Rajasthan State v. Banwari Lal and Others

Supreme Court of India · 08 Apr 2022 · 2022 INSC 410
M. R. Shah; B. R. Gavai
Criminal Appeal No /2022
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court restored the original three-year sentence under Section 307 IPC imposed on Banwari Lal, set aside the High Court's reduction of sentence, dismissed the appeal against probation granted to Mohan Lal, and condoned the delay in filing the State's appeal.

Full Text
Translation output
भारत का सर्वो च्च न्यायालय
आपराधि क अपीलीय क्षेत्राधि कार
आपराधि क अपील सं. /2022
(2022 की विर्वोशेष अनुमधित याधि$का (आपराधि क) संख्या से उत्पन्न
डायरी संख्या 21596/2020 से उत्पन्न)
राजस्थान राज्य ... अपीलकता3
बनाम
बनर्वोारी लाल और अन्य ...प्रत्यथ7
विनर्ण3य
एम.आर. शाह, जे.
JUDGMENT

1. अनुमधित दी गई।

2. एस.बी.आपराधि क अपील संख्या 36/1993 में राजस्थान उच्च न्यायालय, पीठ जयपुर द्वारा पारिरत आक्षेविपत विनर्ण3य एर्वों आदेश विदनांक 06.05.2015 से व्यथिथत एर्वों असंतुष्ट महसूस करते हुए, राज्य ने र्वोत3मान अपील को प्रस्तुत विकया है। उच्च न्यायालय ने उक्त अपील को आंथिशक रूप से स्र्वोीकार विकया है और भा.द.सं. की ारा 307 क े तहत अपरा क े लिलए प्रत्यथ[7] नंबर 1 क े दण्डादेश को यथार्वोत रखते हुए, सजा को तीन साल क े सश्रम कारार्वोास से घटाकर उसक े द्वारा पहले से ही अथिभरक्षा की अर्वोधि (44 विदन) तक कर विदया गया है और जहां तक अथिभयुक्त-प्रत्यथ[7] मोहन लाल का संबं है, उच्च न्यायालय ने विन$ली अदालत द्वारा भा.द.सं. की ारा 324 क े तहत उसे दोषी ठहराने और द.प्र.सं. की ारा 360 क े तहत परिरर्वोीक्षा पर रिरहा करने क े आदेश में हस्तक्षेप नहीं विकया है। 2022 INSC 410

3. यह विक प्रत्यर्थिथयों और अन्य पर ारा 147, 148, 149, 447, 323 र्वो 307 भा.द.सं. क े तहत अपरा ों क े लिलए विर्वोद्वान विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा कोथिशश की गई थी । जहां तक आरोपी बनर्वोारी लाल - प्रत्यथ[7] नंबर 1 का संबं है उस पर भा.द.सं. की ारा 307 क े लिलए मुकदमा $लाया गया था, जिजसमें घायल व्यविक्त – फ ू ल $ंद की खोपड़ी / जिसर क े बी$ में गंभीर $ोटें लगी थीं, जो विक घायल फ ू ल$ंद को खोपड़ी क े बी$ में मस्तिस्तष्क की जि`ल्ली तक फ ै ली हुई 10 x 1 सेमी आकार की हड्डी का गहरा घार्वो था और हड्डी बाहर विनकल रही थी। उसे अन्य $ोटें भी आई हैं। 3.[1] सबूतों की विर्वोर्वोे$ना पर, विर्वो$ारर्ण न्यायालय ने कहा विक अथिभयोजन पक्ष ने उधि$त संदेह से परे साविबत कर विदया है विक घायल फ ू ल $ंद को लगी $ोटें, जो अथिभयुक्त बनर्वोारी लाल क े कारर्ण हुई थीं, प्रक ृ धित क े सामान्य क्रम में मौत का कारर्ण बनने क े लिलए पया3प्त थीं। ऐसा देखते हुए, विर्वो$ारर्ण न्यायालय ने प्रत्यथ[7] - बनर्वोारी लाल को भा.द.सं. की ारा 307 क े लिलए दोषी ठहराया और उसे तीन साल क े कठोर कारार्वोास की सजा सुनाई। हालाँविक, जहाँ तक अथिभयुक्त मोहन लाल का संबं है, विर्वोद्वान विर्वो$ारर्ण न्यायालय ने, हालांविक उसे दोषी ठहराया, लेविकन परिरर्वोीक्षा का लाभ विदया। 3.[2] विर्वोद्वान विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा विदए गए फ ै सले और दोषजिसधिk क े आदेश और सजा से व्यथिथत और असंतुष्ट महसूस करते हुए, प्रत्यथ[7] - अथिभयुक्त बनर्वोारी लाल और मोहन लाल, दोनों ने उच्च न्यायालय क े समक्ष अपील की। उच्च न्यायालय क े समक्ष अथिभयुक्त - बनर्वोारी लाल की ओर से मुख्य दलीलें दी गई ं, जिजसमें प्रत्यथ7यों ने अपनी दोषजिसधिk को $ुनौती नहीं दी, लेविकन जहाँ तक अथिभयुक्त बनर्वोारी लाल का संबं है, सजा कम करने की प्राथ3ना की, इस आ ार पर विक घटना 31.03.1989 को हुई थी, यानी लगभग 26 साल पहले हुई और र्वोे विपछले 26 सालों से मुकदमे का सामना कर रहे थे; साथ ही जब घटना घटी, र्वोे युर्वोा थे और अब र्वोे र्वोृk हो $ुक े हैं। अथिभयुक्त बनर्वोारी लाल की ओर से यह भी विनर्वोेदन विकया गया विक जैसे अथिभयुक्त मोहन लाल को परिरर्वोीक्षा का लाभ विदया गया है, उसे भी परिरर्वोीक्षा का लाभ विदया जा सकता है। इसक े बाद, कोई और कारर्ण बताए विबना और अपरा की प्रक ृ धित या गंभीरता पर विर्वो$ार विकए विबना और आरोपी बनर्वोारी लाल द्वारा घायल फ ू ल$ंद को लगी गंभीर $ोटों क े विबना, उच्च न्यायालय ने उक्त अपील को आंथिशक रूप से स्र्वोीकार कर लिलया और दोषजिसधिk को बनाए रखते हुए, सजा को घटाकर उसक े द्वारा पहले से ही काटी गई अर्वोधि (44 विदन) कर दी है। उच्च न्यायालय ने आरोपी मोहन लाल की अपील खारिरज कर दी है। 3.[3] उच्च न्यायालय द्वारा विदए गए आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश से व्यथिथत और असंतुष्ट महसूस करने, विर्वोद्वान विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा दी गई सजा में हस्तक्षेप करने और विर्वोद्वान विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा लगाए गए तीन साल क े सश्रम कारार्वोास से पहले से ही (44 विदन) की अर्वोधि तक कम करने क े आ ारों पर अथिभयुक्त बनर्वोारी लाल क े संबं में और अथिभयुक्त मोहन लाल क े संबं में परिरर्वोीक्षा क े आदेश की पुविष्ट करने पर राज्य ने र्वोत3मान अपील को प्रस्तुत विकया है। 3.[4] अपील को प्रस्तुत करने में 1880 विदनों की भारी देरी हुई है और इसलिलए राज्य द्वारा एक अलग आपराधि क विर्वोविर्वो आर्वोेदन दायर विकया गया है, जिजसमें देरी को माफ करने की प्राथ3ना की गई है।

4. राज्य की ओर से उपस्तिस्थत विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता श्री विर्वोशाल मेघर्वोाल ने पुरजोर ढंग से कथन विकया है विक मामले क े तथ्यों और परिरस्तिस्थधितयों में, उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश विन$ली अदालत द्वारा लगाए गए तीन साल क े सश्रम कारार्वोास से सजा को पहले से ही (44 विदन) की अर्वोधि तक कम कर विदया गया है। 4.[1] यह पुरजोर कथन विकया गया है विक इस प्रकार उच्च न्यायालय द्वारा विन$ली अदालत द्वारा लगाई गई सजा को कम करने क े लिलए कोई विर्वोशेष कारर्ण नहीं विदया गया है। 4.[2] यह तक 3 भी विदया गया है विक सजा को कम करते समय उच्च न्यायालय ने कम करने र्वोाली और उत्तेजक परिरस्तिस्थधितयों पर विर्वो$ार नहीं विकया है, जो उधि$त सजा/सजा लगाने क े उद्देश्य से प्रासंविगक हैं। 4.[3] यह कथन विकया गया है विक उच्च न्यायालय ने अपरा की गंभीरता और पीविड़त/घायल फ ू ल$ंद को लगी गंभीर $ोटों पर विबल्क ु ल भी विर्वो$ार नहीं विकया है। 4.[4] आगे यह भी कथन विकया गया है विक जब न्याधियक विर्वोर्वोेक का प्रयोग विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा ारा 307 भा.द.सं. क े लिलए अथिभयुक्त को तीन साल क े सश्रम कारार्वोास (बनर्वोारी लाल) की सजा सुनाते हुए विकया गया था, इसमें उच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप नहीं विकया जाना $ाविहए था, विर्वोशेष रूप से, जब दोषजिसधिk को $ुनौती देने र्वोाली अपील पर जोर नहीं विदया गया था। 4.[5] उपरोक्त तक 3 देते हुए और इस न्यायालय क े विनर्ण3य राजस्थान राज्य बनाम मोहन लाल, (2018) 18 एससीसी 535; मध्य प्रदेश राज्य बनाम उ म, (2019) 10 एससीसी 300; और सतीश क ु मार जयंती लाल डाबगर बनाम गुजरात राज्य, (2015) 7 एससीसी 359 का समथ3न करते हुए यह प्राथ3ना की है विक र्वोत3मान अपील की अनुमधित दी जाए, उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश को विनरस्त विकया जाए और विर्वोद्वान विर्वो$ारर्ण न्यायालय क े विनर्ण3य को बहाल विकया जाए।

5. प्रत्यथ7गर्ण की ओर से उपस्तिस्थत विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता श्री अथिभषेक गुप्ता ने र्वोत3मान अपील का पुरजोर विर्वोरो विकया है। 5.[1] अथिभयुक्त की ओर से उपस्तिस्थत विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता श्री अथिभषेक गुप्ता ने जोरदार ढंग से कथन विकया है विक उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश क े लिखलाफ अपील करने में 1880 विदनों की भारी देरी हुई है। यह विक आरोपी अपने जीर्वोन में विफर से बस गए हैं और उनका आ$रर्ण तब से संतोषजनक है और आक्षेविपत विनर्ण3य पारिरत होने क े बाद, र्वोे विकसी भी आपराधि क गधितविर्वोधि में लिलप्त नहीं हैं और घटना र्वोष[3] 1989 की है, काय3र्वोाही को विफर से शुरू करना अत्यंत कठोर और अनुधि$त होगा। इसलिलए, यह प्राथ3ना की जाती है विक अपील को प्राथविमकता देने में 1880 विदनों क े भारी विर्वोलंब को माफ न विकया जाए। 5.[2] गुर्णार्वोगुर्ण पर, अथिभयुक्त की ओर से उपस्तिस्थत विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने पुरजोर ढंग से कथन विकया है विक सजा कम करते समय उच्च न्यायालय ने अथिभयुक्त बनर्वोारी लाल की ओर से प्रस्तुत तथ्यों पर विर्वो$ार विकया है विक घटना लगभग 26 साल पहले हुई थी और आरोपी विपछले 26 साल से मुकदमे का सामना कर रहे थे और जब घटना 1989 में हुई थी, तब आरोपी युर्वोा थे और अब र्वोे र्वोृk व्यविक्त हैं। यह कथन विकया है विक पूर्वो क्त को पहले से ही (44 विदन) की अर्वोधि क े लिलए सजा को कम करते हुए प्रासंविगक विर्वो$ार कहा जा सकता है। 5.[3] अथिभयुक्त की ओर से उपस्तिस्थत विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता ने आगे कथन विकया है विक जहाँ तक अथिभयुक्त मोहन लाल को परिरर्वोीक्षा का लाभ देने का संबं है, र्वोह परिरर्वोीक्षा विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा दी थी, जिजसक े लिखलाफ राज्य ने उच्च न्यायालय क े समक्ष कोई अपील नहीं की थी, इसलिलए जब उच्च न्यायालय ने आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश द्वारा अथिभयुक्त मोहन लाल द्वारा दायर अपील को खारिरज कर विदया, तो राज्य क े पास अब अथिभयुक्त मोहन लाल को परिरर्वोीक्षा का लाभ देने क े आदेश को $ुनौती देने का अधि कार भी नहीं है, क्योंविक राज्य द्वारा उच्च न्यायालय क े समक्ष इसे $ुनौती नहीं दी गई थी। 5.[4] उपरोक्त विनर्वोेदन करते हुए, यह प्राथ3ना की गई विक विर्वोलम्ब को क्षमा करने क े आर्वोेदन क े साथ-साथ गुर्ण-दोष क े आ ार पर भी अपील को अस्र्वोीकार कर विदया जाए।

6. हमने संबंधि त पक्षों क े विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता को विर्वोस्तार से सुना है। प्रारंभ में, यह ध्यान विदया जाना आर्वोश्यक है विक आरोपी बनर्वोारी लाल को विन$ली अदालत ने पीविड़त/घायल फ ू ल$ंद क े शरीर क े महत्र्वोपूर्ण[3] विहस्से पर गंभीर $ोटें पहुँ$ाने क े लिलए भा.द.सं. की ारा 307 क े लिलए दोषी ठहराया था। घायल फ ू ल$ंद को खोपड़ी क े क ें द्र में मस्तिस्तष्क की जि`ल्ली तक फ ै ली हुई 10 x 1 सेमी आकार की हड्डी का गहरा घार्वो था और हड्डी बाहर विनकली हुई थी। तत्पश्चात, आरोपी बनर्वोारी लाल को दोषी पाते हुए, विन$ली अदालत ने उसे तीन साल क े कठोर कारार्वोास की सजा सुनाई। उच्च न्यायालय क े समक्ष एक अपील में, अथिभयुक्त ने दोषजिसधिk को $ुनौती नहीं दी, बस्तिल्क क े र्वोल अदालत से प्राथ3ना की विक र्वोह सजा को उस अर्वोधि तक कम कर दे जो उसने पहले ही काट ली है और कहा विक घटना 31.03.1989 को हुई थी। यानी लगभग 26 साल पहले, विक र्वोे विपछले 26 साल से मुकदमे का सामना कर रहे थे; और जब घटना घटी, र्वोे युर्वोा थे और अब र्वोे र्वोृk व्यविक्त हैं। उच्च न्यायालय ने मामले क े तथ्यों क े विर्वोस्तृत विर्वोश्लेषर्ण क े विबना, $ोट की प्रक ृ धित, हथिथयार का इस्तेमाल विकया, बस सजा को पहले से ही (44 विदन) की अर्वोधि तक कम कर विदया है। आक्षेविपत विनर्ण3य का प्रासंविगक भाग विनम्नानुसार है: "मैंने पक्षकारों क े विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता को सुना है और रिरकॉड[3] पर प्रासंविगक सामग्री का ध्यानपूर्वो3क अध्ययन विकया है। मामले क े तथ्यों और परिरस्तिस्थधितयों को देखते हुए, मैं अपीलकता3 मोहन लाल द्वारा दायर अपील क े संबं में विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश में हस्तक्षेप करना उधि$त नहीं सम`ता। जहाँ तक अथिभयुक्त अपीलकता3 बनर्वोारी लाल द्वारा दायर अपील का संबं है, अपीलकता3ओं क े विर्वोद्वान अधि र्वोक्ता क े तक€ को ध्यान में रखते हुए विक अथिभयुक्त अपीलाथ[7] बनर्वोारी लाल विपछले 26 र्वोष€ से मुकदमे का सामना कर रहा है; मुकदमे क े दौरान र्वोह 44 विदनों तक विहरासत में रहे; र्वोह पहले से सजायाफ्ता व्यविक्त नहीं है, मेरे विर्वो$ार में, न्याय का उद्देश्य पूरा हो जाएगा यविद अपीलकता3 बनर्वोारी को दी गई सजा को उसक े द्वारा पहले से ही क ै द में रहने की अर्वोधि तक कम कर विदया गया है, जैसा विक यहां-ऊपर बताया गया है। अतः इस अपील का विनस्तारर्ण विनम्न विनद„शों क े साथ विकया जाता है: i) अपीलकता3 बनर्वोारी द्वारा दायर अपील आंथिशक रूप से स्र्वोीकार की जाती है; ii) उसकी दोषजिसधिk बहाल रखी जाती है। उसकी सज़ा कम कर दी जाती है और उसे उस अर्वोधि क े लिलए रिरहा कर विदया जाता है, जो उसने पहले ही कारार्वोास में काट ली है, जैसा विक ऊपर बताया गया है। iii) आरोपी अपीलकता3 बनर्वोारी लाल की सजा विनलंविबत कर दी गई और र्वोह जमानत पर है। उसे आत्मसमप3र्ण करने की आर्वोश्यकता नहीं है और उसक े जमानत बांड रद्द कर विदए गए हैं। iv) जहां तक अथिभयुक्त मोहन लाल द्वारा दायर अपील का संबं है, $ूंविक उसे पहले ही परिरर्वोीक्षा का लाभ विदया जा $ुका है, मु`े उनकी अपील में कोई बल नहीं विमला और परिरर्णामस्र्वोरूप, अथिभयुक्त मोहन लाल क े रूप में अपील, विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा पारिरत विनर्ण3य और आदेश की पुविष्ट करने क े बाद खारिरज की जाती है। तद्नुसार विर्वोर्वोाविदत विनर्ण3य संशोधि त विकया जाता है।" 6.[1] जिजस तरह से उच्च न्यायालय ने अपील पर कार3र्वोाई की है और प्रासंविगक तथ्यों पर ध्यान विदए विबना और अपरा की गंभीरता और प्रक ृ धित पर विर्वो$ार विकए विबना सजा को कम विकया है, र्वोह ठहरने योग्य नहीं है। उच्च न्यायालय ने अपील को आकस्तिस्मक और लापरर्वोाह तरीक े से विनपटाया है। उच्च न्यायालय द्वारा विदया गया विनर्ण3य और सजा को कम करने का आदेश और क ु छ नहीं बस्तिल्क न्याय का उपहास करने का एक उदाहरर्ण है और इस न्यायालय द्वारा उधि$त सजा/उपयुक्त दंड लगाने पर विनर्ण3यों क े क्रम में इस न्यायालय द्वारा विन ा3रिरत कानून क े सभी जिसkांतों क े विर्वोरुद्घ है।

7. इस स्तर पर, विकसी विदए गए मामले में उधि$त सजा देने क े लिलए सजा और परीक्षर्ण क े जिसkांतों पर इस न्यायालय क े क ु छ विनर्ण3यों को संदर्थिभत करने और विर्वो$ार करने की आर्वोश्यकता है। i) मोहन लाल (सुप्रा) क े मामले में, उच्च न्यायालय ने विर्वोद्वान विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा पारिरत विनर्ण3य और आदेश को संशोधि त विकया और अथिभयुक्त को उसक े द्वारा पहले से ही विबताई गई अर्वोधि क े लिलए सजा सुनाई, जो क े र्वोल छह विदनों का था और विबल्क ु ल कोई कारर्ण नहीं या बहुत कम र्वोै कारर्ण, उच्च न्यायालय द्वारा विनर्दिदष्ट विकए गए थे। उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश को अपास्त करते हुए, इस न्यायालय ने पैराग्राफ 9 से 13 में विनम्नानुसार अर्वोलोकन विकया है: “9. उच्च न्यायालय ने उपयु3क्त भौधितक तथ्यों को आसानी से दरविकनार कर विदया और अथिभयुक्त को उसक े द्वारा पहले ही विबताई गई अर्वोधि क े लिलए सजा सुनाई, जो इस मामले में क े र्वोल 6 विदन है। हमारे विर्वो$ार में, विन$ली अदालत और उच्च न्यायालय ने भा.द.सं. की ारा 325 और 323 क े तहत अथिभयुक्तों को अपरा क े लिलए दोषी ठहराते हुए एक उदार दृविष्टकोर्ण अपनाया है। उच्च न्यायालय द्वारा 6 विदनों की मामूली सजा देने क े लिलए विबल्क ु ल कोई कारर्ण नहीं या बहुत कम र्वोै कारर्ण विनर्दिदष्ट विकए गए हैं। उच्च न्यायालय द्वारा इस तरह की सजा देना इस न्यायालय क े न्याधियक विर्वोर्वोेक को `क`ोरता है।

10. र्वोत3मान में, भारत में सजा संबं ी विदशाविनद„श नहीं हैं जो या तो विर्वो ाधियका या न्यायपालिलका द्वारा जारी विकए गए हों। हालाँविक, अदालतों ने सजा देने क े मामले में क ु छ विदशा-विनद„श बनाए हैं। र्वोै ाविनक सीमाओं क े भीतर सजा देने में एक न्याया ीश क े पास व्यापक विर्वोर्वोेकाधि कार होता है। $ूंविक कई अपरा ों में क े र्वोल अधि कतम सजा विन ा3रिरत है और क ु छ अपरा ों क े लिलए न्यूनतम सजा विन ा3रिरत है, प्रत्येक न्याया ीश तदनुसार अपने विर्वोर्वोेक का प्रयोग करता है। इसलिलए, कोई एकरूपता नहीं हो सकती। हालाँविक, इस न्यायालय ने बार-बार माना है विक अदालतों को सजा सुनाते समय क ु छ जिसkांतों को ध्यान में रखना होगा, जैसे आनुपाधितकता, प्रधितरो और पुनर्वोा3स। आनुपाधितकता विर्वोश्लेषर्ण में, अपरा ी क े लिलए उधि$त दंड विन ा3रिरत करने क े लिलए अपरा की गंभीरता का आंकलन करना आर्वोश्यक है। विकसी अपरा की गंभीरता, अन्य बातों क े अलार्वोा, उसकी दुष्प्रभार्वो पर भी विनभ3र करती है।

11. इस न्यायालय ने सोमन बनाम क े रल राज्य [सोमन बनाम क े रल राज्य, (2013) 11 SCC 382: (2012) 4 SCC (Cri) 1] में इस प्रकार देखा: (SCC पृष्ठ 393, पैरा 27) "27.1. अदालतों को थिभन्न-थिभन्न तक€ पर सजा क े फ ै सले को आ ार बनाना $ाविहए - जिजनमें से सबसे प्रमुख आनुपाधितकता और विनर्वोारर्ण होगा। 27.2.आपराधि क कार3र्वोाई क े परिरर्णामों का प्रश्न आनुपाधितकता और विनर्वोारक दोनों दृविष्टकोर्णों से प्रासंविगक हो सकता है। 27.[3] जहां तक आनुपाधितकता का संबं है, सजा को अपरा की गंभीरता या गंभीरता क े अनुरूप होना $ाविहए। 27.4.अपरा की गंभीरता को आंकने क े लिलए प्रासंविगक कारकों में से एक इसक े परिरर्णामस्र्वोरूप होने र्वोाले परिरर्णाम हैं।

27.5. अनपेधिक्षत परिरर्णाम/नुकसान अभी भी अपरा ी को उधि$त रूप से जिजम्मेदार ठहराया जा सकता है यविद र्वोे यथोधि$त पूर्वोा3भास थे। शराब क े अर्वोै और भूविमगत विनमा3र्ण क े मामले में, विर्वोषाक्तता की संभार्वोना इतनी अधि क होती है विक न क े र्वोल इसक े विनमा3ता बस्तिल्क विर्वोतरक और खुदरा विर्वोक्र े ता को उपभोक्ता को इसक े संभाविर्वोत जोलिखमों क े बारे में पता $ल जाता है। इसलिलए, भले ही उपभोक्ता को विकसी भी नुकसान का सी ा इरादा नहीं हो सकता है, अगर नकली शराब क े सेर्वोन क े परिरर्णामस्र्वोरूप उपभोक्ता को क ु छ गंभीर $ोट लगती है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो क ु छ गंभीर दोष जुड़ा होना $ाविहए।

12. एलिलस्टर एंथोनी परेरा बनाम महाराष्ट्र राज्य [एलिलस्टर एंथोनी परेरा बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2012) 2 SCC 648: (2012) 1 SCC (Civ) 848: (2012) 1 SCC () में इस अदालत का फ ै सला भी यही है। सीआरआई) 953] जिजसमें यह इस प्रकार मनाया जाता है: (एससीसी पृष्ठ 674, पैरा 84) "84. अपरा क े मामलों में सजा देना एक महत्र्वोपूर्ण[3] काय[3] है। आपराधि क कानून क े प्रमुख उद्देश्यों में से एक अपरा की प्रक ृ धित और गंभीरता और जिजस तरीक े से अपरा विकया जाता है, उसक े अनुरूप उधि$त, पया3प्त, न्यायसंगत और आनुपाधितक सजा देना है। अपरा क े सबूत क े आ ार पर विकसी अथिभयुक्त को सजा देने का कोई कठोर फॉमू3ला नहीं है। अदालतों ने क ु छ जिसkांत विर्वोकजिसत विकए हैं: सजा देने की नीधित का दोहरा उद्देश्य विनर्वोारर्ण और सु ार है। कौन सी सजा न्याय क े उद्देश्य को पूरा करेगी यह प्रत्येक मामले क े तथ्यों और परिरस्तिस्थधितयों पर विनभ3र करता है और अदालत को अपरा की गंभीरता, अपरा का मकसद, अपरा की प्रक ृ धित और अन्य सभी परिरस्तिस्थधितयों को ध्यान में रखना $ाविहए।"

13. उपरोक्त विटप्पथिर्णयों से, यह स्पष्ट है विक दंड लगाने का जिसkांत प्रत्येक मामले क े तथ्यों और परिरस्तिस्थधितयों पर विनभ3र करेगा। हालांविक, सजा उधि$त, पया3प्त, न्यायसंगत, आनुपाधितक और अपरा की प्रक ृ धित और गंभीरता और जिजस तरीक े से अपरा विकया गया है, उसक े अनुरूप होना $ाविहए। सजा देते समय अपरा की गंभीरता, अपरा का मकसद, अपरा की प्रक ृ धित और अन्य सभी उपस्तिस्थत परिरस्तिस्थधितयों को ध्यान में रखा जाना $ाविहए। अदालत सजा सुनाते समय लापरर्वोाह नहीं हो सकती, क्योंविक सजा देने की प्रविक्रया में अपरा और अपरा ी दोनों समान रूप से महत्र्वोपूर्ण[3] हैं। अदालतों को देखना होगा विक जनता का न्याय व्यर्वोस्था से विर्वोश्वास नहीं उठे। अपया3प्त सजा देने से न्याय प्रर्णाली को अधि क नुकसान होगा और एक ऐसी स्तिस्थधित पैदा हो सकती है जहां पीविड़त न्याधियक प्रर्णाली में विर्वोश्वास खो देता है और विनजी प्रधितशो का सहारा लेता है। ii) ऊ म (उपरोक्त) क े मामले में, पैराग्राफ 11 से 13 में, यह देखा गया है और विनम्नानुसार आयोजिजत विकया गया है: "11. हमारी राय है विक विन$ली अदालतों द्वारा अपया3प्त या गलत सजा विदए जाने क े कारर्ण इस अदालत क े समक्ष बड़ी संख्या में मामले दायर विकए जा रहे हैं। क ु छ मामलों में जिजस तरह से सजा दी जाती है, उसक े लिखलाफ हमने बार-बार $ेतार्वोनी दी भी है। इसमें कोई दो राय नहीं है विक सजा क े पहलू को हल्क े में नहीं लिलया जाना $ाविहए, क्योंविक आपराधि क न्याय प्रर्णाली क े इस विहस्से का समाज पर विनर्णा3यक प्रभार्वो पड़ता है। उसी क े आलोक में, हमारी राय है विक हमें इस पर और स्पष्टता प्रदान करने की आर्वोश्यकता है।

12. अपरा ों क े लिलए सजा का विर्वोश्लेषर्ण तीन परीक्षर्णों अथा3त अपरा परीक्षर्ण, आपराधि क परीक्षर्ण और तुलनात्मक आनुपाधितकता परीक्षर्ण की कसौटी पर विकया जाना है। अपरा परीक्षर्ण में विनयोजन की सीमा, हथिथयार का विर्वोकल्प, अपरा का तरीका, विनपटान का तरीका (यविद कोई हो), अथिभयुक्त की भूविमका, अपरा का असामाजिजक या धिघनौना $रिरत्र, पीविड़त की स्तिस्थधित जैसे कारक शाविमल हैं। आपराधि क परीक्षर्ण में अपरा ी की उम्र, अपरा ी का लिंलग, अपरा ी की आर्थिथक स्तिस्थधित या सामाजिजक पृष्ठभूविम, अपरा क े लिलए प्रेरर्णा, ब$ार्वो की उपलब् ता, मन की स्तिस्थधित, मृतक या मृत समूह में से विकसी एक द्वारा भड़काने जैसे कारकों का आंकलन, मुकदमे में पया3प्त रूप से प्रधितविनधि त्र्वो, अपील प्रविक्रया में एक न्याया ीश द्वारा असहमधित, पश्चाताप, सु ार की संभार्वोना, पूर्वो3 आपराधि क रिरकॉड[3] (लंविबत मामलों को न लेने क े लिलए) और कोई अन्य प्रासंविगक कारक (संपूर्ण[3] सू$ी नहीं) शाविमल है।

13. इसक े अधितरिरक्त, हम ध्यान दें विक अपरा परीक्षर्ण क े तहत गंभीरता का पता लगाने की आर्वोश्यकता है। अपरा की गंभीरता का पता (i) पीविड़त की शारीरिरक सत्यविनष्ठा से लगाया जा सकता है; (ii) भौधितक समथ3न या सुख-सुविर्वो ा की हाविन; (iii) अपमान की सीमा; और (iv) विनजता का उल्लंघन।” उक्त विनर्ण3य में, इस न्यायालय ने विफर से आगाह विकया विक क ु छ मामलों में सजा देने क े लापरर्वोाह तरीक े से विनपटाया जाता है । iii) सतीश क ु मार जयंती लाल डाबगर (सुप्रा) क े मामले में, इस न्यायालय ने देखा और माना विक सजा क े पीछे का उद्देश्य और औधि$त्य न क े र्वोल प्रधितशो, अक्षमता, पुनर्वोा3स बस्तिल्क विनर्वोारर्ण भी है।

8. सजा देने क े जिसkांतों पर इस न्यायालय द्वारा विन ा3रिरत कानून को लागू करते हुए, मामले क े तथ्यों को हाथ में लेते हुए, हमारी राय है विक उच्च न्यायालय का दृविष्टकोर्ण सबसे अधि क लापरर्वोाह है। इसलिलए, उच्च न्यायालय का आदेश इस न्यायालय क े हस्तक्षेप क े योग्य है। क े र्वोल देरी क े तकनीकी आ ार पर और क े र्वोल इस आ ार पर विक आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश क े बाद, जो विक अस्तिस्थर है, आरोपी अपने जीर्वोन में विफर से बस गए हैं और उनका आ$रर्ण तब से संतोषजनक रहा है और र्वोे विकसी भी आपराधि क गधितविर्वोधि में शाविमल नहीं हैं, देरी को माफ नहीं करने और गुर्ण-दोष क े आ ार पर अपील पर विर्वो$ार नहीं करने का कोई आ ार नहीं है। अतः अपील प्रस्तुत करने में हुए 1880 विदनों क े विर्वोलम्ब को क्षमा विकया जाता है।

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9. र्वोत3मान मामले में, यह साविबत होता है विक पीविड़त फ ू ल$ंद को शरीर क े महत्र्वोपूर्ण[3] विहस्से यानी जिसर पर गंभीर $ोट लगी है और खोपड़ी पर फ्र ै क्$र था। डॉक्टर ने यह भी कहा है विक $ोट जानलेर्वोा थी और घायल फ ू ल $ंद को लगी $ोट प्रक ृ धित क े सामान्य क्रम में मौत का कारर्ण बनने क े लिलए पया3प्त थी। भा.द.सं. की ारा 307 क े अनुसार, जो कोई भी इस तरह क े इरादे या ज्ञान क े साथ कोई काय[3] करता है, और ऐसी परिरस्तिस्थधितयों में, यविद र्वोह उस काय[3] से मृत्यु का कारर्ण बनता है, तो र्वोह हत्या का दोषी होगा, उसे विकसी एक अर्वोधि क े लिलए कारार्वोास से दंधिडत विकया जाएगा जो विक हो सकता है। दस साल तक का विर्वोस्तार और जुमा3ना क े लिलए भी उत्तरदायी होगा; और अगर इस तरह क े क ृ त्य से विकसी व्यविक्त को $ोट लगती है, तो अपरा ी या तो आजीर्वोन कारार्वोास या भा.द.सं. की ारा 307 में उजिल्ललिखत सजा क े लिलए उत्तरदायी होगा। इस प्रकार, र्वोत3मान मामले में, आरोपी को आजीर्वोन कारार्वोास और/या कम से कम दस साल तक की सजा हो सकती थी। विर्वो$ारर्ण न्यायालय ने अथिभयुक्त बनर्वोारी लाल को तीन र्वोष[3] क े कठोर कारार्वोास की सजा सुनाई। इसलिलए, इस तरह, क े र्वोल तीन साल क े सश्रम कारार्वोास की सजा सुनाते हुए विन$ली अदालत ने पहले ही बहुत नरम रुख अपनाया था। इसलिलए उच्च न्यायालय को इसमें दखल नहीं देना $ाविहए था। हालांविक उच्च न्यायालय ने क ु छ भी नहीं कहा है और उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेविपत फ ै सले और आदेश से, ऐसा प्रतीत होता है विक उच्च न्यायालय क े साथ अथिभयुक्त की ओर से जो तक 3 विदया गया है, र्वोह यह है विक घटना 31.03.1989 को हुई थी। यानी करीब 26 साल पहले; विक र्वोे विपछले 26 र्वोष€ से मुकदमे का सामना कर रहे थे; और जब घटना घटी, र्वोे युर्वोा थे और अब र्वोे र्वोृk व्यविक्त हैं। उपयुक्त और/या पया3प्त सजा देते समय पूर्वो क्त एकमात्र विर्वो$ार नहीं हो सकता है। यहां तक विक अथिभयुक्त की ओर से प्रस्तुत करने क े संबं में विक भा.द.सं. की ारा 307 क े तहत कोई न्यूनतम सजा नहीं है और दस साल तक की सजा होगी, इसका जर्वोाब यह मानते हुए विदया जाता है विक विर्वोर्वोेकपूर्ण[3] तरीक े से सजा का प्रयोग विकया जाना $ाविहए और सजा का पालन विकया जाना $ाविहए। आनुपाधितक रूप से लगाया जा सकता है और विकए गए अपरा की प्रक ृ धित और गंभीरता को देखते हुए और सजा देने क े जिसkांतों पर विर्वो$ार करक े, यहां ऊपर संदर्थिभत विकया गया है।

10. क े र्वोल इसलिलए विक अपील क े विनर्ण3य क े समय तक एक लंबी अर्वोधि समाप्त हो गई है, ऐसी सजा देने का आ ार नहीं हो सकता है जो अनुपातहीन और अपया3प्त है। उच्च न्यायालय ने उधि$त/उपयुक्त सजा/सजा देते समय उन प्रासंविगक कारकों पर विबल्क ु ल भी ध्यान नहीं विदया है जो आर्वोश्यक थे। जैसा विक यहां ऊपर देखा गया है, उच्च न्यायालय ने अपील का विनबटारा और विनस्तारर्ण लापरर्वोाह तरीक े से विकया है। उच्च न्यायालय ने शॉट3कट अपनाते हुए अपील का विनस्तारर्ण विकया है। जिजस तरह से उच्च न्यायालय ने अपील का विनपटारा विकया है, र्वोह अत्यधि क पदार्वोनत है। हमने विर्वोथिभन्न उच्च न्यायालयों क े कई विनर्ण3य देखे हैं और यह पाया गया है विक कई मामलों में आपराधि क अपीलों का विनपटारा सरसरी तौर पर और छोटे-छोटे तरीकों को अपनाकर विकया जाता है। क ु छ मामलों में, भा.द.सं. की ारा 302 क े तहत दोषजिसधिk को विबना कोई पया3प्त कारर्ण बताए ारा 304 भाग I या ारा 304 भाग II IPC में बदल विदया जाता है और क े र्वोल अथिभयुक्त की ओर से विदये गए तक 3 दज[3] विकये जाते हैं विक उनकी दोषजिसधिk को ारा 304 भाग I या ारा 304 भाग II IPC में बदला जा सकता है। र्वोत3मान मामले की तरह, अथिभयुक्त ने दोषजिसधिk को कोई $ुनौती नहीं दी और सजा में कमी क े लिलए प्राथ3ना की और उस पर विर्वो$ार विकया गया और विबना कोई और कारर्ण बताए और प्रासंविगक कारकों पर ध्यान विदए विबना एक अपया3प्त और अनुधि$त सजा दी गई। जिजन पर उधि$त दंड/सजा लगाते समय विर्वो$ार विकया जाना आर्वोश्यक है। हम शॉट3कट अपनाकर आपराधि क अपीलों क े विनपटान की ऐसी प्रथा की निंनदा करते हैं। इसलिलए, उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश आरोपी बनर्वोारी लाल क े संबं में विन$ली अदालत द्वारा लगाए गए तीन साल क े सश्रम कारार्वोास से सजा को पहले से ही (44 विदन) की अर्वोधि तक कम कर विदया गया है, जो पूरी तरह से अस्तिस्थर है और यह रद्द विकए जाने और अलग रखे जाने का पात्र है।

11. अब जहां तक अथिभयुक्त मोहन लाल क े विर्वोरुk राज्य द्वारा दायर की गई अपील का संबं है, यह ध्यान देने की आर्वोश्यकता है विक यहां तक विक विर्वोद्वान विर्वो$ारर्ण न्यायालय ने भी उक्त अथिभयुक्तों को परिरर्वोीक्षा का लाभ प्रदान विकया था, जिजसक े लिखलाफ राज्य ने उच्च न्यायालय क े समक्ष कोई अपील नहीं की और यह अथिभयुक्त था, जिजसने अपील की, जो खारिरज हो गई। इसलिलए, राज्य को अथिभयुक्त मोहन लाल क े लिखलाफ र्वोत3मान अपील को प्राथविमकता नहीं देनी $ाविहए थी, जब उच्च न्यायालय क े समक्ष उसकी अपील खारिरज हो गई थी और सजा की पुविष्ट हो गई थी। यविद राज्य परिरर्वोीक्षा का लाभ देने से व्यथिथत था, तो उस स्तिस्थधित में, प्रथम दृष्टया, राज्य को उच्च न्यायालय क े समक्ष अपील करनी $ाविहए थी।

12. उपरोक्त $$ा3 क े मद्देनजर और ऊपर बताए गए कारर्णों से, जहां तक आरोपी बनर्वोारी लाल का संबं है, र्वोत3मान अपील स्र्वोीकार की जाती है। विर्वो$ारर्ण न्यायालय द्वारा भा.द.सं. की ारा 307 क े तहत दी गई सजा क े आदेश में हस्तक्षेप करते हुए उच्च न्यायालय द्वारा पारिरत आक्षेविपत विनर्ण3य और आदेश, जिजसमें आरोपी बनर्वोारी लाल को तीन साल क े सश्रम कारार्वोास से सजा काटने क े लिलए सुनाई गई सजा को उसक े द्वारा पहले से ही (44 विदन) की अर्वोधि क े लिलए करने को एतदद्वारा रद्द विकया जाता है और अपास्त विकया जाता है। विन$ली अदालत द्वारा आरोपी बनर्वोारी लाल को भा.द.सं. की ारा 307 क े तहत तीन साल क े कठोर कारार्वोास की सजा सुनाए जाने क े फ ै सले और आदेश को बहाल विकया जाता है। अथिभयुक्त बनर्वोारी लाल को शेष सजा काटने क े लिलए आज से $ार सप्ताह की अर्वोधि क े भीतर उपयुक्त जेल अधि कारी/संबंधि त न्यायालय क े समक्ष आत्मसमप3र्ण करने का विनद„श विदया जाता है। जहाँ तक अथिभयुक्त मोहन लाल क े विर्वोरुk राज्य द्वारा दायर की गई अपील का संबं है, उसे एतद्द्वारा खारिरज विकया जाता है। …………………………जे. [श्री। शाह] …………………………जे. [बी.र्वोी. नागरत्ना] नई विदल्ली; अप्रैल 08, 2022. (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.