Full Text
भार ीय सव च्च न्यायालय क
े समक्ष
सिसविवल अपीलीय क्षेत्राति कार
सिसविवल अपील संख्या - 2915/2022
फ
ै जाबाद-अयोध्या विवकास प्राति करण, फ
ै जाबाद ... अपीलक ा.
बनाम
डॉ. राजेश क
ु मार पांडे और अन्य …प्रत्यर्थी8
क
े सार्थी
सिसविवल अपील संख्या 2917/2022
मुरादाबाद विवकास प्राति करण और अन्य. ... अपीलक ा.
बनाम
बाबू और अन्य ...प्रत्यर्थी8
क
े सार्थी
सिसविवल अपील संख्या - 2918/2022
मुरादाबाद विवकास प्राति करण और अन्य. ...
अपीलक ा.
बनाम
होराम सिंसह और अन्य …प्रत्यर्थी8 vLohdj.k
Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
और
सिसविवल अपील संख्या - 2919/2022
मुरादाबाद विवकास प्राति करण ... अपीलक ा.
बनाम
श्रीम ी मल्का बेगम और अन्य ...प्रत्यर्थी8
विन ण. य
माननीय न्यायमूर्ति एमआर शाह,
JUDGMENT
1. चूंविक अपीलों क े इस समूह में विवति और थ्यों क े सामान्य प्रश्न उठ े हैं, इसलिलए उन्हें एक सार्थी सुना गया है और इस समान विनण.य और आदेश द्वारा उनका विनस् ारण विकया जा रहा है।
2. व्यविRग प्रत्यर्थी8 द्वारा प्रस् ु सम्बन्धिन् रिरट यातिचकाओं में इलाहाबाद उच्च् न्यायालय द्वारा पारिर सम्बन्धिन् आदेश एवं विनण.य से व्यथिर्थी एवं असंन् ुष्ट महसूस कर े हुए यहाँ - वास् विवक भूस्वाविम सिजसक े द्वारा उच्च् न्यायालय उR रिरट यातिचका का विनस् ारण यह विनद\श दे े हुए विकया विक सम्बन्धिन् अपीलक ा. गण – विवकास प्राति करण क े द्वारा वास् विवक भू स्वाविम को भूविम अति ग्रहण, पुनवा.स और पुन.व्यवस्र्थीापन में उतिच मुआवजा और पारदर्शिश ा का अति कार अति विनयम, 2013 (ए न्धिस्मनपश्चा अति विनयम, 2013 क े रूप में सन्दर्शिभ ) क े अनुसार मुआवजा सिजस विदनांक पर अति विनयम 2013 लागू हुआ हो क े आ ार पर प्रदान करें अति ग्रही भूविम क े लिलए भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 (ए न्धिस्मनपश्चा अति विनयम, 1894 क े रूप में सन्दर्शिभ ) की ारा 11 क े ह कोई मुआवजा नहीं बन ा, सम्बन्धिन् विवकास प्राति करण क े द्वारा व.मान अपील को प्रस् ु विकया गया है। सिसविवल अपील संख्या - 2915/2022 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
3. फ ै जाबाद विवकास प्राति करण (ए न्धिस्मनपश्चा 'प्राति करण' क े रूप में सन्दर्शिभ ) ने फ ै जाबाद सिजले क े रानोपाली गांव में आवासीय परिरयोजना क े लिलए कु ल 17.172 हेक्टेयर भूविम की मांग की र्थीी।इसमें प्रति वादी नं. 1 से 4 से संबंति प्लॉट नं. 407, 413 और 415 में 03.13 हेक्टेयर भूविम शाविमल र्थीी (सिजसे इसमें इसक े बाद मूल भूस्वाविमयों क े रूप में संदर्शिभ विकया गया है). 3.[1] ारा 4 और ारा 6 क े सार्थी पढ़ी गयी ारा 17 क े अं ग. अति सूचना जारी की गई।मूल भूस्वाविमयों ने उपरोR ीन भूखंडों क े संबं में अति ग्रहण को चुनौ ी दे े हुए उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट यातिचका संख्या 3810/2005 को प्रस् ु विकया।उच्च न्यायालय ने प्राति करण को उपरोR ीन भूखंडों का कब्जा लेने से रोकने क े लिलए अं रिरम रोक लगा दी।उपरोR ीन भूखंडों को छोड़कर, पूरी भूविम का कब्जा प्राति करण द्वारा ले लिलया गया र्थीा।यहां क विक अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह अति विनण.य भी उपयु.R ीन भूखंडों क े संबं में, उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट यातिचका विवचारा ीन ा होने और उच्च न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेश क े कारण घोविt विकया गया र्थीा। यह महत्वपूण. थ्य है, सिजसने हमें अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) (ए) क े ह संसद क े वास् विवक इरादे क े आलोक में इस मामले पर विवचार करने क े लिलए प्रेरिर विकया है।इस प्रकार, पूव R रिरट यातिचका में शाविमल भूविम, अर्थीा. ्, पूव R ीन भूखंडों को छोड़कर, शेt संपलिu का कब्जा 07.09.2005 को ले लिलया गया र्थीा और उसमें अति विनण.य 10.04.2007 को प्रकाथिश विकया गया र्थीा.भुग ान विकए जाने वाले मुआवजे क े संबं में विवथिभन्न ारीखों पर कु ल 5,11,60,606.00 रुपये की राथिश उपलब् कराई गई र्थीी। 3.[2] विदनांक 27.09.2010 क े आदेश क े माध्यम से, उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को अति विनयम, 1894 की ारा 48 (1) क े ह मूल भू-स्वाविमयों द्वारा प्रस् ु आवेदन/प्रत्यावेदन पर विवचार करने क े आदेश का विनद\श देकर प्रति वादी द्वारा प्रस् ु कथिर्थी रिरट यातिचका संख्या 3810/2005 का विनस् ारण विकया है।यह विक उपयुR प्राति करण ने विदनांक 13.03.2012 क े आदेश द्वारा अति विनयम, 1894 की ारा 48 क े ह मूल भू-स्वाविमयों क े प्रत्यावेदन/आवेदन को खारिरज कर विदया।यहाँ प्रत्यर्थी8-मूल भू-स्वाविमयों ने विफर से उच्च न्यायालय क े समक्ष व.मान रिरट यातिचका संख्या 41/ 2012 को प्रार्थीविमक ा दी। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 3.3- उपयु.R रिरट यातिचका विवचारा ीन ा रहने क े दौरान, अति विनयम, 2013 लागू हुआ।उच्च न्यायालय क े समक्ष व.मान रिरट यातिचका की सुनवाई क े समय, मूल भू-स्वाविमयों-मूल रिरट यातिचकाक ा.ओं की ओर से यह प्रस् ु विकया गया र्थीा विक चूंविक अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह कोई पंचाट नहीं विदया गया है, इसलिलए अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े प्राव ान आकर्षिt होंगे और मूल भू-स्वाविमयों को अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों क े ह विन ा.रिर मुआवजे का हकदार होगा। 3.4- आक्षेविप विनण.य और आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने उR रिरट यातिचका को स्वीकार कर लिलया है और यह म व्यR विकया है और अथिभविन ा.रिर विकया है विक इसमें प्रत्यर्थी8 -मूल रिरट यातिचकाक ा.-मूल भू-स्वामी अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े प्राव ानों क े अनुसार मुआवजे क े हकदार होंगे।इसलिलए, उच्च न्यायालय द्वारा पारिर फ ै सले और आदेश क े अनुसार, अब मूल भू-स्वाविमयों/मूल रिरट यातिचकाक ा.ओं को अति विनयम, 2013 क े ह विन ा.रिर मुआवजे का भुग ान करना होगा, फ ै जाबाद-अयोध्या विवकास प्राति करण, फ ै जाबाद ने व.मान अपील दायर की है। सिसविवल अपील संख्या - 2917/2022
4. 20 जुलाई, 2017 आक्षेविप विनण.य और आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने अपीलक ा.-मुरादाबाद विवकास प्राति करण को अति विनण.य की घोtणा आदेश और अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह मुआवजा विन ा.रिर करने का विनद\श विदया है और इसक े परिरणामस्वरूप, यहां क े मूल भूविम मालिलक अति विनयम, 2013 क े ह विन ा.रिर मुआवजे क े हकदार होंगे।इसलिलए मुरादाबाद विवकास प्राति करण ने व.मान अपील दायर की है। 4.1- उच्च न्यायालय क े समक्ष, रिरट यातिचका में, मूल रिरट यातिचकाक ा.ओं ने मुख्य रूप से इस आ ार पर अति ग्रहण की काय.वाही को चुनौ ी दी विक अति विनण.य अति विनयम, 1894 की ारा 6 क े ह घोtणा क े प्रकाशन क े दो साल क े भी र नहीं विदया गया र्थीा और इसलिलए, अति विनयम, 1894 की ारा 11 ए क े प्राव ानों को ध्यान में रख े हुए, अति ग्रहण व्यपग हो गया है।4. 2 र्थीाविप, रिरट यातिचका की सुनवाई क े दौरान और अति विनयम, 2013 क े अ ीन vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA प्रतिकर का अवधारण और सं कर का अव ारण और सदाय करने की विकसी विवविनर्षिदष्ट प्रार्थी.ना क े विबना, मूल रिरट यातिचकाक ा.ओं की ओर से उपन्धिस्र्थी विवद्व अति वRा ने अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े उपबं ों का अवलंब लिलया और प्रति शपर्थी पत्र क े पैरा 20 का अवलंब लिलया सिजसमें यह कहा गया र्थीा विक अति विनण.य अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े अ ीन नहीं विदया गया है और इसलिलए, अति विनण.य अब अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े अ ीन विदया जाएगा। 4.3- अपीलक ा. की ओर से यह मामला र्थीा विक इस प्रकार अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े अ ीन पंचाट रिरट यातिचका विवचारा ीन ा होने और उच्च न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम स्र्थीगन आदेश को ध्यान में रख े हुए घोविt नहीं विकया जा सक ा र्थीा।आक्षेविप विनण.य और आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने अपीलक ा.-मुरादाबाद विवकास प्राति करण को अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह अति विनण.य घोविt करने का विनद\श विदया है. 4.4- उच्च न्यायालय द्वारा अपीलक ा. को अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह पंचाट घोविt करने का विनद\श दे े हुए पारिर आक्षेविप आदेश से व्यथिर्थी और असं ुष्ट महसूस कर े हुए, मुरादाबाद विवकास प्राति करण ने व.मान अपील दायर की है। सिसविवल अपील संख्या - 2918/2022 एवं सिसविवल अपील संख्या - 2919/2022
5. रिरट यातिचका संख्या - 29247/2011 में उच्च न्यायालय द्वारा पारिर 20.07.2017 विदनांविक आक्षेविप आदेश एवं विनण.य से उत्पन्न रिरट यातिचका संख्या 31806/2013 एवं सिसविवल अपील संख्या 2019/2022 में उच्च न्यायालय द्वारा पारिर 20.07.2017 का आक्षेविप आदेश एवं विनण.य से उत्पन्न् सिसविवल अपील संख्या - 2918/2022 सिजसक े द्वारा उच्च न्यायालय क े द्वारा मुरादाबाद विवकास प्राति करण को विनद\श दे े हुए समान आदेश पारिर विकए गये सिजसमें अति विनयम 2013 की ारा 24 (1) क े ह अति विनण.य की घोtणा करें एवं सिजसक े द्वारा मूल भू स्वामी अति विनयम, 2013 क े ह मुआवजा पाने क े हकदार होगें सिजसक े मुरदाबाद विवकास प्राति करण क े द्वारा यह अपील प्रस् ु की गयी है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
6. संबंति विवकास प्राति करण की ओर से विवद्व वरिरष्ठ अति वRा श्री वी. क े. शुक्ला और संबंति मूल भू-स्वाविमयों-मूल रिरट यातिचकाक ा.ओं की ओर से विवद्व वरिरष्ठ अति वRा श्री एस. आर. सिंसह पेश हुए हैं।
7. संबंति विवकास प्राति करण की ओर से पेश वरिरष्ठ अति वRा श्री शुक्ला ने कहा विक मामले क े थ्यों और परिरन्धिस्र्थीति यों में उच्च न्यायालय ने विवकास प्राति करण को अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह अति विनण.य करने का विनद\श देने में गंभीर गल ी की है और इस प्रकार मूल भूविम मालिलक अति विनयम, 2013 क े ह विन ा.रिर मुआवजे क े हकदार होंगे। 7.[1] यह प्रस् ु विकया जा ा है विक उच्च न्यायालय ने इस थ्य की उतिच रूप से अवलोकन नहीं विकया है विक इस प्रकार विवशेt भूविम अति ग्रहण अति कारी उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट यातिचकाओं विवचारा ीन ा होने और/या उच्च न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम स्र्थीगन क े कारण या ो प्राति करण को कब्जा लेने और/या यर्थीान्धिस्र्थीति बनाए रखने का विनद\श देने क े कारण अति विनण.य घोविt नहीं कर सका। 7.[2] यह प्रस् ु विकया जा ा है विक वास् व में,सिसविवल अपील संख्या - 2915/2022 में, इस थ्य को ध्यान में रख े हुए विक त्काल उपबं लागू विकया गया र्थीा एवं मुआवजे का 80% भी जमा विकया गया र्थीा, हालांविक, अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह अति विनण.य उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट यातिचका विवचारा ीन ा होने क े कारण घोविt नहीं विकया जा सका।यह प्रस् ु विकया जा ा है विक कथिर्थी मामले में, भूविम का इ ना बड़ा क्षेत्र अति ग्रविह विकया गया र्थीा, सिजसमें यहां प्रत्यर्थी8 से संबंति प्लॉट नं. 407, 413 और 415 शाविमल हैं.यह प्रस् ु विकया जा ा है विक उपयु.R ीन भूखंडों को छोड़कर अति विनण.य वास् व में अति विनयम की ारा 11 क े ह घोविt विकया गया र्थीा और उसमें यह भी कहा गया र्थीा विक उच्च न्यायालय द्वारा विदए गए स्र्थीगन आदेश क े मद्देनजर पूव R ीन भूखंडों क े संबं में अति विनण.य घोविt नहीं विकया जा सक ा र्थीा.यह प्रति वाद विकया गया है विक उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट यातिचका विवचारा ीन ा होने और उच्च न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम स्र्थीगन क े कारण अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह प्रश्नग भूखंडों क े संबं में अति विनण.य घोविt नहीं विकया जा सका. vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 7.[3] मुरादाबाद विवकास प्राति करण की ओर से सिसविवल अपील संख्या 2917,2918 और 2919 में पेश हुए विवद्व अति वRा ने प्रस् ु विकया है विक इस प्रकार, अत्यावश्यक ा खंड लागू होने क े कारण, मुआवजे का 80% भी पहले ही जमा कर विदया गया र्थीा, हालांविक, अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह अति विनण.य उच्च न्यायालय क े समक्ष रिरट यातिचका विवचारा ीन ा होने क े कारण घोविt नहीं विकया जा सका। 7.[4] यह प्रस् ु विकया जा ा है विक वास् व में उच्च न्यायालय द्वारा मौलिखक प्रस् ुति यों पर आक्षेविप आदेश पारिर विकया गया है विक पंचाट घोविt नहीं विकया गया है और इसलिलए वे अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह राह क े हकदार हैं।इस प्रकार, न ो रिरट यातिचकाओं में संशो न विकया गया और न ही विवथिशष्ट राह क े लिलए प्रार्थी.ना की गई, सिजसमें प्राति करण (ओं) को अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह पुरस्कार घोविt करने का विनद\श विदया गया।यह प्रति वाद विकया गया है विक विकसी भी मामले में, एक बार रिरट यातिचका विवचारा ीन ा होने और/या उच्च न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम स्र्थीगन क े कारण पंचाट घोविt नहीं विकया जा सक ा है, ो भूविम मालिलकों को अति विनयम, 2013 क े ह मुआवजे का लाभ लेने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है।यह आग्रह विकया जा ा है विक भूविम अति ग्रहण अति कारी और/या प्राति करण की ओर से अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह अति विनण.य की घोtणा नहीं करने में कोई विनन्धि€•य ा नहीं र्थीी। 7.[5] संबंति विवकास प्राति करण (ओं) की ओर से पेश हुए विवद्व अति वRाओं ने इंदौर विवकास प्राति करण बनाम मनोहरलाल और अन्य, (2020) 8 एससीसी 129, विवशेt रूप से, पैरा 366.[8] क े मामले में इस न्यायालय की संविव ान पीठ क े विनण.य पर बहु अति क भरोसा विकया है। यह प्रस् ु विकया जा ा है विक विवस् ृ विवचार-विवमश. क े बाद और न्यायालय द्वारा विदए गए स्र्थीगन क े प्रभाव पर इस न्यायालय क े विवथिभन्न विनण.यों पर विवचार करने क े बाद और प्रत्यास्र्थीापन क े सिसद्धां पर इस न्यायालय द्वारा विवशेt रूप से यह कहा गया है विक (i) ) न्यायालय का काय. विकसी पर प्रति क ू ल प्रभाव नहीं डालेगा (i) i) ) कोई भी असंभव काय. करने क े लिलए बाध्य नहीं है (i) i) i) ) कानून विकसी व्यविR को ऐसा काय. करने क े लिलए बाध्य नहीं कर ा है जो वह संभव ः नहीं कर सक ा है
(i) v) ) जहां कानून कोई क.व्य या प्रभार बना ा है और पाट[8] विबना विकसी चूक क े उसका पालन करने क े लिलए अक्षम है और कोई उपचार नहीं है, वहां कानून सामान्य रूप से उसे क्षमा कर देगा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (v) ) यह अति विनयम 2013 का आशय नहीं है, विक सिजन लोगों ने मुकदमा दायर विकया है उन्हें अति विनयम, 2013 की ारा 24 क े ह अनुध्या उच्च मुआवजे का लाभ विमलना चाविहए। 7.[6] संबंति विवकास प्राति करणों की ओर से पेश हुए विवद्व वकील ने इंदौर विवकास प्राति करण उपरोR क े मामले में विनण.य क े पैराग्राफ 366.[8] का बहु अति क भरोसा विकया है और प्रस् ु विकया है विक अति विनयम, 2013 की ारा 24 (2) की व्याख्या कर े समय, इस न्यायालय ने विवशेt रूप से यह म व्यR विकया है और अथिभविन ा.रिर विकया है विक न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेशों क े अन्धिस् त्व की अवति को अपवर्जिज विकया जाना चाविहए। यह प्रस् ु विकया जा ा है विक समान समान ा उस मामले में लागू होगी जहां प्राति करण न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेश क े अन्धिस् त्व क े कारण अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह पंचाट की घोtणा नहीं कर सक ा है. 7.[7] उपरोR प्रस् ुति यां करने और इस न्यायालय द्वारा इंदौर विवकास प्राति करण (पूव R) क े मामले में पैरा 284,285, 287,289, 293,297, 299,300, 301,302, 306,308, 309, 314, 315, 316, 317,318,319,320,321,323,324,325,326,329,334 और 335 में की गई विटप्पथिणयों पर भरोसा कर े हुए, व.मान अपीलों की अनुमति देने क े लिलए प्रार्थी.ना की जा ी है।
8. मूल भूस्वाविमयों की ओर से पेश हुए विवद्व वकील ने भी इंदौर विवकास प्राति करण उपरोR क े मामले में इस न्यायालय क े विनण.य पर भरोसा विकया है। यह प्रस् ु विकया जा ा है विक जैसा विक इस न्यायालय द्वारा उR विनण.य में म व्यR विकया गया है और अथिभविन ा.रिर विकया गया है, सिजस क्षण यह पाया जा ा है विक अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह अति विनयम, 2013 क े लागू होने क े समय कोई भी अति विनण.य घोविt नहीं विकया गया है, ो भूविम मालिलक अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह सी े मुआवजे का हकदार होगा. 8.[1] मूल भू-स्वाविमयों-मूल रिरट यातिचकाक ा. की ओर से उपन्धिस्र्थी विवद्व अति वRा द्वारा आगे यह प्रस् ु विकया जा ा है विक इस प्रकार अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) में इस आशय का कोई विवथिशष्ट प्राव ान नहीं है विक अं रिरम स्र्थीगन और/या रिरट यातिचका की विवचारा ीन ा की अवति को vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपवर्जिज विकया जाएगा।इसलिलए, अति विनयम क े स्र्थीाविप प्रस् ाव क े अनुसार, एक अति विनयम को उसी रूप में पढ़ा जाना चाविहए जैसा वह है। 8.[2] यह प्रति वाद विकया गया है विक विव ातियका का आशय यह है विक एक बार अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह अति विनण.य घोविt नहीं विकया जा ा है, अति विनयम, 2013 क े प्रारंभ क े समय, अति विनयम, 2013 की ारा 24 की उप- ारा (1) क े ह अति ग्रहण क े व्यपग होने से बचाने क े लिलए, मूल भू-स्वाविमयों को अति विनयम, 2013 क े ह विन ा.रिर मुआवजे क े भुग ान द्वारा क्षति पूर्ति करनी होगी। इसलिलए, उच्च न्यायालय ने विवकास प्राति करणों को अति विनयम, 2013 की ारा 24(1) क े ह अति विनण.य घोविt करने और परिरणामस्वरूप अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों क े ह मुआवजे का विन ा.रण करने का विनद\श देने में कोई त्रुविट नहीं की है। 8.[3] यह प्रति वादी की ओर से उपन्धिस्र्थी विवद्वान अति वRा द्वारा आगे प्रस् ु विकया जा ा है - सिसविवल अपील संख्या 2917, 2918 और 2919/2022 में मूल रिरट यातिचकाक ा. इस रह प्रति उuर शपर्थी पत्र में, यह प्रस् ु विकया गया र्थीा विक अति विनण.य घोविt नहीं विकया गया है, अति विनण.य अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह घोविt विकया जाएगा।यह ब ाया गया है विक प्राति करण की ओर से दायर प्रति उuर शपर्थी पत्र में विदए गए पूव R रुख/प्रस् ुति को ध्यान में रख े हुए, उच्च न्यायालय ने अति विनण.य की घोtणा करने और अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह मुआवजे का भुग ान करने का विनद\श विदया है, जो इस न्यायालय द्वारा हस् क्षेप नहीं विकया जा सक ा है. 8.[4] उपयु.R प्रस् ुति यां दे े हुए, यह प्रार्थी.ना की जा ी है विक व.मान अपीलों को खारिरज कर विदया जाए और अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह अति विनण.य घोविt करने और अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों क े ह संबंति भू-स्वाविमयों को मुआवजे का भुग ान करने क े लिलए उपयुR अति कारिरयों को विनद\श विदया जाए।संबंति पक्षों की ओर से पेश होने वाले विवद्व अति वR को सुनने क े बाद, इस न्यायालय क े विवचार क े लिलए जो सवाल उठाया गया है वह हैः - क्या ऐसे मामले में जहां भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह कोई पंचाट प्राति करण द्वारा रिरट यातिचका और/या उच्च न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम स्र्थीगन vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विवचारा ीन ा होने क े कारण घोविt नहीं विकया जा सका, जो भूविम मालिलकों द्वारा दायर विकया गया र्थीा और इसक े परिरणामस्वरूप भूविम अति ग्रहण, पुनवा.स और पुनस्र्थीा.पन अति विनयम, 2013 (अति विनयम, 2013) में उतिच मुआवजा और पारदर्शिश ा का अति कार लागू होने की ारीख को अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह कोई पंचाट घोविt नहीं विकया गया र्थीा, मूल भूविम मालिलक अति विनयम, 2013 की ारा 24 की उप- ारा (1) क े ह विन ा.रिर मुआवजे क े हकदार होंगे?
10. इस स् र पर, अति विनयम, 1894 और अति विनयम, 2013 की ारा 24 क े प्रासंविगक प्राव ानों पर विवचार करना आवश्यक है, जो इस मामले में अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) (ए) क े ह उत्पन्न होने वाले प्रश्न क े संदभ. में अति ग्रहण की व्यपग से संबंति हैं, विवशेt रूप से विकसी न्यायालय द्वारा विदए गए स्र्थीगन आदेशों क े संदभ. में और इसक े परिरणामस्वरूप 01.01.2014 को अति विनण.य नहीं विदया गया, जब अति विनयम, 2013 लागू विकया गया र्थीा।अति विनयम, 1894 की ारा 11 और 11 क को विनम्नानुसार उद्धृ विकया गया हैः “11.कलेक्टर द्वारा जांच और अति विनण.य- (1) इस प्रकार विनय विदन या विकसी अन्य विदन सिजस पर जांच स्र्थीविग कर दी गई है, सिजला ीश उन आपलिuयों (यविद कोई हो) की जांच करेगा जो ारा 9 क े अ ीन ारा 8 क े अ ीन विकए गए मापों को दी गई सूचना क े अनुसरण में विकसी विह बद्ध व्यविR ने कही हैं और ारा 4, उप ारा (1) क े अ ीन अति सूचना क े प्रकाशन की ारीख को भूविम क े मूल्य की जांच करेगा और क्षति पूर्ति का दावा करने वाले व्यविRयों क े संबंति विह ों की जांच करेगा और अपने हार्थीों से अति विनण.य देगा - (i) ) भूविम का वास् विवक क्षेत्र
(i) i) ) वह प्रति कर जो उसकी राय में भूविम क े लिलए अनुज्ञा विकया जाना चाविहए, और
(i) i) i) ) उR प्रति कर को उन सभी व्यविRयों क े बीच प्रभासिज करना सिजनक े बारे में भूविम में ज्ञा है या सिजनक े बारे में यह विवश्वास विकया जा ा है विक वे विह बद्ध हैं, या सिजनक े दावों क े बारे में उनक े पास जानकारी है, चाहे वे उनक े समक्ष •मशः उपन्धिस्र्थी हुए हों या नहीं: vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA परन् ु इस उप ारा क े अ ीन कलेक्टर द्वारा समुतिच सरकार या ऐसे अति कारी क े, सिजसे समुतिच सरकार इस विनविमu प्राति क ृ करे, पूव. अनुमोदन क े विबना कोई अति विनण.य नहीं विदया जाएगाः परं ु यह और विक समुतिच सरकार क े लिलए यह विनदेश देना सक्षम होगा विक सिजला ीश ऐसे मामलों क े ऐसे वग. में, जो समुतिच सरकार इस संबं में विवविनर्षिदष्ट करे, ऐसे अनुमोदन क े विबना ऐसा अति विनण.य दे सक े गा। (2). उप ारा (1) में विकसी बा क े हो े हुए भी, यविद काय.वाही क े विकसी प्र•म पर, सिजलान्याया ीश का यह समा ान हो जा ा है विक भूविम में विह बद्ध सभी व्यविR, जो उसक े समक्ष उपन्धिस्र्थी हुए हैं, समुतिच सरकार द्वारा बनाए गए विनयमों द्वारा विवविह प्ररूप में कलेक्टर क े अति विनण.य में शाविमल विकए जाने वाले मामलों पर लिललिख रूप में सहम हो गए हैं, ो वह आगे की जांच विकए विबना ऐसे करार क े विनबं नों क े अनुसार पंचाट दे सक ा है। (3). उप ारा (2) क े अ ीन विकसी भूविम क े लिलए प्रति कर का अव ारण इस अति विनयम क े अन्य उपबं ों क े अनुसार उसी स्र्थीान में या अन्यत्र अन्य भूविम क े संबं में प्रति कर क े अव ारण को विकसी भी प्रकार प्रभाविव नहीं करेगा। (4). पंजीकरण अति विनयम, 1908 (1908 का 16) में विकसी बा क े हो े हुए भी, उप- ारा (2) क े ह विकया गया कोई भी समझौ ा उस अति विनयम क े ह पंजीकरण क े लिलए उuरदायी नहीं होगा। 11 क. अवति सिजसक े भी र पंचाट विदया जाएगा (1) कलेक्टर घोtणा क े प्रकाशन की ारीख से दो वt. की अवति क े भी र ारा 11 क े ह अति विनण.य देगा और यविद उस अवति क े भी र कोई अति विनण.य नहीं विदया जा ा है, ो भूविम क े अति ग्रहण की पूरी काय.वाही व्यपग होगीः परन् ु ऐसे मामले में जहां उR घोtणा भूविम अज.न (संशो न) अति विनयम, 1984 (1984 का 68) क े प्रारंभ से पूव. प्रकाथिश की जा चुकी है, अति विनण.य ऐसे प्रारंभ से दो वt. की अवति क े भी र विदया जाएगा। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 10.[1] अति विनयम, 2013 की ारा 24 को विनम्नानुसार उद्धृ विकया गया हैः
24. 1894 क े अति विनयम संख्या 1 क े अ ीन भूविम अज.न प्रवि•या कति पय मामलों में व्यपग हुयी समझी जाएगी-(1) इस अति विनयम में विकसी बा क े हो े हुए भी, भूविम अज.न अति विनयम, 1894 (1894 का 1) क े अ ीन आरंभ की गयी भूविम अज.न काय.वाविहयों क े विकसी मामले में - (क) जहां कथिर्थी भूविम अति ग्रहण अति विनयम की ारा 11 क े अ ीन कोई पंचाट नहीं विदया गया है, वहां मुआवजे क े विन ा.रण से संबंति इस अति विनयम क े सभी उपबं लागू होंगे. या (ख) जहां उR ारा 11 क े अ ीन पंचाट विदया गया है, वहां उR भूविम अज.न अति विनयम क े उपबं ों क े अ ीन ऐसी काय.वाविहयां इस प्रकार जारी रहेंगी मानो उR अति विनयम विनरसिस न विकया गया हो। (2) उप ारा (1) में विकसी बा क े हो े हुए भी, भूविम अज.न अति विनयम, 1894 (1894 का 1) क े अ ीन प्रारंभ की गइ. भूविम अज.न काय.वाविहयों क े मामले में, जहां उR ारा 11 क े अ ीन पंचाट इस अति विनयम क े प्रारंभ से पांच वt. या अति क पूव. विदया गया है, किंक ु भूविम का वास् विवक कब्जा नहीं लिलया गया है या प्रति कर का भुग ान नहीं विकया गया है, वहां उR काय.वाविहयां व्यपग हो गइ. समझी जाएंगी और समुतिच सरकार, यविद वह ऐसा करना चाह ी है, ो इस अति विनयम क े उपबं ों क े अनुसार ऐसे भूविम अज.न की काय.वाविहयों को नए सिसरे से आरंभ करेगीः बश \ विक अति विनण.य विदया गया हो और अति कांश भूविम जो ों क े संबं में मुआवजा लाभार्शिर्थीयों क े खा े में जमा नहीं विकया गया हो, ो, कथिर्थी भूविम अति ग्रहण अति विनयम की ारा 4 क े ह अति ग्रहण क े लिलए अति सूचना में विनर्षिदष्ट सभी लाभार्थी8 इस अति विनयम क े प्राव ानों क े अनुसार मुआवजे क े हकदार होंगे।
10.2. अति विनयम, 1894 की ारा 11 कलेक्टर/उपायुR/सिजला मसिजस्ट्रेट, जैसी भी न्धिस्र्थीति हो, सिजन्हें भूविम अति ग्रहण अति कारी क े रूप में पदाथिभविह विकया जा सक ा है, द्वारा अति विनण.य देने से vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पूव. की जाने वाली जांच से संबंति है। र्थीाविप, उR अति विनयम की ारा 11 ए में यह अति देश विदया गया है विक कलेक्टर घोtणा (उR अति विनयम की ारा 6 क े अ ीन) क े प्रकाशन की ारीख से दो वt. की अवति क े भी र ारा 11 क े अ ीन पंचाट देगा और यविद उस अवति क े भी र कोई पंचाट नहीं विदया जा ा है ो भूविम क े अति ग्रहण की पूरी काय.वाही व्यपग हो जाएगी।परन् ुक, इस मामले क े प्रयोजन क े लिलए सुसंग नहीं है।हालांविक, इस स्पष्टीकरण का महत्व है।इसमें कहा गया है विक ारा 11 ए की उप- ारा 1 में उसि‘लिख दो वt. की अवति की गणना आदेश में यह प्राव ान विकया गया है विक वह अवति सिजसक े दौरान उR घोtणा क े अनुसरण में की जाने वाली विकसी काय.वाही पर न्यायालय क े आदेश द्वारा रोक लगाई जा ी है।अ ः, विनविह ार्थी. यह है विक यविद कलेक्टर द्वारा घोtणा क े प्रकाशन की ारीख से दो वt. की अवति क े लिलए पंचाट पारिर करने में विनन्धि€•य ा बर ी जा ी है ो अति ग्रहण व्यपग हो जाएगा। दो वt. की अवति प्रदान करने और विन ा.रिर आदेश का उद्देश्य यह सुविनतिश्च करना र्थीा विक भूविम खोने वाले को उतिच अवति क े भी र अपनी भूविम क े अति ग्रहण क े अनुसरण में मुआवजे का भुग ान आदेश का आश्वासन विदया जाए, सिजसे अति विनयम, 1894 की ारा 11 ए क े ह दो वt. कहा गया है। र्थीाविप, दो वt. की उR अवति की गणना कर े समय वह अवति, सिजसक े दौरान न्यायालय द्वारा पारिर स्र्थीगन आदेश क े कारण कोई अति विनण.य पारिर नहीं विकया जा सका, को बाहर करना पड़ेगा। 10.[3] व्यपग होने की अव ारणा को अति विनयम, 2013 की ारा 24 की उप ारा (2) क े अ ीन भी उपबंति विकया गया है।हालांविक, इस मामले क े उद्देश्य क े लिलए, इस पहलू पर ध्यान देना आवश्यक नहीं है, सिसवाय इसक े विक जहां अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह एक अति विनण.य अति विनयम, 2013 क े लागू होने से पांच साल या उससे अति क समय पहले विदया गया है (जो 01.01.2014 से प्रभावी र्थीा), लेविकन भूविम का भौति क कब्जा नहीं लिलया गया है या मुआवजे का भुग ान नहीं विकया गया है, ो अति ग्रहण की कथिर्थी काय.वाही को व्यपग माना जाएगा।इस न्यायालय ने इंदौर विवकास प्राति करण (उपरोR) क े मामलें में अति विनयम की ारा 24 की उप ारा 2 की व्याख्या की.... यह स्पष्ट रूप उपरोR पैरा में अव ारिर विकया गया है विक पाँच वt. क े समय की गणना कर े समय एैसा समय सिजसमें एक अन् रिरम आदेश काय.कारी है को बाहर विकया जा सक ा है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 10.[4] जैसा विक यह वाद सम्बन्धिन् है, अति विनयम 2013 की ारा 24 की उप ारा 1 क े खंड 'अ' क े द्वारा उपरोR कमी की व्याख्या कर ा है।उपयु.R उप- ारा की शुरुआ एक अविनवाय. खंड क े सार्थी हो ी है और यह 17 में कहा गया है विक भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 क े ह शुरू की गई भूविम अति ग्रहण की विकसी भी काय.वाही क े मामले में अति विनयम, 2013 में विकसी बा क े हो े हुए भी - क). जहां अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह कोई अति विनण.य नहीं विदया गया है, वहां मुआवजे क े विन ा.रण से संबंति अति विनयम, 2013 क े सभी प्राव ान लागू होंगे या ख). जहां ारा 11 क े अ ीन पंचाट विदया गया है, वहां अति विनयम, 1894 क े उपबं ों क े अ ीन ऐसी काय.वाविहयां इस प्रकार जारी रहेंगी मानो उR अति विनयम विनरसिस न विकया गया हो। 10.[5] अति विनयम, 2013 की ारा 24 की उप ारा (1) प्रदान करने का उद्देश्य और प्रयोजन उन अति ग्रहणों को बचाना है जो अति विनयम, 1894 क े अ ीन आरंभ विकए गए र्थीे, जहां कोई अति विनण.य नहीं विदया गया र्थीा या जहां अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े अ ीन अति विनण.य विदया गया र्थीा।उपरोR दोनों न्धिस्र्थीति यों क े लिलए संबंति परिरणाम अति विनयम, 2013 की ारा 24 की उप- ारा 1 क े संबंति खंड (ए) और (बी) में दशा.ए गए हैं। 10.[6] इस मामले क े प्रयोजन क े लिलए जो महत्वपूण. है वह अति विनयम की ारा 24 की उप ारा 1 का खंड (क) है। इसे दोहराने क े लिलए, जब अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह कोई अति विनण.य नहीं विदया गया है, ो मुआवजे क े विन ा.रण से संबंति अति विनयम, 2013 क े सभी प्राव ान लागू होंगे।इसका म लब है विक जब अति विनयम, 1894 क े ह अति ग्रहण की प्रवि•या शुरू कर दी गई है, लेविकन अति विनण.य अति विनयम, 2013 क े लागू होने की ति थिर्थी अर्थीा. 01.01.2014 को नहीं विदया गया है, ो ऐसी न्धिस्र्थीति में अति विनयम, 2013 क े प्राव ान मुआवजे क े विन ा.रण क े संबं में लागू होंगे। शब्दो को लागू करने क े लिलए यह समझना आवश्यक है '’ जहाँ vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति विनयम 1894 की ारा 11 क े ह कोई अति विनण.य नहीं पारिर विकया जा ा हैै।'’ इसका ात्पय. यह है अति ग्रहण प्रवि•या शुरू हो चुकी है विक यद्यविप उन कारण से सिजन्हें अति ग्रहण प्राति कारी अर्थीा. सिजला मसिजस्ट्रेट या उप आयुR या सिजला अति कारी या विवशेt भूविम अति ग्रहण अति कारी या ो जैसी भी न्धिस्र्थीति हो को जानकारी र्थीी क े लिलए अति विनयम, 2013 क े लागू होने की ति थिर्थी अर्थीा. 01.01.2014 क अति विनण.य पारिर नही विकया गया।ऐसा अति विनण.य पारिर न करने और अति विनयम, 2013 को लागू करने में सिजलाति कारी या भूविम अति ग्रहण अति कारी की ओर से विनन्धि€•य ा क े कारण हो सक ा है।ऐसे मामले में अति विनयम, 2013 क े प्राव ान सी े क्षति पूर्ति क े विन ा.रण पर लागू होंगे।ऐसा इसलिलए है क्योंविक अति विनयम, 1894 की ुलना में अति विनयम, 2013 अति क लाभदायक विव ान है।अति विनयम, 2013 क े ह देय मुआवजा विनरस् अति विनयम 1894 की ुलना में अति क है।इस प्रकार, अति विनयम, 2013 क े ह अति ग्रहण की काय.वाही में विनरं र ा होगी। 10.[7] हालांविक, कारणों को आत्मसा करने क े प्राव ान में गहराई से जाना आवश्यक है विक अति विनयम, 2013 क े लागू होने की ारीख को विकसी मामले में जब अति विनयम, 1894 क े ह अति ग्रहण शुरू विकया गया र्थीा, ो कोई विनण.य क्यों नहीं विदया गया होगा। विनरसिस अति विनयम है। इसका एक कारण यह होगा विक अति ग्रहण की काय.वाही या ो भार क े संविव ान 19 क े अनुच्छेद 226 क े ह उच्च न्यायालय क े समक्ष या सिसविवल कोट. क े समक्ष दीवानी मुकदमा दायर करक े कु छ राह की मांग की जा ी है, सिजसमें अं रिरम आदेश शाविमल होंगे लेविकन नहीं "आगे की काय.वाही पर रोक", "बेदखल रहने" या "जमीन क े मालिलक क े सार्थी-सार्थी अति ग्रहण करने वाले प्राति कारी दोनों द्वारा यर्थीान्धिस्र्थीति बनाए रखने " क सीविम है। ऐसे मामले में, जहां एक अं रिरम आदेश अति ग्रहणक ा. प्राति कारी क े लिखलाफ काम कर रहा हो ा, ो उR प्राति कारी को अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह अति विनण.य देने क े संबं में अति ग्रहण की काय.वाही में को आगे बढ़ाने से रोक देगा। 10.[8] जैसाविक पहले उ‘ेख विकया गया है, यविद कोई पंचाट घोtणा क े प्रकाशन की ारीख से दो वt. की अवति क े भी र नहीं विदया जा ा है, ो अति विनयम, 1894 की ारा 11 क क े ह भूविम का अति ग्रहण व्यपग हो जाएगा।किंक ु दो वt. की उR अवति की संगणना आदेश में वह अवति, vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सिजसक े दौरान अति विनयम, 1894 की ारा 6 क े अ ीन घोtणा पर रोक लगाई जा ी है और सिजस अवति क े दौरान न्यायालय क े आदेश द्वारा कोई कार.वाई या आगे की काय.वाही नहीं की जा सक ी र्थीी, अपवर्जिज की जा ी है।लेविकन, अति विनयम, 2013 की ारा 24 की उप- ारा 1 क े खंड (ए) क े ह, यविद उR अति विनयम क े प्रव.न पर कोई अति विनण.य नहीं विदया गया है, अर्थीा. 01.01.2014 को, ो अति विनयम, 2013 क े प्राव ान मुआवजे क े विन ा.रण से संबंति प्राव ान लागू होंगे। 10.[9] जब विनरस् अति विनयम और नए अति विनयम अर्थीा. ् अति विनयम, 2013 में इन दोनों ाराओं को एक सार्थी एक समान रीक े से पढ़ा जा ा है, ो प्रश्न यह उठ ा है विक क्या, विकसी भूविम मालिलक क े ारा में विदए गए न्यायालय क े अं रिरम आदेश क े कारण, अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह कोई पंचाट अति विनयम, 2013 क े लागू होने की ारीख अर्थीा. 01.01.2014 को नहीं विदया गया है, ो इसका अर्थी. यह होगा विक कलेक्टर/भूविम अति ग्रहण अति कारी की ओर से विनन्धि€•य ा क े कारण अति विनण.य नहीं विदया गया है। इस प्रकार, क्या अति विनयम, 2013 क े ह लाभ को सी े ऐसे भूविम मालिलक पर लागू विकया जाना चाविहए, सिजसे अति विनयम, 2013 क े लागू होने की ारीख अर्थीा. 01.01.2014 को अपने पक्ष में न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम आदेश का लाभ भी प्राप्त हो।
10.10 हम पा े हैं विक अथिभव्यविR “जहां कथिर्थी भूविम अति ग्रहण अति विनयम की ारा 11 क े ह कोई अति विनण.य नहीं विदया गया है” को संदर्शिभ रूप से पढ़ा जाना चाविहए न विक सादा पठन क े माध्यम से।ऐसा इसलिलए है क्योंविक कोई भूविम मालिलक सिजसक े पास न्यायालय द्वारा अति विनयम, 1894 की ारा 6 क े ह जारी की गई घोtणा क े अनुसार आगे की काय.वाही पर रोक लगाने का अं रिरम आदेश है और इस प्रकार उसने कलेक्टर/भूविम अति ग्रहण अति कारी को यह क. दे े हुए अति विनण.य देने से रोक विदया है विक 01.01.2014 क अति ग्रहणक ा. प्राति कारी द्वारा अति क मुआवजा प्राप्त करक े अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों क े ह लाभ प्राप्त नहीं विकया गया है।
10.11 जैसा विक पहले ही उ‘ेख विकया गया है, ारा 24 अति विनयम, 1894 क े उपबं ों क े ह शुरू विकए गए सभी अति ग्रहणों को बचाने और सार्थी ही, अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों क े ह vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क ु छ राह प्रदान करने क े लिलए बच खंड की प्रक ृ ति में है, जैसे विक अति विनयम की ारा 24 की उप- ारा 2 या इसकी ारा 24 की उप- ारा 1 क े खंड (क) क े ह अति ग्रहण व्यपग हो जायेगा।इसलिलए, प्रत्येक मामले क े थ्यों पर उR प्राव ानों को लागू कर े समय, दोनों अति विनयमों क े ह प्राव ानों को ध्यान में रख े हुए प्रासंविगक व्याख्या को ध्यान में रखना आवश्यक है। यह ारा 24 की उप- ारा 1 क े खंड (बी) क े पठन पर भी स्पष्ट हो जा ा है, सिजसमें कहा गया है विक यविद कोई पंचाट अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह 01.01.2014 को विदया गया है, अर्थीा. अति विनयम, 2013 क े लागू होने की ारीख, ो अति विनयम, 1894 क े प्राव ानों क े ह काय.वाही जारी रहेगी, मानो उसे विनरस् नहीं विकया गया हो।लेविकन यविद 01.01.2014 को कोई पंचाट नहीं विदया गया है ो ारा 24 की उप- ारा 1 का खंड (क) लागू होगा।
10.12 इस प्रकार, यह आवश्यक है विक उन कारणों पर ध्यान विदया जाए विक क्यों कोई अति विनण.य नहीं विदया गया है।जैसा विक ऊपर चचा. की गई है, यविद कलेक्टर या अति ग्रविह प्राति कारी पर संयम का कोई आदेश है और सिजसक े परिरणामस्वरूप, कलेक्टर या भूविम अति ग्रहण अति कारी अपने विनयंत्रण से परे कारणों से और भूविम मालिलक या विकसी अन्य व्यविR सिजसने अति ग्रहण पर सवाल उठाया हो, क े कहने पर अदाल द्वारा विदए गए अं रिरम आदेश क े अनुपालन में, उस अवति की गणना की जानी है सिजसक े दौरान अं रिरम आदेश लागू हुआ है और यविद अति विनयम, 2013 क े लागू होने की ारीख अर्थीा. 01.01.2014 को, भूविम मालिलक क े पक्ष में विकसी न्यायालय द्वारा विदए गए इस रह क े अं रिरम आदेश क े लागू होने क े कारण कोई भी अति विनण.य नहीं विदया गया है, ो अति विनयम 2013 क े प्राव ान सी े मुआवजे क े विन ा.रण में लागू नहीं विकए जा सक े हैं।ऐसा इसलिलए है क्योंविक यविद अं रिरम आदेश लागू न हो ा ो अति विनण.य अति विनयम, 1894 क े प्राव ानों क े ह 31.12.2013 क विदया जा सक ा र्थीा और विफर अति विनयम, 1894 क े प्राव ान ारा 24 की उप- ारा 1 क े खंड (बी) क े अनुसार 22 क े रूप में लागू हो े। लेविकन दूसरी ओर, भूविम मालिलक क े पक्ष में विकसी न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम आदेश क े लागू होने क े कारण, यह अति विनण.य 01.01.2014 को नहीं विदया गया हो ा जब अति विनयम, 2013 लागू विकया गया र्थीा। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
10.13 ऐसी न्धिस्र्थीति में हमारे विवचार में अति ग्रहणक ा. प्राति कारी पर अति विनयम, 2013 क े उपबं ों क े अ ीन प्रति कर क े अव ारण का भार नहीं डाला जा सक ा।दूसरे शब्दों में, एक रफ भूविम का मालिलक अति ग्रहण की आलोचना नहीं कर सक ा और अति कारिरयों को अति ग्रहण में आगे बढ़ने से रोकने क े लिलए अं रिरम आदेश की मांग नहीं कर सक ा है, और दूसरी रफ, यह क. नहीं दे सक ा है विक चूंविक अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह 01.01.2014 को कोई अति विनण.य नहीं विदया गया है, इसलिलए अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों को मुआवजा विन ा.रिर करने में लागू विकया जाना चाविहए।
11. अति विनयम, 2013 की ारा 24 की उप- ारा (2) की व्याख्या करने पर, इंदौर विवकास प्राति करण उपरोR में इस न्यायालय की संविव ान पीठ ने अं ः पैराग्राफ 366.[8] में विन€कt. विनकाला हैः "366.8. ारा 24(2) क े प्राव ान काय.वाही की एक समझी गई चूक क े लिलए प्रदान कर े हैं, यविद प्राति करण भूविम क े लिलए एक काय.वाही में 2013 अति विनयम क े लागू होने से पहले पांच साल या उससे अति क क े लिलए कब्जा लेने और मुआवजे का भुग ान करने में उनकी विनन्धि€•य ा क े कारण विवफल रहे हैं, ो लागू हो े हैं, भूविम अति ग्रहण की काय.वाही सम्बन्धिन् प्राति कारी क े द्वारा 1-1-2014 क लन्धिम्ब रही हैन्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेशों क े अन्धिस् त्व की अवति को पांच वt. की गणना में शाविमल नहीं विकया जाना है। 11.[1] ऐसा कर े हुए और क ु छ समान प्रस् ुति यों पर विवचार कर े हुए, इस न्यायालय ने पैराग्राफ 284,285,287,289,293,297,299,300,301,302,306,308,309,314,315,316,31 7,318,319,321,323,324,325,326,329,334 में विनम्नलिललिख रूप में विटप्पणी की हैः “284 - विवथिभन्न प्रति द्वंदी दलीलों पर विवचार करने से पहले अति विनयम 2013 की ारा 24 की व्याख्या एवं उद्देश्य पर विवचार करना एक महत्पूण. प्रश्न है। ारा 24 यह vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अव ारिर है विक यविद अति विनयम 1894 क े ह प्रारम्भ की गई काय.वाही अति विनयम 2013 क े लागू होने की ति थिर्थी क लन्धिम्ब रह ी है और इन काय.वाहीं में कोई अति विनण.य नहीं विदया गया है या यहाँ पर कोई चूक नहीं की गई है ो क े वल अति विनयम 2013 क े ह मुआवजे का विन ा.रण करना होगा। जहाँ पर कोई अति विनण.य पारिर विकया जा ा है, यह ारा 24(1)( b ) में उपबंति विकया गया है विक लन्धिम्ब काय.वाही अति विनयम 1894 क े ह चल ी रहेंगी मानों की अति विनयम विनरसिस नहीं हुआ है। अति विनयम, 2013 क े प्राव ान विकसी भी प्राव ान की प्रयोज्य ा को पूरी रह से वर्जिज कर े हैं, ारा 24(2) क े ह दो आवश्यक ाएं हैं, सिजन्हें अति कारिरयों द्वारा पूरा विकया जाना है, 2013 क े अति विनयम क े शुरू होने से 5 साल या उससे अति क पहले अति विनण.य विदया गया है, जहां भूविम का भौति क कब्जा नहीं लिलया गया है और न ही मुआवजे का भुग ान विकया गया है।यविद कब्जा ले लिलया गया है, ो अति ग्रहण करने वाले अति कारिरयों को मुआवजा देना होगा।अति कारिरयों को कार.वाई करने क े लिलए पांच साल का समय प्रदान विकया गया है, न विक मामलें को लेकर चुपचाप बैठने क े लिलए। अति कारिरयों की ओर से सुस् ी या मशीनरी और चूक क े मामले में और विकसी अन्य कारण क े लिलए चूक प्रदान की जा ी है।लैप्स क े वल भूविम अति ग्रहण आदेश वाले अति कारिरयों द्वारा चूक विकए जाने की न्धिस्र्थीति में प्रदान की जा ी है, जो विकसी अन्य कारण या न्यायालय क े आदेश क े कारण नहीं है।जब इस प्राव ान की व्याख्या स्पष्ट है, ो अं रिरम आदेश की अवति को अपवर्जिज करने क े लिलए संसद को ारा 24 (2) क े ह ऐसा प्राव ान करने की कोई आवश्यक ा नहीं र्थीी।हालांविक इसने ारा 19(7) क े परं ुक क े ह घोtणा करने क े लिलए अं रिरम आदेश की अवति को बाहर रखा है और 2013 क े अति विनयम की ारा 69 क े ह की गणना क े लिलए भी बविह€करण विकया गया है। यह प्राव ान की भाtा को देख े हुए ऐसा प्रदान करने की आवश्यक ा क े कारण है। 2013 अति विनयम की ारा 69 क े ह, ारा 11 क े ह प्रारंथिभक अति सूचना क े प्रकाशन की ारीख से शुरू होने वाली अवति क े लिलए बाजार मूल्य पर 12 प्रति श की दर से अति रिरR मुआवजा विदया जाना है।विकसी भी न्यायालय क े अं रिरम विनtे ाज्ञा आदेश क े कारण अति ग्रहण की काय.वाही की अवति क े लिलए 12 प्रति श की दर से vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति रिरR मुआवजे को बाहर रखा गया है। ारा 24 क े उपबं ों ने प्राति कारिरयों पर ऐसे कदम उठाने की बाध्य ा डाली है सिजसका अर्थी. है विक वे ऐसे कदम उठाने क े लिलए स्व ंत्र हैं और उनकी ओर से विनन्धि€•य ा या सुस् ी पर संसद द्वारा विवचार नहीं विकया गया है।परिरणाम ः, काय.वाविहयों का लोप हो ा है।प्राव ानों की प्रक ृ ति ही ऐसी है विक यविद विकसी कारण से अति कारिरयों या सरकार क े लिलए आवश्यक कदम उठाना संभव नहीं है ो उस अवति को बाहर रखा जाना चाविहए।संबंति मंत्री श्री जयराम रमेश ने बहस का जवाब दे े हुए स्पष्ट विकया विक कार.वाई करने क े लिलए अति कारिरयों क े लिलए पांच वt. की समय-सीमा विन ा.रिर की गई है।यविद हम अं रिरम आदेश की अवति को अपवर्जिज नहीं कर े हैं, ो प्राव ान की मूल भावना का उ‘ंघन विकया जाएगा।
285. काय.कारी अति कारिरयों क े लिलए अपेतिक्ष कदम उठाने क े लिलए अवति क े विन ा.रण क े संबं में, डीडीए बनाम सुखबीर सिंसह [(2016) 16 एससीसी 258] क े वाद में देखा गया विक विव ातियका वास् व में काय.पालिलका को ब ा रही है विक उन्हें चाविहए अपने घर को व्यवन्धिस्र्थी कर लिलया है और अति विनण.य की घोtणा क े बाद एक उतिच समय क े भी र अति ग्रहण की काय.वाही पूरी कर ली है।पांच साल की छ ू ट क े बाद भी ऐसा न करने पर विव ायी सविह€णु ा की सीमा को पार कर जाएगा, सिजसक े बाद पूरी काय.वाही व्यपग हो गई मानी जाएगी।इस प्रकार, यह डीडीए बनाम सुखबीर सिंसह [(2016) 16 एससीसी 258] क े विनण.य से स्पष्ट है, सिजस पर भू-स्वाविमयों द्वारा भरोसा विकया जा ा है, विक काय.कारी प्राति कारिरयों क े लिलए कदम उठाने क े लिलए समय-सीमा विन ा.रिर की जा ी है।यविद न्यायालय क े आदेश द्वारा उन्हें रोका जा ा है, ो स्पष्ट रूप से, 25 उपबं ों क े विनव.चन क े अनुसार यह है विक ऐसी अवति को अपवर्जिज विकया जाना चाविहए। यविद ऐसा उपबं विकया गया हो ा ो इसे अत्यति क चे ावनी क े सार्थी विकया जाना चाविहए।विव ान क े विनमा.ण क े दौरान इस प्रस् ाव पर चचा. विकए जाने क े बावजूद ऐसा प्राव ान करने की कोई आवश्यक ा नहीं र्थीी। र्थीाविप, अपवज.न का उपबं अति विनयविम विकया गया है।यह प्राति कारिरयों पर पांच वt› क े भी र अपेतिक्ष कदम vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उठाने की बाध्य ा डाल ा है, जो अपने आप में अं रिरम आदेश की ऐसी अवति को अपवर्जिज कर ा है। X X X X
287. 2013 क े अति विनयम का आशय क े वल वाविदयों को लाभ पहुंचाना नहीं है।इसने एक नई व्यवस्र्थीा शुरू की है जो भूविम मालिलकों क े लिलए फायदेमंद है। ारा 24 क े प्राव ान अपने आप में मुकदमा करने वाले पक्षों को लाभ प्रदान करने का इरादा नहीं रख े हैं, जबविक 2013 क े अति विनयम की ारा 114 और सामान्य खंड अति विनयम की ारा 6 क े अनुसार 1894 अति विनयम क े प्राव ानों क े अनुसार मुकदमा चलाया जाना है। X X X X
289. इस न्यायालय की राय में 2013 क े अति विनयम का आशय यह नहीं है विक सिजन लोगों ने मुकदमा विकया है उन्हें उच्च मुआवजे का लाभ विमलना चाविहए जैसा विक ारा 24 क े ह विवचार विकया गया है, सभी लाभार्शिर्थीयों को लाभ प्रदान विकया जा ा है।प्राव ानों का यह आशय नहीं है विक सिजन व्यविRयों ने मुकदमा दायर विकया है और •मानुसार वे व्यविR सिजन्होंनें मुकदमा दायर उन्होनें अं रिरम आदेश प्राप्त विकया है एवं उनकों 2013 क े अति विनयम क े प्राव ानों का लाभ विमलना चाविहए। सिजन लोगों ने 5 साल क े भी र मुआवजा स्वीकार कर लिलया है और कब्जा भी सौंप विदया है, उन्हें लाभ होगा, अगर अति कांश बकायें क े संबं में राथिश जमा नहीं की गई है। ऐसे मामले हैं सिजनमें परिरयोजनाएं आंथिशक रूप से शुरू की गई हैं और योजना क े अनुसार शेt क्षेत्र योजनाबद्ध विवकास क े लिलए आवश्यक है सिजसक े संबं में अं रिरम स्र्थीगन प्राप्त विकया गया है।अर्थीक मुकदमेबाजों को लाभ पहुंचाना कानून का उद्देश्य नहीं है।इसलिलए यह नहीं कहा जा सक ा है विक 26 अति कारिरयों की विनन्धि€•य ा क े कारण 5 वt› क े भी र कब्जा नहीं लिलया जा सका। लोक नीति मुकदमेबाजी को बढ़ावा देने या बढ़ावा देने की नहीं है बन्धिल्क इसे समाप्त करने की है।कई उदाहरणों में, विवथिभन्न उच्च न्यायालयों में vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA एकल न्याया ीश पीठों द्वारा रिरट यातिचकाएं खारिरज कर दी गई ं और रिरट अपीलें लंबे समय से लंविब र्थीीं और सिजनमें परिरयोजनाओं की भूविम क े एक विहस्से क े संबं में ारा 24 (2) का लाभ प्राप्त करने क े प्रयास विकए गए र्थीे।हमारे विवचार में संसद का इरादा ऐसे वाविदयों को उपरोR कारणों से लाभ प्रदान करने का नहीं र्थीा।मुकदमेबाजी ुच्छ या योग्य हो सक ी है।ऐसे वाविदयों को अपने स्वयं क े मामले क े बल पर खड़ा होना पड़ ा है और ऐसे मामले में 2013 अति विनयम की ारा 114 और सामान्य खंड अति विनयम, 1897 की ारा 6 क े प्राव ान स्पष्ट रूप से आकर्षिt हो े हैं और इस रह की काय.वाही क े प्राव ानों क े ह जारी रखा जाना है पुराना अति विनयम जो 2013 क े अति विनयम की ारा 24(1)(बी) की भावना में होगा। सामान्य खंड अति विनयम, 1897 की ारा 6 (बी) में प्राव ान है विक विनरसन इस प्रकार विनरसिस विकसी भी अति विनयम क े विपछले संचालन को प्रभाविव नहीं करेगा या उसक े ह विवति व रूप से विकया गया या पीविड़ क ु छ भी प्रभाविव नहीं करेगा। ारा 6 (ग) में कहा गया है विक इस प्रकार विनरसिस विकसी अति विनयविमति क े अ ीन अर्जिज, प्रोद्भू या उपग विकसी अति कार, विवशेtाति कार, बाध्य ा या दातियत्व पर विनरसन का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।जब ारा 24 (बी) में प्राव ान क े अनुसार ारा 24 (बी) क े प्रयोजनों क े लिलए 1894 क े अति विनयम क े ह अति विनण.य पारिर विकया गया है, ो ारा 114 क े प्राव ान स्पष्ट रूप से आकर्षिt हो े हैं, क्योंविक सामान्य खंड अति विनयम, 1897 की ारा 6 क े प्राव ान ारा 24 क े गैर-बाध्यकारी खंड की सीमा क, जहां कब्जा नहीं लिलया गया है या भुग ान नहीं विकया गया है, वहां अति कारिरयों की विनन्धि€•य ा से एक चूक हो ी है, ।विकसी भी न्यायालय क े अं रिरम आदेश को प्राति कारिरयों या एजेंसिसयों की विनन्धि€•य ा नहीं कहा जा सक ा है, इस प्रकार ारा 24 (2) में परिरकन्धिल्प 5 वt. की अवति की गणना क े लिलए समय अवति को शाविमल नहीं विकया जाना चाविहए। ारा 24 (2) क े प्राव ान क े अनुसार, जहां कब्जा ले लिलया गया है, लेविकन अति कांश भूविम जो ों क े संबं में मुआवजे का भुग ान या जमा नहीं विकया गया है, वहां सभी लाभार्थी8 क े वल उस सीमा क ही अति क मुआवजे क े हकदार होंगे, 2013 अति विनयम की ारा 114 क े प्राव ानों का अति •मण विकया जाएगा, लेविकन यह सामान्य खंड अति विनयम, 1897 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की ारा 6 क े सामान्य उपयोग को समाप्त नहीं करेगा, जो ारा 24 (2) और इसक े प्राव ान क े रूप में प्रदान विकए गए प्राव ानों को छोड़कर विनरस् क े प्रभाव से संबंति है। X X X X
293. उपयु.R प्रस् ावों क े सार्थी कोई विववाद नहीं हो सक ा। र्थीाविप, व.मान मामले में, जब हम ारा 24 क े उपबं ों का अर्थीा.न्वयन कर े हैं, ो यह स्पष्ट रूप से न्यायालय क े अं रिरम स्र्थीगन क े दौरान व्य ी की गई अवति को हटा दे ा है।कार.वाई करने क े उद्देश्य से पांच वt. की अवति विन ा.रिर की जा ी है, यविद उन्होंने 5 वt. या उससे अति क समय से कार.वाई नहीं की है, ो चूक हो ी है, अन्यर्थीा नहीं।यविद न्यायालय क े आदेश क े कारण अं रिरम स्र्थीगन क े संबं में न्यायालय की काय.वाविहयों में विब ाए गए समय क े अपवज.न क े संबं में कोई उपबं विकया गया हो ा ो यह अत्यति क चे ावनी का मामला हो सक ा र्थीा, सिजस पर इस न्यायालय द्वारा भार संघ बनाम मोदी रबड़ लिलविमटेड [(1986) 4 एस. सी. सी. 66] में विवचार विकया गया है।मोदी रबड़ लिलविमटेड [(1986) 4 एस. सी. सी. 66] में विनम्नलिललिख विटप्पथिणयाॅें की गयी र्थीीः(एससीसी पृष्ठ 72-74, पैरा 7)
7. इन दोनों अति सूचनाओं को क ें द्रीय उत्पाद शुल्क विनयम, 1944 क े विनयम 8 (1) क े ह जारी विकया जा ा है और चूंविक विनयम 2, खंड (v) ) में 'शुल्क' की परिरभाtा को अविनवाय. रूप से विनयम 8 (1) में पेश विकया जाना चाविहए और विनयम 8 (1) में 'उत्पाद शुल्क' की अथिभव्यविR को उस परिरभाtा क े आलोक में पढ़ा जाना चाविहए, विनयम 8 (1) क े ह जारी इन दो अति सूचनाओं में उपयोग की गई समान अथिभव्यविR का भी उसी अर्थी. में अर्थी. लगाया जाना चाविहए, अर्थीा. ्, क ें द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अति विनयम, 1944 क े ह देय उत्पाद शुल्क और इन दोनों अति सूचनाओं क े ह दी गई छ ू ट को क े वल उत्पाद शुल्क क े ऐसे ही vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA रूप में सीविम माना जाना चाविहए।लेविकन प्रति वादी ने क. विदया विक अथिभव्यविR "उत्पाद शुल्क 28" बड़े आयाम में से एक र्थीा और विकसी भी प्रति बं ात्मक या सीविम शब्दों की अनुपन्धिस्र्थीति में यह दशा. ा है विक इसका उद्देश्य क े वल क ें द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अति विनयम, 1944 क े ह लगने वाले उत्पाद शुल्क को संदर्शिभ करना र्थीा।, इसे उत्पाद शुल्क क े सभी क.व्यों को कवर करने क े लिलए आयोसिज विकया जाना चाविहए, चाहे क ें द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अति विनयम, 1944 क े ह या विकसी अन्य अति विनयम क े ह लगाया जा सक ा है प्रत्यर्थी8यों ने इस क. का समर्थी.न कर े हुए कहा विक जब भी क ें द्र सरकार एक अति सूचना क े ह दी गई छ ू ट को क ें द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अति विनयम, 1944 क े ह लगने वाले उत्पाद शुल्क क सीविम करना चाह ी है, ो क ें द्र सरकार ने इसका उपयोग करक े अपने इरादे को इस प्रकार क े शब्दों को कहकर स्पष्ट कर विदया जैसे क े न्द्रीय उत्पाद एवं नमक अति विनयम, 1944 की ारा 3 क े ह उत्पाद शुल्क का देय होना......… क े न्द्रीय उत्पाद एवं नमक अति विनयम क े ह उत्पाद शुल्क का देय होना या उपरोR अति विनयम की अति सूचना सख्यां - सी ई आर-8 (3)/55- सी ई विदनांविक 17-09-1955, अति सूचना सख्यां - सी ई आर- 255/77- सी ई विदनांविक 20-07-1977, अति सूचना सख्यां - सी ई आर- 8(1)/55- सी ई विदनांविक 02-01-1955] अति सूचना सख्यां - सी ई आर-8 (9)/55- सी ई विदनांविक 31- 12-1955, अति सूचना सख्यां - सी ई आर- 95/61- सी ई विदनांविक 01-04-1961 एवं इसी प्रकार क े अन्य अति सूचनाएं। लेविकन, यहां प्रति वादी कहा विक प्रश्न में दो अति सूचनाओं में परिरसीमा क े ऐसे विकसी शब्द का उपयोग नहीं विकया गया है और इसलिलए, 'उत्पाद शुल्क' अथिभव्यविR को उसक े सामान्य प्राक ृ ति क अर्थी. क े अनुसार पढ़ा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA जाना चाविहए, सिजसमें उत्पाद शुल्क क े सभी शुल्क शाविमल हैं, सिजसमें उत्पाद शुल्क क े विवशेt शुल्क और उत्पाद क े सहायक शुल्क शाविमल हैं.अब, इसमें कोई संदेह नहीं है विक उपरोR उसि‘लिख विवथिभन्न अति सूचनाओं में, क ें द्र सरकार ने विनयम 8 (1) क े ह छ ू ट प्रदान कर े समय, विनर्षिदष्ट भाtा का उपयोग विकया है, जो यह दशा. ा है विक ऐसी प्रत्येक अति सूचना क े ह दी गई छ ू ट, क ु ल या आंथिशक, क ें द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अति विनयम, 1944 क े ह लगाए जाने वाले उत्पाद शुल्क क े ह है। लेविकन, क े वल इसलिलए विक, प्रारूपण क े मामले क े रूप में, क ें द्र सरकार ने क ु छ अति सूचनाओं में विवशेt रूप से उत्पाद शुल्क का उ‘ेख विकया है, सिजसक े संबं में क े न्द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अति विनयम, 1944 क े ह उद्ग्रहणीय 'उत्पाद शुल्क' क े रूप में छ ू ट दी जा ी है, इसका यह अर्थी. नहीं है विक विवथिशष्ट ा क े ऐसे शब्दों क े अभाव में, 'उत्पाद शुल्क' अथिभव्यविR को स्वयं ही उत्पाद शुल्क क े सभी शुल्कों क े रूप में पढ़ा जाना चाविहए।यह असामान्य नहीं है विक विव ानमंडल कभी - कभी अपने आशय को संदेह से परे स्पष्ट करने की दृविष्ट से भाtा का उपयोग कर ा है, हालांविक यह सख् ी से आवश्यक नहीं हो सक ा है और इसक े विबना भी उसी आशय को न्यातियक विनमा.ण क े मामले क े रूप में वर्शिण विकया जा सक ा है और यह काय.पालिलका द्वारा अ ीनस्र्थी विव ान क े मामले में अति क होगा।काय.कारी विवभाग में अ ीनस्र्थी विव ान क े विकसी विवथिशष्ट भाग का प्रारूपण करने वाला अति कारी इस दृविष्ट से शब्दों का प्रयोग कर सक ा है विक उसक े आशय क े बारे में या कभी-कभी अति क पूण. ा क े लिलए कोई संदेह की गुंजाइश न रहे, हालांविक ये शब्द अ ीनस्र्थी विव ान क े अर्थी. और व्याविप्त में क ु छ भी नहीं जोड़ सक े हैं। यहां, व.मान अति सूचनाओं में, 'क े न्द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अति विनयम, 1944 क े ह उद्ग्रहणीय उत्पाद शुल्क' शब्दों को प्रति वादीदा ाओं द्वारा भरोसा की गई अन्य अति सूचनाओं की रह स्र्थीान नहीं विमला है।लेविकन vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इससे यह अनुमान लगाना जरूरी नहीं है विक इन अति सूचनाओं में ‘उत्पाद शुल्क’ का आशय उत्पाद शुल्क क े विवशेt और सहायक शुल्कों सविह सभी उत्पाद शुल्कों को संदर्शिभ करना र्थीा।इन शब्दों की अनुपन्धिस्र्थीति हमें इन अति सूचनाओं में 'उत्पाद शुल्क' की अथिभव्यविR की व्याख्या करने क े दातियत्व से मुR नहीं कर ी है।हमें अभी भी इस अथिभव्यविR का अर्थी. लगाना है -इसका अर्थी. और आयाम क्या है-और इसे उस संदभ. को ध्यान में रख े हुए विकया जाना है सिजसमें यह हो ा है। हम पहले ही ब ा चुक े हैं विक ये अति सूचनाएं विनयम 8 (1) क े ह जारी की गई हैं, इन अति सूचनाओं में 'उत्पाद शुल्क' अथिभव्यविR का वही अर्थी. होना चाविहए जो विनयम 8 (1) में है और इसका स्पष्ट अर्थी. है -क ें द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अति विनयम, 1944 क े ह देय उत्पाद शुल्क जैसा विक विनयम 2 खंड (v) ) में परिरकन्धिल्प है।इन परिरन्धिस्र्थीति यों में विवशेt उत्पाद शुल्क और सहायक उत्पाद शुल्क को शाविमल करने क े लिलए इसका एक विवस् ारिर अर्थी. नहीं हो सक ा। (प्रभाव वर्ति ) X X X X
297. श्री बालाजी नगर रेजीडेंथिशयल असोसिसएशन [श्री बालाजी नगर रेजीडेंथिशयल असोसिसएशन बनाम विमलनाडु राज्य, (2015) 3 एससीसी 353] क े विनण.य की शुद्ध ा पर योगेश नीमा [योगेश नीमा बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2016) 6 एससीसी 387] क े मामलें में संदेह विकया गया र्थीा और मामले को एक वृहद न्यायपीठ को विनर्षिदष्ट विकया गया र्थीा। श्री बालाजी नगर रेजीडेंथिशयल असोसिसएशन [श्री बालाजी नगर रेजीडेंथिशयल असोसिसएशन बनाम विमलनाडु राज्य, (2015) 3 एससीसी 353] में विनम्नलिललिख अव ारिर विकए गए र्थीेः(एससीसी पृष्ठ 361, पैराग्राफ 11-12)
11. 2013 क े अति विनयम की ारा 24 को सी े पढ़ने से, यह स्पष्ट है विक 2013 अति विनयम की ारा 24 (2) विकसी भी अवति को बाहर नहीं vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कर ी है, सिजसक े दौरान विकसी भी न्यायालय क े द्वारा विदए गए रोक या विनtे ाज्ञा क े कारण भूविम अति ग्रहण की काय.वाही रुकी हुई हो सक ी है।इसी अति विनयम में, ारा 19(1) क े परन् ुक क े ह घोtणा क े प्रकाशन क े लिलए परिरसीमन क े संदभ. में ारा 19(7) क े प्राव ान और उसक े संदभ. में भूविम क े बाजार मूल्य की गणना क े लिलए ारा 69(2) क े लिलए स्पष्टीकरण ारा 11 क े ह प्रारंथिभक अति सूचना और अति विनण.य की ारीख क े बीच देरी, विवशेt रूप से प्रदान कर े हैं विक अवति या अवति सिजसक े दौरान विकसी भी अदाल क े आदेश द्वारा विकसी भी रोक या विनtे ाज्ञा क े कारण अति ग्रहण की काय.वाही को रोक विदया गया र्थीा, प्रासंविगक अवति की गणना में शाविमल नहीं विकया जाएगा। मामले क े उस दृविष्टकोण से, यह सुरतिक्ष रूप से विन€कt. विनकाला जा सक ा है विक विव ानमंडल ने जानबूझकर आदेश 24 (2) में उसि‘लिख पांच वt› की अवति को बढ़ाने का लोप विकया है, भले ही विकसी न्यायालय द्वारा विदए गए रोक या व्यादेश क े कारण काय.वाही में विवलंब हुआ हो।इस न्यायालय द्वारा पद्मा सुंदर राव बनाम विमलनाडु राज्य [(2002) 3 एससीसी 533] वाले मामले में विवस् ार से चचा. विकए गए विवtय पर कानून की दृविष्ट से न्यायालय द्वारा ऐसे मामले की आपूर्ति नहीं की जा सक ी है।
12. भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 में भी, विव ातियका ने 1984 क े एक संशो न अति विनयम क े माध्यम से ारा 6 में संशो न विकया र्थीा ाविक उस अवति को बाहर करने क े उद्देश्य से स्पष्टीकरण 1 जोड़ा जा सक े जब काय.वाही को रोक विदया गया र्थीा। अति विनयम की ारा 6(1) क े ह घोtणा को प्रकाथिश करने क े लिलए प्रदान की गई सीमा क े संदभ. में अदाल का एक आदेश इसी रह क े प्रभाव क े लिलए ारा 11-ए की व्याख्या र्थीी, सिजसे 1984 क े संशो न अति विनयम 68 द्वारा जोड़ा गया र्थीा।स्पष्ट रूप से, विव ातियका ने अपने विववेक से, 2013 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अति विनयम की ारा 24 (2) क े ह पांच साल की अवति को पूण. बना विदया है और न्यायालय द्वारा स्र्थीगन क े विकसी भी आदेश क े कारण काय.वाही में विकसी भी देरी से प्रभाविव नहीं हुआ है।विव ातियका द्वारा इस् ेमाल विकए गए स्पष्ट शब्द स्पष्ट हैं और इनसे कोई अस्पष्ट ा या टकराव पैदा नहीं हो ा है।ऐसी न्धिस्र्थीति में न्यायालय को व्याख्या क े शान्धिब्दक विनयम से हटने की जरूर नहीं है। X X X X
299. ऐसे मामलों में जहां क ु छ भू-स्वाविमयों ने मुकदमेबाजी का सहारा लिलया है (सिजस पर उनका अति कार है) और यर्थीान्धिस्र्थीति बनाए रखने क े लिलए अं रिरम आदेश प्राप्त विकए हैं, प्राति कारिरयों या राज्य क े अति कारिरयों क े लिलए व्यवहारिरक वास् विवक ा क े रूप में कब्जा लेना या मुआवजे का भुग ान करना संभव नहीं है।कई मामलों में, इस रह क े अं रिरम आदेशों ने भी अति विनण.य देने में रूकावट डाली।अब, जहां क अति विनण.य (और ऐसी काय.वाविहयों क े अनुसरण में मुआवजा भुग ान ) का संबं है, 2013 अति विनयम (सिसक 1894 अति विनयम) क े ह अति विनण.य देने क े लिलए प्रदान की गई अवति को ारा 11-ए क े स्पष्टीकरण क े आ ार पर अपवर्जिज विकया जा सक ा है। [11-ए. अवति सिजसक े भी र अति विनण.य विदया जाएगा।] कलेक्टर घोtणा क े प्रकाशन की ारीख से दो वt. की अवति क े भी र ारा 11 क े ह अति विनण.य देगा और यविद उस अवति क े भी र कोई अति विनण.य नहीं विदया जा ा है।(ख) भूविम क े अज.न क े लिलए पूरी काय.वाही व्यपग हो जाएगी:बश \ विक ऐसे मामले में जहां कथिर्थी घोtणा भूविम अति ग्रहण (संशो न) अति विनयम, 1984 क े लागू होने से पहले प्रकाथिश की जा चुकी हो, अति विनण.य ऐसे प्रारंभ से दो वt. की अवति क े भी र विदया जाएगा।स्पष्टीकरण-इस ारा में उसि‘लिख दो वt. की अवति की गणना आदेश में वह अवति सिजसक े दौरान उR घोtणा क े अनुसरण में की जाने वाली कोई कार.वाई या काय.वाही न्यायालय क े आदेश द्वारा रोक दी जा ी है, अपवर्जिज कर दी जाएगी।] इस प्रकार, अति कारिरयों को विनन्धि€•य ा का कोई दोt नहीं विदया जा सक ा है और सिजन्होंने इस रह क े अं रिरम vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA आदेश प्राप्त विकए हैं, वे मुकदमेबाजी दायर आदेश में अपनी स्वयं की कार.वाई से लाभ नहीं उठा सक े, जो सराहनीय हो या नहीं हो सक ा है।मेरिरट क े सवाल क े अलावा, जब यर्थीान्धिस्र्थीति बनाए रखने या आगे की काय.वाही पर रोक लगाने क े संबं में कोई अं रिरम आदेश हो ा है, ो अति कारी न ो कार.वाई कर सक े हैं और न ही वे मुआवजा दे सक े हैं।उनक े दातियत्व भूविम अति ग्रहण की योजना क े सार्थी जुड़े हुए हैं।यह देखा गया है विक प्राति कारी अं रिरम आदेश समाप्त होने क काय.वाही में इं जार कर सक े हैं।
300. हमारी सुविवचारिर राय में, भू-स्वाविमयों द्वारा शुरू की गई मुकदमेबाजी का विवविनश्चय अपने गुणों क े आ ार पर विकया जाना चाविहए और ारा 24 (2) क े लाभ वाविदयों को उपलब् नहीं होने चाविहए। यविद कोई अं रिरम आदेश नहीं है, ो वे लाभ प्राप्त कर सक े हैं सिजनक े वे हकदार हैं, अन्यर्थीा मुकदमेबाजी, देरी और विवलंबकारी रणनीति क े परिरणामस्वरूप नहीं और कभी -कभी यह पूरी रह से ुच्छ अथिभवचन और जाली दस् ावेज हो सक े हैं जैसा विक वी. चंद्रशेखरन [वी. चंद्रशेखरन बनाम प्रशासविनक अति कारी, (2012) 12 एससीसी 133] में ऊपर उसि‘लिख है। "301. अभय राम बनाम भार संघ [(1997) 5 एससीसी 421] में, इस न्यायालय ने" "कार.वाई या काय.वाही क े स्र्थीगन" "शब्दों क े विवस् ारिर अर्थी. पर विवचार विकया।"यह पाया गया विक इस न्यायालय द्वारा पारिर विकसी भी प्रकार क े आदेश आगे बढ़ने क े लिलए अति कारिरयों की ओर से एक अवरो क कार.वाई होगी.इस न्यायालय ने इस प्रकार म व्यR विकयाः(एससीसी पृष्ठ 428-29, पैरा 9)
9. इसलिलए, बीआर गुप्ता बनाम भार संघ [1988 एससीसी ऑनलाइन डेल 367] में विदए गए कारण ारा 6 क े सापेक्ष्य उपरोR रिरट याचकाक ा. की घोtणा क े प्रकाशन को रद्द करने क े संदभ. में स्पष्ट हैं।विवचार क े लिलए यह प्रश्न उठ ा है विक क्या ारा 6 क े ह प्रत्यर्शिर्थीयों को घोtणा क े प्रकाशन से प्रति बंति करने वाले क ु छ व्यविRयों द्वारा प्राप्त रोक समान रूप से vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपीलक ा.ओं से संबंति मामलों पर लागू होगी।हम इस आ ार पर आगे बढ़ े हैं विक अपीलार्शिर्थीयों ने घोtणा क े प्रकाशन का कोई स्र्थीगन प्राप्त नहीं विकया र्थीा, लेविकन चूंविक क ु छ मामलों में उच्च न्यायालय ने, वास् व में, इसमें इसक े पहले उद्धृ रूप में, उन्हें घोtणा क े प्रकाशन से प्रति बंति कर विदया है, इसलिलए आवश्यक रूप से, जब न्यायालय ने यातिचकाक ा.ओं क े समर्थी.न में घोtणा को प्रति बंति नहीं विकया है, ो अति कारिरयों को मामलों का विनपटारा होने क अपने हार्थी रोक े रखने पड़े।वास् व में, इस न्यायालय ने विवथिभन्न मामलों में स्र्थीगन या काय.वाही क े आदेशों को विवस् ारिर अर्थी. विदया है, अर्थीा. ्, यूसुफभाई नूरमोहम्मद नेंडोलिलया बनाम गुजरा राज्य [(1991) 4 एससीसी 531], हंसराज एच जैन बनाम महाराष्ट्र राज्य [ (1993) 3 एससीसी 634], संगप्पा गुरुलिंलगप्पा सज्जन बनाम कना.टक राज्य [(1994) 4 एससीसी 145], गां ी गृह विनमा.ण सहकारी सविमति लिलविमटेड बनाम राजस्र्थीान राज्य [(1993) 2 एससीसी 662], जी नारायणस्वामी रेड्डी v). कना.टक राज्य [(1991) 3 एससीसी 261] और रोशनीरा बेगम बनाम भार संघ [1996 की नागरिरक अपील संख्या 13976 उप नाम मुरारी बनाम भार संघ, (1997) 1 एससीसी 15] शब्द "कार.वाई या काय.वाही पर रोक" की इस न्यायालय द्वारा व्यापक रूप से व्याख्या की गई है और इसका अर्थी. है विक इस न्यायालय द्वारा पारिर विकसी भी प्रकार क े आदेश आगे बढ़ने क े लिलए अति कारिरयों की ओर से एक विनरो ात्मक कार.वाई होगी। जब ारा 5-ए क े ह जांच करने की कार.वाई को मुद्दा बनाया गया और ारा 6 क े ह घोtणा पर सवाल उठाया गया, ो आवश्यक रूप से जब क न्यायालय यह नहीं मान ा है विक ारा 5- ए क े ह जांच उतिच रीक े से की गई र्थीी और ारा 6 क े ह प्रकाथिश घोtणा वै र्थीी, ो अति कारिरयों को मामले में आगे बढ़ने की अनुमति नहीं होगी।न ीज न, क ु छ क े संबं में दी गई रोक उन लोगों पर भी लागू होगी सिजन्होंने इस संबं में स्टे प्राप्त नहीं विकया र्थीा।हम ारा ५ -ए की जांच और आपलिuयों पर विवचार क े संबं में पहले क े विनद\श की शुद्ध ा से तिकर का अवधारण और संचति नहीं हैं vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क्योंविक इसे प्रति वादी संघ द्वारा चुनौ ी नहीं दी गई र्थीी।हम इसकी शुद्ध ा पर कोई राय व्यR नहीं कर े हैं, हालांविक यह संदेह क े लिलए खुला है।
302. ओम प्रकाश बनाम भार संघ [(2010) 4 एससीसी 17] में, यह देखा गया विक भूविम मालिलकों क े एक मामले में विदए गए स्र्थीगन क े अं रिरम आदेश से अति विनयम की ारा 6 क े ह घोtणा जारी करने क े लिलए आगे बढ़ने क े लिलए प्रति वादी पर पूण. विनयंत्रण होगा।(एससीसी पृष्ठ 44, पैरा 72) "72. इस प्रकार, दूसरे शब्दों में, भूस्वाविमयों क े मामलों में से एक में विदए गए स्र्थीगन का अं रिरम आदेश प्रति वाविदयों पर अति विनयम की ारा 6 क े ह अति सूचना जारी करने क े लिलए आगे बढ़ने पर पूण. प्रति बं लगा देगा। यविद उन्होंने उR अति सूचना उस अवति क े दौरान जारी की र्थीी जब स्र्थीगन लागू र्थीा, ो जाविहर है विक उन्हें अदाल की अवमानना करने क े लिलए दोtी ठहराया जा सक ा र्थीा। स्र्थीगन क े अं रिरम आदेशों में प्रयुR भाtा भी ऐसी है विक इसने अति विनयम की ारा 6 क े ह घोtणा/अति सूचना जारी करक े प्रति वाविदयों को मामले में आगे बढ़ने से पूरी रह से रोक विदया र्थीा। X X X X
306. ारा 24 (2) क े उपबं ों की कठोर ा से बचाने क े लिलए, जब प्राति कारी असंभव क े कारण क.व्यों का पालन करने से विवकलांग हो जा े हैं, ो यह उनक े लिलए एक अच्छा बहाना होगा।वादकारी सही या गल हो सक ा है।उसे उसक े द्वारा अं रिरम आदेश से उत्पन्न न्धिस्र्थीति का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सक ी। "" अपने अपक ृ त्य से कोइ. लाभ नहीं उठा सक ा "" "का सिसद्धां है विक विकसी भी पाट[8] को अपनी गल ी से सुविव ा नहीं विमल सक ी।" "" ारा 24 क े उपबं ों में मुकदमेबाजों या गैर-मुकदमेबाजों क े सार्थी भेदभाव नहीं विकया गया है और एक ही अति ग्रहण क े संबं में उनक े सार्थी अलग-अलग व्यवहार विकया गया है, अन्यर्थीा, असंग परिरणाम हो सक े हैं और प्राव ान अपने आप में भेदभावपूण. हो सक े हैं। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA X X X X
308. यूविनयन ऑफ इंतिडया बनाम नॉर्थी. टेल्यूमर कोलिलयरी [(1989) 3 एससीसी 411] में, इस न्यायालय ने कहा विक देरी करने की रणनीति को फलने -फ ू लने की अनुमति नहीं दी जानी चाविहए। देरी करने से, मालिलक को भारी मात्रा में ब्याज विमलेगा, लेविकन उसे मूल राथिश में से एक पैसा नहीं विमल सक ा है। यह मालिलकों को अन्यायपूण. लाभ प्रदान करने क े बराबर होगा जो संसद का इरादा कभी नहीं हो सक ा। इस न्यायालय ने यह म व्यR विकयाः(एससीसी पृष्ठ 416-17, पैरा 8)
8. उच्च न्यायालय क े विन€कt. मुख्य रूप से कोयला अति विनयम की ारा 18(5) की व्याख्या पर आ ारिर हैं। उच्च न्यायालय ने विवथिभन्न शब्दकोशों से "लाभ प्रदान करना" और "लाभ" शब्दों क े अर्थी. उद्धृ विकए हैं।कोयला अति विनयम क े संदभ. और योजना में इन सरल शब्दों क े अर्थी. को समझने क े लिलए विकसी शब्दकोश या विकसी बाहरी सहाय ा की आवश्यक ा नहीं है। कोयला अति विनयम क े ह आयुR क े समक्ष मालिलकों क े लेनदारों क े दावे हैं और सिजन देनदारिरयों का भुग ान विकया जाना है, वे भी कोयला खदानों क े मालिलकों क े हैं।जब कज. का भुग ान विकया जा ा है और देनदारिरयों का भुग ान विकया जा ा है, ो क े वल कोयला खदानों क े मालिलक ही लाभान्धिन्व हो े हैं।अपने ऋणों और देनदारिरयों का विनव.हन विकए विबना मालिलकों द्वारा ब्याज की राथिश को वापस लेना अनुतिच होगा।उन्हें क े वल दावों क े संविव रण को स्र्थीविग करने क े लिलए देरी करने की रणनीति अपनानी पड़ ी है और परिरणामस्वरूप उन्हें अति क ब्याज विमल ा है।इस रह की देरी क े कारण मालिलक को भारी मात्रा में ब्याज विमलेगा, हालांविक अं ः उसे दावों क े अंति म विनस् ारण पर मूल न में से एक पैसा भी नहीं विमलेगा।यह मालिलकों को अन्यायपूण. लाभ प्रदान करने क े समान होगा जो कभी भी संसद का इरादा नहीं हो सक ा।हम उच्च न्यायालय द्वारा की गई व्याख्या से सहम नहीं हैं और यह मान े हैं विक कोयला अति विनयम क े ह प्राप्त होने वाला ब्याज vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA कोयला खदान क े संबं में आयुR को भुग ान विकया गया न है और इसका उपयोग आयुR द्वारा लेनदारों क े दावों को पूरा करने और कोयला अति विनयम क े प्राव ानों क े अनुसार अन्य देनदारिरयों का विनव.हन करने क े लिलए विकया जाना है।
309. ुच्छ मुकदमेबाजी फाइल करना और रोक प्राप्त करना संविदग् आचरण नहीं हो सक ा है लेविकन ारा 24 (2) का लाभ उन लोगों को नहीं विदया जाना चाविहए सिजन्होंने रोक क े दौरान कब्जा लेने या क्षति पूर्ति क े भुग ान को रोका। X X X X
314. "विवति असंभव करने क े लिलए विववश नहीं कर ी है" "" "उविR का अर्थी. है विक विवति असंभव क े विन€पादन की अपेक्षा नहीं कर ी है।" हालांविक भुग ान संभव है, लेविकन भुग ान का क. प्रासंविगक है।ऐसे मामले हैं सिजनमें मुआवजा विदया गया र्थीा, लेविकन इनकार कर विदया गया र्थीा और विफर राजकोt में जमा कर विदया गया र्थीा।न्यायालय में मुकदमेबाजी चल रही र्थीी, जो लंविब र्थीी (या क ु छ मामलों में विनण.य लिलया गया र्थीा) मुआवजा बढ़ाने क े लिलए पहले क े संदभ› की मांग की गई र्थीी और मुआवजा बढ़ाया गया र्थीा।इस न्यायालय या उच्च न्यायालय में प्रति कर से संबंति काय.वाही क े लंविब मामलों में भी ारा 24 (2) का यह उ‘ेख करने क े लिलए अवलंब लिलया गया र्थीा विक न्यायालय में प्रति कर जमा न विकए जाने या न्यायालय क े अं रिरम आदेश क े कारण राजकोt में या अन्यर्थीा प्रति कर जमा न विकए जाने क े कारण काय.वाविहयां व्यपग हो गई हैं, क्योंविक ऐसी काय.वाविहयां व्यपग हो जाएंगी।
315. चन्द्र विकशोर झा बनाम महावीर प्रसाद [(1999) 8 एस. सी. सी. 266] वाले मामले में, एक विनवा.चन यातिचका पटना उच्च न्यायालय विनयमों क े अध्याय XXE क े विनयम 6 में विवविह रीति से प्रस् ु की जानी र्थीी। विनयमों में कहा गया है विक चुनाव vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA यातिचका, विकसी भी परिरन्धिस्र्थीति में, सीमा की अवति को बचाने क े लिलए रसिजस्ट्रार क े समक्ष प्रस् ु नहीं की जा सक ी है।चुनाव यातिचका को खुली न्यायालय में शाम 4.15 बजे क अर्थीा. न्यायालय क े काय. समय क प्रस् ु विकया जा सक ा है।मुख्य न्याया ीश ने आदेश पारिर विकया र्थीा विक न्यायालय अपराह्न 3.15 बजे क े बाद बाकी क े लिलए नहीं बैठेगी।"" "मोहम्मद गाजी बनाम मध्य प्रदेश राज्य [(2000) 4 एस. सी. सी. 342] में," न्यायालय क े काय. से विकसी को हाविन हो ी है" "उविR क े सार्थी विवचार क े लिलए उविR ''विवति विकसी व्यविR को ऐसा काय. करने क े लिलए विववश नहीं कर ी '' जो संभव नहीं है।" विनम्नलिललिख विटप्पथिणयां की गई ं ः(एससीसी पृष्ठ 347, पैरा 7) "7. मामले क े थ्यों और परिरन्धिस्र्थीति यों में, इन्धिक्वटी का सिसद्धां, अर्थीा. ्," न्यायालय क े काय. विकसी का अविह नहीं करेंगें" "-न्यायालय का कोई काय. विकसी व्यविR पर प्रति क ू ल प्रभाव नहीं डालेगा, लागू नहीं होगा।" ""यह सिसद्धां न्याय और सद्भावना पर आ ारिर है, जो कानून क े प्रशासन क े लिलए एक सुरतिक्ष और विनतिश्च माग.दश.क है।एक अन्य कहाव यह है विक कानून विकसी व्यविR को वह काम करने क े लिलए मजबूर नहीं कर ा जो वह संभव ः नहीं कर सक ा है।यह समझा जा ा है विक स्वयं कानून और उसक े प्रशासन ने इसे अस्वीकार कर विदया है, जैसा विक यह अपनी सामान्य सूविRयों में कर ा है, असंभव ाओं को मजबूर करने क े सभी इरादे, और कानून क े प्रशासन को विवशेt मामलों पर विवचार कर े हुए उस सामान्य अपवाद को अपनाना चाविहए। उपयु.R अति क म की प्रयोज्य ा को इस न्यायालय ने राज कु मार डे बनाम ारापद डे [(1987) 4 एससीसी 398] और गुरशरण सिंसह बनाम एनडीएमसी [(1996) 2 एससीसी 459] में अनुमोविद विकया है। "316. एक अन्य रोमन विवति कहाव "विनमो टेनेटर एड इंपोसिसविबलिलया" "का अर्थी. है विक कोई भी असंभव काय. करने क े लिलए बाध्य नहीं है।" ""हालांविक इस रह क े अति कार लेने और मुआवजे का विव रण असंभव नहीं है, विफर भी वे कानून क े प्रदश.न में सक्षम नहीं हैं, अदाल क े आदेश क े अन्धिस् त्व क े दौरान आदेश का पालन करना पड़ ा है vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA और इसका उ‘ंघन नहीं विकया जा सक ा है।इस प्रकार, न्यायसंग सिसद्धां ों पर भी, ऐसी अवति को अपवर्जिज विकया जाना चाविहए। औद्योविगक विवu विनगम में ऑफ इंतिडया लिलविमटेड v). क ै नानोर एसपीजी. और डब्ल्यूवीजी विमल्स लिलविमटेड [(2002) 5 एससीसी 54], इस न्यायालय ने यह म व्यR विकया विक जहां विवति एक क.व्य या प्रभार का सृजन कर ी है और पक्षकार विबना विकसी व्यति •म क े उसका पालन करने में असमर्थी. है और उसका कोई उपचार नहीं है, वहां विवति सामान्य रूप से उसे क्षमा कर देगी। उपयु.R उविR पर भरोसा कर े हुए इस न्यायालय ने विनम्नलिललिख म व्यR विकयाः(एससीसी पृ. 71, पैरा 30) "30 इंलिग्लश जजमेंट से सन्दर्शिभ लैविटन उविR नान कोविगट एड इम्पासविबलिलया को एस इमपोटेंविनसिसया इक्सयूटस लेगम क े रूप में व्याख्या विकया गया है सिजसका ात्पय. है विक विवति विकसी व्यविR को वह करने क े लिलए विववश नहीं कर ी जो काय. असंभव हो या वह नहीं कर सक ा है। इस प्रकार दातियत्व को विनभाने क े लिलए हमेशा एक अजेय अक्षम ा होनी चाविहए, और यह रोमन उविR विनमो टेनेटुर इंम्पासिसविबलिलया क े समान असंभव है। ब्रूम क े विवति क उविR में न्धिस्र्थीति का वण.न इस प्रकार विकया गया हैः अ ः, यह एक सामान्य विनयम है जो पया.प्त व्यावहारिरक दृष्टां को स्वीकार कर ा है, वह नपुंसक ा बहाना है; जहां कानून एक क.व्य या आरोप बना ा है, और पाट[8] इसे करने क े लिलए अक्षम है, विबना विकसी चूक क े, और कोई उपाय नहीं है, वहां कानून सामान्य रूप से उसे क्षमा करेगा (टी): और हालांविक प्रदश.न की असंभव ा है, सामान्य ौर पर, विकसी पाट[8] द्वारा अनुबं द्वारा स्पष्ट रूप से विकए गए दातियत्व को पूरा नहीं करने का कोई बहाना नहीं है, विफर भी जब दातियत्व कानून द्वारा विनविह है, ो प्रदश.न की असंभव ा एक अच्छा बहाना है। इस प्रकार इस मामालें काग› को प्राप्त करने वालें व्यविR को जहाज से माल उ ारने से डाक स्ट्राइक की वजह से vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA त्काल रूप से रोक विदया गया र्थीा, न्यायालय ने यह अथिभविन ा.रिर कर े हुए कहा विक उनक े द्वारा विकसी विवर्षिनष्ट समय में माल उ ारने में जो स्पष्ट समझौ ा हुआ र्थीा क े अभाव में उतिच समय क े थिभ र माल उ ारने की विववतिक्ष बाध्य ा र्थीी क े ह यह पाया विक विवति असंभव काय. को करने क े लिलए विववश नहीं कर ी एवं लिंलडले एल.जे क े द्वारा कहा गया विकः- हमें विनविह दातियत्वों क े सार्थी काय. करना है, और मुझे विकसी भी मामले की जानकारी नहीं है सिजसमें नुकसान का भुग ान करने क े लिलए विकसी व्यविR पर कभी भी ऐसा नहीं करने क े लिलए विववश विकया जा ा है जो उसक े विनयंत्रण से परे कारणों से असंभव हो जा ा है। (प्रभाव वर्ति )
317. हुडा बनाम बाबेश्वर कन्हर [(2005) 1 एससीसी 191] में, इस न्यायालय ने इस सामान्य सिसद्धां पर विवचार विकया विक एक पक्षकार को उसक े विनयंत्रण से परे कु छ परिरन्धिस्र्थीति यों द्वारा कोई काय. करने से रोका गया है, जो सम्बाथिशव चारी बनाम रामासामी रेड्डी [आईएलआर (1899) 22 मद्रास 179] में आयोसिज प्रर्थीम पश्चात्व 8 अवसर पर ऐसा कर सक ा है।बाबेश्वर कन्हर [हुडा बनाम बाबेश्वर कन्हर, (2005) 1 एससीसी 191] में यह कहा गया र्थीाः(एससीसी पृष्ठ 192-93, पैरा 5)
5. विदनांक 30-10-2001 क े पत्र क े खंड 4 में क्या विन ा.रिर विकया गया है, आवंटन को स्वीकार करने से इनकार करने क े संबं में एक संचार है। यह 28-11-2001 को विकया गया र्थीा।प्रति वादी 1 को 1-12-2001 और 2-12-2001 को हूडा क े काया.लय क े बंद होने और 30-11- 2001 को डाक अवकाश क े कारण नुकसान नहीं हो सक ा है।वास् व में, इन मामलों पर उनका कोई विनयंत्रण नहीं र्थीा।यहां क विक सामान्य खंड अति विनयम, 1897 की ारा 10 क े क. को भी लागू विकया जा सक ा है। उR ारा और विवथिभन्न अन्य अति विनयमों क े विवथिभन्न उपबं ों क े अलावा, यह सामान्य सिसद्धां है विक कोई पक्षकार अपने विनयंत्रण से परे कु छ परिरन्धिस्र्थीति यों द्वारा कोई काय. करने से विनवारिर है, बाद क े प्रर्थीम अवसर vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पर ऐसा कर सक ा है ( सम्बाथिशव चारी बनाम रामासामी रेड्डी [आईएलआर (1899) 22 मद्रास 179]। इस सिसद्धां का अं र्षिनविह उद्देश्य विकसी व्यविR को वह काय. करने में सक्षम बनाना है जो वह अवकाश क े विदन, अगले काय. विदवस पर कर सक ा र्थीा।अ ः, जहां विकसी न्यायालय या काया.लय में विकसी काय. क े विन€पादन क े लिलए कोई अवति विवविह की जा ी है और वह अवति अवकाश क े विदन समाप्त हो जा ी है, वहां यविद काय. उस अवति क े भी र विकया गया माना जाना चाविहए यविद ऐसा अगले विदन विकया जा ा है सिजस विदन न्यायालय या काया.लय खुला है। इसका कारण यह है विक कानून विकसी असंभव काय. को करने क े लिलए बाध्य नहीं कर ा है।(हुसैन अली बनाम डोंजेल [आईएलआर (1880) 5 क ै ल 906]।न्याय और समीचीन ा क े हर विवचार क े लिलए आवश्यक होगा विक स्वीक ृ सिसद्धां, जो सामान्य खंड अति विनयम की ारा 10 क े ह है, उन मामलों में लागू विकया जाना चाविहए जहां यह अन्यर्थीा श › में लागू नहीं हो ा है।अं र्षिनविह सिसद्धां लेक्स नॉन कॉविगट एड इम्पोसिसविबलिलया (कानून विकसी व्यविR को असंभव को करने क े लिलए मजबूर नहीं कर ा) और एक्टस क्यूरी नेविमनेम ग्रेवाविबट (न्यायालय का काय. विकसी व्यविR पर प्रति क ू ल प्रभाव नहीं डालेगा) हैं। न्धिस्र्थीति से ऊपर, नीचे विदए गए मंचों द्वारा पारिर आदेशों में क ु छ भी अन्धिस्र्थीर नहीं है।हालांविक, विन ा.रिर ब्याज की दर र्थीोड़ी अति क प्र ी हो ी है और 3-12-2001 से अर्थीा. सिजस ारीख को हुडा को पत्र प्राप्त हुआ र्थीा, उसे घटाकर 9 प्रति श कर विदया गया है।
318. राष्ट्रपति क े चुनाव में, इस न्यायालय ने [1974] 2 एस. सी. सी. 33 क े संबं में इसी प्रकार की अव ारणा व्यR की र्थीी।जविब विवति क े विकसी भाग को विन€पाविद करने में कोइ. अवरो हो ा है ो इस प्रकार क े आराप को माफ कर विदया जा ा है।जब विकसी अति विनयम द्वारा विन ा.रिर औपचारिरक ाओं का पालन उन परिरन्धिस्र्थीति यों क े कारण असंभव हो जा ा है सिजन पर संबंति व्यविRयों का कोई विनयंत्रण नहीं हो ा है, vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ो इसे एक वै बहाने क े रूप में लिलया जाना चाविहए।न्यायालय ने अव ारिर विकया - (एससीसी पृ. 49-50, पैरा 15) “15 एक उम्मीदवार की मृत्यु क े मामले में पद की अवति समाप्त होने से पहले राष्ट्रपति क े काया.लय में रिरविR को भरने क े लिलए चुनाव क े पूरा होने की असंभव ा, जैसा विक 1952 अति विनयम की ारा 7 से प्रकट हो सक ा है, अनुच्छेद 62( 1) इसक े अविनवाय. चरिरत्र क े को नहीं प्रभाविव कर ा है । उविR इंपोटेथिशया इक्यूसट लेगम का सिसद्घान् विवति क े दूसरे सिसद्घान् लेक्स नान कालिग्जट एड इम्पांसिसविबलिलया से गहरा सम्बन् है। इंम्पोटेंसिसया इक्यूसट लेगम का ात्पय. यह है विक जब कोई आवश्यक काय. हो या कानून क े अविनवाय. भाग को पूरा करने क े लिलए स्र्थीाई असंभव ा हो ी है ो इम्पोटेंथिशया एक बहाना बन सक ा है। कानून विकसी को वह करने क े लिलए मजबूर नहीं कर ा है जो वह संभव ः नहीं कर सक ा।;जहां कानून एक क.व्य या आरोप बना ा है, और पाट[8] विबना विकसी चूक क े इसे करने क े लिलए अक्षम है, और इस पर कोई उपाय नहीं है, वहां कानून सामान्य रूप से उसे माफ कर देगा। इसलिलए, जब ऐसा प्र ी हो ा है विक विकसी क़ानून द्वारा विन ा.रिर औपचारिरक ाओं का प्रदश.न उन परिरन्धिस्र्थीति यों से असंभव बना विदया गया है सिजन पर रुतिच रखने वाले व्यविRयों का कोई विनयंत्रण नहीं र्थीा, जैसे विक भगवान का काय., परिरन्धिस्र्थीति यों को एक वै बहाने क े रूप में लिलया जाएगा।जहां ईश्वर का काय. विकसी अति विनयम क े शब्दों क े अनुपालन को रोक ा है, वहां अति विनयमी प्राव ान को उसक े अविनवाय. स्वरूप से वंतिच नहीं विकया जा ा है क्योंविक ईश्वर क े काय. क े कारण असंभव है (देखें ब्रूम्स लीगल मैन्धिक्सम्स, 10 वां संस्करण, पृष्ठ 162-63 पर और • े ज ऑन स्टैच्यूट लॉ, छठा संस्करण, पृष्ठ 268 पर)।
319. स्टैण्डड. चाट.ड. बैंक बनाम प्रव.न विनदेशालय [(2005) 4 एस. सी. सी. 530] वाले मामले में यह अथिभविन ा.रिर करने क े लिलए विक विवति विकसी व्यविR को वह करने क े vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA लिलए विववश नहीं कर ी जो संभव ः नहीं विकया जा सक ा है क े लिलए यह वै ाविनक उविR “इंपोटेंथिशयां इक्यूसट लेगम” को लागू की गई है। यद्यविप असंभव काय. को करने क े सम्बन् में उविR को लागू नहीं विकया जा सक ा हालांविक उस समय क े लिलए न्यायालय का आदेश क े ह प्राति कारिरयों को अपने दातियत्वों का विनवा.हन क े रकने से अक्षम बना विदया है।इस प्रकार, जब वे प्रदश.न करने में असमर्थी. र्थीे, ो उन्हें पहले उपलब् अवसर पर प्रदश.न करने की अनुमति दी जानी चाविहए, जो उनक े लिलए अति विनयम द्वारा विन ा.रिर समय है, अर्थीा. ् अं रिरम आदेश की अवति को छोड़कर 5 वt. की क ु ल अवति को विदया जाना चाविहए।
320. उविR एक्टस क्यूरिर नेविमनेम ग्रेवाविबट को न्यायलय की काय.वाही या न्यायालय क े काय. क े ह उस सिसद्घान् क े उपर प्रति स्र्थीाविप विकया गया सिजससे कोई पक्षकार परेसान न हो। यविद विवचारा ीन ा क े लन्धिम्ब रहने क े दौरान कोई अं रिरम आदेश विदया जा ा है ो वे मामले में अंति म विनण.य क े अ ीन होंगे। यविद मामले को विबना विकसी मेरिरट क े खारिरज कर विदया जा ा है ो अं रिरम आदेश स्व ः ही भंग हो जा ा है।यविद मामलें को विबना विकसी मेरिरट क े दायर विकया जा ा है ो उविR कम्मोडम एक्स इन्जूरिरया सू नेमों हैबरी डीबेट लागू होगी अर्थीा. विकसी भी पक्षकारा को अपनी गल ी क े लिलए सुविव ा नही विमल सक ी हैविकसी भी व्यविR को अपनी गल ी का लाभ नहीं उठाना चाविहए।यविद मुकदमेबाजी विनरर्थी.क रूप से या विबना विकसी आ ार क े, विवलंब आदेश क े लिलए की गई है और उसक े द्वारा विवलंब हो ा है, ो ऐसे व्यविR क े पक्ष में कोई प्राक ृ ति क न्याय नहीं विमल सक ा है।ऐसे मामलों का विनण.य गुण-दोt क े आ ार पर विकया जाना चाविहए। मृत्युंजय पानी बनाम नम.दा बाला ससमल [ए. आई. आर. 1961 एस. सी. 1353] में, इस न्यायालय ने यह म व्यR विकयाः vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
5. इसी प्रकार का सिसद्घान् लैविटक उविR कम्मोडम इक्स इन्जुरिरया सु नेमो हैविबरी तिडबेट क े नाम से है सिजसका अर्थी. है विकसी पक्षकार को सुविव ा उसकी अपनी गल ी से नहीं विमल सक ी।...... दूसरे शब्दों में कहें ो विकसी को भी अपने गल काय. से लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सक ी। 321 - यह कानून की नीति नहीं है विक देरी क े कारण अमान्य दावों को पूरा विकया जाए। इसी प्रकार, कानून का पालन करने वाले व्यविR की पीड़ा अनुज्ञेय नहीं है।2013 अति विनयम बेईमान मुकदमेबाजों को लाभ प्रदान नहीं कर ा है, लेविकन इसका उद्देश्य अति कारिरयों की सुस् ी को पांच वt› क े भी र पूरा करना है। X X X X 323 - जीटीसी इंडस्ट्रीज लिलविमटेड बनाम भार संघ [(1998) 3 एससीसी 376] वाले मामले में यह म व्यR विकया गया र्थीा विक स्र्थीगन को समाप्त कर े समय, यह न्यायालय का क.व्य है विक वह विवलंब की अवति का विहसाब रखे और साम्या का विनस् ारण करे। यह लाभ नहीं है जो प्रदान विकया जा सक ा है।जयपुर नगर विनगम बनाम सी. एल. विमश्रा [(2005) 8 एस. सी. सी. 423] वाले मामले में यह पाया गया है विक अं रिरम आदेश अंति म आदेश में विवलीन हो जा ा है और इसका स्व ंत्र अन्धिस् त्व नहीं हो सक ा है, अंति म विनण.य से परे नहीं रह सक ा है। एन राम क ृ €ण वमा. बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. [(1992) 2 एससीसी 620], किंग्रडलेज बैंक लिलविमटेड बनाम वी. सीआईटी [(1980) 2 एससीसी 191] पर विनभ.र ा रखी गई र्थीी। यह माना गया र्थीा विक विकसी को भी अदाल क े काय. से पीविड़ होने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है और यविद एक अं रिरम आदेश पारिर विकया गया है और अं ः यातिचका को विबना योग्य ा क े पाया जा ा है और खारिरज कर विदया जा ा है, ो न्याय क े विह में विकसी भी अवांथिछ या अनुतिच लाभ की आवश्यक ा हो ी है। अदाल क े अति कार क्षेत्र को लागू करने वाली पाट[8] द्वारा प्राप्त की गई राथिश को विन€प्रभावी विकया जाना चाविहए। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
324. महादेव सावलाराम शेलक े बनाम पुणे म्युविनसिसपल कॉप. [(1995) 3 एससीसी 33] में, यह देखा गया है विक न्यायालय अपनी विनविह अति कार क्षेत्र क े ह न्यायालय क े अति विनयम द्वारा प्रति वाविदयों द्वारा झेली गई क्षति को शमन करने क े लिलए क.व्य है। न्यायालय की प्रवि•या क े दुरुपयोग पर अंक ु श लगाने क े लिलए ऐसी कार.वाई आवश्यक है।अमरजी सिंसह बनाम देवी र न [(2010) 1 एससीसी 417] और राम क ृ €ण वमा. [राम क ृ €ण वमा. बनाम उuर प्रदेश राज्य, (1992) 2 एससीसी 620] में यह पाया गया विक कोई भी व्यविR न्यायालय क े काय. से पीविड़ नहीं हो सक ा और अं रिरम आदेश क े अनुतिच लाभ को विन€प्रभावी विकया जाना चाविहए। अमरजी सिंसह [अमरजी सिंसह बनाम देवी र न, (2010) 1 एससीसी 417] में, इस न्यायालय ने विटप्पणी कीः 17...... कोई भी वादकारी विकसी न्यायालय में मामले विवचारा ीन ा होने से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सक ा है, क्योंविक अं रिरम आदेश हमेशा मामले में पारिर विकए जाने वाले अंति म आदेश में विवलीन हो जा ा है, और यविद रिरट यातिचका अं ः खारिरज कर दी जा ी है, ो अं रिरम आदेश स्वचालिल रूप से विनरस् हो जा ा है।विकसी भी पक्ष को अं रिरम आदेश प्राप्त करक े अपनी गलति यों का कोई लाभ उठाने और उसक े बाद न्यायालय को दोt देने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है।यह थ्य विक रिरट अं ः विबना विकसी योग्य ा क े पाई जा ी है, दशा. ा है विक एक ुच्छ रिरट यातिचका दायर की गई र्थीी। उविR एक्टस क्यूरिर नेविमनेम ग्रेवाविबट का अर्थी. है विक न्यायालय का काय. विकसी पर प्रति क ू ल पर प्रभाव नहीं डालेगा, जो इस मामलें में लागू हो ा है। ऐसी न्धिस्र्थीति में न्यायालय का दातियत्व है विक वह न्यायालय क े काय. द्वारा विकसी पक्षकार क े सार्थी विकए गए अन्याय को दूर करे। इस प्रकार, न्यायालय की अति कार क्षेत्र का आह्वान करने वाले विकसी भी पक्षकार द्वारा प्राप्त विकए गए विकसी भी अपात्र या अनुतिच लाभ को बेअसर विकया जाना चाविहए, क्योंविक मुकदमेबाजी की संस्र्थीा को न्यायालय क े काय. द्वारा विवलंविब कार.वाई से विकसी वादी को कोई लाभ प्रदान करने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (थिशवशंकर बनाम उuर प्रदेश राज्य सड़क परिरवहन विनगम [1995 सप्लीमेंट (2) एससीसी 726], जीटीसी इंडस्ट्रीज लिलविमटेड बनाम भार संघ [(1998) 3 एससीसी 376] और जयपुर नगर विनगम बनाम सीएल विमश्रा [(2005) 8 एससीसी 423] को देखने पर।
18. राम क ृ €ण वमा. बनाम उuर प्रदेश राज्य [(1992) 2 एस. सी. सी. 620] में, इस न्यायालय ने किंग्रडलेज बैंक लिलविमटेड बनाम सीआईटी [(1980) 2 एस. सी. सी. 191] में अपने पहले क े विनण.य अवलंब कर े हुए इसी रह क े मुद्दे की जांच की और यह अथिभविन ा.रिर विकया विक कोई भी व्यविR न्यायालय क े काय. से पीविड़ नहीं हो सक ा है और यविद एक अं रिरम आदेश पारिर विकया गया है, और यातिचकाक ा. इसका लाभ उठा ा है, और अं ः यातिचका को विकसी भी मेरिरट क े विबना पाया जा ा है और खारिरज कर विदया जा ा है, न्याय क े विह में यह अपेतिक्ष है विक न्यायालय की अति कार क्षेत्र का आह्वान करने वाले विकसी भी पक्षकार द्वारा प्राप्त विकए गए विकसी भी अपात्र या अनुतिच लाभ को विन€प्रभावी विकया जाना चाविहए।
325. कना.टक रेअर अर्थी. बनाम खान और भूविवज्ञान विवभाग [(2004) 2 एस. सी. सी. 783] में, इस न्यायालय ने यह म व्यR विकया विक अति क म एकक्टस क्यूरी नेविमनेम ग्रेवाविबट की आवश्यक ा है विक पक्षकार को उसी न्धिस्र्थीति में रखा जाना चाविहए लेविकन न्यायालय क े आदेश क े लिलए जो अं ः पोtणीय नहीं पाया गया है सिजसक े परिरणामस्वरूप एक पक्ष को लाभ प्राप्त हुआ है जो अन्यर्थीा अर्जिज नहीं हो ा और दूसरे पक्ष को न्यायालय क े आदेशों क े विबना नुकसान उठाना पड़ा है। सफल पक्ष दूसरे पक्ष द्वारा अर्जिज लाभ की मांग कर सक ा है, या जो उसने खो विदया है vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA उसकी क्षति पूर्ति कर सक ा है।इस न्यायालय ने यह म व्यR विकयाः(एससीसी पृष्ठ 790-91, पैरा 10-11)
10. "एक्ट्स क्यूरी नेविमनेम ग्रेविवटी 'क े सिसद्धां में और यह अथिभविन ा.रिर विकया विक सिसद्धां क े वल न्यायालय क े ऐसे काय› क ही सीविम नहीं र्थीा जो गल र्थीे, सिसद्धां ऐसे सभी काय› क े लिलए लागू हो ा है सिजसक े बारे में यह अथिभविन ा.रिर विकया जा सक ा है विक यविद न्यायालय को थ्यों और विवति से सही रूप से अवग कराया गया हो ा ो वह इस प्रकार का काय. नहीं कर ा।" ""यह पुनस्र्थीा.पना का सिसद्धां है जो आकर्षिt हो ा है। जब पक्षकार क े विकसी काय. क े कारण, न्यायालय को ऐसा आदेश पारिर करने क े लिलए समझाया जा ा है, जो अं में विटकाऊ नहीं माना जा ा है, सिजसक े परिरणामस्वरूप एक पक्षकार को लाभ प्राप्त हुआ है, जो उसने अन्यर्थीा अर्जिज नहीं विकया हो ा, या दूसरे पक्षकार को एक ऐसी दरिरद्र ा का सामना करना पड़ा है, जो उसे नहीं उठानी पड़ ी, लेविकन न्यायालय क े आदेश और ऐसे पक्षकार क े काय. क े कारण, ब सफल पक्षकार अं ः मुकदमेबाजी क े अं में न क े संदभ. में विन ा.रणीय राह का हकदार हो ा है, ो वह उसी रह से मुआवजा पाने का हकदार हो ा है सिजस रह से पक्षकारों को न्यायालय का अं रिरम आदेश पारिर न विकया गया हो ा।सफल पक्ष विनम्नलिललिख मांगें कर सक ा हैः(क) न्यायालय क े अं रिरम आदेश क े अ ीन विवरो ी पक्षकार द्वारा अर्जिज लाभ का परिरदान, या (ख) या उसको जो क्षति हुइ है उसकी क्षति पूर्ति की जायेगाी।
11. इस मामले क े थ्यों में, उच्च न्यायालय क े विनण.य [कना.टक रेयर अर्थी. बनाम खान और भूविवज्ञान विवभाग, डब्ल्यूपी नंबर 4030-4031 ऑफ 1997, आदेश विदनांक 1-12-1998 (क े एआर)] क े बावजूद, यविद vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपीलक ा. इस न्यायालय को अं रिरम आदेश पारिर आदेश क े लिलए राजी नहीं कर े, ो वे खनन पट्टों को संचालिल आदेश और विनकाले गए खविनजों को उठाने, हटाने और विनस् ारण क े हकदार नहीं हो े। लेविकन इस न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेशों क े लिलए, अपीलक ा.ओं और ारा 21 की उप- ारा (5) की प्रयोज्य ा को आकर्षिt करने वाले विकसी भी भूविम से विकसी भी खविनज को उठाने वाले विकसी भी व्यविR क े बीच कोई अं र नहीं है। क्योंविक अपीलार्थी8 न्यायालय से हार गए हैं, उन्हें न्यायालय क े अं रिरम आदेशों क े ह उनक े द्वारा अर्जिज लाभ को बनाए रखने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है। उच्च न्यायालय ने उतिच रूप से अपीलार्शिर्थीयों को उसी न्धिस्र्थीति में रखने क े लिलए उuरदायी ठहराया है सिजसमें वे हो े यविद यह न्यायालय अं रिरम आदेश जारी करक े उन्हें संरतिक्ष नहीं कर ा। राज्य सरकार अपीलक ा.ओं से गौण खविनजों की कीम की ही मांग कर रही है।राज्य सरकार द्वारा विकराया, रॉयल्टी या कर की वसूली पहले ही की जा चुकी है और इसलिलए उस मद क े ह कोई मांग नहीं है।अपीलार्शिर्थीयों क े लिखलाफ कोई भी दंडात्मक काय.वाही शुरू नहीं की गई है।यह कहना पूरी रह से गल है विक अपीलक ा.ओं को विकसी भी जुमा.ने का भुग ान करने क े लिलए कहा जा रहा है या विकसी भी दंडात्मक कार.वाई क े अ ीन है.यह अपीलार्शिर्थीयों का मामला नहीं है विक उन्हें विनया. से प्राप्त मूल्य से अति क मूल्य का भुग ान करने क े लिलए कहा जा रहा है या यह विक प्रत्यर्थी8 राज्य द्वारा विन ा.रिर मूल्य विकसी भी रह से मनमाना या अनुतिच है। (प्रभाव वर्ति )
326. ए. आर. अं ुले [ए. आर. अं ुले बनाम आर. एस. नायक, (1988) 2 एस. सी. सी. 602] में इस न्यायालय ने यह म व्यR विकया विक यह एक पूव.स्र्थीाविप सिसद्धां है विक न्यायालय का कोई काय. विकसी व्यविR पर प्रति क ू ल प्रभाव नहीं डालेगा। यह उविR एक्टस क्यूरिर उेविमउेम ग्रवाविबट का सिसद्घान् न्याय और सद्बुतिद्ध पर आ ारिर है और विवति क े प्रशासन क े लिलए एक सुरतिक्ष और विनतिश्च माग.दश.क प्रदान कर ा है। विकसी भी व्यविR को उसक े अति कारों से वंतिच नहीं विकया जा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA सक ा।भार में प्रवि•यात्मक विववादों क े कारण देरी हो ी है।ए. आर. अं ुले [ए. आर. अं ुले बनाम आर. एस. नायक, (1988) 2 एस. सी. सी. 602] में इस न्यायालय ने यह म व्यR विकयाः(एससीसी पृष्ठ 687, पैरा 102)
102. यह सव च्च न्यायालय होने क े कारण विकसी भी वादकारी को अपने विनण.यों पर सवाल उठाने क े लिलए विकसी उच्च न्यायालय में जाने का कोई अवसर नहीं है। मॉन्धिन्ट्रयल स्ट्रीट रेलवे क ं पनी बनाम नॉम.तिडन [1917 एसी 170 (पीसी)] (कागज फटा) में लाड. बकमास्टर ने कहाः न्यायालय क े सभी विनयम और क ु छ नहीं बन्धिल्क न्याय क े उतिच प्रशासन को सुविनतिश्च करने क े उद्देश्य से बनाए गए प्राव ान हैं। इसलिलए, यह आवश्यक है विक उन्हें इस उद्देश्य की सेवा करने और उसक े अ ीन रहने क े लिलए बनाया जाए। इस न्यायालय ने गुजरा राज्य बनाम रामप्रकाश पी. पुरी [(1969) 3 एस. सी. सी. 156] वाले मामले में यह कह े हुए अपनी न्धिस्र्थीति दोहराईः (एससीसी पृ. 159, पैरा 5) प्रवि•या को कानून की रखैल नहीं बन्धिल्क दासी क े रूप में वर्शिण विकया गया है सिजसका उद्देश्य न्याय की सेवा करना और उसे सुगम बनाना है न विक शासन करना या उसमें बा ा डालना।......प्रवि•या क े सभी विनयमों की रह, यह विनयम एक विनमा.ण की मांग कर ा है जो इस उद्देश्य को बढ़ावा देगा। एक बार जब न्यातियक सं ुविष्ट प्राप्त हो जा ी है ो यह विनद\श देने लिलए उपलब् नहीं हो ा है एवं यह न्यायालय की ऋ ु विट क े रूप में स्वीकार क े रूप में ले लिलया जा ा है ो यह न क े वल उतिच है बन्धिल्क यह न्यायालय का क.ब्य है वह अपनी अन् विनविह शविRयों का प्रयोग करक े उस ऋ ु विट का सु ार करें।न्यातियक राय इस दृविष्टकोण क े सार्थी काफी हद क झुकी हुयी है विक न्यायालय क े द्वारा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA की गयी ऋ ु विट को न्यायालय क े द्वारा विबना विकसी बा ा क े सु ारा जा ा है।यह सिसद्धां पर है, जैसा विक अलेक्जेंडर रोजर मामले में इंविग विकया गया है [अलेक्जेंडर रोजर बनाम कम्प्टॉयर डी 'एसकम्प्टे डी पेरिरस, (1969-71) एलआर 3 पीसी 465:17 ईआर 120]। मेरा विवचार है विक व.मान न्धिस्र्थीति में न्यायालय को अपनी ऋ ु विट को सु ारने क े लिलए अपनी अं र्षिनविह शविRयों का प्रयोग विकया जा सक ा है।न्यायमूर्ति महाजन ने क े शरदेव चमरिरया बनाम रा ा विकशन चमरिरया [1953 एस. सी. आर. 136:ए. आई. आर. 1953 एस. सी. 23], एस. सी. आर. पी. 153 में चार न्याया ीशों की न्यायपीठ की ओर से बोल े हुए कहाः (ए. आई. आर. पृष्ठ 28, पैरा 21)
21. न्याया ीश को तिड•ी ारक द्वारा उठाए गये आ ार या विनण[8] ऋणी द्वारा उठाई गई आपलिuयों पर चचा. विकए विबना अपनी ऋ ु विट को सु ारने का अति कार क्षेत्र र्थीा।X X X X
329. इसमें कोई सन्देह नहीं हो सक ा विक जब पक्षकार न्यायालय क े समक्ष हो े है ो अंति म विवविनश्चय अथिभभावी हो ा है और वे अपने सापेक्ष मामलों क े मेरिरट क े आ ार पर जी े या हार जा े है।न ही दूसरे पक्षकार को प्रति क ू ल न्धिस्र्थीति में डालने क े लिलए न्यायालय क े आदेश क े आवरण क े अ ीन आश्रय लेने की अनुमति दी जा सक ी है।यविद विकसी ने न्यायालय क े आवरण क े अ ीन सुख प्राप्त विकया है ो उस अवति को ारा 24 क े अ ीन अपेतिक्ष कदम उठाने क े लिलए प्राति कारिरयों की विनन्धि€•य ा की विदशा में सन्धिम्मलिल नहीं विकया जा सक ा।राज्य क े अति कारिरयों ने अदाल क े आदेश क े विबना कार.वाई की हो ी।वास् व में, यातिचकाक ा.ओं क े लिलए उन मामलों में न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अवसर यह र्थीा विक राज्य या अति ग्रविह विनकाय उनकी संपलिuयों को ले रहे र्थीे। अं ः मामले को अति ग्रहण या मुआवजे को चुनौ ी देने में अपनी योग्य ा क े आ ार पर खड़ा होना र्थीा और vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA इसलिलए ऐसी न्धिस्र्थीति यों में ारा 24 (2) क े ह कोई अति कार या लाभ प्रदान नहीं विकया जा सक ा र्थीा। X X X X
334. इन सभी कारणों से, यह अथिभविन ा.रिर विकया गया है विक ऐसा उपबं अथिभव्यR रूप से अति विनयविम करने का लोप, जो उस अवति को अपवर्जिज कर ा है सिजसक े दौरान कोई अं रिरम आदेश प्रव.न में र्थीा,जो राज्य को अति ग्रविह भूविम का कब्जा लेने से रोक ा है, या विकसी विवशेt मामले या मामले में पंचाट को प्रभावी करने से रोक ा है, जो 5 वt. की अवति की गणना क े प्रयोजन क े लिलए ऐसी अवति या अवति यों को शाविमल नहीं विकया जा सक ा है।इसक े अलावा, क े वल इसलिलए विक 2013 क े अति विनयम की ारा 19 और 69 क े ह व्यपग होने क े परिरणाम क े सार्थी समय-सीमा इंविग की गई है, इसका म लब यह नहीं है विक इस रह क े समय (अं रिरम आदेशों क े अन्धिस् त्व) को कारक बनाने में चूक का कोई विवशेt विव ायी इरादा है।इस संदभ. में इस न्यायालय ने नोविटस विदया है विक नए अति विनयम (न ो 1894 क े अति विनयम क े ह ) क े ह भी पूरे अति ग्रहण की अवति बी जाने क े लिलए, एक विनर्षिदष्ट समय क े भी र मुआवजे का भुग ान न करने क े लिलए कोई प्राव ान लागू नहीं विकया गया है और न ही कब्जे क े संबं में ऐसा कोई प्राव ान विकया गया है। इसक े अलावा, भुग ान और जमा प्राव ानों ( ारा 77 क े ह ) का अनुपालन न करने पर क े वल ारा 80 क े ह अति क ब्याज का भुग ान करना पड़ ा है।समय क े अपवज.न क े लिलए उपबं करने का लोप, सिजसक े दौरान अं रिरम आदेश अन्धिस् त्व में रहे, यह अव ारिर कर े हुए विक व.मान मामले में अति ग्रहणों का व्यपग हो गया है या नहीं, विवtय- वस् ु को ध्यान में रख े हुए, असाव ानी या दुघ.टना का स्पष्ट परिरणाम है और इस सिसद्धां को लागू करने से इनकार करने से गंभीर अन्याय होगा। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
11. 2 प्रत्यास्र्थीापन क े सिसद्धां को लागू कर े समय, पैराग्राफ 335 से 339 में विनम्नलिललिख रूप में यह देखा गया हैः इस विवति क े मामलें में पुनस्र्थीा.पना का सिसद्धां
355. प्रत्यास्र्थीापन का सिसद्धां मुकदमेबाजी क े अं में पूण. न्याय करने क े आदश. पर आ ारिर है और पक्षकारों को उसी न्धिस्र्थीति में रखा जाना है किंक ु मुकदमेबाजी और मामले में पारिर अं रिरम आदेश, यविद कोई हो, क े लिलए। साउर्थी ईस्टन. कोलफील्ड्स लिलविमटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य [(2003) 8 एससीसी 648], यह अथिभविन ा.रिर विकया गया विक कोई भी पक्षकार मुकदमेबाजी का लाभ नहीं उठा सक ा।यविद मुकदमा हार जा ा है ो विवलम्ब क े कारण प्राप्त लाभ को उसे समाप्त करना होगा।न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेश एक अंति म विनण.य में विवलय हो जा ा है।विकसी पाट[8] क े पक्ष में पारिर अं रिरम आदेश की वै ा, अं रिरम चरण में सफल पाट[8] क े लिखलाफ अंति म आदेश क े जाने की न्धिस्र्थीति में उलट जा ी है।सिसविवल प्रवि•या संविह ा की ारा 144 क्षति पूर्ति का स्रो नहीं है।यह न्याय, विन€पक्ष ा और विन€पक्ष ा क े विनयम की वै ाविनक मान्य ा है।न्यायालय को पूण. न्याय आदेश क े लिलए प्रत्यास्र्थीापन का आदेश देने विनविह अति कार क्षेत्र है।यह इस सिसद्धां पर भी है विक एक गल आदेश को जीविव रखकर और उसका सम्मान करक े कायम नहीं रखा जाना चाविहए।इस रह की शविR का प्रयोग कर े हुए, अदाल ों ने ारा 144 सीपीसी की श › क े अं ग. नहीं आने वाली असंख्य न्धिस्र्थीति यों में बहाली क े सिसद्धां को लागू विकया है। जो चीज पुनस्र्थीा.पन की प्रयोज्य ा को आकर्षिt कर ी है, वह यह नहीं है विक न्यायालय का काय. गल है या गल ी या अदाल द्वारा की गई कोई त्रुविट नहीं है; परीक्षण यह है विक क्या पाट[8] क े एक अति विनयम क े कारण अदाल को अं में आयोसिज एक आदेश को पारिर करने क े लिलए राजी करना जो विटकाऊ नहीं है, सिजसक े परिरणामस्वरूप एक पक्ष को एक लाभ प्राप्त हो ा है जो अन्यर्थीा अर्जिज नहीं हो ा, या दूसरे vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA पक्ष को नुकसान उठाना पड़ ा है दरिरद्र ा, क्षति पूर्ति करनी होगी मुकदमेबाजी को उत्पादक उद्योग बनने की अनुमति नहीं दी जा सक ी।जहां प्रत्येक मामले में संयोग का त्व है, वहां मुकदमेबाजी को खेल क कम नहीं विकया जा सक ा।यविद प्रत्यास्र्थीापन की अव ारणा को अं रिरम आदेशों क े लिलए आवेदन से बाहर रखा जा ा है, ो वादकारी को अं रिरम आदेश से प्राप्त होने वाले लाभों को विनगलने से लाभ होगा। इस न्यायालय ने दतिक्षण पूव[8] कोलफील्ड्स लिलविमटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2003) 8 एस. सी. सी. 648] में इस प्रकार म व्यR विकयाः
26. हमारी राय में बहाली का सिसद्घान् इस विवtय का घ्यान रख े है।प्रत्यप.ण शब्द का अर्थी. व्युत्पलिu संबं ी अर्थी. में विकसी तिड•ी या आदेश क े संशो न, परिरव.न या प्रति स्र्थीापन पर विकसी पक्षकार को, जो उसे न्यायालय की तिड•ी या आदेश क े विन€पादन में या विकसी तिड•ी या आदेश क े प्रत्यक्ष परिरणाम में विवलुप्त हो गया है, उसे प्रत्यावर्ति करना है (देखें जफर खान बनाम राजस्व बोड., उuर प्रदेश [1984 सप्लीमेंट एससीसी 505])।(जफर खान बनाम राजस्व बोड., उuर प्रदेश [1984 सप्लीमेंट एससीसी 505]" कानून में, 'क्षति पूर्ति ' शब्द का उपयोग ीन अर्थी› में विकया जा ा हैः(i) ) विकसी विवथिशष्ट वस् ु को उसक े वास् विवक स्वामी या हैसिसय को लौटाना या बहाल करना; (i) i) ) दूसरे को विकए गए गल से प्राप्त लाभों क े लिलए मुआवजा देना; और (i) i) i) ) दूसरे को हुए नुकसान की क्षति पूर्ति या क्षति पूर्ति करना। (ब्लैक लॉ तिडक्शनरी, 7 वां संस्करण, पृष्ठ 1315 देखें)।जॉन डी. कालामारी और जोसेफ एम. पेरिरलो द्वारा संविवदाओं क े कानून को ब्लैक द्वारा यह कहने क े लिलए उद्धृ विकया गया है विक “क्षति पूर्ति ” एक अस्पष्ट शब्द है, जो कभी-कभी चीजों vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA को विनकालने का उ‘ेख कर ा है सिजसे लिलया गया है और कभी- कभी विकए गए नुकसान क े लिलए मुआवजे का उ‘ेख कर ा हैः प्रायः शब्द क े विकसी भी अर्थी. क े अं ग. परिरणाम एक ही हो ा है।... अन्यायपूण. विन.न ा, सार्थी ही अन्यायपूण. समृतिद्ध, क्षति पूर्ति का एक आ ार है।यविद प्रति वादी गैर -अपक ृ त्यकारी गल व्यपदेशन का दोtी है, ो वसूली का उपाय कठोर नहीं हानेा चाविहए, लेविकन प्रत्यास्र्थीापन क े अन्य मामलों की रह, सापेक्ष गल ी, सहम जोलिखम और वैकन्धिल्पक जोलिखम आवंटन की विन€पक्ष ा पर सहमति नहीं है और विकसी भी पक्ष की गल ी क े लिलए सिजम्मेदार नहीं है । प्रत्यास्र्थीापन क े सिसद्धां को सिसविवल प्रवि•या संविह ा, 1908 की ारा 144 में कानूनी रूप से मान्य ा दी गई है। ारा 144 सीपीसी न क े वल विकसी तिड•ी को परिरवर्ति, उलट, अपास् या संशोति विकए जाने क े बारे में बा कर ी है, बन्धिल्क इसमें एक तिड•ी क े बराबर का आदेश भी शाविमल है।उपबं का दायरा इ ना व्यापक है विक उसमें विकसी तिड•ी या आदेश क े लगभग सभी प्रकार क े परिरव.न, प्रति व.न, अपास् करना या उपां रण को सन्धिम्मलिल विकया जा सक ा है।न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेश एक अंति म विनण.य में विवलय हो जा ा है।विकसी पाट[8] क े पक्ष में पारिर अं रिरम आदेश की वै ा, अं रिरम चरण में सफल पाट[8] क े लिखलाफ अंति म विनण.य होने की न्धिस्र्थीति में उलट जा ी है।… 27 यह इस सिसद्धां पर भी है विक विकसी गल आदेश को जीविव रखकर और उसका सम्मान करक े कायम नहीं रखा जाना चाविहए (ए. अरुनाविगरी नादर बनाम एस. पी. रथिर्थीनासामी [1970 एस. सी. सी. ऑनलाइन मैड. 63]।......ऐसी अं र्षिनविह शविRयों का प्रयोग कर े हुए न्यायालयों ने ऐसे vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अनविगन 53 न्धिस्र्थीति यों में प्रति स्र्थीापन क े सिसद्धां ों को लागू विकया है जो ारा 144 की श › क े अं ग. नहीं आ ी हैं।
28. विक न्यायालय क े विकसी काय. से कोई व्यविR पीविड़ नहीं होगा, यह विनयम न्यायालय क े विकसी त्रुविटपूण. काय. क सीविम नहीं है-न्यायालय क े काय. में ऐसे सभी काय. शाविमल हैं सिजनक े बारे में न्यायालय विकसी विवति क काय.वाही में यह राय बना सक ा है विक यविद उसे थ्यों और विवति से सही रूप से अवग कराया गया हो ा ो न्यायालय इस प्रकार काय. नहीं कर ा।पुनस्र्थीा.पन की अव ारणा को अं रिरम आदेशों क े लिलए आवेदन से बाहर रखा गया है, ब वादकारी अं रिरम आदेश से प्राप्त होने वाले लाभों को विनगलकर लाभ उठाएगा, भले ही वाद अन् में हार गये हो। इसे नजरअंदाज नहीं विकया जा सक ा।अ ः हमारी यह राय है विक सफल पक्षकार मुकदमे क े अं में न क े रूप में विन ा.रणीय राह का हकदार है और वह उस अवति क े लिलए उपयुR उतिच दर पर ब्याज देकर क्षति पूर्ति पाने का हकदार है सिजसक े लिलए न की रिरहाई को रोकने वाला न्यायालय का अं रिरम आदेश प्रव.न में रहा र्थीा। (प्रभाव वर्ति )
336. गुजरा राज्य बनाम एस्सार ऑयल लिलविमटेड [(2012) 3 एससीसी 522] वाले मामले में यह म व्यR विकया गया र्थीा विक क्षति पूर्ति का सिसद्धां अन्यायपूण. संव.न या अन्यायपूण. लाभ क े विवरुद्ध एक उपचार है। न्यायालय ने कहाः (एससीसी पृष्ठ 542, पैरा 61-62)
61. पुनस्र्थीा.पन की अव ारणा वस् ु ः एक सामान्य विवति सिसद्धां है और यह अन्यायपूण. समृतिद्ध या अन्यायपूण. लाभ क े विवरुद्ध एक उपचार है।इस अव ारणा का मूल न्यायालय की अं रात्मा में विनविह है, जो एक पक्ष को दूसरे से प्राप्त न या क ु छ लाभ को रखने से रोक ा है, जो उसे अदाल की गल तिड•ी क े माध्यम से प्राप्त हुआ vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है।अंग्रेजी कानून में ऐसा उपचार आम ौर पर अनुबं या अपकृ त्य में एक उपचार से अलग हो ा है और सामान्य विवति उपचार की ीसरी श्रेणी क े भी र आ ा है, सिजसे अ.-अनुबं या पुनस्र्थीा.पन कहा जा ा है। 62.यविद हम प्रत्यास्र्थीापन की अव ारणा का विवश्लेtण कर े हैं, े एक बा स्पष्ट रूप से उभर ी है विक पुनस्र्थीा.पन की बाध्य ा उस व्यविR या प्राति करण पर है सिजसे अन्यायपूण. समृतिद्घ या अन्यायपूण. लाभ प्राप्त हुआ है।(हेल्सबरी लाज ऑफ इंग्लैंड, चौर्थीा संस्करण, खंड 9 देखें)(पृष्ठ 434)।
337. ए. शनमुगम बनाम अरिरया क्षवित्रय राजकु ल वंशर्थीु मदालय नंदवन परिरपालनाई संगम [(2012) 6 एस. सी. सी. 430] वाले मामले में यह कहा गया र्थीा विक मुकदमेबाजी क े लाभ को बेअसर करने क े लिलए प्रत्यप.ण संबं ी अति कार क्षेत्र प्रत्येक न्यायालय में अं र्षिनविह है। यविद न्यायपालिलका में लोगों का विवश्वास बनाए रखना है ो मुकदमेबाजी क े प्रभावों क े कारण कानून क े सही पक्ष क े व्यविR को वंतिच नहीं विकया जाना चाविहए और ुच्छ मुकदमेबाजी क े अनुतिच लाभ को समाप्त करना होगा। न्यायालय ने कहाः(एससीसी पृष्ठ 451-55, पैरा 37)
37. इस न्यायालय ने भार ीय पया.वरण-विवति क काय.वाही परिरtद बनाम भार ीय संघ (2011) 8 एस. सी. सी. 161] (सिजनमें से एक, न्यायमूर्ति डॉ. भंडारी, विनण.य क े लेखक र्थीे) क े एक अन्य महत्वपूण. मामले में प्रत्यास्र्थीापन की अव ारणा पर विवचार करने का अवसर विमला।प्रासंविगक विनण.यों से संबंति उस vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विनण.य क े प्रासंविगक पैराग्राफ यहां पुनः प्रस् ु विकए गए हैंः(एससीसी पृष्ठ 238- 41 और 243, पैरा 171-76 और 183-84) '170. * *
171. राम क ृ €ण वमा. बनाम उuर प्रदेश राज्य [(1992) 2 एस. सी. सी. 620] में इस न्यायालय ने विनम्नलिललिख म व्यR विकयाः(एससीसी पृष्ठ 630, पैरा 16) 16...अपीलक ा.ओं/विनजी ऑपरेटरों सविह 50 ऑपरेटर विनद\श क े अनुसार सुनवाई में देरी करक े न्यायालय की प्रवि•या का घाेर दुप्र.योग करक े अपनी गाविड़या चला रहे हैं[जीवन नार्थी वहल बनाम उuर प्रदेश राज्य, (2011) 12 एससीसी 769] और इससे पहले क े उच्च न्यायालय या इसक े अलावा। वास् व में, 29-9-1959 क े बाद अनुदान की प्रारंथिभक अवति की समाविप्त पर, उन्होंने नवीकरण प्राप्त करने या अपने वाहनों को चलाने का अति कार खो विदया, क्योंविक इस न्यायालय ने योजना को लागू घोविt कर विदया।हालांविक, कानून की प्रवि•या का दुरुपयोग करक े, वे आपलिuयों की सुनवाई लंविब रहने क अपने वाहनों को चलाना जारी रखे हुए हैं।इस न्यायालय ने किंग्रडलेज बैंक लिलविमटेड बनाम सीआईटी [(1980) 2 एससीसी 191] वाले मामलें में यह अथिभविन ा.रिर विकया विक उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 226 क े अ ीन अपनी शविR का प्रयोग कर े हुए न्याय क े विह में यह अपेतिक्ष विकया विक न्यायालय की अति कार क्षेत्र का अवलंब लेने वाले विकसी पक्षकार द्वारा प्राप्त विकए गए विकसी अपात्र या अनुतिच लाभ को विन€प्रभावी विकया जाना चाविहए।यह भी अथिभविन ा.रिर विकया गया विक इसक े द्वारा मुकदमे की संस्र्थीा को इसक े लिलए सिजम्मेदार पक्षकार को अनुतिच लाभ प्रदान करने की अनुमति नहीं दी जानी चाविहए। उस विवति क े आलोक में इस न्यायालय क े द्वारा संविव ांन क े अनुच्छेद 142(1) क े ह शविRयों का प्रयोग कर े हुये कहा विक यह न्यायालय पूण. न्याय करेगा और अनुमोविद माग. या क्षेत्र या उसक े विहस्से पर स्टेज क ै रिरज चलाने क े लिलए मुकदमे को खींचने में vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अपीलक ा.ओं सविह 50 ऑपरेटरों द्वारा प्राप्त अनुतिच लाभ को बेअसर करेगा और 26-2-1959 की प्रारूप योजना क े लिलए उनक े द्वारा दायर आपलिuयों की सुनवाई क े अति कार क्षेत्र को खो देगा।" 172....... इस न्यायालय ने कविव ा त्रेहन बनाम बलसरा हाइजीन प्रोडक्ट्स लिलविमटेड [(1994) 5 एस. सी. सी. 380] में विनम्नलिललिख म व्यR विकयाः (एससीसी पृष्ठ 391, पैरा 22)
22. क्षति पूर्ति करने की अति कार क्षेत्र प्रत्येक न्यायालय में अं र्षिनविह है और जब भी मामले का न्याय मांग ा है ब इसका प्रयोग विकया जाएगा।इसका उपयोग अं र्षिनविह शविRयों क े ह विकया जाएगा, जहां मामला सख् ी से ारा 144 क े दायरे में नहीं आ ा है। ारा 144 क े ह - '144. प्रत्यास्र्थीापन क े लिलए आवेदन-(1) जहां और जहां क कोई तिड•ी या आदेश विकसी अपील, पुनरीक्षण या अन्य काय.वाही में परिरवर्ति या उलट जा ा है या इस प्रयोजन क े लिलए मुकदमा विकए गए विकसी वाद में अपास् या उपां रिर विकया जा ा है, त्काल मामला ारा 144 की श › क े अं ग. नहीं आ सक ा है, लेविकन इस रह क े मामले में पीविड़ ारा हर अदाल में विनविह प्रत्यास्र्थीापन की व्यापक और सामान्य शविRयों क े लिलए अपील कर सक ा है।
173. इस न्यायालय ने माश.ल सन्स एंड क ं पनी (इंतिडया) लिलविमटेड बनाम साही ओरेट्रान्स (प्राइवेट) लिलविमटेड [(1999) 2 एस. सी. सी. 325] में विनम्नलिललिख म व्यR विकयाः (एससीसी पृष्ठ 326-27, पैरा 4)
4. थ्यों क े कर्थीन से, हालांविक यह हमें प्रर्थीम दृष्टया प्र ी हो ा है विक अपीलक ा. क े पक्ष में एक तिड•ी विकसी न विकसी कारण से vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA विन€पाविद नहीं की जा रही है, हम इस स् र पर प्रत्यर्थी8 क े द्वारा अपीलक ा. को कब्जा देने का विनद\श देना उतिच नहीं समझ े हैं, चूंविक प्रति वादी द्वारा दायर वाद अभी भी लंविब है।यह सही है विक विकसी न विकसी कारण से काय.वाही को लम्बे समय क खींचा जा ा है और कभी-कभी प्रत्येक चरण में विनरं र विवस् ार क े सार्थी उच्च कनीकी बन जा ा है, सिजससे असाव ान लोगों को कानूनी जाल में फ ं साया जा ा है।विवलंब क े कारण, काय.वाही क े अनैति क पक्षकार अनुतिच लाभ उठा े हैं और सिजस व्यविR क े पास अनुतिच कब्जा है वह प्रवि•यात्मक जविटल ाओं का अनुतिच लाभ उठाकर मामलों क े विनस् ारण में विवलंब करने में खुशी प्राप्त कर ा है।यह भी एक ज्ञा थ्य है विक अचल संपलिu क े कब्जे क े लिलए तिड•ी प्राप्त करने क े बाद, इसक े विन€पादन में लंबा समय लग ा है।ऐसी न्धिस्र्थीति में विनण[8] लेनदान क े विह ों की रक्षा करने क े लिलए, यह आवश्यक है विक उतिच आदेश पारिर विकया जान चाविहए ाविक वह व्यविR जो सम्पलिu पर अपना कब्जा बनाये हुए है क े द्वारा बाजार क े विकराए क े विहसाब से लाभ का उतिच भुग ान विकया जाना चाविहए।उपयुR मामलो में, न्यायायल एक रिरसीवर की विनयुRी कर सक ा है एवं उस व्यविR को सिजसक े सम्पलिu का कब्जा है वह रिरसीवर क े एजेंट क े रूप में काय. करेगा [रिरसिसवर इस विनद\श क े सार्थी एक राॅयल्टी राथिश जमा करेगा जो उसे न्यायालय जमा करने को कहेगा ] या एेसा कोइ. अन्य आदेश पारिर करेगा जो न्याय क े विह में हो।यह उस वादी को आैर अति क क्षति से बचा सक ी है सिजसक े पक्ष तिड•ी में पारिर की जायेगी उस वादी आैर अति क क्षति से बचा सक ी है आैर सम्पलिu को अन्य हस् ान् रण से भी बचा सक ी है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
174. पद्माव ी बनाम हरिरजन सेवक संघ [2008 एससीसी ऑनलाइन डेल 1202] में विद‘ी उच्च न्यायालय द्वारा 6-11-2008 लिलया गया विनण.य विनम्नानुसार है:(एससीसी ऑनलाइन डेल पैरा 6)
6. मामले से प ा चल ा है विक ुच्छ प्रति रक्षा और ुच्छ मुकदमेबाजी एक सुविवचारिर उद्यम है सिजसमें कोई जोलिखम की न्धिस्र्थीति नहीं है।आपको क े वल मुकदमेबाजी को लंबा खींचने क े लिलए पेशेवरों अति वRाआें को शाविमल करना होगा ाविक विकसी व्यविR क े अति कारों से वंतिच विकया जा सक े और अवै ा का लाभ उठाया जा सक े ।मै समझ ा हूं विक ऐसे मामलों में जहां न्यायालय यह पा ा है विक आदाल ों को एक उपकरण क े रूप में उपयोग कर े हुए, विकसी वादकारी ने अवै ा को कायम रखा है या अवै कब्जे को बनाए रखा है, वहां न्यायालय को ऐसे वाविदयों पर लाग अति रोविप करनी चाविहए जो वादकारी द्वारा प्राप्त विकए गए लाभों क े बराबर होनी चाविहए और सही व्यविR को नुकसान और वंचन का सामना करना पड़ ा है ाविक ुच्छ मुकदमेंबाजी को रोका जा सक े और लागों को अदाल ों क े माध्यम से अवै काय› की भरपूर फसल काटने से रोका जा सक े ।प्रत्येक न्यातियक प्रणाली का एक उद्देश्य अदाल ों को एक उपकरण क े रूप में उपयोग कर े हुए अन्यायपूण. समृतिद्ध को ह ोत्साविह करना है।न्यायालयों द्वारा अति रोविप खचा. सभी मामलों में सही व्यविR द्वारा वहन विकए जाने वाले वंचन क े बराबर वास् विवक खचा. होना चाविहए। हम उपरोR मामले में विद‘ी उच्च न्यायालय क े विन€कt› को मंजूरी दे े हैं।
175. उच्च न्यायालय ने यह भी कहाः (पदमाव ी बनाम हरिरजन सेवक संघ, 2008 एस. सी. सी. ऑनलाइन डेल 1202)एस. सी. सी. ऑनलाइन डेल 9)
9. इस मामले से अलग होने से पहले, हम यह देखना आवश्यक समझ े हैं विक अदाल में अति प्रवाह मामलों क े [मुख्य] कारणों में से एक ुच्छ vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA मुकदमेबाजी है सिजसमें अदाल ों को वाविदयों द्वारा लगाया जा ा है और सिजसे यर्थीासंभव लंबे समय क खींचा जा ा है।यहां क विक अगर ये वादी अ ं ः मुकदमा हार जा े हैं, ो वे वास् विवक विवजे ा बज जा े है और वह आलिखरी प्रसन्न ा है।न्यायालयों से रोक और व्यादेश प्राप्त करक े अवै काय› को कायम रखने वाले लोगों क े इस वग. को न क े वल पीविड़ व्यविR को उनक े द्वारा विकए गए पूरे अवै लाभ का भुग ान उसक े अति कार से वंतिच व्यविR को लाग क े रूप में विकया जाना चाविहए, बन्धिल्क उन पर अनुकरणीय खच› का भी बोझ डाला जाना चाविहए। न्यायपालिलका में लोगों का विवश्वास भी कायम रह सक ा है जब कानून क े दाविहने पक्ष क े लोग यह महसूस न करें विक अगर वे न्यायालय में न्याय क े लिलए लड़ े रहे और अं ः जी े रहे, ो वे मूख. साविब होंगे क्योंविक 20 या 30 वt› क े बाद कोई मामला जी े ही अपरा ी को वास् विवक लाभकारी बना देंगे, सिजसने उन सभी वt› क े लिलए लाभ उठाया र्थीा। इस प्रकार, यह देखना न्यायालयों का क.व्य विक ऐसे अपराति यों को हर कदम पर ह ोत्साविह विकया जाए और यविद वे अपनी न शविR क े कारण मुकदमेबाजी को लंबा खींचने में सफल हो जा े है, ो अं ः उन्हें इन सभी वt क े मुकदमेंबाजी क े खच› का सामना करना पड़ेगा।स्र्थीाविप कानूनी न्धिस्र्थीति यों क े बावजूद, स्पष्ट रूप से गल काम करने वाले एक क े बाद एक न्यातियक समीक्षा ंत्र का उपयोग जुए क े रूप में कर े हैं, पूरी रह से जान े हुए विक पासा हमेशा उनक े पक्ष में हो ा है क्योंविक अगर वे हार जा े हैं, ो प्राप्त समय ही वास् विवक लाभ हो ा है।इस न्धिस्र्थीति को अदाल ों द्वारा लाभ लिलया जाना चाविहए।
176. विद‘ी उच्च न्यायालय क े इस विनण.य क े विवरुद्ध, इस न्यायालय में अपील (सिसविवल) क े लिलए विवशेt अनुमति (2008) सं. 29197/2008 को वरीय ा विदया vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA गया र्थीा।न्यायालय ने विनम्नलिललिख आदेश पारिर विकया [पद्मव ी बनाम हरिरजन सेवक संघ, (2012) 6 SCC 460]:, (2012) 6 एससीसी 460]:
1. हमने पक्षकारों की ओर से उपन्धिस्र्थी विवद्व वकील को सुना है।हम उच्च न्यायालय द्वारा पारिर सुविवचारिर विनण.य में हस् क्षेप करने का कोई आ ार नहीं पा े हैं।इसलिलए विवशेt अनुमति यातिचका खारिरज की जा ी है। * * * *
183. माश.ल सन्स एंड क ं पनी (इंतिडया) लिलविमटेड बनाम साही ओरेट्रान्स (पी) लिलविमटेड [(1999) 2 एससीसी 325] में इस न्यायालय ने विनम्नलिललिख रूप में म व्यR विकया हैः (एससीसी पृष्ठ 326-27)
4. यह सत्य है विक काय.वाही को लम्बे समय से खींचा जा रहा है या दूसरी रफ, विकसी भी अवसर पर विबना डरे इसे एक विवति क जाल में फसा कर इसे प्रत्येक स् र पर न खत्म होने वाली प्रवि•या को इ ना कविठन बना विदया जा ा विवलंब क े कारण, काय.वाही क े बेईमान पक्षकार अनुतिच लाभ उठा े हैं और सिजस व्यविR क े पास गल कब्जा हो ा है, वह प्रवि•याग जविटल ाओं का अनुतिच लाभ उठाकर मामलों क े विनपटान में विवलंब में प्रसन्न ा प्राप्त कर ा है। यह भी एक ज्ञा थ्य है विक अचल संपलिu क े कब्जे क े लिलए तिड•ी प्राप्त करने क े बाद इसक े विन€पादन में लंबा समय लग ा है।ऐसी न्धिस्र्थीति में, विनण.य देने वाले- लेनदार क े विह ों की रक्षा क े लिलए, उतिच आदेश पारिर करना आवश्यक है ाविक विकसी व्यविR द्वारा उतिच लाभ का भुग ान विकया जा सक े जो बाजार विकराए क े बराबर हो सक ा है।उपयुR मामलों में न्यायालय रिरसीवर की विनयुविR कर सक ा है और उस व्यविR को रिरसीवर क े एजेंट क े रूप में काय. आदेश का विनद\श दे सक ा है, जो रिरसीवर द्वारा विन ा.रिर रॉयल्टी राथिश जमा आदेश या ऐसा अन्य आदेश पारिर आदेश vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA का विनद\श दे सक ा है, जो न्याय क े विह को पूरा करे।यह अथिभयोRा को, सिजसक े पक्ष में तिड•ी पारिर की गई है, आगे होने वाली क्षति को रोक सक ा है और संपलिu की रक्षा कर सक ा है, सिजसमें और अन्यसं•ामण भी शाविमल है।
184. औसेफ मर्थीाई बनाम एम. अब्दुल खाविदर [(2002) 1 एस. सी. सी. 319] में इस न्यायालय ने विवति क न्धिस्र्थीति को दोहराया विकः (एससीसी पृष्ठ 328, पैरा 13)
13. अदाल द्वारा विदया गया स्टे विकसी पक्ष को अति कार प्रदान नहीं कर ा है और यह हमेशा अदाल में मामले क े अंति म परिरणाम क े अ ीन और स्र्थीगन प्राप्त करने वाले पक्ष क े जोलिखम और लाग पर विदया जा ा है।मुकदमा खारिरज होने क े बाद संबंति पक्ष उस न्धिस्र्थीति में चला जा ा है जो न्यायालय में यातिचका दायर करने से पहले र्थीी और सिजसने स्र्थीगन मंजूर विकया र्थीा।स्र्थीगन की मंजूरी स्व ः ही सांविवति क संरक्षण क े विवस् ार क े समान नहीं है। ' अन्य विनण.य भी हैं, जो इसी सिसद्धां को दोहरा े हैं और लागू कर े हैं।भार ीय पया.वरण-विवति क कार.वाई परिरtद बनाम भार संघ, (2011) 8 एससीसी 161, किंग्रडलेज बैंक लिलविमटेड बनाम सीआईटी, (1980) 2 एससीसी 191, इंजेक्शन रामक ृ €ण 61 वमा. बनाम उuर प्रदेश राज्य, (1992) 2 एससीसी 620. माश.ल सन्स एंड क ं पनी (इंतिडया) लिलविमटेड बनाम साही ओरेट्रांस (पी) लिलविमटेड, (1999) 2 एससीसी 620[325]।
338. कोई अपरा ी या व.मान संदभ. में, कोई वादकारी जो अपना जोलिखम उठा ा है, को विवलम्ब करने की युविRयों द्वारा लाभ प्राप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सक ी।यह न्यातियक प्रणाली का क.व्य है विक वह न्यायालय को एक औजार क े रूप में उपयोग करक े अनुतिच लाभ उठाने या अनुतिच लाभ उठाने को ह ोत्साविह करे। कलभार ी एडवरटाइसिंजग बनाम हेमं विवमलनार्थी नरीचविनया [(2010) 9 एससीसी vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 437] में, यह देखा गया विक न्यायालयों को अं रिरम आदेशों क े अनुसरण में पारिर परिरणामी आदेशों क े प्रभाव को विन€प्रभावी करने में साव ान रहना चाविहए। अं रिरम उपाय क े रूप में राह प्राप्त करने और योग्य ा क े गुणावगुण क े आ ार पर मामले क े न्यायविनण.यन से बचने क े लिलए वाविदयों क े बीच बढ़ े रुझान को रोकने क े लिलए ऐसे विनद\श आवश्यक हैं।इस प्रकार, प्रति स्र्थीापन सिसद्धां इस विवचार को मान्य ा दे ा है और उसे आकार दे ा है विक विकसी वादकारी द्वारा न्यायालय क े आदेशों क े कारण, उसक े इशारे पर, प्राप्त लाभ को कायम नहीं रखा जाना चाविहए-यह विवपुल या •विमक वादकारी को बार-बार अदाल ों में जाने और दूसरों क े अति कारों को विवफल करने क े लिलए प्रोत्साविह करेगा-सिजसमें अं र्षिनविह साव.जविनक उद्देश्यों को कम करना भी शाविमल है।उदाहरण क े लिलए, एक अलग दृविष्टकोण का अर्थी. होगा विक जहां दो भू - स्वाविमयों (एक ही अति सूचना द्वारा उनकी भूविम से विवस्र्थीाविप विकया जाना चाह ा है) को मुआवजा विदया जा ा है, सिजनमें से एक मुद्दे को अंति म रूप देने की अनुमति दे ा है-और दूसरा अति ग्रहण क े अं र्षिनविह साव.जविनक उद्देश्य को रोकने क े लिलए, एक या मुकदमेबाजी की श्रृंखला दायर करने का प्रयास कर ा है, सिजस विवचारा ीन ा रहने क े दौरान अं रिरम आदेश जारी हो सक ा है और ाराकारों को बाध्य कर सक ा है, ो बाद में लाभ होगा और ारा 24 (2) क े ह मानद व्यपग श. क े सार्थी पुरस्क ृ विकया जाएगा।इस न्यायालय की राय में, ऐसा परिरणाम कभी भी संसद द्वारा आशतिय नहीं र्थीा, इसक े अलावा, प्रति वादकारी सिसद्धां यह अपेक्षा कर ा है विक वादकारी द्वारा प्राप्त लाभ को दूसरे पक्ष क े पक्ष में उपयुR रूप से प्रति स्र्थीाविप विकया जाना चाविहए।
339. क ृ €णास्वामी एस. पी. डी. बनाम भार संघ [(2006) 3 एस. सी. सी. 286] में यह म व्यR विकया गया विक न्यायालय की अनजाने में हुई गल ी, जो विकसी भी पक्षकार क े हे ुक पर प्रति क ू ल प्रभाव डाल सक ी है, को अवश्य और क े वल उसी क े द्वारा सु ारा जा सक ा है। इस प्रकार, हमारी राय में, सिजस अवति क े लिलए अं रिरम आदेश ने ारा 24 क े ह काम विकया है, उसे उपरोR विवथिभन्न कारणों से ारा 24 (2) क े ह 5 साल की अवति की गणना करने क े लिलए बाहर रखा जाना चाविहए। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA 12.उपयु.R विटप्पथिणयों का सारांश और सार इस प्रकार है - (i) ). अति कारिरयों को कार.वाई करने क े लिलए पांच साल का समय प्रदान विकया जा ा है, न विक मामले पर समय बबा.द करने क े लिलए;
(i) i) ). क े वल सुस् ी या विनन्धि€•य ा और अति कारिरयों की ओर से चूक क े मामलों में और विकसी अन्य कारण से अति ग्रहण की चूक नहीं हो सक ी है।
(i) i) i) ).भूविम अति ग्रहण आदेश वाले प्राति कारिरयों द्वारा चूक विकए जाने की न्धिस्र्थीति में ही अति ग्रहण की अवति समाप्त हो जा ी है, न विक विकसी अन्य कारण से या अदाल क े आदेश से समाप्त हेा ी है।
(i) v) ) अति विनयम, 2013 की ारा 69 क े ह प्रदान विकए गए 12% की दर से अति रिरR मुआवजे को विकसी भी अदाल क े अं रिरम विनtे ाज्ञा आदेश क े कारण अति ग्रहण की काय.वाही की अवति से बाहर रखा गया है; (v) ) यविद अति ग्रहण करने वाले प्राति कारिरयों क े लिलए, विकसी भी कारण से, जो उनक े या सरकार क े लिलए सिजम्मेदार नहीं है, आवश्यक कदम उठाना संभव नहीं है, ो अवति को बाहर रखा जाना चाविहए।
(v) i) ) यविद न्यायालय क े आदेश द्वारा प्राति कारिरयों को रोका जा ा है, ो स्पष्ट रूप से, ऐसी अवति क े उपबं ों की व्याख्या क े अनुसार 'संक्षेप' को अपवर्जिज विकया जाना चाविहए
(v) i) i) ) अति विनयम, 2013 का आशय क े वल भू-स्वाविमयों को लाभ पहुंचाना नहीं है। ारा 24 क े प्राव ान अपने आप में मुकदमा करने वाले पक्षों को लाभ प्रदान करने का इरादा नहीं रख े हैं, जबविक अति विनयम, 2013 की ारा 114 और सामान्य खंड अति विनयम की ारा 6 क े अनुसार मामले को अति विनयम 1894, क े प्राव ानों क े अनुसार मुकदमा चलाया जाना है। यह अति विनयम, 2013 का संशो न नहीं है विक सिजन लोगों ने अति ग्रहण प्रवि•या को चुनौ ी विदया है, उन्हें ारा 24 क े ह अनुशंसिस उच्च मुआवजे का लाभ विमलना चाविहए vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
(i) x) उपबं ों से यह आशय नहीं है विक सिजन व्यविRयों ने मुकदमा दायर विकया है और संविव ान क े अनुच्छेद 226 क े ह दीवानी न्यायालयों या उच्च न्यायालय से वाद दायर करक े अं रिरम आदेश प्राप्त विकए हैं, उन्हें अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों का लाभ प्राप्त होना चाविहए, सिसवाय उस सीमा क जहां क विवशेt रूप से अति विनयम, 2013 क े ह प्राव ान विकया गया है (x) ऐसे मामलों में जहां क ु छ भूस्वाविमयों ने मुकदमेबाजी का सहारा लेना चुना है और अं रिरम आदेश प्राप्त कर लिलया है या यर्थीान्धिस्र्थीति क े आदेशों का कब्जा लेने या आदेशों को व्यावहारिरक वास् विवक ा क े रूप में या सरकार क े लिलए कब्जा या भूस्वाविमयों को मुआवजे का भुग ान करना संभव नहीं है। कई मामलों में, इस रह क े अं रिरम आदेशों ने एक पंचाट पारिर करने में भी बा ा डाली है (xi) ). र्थीाविप, जहां क पंचाटों का संबं है, अति विनयम, 2013 (si) c 1894 अति विनयम) क े अ ीन पंचाट देने क े लिलए उपबंति अवति को ारा 11-क क े स्पष्टीकरण क े आ ार पर अपवर्जिज विकया जा सक ा है, सिजसमें यह उपबं विकया गया है विक दो वt. की अवति की संगणना आदेश में, वह अवति सिजसक े दौरान घोtणा क े अनुसरण में की जाने वाली कोई कार.वाई या काय.वाही न्यायालय क े आदेश द्वारा रोक दी जा ी है, को अपवर्जिज विकया जाएगा।
(xi) i) ) भू-स्वाविमयों द्वारा शुरू विकए गए मुकदमेबाजी का विवविनश्चय स्वयं अपने गुणों क े आ ार पर विकया जाना है और ारा 24 (2) क े लाभ मुकदमेबाजों को सी े रीक े से उपलब् नहीं होने चाविहए।यविद कोई अं रिरम आदेश नहीं है, ो उन्हें वे लाभ विमल सक े हैं सिजनक े वे हकदार हैं, अन्यर्थीा नहीं।विवलंब और विवलंबकारी रणनीति और कभी-कभी पूरी रह से विनरर्थी.क दलीलों क े परिरणामस्वरूप अति विनयम, 2013 की ारा 24 की उप- ारा (1) क े ह भूविम मालिलकों को लाभ नहीं हो सक ा है। इस न्यायालय द्वारा पारिर विकसी भी प्रकार का आदेश प्राति कारिरयों की ओर से आगे की कार.वाई को रोक देगा, जब अति ग्रहण की चुनौ ी लंविब है vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA
(xi) v) ) भूस्वाविमयों क े मामलों में से एक में विदए गए स्र्थीगन का अं रिरम आदेश अति कारिरयों को घोtणा जारी करने क े लिलए आगे बढ़ने क े लिलए पूण. संयम का कारण बनेगा; (xv) ) जब प्राति कारिरयों को असंभव क े कारण क.व्यों का विनव.हन करने से रोक विदया जा ा है, ो यह उनक े लिलए ारा 24 क े उपबं ों की कठोर ा से बचाने क े लिलए पया.प्त बहाना होगा।विकसी वादकारी क े पास अच्छा या बुरा कारण हो सक ा है, चाहे वह सही हो या गल ।लेविकन न्यायालय द्वारा उसक े पक्ष में पारिर अं रिरम आदेश क े माध्यम से उसक े द्वारा बनाई गई न्धिस्र्थीति का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है।हालांविक ारा 24 भूस्वाविमयों क े बीच भेदभाव नहीं कर ी है जो वादी या प्रति वादी है उनकों उसी अति ग्रहण क े संब में उनक े सार्थीा अलग अलग व्यवहार कर ी है, लेविकन यह आवश्यक है विक उन सभी को संसद क े दृविष्टकोण से देखा जाये।अन्यर्थीा, विवtम परिरणाम हो सक े हैं और प्राव ान अपने आप में भेदभावपूण. हो सक े हैं
(xv) i) ) कानून असंभव क े प्रदश.न की उम्मीद नहीं कर ा है(xv) i) i) ) न्यायालय का कोई काय. विकसी व्यविR पर प्रति क ू ल प्रभाव नहीं डालेगा।
(xv) i) i) i) ). कोई पक्षकार अपने विनयंत्रण से परे कति पय परिरन्धिस्र्थीति यों में कोई काय. करने से विनवारिर विकया जा ा है ो वह पश्चात्व 8 अवसर पर ऐसा कर सक ा है।
(xi) x). जब विवति क े विकसी भाग को करने क े लिलए कोई विवकलांग ा है, ो ऐसे प्रभार को क्षमा विकया जाना चाविहए।जब विकसी अति विनयम द्वारा विन ा.रिर औपचारिरक ाओं का पालन उन परिरन्धिस्र्थीति यों क े कारण असंभव हो जा ा है सिजन पर संबंति व्यविRयों का कोई विनयंत्रण नहीं हो ा है, ो इसे एक वै बहाने क े रूप में लिलया जाना चाविहए (xx) न्यायालय अपनी विनविह अति कार क्षेत्र क े अं ग. न्यायालय क े काय. द्वारा प्रति वाविदयों को हुए नुकसान को शमन करने क े लिलए क.व्य विनभा सक ा है। vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA (xxi) ) कोई भी व्यविR न्यायालय क े काय. से पीविड़ नहीं हो सक ा है और अं रिरम आदेश क े अनुतिच लाभ को विन€प्रभावी विकया जाना चाविहए।
(xxi) i) ) विकसी भी पक्षकार को दूसरे पक्षकार को प्रति क ू ल न्धिस्र्थीति में डालने क े लिलए न्यायालय क े आदेश क े आवरण क े अ ीन आश्रय लेने की अनुज्ञा नहीं दी जा सक ी है।
(xxi) i) i) ) यविद विकसी ने न्यायालय क े आवरण का उपभोग विकया है, ो ारा 24 क े अ ीन अपेतिक्ष कदम उठाने क े लिलए प्राति कारिरयों की विनन्धि€•य ा की विदशा में उस अवति को शाविमल नहीं विकया जा सक ा है क्योंविक राज्य प्राति कारिरयों ने न्यायालय क े आदेश क े विबना प्रति कर का अव ारण आदेश क े लिलए काय. विकया हो ा और पंचाट पारिर विकया हो ा।
13. दलीलों का खारिरज कर े हुए कहा विक ारा 24 का कोई स्पष्ट प्राव ान नहीं है जो उस अवति को अपवर्जिज कर ा है सिजसक े दौरान कोई अं रिरम आदेश प्रव.न में र्थीा, राज्य को अति गृही भूविम का कब्जा लेने से या अति विनण.य को प्रभावी करने से रोक ा है, यह म व्यR विकया गया है और 67 विकसी विवशेt मामले या मामलों में, पांच वt. की अवति की गणना क े प्रयोजन क े लिलए ऐसी अवति या अवति यों को शाविमल नहीं विकया जा सक ा है।
14. उपयु.R विटप्पथिणयां अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) का विनव.चन कर े समय और उस पर विवचार कर े समय उपयुR रूप से लागू होंगी।दूसरे शब्दों में, क्या न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम स्र्थीगन और अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह पंचाट की घोtणा नहीं करने वाले प्राति करण क े कारण और अति विनयम, 2013 क े लागू होने क े समय अं रिरम स्र्थीगन जारी रहने क े कारण, ऐसे वाविदयों, सिजन्हें अं रिरम आदेश से लाभ विमला है, को इसका लाभ उठाने की अनुमति दी जा सक ी है और उसक े बाद प्रार्थी.ना की जा सक ी है विक ऐसी न्धिस्र्थीति में, उन्हें नए अति विनयम, 2013 क े अनुसार मुआवजे का भुग ान विकया जाएगा?यह विववाविद नहीं हो सक ा है विक अति विनयम, 1894 क े ह देय मुआवजे की मात्रा और अति विनयम, 2013 क े ह देय मुआवजे vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA क े बीच बहु बड़ा अं र होगा।यह नहीं कहा जा सक ा है विक न्यायालय द्वारा पारिर अं रिरम आदेश क े कारण पंचाट की घोtणा नहीं करने में प्राति करण की ओर से कोई विनन्धि€•य ा र्थीी.अ ः क्या राज्य और सरकारी खजाने को उस न्धिस्र्थीति में नुकसान उठाना चाविहए जब प्राति करण द्वारा पुरस्कार घोविt करने में कोई विनन्धि€•य ा नहीं बर ी गई है?अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) को अति विनयविम कर े समय संसद का इरादा विकसी वादकारी को लाभ देने का नहीं हो सक ा है, सिजसने स्र्थीगन स्र्थीगन आदेश प्राप्त कर लिलया है और उसक े कारण पंचाट घोविt नहीं विकया जा सक ा है और उसक े बाद वादकारी को अति विनयम, 2013 क े अनुसार मुआवजा विदया जा सक ा है। इससे उन भू-स्वाविमयों क े बीच भी भेदभाव हो सक ा है सिजनकी भूविम उसी अति सूचना क े ह अति ग्रविह की गई है।एक उदाहरण लीसिजए, जैसा विक व.मान मामले में, 2022 की दीवानी यातिचका सं 2915 में, यहां प्रति वादी क े स्वाविमत्व वाले ीन भूखंडों सविह विवथिभन्न भू-स्वाविमयों से क ु ल 17.172 हेक्टेयर भूविम का अति ग्रहण विकया गया र्थीा.इसमें अक े ले प्रति वादी को अं रिरम आदेश विदया गया और उसक े कारण, क े वल ीन भूखंडों क े संबं में अति विनण.य घोविt नहीं विकया जा सका और उसी अति सूचना क े ह शेt भूविम क े संबं में, अति विनण.य घोविt विकए गए और मुआवजे का भुग ान अति विनयम, 1894 क े ह विकया गया.अ ः यविद प्रत्यर्थी8 जो यहां प्रति वाद कर रहें है को स्र्थीगन आदेश प्राप्त हो गया है ो उन्हें अति विनयम २०१३ क े आ ार पर आवश्यक मुआवजे प्रदान विकया जाना चाविहए, यविद उस ति र्थीी क जब अति विनयम २०१३ अति विनयविम नहीं हुआ र्थीा ब क मुआवजें का विन ा.रण नहीं हुआ ो एेसी स्र्थीति में उसी अति सूचना क े ह भूविम मालिलक को दो अलग अलग मुआवजे क े हकदार होगें एवं यह उन सभी भूविम मालिलकों क े सार्थी भेदभाव होगा सिजनकी भूविम का अति ग्रहण इसी अति सूचना क े ह विकया गया है जो हमारे विवति विनमा. ाआें का कभी भी इरादा नहीं र्थीा।
15. इंदौर विवकास प्राति करण (पूव R) क े मामले में, इस न्यायालय ने भी प्रत्यास्र्थीापन क े सिसद्धां को लागू विकया।यह म व्यR विकया गया है विक प्रत्यास्र्थीापन का सिसद्धां मुकदमेबाजी क े अं में पूण. न्याय करने क े आदश. पर आ ारिर है और किंक ु मुकदमेबाजी और मामले में पक्षकारों को पारिर अं रिरम आदेश, यविद कोई हो, क े लिलए उसी न्धिस्र्थीति में रखा जाना है। प्रत्यास्र्थीापन क े सिसद्धां को लागू कर े हुए, यह आगे कहा गया है विक कोई भी पक्षकार मुकदमेबाजी का लाभ नहीं उठा सक ा vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA है।आगे यह म व्यR विकया गया है और अथिभविन ा.रिर विकया गया है विक प्रत्यास्र्थीापन का सिसद्धां न्याय, सम ा और विन€पक्ष ा क े विनयम की सांविवति क मान्य ा है।न्यायालय को पूण. न्याय आदेश क े लिलए प्रत्यास्र्थीापन का आदेश देने क े विनविह अति कार क्षेत्र है।यह इस सिसद्धां पर भी है विक कोई असफल वादकारी, सिजसे अं रिरम आदेश का लाभ प्राप्त है, प्रारंभ में अति ग्रहण प्रवि•या को बाति करक े और बाद में अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों क े ह अति क मुआवजे की मांग करक े अति विनयम, 2013 क े प्रव.न पर इसका लाभ नहीं उठा सक ा है।हम इस कारण से ऐसा कह े हैं विक यविद विकसी भू-स्वामी क े कहने पर, सिजसने अति ग्रहण को चुनौ ी दी है, एक न्यायालय द्वारा एक अं रिरम आदेश पारिर विकया गया है, ो अति ग्रहण या अति ग्रहण अति सूचना की काय.वाही रद्द कर दी जाएगी. ब कोई भी मुआवजा विन ा.रिर करने का अवसर नहीं होगा।लेविकन दूसरी ओर, यविद कोई भू-स्वामी, सिजसक े पास अति ग्रहण को चुनौ ी देने क े दौरान अं रिरम आदेश का लाभ है, असफल रह ा है, ो वह यह दावा नहीं कर सक ा है विक उसे अति विनयम, 2013 क े प्राव ानों क े ह मुआवजा विदया जाना चाविहए, जबविक एक भू-स्वामी, सिजसे विकसी अं रिरम आदेश का लाभ नहीं विमला र्थीा, को अति विनयम, 1894 क े प्राव ानों क े ह मुआवजा विदया जा ा है, जो अति विनयम, 2013 क े ह गणना की जाने वाली राथिश से कम है।
15. 1 गुजरा राज्य बनाम एस्सार ऑयल लिलविमटेड, (2012) 3 एससीसी 522 क े मामले में इस न्यायालय क े विनण.य का अनुसरण कर े हुए, यह म व्यR विकया गया है विक प्रति स्र्थीापन का सिसद्धां अन्यायपूण. संव.न या अन्यायपूण. लाभ क े विवरुद्ध एक उपचार है। ए. शनमुगम बनाम अरिरया क्षवित्रय राजक ु ल वंशर्थीु मदालय नंदवन परिरपालनाई संगम, (2012) 6 एस. सी. सी. 430 क े मामले में इस न्यायालय क े विवविनश्चय का अनुसरण कर े हुए यह म व्यR विकया गया है विक मुकदमेबाजी क े लाभ को बेअसर करने क े लिलए प्रति स्र्थीापन अति कार क्षेत्र प्रत्येक न्यायालय में अं र्षिनविह है। यविद न्यायपालिलका में लोगों का विवश्वास बनाए रखना है ो मुकदमेबाजी क े प्रभावों क े कारण कानून क े सही पक्ष क े व्यविR को वंतिच नहीं विकया जाना चाविहए और ुच्छ मुकदमेबाजी क े अनुतिच लाभ को समाप्त करना होगा।
16. इसलिलए, प्रति स्र्थीापन क े सिसद्धां को भी लागू करना, जैसा विक विनम्नलिललिख द्वारा लागू हो ा है इस न्यायालय ने इंदौर विवकास प्राति करण उपरोR क े मामले में, भूविम मालिलकों को उनक े द्वारा प्राप्त vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA अं रिरम आदेश का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सक ी है, सिजसक े कारण प्राति करण अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह पंचाट घोविt नहीं कर सका और उसक े बाद यह क. विदया विक इस मामले की दृविष्ट से, उन्हें अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह मुआवजा विदया जाएगा, सिजसक े ह अति विनयम, 2013 क े ह मुआवजा विन ा.रिर करने पर उन्हें अति क मुआवजा उपलब् होगा। 71 विन€कt.: -
17. उपरोR को ध्यान में रख े हुए और ऊपर ब ाए गए कारणों से, यह विनम्नलिललिख रूप में देखा गया हैः - (i) ) यह विन€कt. विनकाला गया है और अथिभविन ा.रिर विकया गया है विक ऐसे मामले में जहां भूविम अति ग्रहण, पुनवा.स और पुनस्र्थीा.पन में उतिच प्रति कर और पारदर्शिश ा का अति कार अति विनयम, 2013 क े लागू होने की ारीख को, विकसी काय.वाही विवचारा ीन ा होने और/ या न्यायालय द्वारा विदए गए अं रिरम स्र्थीगन क े कारण अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह कोई पंचाट घोविt नहीं विकया गया है, ऐसे भूविम मालिलक अति विनयम, 2013 की ारा 24 (1) क े ह मुआवजे क े हकदार नहीं होंगे और वे क े वल अति विनयम, 1894 क े ह ही मुआवजे क े हकदार होंगे।
18. उपयु.R चचा. को ध्यान में रख े हुए और उपयु.R कारणों से और हमारे विन€कt. को ध्यान में रख े हुए, इन सभी अपीलों की अनुमति दी जा ी है।उच्च न्यायालयों द्वारा पारिर आक्षेविप विनण.य और आदेश रद्द एवं अपास् विकए जा े हैं।संबंति उपयुR प्राति कारी (ओं) को अति विनयम, 1894 की ारा 11 क े ह विवचारा ीन भूविम क े संबं में पचांट घोविt करने और अति विनयम, 2013 की ारा 114 क े सार्थी पढ़ी गयी सामान्य खंड अति विनयम, 1897 की ारा 6 को ध्यान में रख े हुए अति विनयम, 1894 क े प्राव ानों क े ह मुआवजे का विन ा.रण कर ा है, जहां भी लागू हो और मूल भूस्वाविमयों को अति विनयम, 1894 क े प्राव ानों क े ह दनुसार मुआवजे का भुग ान विकया जाएगा। यह कहने की आवश्यक ा नहीं है विक यविद भू -स्वामी अति विनयम, 1894 क े पंचाट क े vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA ह घोविt मुआवजे क े विन ा.रण से व्यथिर्थी हैं, ो वे क े वल भूविम अति ग्रहण अति विनयम, 1894 क े प्राव ानों क े ह मुआवजा बढ़ाने क े लिलए कानून का सहारा ले सक े हैं। इसक े सार्थी ही व.मान अपीलों की अनुमति दी जा ी है।हालांविक, मामले क े थ्यों और परिरन्धिस्र्थीति यों में, लाग क े बारे में कोई आदेश नहीं होगा। …………………………. [न्यायमूर्ति एम. आर. शाह] …………………………... [बी. वी. नागरत्न] नई विद‘ी 20 मई, 2022 vLohdj.k Þ{ks=h; Hkk"kk esa vuqokfnr fu.kZ; oknh ds viuh Hkk"kk esa le>us gsrq fufcZa/kr iz;ksx ds fy;s gS vkSj fdlh vU; mís'; ds fy;s iz;ksx ugh fd;k tk ldrk gSA lHkh O;kogkfjd vkSj ljdkjh mís';ksa ds fy;s] fu.kZ; dk vaxzsth laLdj.k izkekf.kd ekuk tk;sxk rFkk fu"iknu vkSj fdz;kUo;u ds mís';ksa ds fy;s ekU; gksxkßA