Rajasthan State v. Chetan Jef

Supreme Court of India · 11 May 2022
M. R. Shah; B. V. Nagarathna
Civil Appeal No 3116 of 2022
criminal appeal_allowed Significant

AI Summary

The Supreme Court held that concealment of pending criminal cases in a police constable application form justifies rejection of candidature, overruling the High Court's direction to consider appointment.

Full Text
Translation output
भारत क
े सर्वोच्च न्यायालय
सिविल अपीलीय अधिकारिता
दीवानी याचिका संख्या 3116/2022
राजस्थान राज्य और अन्य ………..अपीलकर्ता
बनाम
चेतन जेफ …………..प्रत्यर्थी
निर्णय
एम. आर. शाह, जे.
JUDGMENT

1. डी.बी. विशेष अपील संख्या 1479/2018 में राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ द्वारा दिनांक 04.03.2020 को पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश, जिसक े द्वारा उच्च न्यायालय ने राजस्थान राज्य द्वारा की गई अपील को खारिज किया और कांस्टेबल (सामान्य) क े पद पर नियुक्ति क े लिए राज्य को प्रत्यर्थी- याचिकाकर्ता क े मामले पर विचार करने का निर्देश देने वाले विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय और आदेश की पुष्टि की है, से असंतुष्ट होकर राज्य ने वर्तमान अपील को प्रस्तुत किया है।

2. संक्षेप में वर्तमान मामले से जुड़े तथ्य नीचे इस प्रकार हैं:- 2.[1] राजस्थान पुलिस क े विभिन्न जिलों/बटालियनों/इकाइयों में कांस्टेबल (सामान्य), कांस्टेबल (ऑपरेटर), कांस्टेबल (ड्राईवर) और कांस्टेबल (बैंड) क े क ु ल 4684 रिक्त पदों की भर्ती क े लिए पुलिस महानिदेशक, राजस्थान, जयपुर द्वारा दिनांक 07.04.2008 क े पत्र द्वारा आवेदन आमंत्रित किए गए थे। 2008 की भर्ती अधिसूचना क े अनुसार, सभी इच्छ ु क उम्मीदवारों को कांस्टेबल क े विभिन्न पदों क े लिए नियुक्ति प्राप्त करने क े लिए लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षा, प्रवीणता परीक्षा, विशेष योग्यता परीक्षा और साक्षात्कार में उत्तीर्ण होना आवश्यक था। उक्त अधिसूचना क े पैराग्राफ 9 (ई) क े अनुसार, उम्मीदवारों को अपने आवेदन प्रपत्रों में सही जानकारी भरने की आवश्यकता थी। इसमें यह प्रावधान किया गया कि यदि आवेदन पत्र में दी गई जानकारी गलत और अधूरी पाई जाती है, तो इस तरह का आवेदन पत्र चयन प्रक्रिया क े किसी भी चरण में खारिज किया जा सकता है। प्रत्यर्थी ने उक्त पद क े लिए आवेदन पत्र प्रस्तुत किया। दिनांकित 26.04.2008 आवेदन प्रपत्र क े कॉलम संख्या 15 में प्रत्यर्थी ने (जिसे इसमें इसक े बाद मूल रिट याचिकाकर्ता कहा गया है) स्पष्ट रूप से कहा था कि उसका कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं है । उसने यह भी कहा कि उसक े खिलाफ कोई एफ.आई.आर. या आपराधिक मामला लंबित नहीं हैं। उसने आवेदन प्रपत्र क े साथ हस्ताक्षरित घोषणा पत्र भी संलग्न किया, जिसमें कहा गया था कि दिनांक 26.04.2008 क े आवेदन प्रपत्र क े पैरा 15 में प्रकट की गई जानकारी सही थी और उसक े द्वारा किसी आपराधिक रिकॉर्ड को छिपाया नहीं गया। 2.[2] मूल रिट याचिकाकर्ता ने लिखित परीक्षा क े साथ-साथ शारीरिक परीक्षा को भी पास कर लिया। इस स्तर पर यह ध्यान देने की बात है कि मूल रिट याचिकाकर्ता पहले से ही भारतीय दंड संहिता की धारा 143, 341 और 336 (इसमें इसक े बाद 'भा.दं.सं.'क े रूप में संदर्भित) क े तहत दंडनीय अपराधों क े लिए पुलिस स्टेशन, नीम का थाना, सीकर में उसक े खिलाफ दर्ज प्राथमिकी संख्या 458/2007 दिनांक 17.12.2007 में आपराधिक कार्यवाही का सामना कर रहा था, जबकि, उसक े द्वारा आवेदन पत्र में इसका कोई खुलासा नहीं किया गया था। इस प्रकार, उसने अपने खिलाफ एफ.आई.आर./आपराधिक मामले क े विचाराधीन होने क े बारे में तात्विक तथ्य को छ ु पाया । 2.[3] पुलिस अधीक्षक, जिला सीकर ने पुलिस अधीक्षक, हनुमानगढ़ को दिनांक 21.08.2008 क े पत्र द्वारा 2007 की उक्त प्राथमिकी संख्या 458 क े बारे में सूचित किया। कथित जानकारी क े आधार पर, मूल रिट याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी इस आधार पर अस्वीकार कर दी गई कि मूल रिट याचिकाकर्ता ने नौकरी क े लिए आवेदन पत्र क े कॉलम 15 में अपने आपराधिक पूर्ववृत्त क े बारे में तात्विक तथ्य को छ ु पाया और गलत कथन किये । 2.[4] अपनी उम्मीदवारी की अस्वीक ृ ति से व्यथित महसूस करते हुए मूल रिट याचिकाकर्ता ने सिविल रिट याचिका संख्या 10250/2008 क े माध्यम से उच्च न्यायालय क े विद्वत एकल न्यायाधीश क े समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत की। यह भी प्रकट होता है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 141, 452, 380, 352, 427 क े लिए मूल रिट याचिकाकर्ता क े खिलाफ सीकर क े नीम का थाना पुलिस स्टेशन में दिनांक 27.02.2012 को एक और प्राथमिकी दर्ज की गई थी। 30.07.2015 दिनांकित निर्णय और आदेश द्वारा, विद्वत विचारण अदालत ने उसे भा.दं.सं. की धारा 352 सपठित धारा 149 क े तहत अपराधों क े लिए पक्षकारों क े मध्य राजीनामा हो जाने क े आधार पर बरी कर दिया और भा.दं.सं. की धारा 147, 148, 455, 440 सपठित धारा 149 क े तहत अपराधों क े लिए मूल रिट याचिकाकर्ता को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया । तथापि, एक दूसरे मामले में विद्वत विचारण न्यायालय एसीजेएम-1, नीम का थाना, सीकर, ने दिनांक 21.01.2016 क े निर्णय और आदेश द्वारा मूल रिट याचिकाकर्ता को भारतीय दंड भा.दं.सं. की धारा 341, 323 सपठित धारा 34 क े अधीन दंडनीय अपराधों क े लिए दोषसिद्ध करते हुए उसे अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 का लाभ प्रदान किया। 2.[5] दिनांक 12.03.2018 क े निर्णय द्वारा, विद्वत एकल न्यायाधीश ने पूर्वोक्त रिट याचिका को अनुमति दी और राज्य को कांस्टेबल क े पद क े लिए मूल रिट े मामले पर निम्नलिखित आधारों पर विचार करने का निर्देश दियाः “1. यह कि पक्षकार यह दिखाने क े लिए कि प्रत्यर्थी ने कथित आवेदन पत्र, दिनांक 26.04.2008 क े कॉलम 15 में आपराधिक पूर्ववृत्त क े संबंध में किसी जानकारी को छ ु पाया था, किसी भी सामग्री को अभिलेख पर रखने में विफल रहे ।

2. कि वर्तमान मामले में प्रत्यर्थी पर ऐसे अपराधों का आरोप लगाया गया था जो प्रक ृ ति में तुच्छ थे और प्रत्यर्थी द्वारा ऐसे अपराधों को अनदेखा किया जाना चाहिए । पूर्वोक्त स्थिति को स्थापित करने क े लिए माननीय उच्च न्यायालय ने अवतार सिंह बनाम भारत संघ और अन्य (2016) 8 एस. सी. सी. 471 वाले मामले क े आदेश पर भरोसा किया।

3. भंज राम बनाम राजस्थान राज्य और अन्य अन्य बी. सिविल रिट याचिका संख्या 6884/2008 क े मामले में दिनांक 01.03.2017 का निर्णय उक्त रिट याचिका में उल्लिखित तथ्यों पर पूरी तरह से लागू होता है।" 2.[6] भा.दं.सं. की धारा 341 और 323 क े खिलाफ दिनांक 05.09.2018 को तीसरी प्राथमिकी दर्ज की गई थी। 2.[7] सिविल रिट याचिका संख्या 10250/2008 को मंजूर करते हुए विद्वत एकल न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय और आदेश से व्यथित और असंतुष्ट महसूस करते हुए और कांस्टेबल क े पद क े मामले पर विचार करने क े लिए राज्य को निर्देश दिये जाने पर राज्य ने उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ क े समक्ष रिट अपील प्रस्तुत की। 2.[8] रिट अपील विचाराधीन रहने क े दौरान, विद्वत एसीजेएम, नीम का थाना, सीकर ने दिनांक 09.09.2019 क े निर्णय और आदेश द्वारा प्राथमिकी संख्या 348/2018 में पक्षकारों क े बीच हुए समझौते को ध्यान में रखते हुए भा.दं.सं. की धारा 341 और 323 क े लिए मूल रिट याचिकाकर्ता को बरी कर दिया । 2.[9] भा.दं.सं. की धारा 341,323,382,427 क े लिए मूल रिट याचिकाकर्ता क े खिलाफ नीम का थाना, सीकर में दिनांक 20.12.2018 को संख्या 505/2018 वाली एक और प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

2.10 उपरोक्त क े बावजूद, दिनांक 04.03.2020 क े आक्षेपित निर्णय और आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ ने उक्त अपील को खारिज कर दिया है और विद्वत एकल न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय और आदेश की पुष्टि की है, जिसक े द्वारा विद्वत एकल न्यायाधीश ने राज्य को कांस्टेबल क े रूप में नियुक्ति क े मामले पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। इस बीच, प्राथमिकी संख्या 505/2018 क े संबंध में भा.दं.सं. की धारा 341,323,382,427 क े खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया है और मुकदमा लंबित है।

2.11 उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ द्वारा रिट अपील को खारिज करने और अपीलकर्ता-राज्य को कांस्टेबल क े मामले पर विचार करने का निर्देश देने वाले विद्वत एकल न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय और आदेश से व्यथित और असंतुष्ट महसूस करते हुए, राज्य ने वर्तमान अपील को प्रस्तुत किया है।

3. हमने राजस्थान सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और एएजी डॉ. मनीष सिंघवी और मूल याचिकाकर्ता की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री आर. क े. शुक्ला को सुना।

4. डॉ. मनीष सिंघवी, विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता ने पुरजोर तरीक े से तर्क प्रस्तुत किये कि आपराधिक पृष्ठभूमि, जिसे मूल रिट याचिकाकर्ता द्वारा छ ु पाया गया था, को ध्यान में रखे बिना दोनों विद्वान एकल न्यायाधीश और खण्ड पीठ अपीलकर्ता राज्य को कांस्टेबल क े मामले पर विचार करने का निर्देश देने में एक गंभीर गलती की है। 4.[1] राजस्थान राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी द्वारा यह प्रतिवाक किया गया कि मूल रिट याचिकाकर्ता क े आवेदन प्रपत्र क े कॉलम 15, जिसक े द्वारा उससे आपराधिक पूर्ववृत्त क े सही और सही तथ्यों का उल्लेख करने की अपेक्षा की गई थी, और इस तथ्य क े बावजूद कि वह प्राथमिकी संख्या 458/2007 क े माध्यम से आपराधिक अभियोजन का सामना कर रहा था, मूल रिट याचिकाकर्ता ने इसे छ ु पाया और इसका खुलासा नहीं किया। इसक े विपरीत प्रत्यर्थी ने उक्त क ॅ ालम में - कि क्या आवेदक क े खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज किया गया है? क े जवाब में "नही "अंकित किया । 4.[2] यह कथन किया गया कि जब अभ्यर्थी ने प्रारंभिक प्रक्रम पर ही सही और सत्य तथ्यों का उल्लेख नहीं किया और इस प्रकार तात्विक तथ्यों को छ ु पाया, तो वह कांस्टेबल क े रूप में पद पर नियुक्त किए जाने का हकदार नहीं है। 4.[3] यह कथन किया गया कि कांस्टेबल का पद, जिसका कर्तव्य कानून और आदेश बनाए रखना है, सबसे पहले ईमानदार होना चाहिए। यह प्रस्तुत किया गया कि एक उम्मीदवार, जिसने प्रारंभिक चरण में ही एक कांस्टेबल क े रूप में नियुक्ति प्राप्त करने से पहले आपराधिक पृष्ठभूमि होने क े तात्विक तथ्यों को छ ु पाया है और उसने आवेदन पत्र में गलत कथन किया है, उस पर भरोसा क ै से किया जा सकता है और उन्हें कांस्टेबल क े रूप में क ै से नियुक्त किया जा सकता है? यह कथन किया कि इस प्रकार एक कांस्टेबल क े रूप में उनकी उम्मीदवारी को अस्वीकार करना राज्य क े लिए उचित था । अवतार सिंह बनाम भारत संघ, (2016) 8 एससीसी 471 और दया शंकर यादव बनाम भारत संघ, (2010) 14 एससीसी 103 क े मामले में इस े विनिश्चयों का समर्थन किया गया । 4.[4] राज्य क े विद्वत वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी द्वारा इसक े अलावा यह भी आग्रह किया गया कि खण्ड पीठ द्वारा रिट अपील का विनिश्चय किए जाने तक, मूल रिट याचिकाकर्ता क े विरुद्घ 3 से 4 प्राथमिकियां दर्ज हो गई, जिनमें से दो मामलों में समझौता करक े वह बरी हआ और एक मामले में उसे दोषी ठहराया गया है, हालांकि उसमें अपराधी परिवीक्षा अधिनियम का लाभ दिया गया है। यह कथन किया गया कि उसक े खिलाफ एक आपराधिक मामला अभी भी लंबित है । ऐसे व्यक्ति को कांस्टेबल क े रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता है, इसलिए, यह अनुरोध किया जाता है कि इस न्यायालय को बाद की घटनाओं पर भी विचार करना चाहिए । 5 वर्तमान अपील का श्री आर. क े. शुक्ला, मूल रिट याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता द्वारा विरोध किया गया है। 5.[1] मूल रिट याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए विद्वान अधिवक्ता श्री आर. क े. शुक्ला द्वारा यह पुरजोर तर्क दिये गए कि मूल रिट याचिकाकर्ता क े खिलाफ आरोपित अपराध प्रक ृ ति में मामूली थे और उसे उनमें बरी भी कर दिया गया था और एक मामले में उसे अपराधी परिवीक्षा अधिनियम का लाभ प्रदान किया गया है । उच्च न्यायालय की एकल न्यायाधीश क े साथ-साथ खण्ड पीठ ने कांस्टेबल क े पद क े लिए मूल रिट याचिकाकर्ता क े मामले पर विचार करने क े लिए राज्य को सही निर्देश दिया है। 5.[2] यह कथन किया गया है कि जब विद्वत एकल न्यायाधीश क े साथ-साथ खण्ड पीठ दोनों ने ठोस कारण देकर कांस्टेबल क े पद क े मामले पर विचार करने क े लिए राज्य को निर्देश देने पर सहमति व्यक्त की है । ऐसे में भारत क े संविधान क े अनुच्छेद 136 क े तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस न्यायालय द्वारा इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।

6. हमने संबंधित पक्षों की ओर से पेश होने विद्वान अधिवक्ताओं को विस्तार से सुना है। 6.[1] प्रारंभ में, यह नोट किया जाना अपेक्षित है कि जिस पद पर रिट याचिकाकर्ता नियुक्ति की मांग कर रहा है वह कांस्टेबल का पद है। यह विवादित नहीं हो सकता है कि कांस्टेबल का कर्तव्य कानून और आदेश को बनाए रखना है, इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि वह ईमानदार, व भरोसेमंद होगा। वर्दीधारी सेवा में एक कर्मचारी उच्च स्तर की ईमानदारी का पूर्वानुमान करता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति से कानून को बनाए रखने की उम्मीद की जाती है और इसक े विपरीत छल और छल में किसी भी कार्य को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। वर्तमान मामले में मूल रिट याचिकाकर्ता ने उपरोक्त अपेक्षाओं/आवश्यकताओं की पुष्टि नहीं की है। उसने अपने आपराधिक इतिहास क े तथ्यों को छ ु पाया। उसने आवेदन पत्र में यह खुलासा नहीं किया कि उसक े खिलाफ एक आपराधिक मामला/एफआईआर लंबित है। इसक े विपरीत, आवेदन पत्र में, उसने एक गलत बयान दिया कि वह किसी आपराधिक मामले का सामना नहीं कर रहा है, इसलिए, उपर्युक्त कारण से, उसकी उम्मीदवारी उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा अस्वीकार कर दी गई। उपरोक्त क े बावजूद, विद्वान एकल न्यायाधीश ने रिट याचिकाकर्ता को अनुमति दी और राज्य को कांस्टेबल क े लिए मूल रिट याचिकाकर्ता क े मामले पर मुख्य रूप से इस आधार पर विचार करने का निर्देश दिया कि अपराध प्रक ृ ति में मामूली थे और ऐसे अपराधों को दबाने की अनदेखी की जानी चाहिए थी, जिसकी पुष्टि खण्ड पीठ ने की है। 6.[2] प्रश्न यह नहीं है कि अपराध प्रक ृ ति में तुच्छ थे या नहीं। सवाल मूल रिट याचिकाकर्ता द्वारा अपने आपराधिक पूर्ववृत्त क े संबंध में तात्विक तथ्य को छ ु पाने और आवेदन पत्र में झूठा बयान देने का है । यदि आरंभ में ही उसने अपने आपराधिक पूर्ववृत्त क े संबंध में तात्विक तथ्य को छ ु पा दिया है और वास्तव में गलत बयान दिया है तो उसे कांस्टेबल क े रूप में क ै से नियुक्त किया जा सकता है। भविष्य में उस पर भरोसा क ै से किया जा सकता है? यह उम्मीद क ै से की जाती है कि उसक े बाद वह अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाएगा? 6.[3] परिणामस्वरुप, प्राधिकारियों द्वारा कांस्टेबल क े पद क े लिए प्रत्यर्थी की उम्मीदवारी को अस्वीकार करना न्यायोचित था। 6.[4] इस प्रक्रम पर दयाशंकर यादव (पूर्वोक्त) क े मामले में इस न्यायालय क े विनिश्चय को निर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित है। पैरा 14 और 16 में, यह निम्नलिखित रूप में अभिनिर्धारित किया गया हैः “14. इस मामले में प्रासंगिक क ें द्रीय रिजर्व पुलिस बल नियम, 1955 का नियम 14 सत्यापन से संबंधित है। उक्त नियम क े खंड (क) और (ख) नीचे उद्धृत किए गए हैंः "14. सत्यापन- (क) जैसे ही किसी व्यक्ति का नामांकन किया जाता है, उसक े चरित्र, पूर्ववृत्त, संबंध और आयु का सत्यापन समय-समय पर क े न्द्रीय सरकार द्वारा विहित प्रक्रिया क े अनुसार किया जाएगा। सत्यापन नामावली उस जिले क े जिला मजिस्ट्रेट या उपायुक्त को भेजी जाएगी, जिसका भर्ती किया गया व्यक्ति निवासी है। (ख) सत्यापन रोल सीआरपी फॉर्म 25 में होगा और सत्यापन क े बाद संबंधित बल क े सदस्य क े चरित्र और सेवा रोल क े साथ संलग्न किया जाएगा।" उक्त जानकारी मांगने का उद्देश्य उम्मीदवार क े चरित्र और पूर्ववृत्त का पता लगाना है ताकि पद क े लिए उसकी उपयुक्तता का आंकलन किया जा सक े । इसलिए, उम्मीदवार को इन कॉलम में सवालों का सच्चाई और पूरी तरह से जवाब देना होगा और इसमें किसी भी गलत प्रस्तुति या गलत बयान को देना, अपने आप में एक वर्दीधारी सुरक्षा सेवा क े लिए अनुपयुक्त आचरण या चरित्र को प्रदर्शित करेगा।

16. इस प्रकार किसी आपराधिक मामले में उसकी दोषसिद्धि या किसी आपराधिक अपराध में उसकी संलिप्तता (भले ही उसे तकनीकी आधार पर या संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया हो) या अन्य आचरण (जैसे परीक्षा में नकल करना) या निष्कासन या निलंबन या कॉलेज से प्रतिबंध आदि क े आधार पर किसी आपराधिक अपराध क े लिए अभियोजन या दोषसिद्धि से संबंधित प्रश्नों क े उत्तर में (भले ही वह अंततः आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया हो) सामग्री की जानकारी को दबाने या झूठा बयान देने क े आधार पर परिवीक्षा पर किसी कर्मचारी को सेवा से डिस्चार्ज किया जा सकता है या किसी संभावित कर्मचारी को रोजगार से इनकार किया जा सकता है। यह आधार पिछले पूर्ववृत्त और चरित्र क े आधार से अलग है, क्योंकि यह वर्तमान संदिग्ध आचरण और घोषणा करते समय चरित्र की अनुपस्थिति को दर्शाता है, जिससे वह पद क े लिए अनुपयुक्त हो जाता है। 6.[5] ए. पी. बनाम बी. चिन्नाम नायडू राज्य, (2005) 2 एस. सी. सी. 746 में, इस न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया है कि अनुप्रमाणन प्रपत्र में सूचना की अपेक्षा करने का उद्देश्य और तत्पश्चात् अभ्यर्थी द्वारा की गई घोषणा का उद्देश्य सेवा में प्रवेश करने या जारी रखने क े लिए उसकी उपयुक्तता का निर्णय करने क े लिए चरित्र और पूर्ववृत्त का अभिनिश्चय और साक्षीकरण करना है। यह भी देखा गया है कि जब कोई उम्मीदवार सामग्री संबंधी जानकारी छिपाता है और/या गलत जानकारी देता है, तो वह नियुक्ति या सेवा में बने रहने क े लिए किसी भी अधिकार का दावा नहीं कर सकता है। 6.[6] देवेंद्र क ु मार बनाम उत्तरांचल राज्य, (2013) 9 एस. सी. सी. 363 में, प्रशिक्षण में शामिल होने क े दौरान, कर्मचारी से क ु छ निश्चित जानकारी, विशेष रूप से, कि क्या वह कभी किसी आपराधिक मामले में शामिल रहा है, देते हुए एक शपथ पत्र प्रस्तुत करने क े लिए कहा गया था। कर्मचारी ने यह कहते हुए एक शपथ पत्र प्रस्तुत किया कि वह कभी भी किसी आपराधिक मामले में शामिल नहीं था। कर्मचारी ने संतोषजनक रूप से अपना प्रशिक्षण पूरा किया और इसी समय नियोक्ता को चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया क े अनुसरण में पता चला कि कर्मचारी वास्तव में एक आपराधिक मामले में शामिल था। यह पाया गया कि उस मामले में अंतिम रिपोर्ट अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई थी और संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकार की गई थी । इसक े आधार पर, कर्मचारी को इस आधार पर अचानक हटा दिया गया क्योंकि वह एक अस्थायी सरकारी कर्मचारी था, इसलिए उसे बिना किसी जांच क े सेवा से हटाया जा सकता है। कर्मचारी द्वारा उक्त आदेश को उच्च न्यायालय क े एकल न्यायाधीश क े समक्ष एक रिट याचिका दायर करक े चुनौती दी गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। खण्ड पीठ ने उस आदेश को बरकरार रखा, जो इस े समक्ष अपील का विषय था। अपील को खारिज करते हुए, इस न्यायालय ने टिप्पणी की और कहा कि सवाल यह नहीं है कि कर्मचारी इस पद क े लिए उपयुक्त है या नहीं। किसी आपराधिक मामले/कार्यवाही का लंबित होना इस तरह विचाराधीन मामलों की जानकारी को छ ु पाने से अलग है। किसी व्यक्ति क े खिलाफ लंबित मामले में नैतिक अधमता शामिल नहीं हो सकती है, लेकिन इस जानकारी को छ ु पाना ही नैतिक अधमता है। यह आगे देखा गया है कि नियोक्ता द्वारा मांगी गई जानकारी यदि आवश्यक रूप से प्रकट नहीं की जाती है, तो निश्चित रूप से भौतिक जानकारी को छिपाना होगा और उस स्थिति में, सेवा समाप्त होने क े लिए उत्तरदायी हो जाएगी, भले ही आगे कोई मुकदमा न चला हो या संबंधित व्यक्ति बरी हो गया हो। 6.[7] जैनेन्द्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2012) 8 एस. सी. सी. 748, पैरा 29.[4] क े मामले में, इस न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया है और अभिनिर्धारित किया है कि “कोई अभ्यर्थी तात्विक जानकारी को दबाने और/या झूठी जानकारी देने क े कारण सेवा में बने रहने का दावा नहीं कर सकता और नियोक्ता को रोजगार की प्रक ृ ति क े साथ-साथ अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपनी सेवाएं समाप्त करने का विवेकाधिकार है। पैरा 29.[6] में आगे यह देखा गया है कि जो व्यक्ति तात्विक जानकारी को दबाता है और/या गलत जानकारी देता है, वह नियुक्ति या सेवा में निरंतरता क े लिए किसी भी अधिकार का दावा नहीं कर सकता है। पैरा 29.[7] में यह देखा गया है और अभिनिर्धारित किया गया है कि वर्दीधारी सेवा में सेवा करने क े लिए आशयित व्यक्ति से अपेक्षित मानक अन्य सेवाओं से काफी भिन्न है और इसलिए, महत्वपूर्ण जानकारी क े संबंध में किसी भी जानबूझकर बयान या चूक को गंभीरता से लिया जा सकता है और नियुक्ति प्राधिकारी क े अंतिम निर्णय को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। 6.[8] दया शंकर यादव बनाम भारत संघ, (2010) 14 एस. सी. सी. 103 में, इस न्यायालय को पूर्ववृत्तों क े संबंध में जानकारी मांगने क े प्रयोजन पर विचार करने का अवसर मिला। यह पाया गया है और अभिनिर्धारित किया गया है कि पूर्ववृत्त क े संबंध में जानकारी मांगने का उद्देश्य उम्मीदवार क े चरित्र और पूर्ववृत्त का पता लगाना है ताकि पद क े लिए उसकी उपयुक्तता का आकलन किया जा सक े । यह भी देखा गया है कि जब कोई कर्मचारी या संभावित कर्मचारी सत्यापन प्रपत्र में चरित्र और पूर्ववृत्त से संबंधित प्रश्नों क े उत्तर घोषित करता है, तो उसक े सत्यापन क े निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैंः(एससीसी पृ. 110-11, पैरा 15) “15. (क) यदि घोषणा करने वाले ने प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर दिया है और किसी आपराधिक मामले का ब्यौरा प्रस्तुत किया है (जिसमें उसे साक्ष्य क े अभाव में संदेह का लाभ देकर दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया गया था), तो नियोक्ता उसे रोजगार देने से इंकार कर सकता है (या यदि पहले से ही परिवीक्षा पर नियोजित है, तो उसे सेवा से मुक्त कर सकता है), यदि वह उस अपराध/अपराध की प्रक ृ ति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए अयोग्य पाया जाता है, जिसमें वह शामिल था। (ख) दूसरी ओर, यदि नियोक्ता को पता चलता है कि ऐसे अपराधों से संबंधित जो तकनीकी थे, या ऐसे प्रक ृ ति क े थे जो घोषणा करने वाले की रोजगार क े लिए योग्यता को प्रभावित नहीं करते थे, या जहां घोषणा करने वाले को सम्मानजनक रूप से बरी कर दिया गया था और दोषमुक्त कर दिया गया था, तो नियोक्ता इस तथ्य की अनदेखी कर सकता है कि घोषणा करने वाले पर किसी आपराधिक मामले में मुकदमा चलाया गया था और उसे नियुक्त करने या उसे रोजगार में जारी रखने क े लिए आगे बढ़ सकता है। (ग) जहां घोषणाकर्ता ने नकारात्मक रूप से प्रश्नों का उत्तर दिया है और सत्यापन पर यह पाया गया है कि उत्तर गलत थे, वहां नियोक्ता घोषणाकर्ता को नियोजित करने से इनकार कर सकता है (या उसे डिस्चार्ज कर सकता है, यदि वह पहले से ही नियोजित है), भले ही घोषणाकर्ता को आरोपों से मुक्त कर दिया गया हो या बरी कर दिया गया हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब उसक े चरित्र से संबंधित तात्विक जानकारी का दमन या अप्रकटन होता है, तो यह स्वयं घोषणाकर्ता को नियोजित न करने का एक कारण बन जाता है। (घ) जहां साक्षीकरण प्रपत्र या साक्षीकरण प्रपत्र में घोषणा करने वाले से किसी आपराधिक कार्यवाही में अपनी संलिप्तता का खुलासा करने की अपेक्षा करने वाले उचित या पर्याप्त प्रश्न नहीं हैं, या जहां उम्मीदवार को साक्षीकरण रोल/साक्षीकरण प्रपत्र में घोषणाएं करने क े दौरान आपराधिक कार्यवाही की शुरुआत क े बारे में जानकारी नहीं थी, वहां उम्मीदवार को संबंधित जानकारी न देने क े लिए दोष नहीं पाया जा सकता है। लेकिन यदि नियोक्ता को अन्य साधनों (जैसे पुलिस सत्यापन या शिकायतें आदि) से घोषणा करने वाले की भागीदारी क े बारे में पता चलता है, तो नियोक्ता (ए) या (बी) उपरोक्त पाठ्यक्रमों का सहारा ले सकता है। इसक े बाद यह पाया गया है कि किसी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त किया जा सकता है या किसी संभावित कर्मचारी को किसी आपराधिक अपराध क े लिए अभियोजन या दोषसिद्धि से संबंधित प्रश्नों क े उत्तर में (भले ही उसे अंततः आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया हो) इस आधार पर रोजगार से इनकार किया जा सकता है। 6.[9] मध्य प्रदेश राज्य बनाम अभिजीत सिंह पवार, (2018) 18 एस. सी. सी. 733 में, जब कर्मचारी ने चयन प्रक्रिया में भाग लिया, तो उसने अपने विरुद्ध लंबित आपराधिक मामले को प्रकट करते हुए एक शपथ पत्र दिया।यह शपथ पत्र 22-12- 2012 को दायर किया गया था।प्रकटीकरण क े अनुसार, वर्ष 2006 में दर्ज एक मामला उस तारीख को लंबित था जब शपथ पत्र प्रस्तुत किया गया था। हालांकि, इस तरह का शपथ पत्र करने क े चार दिनों क े भीतर मूल शिकायतकर्ता और कर्मचारी क े बीच समझौता हो गया और सीआरपीसी की खंड 320 क े तहत अपराध का शमन करने क े लिए एक आवेदन दायर किया गया। समझौते क े विलेख को देखते हुए कर्मचारी को छ ु ट दे दी गई। उसक े बाद कर्मचारी का चयन किया गया और उसे चिकित्सा जांच क े लिए बुलाया गया। हालांकि, लगभग उसी समय, उनक े चरित्र का सत्यापन भी किया गया और चरित्र सत्यापन रिपोर्ट पर उचित विचार करने क े बाद, उनकी उम्मीदवारी को खारिज कर दिया गया। कर्मचारी ने अपनी उम्मीदवारी की अस्वीक ृ ति को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय क े विद्वान एकल न्यायाधीश ने उक्त रिट याचिका की अनुमति दी। विद्वत एकल न्यायाधीश द्वारा राज्य को कर्मचारी की नियुक्ति करने का निर्देश देने वाले निर्णय और आदेश की खण्ड पीठ द्वारा पुष्टि की गई, जिसक े कारण इस े समक्ष अपील की गई । अवतार सिंह बनाम भारत संघ, (2016) 8 एस. सी. सी. 471 वाले मामले में विनिश्चय सहित मुद्दे पर विनिश्चयों पर विचार करने क े पश्चात्, इस न्यायालय ने कर्मचारी की उम्मीदवारी को अस्वीकार करने क े राज्य क े आदेश को यह कहते हुए कायम रखा कि जैसा अवतार सिंह (पूर्वोक्त) में अभिनिर्धारित किया गया था, उन मामलों में भी जहां किसी अंतिम मामले क े बारे में सच्चा प्रकटन किया गया था, नियोक्ता को अभ्यर्थी क े पूर्ववृत्त पर विचार करने का अधिकार होगा और उसे ऐसे अभ्यर्थी को नियुक्त करने क े लिए विवश नहीं किया जा सकता।

6.10 अवतार सिंह (उपर्युक्त) में अभिजीत सिंह पंवार (उपर्युक्त) में विनिश्चय क े पैरा 38.[5] को पुनः प्रस्तुत करने और/या पुनर्विचार करने क े पश्चात्, पैरा 13 में इस न्यायालय ने निम्नलिखित मत व्यक्त किया और अभिनिर्धारित कियाः "13. अवतार सिंह [अवतार सिंह बनाम भारत संघ, (2016) 8 एस. सी. सी. 471] में, यद्यपि यह न्यायालय मुख्य रूप से सूचना क े गैर-प्रकटन या गलत प्रकटन क े प्रश्न से संबंधित था, पैरा 38.[5] में यह मत व्यक्त किया गया था कि ऐसे मामलों में भी जहां किसी निष्कर्ष मामले क े बारे में सच्चा प्रकटन किया गया था, नियोक्ता को अभी भी उम्मीदवार क े पूर्ववृत्तों पर विचार करने का अधिकार होगा और उसे ऐसा उम्मीदवार नियुक्त करने क े लिए मजबूर नहीं किया जा सकता था।"

6.11 हाल ही में, राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड बनाम अनिल क ं वरिया, (2021) 10 एससीसी 136 क े मामले में, इस न्यायालय को एक कर्मचारी की ओर से, जिसकी सेवाओं को इस आशय की झूठी घोषणा दायर करने क े आधार पर समाप्त कर दिया गया था कि न तो उसक लंबित है और न ही उसे किसी न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया है, यह कहने पर कि बाद में उसे अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की खंड 12 का लाभ प्रदान किया गया है और इसलिए उसकी सेवाओं को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए था। इस न्यायालय ने पैरा 13 और 14 में निम्नलिखित मत व्यक्त किया हैः "13. अन्यथा भी, बाद में 1958 क े अधिनियम की खंड 12 का लाभ प्राप्त करना प्रत्यर्थी क े लिए सहायक नहीं होगा क्योंकि सवाल 14-4-2015 को एक झूठी घोषणा दायर करने क े बारे में है कि न तो उसक लंबित है और न ही उसे किसी अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया है, जो 1958 क े अधिनियम की खंड 12 का लाभ देने वाले विद्वत सत्र न्यायालय द्वारा पारित आदेश से बहुत पहले था।जैसाकि इसमें ऊपर कहा गया है, बाद में दोषमुक्ति क े मामले में भी कर्मचारी ने एक बार झूठी घोषणा की और/या लंबित आपराधिक मामले क े तात्विक तथ्य को दबाया तो वह अधिकार क े रूप में नियुक्ति का हकदार नहीं होगा।"

14. इस मुद्दे/प्रश्न पर नियोजक क े दृष्टिकोण से एक अन्य दृष्टिकोण से विचार किया जा सकता है। सवाल यह नहीं है कि क्या कोई कर्मचारी मामूली प्रक ृ ति क े विवाद में शामिल था और क्या उसे बाद में बरी कर दिया गया है या नहीं। प्रश्न ऐसे कर्मचारी की विश्वसनीयता और/या विश्वसनीयता क े बारे में है जो रोजगार क े प्रारंभिक चरण में अर्थात घोषणा/सत्यापन प्रस्तुत करते समय और/या किसी पद क े लिए आवेदन करते समय झूठी घोषणा करता है और/या खुलासा नहीं करता है और/या आपराधिक मामले में शामिल होने क े तात्विक तथ्य को दबाता है। यदि सही तथ्यों का खुलासा किया गया होता, तो नियोक्ता ने उसे नियुक्त नहीं किया होता। सवाल विश्वास का है, ऐसी स्थिति में, जहां नियोक्ता को लगता है कि कोई कर्मचारी जिसने प्रारंभिक चरण में ही गलत बयान दिया है और/या तथ्यों का खुलासा नहीं किया है और/या भौतिक तथ्यों को दबाया नहीं है और इसलिए उसे सेवा में जारी नहीं रखा जा सकता है क्योंकि ऐसे कर्मचारी पर भविष्य में भी भरोसा नहीं किया जा सकता है, नियोक्ता को इस तरह क े कर्मचारी को जारी रखने क े लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। कर्मचारी को जारी रखने या न रखने का विकल्प हमेशा नियोक्ता को दिया जाना चाहिए। दोहराव की कीमत पर, यह देखा गया है और जैसा कि इसमें ऊपर निर्णय की शर्त में कहा गया है कि ऐसा कर्मचारी नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता है और/या अधिकार क े रूप में सेवा में बना रह सकता है।

7. उपर्युक्त मामलों में इस न्यायालय द्वारा अधिकथित विधि को लागू करते हुए यह नहीं कहा जा सकता है कि वर्तमान मामले में कांस्टेबल क े पद क याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को अस्वीकार करने में प्राधिकारी ने कोई त्रुटि की है।

8. वैसे भी यह नोट किया जाना आवश्यक है कि बाद में और विद्वत एकल न्यायाधीश क े साथ-साथ खण्ड पीठ क े समक्ष कार्यवाही क े दौरान, मूल रिट याचिकाकर्ता क े खिलाफ तीन से चार अन्य एफआईआर दायर की जाती हैं, जो आपराधिक मुकदमों में परिणत होती हैं और दो मामलों में उसे समझौते क े आधार पर बरी कर दिया गया है और एक में दोषी ठहराए जाने पर भी उसे अपराधी परिवीक्षा अधिनियम का लाभ दिया गया है। उसक े खिलाफ एक और आपराधिक मामला लंबित है। इसलिए मूल रिट याचिकाकर्ता को कांस्टेबल क े ऐसे पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता।

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9. उपर्युक्त चर्चा को ध्यान में रखते हुए और ऊपर बताए गए कारणों से विद्वत एकल न्यायाधीश और खण्ड पीठ दोनों ने कांस्टेबल क े लिए प्रत्यर्थी क े मामले पर विचार करने क े लिए राज्य को निर्देश देने में गलती की है। उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय और आदेश तथ्यों क े साथ-साथ कानून क े आधार पर भी टिकाऊ नहीं है। इन परिस्थितियों में, इसे रद्द किया जाना चाहिए और अलग रखा जाना चाहिए और तदनुसार खारिज किया जाता है और रद्द किया जाता है । यह अभिनिर्धारित किया गया है कि कांस्टेबल क े पद क े लिए प्रत्यर्थी-मूल रिट याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी उचित प्राधिकारी द्वारा उचित रूप से अस्वीकार कर दी गई थी । तदनुसार वर्तमान अपील स्वीकार की जाती है।मामले क े तथ्यों और परिस्थितियों में, लागत क े बारे में कोई आदेश नहीं दिया जाता है। (एम. आर. शाह) (बी. वी. नागरत्ना) नई दिल्ली, 11 मई, 2022 (Translation has been done through AI Tool: SUVAS with the help of Translator) Disclaimer: The translated judgment in vernacular language made for the restricted use of the litigant to understand it in his/her language and may not be used for any other purposes. For all practical and official purposes, the English version of the judgment shall be authentic and shall hold the field for the purpose of execution and implementation.