गए दर्थी, भुग ान को क ै सा माना जाएगा। यहां क विक अंति म आदेश में भी, इस न्यायालय ने यह स्पष्ट कर विदया र्थीा विक जो भुग ान विकया गया र्थीा वह क े वल दर्थी, र्थीा।
20. यह विवति का एक मूलभू सिसद्धां है विक कोई पक्षकार जो एक अं रिरम आदेश का लाभ उठा रहा है, ऐसे अं रिरम आदेश का लाभ tो देगा जब मामले का अंति म परिरणाम उसक े लिtलाफ आ ा है। इस न्यायालय द्वारा 25.04.2003 क े एक आदेश द्वारा हस् ां रिर विकए गए वादों को अच्छिन् म रूप से tारिरज विकए जाने से पहले स्वैच्छि‚ƒक पृर्थीक्करण योजना क े प्रभाव में आने की आकच्छिस्मक परिरच्छिस्र्थीति क े कारण, एक भ्रम पैदा हुआ विक अंति म आहरिर वे न में दर्थी, भुग ान शाविमल है, यह संभव नहीं है विक इस मौलिलक विनयम क े लिtलाफ जाया जाए विक विकसी अं रिरम आदेश क े लाभ स्व(ालिल रूप से समाप्त हो जाएंगे जब इसे प्राप्त करने वाला पक्षकार अंति म (रण में विवफल हो जाएगा।
21. द स्7्रॉ बो<, मैन्युफ ै क्(रिंरग क ं पनी लिलविम7े< बनाम इट्स वक, मैन 1 में, इस न्यायालय ने इस अति विनयम की ारा 2( ) क े ह "मजदूरी" पद क े अर्थी, को 1 (1977) 2 एससीसी 329 Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विनम्नानुसार स्पष्ट विकया हैः "हम स्पष्ट कर े हैं विक मजदूरी क े अर्थी, में मूल मजदूरी और महंगाई भत्ता शाविमल होगा और क ु ƒ नहीं।"
22. उपरोक्त क े मद्देनजर, अपील को अनुमति दी जा ी है और अति विनयम क े ह उच्च न्यायालय, विनयंत्रण प्राति कारी और अपीलीय प्राति कारी क े आदेश सिजसमें माना गया है विक इस न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम आदेश क े अनुसरण में विकया गया दर्थी, भुग ान वे न का विहस्सा होगा, को अपास् विकया जा ा है। हालांविक, समय क े प्रवाह को देt े हुए और इस थ्य को ध्यान में रt े हुए विक क ु ƒ कम,(ारी अब जीविव नहीं हैं, हम प्रबं न को विनदlश दे े हैं यविद भुग ान पहले ही प्रत्यर्भिर्थीयों या उनक े परिरवारों में से विकसी को विकया जा (ुका है ो उसकी प्राविप्त को प्रभाविव न करें। लाग क े लिलए कोई आदेश नहीं होगा।............................................. (न्यायमूर्ति हेमं गुप्ता)............................................. (न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यम) नई विदल्ली; 7 अप्रैल 2022. Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA