Rajasthan State v. Eten Jef

Supreme Court of India · 11 May 2022
M. R. Shah
Civil Appeal No 3116/2022
2022 INSC 556
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that concealment of criminal antecedents and false declaration in police recruitment applications disentitle a candidate from appointment, upholding the State's rejection of such candidature.

Full Text
Translation output
भारत क
े सर्वो च्च न्यायालय
सिसविर्वोल अपीलीय अधि कारिरता
दीर्वोानी याधि का संख्या 3116/2022
राजस्थान राज्य और अन्य ………..अपीलकता)
बनाम
ेतन जेफ …………..प्रत्यथ/
विनर्ण)य
एम. आर. शाह, जे.
JUDGMENT

1. डी.बी. विर्वोशेष अपील संख्या 1479/2018 में राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ द्वारा विदनांक 04.03.2020 को पारिरत आक्षेविपत विनर्ण)य और आदेश, सिजसक े द्वारा उच्च न्यायालय ने राजस्थान राज्य द्वारा की गई अपील को खारिरज विकया और कांस्टेबल (सामान्य) क े पद पर विनयुविJ क े लिलए राज्य को प्रत्यथ/- याधि काकता) क े मामले पर विर्वो ार करने का विनदMश देने र्वोाले विर्वोद्वान एकल न्याया ीश द्वारा पारिरत विनर्ण)य और आदेश की पुविN की है, से असंतुN होकर राज्य ने र्वोत)मान अपील को प्रस्तुत विकया है।

2. संक्षेप में र्वोत)मान मामले से जुड़े तथ्य नी े इस प्रकार हैं:- 2.[1] राजस्थान पुलिलस क े विर्वोभिभन्न सिजलों/बटालिलयनों/इकाइयों में कांस्टेबल (सामान्य), कांस्टेबल (ऑपरेटर), कांस्टेबल (ड्राईर्वोर) और कांस्टेबल (बैंड) क े क ु ल 4684 रिरJ पदों की भत/ क े लिलए पुलिलस महाविनदेशक, राजस्थान, जयपुर द्वारा विदनांक 07.04.2008 क े पत्र द्वारा आर्वोेदन आमंवित्रत विकए गए थे। 2008 की भत/ अधि सू ना क े अनुसार, सभी इच्छ ु क उम्मीदर्वोारों को कांस्टेबल क े विर्वोभिभन्न पदों क े लिलए विनयुविJ प्राप्त करने क े लिलए लिललिखत परीक्षा, शारीरिरक दक्षता परीक्षा, प्रर्वोीर्णता 2022 INSC 556 परीक्षा, विर्वोशेष योग्यता परीक्षा और साक्षात्कार में उत्तीर्ण) होना आर्वोश्यक था। उJ अधि सू ना क े पैराग्राफ 9 (ई) क े अनुसार, उम्मीदर्वोारों को अपने आर्वोेदन प्रपत्रों में सही जानकारी भरने की आर्वोश्यकता थी। इसमें यह प्रार्वो ान विकया गया विक यविद आर्वोेदन पत्र में दी गई जानकारी गलत और अ ूरी पाई जाती है, तो इस तरह का आर्वोेदन पत्र यन प्रविeया क े विकसी भी रर्ण में खारिरज विकया जा सकता है। प्रत्यथ/ ने उJ पद क े लिलए आर्वोेदन पत्र प्रस्तुत विकया। विदनांविकत 26.04.2008 आर्वोेदन प्रपत्र क े कॉलम संख्या 15 में प्रत्यथ/ ने (सिजसे इसमें इसक े बाद मूल रिरट याधि काकता) कहा गया है) स्पN रूप से कहा था विक उसका कोई आपराधि क पूर्वो)र्वोृत्त नहीं है । उसने यह भी कहा विक उसक े लिखलाफ कोई एफ.आई.आर. या आपराधि क मामला लंविबत नहीं हैं। उसने आर्वोेदन प्रपत्र क े साथ हस्ताक्षरिरत घोषर्णा पत्र भी संलग्न विकया, सिजसमें कहा गया था विक विदनांक 26.04.2008 क े आर्वोेदन प्रपत्र क े पैरा 15 में प्रकट की गई जानकारी सही थी और उसक े द्वारा विकसी आपराधि क रिरकॉड) को भिछपाया नहीं गया। 2.[2] मूल रिरट याधि काकता) ने लिललिखत परीक्षा क े साथ-साथ शारीरिरक परीक्षा को भी पास कर लिलया। इस स्तर पर यह ध्यान देने की बात है विक मूल रिरट याधि काकता) पहले से ही भारतीय दंड संविहता की ारा 143, 341 और 336 (इसमें इसक े बाद 'भा.दं.सं.'क े रूप में संदर्भिभत) क े तहत दंडनीय अपरा ों क े लिलए पुलिलस स्टेशन, नीम का थाना, सीकर में उसक े लिखलाफ दज) प्राथविमकी संख्या 458/2007 विदनांक 17.12.2007 में आपराधि क काय)र्वोाही का सामना कर रहा था, जबविक, उसक े द्वारा आर्वोेदन पत्र में इसका कोई खुलासा नहीं विकया गया था। इस प्रकार, उसने अपने लिखलाफ एफ.आई.आर./आपराधि क मामले क े विर्वो ारा ीन होने क े बारे में तात्वित्र्वोक तथ्य को छ ु पाया । 2.[3] पुलिलस अ ीक्षक, सिजला सीकर ने पुलिलस अ ीक्षक, हनुमानगढ़ को विदनांक 21.08.2008 क े पत्र द्वारा 2007 की उJ प्राथविमकी संख्या 458 क े बारे में सूधि त विकया। कभिथत जानकारी क े आ ार पर, मूल रिरट याधि काकता) की उम्मीदर्वोारी इस आ ार पर अस्र्वोीकार कर दी गई विक मूल रिरट याधि काकता) ने नौकरी क े लिलए आर्वोेदन पत्र क े कॉलम 15 में अपने आपराधि क पूर्वो)र्वोृत्त क े बारे में तात्वित्र्वोक तथ्य को छ ु पाया और गलत कथन विकये । 2.[4] अपनी उम्मीदर्वोारी की अस्र्वोीक ृ धित से व्यभिथत महसूस करते हुए मूल रिरट याधि काकता) ने सिसविर्वोल रिरट याधि का संख्या 10250/2008 क े माध्यम से उच्च न्यायालय क े विर्वोद्वत एकल न्याया ीश क े समक्ष रिरट याधि का प्रस्तुत की। यह भी प्रकट होता है विक भारतीय दंड संविहता की ारा 147, 148, 141, 452, 380, 352, 427 क े लिलए मूल रिरट याधि काकता) क े लिखलाफ सीकर क े नीम का थाना पुलिलस स्टेशन में विदनांक 27.02.2012 को एक और प्राथविमकी दज) की गई थी। 30.07.2015 विदनांविकत विनर्ण)य और आदेश द्वारा, विर्वोद्वत विर्वो ारर्ण अदालत ने उसे भा.दं.सं. की ारा 352 सपविठत ारा 149 क े तहत अपरा ों क े लिलए पक्षकारों क े मध्य राजीनामा हो जाने क े आ ार पर बरी कर विदया और भा.दं.सं. की ारा 147, 148, 455, 440 सपविठत ारा 149 क े तहत अपरा ों क े लिलए मूल रिरट याधि काकता) को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर विदया । तथाविप, एक दूसरे मामले में विर्वोद्वत विर्वो ारर्ण न्यायालय एसीजेएम-1, नीम का थाना, सीकर, ने विदनांक 21.01.2016 क े विनर्ण)य और आदेश द्वारा मूल रिरट याधि काकता) को भारतीय दंड भा.दं.सं. की ारा 341, 323 सपविठत ारा 34 क े अ ीन दंडनीय अपरा ों क े लिलए दोषसिसद्ध करते हुए उसे अपरा ी परिरर्वोीक्षा अधि विनयम, 1958 का लाभ प्रदान विकया। 2.[5] विदनांक 12.03.2018 क े विनर्ण)य द्वारा, विर्वोद्वत एकल न्याया ीश ने पूर्वो J रिरट याधि का को अनुमधित दी और राज्य को कांस्टेबल क े पद क े लिलए मूल रिरट े मामले पर विनम्नलिललिखत आ ारों पर विर्वो ार करने का विनदMश विदयाः “1. यह विक पक्षकार यह विदखाने क े लिलए विक प्रत्यथ/ ने कभिथत आर्वोेदन पत्र, विदनांक 26.04.2008 क े कॉलम 15 में आपराधि क पूर्वो)र्वोृत्त क े संबं में विकसी जानकारी को छ ु पाया था, विकसी भी सामग्री को अभिभलेख पर रखने में विर्वोफल रहे ।

2. विक र्वोत)मान मामले में प्रत्यथ/ पर ऐसे अपरा ों का आरोप लगाया गया था जो प्रक ृ धित में तुच्छ थे और प्रत्यथ/ द्वारा ऐसे अपरा ों को अनदेखा विकया जाना ाविहए । पूर्वो J त्विस्थधित को स्थाविपत करने क े लिलए माननीय उच्च न्यायालय ने अर्वोतार सिंसह बनाम भारत संघ और अन्य (2016) 8 एस. सी. सी. 471 र्वोाले मामले क े आदेश पर भरोसा विकया।

3. भंज राम बनाम राजस्थान राज्य और अन्य अन्य बी. सिसविर्वोल रिरट याधि का संख्या 6884/2008 क े मामले में विदनांक 01.03.2017 का विनर्ण)य उJ रिरट याधि का में उसिyलिखत तथ्यों पर पूरी तरह से लागू होता है।" 2.[6] भा.दं.सं. की ारा 341 और 323 क े लिखलाफ विदनांक 05.09.2018 को तीसरी प्राथविमकी दज) की गई थी। 2.[7] सिसविर्वोल रिरट याधि का संख्या 10250/2008 को मंजूर करते हुए विर्वोद्वत एकल न्याया ीश द्वारा पारिरत विनर्ण)य और आदेश से व्यभिथत और असंतुN महसूस करते हुए और कांस्टेबल क े पद क े मामले पर विर्वो ार करने क े लिलए राज्य को विनदMश विदये जाने पर राज्य ने उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ क े समक्ष रिरट अपील प्रस्तुत की। 2.[8] रिरट अपील विर्वो ारा ीन रहने क े दौरान, विर्वोद्वत एसीजेएम, नीम का थाना, सीकर ने विदनांक 09.09.2019 क े विनर्ण)य और आदेश द्वारा प्राथविमकी संख्या 348/2018 में पक्षकारों क े बी हुए समझौते को ध्यान में रखते हुए भा.दं.सं. की ारा 341 और 323 क े लिलए मूल रिरट याधि काकता) को बरी कर विदया । 2.[9] भा.दं.सं. की ारा 341,323,382,427 क े लिलए मूल रिरट याधि काकता) क े लिखलाफ नीम का थाना, सीकर में विदनांक 20.12.2018 को संख्या 505/2018 र्वोाली एक और प्राथविमकी दज) की गई थी।

2.10 उपरोJ क े बार्वोजूद, विदनांक 04.03.2020 क े आक्षेविपत विनर्ण)य और आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने उJ अपील को खारिरज कर विदया है और विर्वोद्वत एकल न्याया ीश द्वारा पारिरत विनर्ण)य और आदेश की पुविN की है, सिजसक े द्वारा विर्वोद्वत एकल न्याया ीश ने राज्य को कांस्टेबल क े रूप में विनयुविJ क े मामले पर विर्वो ार करने का विनदMश विदया गया था। इस बी, प्राथविमकी संख्या 505/2018 क े संबं में भा.दं.सं. की ारा 341,323,382,427 क े लिखलाफ आरोप पत्र दायर विकया गया है और मुकदमा लंविबत है।

2.11 उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ द्वारा रिरट अपील को खारिरज करने और अपीलकता)-राज्य को कांस्टेबल क े मामले पर विर्वो ार करने का विनदMश देने र्वोाले विर्वोद्वत एकल न्याया ीश द्वारा पारिरत विनर्ण)य और आदेश से व्यभिथत और असंतुN महसूस करते हुए, राज्य ने र्वोत)मान अपील को प्रस्तुत विकया है।

3. हमने राजस्थान सरकार की ओर से र्वोरिरष्ठ अधि र्वोJा और एएजी डॉ. मनीष सिंसघर्वोी और मूल याधि काकता) की ओर से विर्वोद्वान अधि र्वोJा श्री आर. क े. शुक्ला को सुना।

4. डॉ. मनीष सिंसघर्वोी, विर्वोद्वान र्वोरिरष्ठ अधि र्वोJा ने पुरजोर तरीक े से तक ) प्रस्तुत विकये विक आपराधि क पृष्ठभूविम, सिजसे मूल रिरट याधि काकता) द्वारा छ ु पाया गया था, को ध्यान में रखे विबना दोनों विर्वोद्वान एकल न्याया ीश और खण्ड पीठ अपीलकता) राज्य को कांस्टेबल क े मामले पर विर्वो ार करने का विनदMश देने में एक गंभीर गलती की है। 4.[1] राजस्थान राज्य की ओर से उपत्विस्थत विर्वोद्वान र्वोरिरष्ठ अधि र्वोJा डॉ. मनीष सिंसघर्वोी द्वारा यह प्रधितर्वोाक विकया गया विक मूल रिरट याधि काकता) क े आर्वोेदन प्रपत्र क े कॉलम 15, सिजसक े द्वारा उससे आपराधि क पूर्वो)र्वोृत्त क े सही और सही तथ्यों का उyेख करने की अपेक्षा की गई थी, और इस तथ्य क े बार्वोजूद विक र्वोह प्राथविमकी संख्या 458/2007 क े माध्यम से आपराधि क अभिभयोजन का सामना कर रहा था, मूल रिरट याधि काकता) ने इसे छ ु पाया और इसका खुलासा नहीं विकया। इसक े विर्वोपरीत प्रत्यथ/ ने उJ क ॅ ालम में - विक क्या आर्वोेदक क े लिखलाफ कोई आपराधि क मामला दज) विकया गया है? क े जर्वोाब में "नही "अंविकत विकया । 4.[2] यह कथन विकया गया विक जब अभ्यथ/ ने प्रारंभिभक प्रeम पर ही सही और सत्य तथ्यों का उyेख नहीं विकया और इस प्रकार तात्वित्र्वोक तथ्यों को छ ु पाया, तो र्वोह कांस्टेबल क े रूप में पद पर विनयुJ विकए जाने का हकदार नहीं है। 4.[3] यह कथन विकया गया विक कांस्टेबल का पद, सिजसका कत)व्य कानून और आदेश बनाए रखना है, सबसे पहले ईमानदार होना ाविहए। यह प्रस्तुत विकया गया विक एक उम्मीदर्वोार, सिजसने प्रारंभिभक रर्ण में ही एक कांस्टेबल क े रूप में विनयुविJ प्राप्त करने से पहले आपराधि क पृष्ठभूविम होने क े तात्वित्र्वोक तथ्यों को छ ु पाया है और उसने आर्वोेदन पत्र में गलत कथन विकया है, उस पर भरोसा क ै से विकया जा सकता है और उन्हें कांस्टेबल क े रूप में क ै से विनयुJ विकया जा सकता है? यह कथन विकया विक इस प्रकार एक कांस्टेबल क े रूप में उनकी उम्मीदर्वोारी को अस्र्वोीकार करना राज्य क े लिलए उधि त था । अर्वोतार सिंसह बनाम भारत संघ, (2016) 8 एससीसी 471 और दया शंकर यादर्वो बनाम भारत संघ, (2010) 14 एससीसी 103 क े मामले में इस े विर्वोविनश्चयों का समथ)न विकया गया । 4.[4] राज्य क े विर्वोद्वत र्वोरिरष्ठ अधि र्वोJा डॉ. मनीष सिंसघर्वोी द्वारा इसक े अलार्वोा यह भी आग्रह विकया गया विक खण्ड पीठ द्वारा रिरट अपील का विर्वोविनश्चय विकए जाने तक, मूल रिरट याधि काकता) क े विर्वोरुद्घ 3 से 4 प्राथविमविकयां दज) हो गई, सिजनमें से दो मामलों में समझौता करक े र्वोह बरी हआ और एक मामले में उसे दोषी ठहराया गया है, हालांविक उसमें अपरा ी परिरर्वोीक्षा अधि विनयम का लाभ विदया गया है। यह कथन विकया गया विक उसक े लिखलाफ एक आपराधि क मामला अभी भी लंविबत है । ऐसे व्यविJ को कांस्टेबल क े रूप में विनयुJ नहीं विकया जा सकता है, इसलिलए, यह अनुरो विकया जाता है विक इस न्यायालय को बाद की घटनाओं पर भी विर्वो ार करना ाविहए । 5 र्वोत)मान अपील का श्री आर. क े. शुक्ला, मूल रिरट याधि काकता) की ओर से उपत्विस्थत विर्वोद्वान अधि र्वोJा द्वारा विर्वोरो विकया गया है। 5.[1] मूल रिरट याधि काकता) की ओर से पेश हुए विर्वोद्वान अधि र्वोJा श्री आर. क े. शुक्ला द्वारा यह पुरजोर तक ) विदये गए विक मूल रिरट याधि काकता) क े लिखलाफ आरोविपत अपरा प्रक ृ धित में मामूली थे और उसे उनमें बरी भी कर विदया गया था और एक मामले में उसे अपरा ी परिरर्वोीक्षा अधि विनयम का लाभ प्रदान विकया गया है । उच्च न्यायालय की एकल न्याया ीश क े साथ-साथ खण्ड पीठ ने कांस्टेबल क े पद क े लिलए मूल रिरट याधि काकता) क े मामले पर विर्वो ार करने क े लिलए राज्य को सही विनदMश विदया है। 5.[2] यह कथन विकया गया है विक जब विर्वोद्वत एकल न्याया ीश क े साथ-साथ खण्ड पीठ दोनों ने ठोस कारर्ण देकर कांस्टेबल क े पद क े मामले पर विर्वो ार करने क े लिलए राज्य को विनदMश देने पर सहमधित व्यJ की है । ऐसे में भारत क े संविर्वो ान क े अनुच्छेद 136 क े तहत शविJयों का प्रयोग करते हुए इस न्यायालय द्वारा इसमें हस्तक्षेप नहीं विकया जा सकता है।

6. हमने संबंधि त पक्षों की ओर से पेश होने विर्वोद्वान अधि र्वोJाओं को विर्वोस्तार से सुना है। 6.[1] प्रारंभ में, यह नोट विकया जाना अपेधिक्षत है विक सिजस पद पर रिरट याधि काकता) विनयुविJ की मांग कर रहा है र्वोह कांस्टेबल का पद है। यह विर्वोर्वोाविदत नहीं हो सकता है विक कांस्टेबल का कत)व्य कानून और आदेश को बनाए रखना है, इसलिलए यह उम्मीद की जाती है विक र्वोह ईमानदार, र्वो भरोसेमंद होगा। र्वोद/ ारी सेर्वोा में एक कम) ारी उच्च स्तर की ईमानदारी का पूर्वोा)नुमान करता है क्योंविक ऐसे व्यविJ से कानून को बनाए रखने की उम्मीद की जाती है और इसक े विर्वोपरीत छल और छल में विकसी भी काय) को बदा)श्त नहीं विकया जा सकता है। र्वोत)मान मामले में मूल रिरट याधि काकता) ने उपरोJ अपेक्षाओं/आर्वोश्यकताओं की पुविN नहीं की है। उसने अपने आपराधि क इधितहास क े तथ्यों को छ ु पाया। उसने आर्वोेदन पत्र में यह खुलासा नहीं विकया विक उसक े लिखलाफ एक आपराधि क मामला/एफआईआर लंविबत है। इसक े विर्वोपरीत, आर्वोेदन पत्र में, उसने एक गलत बयान विदया विक र्वोह विकसी आपराधि क मामले का सामना नहीं कर रहा है, इसलिलए, उपयु)J कारर्ण से, उसकी उम्मीदर्वोारी उपयुJ प्राधि कारी द्वारा अस्र्वोीकार कर दी गई। उपरोJ क े बार्वोजूद, विर्वोद्वान एकल न्याया ीश ने रिरट याधि काकता) को अनुमधित दी और राज्य को कांस्टेबल क े लिलए मूल रिरट याधि काकता) क े मामले पर मुख्य रूप से इस आ ार पर विर्वो ार करने का विनदMश विदया विक अपरा प्रक ृ धित में मामूली थे और ऐसे अपरा ों को दबाने की अनदेखी की जानी ाविहए थी, सिजसकी पुविN खण्ड पीठ ने की है। 6.[2] प्रश्न यह नहीं है विक अपरा प्रक ृ धित में तुच्छ थे या नहीं। सर्वोाल मूल रिरट याधि काकता) द्वारा अपने आपराधि क पूर्वो)र्वोृत्त क े संबं में तात्वित्र्वोक तथ्य को छ ु पाने और आर्वोेदन पत्र में झूठा बयान देने का है । यविद आरंभ में ही उसने अपने आपराधि क पूर्वो)र्वोृत्त क े संबं में तात्वित्र्वोक तथ्य को छ ु पा विदया है और र्वोास्तर्वो में गलत बयान विदया है तो उसे कांस्टेबल क े रूप में क ै से विनयुJ विकया जा सकता है। भविर्वोष्य में उस पर भरोसा क ै से विकया जा सकता है? यह उम्मीद क ै से की जाती है विक उसक े बाद र्वोह अपना कत)व्य ईमानदारी से विनभाएगा? 6.[3] परिरर्णामस्र्वोरुप, प्राधि कारिरयों द्वारा कांस्टेबल क े पद क े लिलए प्रत्यथ/ की उम्मीदर्वोारी को अस्र्वोीकार करना न्यायोधि त था। 6.[4] इस प्रeम पर दयाशंकर यादर्वो (पूर्वो J) क े मामले में इस न्यायालय क े विर्वोविनश्चय को विनर्दिदN विकया जाना अपेधिक्षत है। पैरा 14 और 16 में, यह विनम्नलिललिखत रूप में अभिभविन ा)रिरत विकया गया हैः “14. इस मामले में प्रासंविगक क ें द्रीय रिरजर्वो) पुलिलस बल विनयम, 1955 का विनयम 14 सत्यापन से संबंधि त है। उJ विनयम क े खंड (क) और (ख) नी े उद्धृत विकए गए हैंः "14. सत्यापन- (क) जैसे ही विकसी व्यविJ का नामांकन विकया जाता है, उसक े रिरत्र, पूर्वो)र्वोृत्त, संबं और आयु का सत्यापन समय-समय पर क े न्द्रीय सरकार द्वारा विर्वोविहत प्रविeया क े अनुसार विकया जाएगा। सत्यापन नामार्वोली उस सिजले क े सिजला मसिजस्ट्रेट या उपायुJ को भेजी जाएगी, सिजसका भत/ विकया गया व्यविJ विनर्वोासी है। (ख) सत्यापन रोल सीआरपी फॉम) 25 में होगा और सत्यापन क े बाद संबंधि त बल क े सदस्य क े रिरत्र और सेर्वोा रोल क े साथ संलग्न विकया जाएगा।" उJ जानकारी मांगने का उद्देश्य उम्मीदर्वोार क े रिरत्र और पूर्वो)र्वोृत्त का पता लगाना है ताविक पद क े लिलए उसकी उपयुJता का आंकलन विकया जा सक े । इसलिलए, उम्मीदर्वोार को इन कॉलम में सर्वोालों का सच्चाई और पूरी तरह से जर्वोाब देना होगा और इसमें विकसी भी गलत प्रस्तुधित या गलत बयान को देना, अपने आप में एक र्वोद/ ारी सुरक्षा सेर्वोा क े लिलए अनुपयुJ आ रर्ण या रिरत्र को प्रदर्भिशत करेगा।

16. इस प्रकार विकसी आपराधि क मामले में उसकी दोषसिसधिद्ध या विकसी आपराधि क अपरा में उसकी संलिलप्तता (भले ही उसे तकनीकी आ ार पर या संदेह का लाभ देते हुए बरी कर विदया गया हो) या अन्य आ रर्ण (जैसे परीक्षा में नकल करना) या विनष्कासन या विनलंबन या कॉलेज से प्रधितबं आविद क े आ ार पर विकसी आपराधि क अपरा क े लिलए अभिभयोजन या दोषसिसधिद्ध से संबंधि त प्रश्नों क े उत्तर में (भले ही र्वोह अंततः आपराधि क मामले में बरी कर विदया गया हो) सामग्री की जानकारी को दबाने या झूठा बयान देने क े आ ार पर परिरर्वोीक्षा पर विकसी कम) ारी को सेर्वोा से धिडस् ाज) विकया जा सकता है या विकसी संभाविर्वोत कम) ारी को रोजगार से इनकार विकया जा सकता है। यह आ ार विपछले पूर्वो)र्वोृत्त और रिरत्र क े आ ार से अलग है, क्योंविक यह र्वोत)मान संविदग् आ रर्ण और घोषर्णा करते समय रिरत्र की अनुपत्विस्थधित को दशा)ता है, सिजससे र्वोह पद क े लिलए अनुपयुJ हो जाता है। 6.[5] ए. पी. बनाम बी. धि न्नाम नायडू राज्य, (2005) 2 एस. सी. सी. 746 में, इस न्यायालय ने यह मत व्यJ विकया है विक अनुप्रमार्णन प्रपत्र में सू ना की अपेक्षा करने का उद्देश्य और तत्पश्चात् अभ्यथ/ द्वारा की गई घोषर्णा का उद्देश्य सेर्वोा में प्रर्वोेश करने या जारी रखने क े लिलए उसकी उपयुJता का विनर्ण)य करने क े लिलए रिरत्र और पूर्वो)र्वोृत्त का अभिभविनश्चय और साक्षीकरर्ण करना है। यह भी देखा गया है विक जब कोई उम्मीदर्वोार सामग्री संबं ी जानकारी भिछपाता है और/या गलत जानकारी देता है, तो र्वोह विनयुविJ या सेर्वोा में बने रहने क े लिलए विकसी भी अधि कार का दार्वोा नहीं कर सकता है। 6.[6] देर्वोेंद्र क ु मार बनाम उत्तरां ल राज्य, (2013) 9 एस. सी. सी. 363 में, प्रभिशक्षर्ण में शाविमल होने क े दौरान, कम) ारी से क ु छ विनधिश्चत जानकारी, विर्वोशेष रूप से, विक क्या र्वोह कभी विकसी आपराधि क मामले में शाविमल रहा है, देते हुए एक शपथ पत्र प्रस्तुत करने क े लिलए कहा गया था। कम) ारी ने यह कहते हुए एक शपथ पत्र प्रस्तुत विकया विक र्वोह कभी भी विकसी आपराधि क मामले में शाविमल नहीं था। कम) ारी ने संतोषजनक रूप से अपना प्रभिशक्षर्ण पूरा विकया और इसी समय विनयोJा को रिरत्र सत्यापन की प्रविeया क े अनुसरर्ण में पता ला विक कम) ारी र्वोास्तर्वो में एक आपराधि क मामले में शाविमल था। यह पाया गया विक उस मामले में अंधितम रिरपोट) अभिभयोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई थी और संबंधि त न्याधियक मसिजस्ट्रेट द्वारा स्र्वोीकार की गई थी । इसक े आ ार पर, कम) ारी को इस आ ार पर अ ानक हटा विदया गया क्योंविक र्वोह एक अस्थायी सरकारी कम) ारी था, इसलिलए उसे विबना विकसी जां क े सेर्वोा से हटाया जा सकता है। कम) ारी द्वारा उJ आदेश को उच्च न्यायालय क े एकल न्याया ीश क े समक्ष एक रिरट याधि का दायर करक े ुनौती दी गई थी, सिजसे खारिरज कर विदया गया था। खण्ड पीठ ने उस आदेश को बरकरार रखा, जो इस े समक्ष अपील का विर्वोषय था। अपील को खारिरज करते हुए, इस न्यायालय ने विटप्पर्णी की और कहा विक सर्वोाल यह नहीं है विक कम) ारी इस पद क े लिलए उपयुJ है या नहीं। विकसी आपराधि क मामले/काय)र्वोाही का लंविबत होना इस तरह विर्वो ारा ीन मामलों की जानकारी को छ ु पाने से अलग है। विकसी व्यविJ क े लिखलाफ लंविबत मामले में नैधितक अ मता शाविमल नहीं हो सकती है, लेविकन इस जानकारी को छ ु पाना ही नैधितक अ मता है। यह आगे देखा गया है विक विनयोJा द्वारा मांगी गई जानकारी यविद आर्वोश्यक रूप से प्रकट नहीं की जाती है, तो विनधिश्चत रूप से भौधितक जानकारी को भिछपाना होगा और उस त्विस्थधित में, सेर्वोा समाप्त होने क े लिलए उत्तरदायी हो जाएगी, भले ही आगे कोई मुकदमा न ला हो या संबंधि त व्यविJ बरी हो गया हो। 6.[7] जैनेन्द्र सिंसह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2012) 8 एस. सी. सी. 748, पैरा 29.[4] क े मामले में, इस न्यायालय ने यह मत व्यJ विकया है और अभिभविन ा)रिरत विकया है विक “कोई अभ्यथ/ तात्वित्र्वोक जानकारी को दबाने और/या झूठी जानकारी देने क े कारर्ण सेर्वोा में बने रहने का दार्वोा नहीं कर सकता और विनयोJा को रोजगार की प्रक ृ धित क े साथ-साथ अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपनी सेर्वोाएं समाप्त करने का विर्वोर्वोेकाधि कार है। पैरा 29.[6] में आगे यह देखा गया है विक जो व्यविJ तात्वित्र्वोक जानकारी को दबाता है और/या गलत जानकारी देता है, र्वोह विनयुविJ या सेर्वोा में विनरंतरता क े लिलए विकसी भी अधि कार का दार्वोा नहीं कर सकता है। पैरा 29.[7] में यह देखा गया है और अभिभविन ा)रिरत विकया गया है विक र्वोद/ ारी सेर्वोा में सेर्वोा करने क े लिलए आशधियत व्यविJ से अपेधिक्षत मानक अन्य सेर्वोाओं से काफी भिभन्न है और इसलिलए, महत्र्वोपूर्ण) जानकारी क े संबं में विकसी भी जानबूझकर बयान या ूक को गंभीरता से लिलया जा सकता है और विनयुविJ प्राधि कारी क े अंधितम विनर्ण)य को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। 6.[8] दया शंकर यादर्वो बनाम भारत संघ, (2010) 14 एस. सी. सी. 103 में, इस न्यायालय को पूर्वो)र्वोृत्तों क े संबं में जानकारी मांगने क े प्रयोजन पर विर्वो ार करने का अर्वोसर विमला। यह पाया गया है और अभिभविन ा)रिरत विकया गया है विक पूर्वो)र्वोृत्त क े संबं में जानकारी मांगने का उद्देश्य उम्मीदर्वोार क े रिरत्र और पूर्वो)र्वोृत्त का पता लगाना है ताविक पद क े लिलए उसकी उपयुJता का आकलन विकया जा सक े । यह भी देखा गया है विक जब कोई कम) ारी या संभाविर्वोत कम) ारी सत्यापन प्रपत्र में रिरत्र और पूर्वो)र्वोृत्त से संबंधि त प्रश्नों क े उत्तर घोविषत करता है, तो उसक े सत्यापन क े विनम्नलिललिखत परिरर्णाम हो सकते हैंः(एससीसी पृ. 110-11, पैरा 15) “15. (क) यविद घोषर्णा करने र्वोाले ने प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर विदया है और विकसी आपराधि क मामले का ब्यौरा प्रस्तुत विकया है (सिजसमें उसे साक्ष्य क े अभार्वो में संदेह का लाभ देकर दोषसिसद्ध या दोषमुJ विकया गया था), तो विनयोJा उसे रोजगार देने से इंकार कर सकता है (या यविद पहले से ही परिरर्वोीक्षा पर विनयोसिजत है, तो उसे सेर्वोा से मुJ कर सकता है), यविद र्वोह उस अपरा /अपरा की प्रक ृ धित और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए अयोग्य पाया जाता है, सिजसमें र्वोह शाविमल था। (ख) दूसरी ओर, यविद विनयोJा को पता लता है विक ऐसे अपरा ों से संबंधि त जो तकनीकी थे, या ऐसे प्रक ृ धित क े थे जो घोषर्णा करने र्वोाले की रोजगार क े लिलए योग्यता को प्रभाविर्वोत नहीं करते थे, या जहां घोषर्णा करने र्वोाले को सम्मानजनक रूप से बरी कर विदया गया था और दोषमुJ कर विदया गया था, तो विनयोJा इस तथ्य की अनदेखी कर सकता है विक घोषर्णा करने र्वोाले पर विकसी आपराधि क मामले में मुकदमा लाया गया था और उसे विनयुJ करने या उसे रोजगार में जारी रखने क े लिलए आगे बढ़ सकता है। (ग) जहां घोषर्णाकता) ने नकारात्मक रूप से प्रश्नों का उत्तर विदया है और सत्यापन पर यह पाया गया है विक उत्तर गलत थे, र्वोहां विनयोJा घोषर्णाकता) को विनयोसिजत करने से इनकार कर सकता है (या उसे धिडस् ाज) कर सकता है, यविद र्वोह पहले से ही विनयोसिजत है), भले ही घोषर्णाकता) को आरोपों से मुJ कर विदया गया हो या बरी कर विदया गया हो। ऐसा इसलिलए है क्योंविक जब उसक े रिरत्र से संबंधि त तात्वित्र्वोक जानकारी का दमन या अप्रकटन होता है, तो यह स्र्वोयं घोषर्णाकता) को विनयोसिजत न करने का एक कारर्ण बन जाता है। (घ) जहां साक्षीकरर्ण प्रपत्र या साक्षीकरर्ण प्रपत्र में घोषर्णा करने र्वोाले से विकसी आपराधि क काय)र्वोाही में अपनी संलिलप्तता का खुलासा करने की अपेक्षा करने र्वोाले उधि त या पया)प्त प्रश्न नहीं हैं, या जहां उम्मीदर्वोार को साक्षीकरर्ण रोल/साक्षीकरर्ण प्रपत्र में घोषर्णाएं करने क े दौरान आपराधि क काय)र्वोाही की शुरुआत क े बारे में जानकारी नहीं थी, र्वोहां उम्मीदर्वोार को संबंधि त जानकारी न देने क े लिलए दोष नहीं पाया जा सकता है। लेविकन यविद विनयोJा को अन्य सा नों (जैसे पुलिलस सत्यापन या भिशकायतें आविद) से घोषर्णा करने र्वोाले की भागीदारी क े बारे में पता लता है, तो विनयोJा (ए) या (बी) उपरोJ पाठ्यeमों का सहारा ले सकता है। इसक े बाद यह पाया गया है विक विकसी कम) ारी को सेर्वोा से बखा)स्त विकया जा सकता है या विकसी संभाविर्वोत कम) ारी को विकसी आपराधि क अपरा क े लिलए अभिभयोजन या दोषसिसधिद्ध से संबंधि त प्रश्नों क े उत्तर में (भले ही उसे अंततः आपराधि क मामले में बरी कर विदया गया हो) इस आ ार पर रोजगार से इनकार विकया जा सकता है। 6.[9] मध्य प्रदेश राज्य बनाम अभिभजीत सिंसह पर्वोार, (2018) 18 एस. सी. सी. 733 में, जब कम) ारी ने यन प्रविeया में भाग लिलया, तो उसने अपने विर्वोरुद्ध लंविबत आपराधि क मामले को प्रकट करते हुए एक शपथ पत्र विदया।यह शपथ पत्र 22-12- 2012 को दायर विकया गया था।प्रकटीकरर्ण क े अनुसार, र्वोष) 2006 में दज) एक मामला उस तारीख को लंविबत था जब शपथ पत्र प्रस्तुत विकया गया था। हालांविक, इस तरह का शपथ पत्र करने क े ार विदनों क े भीतर मूल भिशकायतकता) और कम) ारी क े बी समझौता हो गया और सीआरपीसी की खंड 320 क े तहत अपरा का शमन करने क े लिलए एक आर्वोेदन दायर विकया गया। समझौते क े विर्वोलेख को देखते हुए कम) ारी को छ ु ट दे दी गई। उसक े बाद कम) ारी का यन विकया गया और उसे धि विकत्सा जां क े लिलए बुलाया गया। हालांविक, लगभग उसी समय, उनक े रिरत्र का सत्यापन भी विकया गया और रिरत्र सत्यापन रिरपोट) पर उधि त विर्वो ार करने क े बाद, उनकी उम्मीदर्वोारी को खारिरज कर विदया गया। कम) ारी ने अपनी उम्मीदर्वोारी की अस्र्वोीक ृ धित को ुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में एक रिरट याधि का दायर की। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय क े विर्वोद्वान एकल न्याया ीश ने उJ रिरट याधि का की अनुमधित दी। विर्वोद्वत एकल न्याया ीश द्वारा राज्य को कम) ारी की विनयुविJ करने का विनदMश देने र्वोाले विनर्ण)य और आदेश की खण्ड पीठ द्वारा पुविN की गई, सिजसक े कारर्ण इस े समक्ष अपील की गई । अर्वोतार सिंसह बनाम भारत संघ, (2016) 8 एस. सी. सी. 471 र्वोाले मामले में विर्वोविनश्चय सविहत मुद्दे पर विर्वोविनश्चयों पर विर्वो ार करने क े पश्चात्, इस न्यायालय ने कम) ारी की उम्मीदर्वोारी को अस्र्वोीकार करने क े राज्य क े आदेश को यह कहते हुए कायम रखा विक जैसा अर्वोतार सिंसह (पूर्वो J) में अभिभविन ा)रिरत विकया गया था, उन मामलों में भी जहां विकसी अंधितम मामले क े बारे में सच्चा प्रकटन विकया गया था, विनयोJा को अभ्यथ/ क े पूर्वो)र्वोृत्त पर विर्वो ार करने का अधि कार होगा और उसे ऐसे अभ्यथ/ को विनयुJ करने क े लिलए विर्वोर्वोश नहीं विकया जा सकता।

6.10 अर्वोतार सिंसह (उपयु)J) में अभिभजीत सिंसह पंर्वोार (उपयु)J) में विर्वोविनश्चय क े पैरा 38.[5] को पुनः प्रस्तुत करने और/या पुनर्दिर्वो ार करने क े पश्चात्, पैरा 13 में इस न्यायालय ने विनम्नलिललिखत मत व्यJ विकया और अभिभविन ा)रिरत विकयाः "13. अर्वोतार सिंसह [अर्वोतार सिंसह बनाम भारत संघ, (2016) 8 एस. सी. सी. 471] में, यद्यविप यह न्यायालय मुख्य रूप से सू ना क े गैर-प्रकटन या गलत प्रकटन क े प्रश्न से संबंधि त था, पैरा 38.[5] में यह मत व्यJ विकया गया था विक ऐसे मामलों में भी जहां विकसी विनष्कष) मामले क े बारे में सच्चा प्रकटन विकया गया था, विनयोJा को अभी भी उम्मीदर्वोार क े पूर्वो)र्वोृत्तों पर विर्वो ार करने का अधि कार होगा और उसे ऐसा उम्मीदर्वोार विनयुJ करने क े लिलए मजबूर नहीं विकया जा सकता था।"

6.11 हाल ही में, राजस्थान राज्य विर्वोद्युत प्रसारर्ण विनगम लिलविमटेड बनाम अविनल क ं र्वोरिरया, (2021) 10 एससीसी 136 क े मामले में, इस न्यायालय को एक कम) ारी की ओर से, सिजसकी सेर्वोाओं को इस आशय की झूठी घोषर्णा दायर करने क े आ ार पर समाप्त कर विदया गया था विक न तो उसक लंविबत है और न ही उसे विकसी न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया है, यह कहने पर विक बाद में उसे अपरा ी परिरर्वोीक्षा अधि विनयम की खंड 12 का लाभ प्रदान विकया गया है और इसलिलए उसकी सेर्वोाओं को समाप्त नहीं विकया जाना ाविहए था। इस न्यायालय ने पैरा 13 और 14 में विनम्नलिललिखत मत व्यJ विकया हैः "13. अन्यथा भी, बाद में 1958 क े अधि विनयम की खंड 12 का लाभ प्राप्त करना प्रत्यथ/ क े लिलए सहायक नहीं होगा क्योंविक सर्वोाल 14-4-2015 को एक झूठी घोषर्णा दायर करने क े बारे में है विक न तो उसक लंविबत है और न ही उसे विकसी अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया है, जो 1958 क े अधि विनयम की खंड 12 का लाभ देने र्वोाले विर्वोद्वत सत्र न्यायालय द्वारा पारिरत आदेश से बहुत पहले था।जैसाविक इसमें ऊपर कहा गया है, बाद में दोषमुविJ क े मामले में भी कम) ारी ने एक बार झूठी घोषर्णा की और/या लंविबत आपराधि क मामले क े तात्वित्र्वोक तथ्य को दबाया तो र्वोह अधि कार क े रूप में विनयुविJ का हकदार नहीं होगा।"

14. इस मुद्दे/प्रश्न पर विनयोजक क े दृविNकोर्ण से एक अन्य दृविNकोर्ण से विर्वो ार विकया जा सकता है। सर्वोाल यह नहीं है विक क्या कोई कम) ारी मामूली प्रक ृ धित क े विर्वोर्वोाद में शाविमल था और क्या उसे बाद में बरी कर विदया गया है या नहीं। प्रश्न ऐसे कम) ारी की विर्वोश्वसनीयता और/या विर्वोश्वसनीयता क े बारे में है जो रोजगार क े प्रारंभिभक रर्ण में अथा)त घोषर्णा/सत्यापन प्रस्तुत करते समय और/या विकसी पद क े लिलए आर्वोेदन करते समय झूठी घोषर्णा करता है और/या खुलासा नहीं करता है और/या आपराधि क मामले में शाविमल होने क े तात्वित्र्वोक तथ्य को दबाता है। यविद सही तथ्यों का खुलासा विकया गया होता, तो विनयोJा ने उसे विनयुJ नहीं विकया होता। सर्वोाल विर्वोश्वास का है, ऐसी त्विस्थधित में, जहां विनयोJा को लगता है विक कोई कम) ारी सिजसने प्रारंभिभक रर्ण में ही गलत बयान विदया है और/या तथ्यों का खुलासा नहीं विकया है और/या भौधितक तथ्यों को दबाया नहीं है और इसलिलए उसे सेर्वोा में जारी नहीं रखा जा सकता है क्योंविक ऐसे कम) ारी पर भविर्वोष्य में भी भरोसा नहीं विकया जा सकता है, विनयोJा को इस तरह क े कम) ारी को जारी रखने क े लिलए मजबूर नहीं विकया जा सकता है। कम) ारी को जारी रखने या न रखने का विर्वोकल्प हमेशा विनयोJा को विदया जाना ाविहए। दोहरार्वो की कीमत पर, यह देखा गया है और जैसा विक इसमें ऊपर विनर्ण)य की शत) में कहा गया है विक ऐसा कम) ारी विनयुविJ का दार्वोा नहीं कर सकता है और/या अधि कार क े रूप में सेर्वोा में बना रह सकता है।

7. उपयु)J मामलों में इस न्यायालय द्वारा अधि कभिथत विर्वोधि को लागू करते हुए यह नहीं कहा जा सकता है विक र्वोत)मान मामले में कांस्टेबल क े पद क याधि काकता) की उम्मीदर्वोारी को अस्र्वोीकार करने में प्राधि कारी ने कोई त्रुविट की है।

8. र्वोैसे भी यह नोट विकया जाना आर्वोश्यक है विक बाद में और विर्वोद्वत एकल न्याया ीश क े साथ-साथ खण्ड पीठ क े समक्ष काय)र्वोाही क े दौरान, मूल रिरट याधि काकता) क े लिखलाफ तीन से ार अन्य एफआईआर दायर की जाती हैं, जो आपराधि क मुकदमों में परिरर्णत होती हैं और दो मामलों में उसे समझौते क े आ ार पर बरी कर विदया गया है और एक में दोषी ठहराए जाने पर भी उसे अपरा ी परिरर्वोीक्षा अधि विनयम का लाभ विदया गया है। उसक े लिखलाफ एक और आपराधि क मामला लंविबत है। इसलिलए मूल रिरट याधि काकता) को कांस्टेबल क े ऐसे पद पर विनयुJ नहीं विकया जा सकता।

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9. उपयु)J ा) को ध्यान में रखते हुए और ऊपर बताए गए कारर्णों से विर्वोद्वत एकल न्याया ीश और खण्ड पीठ दोनों ने कांस्टेबल क े लिलए प्रत्यथ/ क े मामले पर विर्वो ार करने क े लिलए राज्य को विनदMश देने में गलती की है। उच्च न्यायालय द्वारा विदया गया विनर्ण)य और आदेश तथ्यों क े साथ-साथ कानून क े आ ार पर भी विटकाऊ नहीं है। इन परिरत्विस्थधितयों में, इसे रद्द विकया जाना ाविहए और अलग रखा जाना ाविहए और तदनुसार खारिरज विकया जाता है और रद्द विकया जाता है । यह अभिभविन ा)रिरत विकया गया है विक कांस्टेबल क े पद क े लिलए प्रत्यथ/-मूल रिरट याधि काकता) की उम्मीदर्वोारी उधि त प्राधि कारी द्वारा उधि त रूप से अस्र्वोीकार कर दी गई थी । तदनुसार र्वोत)मान अपील स्र्वोीकार की जाती है।मामले क े तथ्यों और परिरत्विस्थधितयों में, लागत क े बारे में कोई आदेश नहीं विदया जाता है। (एम. आर. शाह) (बी. र्वोी. नागरत्ना) नई विदyी, 11 मई, 2022 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.